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Friday, June 24, 2011

यादों के इडियट बॉक्स से झांकती कुछ स्मृतियाँ रिवाईंड होती, एक कहानी में जज़्ब होकर

Taaza Sur Taal (TST) - 18/2011 - REWIND - NINE LOST MEMORIES A NON FILM ALBUM BY "THE BAND CALLED NINE"

ताज़ा सुर ताल में एक बार हम फिर हाज़िर हैं कुछ लीक से हट कर बन रहे संगीत की चर्चा लेकर. पत्रकारिता में एक कामियाब नाम रहे नीलेश मिश्रा ने काफी समय पहले ट्रेक बदल कर बॉलीवुड का रुख कर लिया था. एक उभरते हुए गीतकार के रूप में यहाँ भी वो एक खास पहचान बना चुके हैं. "जादू है नशा है" (जिस्म), "तुमको लेकर चलें" (जिस्म), "क्या मुझे प्यार है" (वो लम्हें), "गुलों में रंग भरे" (सिकंदर), "आई ऍम इन लव" (वंस अपौन अ टाइम इन मुंबई) और 'अभी कुछ दिनों से (दिल तो बच्चा है जी) खासे लोकप्रिय रहे हैं. निलेश ने संगीत की दुनिया में अपना अगला कदम रखा एक बैंड "द बैंड कोल्ड नाईन" बना कर. आज हम इसी बैंड के नए और शायद पहले अल्बम "रीवायिंड" की यहाँ चर्चा करने जा रहे हैं.

अभी बीते सप्ताह इस अल्बम का दिल्ली में एक भव्य कार्यक्रम में विमोचन हुआ, "मोहल्ला लाईव" के इस कार्यक्रम में मैंने भी शिरकत की. दरअसल नीलेश और उनकी टीम केवल इसी बात से हम सबकी तालियों की हकदार हो जाती है कि उन्होंने इस अल्बम में कुछ बेहद नया कॉसेप्ट ट्राई किया है. जिस तरह हिंद युग्म में अपनी पहली अल्बम "पहला सुर" में कविताओं और गीतों को मिलाकर पेश करने का अनूठा प्रयोग किया था, यहाँ भी एक कवितामयी कहानी है जिसके बीच में गीत भी चलते हैं, यानी "थोड़े गीत थोड़ी कहानी". इस प्रयोग को नाम दिया गया है "किस्सागोई". यानी कि श्रोता को ये भी पता चल जाता है कि अमुख गीत किस सिचुएशन के लिए बना होगा. इस प्रयोग में मगर एक खामी है, गीत आप बार बार सुन सकते हैं, मगर सुनी हुई कहानी को बार बार सुनना शायद बहुत से श्रोता पसंद न करें. मगर मैं आपको बता दूं कि नीलेश की आवाज़ और कहानी को कहने की अदायगी बेहद शानदार और बाँध के रखने वाली है.

अब इस किस्सागोई में जो किस्सा है उसमें छोटे शहर और मध्यमवर्गीय परिवारों के किरदार चुनकर एक रिश्ता कायम करने की कोशिश तो की गयी है, पर कहानी में कुछ खास नयापन नहीं है हाँ उसे कहने के लिए नीलेश ने जो शब्द चुने हैं शानदार हैं बेशक. तो चलिए अब गीतों की बढ़ा जाए.

"इडियट बॉक्स" में वो सब है जो आपके बचपन को आपके लिए रीवायिंड कर देगा. आकाशवाणी की सुबहें और दूरदर्शन की शामें, बड़े सुहाने दिन थे, आज की पीढ़ी को तो शायद यकीन भी न हो उन बातों पर. शिल्पा राव की आवाज़ में वो नोस्टोलोजिया बहुत खूब छलकता है.

छोटे शहर से बड़े शहर में आये एक इंसान की तनहाईयाँ दिखती है "माज़ी" में. सूरज जगन एक उभरते हुए रोक्क् गायक है. पर मुझे शिकायत है कि जब प्रयोग में इतनी ताजगी है तो संगीत में क्यों नहीं. जब आजकल बॉलीवुड में भी सिर्फ और सिर्फ रोक्क् ही चालू है तो "बैंड कोल्ड नाईन" को यहाँ भी कुछ नया करना चाहिए था. गीत में जान आती है शिल्प राव जब 'मोरे पिया' गाती है.

"कोल्लेज में कोई दस बीस साल लंबा कोर्स नहीं होता क्या.." नीलेश पूछते हैं, और वो लड़कपन की यादें एक बार फिर उभरती है इस बार सूरज जगन की आवाज़ में "इडियट बॉक्स" के एक अन्य संस्करण में. "काठ गोदाम की बस ५ बजे जाती है...पूरी फिल्म भी नहीं देखने दी उसने..." के बाद "रूबरू" प्यार के उस अल्हडपन की कहानी है. संगीत पक्ष मुझे यहाँ भी बोलों के लिहाज से कमजोर लगा. धुन वही बढ़िया होती है जो दिल के तार छेड़े और गीत वही यादगार होता है जिसे हम अकेले में गुनगुना सकें. अगला गीत 'शायद" भी आजकल बन रहे बॉलीवुड के गीतों से कुछ खास अलग नहीं है, पर मैं बताता चलूँ कि नीलेश के बोल और उनकी कमेंट्री इन सब गीतों में भी शानदार है. नायक को सामने की बिल्डिंग में अचार के लिए नीम्बू सुखाती औरत को देख कर याद आती है "माँ" और गीत उभरता है "आँगन" "खाली खाली शामों में, उलझन से भरी दुपहरों में, कुछ ढूँढता है मन...." वाह बेहद खूबसूरत है ये गीत, यहाँ सौभाग्यवश संगीत पक्ष भी गीत के बोलों के टक्कर का है, और सूरज जगन ने दिखाया है कि वो गीतों में भाव लाना भी खूब जानते हैं.

टूटते रिश्तों की कहानी बयां करती "नैना तोरे" में शिल्पा खूब जमी है, सुन्दर शब्द और संगीत उनका भरपूर साथ देते हैं. इंटरल्यूड में सितार का सुन्दर इस्तेमाल हुआ है. ट्रांस मिक्स का उत्कृष्ट नमूना है ये गीत. नीलेश खुद माइक के पीछे आकर गाते भी हैं. एक मुश्किल कम्पोजीशन है ये. गज़ल नुमा ये गीत है "उनका ख्याल" जिसे वो अच्छा निभा गए हैं, गायिकी उनकी जैसी भी हो पर भाव पक्ष खूब संभाला है. एक गीत से रिश्ता जोड़ने के लिए ये काफी होता है. अल्बम का अंतिम गीत "दिल रफू" एक डांस नंबर है, जो भरपूर मज़ा देता है. कोंसर्ट के दौरान बहुत से लोगों को इस पर थिरकते देखा. संगीतकार अमर्त्य राहूत यहाँ कामियाब रहे हैं.

कुल मिलाकर ये अलबम आपको बेहद भाएगा ये मैं दावे के साथ कह सकता हूँ. एक नए और लाजवाब प्रयोग को इतने बेहतर तरीके से प्रस्तुत करने के लिए ये पूरी टीम बधाई की हकदार है. हम तो सिफारिश करेंगें कि आप इसे अवश्य सुनें.

