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Tuesday, April 28, 2009

आलसी सावन बदरी उडाये...भूपेन दा के स्वरों में

बात एक एल्बम की # 04

फीचर्ड आर्टिस्ट ऑफ़ दा मंथ - भूपेन हजारिका.
फीचर्ड एल्बम ऑफ़ दा मंथ - मैं और मेरा साया, - भूपेन हजारिका (गीत अनुवादन - गुलज़ार)


बतौर संगीतकार अपनी पहली हिन्दी फ़िल्म 'आरोप' (1974) साईन में उन्होंने लता से 'नैनों में दर्पण है' गवाया. इस गाने के बारे में भूपेन दा बताते है "एक दिन जब मैं रास्ते से गुजर रहा था तब एक पहाड़ी लडके को गाय चराते हुए इस धुन को गाते सुना इस गाने से मै इतना प्रभावित हुआ कि मैंने उसी समय इस गाने की टियून को लिख लिया. हालांकि मैंने उसकी हू -बहू नक़ल नही किया मगर उसका प्लाट वही रखा ताकि उसकी आत्मा जिन्दा रहे.

और एक लम्बे अंतराल के बाद हिंदी में आई उनकी फिल्म "रुदाली" में एक बार फिर लता ने स्वर दिया उस अमर गीत को. 'दिल हूँ हूँ करे..." इस फिल्म में आशा ने अपनी आवाज़ से एक सजाया था बोल थे ...."समय धीरे चलो...". १९९२ में उन्हें दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया. वापस आते हैं हमारे फीचर्ड एल्बम की तरफ. "मैं और मेरा साया" में मूल असामी बोलों को हिंदी में तर्जुमा किया गुलज़ार साहब ने. गुलज़ार साहब ने इन सुंदर गीतों को हिंदी भाषी श्रोताओं को पेश कर बहुत उपकार किया है. इस एल्बम से गुजरना यानी भूपेन दा के मधुर स्वरों और शब्दों के असीम आकाश में विचरना. सच में एक अनूठा अनुभव है ये. आज इस अंतिम कड़ी में सुनिए ये तीन गीत -

ये किसकी सदा है ....


आलसी सावन बदरी उडाये....


और अंत में ये शीर्षक गीत - मैं और मेरा साया....


एल्बम "मैं और मेरा साया" के अन्य गीत यहाँ सुनें -

डोला रे डोला...
एक कली दो पत्तियां...
उस दिन की बात है रमैया...
हाँ आवारा हूँ...
कितने ही सागर....

भूपेन दा हिंदी फिल्म "एक पल" के सभी गीतों को सुनने के लिए यहाँ जाएँ -
दुर्लभ गीत फिल्म "एक पल" के

साप्ताहिक आलेख - उज्जवल कुमार



"बात एक एल्बम की" एक साप्ताहिक श्रृंखला है जहाँ हम पूरे महीने बात करेंगे किसी एक ख़ास एल्बम की, एक एक कर सुनेंगे उस एल्बम के सभी गीत और जिक्र करेंगे उस एल्बम से जुड़े फनकार/फनकारों की. इस स्तम्भ को आप तक ला रहे हैं युवा स्तंभकार उज्जवल कुमार. यदि आप भी किसी ख़ास एल्बम या कलाकार को यहाँ देखना सुनना चाहते हैं तो हमें लिखिए.


Tuesday, April 21, 2009

जेहन को सोच का सामान भी देते हैं भूपेन दा अपने शब्दों और गीतों से

बात एक एल्बम की # 03

फीचर्ड आर्टिस्ट ऑफ़ दा मंथ - भूपेन हजारिका.
फीचर्ड एल्बम ऑफ़ दा मंथ - मैं और मेरा साया, - भूपेन हजारिका (गीत अनुवादन - गुलज़ार)


असम का बिहू, बन गीत और बागानों के लोकगीत को राष्ट्रीय फ़लक पे स्थपित करने का श्रेय हजारिका को ही जाता है. उनके शब्द आवाम की आवाज़ को सुन कर उन्ही के मनोभावों और एहसासों को गीत का रूप दे देते हैं और बहुत ही मासूमियत से फिर दादा पूछते हैं - 'ये किसकी सदा है'. भूपेन दा ने बतौर संगीतकार पहली असमिया फ़िल्म 'सती बेहुला' (१९५४) से अपना सफ़र शुरू क्या.

