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Sunday, October 14, 2012

फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी – ३

स्वरगोष्ठी – ९२ में आज 
मन्ना डे ने गाया उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ का दादरा
‘बनाओ बतियाँ चलो काहे को झूठी...’ 


‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ के एक नए अंक में, मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। इस श्रृंखला में हम कुछ ऐसी ठुमरियों पर चर्चा कर रहे हैं, जिन्हें स्वयं मूल गायक-गायिका ने अथवा किसी फिल्मी पार्श्वगायक-गायिका ने फिल्म में भी गाया है। पिछले दो अंकों में हमने आपसे क्रमशः उस्ताद अब्दुल करीम खाँ और बेगम अख्तर की गायी ठुमरियों के फिल्मी प्रयोग पर चर्चा की थी। आज के अंक में हम ‘आफ़ताब-ए-मौसिकी’ के खिताब से नवाज़े गए उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ के व्यक्तित्व पर चर्चा करेंगे। साथ ही उनके गाये एक दादरा- “बनाओ बतियाँ चलो काहे को झूठी...” और उसके फिल्मी प्रयोग का भी उल्लेख करेंगे।

न्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम दशक से लेकर पिछली शताब्दी के मध्यकाल तक के जिन संगीतज्ञों की गणना हम शिखर-पुरुष के रूप में करते हैं, उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ उन्ही में से एक थे। ध्रुवपद-धमार, खयाल-तराना, ठुमरी-दादरा, सभी शैलियों की गायकी पर उन्हें सिद्धि प्राप्त थी। प्रकृति ने उन्हें घन, मन्द्र और गम्भीर कण्ठ का उपहार तो दिया ही था, उनके शहद से मधुर स्वर श्रोताओं पर रस-वर्षा कर देते थे। फ़ैयाज़ खाँ का जन्म ‘आगरा घराना’ के ध्रुवपद गायकों के परिवार में हुआ था। दुर्भाग्य से फ़ैयाज़ खाँ के जन्म से लगभग तीन मास पूर्व ही उनके पिता सफदर हुसैन खाँ का इन्तकाल हो गया। जन्म से ही पितृ-विहीन बालक को उनके नाना ग़ुलाम अब्बास खाँ ने अपना दत्तक पुत्र बनाया और पालन-पोषण के साथ-साथ संगीत-शिक्षा की व्यवस्था भी की। यही बालक आगे चल कर आगरा घराने का प्रतिनिधि बना और भारतीय संगीत के अर्श पर आफताब बन कर चमका। फ़ैयाज़ खाँ की विधिवत संगीत शिक्षा उस्ताद ग़ुलाम अब्बास खाँ से आरम्भ हुई, जो फ़ैयाज़ खाँ के गुरु और नाना तो थे ही, गोद लेने के कारण पिता के पद पर भी प्रतिष्ठित हो चुके थे। फ़ैयाज़ खाँ के पिता का घराना ध्रुपदियों का था, अतः ध्रुवपद अंग की गायकी इन्हें संस्कारगत प्राप्त हुई।

आगे चल कर फ़ैयाज़ खाँ ध्रुवपद के ‘नोम-तोम’ के आलाप में इतने दक्ष हो गए थे कि संगीत समारोहों में उनके समृद्ध आलाप की फरमाइश हुआ करती थी। उनकी ख्याति के कारण बड़ौदा राज-दरबार में संगीतज्ञ के रूप में उनकी नियुक्ति हुई। १९३८ में उन्हे मैसूर दरबार से “आफताब-ए-मौसिकी” (संगीत के सूर्य) की उपाधि से नवाजा गया। ध्रुवपद और खयाल गायकी में दक्ष होने के साथ-साथ ठुमरी-दादरा गायन में भी वे अत्यन्त कुशल थे। फ़ैयाज़ खाँ ने कलकत्ता (अब कोलकाता) में भैया गनपत राव और मौजुद्दीन खाँ से ठुमरी-दादरा सुना था और संगीत की इस विधा से अत्यन्त प्रभावित हुए थे। ठुमरी के दोनों दिग्गजों से प्रेरणा पाकर उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ ने इस विधा में भी दक्षता प्राप्त की। खाँ साहब ठुमरी और दादरा के बीच उर्दू के शे’र जोड़ कर चार-चाँद लगा देते थे। इसके साथ ही टप्पे की तानों को भी वे ठुमरी गाते समय जोड़ लिया करते थे। आज हम आपको उनका गाया भैरवी का बेहद लोकप्रिय दादरा- ‘बनाओ बतियाँ चलो काहे को झूठी...’ सुनवाते हैं।

भैरवी दादरा : ‘बनाओ बतियाँ चलो काहे को झूठी...’ : उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ



उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ के स्वर में प्रस्तुत भैरवी का यह दादरा श्रृंगार-रस प्रधान है। नायिका नायक से सौतन के घर न जाने की मान-मनुहार करती है, और यही इस दादरा का प्रमुख भाव है। यह दादरा १९६० में प्रदर्शित, देव आनन्द, नूतन और महमूद अभिनीत फिल्म ‘मंज़िल’ में संगीतकार सचिनदेव बर्मन ने प्रयोग किया था। यूँतो इस फिल्म के प्रायः सभी गीत लोकप्रिय हुए थे, किन्तु पार्श्वगायक मन्ना डे के स्वर में प्रस्तुत यह दादरा सदाबहार गीतों की श्रेणी में शामिल हो गया था। फिल्म में यह दादरा हास्य अभिनेता महमूद के लिए मन्ना डे ने पार्श्वगायन किया था। गीत चूँकि महमूद पर फिल्माना था इसलिए बर्मन दादा और मन्ना डे ने इस श्रृंगार प्रधान गीत को अपने कौशल से हास्य गीत के रूप में ढाल दिया। मूल दादरा की पहचान को बनाए रखते हुए गीत को फिल्म में शामिल किया गया था। हाँ, स्थायी के शब्दों में ‘चलो’ के स्थान पर ‘हटो’ अवश्य जोड़ा गया और गीत के अन्तिम भाग में तीनताल का प्रयोग किया गया। लीजिए अब आप इस दादरा का फिल्मी संस्करण सुनिए-

फिल्म – मंज़िल : ‘बनाओ बतियाँ हटो काहे को झूठी...’ : मन्ना डे



इस पारम्परिक दादरा को अन्य गायक-गायिकाओं ने भी स्वर दिया है। एक ही दादरा अलग-अलग स्वरों में अलग-अलग रंग की अनुभूति कराता है। अब हम आपको यही दादरा पाकिस्तान की गायिका ताहिरा सईद की आवाज़ में सुनवाते हैं। ताहिरा सईद अपने समय की सुप्रसिद्ध गायिका मलिका पुखराज की बेटी हैं। इस दादरा को उन्होने अपने नर्म स्वरों में गाया है। उनकी इस प्रस्तुति में आपको गजल गायकी का रंग भी परिलक्षित होगा। आप उनकी आवाज़ में यह दादरा सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

भैरवी दादरा : ‘बनाओ बतियाँ चलो काहे को झूठी...’ : ताहिरा सईद

आज की पहेली

आज की संगीत पहेली में हम आपको एक पूरब अंग की सुविख्यात गायिका के स्वर में ठुमरी का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली के सौवें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।



१_ यह ठुमरी किस राग में निबद्ध है?

२_ इस ठुमरी का प्रयोग एक श्वेत-श्याम हिन्दी फिल्म में किया गया था। आप हमें उस फिल्म के संगीतकार का नाम बताइए।


आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के ९४वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। हमसे सीधे सम्पर्क के लिए swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर अपना सन्देश भेज सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के ९०वें अंक की पहेली में हमने एक ठुमरी का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग ‘पीलू’ और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका बेगम अख्तर। दोनों प्रश्नों के सही उत्तर एकमात्र प्रतिभागी पटना की अर्चना टण्डन ने दिया है। लखनऊ के प्रकाश गोविन्द ने गायिका को तो ठीक-ठीक पहचाना, किन्तु राग पहचानने में भूल की। इनके अलावा मीरजापुर, उत्तरप्रदेश के डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने सूचित किया है कि उनका स्थानान्तरण मीरजापुर से जौनपुर के लिए हो गया है, इसलिए वे दो सप्ताह तक प्रतियोगिता में भाग नहीं ले पाएँगे। अर्चना जी और प्रकाश जी को रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर से हार्दिक बधाई।

चौथे सेगमेंट के विजेता और उनके प्राप्तांक

चौथे सेगमेंट अर्थात ९०वें अंक की समाप्ति पर प्रतिभागियों के प्राप्तांकों का योग इस प्रकार रहा-

१- क्षिति तिवारी, जबलपुर – १६

२- डॉ. पी.के. त्रिपाठी, मीरजापुर – १५

३- प्रकाश गोविन्द, लखनऊ – १२

४- अर्चना टण्डन, पटना – ४

५- कश्यप दवे, अहमदाबाद – २

इस प्रकार चौथे सेगमेंट की समाप्ति पर प्रथम तीन स्थानों पर क्रमशः क्षिति तिवारी, डॉ. पी.के. त्रिपाठी और प्रकाश गोविन्द रहे। सभी विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से बधाई।

झरोखा अगले अंक का

मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ के अगले अंक में हम आपको पूरब अंग की दो विख्यात ठुमरी गायिकाओं के व्यक्तित्व पर और उनकी गायी एक बेहद चर्चित ठुमरी पर चर्चा करेंगे। जिस प्रकार आज के अंक में प्रस्तुत किया गया दादरा फिल्म में हास्य अभिनेता पर फिल्माया गया था, उसी प्रकार अगले अंक में प्रस्तुत की जाने वाली ठुमरी भी एक हास्य अभिनेता पर फिल्माया गया है। अगले रविवार को प्रातः ९-३० पर आयोजित आपकी अपनी इस गोष्ठी में आप हमारे सहभागी बनिए। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।