आवाज़ रेटिंग - 9/10

मुझे इस अल्बम के गाने कहीं ऑनलाइन सुनने को नहीं मिले, पर फ्लिप्कार्ट से इसे खरीद कर आप सुन सकते हैं



अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं। "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है। आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रूरत है उन्हें ज़रा खंगालने की। हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं।

Friday, June 10, 2011

डेल्ही बेल्ली - एकदम फ्रेश, अनुसुना, और नए मिजाज़ का संगीत

Taaza Sur Taal (TST) - 17/2011 - DELHI BELLY

फिल्म "खाकी" का वो खूबसूरत गीत आपको याद ही होगा – 'वादा रहा प्यार से प्यार का....". एक बेहद युवा संगीतकार राम संपत ने रचा था इस गीत को. "खाकी" की सफलता के बावजूद राम अभी उस कमियाबी को नहीं छू पाए थे जिसके कि वो निश्चित ही हकदार हैं. आमिर खान की "पीपली लाईव" के महंगाई डायन गीत को जमीनी गीत बनाने में भी उनका योगदान रहा था. शायद वहीँ से प्रभावित होकर आमिर ने अपनी महत्वकांक्षी फिल्म "डेल्ही बेल्ली" में उन्हें बतौर संगीतकार चुना. आईये आज बात करें "डेल्ही बेल्ली" में राम के संगीत की.

कहते हैं फ़िल्में समाज का आईना होते हैं. इस नयी सदी का युवा जिन परेशानियों, कुंठाओं और भावनाओं से उलझ रहा है जाहिर है यही सब आज की फिल्मों में, गीतों में दिखाई सुनाई देगा. अब जो कहते हैं कि आज संगीत बदल गया है कोई उनसे पूछे कि आज दुनिया कितनी बदल गयी है. संगीत भी तो उसके पेरेलल ही चलेगा न. बहरहाल हम आपको बता दें कि डेल्ही बेल्ली एक पूरी तरह से "एक्सपेरिमेंटल" अल्बम है, यानी एक दम कुछ नया ताज़ा, अगर आपके कान इसके लिए तैयार हों तभी इस अल्बम को सुनें. उदाहरण के लिए पहला ही गीत "भाग भाग डी के बोंस" कुछ ऐसा है जो पहली सुनवाई में ही आपको चौका देगा. खुद राम ने इसे अपनी आवाज़ दी है. प्रस्तुत गीत में वो सभी उलझनें, मुश्किलातें, कुंठाएं समाहित है जिसका कि हम ऊपर जिक्र कर चुके हैं. रोक्क् शैली के इस गीत की रिदम बेहद तेज है ऐसा लगेगा जैसे आप किसी रोलर कोस्र्टर में बैठे हैं और भागे जा रहे हैं, गीत के बोल भी तो आखिर भागने की सलाह दे रहे हैं. कुल मिलाकर ये गीत एक चार्ट बस्टर है इसमें कोई शक नहीं.

डैडी मुझे बोला तू गलती है मेरी,
तुझपे जिंदगानी गिल्टी है मेरी,
साबुन की शकल में निकला तू तो झाग....


खुद पर पड़े माँ बाप की भारी भरकम उम्मीदों के बोझ को आज का युवा और किन शब्दों में व्यक्त करेगा....अल्बम की खासियत है इसकी विविधता, अगला गीत "नक्कड़ वाले डिस्को" एकदम अलग पेस का है. सड़क छाप शब्दों से बुना गया है इस गीत को, जिसे गाया है कीर्ति सगाथिया ने. संगीत संयोजन गीत की जान है. इस गीत को हास्य जोनर का कह सकते हैं. पर है कानों के लिए एक नया अनुभव. मुझे तो मज़ा आया.

चेतन शशितल आपको हैरान करते हैं जब सहगल अंदाज़ में गीत की शुरुआत करते है, गीत का नाम ही "सहगल ब्ल्यूस" है. लाउंज म्यूजिक और सहगल का रेट्रो अंदाज़. २०११ में में १९४१ का मज़ा. "इस दर्द की न है दवाई, मजनूं है या है तू कसाई..." हा हा हा...गजब का संगीत संयोजन, एकदम नया इस्टाईल है राम का.

अगर अल्बम के अब तक के गीत आपको फ्रेश लगे हों तो लीजिए पेश है नए अंदाज़ में बॉलीवुड का तडका मार के, पुरविया संगीत का जादू अगले गीत बेदर्दी राजा में जिसे आवाज़ से संवारा है सोना महापात्रा ने. हारमोनियम के स्वरों को हमने कितना मिस किया है इस नए दशक में, भरपूर आनंद देगा आपको ये गीत अगर आपको ठेठ भारतीय संगीत पसंद है तो.

अगला गीत आपको भारत से सीधे अमेरिका ले जायेगा "गन्स एंड रोसेस" और "मेटालिका" स्टाईल का हार्ड रोक्क् गीत है "जा चुड़ैल". नए दौर की लड़कियां भी नयी है. और लड़के अगर इन्हें समझने में भूल करे तो आश्चर्य क्या. ऐसे में "चुड़ैल" जैसे शब्द स्वाभाविक ही जुबान पे आते है और मुझे लगता है कि लड़कियों को भी अब इन नए संबोधनों से कोई परेशानी नहीं है(बेहद व्यक्तिगत राय है). वैसे सूरज जगन अब इस शैली में मास्टर हो गए हैं. गीत हार्ड रोक्क् से चहेतों को ही अधिक भाएगा.

अगला गीत एक सोफ्ट रोमांटिक गीत है खुद राम और तरन्नुम मालिक की युगल आवाजों में. तरन्नुम आपको याद होगा कभी आवाज़ के इसी मंच पर आई थी गीत "एक धक्का दो" लेकर जिसे आप सब श्रोताओं का भरपूर प्यार भी मिला था. हमें लगा इस गीत के बारे में क्यों न कुछ तरन्नुम से ही पूछा जाए. लीजिए पेश है ये संक्षिप्त सा इंटरव्यू-
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सजीव – राम का संगीत इस अल्बम में बेहद "एक्सपेरिमेंटल" है, कैसा रहा उनके साथ काम करना ?

तरन्नुम – मैंने उनके साथ कुछ जिंगल्स भी किये हैं और उनके साथ काम करना हमेशा ही एक रेफ्रेशिंग तजुर्बा रहा है, अब उनके साथ इस फिल्म में काम करना मेरी खुशकिस्मती रही. वो बहुत जबरदस्त संगीतकार है और एक अच्छे इंसान भी.

सजीव – अगर मै पूछूं "तेरे सिवा" के आलावा आपका पसंदीदा गीत कौन सा है फिल्म का ?

तरन्नुम – ये बेहद मुश्किल सवाल है, क्योंकि हर गीत यहाँ बेहद अलग है, "डी के बॉस" एक रोक्क् गीत है जबकि "बेदर्दी राजा" एक आइटम गीत है. जिसे सोना ने बहुत ही बढ़िया गाया है. और देखा जाए तो "तेरे सिवा" इकलौता रोमांटिक गीत है, तो मैं इस अल्बम के गीतों को एक दूसरे से कम्पेयर नहीं कर सकती, मुझे इसके सभी गीत पसंद है क्योंकि सभी बेहद यूनिक हैं.

सजीव – अच्छा इस गीत से जुडी हुई कोई बात जो याद आती हो ?