भूपेन दा असमिया फ़िल्म में काम करने के बाद अपना रुख मुंबई की ओर किया वहाँ इनकी मुलाकात सलिल चौधरी और बलराज सहानी से हुई। इनलोगों के संपर्क में आ कर भूपेन दा इंडियन पीपल थियेटर मोवमेंट से जुड़े. हेमंत दा भी इस थियेटर में आया करते थे. हेमंत दा और भूपेन दा की कैमेस्ट्री ऐसी जमी कि भूपेन दा उनके घर में हीं रहने लगे. एक दिन अचानक हेमंत दा हजारिका को लता जी से मुलाकात करवाने ले गए. लता से उनकी ये पहली मुलाकात थी भूपेनदा खासा उत्साहित थे.जब लता जी से मुलाकात हुई तब आश्चर्य से बोली कि 'आप ही भूपेन हो जितना आपका नाम है उतनी तो आपकी उम्र नही है!' भूपेन दा ने लता जी को बातो ही बातो में ये इकारानाम भी करवा लिए कि जब भी कोई हिन्दी फ़िल्म बनाऊंगा तब आप मेरे लिए गायेंगी ।

किसी गीत के सरल माध्यम से एक सशक्त सन्देश कैसे दिया जाता है ये कोई भूपेन दा से सीखे. एल्बम "मैं और मेरा साया" में भी उन्होंने कुछ ऐसे ही विचारों को उद्देलित करने वाले गीत रचे हैं, उदाहरण के लिए सुनिए आसाम के बागानों में गूंजती ये सदा..एक कली दो पत्तियां...नाज़ुक नाज़ुक उँगलियाँ....



सुनिए एक और कहानी इस गीत के माध्यम से, आवाज़ में ऐसा दर्द भूपेन दा के अलावा और कौन भर सकता है...




साप्ताहिक आलेख - उज्जवल कुमार



"बात एक एल्बम की" एक साप्ताहिक श्रृंखला है जहाँ हम पूरे महीने बात करेंगे किसी एक ख़ास एल्बम की, एक एक कर सुनेंगे उस एल्बम के सभी गीत और जिक्र करेंगे उस एल्बम से जुड़े फनकार/फनकारों की. इस स्तम्भ को आप तक ला रहे हैं युवा स्तंभकार उज्जवल कुमार. यदि आप भी किसी ख़ास एल्बम या कलाकार को यहाँ देखना सुनना चाहते हैं तो हमें लिखिए.


Tuesday, April 14, 2009

बहता हूँ बहता रहा हूँ...एक निश्छल सी यायावरी है भूपेन दा के स्वर में

बात एक एल्बम की # 02

फीचर्ड आर्टिस्ट ऑफ़ दा मंथ - भूपेन हजारिका.
फीचर्ड एल्बम ऑफ़ दा मंथ - मैं और मेरा साया, - भूपेन हजारिका (गीत अनुवादन - गुलज़ार)


भूपेन दा का जन्म १ मार्च १९२६ को नेफा के पास सदिया में हुआ.अपनी स्कूली शिक्षा गुवाहाटी से पूरी कर वे बनरस चले आए और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में राजनीती शास्त्र से स्नातक और स्नातकोत्तर किया. साथ में अपना संगीत के सफर को भी जारी रखा और चार वर्षों तक 'संगीत भवन' से शास्त्रीय संगीत की तालीम भी लेते रहे। वहां से अध्यापन कार्य से जुड़े रहे इन्ही दिनों ही गुवाहाटी और शिलांग रेडियो से भी जुड़ गए. जब इनका तबादला दिल्ली आकाशवाणी में हो गया तब अध्यापन कार्य छोड़ दिल्ली आ गए ।

