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Tuesday, February 1, 2011

तेरे लिए किशमिश चुनें, पिस्ते चुनें: ऐसे मासूम बोल पर सात क्या सत्तर खून माफ़! गुलज़ार और विशाल का कमाल!

Taaza Sur Taal (TST) - 04/2011 - SAAT KHOON MAAF

एक गीतकार जो सीधे-सीधे यीशु से सवाल पूछता है कि तुम अपने चाहने वालों को कैसे चुनते हो, एक गीतकार जो अपनी प्रेमिका के लिए परिंदों से बागों का सौदा कर लेता है ताकि उसके लिए किशमिश और पिस्ते चुन सके, एक गीतकार जो प्रेमिका की तारीफ़ के लिए "म्याउ-सी लड़की" जैसे संबोधन और उपमाओं की पोटली उड़ेल देता है, एक गीतकार जो आँखों से आँखें चार करने की जिद्द तो करता है, लेकिन मुआफ़ी भी माँगता है कि "सॉरी तुझे संडे के दिन ज़हमत हुई", एक गीतकार जो ओठों से ओठों की छुअन को "ऒठ तले चोट चलने" की संज्ञा देता है, एक गीतकार जो सूखे पत्तों को आवारा बताकर ज़िंदगी की ऐसी सच्चाई बयां करता है कि सीधी-सादी बात भी सूफ़ियाना लगने लाती है .. यह एक ऐसे गीतकार की कहानी है जो शब्दों से ज्यादा भाव को अहमियत देता है और इसलिए शब्दों के गुलेल लेकर भावों के बगीचे में नहीं घुमता, बल्कि भावों के खेत में खड़े होकर शब्दों की चिड़ियों को प्यार से अपने दिल के मटर मुहैया कराता है और फिर उन चिड़ियों को छोड़ देता है खुले आसमान में परवाज़ भरने के लिए, फिर जो भी बहेलिया उन चिड़ियों को अपनी समझ के गुलेल से बस में करने की कोशिश करता है, उसे उन "परिंदों" के पर हीं नसीब होते है, लेकिन जिसे खुले आसमान से प्यार है, वह उन "पाखियों" की हरेक उड़ान का मर्म जान लेता है और न जानते हुए भी जुड़ जाता है उस जादूगर से जिसके पास बार-बार लौटकर ये पंछी जाया करते हैं। यह एक ऐसे गीतकार की कहानी है, जिसे यूँ हीं "गुलज़ार" नहीं कहा जाता।

अब खैर तो नहीं,
कोई बैर तो नहीं,
दुश्मन जिये मेरा,
वो भी गैर तो नहीं..
(ओ मामा)

अपने दिल को इतने प्यार से शायद हीं किसी ने दुश्मन कहा होगा, वैसे भी गुलज़ार साहब दिल और चाँद से खेलने में माहिर है.. आखिर इन्होंने हीं "दिल को पड़ोसी" कहा था और "चाँद को थाली में परोस" दिया था.. शायद हीं ऐसी कोई नज़्म या ग़ज़ल होती है, जिसमें ये चाँद का ज़िक्र नहीं करते। संभव है कि किसी नज़्म या ग़ज़ल में ये चाँद का ज़िक्र करना भूल गए हों लेकिन "एलबम" या "फिल्म" के किसी न किसी गीत में चाँद की बात निकल हीं आती है, लेकिन यह क्या... मेरे हिसाब से "सात खून माफ़" अकेली या पहली फिल्म होगी जिसमें चाँद नदारद है.. हाँ तारे हैं, गुलज़ार साहब तारों को नहीं भूलते और इसलिए कहते हैं कि "तेरे लिए मैं सीसे का आसमान बुन दूँगा, ताकि पैर में तारों की किरचियाँ न चुभें" ("तेरे लिए")। सुरेश वाडेकर साहब ने इस गाने में क्या मिसरी घोली है, उसका बयान शब्दों में नहीं किया जा सकता। "तेरे लिए किशमिश चुनें, पिस्ते चुनें".. इन लफ़्ज़ों को सुनते हीं कश्मीर की वादी आँखों के सामने आ जाती है। वाडेकर साहब से विशाल ने इस गाने में वही तिलिस्म बुनवाया है, जो ओंकारा के "जाग जा" में नज़र आया था।