तरन्नुम – राम ने मुझे फोन किया और अपने स्टूडियो आने को कहा. सबसे बढ़िया बात ये रही कि राम ने मुझे मात्र १० मिनट में ये गीत समझा दिया सिखा दिया, और सिर्फ २५ मिनट बाद मैं डब्बिंग रूम से बाहर थी और गाना पूरा हो चुका था.
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अल्बम में २ गीत और हैं – स्वीटी तेरा प्यार और आई हेट यू लईक आई लव यू....दोनों ही गीत एक दूसरे से एकदम अलग है हैं और अल्बम की विविधता को बढाते हैं. सभी गीत अमिताभ भट्टाचार्य ने लिखे हैं, शाब्दिक लिहाज से गीत और बढ़िया हो सकते थे, पर शायद फिल्म की जरुरत के हिसाब से उन्हें ऐसा रखा गया हो, बहरहाल लंबे समय बाद राम संपत कुछ ऐसे देने में कामियाब रहे हैं जिसकी उनके जैसे बेहद प्रतिभाशाली संगीतकार से हमेशा ही उम्मीद रहती है. मुझे व्यक्तिगत तौर पर "डी के बॉस" "सहगल ब्ल्यूस" और "बेदर्दी राजा" बेहद पसंद आये. फिर वही बात कहूँगा ये अल्बम आपके लिए है अगर वाकई कुछ अनसुना, अनूठा सुनने की चाहत रखते हों तो.

आवाज़ रेटिंग - 8.5/10

एक और बात: इस एलबम के सारे गाने आप यहाँ पर सुन सकते हैं।




अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं। "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है। आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रूरत है उन्हें ज़रा खंगालने की। हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं।

Friday, June 3, 2011

लाईफ बहुत सिंपल है....वाकई अमोल गुप्ते और हितेश सोनी के रचे इन गीतों सुनकर आपको भी यकीन हो जायेगा

Taaza Sur Taal (TST) - 16/2011 - STANLEY KA DABBA

दोस्तों मुझे यकीन है कि "तारे ज़मीन पर" आपकी पसंदीदा फिल्मों में से एक होगी. अगर हाँ तो आप ये भी जानते होंगें कि इस फिल्म के निर्देशक पहले अमोल गुप्ते नियुक्त हुए थे, बाद में कुछ कारणों के चलते अमोल, अमीर से अलग हो गए और अमीर ने खुद फिल्म का निर्देशन किया. पर ये भी सच है कि उस फिल्म में अमोल का योगदान एक लेखक से बहुत कुछ अधिक था, जाहिर है जब उस अमोल की खुद निर्देशित फिल्म आये और उसमें भी बच्चों की ही प्रमुख भूमिकाएं हो तो उम्मीदें बेहद बढ़ जाती है. "तारे ज़मीन पर" में संगीत था शंकर एहसान लॉय की तिकड़ी का और कुछ गीत तो फिल्म के ऐसे थे कि आने वाले कई दशकों तक श्रोताओं को याद रहेंगें. मगर अमोल ने अपनी फिल्म "स्टेनली का डब्बा" के लिए चुना संगीतकार हितेश सोनिक को, और गीतकार की भूमिका खुद उठाने की सोची. हितेश अब तक पार्श्व संगीत के लिए जाने जाते थे और अनुराग कश्यप विशाल भारद्वाज जैसे बड़े संगीतकारों के साथ काम कर चुके है. बतौर स्वतंत्र संगीतकार ये उनकी पहली फिल्म है.

बहरहाल हम आते हैं इस अल्बम के गीतों पर. दरअसल पहला गीत ही ऐसा है जो आपको गहरे तक छूने की कुव्वत रखता है. शान की मधुर आवाज़ और अमोल गुप्ते के अलग "हट के" बोलों में जैसे जादू है. "लाईफ बहुत सिंपल है..." जीवन को सरल और सहज होकर देखने की सीख देती है, हितेश ने संगीत संयोजन बेहद सरल रखा है. और धुन भी मन को छूने में सक्षम है. यक़ीनन आप इस गीत को ड्राईव करते हुए गुनगुनाना चाहेंगें.

सुखविंदर ने सहज होकर गाया है अगला गीत "डब्बा", जिसे सुनकर आपको याद आ जायेगा माँ के हाथों बनाया हुआ टिफिन का डब्बा जिसे स्कूल ले जाते समय ताकीद मिलती थी कि कुछ भी बाकी नहीं छूटना चाहिए, और वो स्कूल रिसेस जिसमें योजना बनती थी इस डिब्बे को कैसे खाली किया जाए. दाल, चावल, पनीर, मशरूम, गोभी....सब कुछ है इस मसाला मिक्स गीत में. सुखविंदर यहाँ आपको एक नए अंदाज़ में दिखेंगें. वो एक ऐसे गायक हैं कि जो गाते हैं उसमें अपना दिल उंडेल देते है, अमोल के गैर पारंपरिक शब्द इस सरल सहज गीत की जान हैं.

शंकर महादेवन की आवाज़ में है अगला गीत "नन्ही सी जान". कहानीनुमा ये गीत अल्बम के अन्य गीतों से अलग कुछ रोक् शैली का है. ये फिल्म की सिचुएशन के अनुरूप होना चाहिए, जो शायद परदे पर अधिक सटीक लगे. विशाल ददलानी आते है अगला गीत लेकर "तेरे अंदर भी कहीं...", ये सोफ्ट रोक् गीत उनकी आवाज़ में खूब जचता है. इस गीत का एक संस्करण आदित्य चक्रवर्ती की किशोर आवाज़ में भी है. अमोल लिखते हैं –"किरणों में नहाके ताज़ा तरीन, खुशियों के निवाले हो ज्यादा महीन, भोला सा दिल करे सबपे यकीन, भेड़ों की भीड़ में भूल आया क्या तू...." वाह

तमाम पुरुष गायकों की भीड़ में एक गीत है जिसमें महिला स्वर सुनाई देता है. इसे गीत को खुद अमोल के स्वरबद्ध किया है. ये गीत एक लोरी है, पता नहीं कितने दिनों बाद फिल्मों में एक अच्छी लोरी सुनने को मिली है, पार्श्व वाध्य के रूप में सिर्फ बांसुरी के स्वर हैं, और हंसिका अय्यर की सुरीली आवाज़ में बहुत प्यारा बन पड़ा है ये गीत – झूला झूल...., अवश्य सुनियेगा. व्यक्तिगत तौर पर मैं इस अल्बम की सिफारिश अवश्य करूँगा, बाकी सुनकर आप भी बताएं कि ये धीमा, सुरीला संगीत अपनी सहजता में आपको किस हद तक भाया है.

आवाज़ रेटिंग - 8/10

एक और बात: इस एलबम के सारे गाने आप यहाँ पर सुन सकते हैं।




अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं। "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है। आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रूरत है उन्हें ज़रा खंगालने की। हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं।

Tuesday, May 24, 2011

लव यू मिस्टर कलाकार है सुरीले प्रेम गीतों से सजी अल्बम

Taaza Sur Taal (TST) - 14/2011 - Love U Mr Kalakaar

राजश्री प्रोडक्शन ने हमेशा ही साफ़ सुथरी संगीतमयी फिल्मों की परंपरा को निभाया है. पर मुझे लगता है कि वो अपनी फिल्मों के संगीत को सही रूप से प्रोमोट नहीं करते यही वजह है कि उनकी फिल्मों का संगीत अच्छा होने के बावजूद बहुत अधिक लोगों तक नहीं पहुँच पाता, हमेशा माउथ टू माउथ पब्लिसिटी काम नहीं करती है ये बात अब उन्हें समझनी चाहिए. तुषार कपूर और अमृता राव अभिनीत उनकी नयी फिल्म "लव यू मिस्टर कलाकार" एक और प्रेम कहानी है, जाहिर है संगीत में माधुर्य जरूरी है, संगीतकार के रूप में चुने गए हैं बेहद प्रतिभाशाली सन्देश शान्दलिया और गीत लिखे हैं नवोदित गीतकार मनोज मुन्तशिर ने. चलिए जरा सी चर्चा करें इस अल्बम में सजे गीतों की आज.