भूपेन दा के दिल में एक ख्वाहिश थी की वे एक जर्नलिस्ट बने. इन्ही दिनों इनकी मुलाकात संगीत नाटक अकादमी के अध्यक्ष नारायण मेनन से हुई. भूपेन दा की कला और आशावादिता से वे खासा प्रभावित हुए और उन्हें सलाह दी के वे विदेश जा कर पी.एच.डी. करें भूपेन दा ने उनकी सलाह मान ली और कोलंबिया विश्वविद्यालय में मॉस कम्युनिकेशंस से पी.एच डी करने चले गए. मेनन साहब ने स्कालरशिप दिलाने में काफी मदद की. कोलंबिया में पढ़ाई के साथ -साथ होटल में काम किया और कुछ मैगजीन और लघु फिल्मों में संवाद भी बोले. इन सब कामो से वे लगभग २५० डालर कमा लेते थे जिससे उनके शौक भी पूरे हो जाया करते. इन्ही दिनों इनकी मुलाकात राबर्ट स्टेन्स और राबर्ट फेल्हरती से हुई जिनके संपर्क में इन्हे फिल्मो के बारे में काफी कुछ सीखने का मौका भी मिला. जगह -जगह के लोक संगीत को संग्रह करना और सीखना भूपेन साहब के शौको में सबसे उपर. एक दिन दादा एक सड़क से हो कर गुजर रहे थे तभी अमेरिका के मशहुर नीग्रो लोकगायक पॉल रॉबसन गाते हुए देखा वे गाये जा रहे थे 'ol 'man river,you dont say nothing ,you just keep rolling along' पॉल के साथ मात्र एक गिटार वादक था और एक ड्रम और कोई इंस्ट्रूमेंट नही.पॉल की आवाज और उनका गाया यह गाना भूपेन दा को इतना अच्छा लगा कि उससे प्रेरित हो कर 'ओ गंगा तुम बहती हो क्यूँ' रचना का सृजन किया. पॉल से से इनकी जान पहचान भी हो गई और पॉल से ये नीग्रो लोकगायकी के गुर भी सीखने लगे मगर पॉल की दोस्ती थोडी महंगी पड़ी और 7 दिनों के लिए पॉल के साथ जेल की हवा खानी पड़ी .बहरहाल हजारिका अपनी शिक्षा पूरी कर भारत लौट आए।

चलिए आगे का किस्सा अगले सप्ताह अब सुनते हैं हमारे फीचर्ड एल्बम "मैं और मेरा साया" से भूपेन के गाये ये दो गीत.
हाँ आवारा हूँ ..यायावर दादा के चरित्र को चित्रित करता है ये मधुर गीत-




कुछ इसी भाव का है ये दूसरा गीत भी. कितने ही सागर, कितने ही धारे...बहते हैं बहता रहा हूँ....वाह... सुनिए और इस आनंद में सागर में डूब जाईये -



साप्ताहिक आलेख - उज्जवल कुमार



"बात एक एल्बम की" एक साप्ताहिक श्रृंखला है जहाँ हम पूरे महीने बात करेंगे किसी एक ख़ास एल्बम की, एक एक कर सुनेंगे उस एल्बम के सभी गीत और जिक्र करेंगे उस एल्बम से जुड़े फनकार/फनकारों की. इस स्तम्भ को आप तक ला रहे हैं युवा स्तंभकार उज्जवल कुमार. यदि आप भी किसी ख़ास एल्बम या कलाकार को यहाँ देखना सुनना चाहते हैं तो हमें लिखिए.