कृष्णमोहन मिश्र 

 
'मैंने देखी पहली फिल्म' : आपके लिए एक रोचक प्रतियोगिता
दोस्तों, भारतीय सिनेमा अपने उदगम के 100 वर्ष पूरा करने जा रहा है। फ़िल्में हमारे जीवन में बेहद खास महत्त्व रखती हैं, शायद ही हम में से कोई अपनी पहली देखी हुई फिल्म को भूल सकता है। वो पहली बार थियेटर जाना, वो संगी-साथी, वो सुरीले लम्हें। आपकी इन्हीं सब यादों को हम समेटेगें एक प्रतियोगिता के माध्यम से। 100 से 500 शब्दों में लिख भेजिए अपनी पहली देखी फिल्म का अनुभव radioplaybackindia@live.com पर। मेल के शीर्षक में लिखियेगा ‘मैंने देखी पहली फिल्म’। सर्वश्रेष्ठ तीन आलेखों को 500 रूपए मूल्य की पुस्तकें पुरस्कारस्वरुप प्रदान की जायेगीं। तो देर किस बात की, यादों की खिड़कियों को खोलिए, कीबोर्ड पर उँगलियाँ जमाइए और लिख डालिए अपनी देखी हुई पहली फिल्म का दिलचस्प अनुभव। प्रतियोगिता में आलेख भेजने की अन्तिम तिथि 31अक्टूबर, 2012 है।


 

Sunday, October 7, 2012

फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी – २

   
स्वरगोष्ठी – ९१ में आज 
बेगम अख्तर की ९९वें जन्मदिवस पर स्वरांजलि

‘भर भर आईं मोरी अँखियाँ पिया बिन...’

रस, रंग और भाव की सतरंगी छटा बिखेरती ठुमरी पर केन्द्रित लघु श्रृंखला ‘फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ के एक नए अंक में कृष्णमोहन मिश्र का अभिवादन स्वीकार कीजिए। ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी इस श्रृंखला के आज के अंक में हम ठुमरी और गजल की साम्राज्ञी बेगम अख्तर को उनके ९९वें जन्मदिन पर स्मरण कर रहे हैं। आज इस अवसर पर बेगम साहिबा की गायी ठुमरी और ग़ज़ल से हम उन्हें स्वरांजलि अर्पित करते हैं।



श्रृंगार और भक्ति रस से सराबोर ठुमरी और गजल शैली की अप्रतिम गायिका बेगम अख्तर का जन्म ७ अक्तूबर, १९१४ उत्तर प्रदेश के फ़ैज़ाबाद नामक एक छोटे से नगर (तत्कालीन अवध) में एक कट्टर मुस्लिम परिवार में हुआ था। परिवार में किसी भी सदस्य को न तो संगीत से अभिरुचि थी और न किसी को संगीत सीखना-सिखाना पसन्द था। परन्तु अख्तरी (बचपन में उन्हें इसी नाम से पुकारा जाता था) को तो मधुर कण्ठ और संगीत के प्रति अनुराग जन्मजात उपहार के रूप में प्राप्त था। एक बार सुविख्यात सरोदवादक उस्ताद सखावत हुसेन खाँ के कानों में अख्तरी के गुनगुनाने की आवाज़ पड़ी। उन्होने परिवार में ऐलान कर दिया कि आगे चल कर यह नन्ही बच्ची असाधारण गायिका बनेगी, और देश-विदेश में अपना व परिवार का नाम रोशन करेगी। उस्ताद ने अख्तरी के माता-पिता से संगीत की तालीम दिलाने का आग्रह किया। पहले तो परिवार का कोई भी सदस्य इसके लिए राजी नहीं हुआ किन्तु अख्तरी की माँ, जो स्वयं भी कुशल गायिका थीं, ने सबको समझा-बुझा कर अन्ततः मना लिया।

उस्ताद सखावत हुसेन ने अपने मित्र, पटियाला के प्रसिद्ध गायक उस्ताद अता मुहम्मद खाँ से अख्तरी को तालीम देने का आग्रह किया। वे मान गए और अख्तरी उस्ताद के पास भेज दी गईं। मात्र सात वर्ष की आयु में उन्हें उस्ताद के कठोर अनुशासन में रियाज़ करना पड़ा। तालीम के दिनों में ही उनका पहला रिकार्ड- ‘वह असीरे दम बला हूँ...’ बना और वे अख्तरी बाई फैजाबादी बन गईं। उस्ताद अता मुहम्मद खाँ के बाद उन्हें पटना के उस्ताद अहमद खाँ से रागों की विधिवत शिक्षा मिली। इसके अलावा बेगम अख्तर को उस्ताद अब्दुल वहीद खाँ और हारमोनियम वादन में सिद्ध उस्ताद गुलाम मुहम्मद खाँ का मार्गदर्शन भी प्राप्त हुआ। १९३४ में कलकत्ता (अब कोलकाता) के अल्फ्रेड थियेटर हॉल में बिहार के भूकम्प-पीड़ितों के सहायतार्थ एक संगीत समारोह का आयोजन किया गया था। इस समारोह में कई बड़े कलाकारों के बीच नवोदित अख्तरी बाई को पहली बार गाने का अवसर मिला। मंचीय कार्यक्रमों की भाषा में कहा जाए तो “अख्तरी बाई ने मंच लूट लिया”।