अंग्रेजी शब्दों क इस्तेमाल अब राजश्री वालों को भी रास आ रहा है. "सरफिरा सा है दिल" में श्रेया की अधुर आवाज़ है, खूबसूरत बोल हैं और मधुर धुन है सन्देश की, पर मैं समझ नहीं पाता हूँ, नीरज श्रीधर से ये गीत क्यों गवाया गया. आज जब इंडस्ट्री में इतने नए पुराने गायक मौजूद हैं संगीतकार नीरज से ऐसे गीत गवाते हैं जो उनका फोर्टे नहीं है ये अजीब लगता है. मुझे लगता है कि ये गीत और भी बढ़िया बन सकता था अगर सही गायक से इसे गवाया जाता.

विजय प्रकाश और गायत्री गांजावाला की आवाजों में अगला गीत "तेरा इंतज़ार", यहाँ भी एक बार फिर अंग्रेजी शब्दों से शुरुआत है. गाने का पेस बहुत बढ़िया है, विजय की आवाज़ में कशिश है, मनोज के शब्द परफेक्ट हैं. कुल मिलाकर एक खूबसूरत गीत है. गायत्री की आवाज़ दूसरे अंतरे से शुरू होती है जिसके बाद गीत और भी दिलचस्प हो जाता है. हमारी तरफ से पूरे अंक इस गीत को

"भूरे भूरे बादल, भीगा भीगा जंगल, नीला नीला पानी, शामें हैं सुहानी"....मुझे ये अगला गीत बेहद पसंद आया. श्रेया ने गायिकी में जो अदाएं उठायी है उसे मैच किया है बहुत अच्छे से कुणाल गांजावाला ने. बांसुरी की सुन्दर तानें पहाड़ों में वादियों में ले जाती है. एक बोन फायर में कैम्पिंग करते जोड़े की फीलिंग्स को बहुत अच्छे से मनोज ने अपने शब्दों से उभारा है और सन्देश ने जान फूंक दी है इस गीत में, अंत तक बांसुरी साथ चलती है और मन को मोहे रखती हैं.

शीर्षक गीत कुणाल और गायत्री की युगल आवाजों में है. कुणाल के स्वाभाविक अंदाज़ के अनुरूप है ये गीत. एक कलाकार जो अपने रंगों में दुनिया को रंगता है उसको समर्पित है ये गीत. अच्छा फिल्मांकन इस गीत को परदे पर बढ़िया बना देगा इसमें कोई शक नहीं. याद आया मुझे कि जीतेन्द्र ने एक मूर्तिकार की भूमिका की थी "गीत गया पत्थरों ने" में और अब एक तुषार पेंटर बने हैं इस सदी के. वेल वी टू लव ऑल अवर कलाकार.

अब बारी उस गायक की जिसकी आवाज़ का टिम्बर कहीं दूर ही उड़ा ले जाता है, जी हाँ मेरे पसंदीदा मोहित चौहान जिनके साथ है शिवांगी कश्यप (क्या शिवांगी, शिबानी कश्यप से सम्बंधित है, अगर आपको पता हो तो बताएं) जिनकी आवाज़ में ताजगी है. "वक्त ये रूठ के हाथ से छूट के जाने फिर आये न आये, कहीं से चली आ...", सबसे अच्छी बात है कि गीत सामान्य अंतरा मुखडा फोर्मेट में नहीं है. एक बहाव है जहाँ दोनों गायक आपको बहा ले जाते हैं. बहुत बढ़िया गीत है और हम दे रहे हैं एक और थम्प्स अप.

जेनिस सोबित और विन्नी हट्टन की आवाजों में एक अंग्रेजी गीत भी है "रीचिंग फॉर थे द रेनबो" और कुछ रीमिक्स भी हैं. कुल मिलाकर मुझे उम्मीद से अधिक मिला इस अल्बम से, संगीत के ऐसे दौर में जहाँ मेलोडी लगभग गायब सी हो चली है, फिल्म का संगीत एक ताज़ा झोंके जैसा है पर आपकी संगीत पिपासा को पूरी तरह से संतुष्ट कर पाता हो ऐसा भी नहीं है. इस दौर में लगता है कि एक झोंका नहीं आंधी चाहिए. बहरहाल सन्देश और मनोज मुन्तशिर की ये जोड़ी उम्मीद जगाती है. और आने वाले समय में हम इनसे और भी अच्छे संगीत प्रयासों की निश्चित ही उम्मीद रख सकते हैं.

श्रेष्ठ गीत – कहीं से चली आ, भूरे भूरे बादल, तेरा इन्तेज़ार
आवाज़ रेटिंग – ८/१०


और अब सुनिए इन गीतों को - सौजन्य रागा डॉट कॉम



अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं। "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है। आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रूरत है उन्हें ज़रा खंगालने की। हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं।

Monday, May 16, 2011

आ बदल डाले रस्में सभी इसी बात पे.....कुछ तो बात है अमित त्रिवेदी के "आई एम्" में

Taaza Sur Taal (TST) - 12/2011 - I AM

आज सोमवार की इस सुबह मुझे यानी सजीव सारथी को यहाँ देख कर हैरान न होईये, दरअसल कई कारणों से पिछले कुछ दिनों से हम ताज़ा सुर ताल नहीं पेश कर पाए और इस बीच बहुत सा संगीत ऐसा आ गया जिस पर चर्चा जरूरी थी, तो कुछ बैक लोग निकालने के इरादे से मैं आज यहाँ हूँ, आज हम बात करेंगें ओनिर की नयी फिल्म "आई ऍम" के संगीत की. दरअसल फिल्म संगीत में एक जबरदस्त बदलाव आया है. अब फिल्मों में अधिक वास्तविकता आ गयी है, तो संगीत का इस्तेमाल आम तौर पर पार्श्व संगीत के रूप में हो रहा है. यानी लिपसिंग अब लगभग खतम सी हो गयी है. और एक ट्रेंड चल पड़ा है रोक् शैली का. व्यक्तिगत तौर पर मुझे रोक् जेनर बेहद पसंद है पर अति सबकी बुरी है. खैर आई ऍम का संगीत भी यही उपरोक्त दोनों गुण मौजूद हैं.

पहला गाना "बांगुर", बेहद सुन्दर विचार, समाज के बदलते आयामों का चित्रण है, एक तुलनात्मक अध्ययन है बोलों में इस गीत के और इस कारुण अवस्था से बाहर आने की दुआ भी है. आवाजें है मामे खान और कविता सेठ की. अमित त्रिवेदी के चिर परिचित अंदाज़ का है गीत जिसे सुनते हुए भीड़ भाड भरे शहर उलझनों की जिन्दा तस्वीरें आँखों के आगे झूलने लगती हैं. मामे खान भी उभरते हुए गायक मोहन की तरह बेहद सशक्त है. इससे पहले आपने इन्हें "नो वन किल्ल्ड जसिका" के बेहद प्रभावशाली गीत "ऐतबार" में सुना था. पर यहाँ अंदाज़ अपेक्षाकृत बेहद माईल्ड है. कविता अपने फॉर्म में है, यक़ीनन गीत कई कई बार सुने जाने लायक है.