Tuesday, April 7, 2009

मैं और मेरा साया - भूपेन दा का एक नायाब एल्बम.

बात एक एल्बम की # ०१

फीचर्ड आर्टिस्ट ऑफ़ दा मंथ - भूपेन हजारिका.
फीचर्ड एल्बम ऑफ़ दा मंथ - मैं और मेरा साया, - भूपेन हजारिका (गीत अनुवादन - गुलज़ार)


दोस्तों आज बात एक ऐसी शख्सियत की हो रही है जिनके बारे में कुछ कहने में ढेरों मुश्किलों से साक्षत्कार होना पड़ता है. इस एक शख्स में कई शख्सियत समायी हुई है ।बुद्धिजीवी संगीतकार, उत्कृष्ट गायक, सवेदनशील कवि, अभिनेता, लेखक, निर्देशक, समाज सेवक और न जाने कितने रूप. दोस्तों मै दादा साहेब फाल्के सम्मान से सम्मानित डॉक्टर भूपेन हजारिका के बारे में बात कर रहा हूँ .जब भी हिन्दी सिने जगत में लोकसंगीत की बात आएगी तो भूपेन दा के का नाम शीर्ष पर रहेगा. उन्होंने अपने संगीत के जरिये आसाम की मिट्टी की सोंधी खुश्बू कायनात में घोल दी है.


बचपन में पिता शंकर देव का उपदेश ज्यादातर गेय रूप में प्राप्त होता था. उन्ही दिनों उनके मन में संगीत ने अपना घर बना लिया और वे ज्योति प्रसाद अग्रवाल, विष्णु प्रसाद शर्मा और फणी शर्मा जैसे संगीतविदों के संपर्क में आकर लोकगीत की तालीम लेने लगे।

भूपेन दा के आवाज़ में वह बंजारापन है जो उस्तादों से लेकर आम जन -जन को अपने गिरफ्त में ले लेता हैं और अपनी आवाज़ को सबकी आवाज़ बना देता हैं। भूपेन दा की रचनाओं की वेदना की गहराई का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है जब वे एक दफ़ा नागा रिबेल्स से बात करने गए तो आपनी एक रचना 'मानुहे मनोहर बाबे' को वहां के एक नागा युवक को उन्हीं कि अपनी भाषा में अनुवाद करने को कहा और जब उन लोगों ने इस गीत को सुना तो सभी के आंखों में आँसू आ गए। भूपेन दा के इस गीत के बंगला अनुवाद 'मानुष मनुषेरे जन्में', को बी.बी.सी.की तरफ़ से 'सॉंग ऑफ द मिलेनियम,के खिताब से नवाजा गया. इस गीत के जरिये भूपेन दा का कवि रूप का चिंतन हमारे सामने आता है.

हमारे फीचर्ड आर्टिस्ट भूपेन दा पर होंगी और बातें अगले मंगलवार, फिलहाल सुनते हैं इस महीने की फीचर्ड एल्बम, "मैं और मेरा साया" से भूपेन हजारिका की आवाज़. भूपेन दा के मूल गीत का हिंदी अनुवाद किया है गुलज़ार साहब ने.



साप्ताहिक आलेख - उज्जवल कुमार



"बात एक एल्बम की" एक साप्ताहिक श्रृंखला है जहाँ हम पूरे महीने बात करेंगे किसी एक ख़ास एल्बम की, एक एक कर सुनेंगे उस एल्बम के सभी गीत और जिक्र करेंगे उस एल्बम से जुड़े फनकार/फनकारों की. इस स्तम्भ को आप तक ला रहे हैं युवा स्तंभकार उज्जवल कुमार. यदि आप भी किसी ख़ास एल्बम या कलाकार को यहाँ देखना सुनना चाहते हैं तो हमें लिखिए.