फिल्म 'जलसाघर' का एक दृश्य 
बेगम अख्तर यद्यपि खयाल गायकी में अत्यन्त कुशल थीं किन्तु उन्हें ठुमरी और गज़ल गायन में सर्वाधिक ख्याति मिली। स्पष्ट उच्चारण और भावपूर्ण गायकी के कारण उन्हे चौथे और पाँचवें दशक की फिल्मों में भी अवसर मिला। उन्होने ईस्टर्न इण्डिया कम्पनी की फिल्मों- एक दिन का बादशाह, नल-दमयंती, नसीब का चक्कर आदि फिल्मों में काम किया। १९४० में बनी महबूब प्रोडक्शन की फिल्म ‘रोटी’ में उनके गाये गीतों ने तो पूरे देश में धूम मचाई थी। विश्वविख्यात फ़िल्मकार सत्यजीत रे ने १९५९ में भारतीय संगीत की उन्नीसवीं शताब्दी में दशा-दिशा पर फिल्म ‘जलसाघर’ का निर्माण किया था। इस फिल्म में गायन, वादन और नर्तन के तत्कालीन उत्कृष्ट कलाकारों को प्रत्यक्ष रूप में प्रस्तुत किया गया था। फिल्म में बिस्मिल्लाह खाँ (शहनाई), उस्ताद वहीद खाँ (सुरबहार), रोशन कुमारी (कथक), उस्ताद सलामत अली खाँ (खयाल गायन) के साथ बेगम अख्तर ने गायिका दुर्गा बाई की भूमिका मे राग पीलू में निबद्ध विरह-वेदना को उकेरती ठुमरी- ‘भर भर आईं मोरी अँखियाँ पिया बिन...’ का गायन प्रस्तुत किया था। आगे बढ़ाने से पहले लीजिए, आप भी यह ठुमरी सुनिए-

पीलू ठुमरी : ‘भर भर आईं मोरी अँखियाँ पिया बिन...’ : बेगम अख्तर



विदुषी बेगम अख्तर का उदय जिस काल में हुआ था, भारतीय संगीत का पुनर्जागरण काल था। ब्रिटिश शासनकाल में भारतीय संगीत जिस प्रकार उपेक्षित हुआ था, उससे जनजीवन से संगीत की दूरी बढ़ गई थी। ऐसी स्थिति में १८७८ में जन्में पण्डित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर और १८९६ में जन्में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने अपने अनथक प्रयत्नों से पूरी शुचिता के साथ संगीत को न केवल पुनर्प्रतिष्ठित किया बल्कि जन-जन के लिए संगीत-शिक्षा सुलभ कराया। इस दोनों संगीत-ऋषियों के प्रयत्नों के परिणाम बीसवीं शताब्दी के आरम्भिक दशकों में परिलक्षित होने लगे थे। बेगम अख्तर इसी पुनर्जागरण काल की देन थीं। उनकी गायकी में शुचिता थी और श्रोताओं के हृदय को छूने की क्षमता भी थी। अब हम आपके लिए बेगम अख्तर के स्वर में एक होरी ठुमरी प्रस्तुत करते हैं। सुविख्यात गायक पण्डित जसराज ने बेगम साहिबा और उनकी गायकी पर एक सार्थक टिप्पणी की थी, जिसे ठुमरी से पूर्व आप भी सुनेंगे।

होरी ठुमरी : ‘कैसी ये धूम मचाई...’ : बेगम अख्तर



बेगम अख्तर ने अपने जीवन में ठुमरी, दादरा और गज़ल गायकी को ही अपना लक्ष्य बनाया। खयाल गायकी में भी वे दक्ष थीं, किन्तु उनका रुझान उप-शास्त्रीय गायकी की ओर ही केन्द्रित रहा। उनकी गायकी में अनावश्यक अलंकरण नहीं होता था। उनके सुर सच्चे होते थे। बड़ी सहजता और सरलता से रचना के भावों को श्रोताओं तक सम्प्रेषित कर देती थीं। अब हम आपके लिए बेगम साहिबा की गज़ल गायकी का एक उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। एक कार्यक्रम में सुप्रसिद्ध शायर कैफी आज़मी और बेगम अख्तर की अनूठी जुगलबन्दी हुई। पहले कैफी आज़मी ने अपनी एक गज़ल पढ़ी। बाद में बेगम साहिबा ने उसी गज़ल का सस्वर गायन प्रस्तुत किया था। शायर और गायिका अर्थात शब्द और स्वर की एक ही मंच पर हुई इस अनूठी जुगलबन्दी का आप आनंद लीजिए और हमें आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से विदुषी बेगम अख्तर की स्मृतियों को सादर नमन अर्पित है।

गजल : ‘सुना करो मेरे जाँ इनसे उनसे अफसाने...’ : बेगम अख्तर



आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी संगीत-पहेली का आज से आरम्भ हो रहा है पाँचवाँ और अन्तिम सेगमेंट। आप जानते ही हैं कि ५१वें अंक से हमने संगीत पहेली को दस-दस अंकों की श्रृंखलाओं (सेगमेंट) में बाँटा था। पाँचवें सेगमेंट अर्थात १००वें अंक तक सर्वाधिक सेगमेंट के पहले तीन विजेताओ का हम चयन करेंगे और उन्हें पुरस्कृत करेंगे। अगले अंक में चौथे सेगमेंट के विजेताओं के नाम की घोषणा भी की जाएगी।

‘स्वरगोष्ठी’ की आज की संगीत-पहेली में हम आपको कण्ठ-संगीत प्रस्तुति का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछेंगे। १००वें अंक तक सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाले प्रतिभागी श्रृंखला के विजेता होंगे।


१ - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह रचना किस राग में निबद्ध है?

२ - यह किस भारतीय गायक की आवाज़ है?