इसके बाद जो गीत है वो अल्बम का सबसे शानदार गीत है, पहले गीत की तमाम निराशाओं को दरकिनार कर एक नयी आशा का सन्देश है यहाँ. गीत के बोल उत्कृष्ट हैं, "बोझ बनके रहे सुबह क्यों किसी रात पे....", "जीत दम तोड़ दे न कभी किसी मात पे" जैसी पक्तियां स्वतः ही आपका ध्यान आकर्षित करेंगीं. आवाज़ है मेरे बेहद पसंदीदा गायक के के की. मैं अभी कुछ दिनों पहले ये फिल्म देखी थी, जिसके बाद ही मुझे इसके संगीत के चर्चा लायक होने का अहसास हुआ. एक और बार बार सुने जाने लायक गीत.

फिल्म में चार छोटी छोटी कहानियों को जोड़ा गया है. अगला गीत इसकी तीसरी कहानी पर है जहाँ नायक का बचपन में शारीरिक शोषण हुआ है और बड़े होने के बाद भी कैसे उन बुरे लम्हों को वो खुद से जुदा नहीं कर पा रहा है, इसी कशमकश का बयां है गीत "बोझिल से...". बेहद दर्द भरा गीत है, एक बार फिर शब्द शानदार हैं,..."बिना पूछे ढेर सारी यादें जब आती है.....ख़ाक सा धुवां सा रहता है इन आँखों में...." वाह. यहाँ संगीत है राजीव भल्ला का. आवाज़ निसंदेह के के की है, जिनकी आवाज में ऐसे गीत अक्सर एक मिसाल बन जाते हैं. यहाँ भी कोई अपवाद नहीं.

अगला गीत 'ऑंखें" शायद हिंदी फिल्म इतिहास का पहला गीत होगा जो एक प्रेम गीत है और जहाँ दोनों प्रेमी समलिंगी है. बस यही इस गीत की खूबी है पर इसके आलावा गीत में कोई नयापन नहीं है. विवेक फिलिप के संगीत में ये गीत अल्बम के बाकी गीतों से कुछ कमजोर ही है.

अमित त्रिवेदी वापस आते हैं एक और नए तजुर्बे के साथ. एक आज़ान से शुरू होता है ये गीत, क्योंकि फिल्म में इसका इस्तेमाल एक कश्मीरी पंडित परिवार के पलायन की दास्ताँ बयां करने के लिए होता है. "साये साये" जिस तरह से बोला गया है वही काफी है आपकी तव्वजो चुराने के लिए. देखिये ऊपर मैंने मोहन का नाम लिया और मोहन मौजूद है यहाँ, साथ में जबरदस्त फॉर्म में रेखा भारद्वाज. जन्नत से दूर होकर खोये हुए जन्नत का दर्द है बोलों में, कहीं कहीं अमित रहमान के "दिल से" वाले अंदाज़ को फोल्लो करते नज़र आते हैं जैसे जैसे गीत आगे बढ़ता है, मुझे यही बात खटकी इस गीत में वैसे गीत शानदार है पर जिन लोगों इस दर्द को जिया है केवल उन्हीं को ये लंबे समय तक याद रहेगा.

राजीव भल्ला का "येंदु वंडू मेरी समझ से बाहर, इसलिए इसका जिक्र छोड़ रहा हूँ, वैसे बांगुर, बोझिल और इसी बात पे जैसे गीत काफी हैं इस अल्बम के लिए आपके द्वारा चुकाई गयी कीमत की वसूली के लिए. वैसे कभी मौका लगे तो ये फिल्म भी देखिएगा, ओनिर एक बेहद सशक्त निर्देशक हैं और फिल्म में आज के दौर के परेल्लल सिनेमा के सभी कलाकार मौजूद हैं. मुझे लगता है जिस स्तर के संगीतकार हैं अमित त्रिवेदी उन्हें रोक् जेनर से कुछ अलग भी ट्राई करना चाहिए अपने संगीत में विवधता लाने के लिए.

श्रेष्ठ गीत – "इसी बात पे", "बांगुर", "साये साये", और "बोझिल"
आवाज़ रेटिंग – ७.५/१०

फिल्म के गीत आप यहाँ सुन सकते हैं



अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं। "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है। आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रूरत है उन्हें ज़रा खंगालने की। हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं।

Friday, May 6, 2011

यश राज की "लव का द एंड" है ठंडी संगीत के मामले में

Taaza Sur Taal (TST) - 11/2011 - LOVE KA THE END

नमस्कार! 'ताज़ा सुर ताल' मे आप सभी का स्वागत है। युवा पीढ़ी को नज़र में रख कर फ़िल्म बनाने वाले फ़िल्म निर्माण कंपनियों में एक महत्वपूर्ण नाम है 'यश राज फ़िल्म्स'। इसी 'यश राज फ़िल्म्स' की एक सबसिडियरी बैनर का गठन हुआ है 'Y-Films' के नाम से, जिसका शायद मूल उद्देश्य है युवा पीढ़ी को पसंद आने वाली फ़िल्में बनाया, यानी कि Y for Youth। इस बैनर तले पहली फ़िल्म का निर्माण हुआ है जो आज देश भर में प्रदर्शित हो रही है। जी हाँ, 'लव का दि एण्ड'। फ़िल्म प्रेरीत है २००५ की अमरीकी फ़िल्म 'जॉन टकर मस्ट डाइ' से। १९ अप्रैल को फ़िल्म का संगीत रिलीज़ हुआ था। फ़िल्म में पर्दे पर नज़र आयेंगे नवोदित जोड़ी ताहा शाह और श्रद्धा कपूर।

किसी अमरीकी फ़िल्म को लेकर उसका भारतीयकरण करने में यश राज फ़िल्म्स नें पहले भी कोशिश की थी। पिचले साल ही 'लव इम्पॉसिबल' में यह नीति अपनाई गई थी, और उसके संगीत में भी वही यंग् शैली नज़र आयी थी, हालाँकि न फ़िल्म चली न ही उसका संगीत। देखते हैं 'लव का दि एण्ड' का क्या हाल होता है! और जब संगीत का पक्ष सम्भाला है राम सम्पत जैसे संगीतकार नें और गीत लिखे हैं आज के दौर के अग्रणी गीतकारों में से एक अमिताभ भट्टाचार्य नें, तो फ़िल्म के गीतों की तरफ़ कम से कम एक बार ध्यान देना तो अनिवार्य हो जाता है।

ऐल्बम का पहला गीत है गायिका अदिति सिंह शर्मा की आवाज़ में, जो है फ़िल्म का शीर्षक गीत। चैनल-वी पर एक कार्यक्रम आता है 'Axe your Ex'। इस सीरीज़ का अगर कोई टाइटल सॉंग् चुनना हुआ तो इस गीत का प्रयोग हो सकता है, क्योंकि गीत का भाव ही है अपने एक्स-लवर को सबक सिखाना। वह ज़माना गया जब प्यार में असफल होकर दर्द भरा गीत गाया जाता था। इस गीत का मूड ग़मगीन बिल्कुल नहीं है, बल्कि गीत एक पेप्पी नंबर है, और इसके बोलों को सुनकर मज़ा आता है। ७० के दशक में आपने सुना होगा "मार दिया जाये कि छोड़ दिया जाये, बोल तेरे साथ क्या सुलूग किया जाये"। "लव का दि एण्ड" गीत इसी गीत का २०११ संस्करण मान लीजिये, बस!। फ़िल्म की कहानी के हिसाब से गीत अर्थपूर्ण ही प्रतीत हो रहा है, बाकि फ़िल्म देखते वक़्त पता चलेगा। लेकिन केवल सुन कर इस गीत का किसी के होठों पर सज पाना ज़रा मुश्किल सा लगता है।