Tuesday, March 31, 2009

कहाँ हाथ से कुछ छूट गया याद नहीं - मीना कुमारी की याद में


मीना कुमारी ने 'हिन्दी सिनेमा' जगत में जिस मुकाम को हासिल किया वो आज भी अस्पर्शनीय है ।वे जितनी उच्चकोटि की अदाकारा थीं उतनी ही उच्चकोटि की शायरा भी । अपने दिली जज्बात को उन्होंने जिस तरह कलमबंद किया उन्हें पढ़ कर ऐसा लगता है कि मानो कोई नसों में चुपके -चुपके हजारों सुईयाँ चुभो रहा हो. गम के रिश्तों को उन्होंने जो जज्बाती शक्ल अपनी शायरी में दी, वह बहुत कम कलमकारों के बूते की बात होती है. गम का ये दामन शायद 'अल्लाह ताला' की वदीयत थी जैसे। तभी तो कहा उन्होंने -

कहाँ अब मैं इस गम से घबरा के जाऊँ
कि यह ग़म तुम्हारी वदीयत है मुझको

पैदा होते ही अब्बा अली बख्श ने रुपये के तंगी और पहले से दो बेटियों के बोझ से घबरा कर इन्हे एक मुस्लिम अनाथ आश्रम में छोड़ आए. अम्मी के काफी रोने -धोने पर वे इन्हे वापस ले आए ।परिवार हो या वैवाहिक जीवन मीना जो को तन्हाईयाँ हीं मिली

चाँद तन्हा है,आस्मां तन्हा
दिल मिला है कहाँ -कहाँ तन्हां

बुझ गई आस, छुप गया तारा
थात्थारता रहा धुआं तन्हां

जिंदगी क्या इसी को कहते हैं
जिस्म तन्हां है और जां तन्हां

हमसफ़र कोई गर मिले भी कहीं
दोनों चलते रहे यहाँ तन्हां

जलती -बुझती -सी रौशनी के परे
सिमटा -सिमटा -सा एक मकां तन्हां

राह देखा करेगा सदियों तक
छोड़ जायेंगे ये मकां तन्हा

और जाते जाते सचमुच सरे जहाँ को तन्हां कर गयीं ।जब जिन्दा रहीं सरापा दिल की तरह जिन्दा रहीं ।दर्द चुनते रहीं संजोती रहीं और कहती रहीं -

टुकडे -टुकडे दिन बिता, धज्जी -धज्जी रात मिली
जितना -जितना आँचल था, उतनी हीं सौगात मिली

जब चाह दिल को समझे, हंसने की आवाज़ सुनी
जैसा कोई कहता हो, ले फ़िर तुझको मात मिली

होंठों तक आते -आते, जाने कितने रूप भरे
जलती -बुझती आंखों में, सदा-सी जो बात मिली

वह कोई साधारण अभिनेत्री नहीं थी, उनके जीवन की त्रासदी, पीडा, और वो रहस्य जो उनकी शायरी में अक्सर झाँका करता था, वो उन सभी किरदारों में जो उन्होंने निभाया बाखूबी झलकता रहा. फिल्म "साहब बीबी और गुलाम" में छोटी बहु के किरदार को भला कौन भूल सकता है. "न जाओ सैया छुडाके बैयाँ..." गाती उस नायिका की छवि कभी जेहन से उतरती ही नहीं. १९६२ में मीना कुमारी को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के लिए तीन नामांकन मिले एक साथ. "साहब बीबी और गुलाम", मैं चुप रहूंगी" और "आरती". यानी कि मीना कुमारी का मुकाबला सिर्फ मीना कुमारी ही कर सकी. सुंदर चाँद सा नूरानी चेहरा और उस पर आवाज़ में ऐसा मादक दर्द, सचमुच एक दुर्लभ उपलब्धि का नाम था मीना कुमारी. इन्हें ट्रेजेडी क्वीन यानी दर्द की देवी जैसे खिताब दिए गए. पर यदि उनके सपूर्ण अभिनय संसार की पड़ताल करें तो इस तरह की "छवि बंदी" उनके सिनेमाई व्यक्तित्व के साथ नाइंसाफी ही होगी.