गुलज़ार साहब "तू" से "आप" का सफ़र बड़ी हीं ईमानदारी और बड़े हीं प्यार से पूरा करते हैं। मुझसे अगर एक गीतकार की हैसियत से पूछा जाए तो मुझे "तू" और "आप" दोनों हीं प्यारे हैं, लेकिन "तू" कुछ ज्यादा प्यारा है। किसी को "आप" कहकर "दिल" उड़ेल देना मुझे थोड़ा मुश्किल का काम लगता आया है, लेकिन "बेकरां" में जिस तरह से गुलज़ार साहब ने अपने नायक से "एक ज़रा चेहरा उधर कीजै इनायत होगी.......... लिल्लाह!!!" कहवा दिया है, उसके बाद तो मेरे सारे शक़-ओ-शुबहा दूर हो गए। हाँ ,अपनी प्रेयसी को "आप" कहकर भी उससे(उनसे) इश्क़ जताया जा सकता है और वो भी बड़े हीं लाजवाब तरीके से। "आँख कुछ लाल-सी है, रात जागे तो नही, रात जब बिजली गई, डर के भागे तो नही".. वाह! क्या मासूमियत है इन शब्दों में.. इस गीत को विशाल से अच्छी कोई आवाज़ नहीं मिल सकती थी.. "ओंकारा" के "ओ साथी रे" के बाद विशाल ने अपनी आवाज़ का मखमलीपन इसी गीत के लिये बचाकर रखा था मानो!

बरसों पहले जब गुलज़ार साहब ने एक नज़्म के माध्यम से भगवान शंकर से प्रश्न किया था कि "इतने सारे लोग तुम्हें दूध से नहवाते है, चिपचिपा कर देते हैं तुम्हें, धूप और अगरू के धुएँ से तुम्हारी नाक में दम कर देते हैं, फिर भी तुम हिलते-डुलते नहीं, ना हीं अपनी परेशानी बयां करते हो और ना दूसरों की परेशानी हीं सुनते हो"... "एक ज़रा छींक हीं दो तुम कि यकीं आए कि सब देख रहे हो" तभी मालूम पड़ गया था कि यह शायर ऊपर वाले से आँख में आँख डालकर सवाल पूछने की कुव्वत रखता है... तभी तो जब "यीशु" गाने में ये कहते हैं कि "गिरज़े का गज़र सुनते हो? फिर भी क्यूँ चुप रहते हो?" "क्या जिस्म ये बेमानी है, क्या रूह गरीब होती है, तुम प्यार हीं प्यार हो लेकिन, क्या प्यार सलीब होती है?" तो उस सर्वशक्तिमान की सत्ता भी कांपने लगती है। भला किसमें इतनी हिम्मत होगी जो यीशु से यह पूछे कि "रूई की तरह इस जिस्म को तुम कैसे धुनते हो?" जिस्म और रूह के अस्तित्व और अहमियत के ऐसे सवाल हमेशा-से हीं यक्ष-प्रश्न रहे हैं, काश कभी इसका जवाब मिल जाए! रेखा भारद्वाज जिस तरह से रूह में रूई डुबोकर यीशु के सलीब के सामने सवालों की एक सूची तैयार करती हैं, उससे नामुमकिन है कि "यीशु" ज्यादा देर तक चुप रह पाएँगे। सुनने वाले तो कतई नहीं रह सकते.. उनके दिलों से वाह और आह तो निकल हीं आएगी।

"खादिम को दिल पर तो इख्तियार करने दो" हो या फिर "खादिम हूँ, शहजादी को तैयार करने दो" यानि कि "डार्लिंग" हो या फिर "दूसरी डार्लिंग".. दोनों हीं मामलों में "रसियन धुन" पर थिरकती बावली को खुद के खादिम होने पर बड़ा ही गुमान है। खुद को अपने प्रेमी पर निछावर करने की ऐसी तड़प है कि वह "उसके मिलने" को "वस्ल-ए-ख़ुदा" (ख़ुदा से मिलना) मान बैठी है और इस बात से वह कतई भी शर्मिंदा नहीं है तभी तो कहती है कि "पब्लिक में सनसनी एक बार करने दो"। इस गीत में उषा उत्थुप की मर्दानी आवाज़ (जिसमें डार्लिंग की लंबी तान एक गूंज बनकर कानों में उतरती है) और रेखा भारद्वाज का "हस्कीनेस" एक दूसरे के पूरक बनकर सामने आते हैं। यहाँ पर कौन श्रेष्ठ है का निर्णय करना जितना मुश्किल है, उतना हीं फिजूल भी। "दूसरी डार्लिंग" में उषा उत्थुप पार्श्व में चली गई हैं जहाँ पर पहले से क्लिंटन सेरेजो और फ़्रैक्वाईस कैस्टेलिनों मौजूद हैं। इस गाने की धुन एक रसियन "लोक-गीत" की धुन पर आधारित है। उस रसियन गीत को यहाँ और यहाँ सुना जा सकता है।