३ – यही पारम्परिक दादरा सातवें दशक के आरम्भ में बनी एक फिल्म में भी शामिल किया गया था। क्या आप उस फिल्मी गीत के पार्श्वगायक का नाम बता सकते है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के ९३वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के ८९वें अंक में हमने आपको सुप्रसिद्ध गायक उस्ताद अब्दुल करीम खाँ की आवाज़ में एक प्राचीन ठुमरी का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग झिंझोटी दूसरे का सही उत्तर है- ठुमरी शैली। इस बार की पहेली में नियमित उत्तरदाताओं ने भाग नहीं लिया और जिन्होने भाग लिया, उनमें से किसी का उत्तर सही नहीं था।

झरोखा अगले अंक का


मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ के आगामी अंक में हम आपसे हम एक बेहद लोकप्रिय दादरा पर चर्चा करेंगे। आपके सम्मुख हम इस दादरा का उपशास्त्रीय और फिल्मी, दोनों रूप प्रस्तुत करेंगे। आपकी स्मृतियों में यदि किसी मूर्धन्य कलासाधक की ऐसी कोई पारम्परिक रचना हो जिसे किसी भारतीय फिल्म में भी शामिल किया गया हो तो हमें अवश्य लिखें। आपके सुझाव और सहयोग से इस स्तम्भ को अधिक सुरुचिपूर्ण रूप दे सकते हैं। अगले रविवार को प्रातः ९-३० पर आयोजित अपनी इस गोष्ठी में आप अवश्य पधारिए। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


कृष्णमोहन मिश्र

 
'मैंने देखी पहली फिल्म' : आपके लिए एक रोचक प्रतियोगिता
दोस्तों, भारतीय सिनेमा अपने उदगम के 100 वर्ष पूरा करने जा रहा है। फ़िल्में हमारे जीवन में बेहद खास महत्त्व रखती हैं, शायद ही हम में से कोई अपनी पहली देखी हुई फिल्म को भूल सकता है। वो पहली बार थियेटर जाना, वो संगी-साथी, वो सुरीले लम्हें। आपकी इन्हीं सब यादों को हम समेटेगें एक प्रतियोगिता के माध्यम से। 100 से 500 शब्दों में लिख भेजिए अपनी पहली देखी फिल्म का अनुभव radioplaybackindia@live.com पर। मेल के शीर्षक में लिखियेगा ‘मैंने देखी पहली फिल्म’। सर्वश्रेष्ठ तीन आलेखों को 500 रूपए मूल्य की पुस्तकें पुरस्कारस्वरुप प्रदान की जायेगीं। तो देर किस बात की, यादों की खिड़कियों को खोलिए, कीबोर्ड पर उँगलियाँ जमाइए और लिख डालिए अपनी देखी हुई पहली फिल्म का दिलचस्प अनुभव। प्रतियोगिता में आलेख भेजने की अन्तिम तिथि 31अक्टूबर, 2012 है।



Monday, July 4, 2011

"गोरी तोरे नैन काजर बिन कारे..." श्रृंगार का एक अन्दाज़ यह भी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 692/2011/132

भारतीय संगीत की अत्यन्त लोकप्रिय उपशास्त्रीय शैली "ठुमरी" का फिल्मों में प्रयोग विषयक जारी श्रृंखला "रस के भरे तोरे नैन" के इस नए अंक में आपका स्वागत है| कल हमने "पछाहीं ठुमरी" के बेमिसाल रचनाकार और गायक ललनपिया का आपसे परिचय कराया था| मध्यलय और द्रुतलय में गायी जाने वाली बोल-बाँट या बन्दिश की पछाहीं ठुमरियों में लय का चमत्कार और चपलता का गुण होता है| आज की कड़ी में पछाहीं ठुमरियों पर चर्चा को आगे बढाते हैं| पछाहीं ठुमरियाँ अधिकतर ब्रज भाषा में होती हैं| पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ब्रज और बुन्देलखण्ड क्षेत्र के लोक संगीत का इन ठुमरियों पर विशेष प्रभाव पड़ा| दूसरी ओर इनकी रचना करने में घरानेदार गायकों, सितारवादकों और कथक-नर्तकों का विशेष योगदान होने के कारण इन पर परम्परागत राग-संगीत का भी प्रभाव पड़ा| इसलिए बोल-बाँट की ठुमरी रचनाओं में विविधता दिखाई देती है| कुछ ठुमरियों में ध्रुवपद की तरह आड़ और दुगुन आदि लयकारियों का प्रयोग भी मिलता है|

पूरब की ठुमरियाँ लोकधुनों और चंचल-हलकी प्रकृति के रागों तक सीमित हैं, वहीं पछांह की ठुमरियाँ कुछ गम्भीर प्रकृति के रागों को छोड़ कर प्रायः सभी रागों में मिलती हैं| अपने समय के श्रेष्ठ संगीतज्ञ रामकृष्ण बुआ बझे ने अपने ठुमरी-गुरु सादिक अली खाँ की ठुमरियों के सम्बन्ध में बताते हुए उल्लेख किया है कि बोल-बाँट की पछाहीं ठुमरियाँ स्थायी-अन्तरा वाले मध्यलय के ख़याल के सामान और प्रायः सभी रागों में पायी जाती है| बोल-बाँट की ठुमरी के रचनाकारों और गायकों में लखनऊ के वजीर मिर्ज़ा 'कदरपिया', महाराज बिन्दादीन बेगम आलमआरा तथा 'चाँदपिया', बरेली के तवक्कुल हुसैन 'सनदपिया', फर्रुखाबाद के 'ललनपिया', मथुरा के 'सरसपिया', दिल्ली के श्रीलाल गोस्वामी 'कुँवरश्याम', गोपाल, 'सुघरछैल', ग्वालियर के नज़र अली 'नज़रपिया' आदि संगीतज्ञ मुख्यरूप से उल्लेखनीय हैं| ये सभी संगीतज्ञ उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध से लेकर बीसवीं शताब्दी के पहले दो दशकों के बीच सक्रिय थे| बरेली के तवक्कुल हुसैन 'सनदपिया' रामपुर के सुप्रसिद्ध सितारवादक बहादुर हुसैन के शिष्य थे| उन्होंने अधिकतर ठुमरी रचनाएँ अपनी गुरु-परम्परा में प्रचलित तंत्रवाद्य की मध्य और द्रुतलयबद्ध गतों के अनुसार कीं|