एक बार गुलज़ार साहब ने उनको एक नज़्म दिया था. लिखा था :

शहतूत की शाख़ पे बैठी मीना
बुनती है रेशम के धागे
लम्हा -लम्हा खोल रही है
पत्ता -पत्ता बीन रही है
एक एक सांस बजाकर सुनती है सौदायन
एक -एक सांस को खोल कर आपने तन पर लिपटाती जाती है
अपने ही तागों की कैदी
रेशम की यह शायरा एक दिन
अपने ही तागों में घुट कर मर जायेगी

पढ़ कर मीना जी हंस पड़ी । कहने लगी -"जानते हो न, वे तागे क्या हैं ?उन्हें प्यार कहते हैं । मुझे तो प्यार से प्यार है । प्यार के एहसास से प्यार है, प्यार के नाम से प्यार है । इतना प्यार कि कोई अपने तन से लिपट कर मर सके तो और क्या चाहिए?" महजबीं से मीना कुमारी बनने तक (निर्देशक विजय भट्ट ने उन्हें ये नाम दिया), और मीना कुमारी से मंजू (ये नामकरण कमाल अमरोही ने उनसे निकाह के बाद किया ) तक उनका व्यक्तिगत जीवन भी हजारों रंग समेटे एक ग़ज़ल की मानिंद ही रहा. "बैजू बावरा","परिणीता", "एक ही रास्ता", 'शारदा". "मिस मेरी", "चार दिल चार राहें", "दिल अपना और प्रीत पराई", "आरती", "भाभी की चूडियाँ", "मैं चुप रहूंगी", "साहब बीबी और गुलाम", "दिल एक मंदिर", "चित्रलेखा", "काजल", "फूल और पत्थर", "मँझली दीदी", 'मेरे अपने", "पाकीजा" जैसी फिल्में उनकी "लम्बी दर्द भरी कविता" सरीखे जीवन का एक विस्तार भर है जिसका एक सिरा उनकी कविताओं पर आके रुकता है -

थका थका सा बदन,
आह! रूह बोझिल बोझिल,
कहाँ पे हाथ से,
कुछ छूट गया याद नहीं....

३१ मार्च १९७२ को उनका निधन हुआ. आज उनकी ३७ वीं पुण्यतिथि पर उन्हें 'आवाज़' का सलाम. सुनते हैं उन्ही की आवाज़ में उन्हीं का कलाम. जिसे खय्याम साहब ने स्वरबद्ध किया है -

चाँद तन्हा...


मेरा माज़ी


ये नूर किसका है...


प्रस्तुति - उज्जवल कुमार

Thursday, March 19, 2009

रात भर आपकी याद आती रही - संगीतकार जयदेव पर विशेष


'ये दिल और उनकी निगाहों के साये
मुझे घेर लेती हैं बाँहों के साये'


जयदेव के संगीतबद्ध गीत हमेशा अपने गिरफ्त में ले लेते हैं । और गिरफ्त भी इतनी कोमल जिसके कर्ण स्पर्श से ही रोम -रोम आनंदित हो उठे तो कौन भला इनसे अलग होना चाहेगा ।जयदेव ने ऐसे गीतों की रचना की जो मेलोडी से सराबोर होते हुए भी शास्त्रीय प्रधान रहे ।वे हमेशा अपनी संगीत विधा के प्रति ईमानदार रहे. वे जितने सादे थे उतनी ही जटिल उनकी संगीत रचना है मगर जटिल होते हुए भी उनकी धुनें बेहद सरस और मंत्रमुग्ध कर देने वाली है |