अगले गीत की बात करूँ उससे पहले मैं उस गीत (आवारा) के बोलों की तरफ़ सबका ध्यान आकृष्ट कराना चाहूँगा:

आवारा आवारा
हवा पे रखे सूखे पत्ते आवारा
पाँव जमीं पे लगते ही उड़ लेते हैं दुबारा
ना शाख जुड़े ना जड़ पकड़े
मौसम मौसम बंजारा

झोंका झोंका ये हवा
रोज़ उड़ाये रे
जाकी डा्ल गयी वो तो बीत गया
जाकी माटी गयी वो का मीत गया
कोई न बुलाये रे
रुत रंग लिये आई भी गई
मुठ्ठियाँ ना खुली बेरंग रही
सूखा पत्ता बंजारा


पेड़ से उतर चुके सूखे पत्तों की मिसाल देकर गुलज़ार साहब रूह से उतर चुकी जिस्म या फिर दो इंसानों के बीच खत्म चुके संबंध की कहानी कहते हैं। एक बार जो जिस्म उतर जाए वह फिर से रूह से जुड़ नहीं पाता, एक बार रिश्ते की जो डोर टूट जाए वह फिर से अपने असल रूप में आ नहीं पाती। पल भर को पत्ते जमीं पर पड़े रहें तो इसका मतलब यह नहीं होता कि उसे जड़ नसीब होने वाला है, क्योंकि अगले हीं पल उसे हवा उड़ाकर कहीं और जा पटकती है। जो एक बार डाल छोड़ दे, वह उस डाल के लिए अतीत हो जाता है, जो एक बार माटी छोड़ दे, वह अपनी ज़िंदगी हीं गंवा बैठता है, फिर चाहे कितने भी मौसम आएँ और जाएँ उस पत्ते के लिए मौसम की मुट्ठी में कोई भी पैगाम, कोई भी खुशखबरी नहीं होती। और इस तरह वह सूखा पत्ता आवारा और बंजारा बनकर रह जाता है। इस लिए यही कोशिश होनी चाहिए कि "वह डोर कभी न टूटे".. आखिर रहीम ने भी तो कहा है:

रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय,
टूटे तो फिर ना जुड़े, जुड़े गांठ पड़ि जाय
...

रहींम तो इस बात का यकीन दिलाते हैं कि जुड़ना संभव है, लेकिन गुलज़ार साहब की नज़रों में "एक बार नज़र से गिरे तो फिर नज़र में चढने की कोई संभावना नहीं है।" इस गीत को पढने के बाद ऐसा लगता है कि राहत फ़तेह अली ख़ान साहब हीं इसके साथ सही न्याय कर सकते हैं, लेकिन विशाल ने इस बार एक नए गायक "मास्टर सलीम" में अपना यकीन दिखाया है और यकीनन सलीम साहब इसे निबाहने में खरे उतरते हैं।

अगले दो गाने "ओ मामा" और "दिल दिल है" रॉक शैली के हैं। "ओ मामा" में के के की आवाज़ है तो "दिल दिल है" में "सूरज जगन" की। "के के" लगभग दस साल बाद विशाल के साथ लौटे हैं। "अनुराग कश्यप" की "अनरीलिज़्ड फिल्म" "पाँच" में "के के" के गाए गीत "सर झुका ख़ुदा हूँ मैं" को बहुत सारी प्रशंसा हासिल हुई थी। अगर यह फिल्म रीलिज़ हुई होती तो निस्संदेह यह प्रशंसा सैकड़ों गुणा बढ चुकी होती, लेकिन संगीत की सही समझ रखने वालों को इससे कोई खासा फ़र्क नहीं पड़ता। हम सब "के के" की काबिलियत से अच्छी तरह वाकिफ़ है, इसलिए "ओ मामा" में "म्याऊँ-सी लड़की" सुनकर खुश भी होते हैं और झूम भी पड़ते हैं। जहाँ तक "दिल दिल है" की बात है तो "सूरज जगन" की गायकी "विशाल दादलानी" की तरह सुनाई पड़ती है। सूरज कहीं भी कमजोर नहीं पड़े हैं, लेकिन मेरे हिसाब से विशाल दादलानी होते तो बात हीं कुछ और होती। वैसे यह अच्छी ख़बर है कि विशाल भारद्वाज कुछ गिने-चुने गायकों तक हीं सीमित नहीं है, बल्कि नए-नए गायकों को उनकी आवाज़ और पहुँच के हिसाब से मौका दे रहे हैं। अगर ऐसी बात नहीं होती तो हमें इस फ़िल्म में "सुखविंदर" और "राहत" साहब के गाने सुनने को ज़रूर मिलते।