दूसरा गीत है "टूनाइट"। भले ही यह दूसरा ट्रैक रखना है, इस गीत को पिछले गीत से पहले होना चाहिये था, क्योंकि इसका जो भाव है वह कुछ ऐसा है कि एक जवान लड़की जो थोड़ी डरी हुई है क्योंकि उसे अपने पहले पहले नाइट आउट पे जाना है अपने बॉय-फ़्रेण्ड के साथ। उसे पता नहीं कि क्या होने वाला है। यह भी यह यंग् नंबर है, एक टीनेजर सॉंग् और इस तरह का गीत अक्सर पश्चिमी फ़िल्मों में पाया जाता है। ज़्यादा साज़ों की भरमार नहीं है, एक सीधा सरल सा गीत है। भले ही गीत का अंदाज़ ज़रा उत्तेजक है, लेकिन अदायगी में मासूमीयत है, मिठास है, सादगी है। गायिका सुमन श्रीधर नें अच्छा निभाया है गीत को, और एक १८ वर्षीय लड़की पर उनकी आवाज़ ख़ूब जँची है। कम्पोज़िशन के पार्श्व में जैज़ म्युज़िक की झलक मिलती है।

अगला गीत है "फ़्रेक-आउट", जिसे अदिति सिंह शर्मा और जॉय बरुआ नें गाया है। इस गीत को इन दिनों ख़ूब लोकप्रियता मिल रही है, गीत के बोल या संगीत की वजह से नहीं, बल्कि इस बात के लिये कि यह पहला भारतीय फ़िल्मी गीत है जिसमें 'स्टॉप-मोशन' तकनीक का इस्तमाल हुआ है इसके विडियो में। इस रॉक-पॉप नंबर के पार्श्व में व्हिसल की ध्वनि का सृजनात्मक प्रयोग किया गया है। आज के युवाओं की ज़िंदगी में क्या कुछ हो रहा है, उन्हीं सब बातों को लेकर के है यह गीत। इस गीत को सुनने के लिये लोग जितने बेकरार हैं, उससे कई गुणा ज़्यादा प्रतीक्षा है इसके फ़िल्मांकन को देखने की।

और अब बारी एक आइटम नंबर की। "शीला" और "मुन्नी" के बाद अब पेश है "दि मटन सॉंग्‍"। कृष्णा बेउरा की आवाज़ में है यह गीत। चौंक गये न यह देख कर कि आइटम गीत में गायक का क्या काम? जी हाँ, फ़िल्म में एक मर्द औरत का भेस धारण कर इस गीत में नृत्य प्रस्तुत करता है। इससे पहले कृष्णा नें राहत फ़तेह अली ख़ान के साथ 'नमस्ते लंदन' में "मैं जहाँ रहूँ" गीत में क्या ख़ूब गायन प्रस्तुत किया था। लेकिन यह गीत न तो 'नमस्ते लंदन' के उस गीत के करीब है, और ना ही "मुन्नी" या "शीला" के साथ कोई टक्कर है। फ़िल्मांकन पर पूरी तरह से निभर करेगा इस गीत की कामयाबी। सिर्फ़ सुन कर तो न कान पर कोई असर हुआ, ना ही दिल पर।

पाँचवें नंबर पर है "फ़न फ़ना"। इन दिनों युवाओं की पसंदीदा गायकों में हैं अली ज़फ़र, जिन्होंने इस गीत को गाया है। इस टीनेजर गीत को सुन कर ज़रा सी निराशा हुई क्योंकि अली के पहले गीतों के मुक़ाबले यह गीत ज़रा कम कम ही लगा। वैसे इस हिंग्लिश गीत को अली नें अपनी तरफ़ से अच्छा-ख़ासा निभाया है, लेकिन अब जैसे इस ऐल्बम में एकरसता आने लगी है। विविधता की कमी महसूस होने लगी है। यह भी एक ज़िप्पी-पेप्पी नंबर है, रॉक शैली में निबद्ध।

और 'लव का दि एण्ड' का दि एण्ड हो रहा है "हैप्पी बड्डे बेबी" से। इसे गीत कम और हिजराओं द्वारा लड़की को दी जा रही बधाई ज़्यादा लग रही है। राम सम्पत को यह सूझा कि स्टैण्ड-अप कॉमेडियन जिमी मोसेस से इस "गीत" को गवाया जाये। यह हमारी ख़ुशक़िस्मती है कि इस "गीत" की अवधि ४५ सेकण्ड्स की ही है।

दोस्तों, जिस उम्मीद से इस ऐल्बम की तरफ़ मेरी निगाह गई थी, जिस बैनर के साथ इस फ़िल्म का संबंध है, मुझे तो भई निराशा ही हाथ लगी। ठीक है, माना कि यंग फ़िल्म है, लेकिन हर बार यंग फ़िल्म कहकर उसके संगीत के साथ अन्याय होता हुआ भी तो नहीं देखा जाता। क्या ख़राबी है अगर एक गीत "दिल पे नहीं कोई ज़ोर, तेरी ओर तेरी ओर" जैसा भी कम्पोज़ किया जाये तो? ख़ैर, पसंद अपनी अपनी, ख़याल अपना अपना। मेरी तरफ़ से इस ऐल्बम को ४ की रेटिंग्, और इस ऐल्बम से मेरा पिक है सुमन श्रीधर का गाया "टूनाइट"।

आज के लिये बस इतना ही। अगले हफ़्ते फिर किसी फ़िल्म के संगीत की समीक्षा के साथ उपस्थित होंगे, तब तक के लिये 'ताज़ा सुर ताल' केर मंच से इजाज़त दीजिये, नमस्कार!

इसी के साथ 'ताज़ा सुर ताल' के इस अंक को समाप्त करने की हमें इजाज़त दीजिये, नमस्कार!

ताज़ा सुर ताल के वाहक बनिये

अगर आप में नये फ़िल्म संगीत के प्रति लगाव है और आपको लगता है कि आप हर सप्ताह एक नई फ़िल्म के संगीत की समीक्षा लिख सकते हैं, तो हम से सम्पर्क कीजिए oig@hindyugm.com के पते पर। हमें तलाश है एक ऐसे वाहक की जो 'ताज़ा सुर ताल' को अपनी शैली में नियमीत रूप से प्रस्तुत करे, और नये फ़िल्म संगीत के प्रति लोगों की दिलचस्पी बढ़ाये!




अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं। "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है। आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रूरत है उन्हें ज़रा खंगालने की। हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं।

Friday, April 29, 2011

बेहद प्रयोगधर्मी है शोर इन द सिटी का संगीत

Taaza Sur Taal (TST) - 10/2011 - Shor In The City

'ताज़ा सुर ताल' के सभी पाठकों को सुजॉय चटर्जी का नमस्कार! पिछले कई हफ़्तों से 'टी.एस.टी' में हम ऐसी फ़िल्मों की संगीत समीक्षा प्रस्तुत कर रहे हैं जो लीक से हटके हैं। आज भी एक ऐसी ही फ़िल्म को लेकर हाज़िर हुए हैं, जो २०१० में पुसान अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव और दुबई अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव के लिए मनोनीत हुई थी। इस फ़िल्म के लिये निर्देशक राज निदिमोरु और कृष्णा डी.के को सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार भी मिला न्यु यॉर्क के MIAAC में। वैसे भारत के सिनेमाघरों में यह फ़िल्म २८ अप्रैल को प्रदर्शित हो रही है। शोभा कपूर व एकता कपूर निर्मित इस फ़िल्म का शीर्षक है 'शोर इन द सिटी'।

'शोर इन द सिटी' तुषार कपूर, सेन्धिल रामामूर्ती, निखिल द्विवेदी, पितोबश त्रिपाठी, संदीप किशन, गिरिजा ओक, प्रीति देसाई, राधिका आप्टे और अमित मिस्त्री के अभिनय से सजी है। फ़िल्म का पार्श्वसंगीत तैयार किया है रोशन मचाडो नें। फ़िल्म के गीतों का संगीत सचिन-जिगर और हरप्रीत नें तैयार किया हैं। हरप्रीत के दो गीत उनकी सूफ़ी संकलन 'तेरी जुस्तजू' से लिया गया है। गीतकार के रूप में समीर और प्रिया पांचाल नें काम किया है। आइए अब इस ऐल्बम के गीतों की एक एक कर समीक्षा की जाये!

पहला गीत है श्रेया घोषाल और तोची रैना की आवाज़ों में "साइबो"। गीत के बोल हैं "धीरे धीरे, नैनों को धीरे धीरे, जिया को धीरे धीरे, अपना सा लागे है साइबो"। सचिन-जिगर नें अपने पारी की अच्छी शुरुआत की है। भले ही फ़िल्म का नाम है 'शोर इन द सिटी', लेकिन यह गीत शोर-गुल से कोसों दूर है। श्रेया अपनी नर्म मीठी आवाज़ में गीत शुरु करती है, जिसमें पंजाबी अंदाज़ भी है। उसके बाद तोची उसमें अपना रंग भरते हैं। इस गीत की ख़ास बात है इसमें प्रयोग हुए विभिन्न साज़ों का संगम। भारतीय और पाश्चात्य साज़ों का कैसा ख़ूबसूरत मेल है इस गीत में, इसे सुन कर ही इसका आनंद लिया जा सकता है। इस सुंदर कर्णप्रिय गीत के रीमिक्स संस्करण की क्या आवश्यक्ता पड़ गयी थी, कभी मौका मिले तो संगीतकार व फ़िल्म के निर्माता से ज़रूर पूछूंगा। फ़िल्म के प्रोमोशन में इसी गीत का इस्तमाल हो रहा है।

'शोर इन द सिटी' का दूसरा गीत है फ़िल्म के शीर्षक को सार्थक करता है। जी हाँ, शोर शराबे से भरपूर सूरज जगन, प्रिया पांचाल (जो इस गीत की गीतकार भी हैं) और स्वाति मुकुंद की आवाज़ों में "साले कर्मा इस अ बिच" गीत को सेन्सर बोर्ड कैसे पास करती है, यह भी सोचने वाली बात है। गीत के बीच बीच में रोबोट शैली की आवाज़ों का प्रयोग है। हो सकता है कुछ नौजवानों को गीत पसंद आये, लेकिन मुझे तो केवल शोर ही सुनाई दिया इस गीत में। गीत में रॉक शैली, दमदार गायकी और सख़्त शब्दों का प्रयोग है जो इस गीत को एक "शहरी" रूप प्रदान करती है।

पिछले हफ़्ते 'मेमोरीज़ इन मार्च' में मोहन की आवाज़ में "पोस्ट बॉक्स" गीत की चर्चा आपको याद होगी। 'शोर इन द सिटी' में भी 'अग्नि' के मोहन कन्नन की आवाज़ में एक गीत है "शोर"। गीत भारतीय शास्त्रीय संगीत के साथ शुरु होती है तो लगता है कि यह कर्णप्रियता बनी रहेगी, लेकिन तुरंत पाश्चात्य साज़ों की भीड़ उमड पड़ती है और गीत एक रॉक रूप ले लेता है। इंटरल्युड्स में फिर से शास्त्रीय संगीत और आलाप का फ़्युज़न है। इस तरह का संगीत पाक़िस्तानी बैण्ड्स की खासियत मानी जाती है। गीत की अपनी पहचान है, लेकिन ऐसी भी कोई ख़ास बात नहीं जो भीड़ मे अलग सुनाई दे। गीत को थोड़ा और कर्णप्रिय ट्रीटमेण्ट दिया जा सकता था।

अतिथि संगीतकार हरप्रीत सिंह की धुन पर श्रीराम अय्यर की आवाज़ में "दीम दीम ताना" को सुनकर भी एक बैण्ड गीत की ही याद आती है। काफ़ी तेज़ रफ़्तार वाला गीत है ठीक एक शहर की ज़िंदगी की तरह। ये सब गानें फ़िल्म संगीत की प्रचलित फ़ॉरमैट से अलग तो लगते हैं, लेकिन यह प्रयोग, यह एक्स्पेरीमेण्ट कितना सफल होगा, यह तो वक़्त ही बताएगा। वैसे कुछ साल पहले तक भी ज़माना ऐसा हुआ करता था कि कम से कम कुछ गीत हमारी ज़ुबान पर ज़रूर चढ़ते थे, जिन्हें हम जाने अंजाने गुनगुनाया करते थे। लेकिन आजकल कोई ऐसा गीत सुनाई नहीं देता जो हमारी होठों की शान बन सके। आज मेरे होठों पर जो सब से नया गीत सजता है, वह है 'सिंह इज़ किंग' का "तेरी ओर"। पता नहीं क्यों, इस गीत के बाद कोई ऐसा गीत मुझे भाया ही नहीं जिसे गुनगुनाने को जी चाहे। ख़ैर, मुद्दे पर वापस आते हैं, "दीम दीम ताना" भी एक "अलग" गीत है जिसमें हिंदी रैप का भी प्रयोग हुआ है और अरेंजमेण्ट भी अच्छा है, लेकिन सबकुछ होते हुए भी दिल को छू पाने में असमर्थ है। माफ़ी चाहता हूँ।

ये तो थे इस फ़िल्म के ऑरिजिनल गानों की समीक्षा। इस ऐल्बम में तीन बोनस ट्रैक्स भी है। रूप कुमार राठौड़ का "तेरी जुस्तजू", अग्नि का "उजाले बाज़" और कैलासा का "बबम बम बबम"। दोस्तों, एक पंक्ति में अगर 'शोर इन द सिटी' के साउण्डट्रैक के बारे में बताया जाये तो यही कह सकते हैं कि इस फ़िल्म का संगीत पूर्णत: प्रयोगधर्मी है, जिसमें से ग़ैरफ़िल्मी ऐल्बम के गीतों की महक आतीhttp://www.blogger.com/img/blank.gif है। गानें हो सकता है कि बहुत ख़ास न हो, लेकिन 'ताज़ा सुर ताल' में इसकी समीक्षा प्रस्तुत करने का हमारा उद्येश्य यही है कि हम नये संगीत में हो रहे प्रयोगों की तरफ़ अपना और आपका ध्यान आकृष्ट कर सकते हैं। और हमें पूरा पूरा हक़ भी है कि अगर संगीत कर्णप्रिय नहीं है, अगर उसमें केवल अनर्थक साज़ों का महाकुम्भ है, तो हम उसे नकार दे, उसे अस्वीकार कर दें। इस ऐल्बम को हम दे रहे हैं ७.५ की रेटिंग् और इस ऐल्बम से हमारा पिक है, निस्संदेह, "साइबो"।

फिल्म के गाने आप यहाँ सुन सकते हैं

इसी के साथ 'ताज़ा सुर ताल' के इस अंक को समाप्त करने की हमें इजाज़त दीजिये, नमस्कार!