वैसे जयदेव का निजी जीवन और संगीत -जीवन दोनों ही सदैव संघर्षपूर्ण रहा । ये वाकया है कि जिनके रिकॉर्ड भले ही हजारो बिके हों मगर उनके पास अपना रिकॉर्ड प्लेयर नही था। जयदेव मूलतः पंजाबी थे उनका जन्म ३ अगस्त १९१८ को 'नैरोबी' में हुआ था। माँ-बाप का प्यार तो इन्होने ठीक से जाना भी नही था कि माँ भगवन के पास और पिता अफ्रीका व्यवसाय के चक्कर में । इनका बचपन एक यतीम की तरह ही गुजरा. उन मुश्किल दिनों में एक मात्र सहारा अपने फूफा ही हुए जिनके यहाँ उन्होंने कुछ दिन बिताये ।

जयदेव की उम्र जब १५ की होगी जब 'अली बाबा चालीस चोर' फ़िल्म में जहाँआरा कज्जन का गीत 'ये बिजली दुख की गिरती है'सुन कर इतने प्रभावित हुए कि बरकत राय से संगीत की तालीम लेने लगे. और कुछ ही दिनों बाद चलचित्र की दुनिया में अपना भाग्य आजमाने बम्बई भाग आए। शुरूवाती दौर में इन्होने कुछ फिल्मों में बाल भूमिकायें की -वाडिया फ़िल्म -कंपनी की 'वामन अवतार ','वीर भरत','हंटर वाली ', 'काला गुलाब', 'मिस फ्रंटियर मेल'आदि। इन्ही दिनों वे कृष्णराव चोंकर से संगीत की तालीम भी लेते रहे ।



तभी अचनक फूफा की मृत्यु से उन्हें लुधियाना लौटना पड़ा। अपनी मुकाम को की तलाश इन्हे चलचित्र की दुनिया में ही थी अतः साल के आख़िर तक वो फ़िर बम्बई लौट आए । मुम्बई में आये अभी वो कुछ ही दिन हुए कि अचानक उनके पिता की तबियत ख़राब होने के कारण वे भारत लौट आए और इन्हे एकबार फ़िर लुधियाना लौटना पड़ा । फूफा के बाद पिता की मृत्यु ने उनको झकझोर कर रख दिया । अब परिवार की सारी जिमेदारी उन्ही के ऊपर आ गई ।इस दौरान उन्हें काफी दिनों तक लुधियाना रुकना पड़ा । परिवार में एक छोटी बहन और एक छोटा भाई जिसकी जिम्मेदारी को उन्हने हर संभव निभाया । बहन की शादी के बाद जयदेव ने अपना संगीत जीवन फ़िर शुरु किया वे इस बार बम्बई न जा कर अल्मोडा गए जहाँ वो उदयशंकर जी के वाध्यशाला में शामिल हो गए ।



कुछ दिनों बाद संगीत की की उच्चतर शिक्षा लेने के लिए अपना रुख लखनऊ किया जहाँ उन्हें उस्ताद अली अकबर खान से सरोद की शिक्षा लेने का सौभाग्य प्राप्त हुआ ।सरोद की तालीम उनकी रचनाओं में हर जगह मिलती है। उनकी धुनों में जहाँ -तहाँ उसके स्वर ,खटके ,मुरकी आदि सुनाई पडतें है । या वो "गमन" का "आपकी याद आती रही रात भर" हो या "रेशमा और शेरा" का 'तू चंदा मैं चाँदनी' हो| बहरहाल, एक बार फ़िर उनकी संगीत यात्रा कुछ दिनों के लिए रुक गई जब बीमार होने के कारण वे अपनी बहन के यहाँ शिमला आ गए। कुछ समय बहन के यहाँ गुजरने के पश्चात् वे ऋषिकेश में स्वामी दयानंद के आश्रम चले गए और ६ महीने वहां गुजरे ।