ठुमरी एकल रूप में ही गाये जाने की परम्परा है| युगल ठुमरी गायन का उदाहरण कभी-कभी नृत्य में ही मिलता है| 1964 की एक फिल्म है- "मैं सुहागन हूँ", जिसमें युगल ठुमरी गायन का प्रयोग किया गया है| फिल्म के संगीत निर्देशक लच्छीराम ने इस परम्परागत ठुमरी को आशा भोसले और मोहम्मद रफ़ी के स्वरों में प्रस्तुत किया है| यह फिल्म संगीतकार लच्छीराम तँवर की सफलतम फिल्मों में से एक थी| फिल्म के नायक-नायिका अजीत और माला सिन्हा हैं परन्तु इस ठुमरी को फिल्म के सह कलाकारों- सम्भवतः केवल कुमार और निशि पर फिल्माया गया है| ठुमरी के अन्त में अभिनेत्री द्वारा तीनताल में तत्कार और टुकड़े भी प्रस्तुत किये गए हैं| मूलतः यह राग "देश" में निबद्ध बोल-बाँट की ठुमरी है| इसी ठुमरी को पकिस्तान की गायिका इकबाल बानो ने मध्यलय में बोल-बनाव के साथ गाया है| फिल्म "मैं सुहागन हूँ" में बन्दिश की ठुमरी के रूप में गाया गया है| आशा भोसले और मोहम्मद रफ़ी ने गायन में राग देश के स्वरों को बड़े आकर्षक ढंग से निखारा है| मोहम्मद रफ़ी ने इस गीत को सपाट स्वरों में गाया है किन्तु आशा भोसले ने स्वरों में मुरकियाँ देकर और बोलों में भाव उत्पन्न कर ठुमरी को आकर्षक रूप दे दिया है| आइए सुनते हैं, श्रृंगार रस से ओतप्रोत राग देश की यह ठुमरी -



क्या आप जानते हैं...
कि सुप्रसिद्ध फिल्म अभिनेत्री माला सिन्हा अभिनय के साथ-साथ गायन में भी कुशल थीं| 50 के दशक में वह रेडियो कलाकार रहीं, किन्तु फिल्मों में उन्होंने कभी नहीं गाया| यहाँ तक कि उन्हें स्वयं की अभिनीत भूमिकाओं में भी अन्य पार्श्वगायिकाओं के स्वरों का सहारा लेना पड़ा|

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 13/शृंखला 19
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - एक बेहद सफल फिल्म की ठुमरी.
सवाल १ - किस राग पर आधारित है रचना - ३ अंक
सवाल २ - गीतकार कौन हैं - २ अंक
सवाल ३ - संगीतकार बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
क्षिति जी लगातार अच्छा कर रहीं हैं, हालाँकि अभी भी वो अमित से पीछे हैं, पर हो सकता है कि ये बाज़ी उनके हाथ रहे, अवध जी आपने क्यों नहीं जवाब दिया वैसे :)

खोज व आलेख- कृष्ण मोहन मिश्र



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Sunday, February 13, 2011

सुर संगम में आज - बेगम अख्तर की आवाज़ में ठुमरी और दादरा का सुरूर

सुर संगम - 07

कुछ लोगों का यह सोचना है कि मॊडर्ण ज़माने में क्लासिकल म्युज़िक ख़त्म हो जाएगी; उसे कोई तवज्जु नहीं देगा, पर मैं कहती हूँ कि यह ग़लत बात है। ग़ज़ल भी क्लासिकल बेस्ड है। अगर सही ढंग से पेश किया जाये तो इसका जादू भी सर चढ़ के बोलता है।