आपने गौर किया होगा कि हमारी यह समीक्षा "गीतकार" के लिए ज्यादा थी बनिस्पत संगीतकार और गायक-गायिकाओं के। अब क्या करें हम! जहाँ गुलज़ार साहब नज़र आ जाते हैं तो नज़र उनसे हटती हीं नहीं। और वैसे भी हमारी संगीत की समझ बहुत कम है। हम किसी भी गाने में बोल को तरज़ीह देते हैं, क्योंकि हम खुद ठहरे एक "संघर्षरत गीतकार" :)

वैसे एक बात कहना चाहूँगा कि आज के दौर में "विशाल भारद्वाज" एकमात्र ऐसे संगीतकार हैं जो "कविता" की कद्र करते हैं और जानते हैं कि "एक गीतकार" (अमूमन "गुलज़ार साहब") के शब्दों को कितनी अहमियत दी जानी चाहिए, तभी तो इनका हर एक गीत दिल के करीब पहुँच जाता है।

चलिए तो अब आज की बातचीत पर यहीं पूर्णविराम लगाते हैं। अगली मुलाकात अगले हफ़्ते होगी। तब तक "दिल दिल है" गाने से "दिल" की परिभाषा जानने की कोशिश की जाए:

सौ जन्नतों के काबिल है,
यह जाहिलों का जाहिल है..
दिल दर्द की मटकी, दिल जान की आफ़त,
बदमाशियाँ करके, दिखलाए शराफ़त..
जो दिल को चुरा ले, दिल उसकी अमानत,
सब इश्क़ के मुजरिम, एक दिल की जमानत
......

आवाज़ रेटिंग - 9/10

सुनने लायक गीत - डार्लिंग, दूसरी डार्लिंग, बेकरां, तेरे लिए, आवारा, यीशु, ओ मामा




अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं। "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है। आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रूरत है उन्हें ज़रा खंगालने की। हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं।

Thursday, April 8, 2010

गलियों में घूमो, सड़कों पे झूमो, दुनिया की खूब करो सैर....आशा और उषा का है ये सुरीला पैगाम