जयदेव के जीवन की एक के बाद एक आती घटनाओं ने उन्हें 'घुमंतू' तारा बना दिया था । लुधियाना, बॉम्बे, लखनऊ, शिमला, ऋषिकेश, उज्जैन आदि जगहों पर थोड़ा-थोड़ा समय गुजरा। इसी दौरान जयदेव दिल्ली पहुंचे जहाँ उन्होंने अपने दनिक खर्च को चलाने हेतु एक बैंक में नौकरी कर ली। इसी दरमियाँ अपने छोटे भाई का विवाह किया। मगर साल के अन्दर ही उनके भाई की मृत्यु हो गई।भाई की आसमयिक मृत्यु ने जयदेव को फ़िर एक बार दुखो के सागर में छोड़ दिया । गिर कर उठाना और उठ कर चलना जयदेव को ये शक्ति को शायद 'माँ शारदा' ही देती थीं ।



अपने आप को संभालते हुए इन्होने अपना सांगीतिक जीवन फ़िर से शुरू किया। १९४७ में ये रेडियो पर गाने लगे, कुछ ही दिनों बाद ये पुनः उस्ताद अली अकबर खान के पास जयपुर चले गए जहाँ खान साहब दरबारी संगीतज्ञ थे| जब अली अकबर खान ने नवकेतन की फ़िल्म "आंधियां" और "हमसफ़र" में संगीत दिया तब जयदेव को अपने सहायक के रूप में रखा। इसी फ़िल्म के बाद जेड का फ़िल्म संगीत से जोदव हुआ । नवकेतन साथ जयदेव का रिश्ता काफी दिनों तक रहा। अली अकबर खान के बाद ये सचिन देव बर्मन के सहायक बन गए।



स्वतंत्र रूप से संगीत देने का मौका चेतन आनंद निर्देशित फ़िल्म "जोरू का भाई"(१९५५) में मिला। लेकिन जयदेव का नाम नवकेतन की ही फ़िल्म "हम दोनों"(१९६१) से -"अल्ला तेरो नाम ईश्वर तेरो नाम" से सबकी जुबान पर चढ़ गया। ये गीत भारत के कंपोजिट सेकुलर संस्कृति का मानक गीत बन चुका है। इस गीत की रचना के पीछे एक बड़ा ही दिलचस्प वाकया है।जिस समय यह फ़िल्म इन्हे मिली उस समय लता और एस डी बर्मन के मनमुटाव के बीच जयदेव भी शरीक थे। जब रशीद खान लता जी के पास इस गीत के गाने का प्रस्ताव ले कर गए, तो लता जी ने साफ़ मना कर दिया। जब रशीद खान ने ये कहा अगर आप इस फ़िल्म में नही गायेंगी तो जयदेव को इस फ़िल्म से निकाल दिया जाएगा। इस बात से लता जी ने हिचकते हुए हाँ कह दिया । वैसे इस गीत की दुरूह स्केल के साथ लता जी ही न्याय कर सकती थी ।एस.डी. बर्मन हमेशा कहते ये थे कि जयदेव बहुत जटिल धुन बना देते है जो आम लोगो के से परे होता है । आरोह -अवरोह का मुश्किल क्रम,पारंपरिक छंद से हट कर अपनी अलग लय उनकी विरल संगीत विधा की परिचायक है । चाहे शास्त्रीय आधार का गीत हो या ग़ज़ल और साहित्यिक काव्यात्मक लिए रचना हो वे अपने रचनात्मकता के चरमोत्कर्ष पर रहते थे ।

"अनकही","गमन',"रेशमा और शेरा","आलाप","मुझे जीने दो" जैसी फिल्मों में उनका संगीत कौन भूल सकता है भला. हरिवंश राय बच्चन की मधुशाला एलबम को मन्ना डे ने स्वर दे कर और जयदेव ने संगीत दे कर अमर कर दिया है ।जयदेव आज हमारे बीच नही है मगर अपनी रचनाओं से वो सदा इस लोक में मौजूद रहेंगे.



प्रस्तुति - उज्जवल कुमार

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