"आप सभी को मेरा सलाम, मुझे आप से बातें करते हुए बेहद ख़ुशनसीबी महसूस हो रही है। मुझे ख़ुशी है कि मैंने ऐसे वतन में जनम लिया जहाँ पे फ़न और फ़नकार से प्यार किया जाता है, और मैंने आप सब का शुक्रिया अपनी गायकी से अदा किया है"। मलिका-ए-ग़ज़ल बेगम अख़्तर जी के इन शब्दों से, जो उन्होंने कभी विविध भारती के किसी कार्यक्रम में श्रोताओं के लिए कहे थे, आज के 'सुर-संगम' का हम आगाज़ करते हैं। बेगम अख़्तर एक ऐसा नाम है जो किसी तारुफ़ की मोहताज नहीं। उन्हें मलिका-ए-ग़ज़ल कहा जाता है, लेकिन ग़ज़ल गायकी के साथ साथ ठुमरी और दादरा में भी उन्हें उतनी ही महारथ हासिल है। ३० अक्तुबर १९७४ को वो इस दुनिया-ए-फ़ानी से किनारा तो कर लिया, लेकिन उनकी आवाज़ का जादू आज भी सर चढ़ कर बोलता है। आज के संगीत में जब चारों तरफ़ शोर-शराबे का माहौल है, ऐसे में बेगम अख्तर जैसे फ़नकारों की गाई रचनाओं को सुन कर मन को कितनी शांति, कितना सुकून मिलता है, वह केवल अच्छे संगीत-रसिक ही महसूस कर सकता है। और बेगम अख़्तर जी ने भी तो उसी कार्यक्रम में कहा था, "कुछ लोगों का यह सोचना है कि मॊडर्ण ज़माने में क्लासिकल म्युज़िक ख़त्म हो जाएगी; उसे कोई तवज्जु नहीं देगा, पर मैं कहती हूँ कि यह ग़लत बात है। ग़ज़ल भी क्लासिकल बेस्ड है। अगर सही ढंग से पेश किया जाये तो इसका जादू भी सर चढ़ के बोलता है।" दोस्तों, बेगम अख़्तर की गाई हुई एक बेहद मशहूर ग़ज़ल हम आपको थोड़ी देर में सुनवाएँगे, पहले आइए सुनते हैं एक दादरा "हमरी अटरिया प आओ सांवरिया"।

दादरा - हमरी अटरिया प आओ सांवरिया (बेगम अख़्तर)


बेगम अख़्तर का असली नाम अख़्तरीबाई फ़ैज़ाबादी है। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के फ़ैज़ाबाद में ७ अक्तुबर १९१४ को हुआ था। उनके पिता अस्ग़र हुसैन, जो पेशे से एक वकील थे, ने मुश्तरी नामक महिला से अपनी दूसरी शादी की, लेकिन बाद में उन्हे तलाक़ दे दिया और इस तरह से मुश्तरी की दो बेटियाँ ज़ोहरा और बिब्बी (अख़्तरीबाई) भी पितृप्रेम से वंचित रह गए। पिता के अभाव को अख़्तरीबाई ने रास्ते का काँटा नहीं बनने दिया और स्वल्पायु से ही संगीत में गहरी रुचि लेने लगीं। जब वो मात्र सात वर्ष की थीं, तभी वो चंद्राबाई नामक थिएटर आर्टिस्ट के संगीत से प्रभावित हुईं। पटना के प्रसिद्ध सारंगी वादक उस्ताद इम्दाद ख़ान से उन्हें बाक़ायदा संगीत सीखने का मौका मिला; उसके बाद पटियाला के अता मोहम्मद ख़ान ने भी उन्हें संगीत की बारीकियाँ सिखाई। तत्पश्चात् अख़्तरीबाई अपनी वालिदा के साथ कलकत्ते का रुख़ किया और वहाँ जाकर संगीत के कई दिग्गजों जैसे कि मोहम्मद ख़ान, अब्दुल वाहीद ख़ान और सुताद झंडे ख़ान से संगीत की तालीम ली। १५ वर्ष की आयु में उन्होंने अपना पहला पब्लिक पर्फ़ॊमैन्स दिया। १९३४ में बिहार के भूकम्प प्रभावित लोगों की मदद के लिए आयोजित एक जल्से में उन्होंने अपना गायन प्रस्तुत किया जिसकी तारीफ़ ख़ुद सरोजिनी नायडू ने की थी। इस तारीफ़ का यह असर हुआ कि अख़्तरीबाई ने ग़ज़ल गायकी को बहुत गंभीरता से लिया और एक के बाद एक उनके गाये ग़ज़लों, दादरा और ठुमरी के रेकोर्ड्स जारी होते गए। तो क्यों न हम भी इन्हीं रेकॊर्ड्स में से एक यहाँ बजाएँ! ग़ज़ल तो हम सुन चुके हैं, आइए एक ठुमरी का आनंद लिया जाए।

ठुमरी - ना जा बलम परदेस (बेगम अख़्तर)


अख़्तरीबाई का ताल्लुख़ फ़िल्मी गीतों से भी रहा है। इस क्षेत्र में उनकी योगदान को हम फिर किसी दिन आप तक पहूँचाएँगे 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के ज़रिए, यह हमारा आप से वादा है। १९४५ में अख़्तरीबाई ने बैरिस्टर इश्तिआक़ अहमद अब्बासी से विवाह किया और वो बन गईं बेगम अख़्तर। लेकिन विवाह के बाद पति की सख़्ती की वजह से बेगम अख़्तर लगभग पाँच वर्षों के लिए गा नहीं सकीं और आख़िरकार बीमार पड़ गईं। उनकी बिगड़ती हालत को देखकर चिकित्सक ने उन्हें दोबारा गाने का सलाह दी. और इस तरह से १९४९ को बेगम अख़्तर वापस रेकॊर्डिंग् स्टुडिओ पहुँचीं और लखनऊ रेडिओ स्टेशन के लिए तीन ग़ज़लें गाईं और जल्द ही स्वस्थ हो उठीं। फिर उन्होंने स्टेज पर गाने का सिलसिला जारी रखा और आजीवन यह सिलसिला जारी रहा। उम्र के साथ साथ उनकी आवाज़ भी और ज़्यादा मचियोर और पुर-असर होती चली गई, जिसमें गहराई और ज़्यदा होती गई। अपनी ख़ास अंदाज़ में वो ग़ज़लें और उप-शास्त्रीय संगीत की रचनाएँ गाया करतीं। जो भी ग़ज़लें वो गातीं, उनकी धुनें भी वो ख़ुद ही बनातीं, जो राग प्रधान हुआ करती थी. वैसे दूसरे संगीतकारों के लिए भी गाया, और ऐसे ही एक संगीतकार थे हमारे ख़य्याम साहब जिन्हें यह सुनहरा मौका मिला बेगम साहिबा से गवाने का। सुनिए ख़य्याम साहब के शब्दों में (सौजन्य: संगीत सरिता, विविध भारती):