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 398/2010/98

'सखी सहेली' शृंखला की आज की कड़ी में एक ज़बरदस्त हंगामा होने जा रहा है, क्योंकि आज के अंक के लिए हमने दो ऐसी गायिकाओं को चुना है जो अपनी हंगामाख़ेज़ आवाज़ के लिए जानी जाती रहीं हैं। इनमें से एक तो और कोई नहीं बल्कि आशा भोसले हैं, जो हर तरह के गीत गा सकने में माहिर हैं, और दूसरी आवाज़ है उषा अय्यर की। जी हाँ, वही उषा अय्यर, जो बाद में उषा उथुप के नाम से मशहूर हुईं। उषा जी पाश्चात्य और डिस्को शैली के गीतों के लिए जानी जाती हैं और उनका स्टेज परफ़ॊर्मैन्स इतना ज़रबदस्त होता है कि श्रोतागण सब कुछ भूल कर उनके साथ थिरक उठते हैं, मचल उठते हैं। तो ज़रा सोचिए, अगर आशा जी की मज़बूत लेकिन पतली आवाज़ और उषा जी मज़बूत और वज़नदार आवाज़ एक साथ मिल जाएँ एक ही गीत में तो किस तरह का हंगामा पैदा हो जाए! इसी प्रयोग को आज़माया था राहुल देव बर्मन ने १९७० की फ़िल्म 'हरे रामा हरे कृष्णा' के दो गीतों में। वैसे पहले गीत "दम मारो दम" में आशा जी की ही आवाज़ मुख्य रूप से सुनाई देती है, लेकिन जो दूसरा गीत है उसमें दोनों गायिकाओं को एक दूसरे के साथ बराबर का टक्कर लेने का मौका मिला था। एक तरफ़ आशा भोसले ज़ीनत अमान के लिए हिंदी मे गा रही हैं, और दूसरी तरफ़ उषा अय्यर अंग्रेज़ी में एक फ़िरंगी हिप्पी लड़की के लिए गा रही हैं। हिप्पियों पर बने गीतों में शायद यह सब से लोकप्रिय फ़िल्मी गीत रहा है। राम और कृष्ण के नाम का सहारा लेकर नशे में डूबे रहने वाले हिप्पे समुदाय का सजीव चित्रण इस गीत के माध्यम से आनंद बक्शी, पंचम और इन दोनो गायिकाओं ने किया है। कुल मिलाकर एक बेहद ज़बरदस्त पाश्चात्य जुगलबंदी की मिसाल है यह गीत और गीत के बोल हैं, जी नहीं, ऐसे नहीं, बल्कि इस गीत के पूरे बोल हम नीचे लिख रहे हैं। क्या है कि अंग्रेज़ी के बोलों पर म्युज़िक इस तरह से हावी है कि बहुत से लोगों को सही शब्दों का पता नहीं चल पाता है। इसलिए ये रहे इस गीत के बोल, इनके सहारे आप भी इस गीत को सुनते हुए मन ही मन गुनगुनाइए।

"I love you,
Can't you see my blue eyes I really do
Oh please give me another, another little chance
Ha dum daba daba dam daba daba daba daba daba dab.....

क्या ख़ुशी क्या ग़म, जब तक है दम में दम,
अरे ओ कश पे कश लगाते जाओ,
हे.. गलियों में झूमूँ, सड़कों पे घूमूँ,
दुनिया की ख़ूब करूँ सैर।
हरे रामा करे कृष्णा हरे रामा हरे कृष्णा।

I love you
Can't you see my blue eyes I really do
Oh please give me another, another little chance
Ha dum daba daba dam daba daba daba daba daba dab.....

आ दीवाने हम, जब तक है दम में दम,
अरे ओ कश पे कश लगाते जाओ,
गोरे हो या काले, अपने है सारे,
दुनिया में कोई नहीं ग़ैर।
हरे रामा करे कृष्णा हरे रामा हरे कृष्णा।"

इस गीत में उषा जी जिस तरह से "हरे रामा करे कृष्णा" के बीच बीच में 'everybody' कहती हैं, यह उन्होने अपने स्टेज शोज़ में हमेशा बरकरार रखा है और यह उनका यूनिक स्टाइल भी बन गया था। आज उषा उथुप का गीत पंचम के संगीत में बज रहा है, तो आपको यह बता दें कि उषा जी और पंचम बहुत अच्छे दोस्त थे। विविध भारती पर उषा जी बताती हैं कि "मैं क्या बताऊँ, कुछ लोग समझते हैं कि only they have the authority to talk about R D Burman। ख़ैर, जो भी है, he and I shared a lot of music, we were really यार, real यारी थी हमारी।" तो चलिए, उसी यारी दोस्ती के नाम हो जाए यह तड़कता भड़कता गाना।



क्या आप जानते हैं...
कि उषा उथुप ने रिकार्ड कायम किया जब एच.एम.वी ने उनके गाए गीतों के ६ ग्रामोफ़ोन रिकार्ड्स निकाले, जो उस समय अपने आप में एक रिकार्ड था। उषा जी की आवाज़ और गायन शैली की तारीफ़ इंदिरा गांधी और नेल्सन मंडेला जैसे शख़्स भी कर चुके हैं।

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. पनघट पर पानी भरती सखी सहेलियों का है ये मधुर गीत, गीत बताएं-३ अंक.
2. राजस्थान में पानी की समस्या पर आधारित इस फिल्म के शीर्षक में भी "पानी" शब्द है, निर्देशक बताएं- २ अंक.
3. मीनू पुरुषोत्तम के साथ किस गायिका ने आवाज़ मिलायी है इस गीत में -२ अंक.
4. जयदेव की है धुन, गीतकार बताएं -२ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
वाह... चार जवाब, चारों सही, लगता है बहुत आसान पहेली रही ये. बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



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