"जब मैं छोटा था, उस वक़्त बेगम अख़्तर जी की गायी हुई ग़ज़लें सुना करता था। तो आप समझ सकते हैं कि जब मुझे उनके लिए ग़ज़लें कम्पोज़ करने का मौका मिला तो कैस लगा होगा! एक बार वो मुझे मिलीं तो कहने लगीं कि 'ख़य्याम साहब, मैं चाहती हूँ कि आप मेरे लिए ग़ज़लें कम्पोज़ करें, मैं आपके लिए गाना चाहती हूँ। तो पहले तो मैंने उनसे कहा कि मैं क्या आपके लिए ग़ज़लें बनाऊँगा, आप ने इतने अच्छे अच्छे ग़ज़लें गायी हैं। लेकिन उन्होंने कहा कि 'नहीं, आप कम्पोज़ कीजिए, मैं ६ ग़ज़लों का एक पूरा ऐल्बम करना चाहती हूँ, आप बताइए कि जल्द से जल्द कब हम रिकोर्ड कर सकते हैं?'। मैंने कहा कि देखिए मुझे एक ग़ज़ल के लिए एक महीना चाहिए, ऐसे ६ ग़ज़लों के लिए ६ महीने लग जाएँगे। उन्होंने कहा 'ठीक है'। फिर मैंने ग़ज़लें कम्पोज़ करनी शुरु की। अब रिहर्सल का वक़्त आया, उस वक़्त उनकी उम्र भी हो गई थी, तो उनके गले से वो आवाज़, वो काम नहीं निकल के आ रहा था जैसा कि मैं चाह रहा था। लेकिन क्योंकि वो इतती बड़ी फ़नकारा हैं, मैं उनसे नहीं कह सकता था कि आप यहाँ ग़लत गा रही हैं, या आप से नहीं हो पा रहा है। लेकिन वो इतनी बड़ी कलाकार हैं कि वो इस बात को समझ गयीं कि उनसे ठीक से नहीं गाया जा रहा है। उन्होंने मुझसे कहा कि 'ख़य्याम साहब, मैं ठीक से गा नहीं पा रही हूँ'। हमने फिर मिल कर वो ग़ज़लें तैयार की, और ग़ज़लें रेकॊर्ड हो जाने के बाद बेग़म अख़्तर जी मुझसे कहने लगीं कि 'ख़य्याम साहब, आप ने मुझसे यह काम कैसे करवा लिया? मुझे तो लग ही नहीं रहा कि इतना अच्छा मैंने गाया है!' यह उनका बड़प्पन था।"

तो लीजिए दोस्तों, वादे के मुताबिक़ बेगम अख़्तर जी की आवाज़ में अब एक ऐसी ग़ज़ल की बारी जिसकी तर्ज़ ख़य्याम साहब ने ही बनाई है, "मेरे हमनफ़स मेरे हमनवा...", पेश-ए-ख़िदमत है।

ग़ज़ल: मेरे हमनफ़स मेरे हमनवा (बेगम अख़्तर)


अहमदाबाद में बेगम अख़्तर ने अपना अंतिम कॊन्सर्ट प्रस्तुत करते वक़्त उनकी तबियत ख़राब होने लगी और उन्हें उसी वक़्त अस्पताल पहुँचाया गया। ३० अक्तुबर १९७४ को ६० वर्ष की आयु में उन्होंने अपनी सहेली नीलम गमादिया की बाहों में दम तोड़ा, जिनकी निमंत्रण से ही बेगम अख़्तर अहमदाबाद आई थीं अपने जीवन का अंतिम पर्फ़ॊर्मैन्स देने के लिए। बेगम अख़्तर को लोगों का इतना प्यार मिला है कि वह प्यार आज भी क़ायम है, उनके जाने के चार दशक बाद भी उनकी गायकी के कायम आज भी करोड़ों में मौजूद हैं। पद्मश्री, संगीत नाटक अकादमी और मरणोपरांत पद्मभूषण से सम्मानित बेगम अख़्तर संगीताकाश की एक चमकता सितारा हैं जिनकी चमक युगों युगों तक बरकरार रहेगी।

तो दोस्तों, यह था आज का 'सुर-संगम', हमें आशा है आपको पसंद आया होगा। इस स्तंभ के लिए आप अपने विचार, सुझाव और आलेख हमें oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेज सकते हैं। शाम ६:३० बजे 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के साथ हम फिर हाज़िर होंगे, तब तक के लिए इजाज़त दीजिए, नमस्कार!

प्रस्तुति-सुजॉय चटर्जी



आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

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