ताज़ा सुर ताल के वाहक बनिये

अगर आप में नये फ़िल्म संगीत के प्रति लगाव है और आपको लगता है कि आप हर सप्ताह एक नई फ़िल्म के संगीत की समीक्षा लिख सकते हैं, तो हम से सम्पर्क कीजिए oig@hindyugm.com के पते पर। हमें तलाश है एक ऐसे वाहक की जो 'ताज़ा सुर ताल' को अपनी शैली में नियमीत रूप से प्रस्तुत करे, और नये फ़िल्म संगीत के प्रति लोगों की दिलचस्पी बढ़ाये!




अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं। "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है। आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रूरत है उन्हें ज़रा खंगालने की। हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं।

Tuesday, March 22, 2011

संगीत समीक्षा - सतरंगी पैराशूट - बच्चों की इस फिल्म के संगीत के लिए एकजुट हुए चार दौर के फनकार, देने एक सुरीला सरप्रायिस

Taaza Sur Taal (TST) - 06/2011 - SATRANGEE PARACHUTE

'आवाज़' के दोस्तों नमस्कार! मैं, सुजॊय चटर्जी, साप्ताहिक स्तंभ 'ताज़ा सुर ताल' के साथ हाज़िर हूँ। साल २०११ के फ़िल्मों की अगर हम बात करें तो 'ताज़ा सुर ताल' में इस साल हमनें जिन फ़िल्मों की चर्चा की है, वो हैं 'नो वन किल्ड जेसिका', 'यमला पगला दीवाना', 'धोबी घाट', 'दिल तो बच्चा है जी', 'ये साली ज़िंदगी', 'सात ख़ून माफ़' और 'तनु वेड्स मनु'। एक और महत्वपूर्ण फ़िल्म प्रदर्शित हुई थी वर्ल्ड कप क्रिकेट शुरु होने से ठीक पहले, पटियाला हाउस, जिसका केन्द्रबिंदु भी क्रिकेट ही था। अक्षय कुमार, ऋषी कपूर, डिम्पल कपाडिया अभिनीत यह फ़िल्म अच्छी बनी, लेकिन इसके संगीत नें कोई छाप नहीं छोड़ी। और २०११ की अब तक की कुछ और प्रदर्शित फ़िल्में जो कब आईं और कब गईं पता भी नहीं चला, और न ही पता चला उनके संगीत का, ऐसी फ़िल्मों में कुछ नाम हैं - 'विकल्प', 'मुंबई मस्त कलंदर', 'होस्टल', 'यूनाइटेड सिक्स', 'ऐंजेल', 'तुम ही तो हो' वगेरह। क्रिकेट विश्वकप भी एक वजह है कि इन दिनों बड़े बैनर की फ़िल्में प्रदर्शित नहीं हो रही हैं। २०११ के कलेण्डर में अगर नज़र डालें तो मार्च के महीने के लिए केवल दो फ़िल्मों के रिलीज़ डेट्स दिये गये हैं - ४ मार्च को 'ये फ़ासले' और २५ मार्च को 'हैप्पी हस्बैण्ड्स'।

आज 'ताज़ा सुर ताल' में हम जिस फ़िल्म की चर्चा करने जा रहे हैं वह एक बच्चों की फ़िल्म है। एक ज़माना था जब बच्चों के लिए फ़िल्में बनती थीं जिनका बच्चे और बड़े, सभी आनंद लिया करते थे और वो फ़िल्में सफल भी होती थीं। लेकिन आज बच्चों के लिए फ़िल्मों का निर्माण लगभग बंद हो चुका है। और जो गिनी-चुनी फ़िल्में बनती हैं, उनका न तो कोई प्रचार होता है, और न ही किसी का इनकी तरफ़ ध्यान जाता है। आप ही बताइए 'सतरंगी पैराशूट' नाम से जो फ़िल्म आई है, इसके बारे में आप में से कितनों को पता है? फ़िल्म के शीर्षक से भी ज़्यादा कुछ अनुमान लगाना मुश्किल है और फ़िल्म में नये संगीतकार कौशिक दत्ता और गीतकार राजीव बरनवाल के होने से इस ऐल्बम से किस तरह की उम्मीद की जाये, ये भी विचारणीय है। इसलिए हमनें सोचा कि क्यों न हम ही इसके गीतों को सुन कर आपको इसकी समीक्षा दें! 'सतरंगी पैराशूट' विनीत खेत्रपाल निर्मित व निर्देशित फ़िल्म है, जिसमें मुख्य किरदारों में तो कुछ दिलचस्प बच्चे ही हैं, और साथ में हैं जैकी श्रॊफ़, के. के. मेनन, संजय मिश्रा और ज़ाकिर हुसैन। पप्पु की भूमिका में जिस बच्चे ने अभिनय किया है, उनका नाम है सिद्धार्थ संघानी। कहानी कुछ इस तरह की है कि पप्पु अपने अंधी दोस्त कुहू के लिए एक पैराशूट ढूंढने निकल पड़ता है। वो अपने दोस्तों के साथ इस तलाश में निकल पड़ता है और नैनिताल से पहुँच जाता है मायानगरी मुंबई। लेकिन उन्हें क्या पता मुंबई के असली रूप का! पप्पु और उसके दोस्त उग्रपंथियों के साथ जाने अंजाने में भिड़ जाता है, जो मुंबई में आतंक फैलाने के लिए पैराशूटों का इस्तेमाल करने वाले हैं।

'सतरंगी पैराशूट' ऐल्बम का पहला ट्रैक है "ज़िंदगी की राह में मुस्कुराता चल", जिसे कैलाश खेर नें गाया है। कैलाश खेर वैसे भी दार्शनिक गीत गाने के लिए जाने जाते हैं, और यह गीत भी उसी जौनर का है। गीत के शब्दों में कोई नई बात तो नहीं, लेकिन गीत का रिदम हमें गीत में बनाये रखता है, और सुनने में अच्छा लगता है। ऒर्केस्ट्रेशन भी "सुरीला" है और इस गीत को सुनते हुए दिल में एक चाह सी जगती है ऐल्बम के दूसरे गीत को सुनने की। ये सोचकर कि जिस तरह से इस गीत का संगीत कुछ अलग सा सुनाई दे रहा है, क्या दूसरे गीत में भी कोई ख़ास बात होगी?

ऐल्बम का दूसरा गीत है एक लोरी। दोस्तों, एक समय था जब किसी फ़िल्म के अलग अलग गीत अलग अलग सिचुएशन्स पर हुआ करते थे, और लोरी, भजन, क़व्वाली, देश भक्ति गीत, ग़ज़ल, तथा हर तरह के गीत बारी बारी से फ़िल्मों में आते रहते थे। लेकिन पिछले कुछ सालों से तो फ़िल्मों में बस तीन ही तरह के गीत रह गये हैं - हप्पी सॊंग्, सैड सॊंग् और डान्स नंबर्स। ऐसे में 'सतरंगी पैरशूट' में श्रेया घोषाल की गाई लोरी की सराहना करनी ही पड़ेगी। "मेरे बच्चे तेरी माँ ये रोज़ कहानी सुनाये, चंदा मामा परियों वाली चैन से तू सो जाये, सपनें में फिर आये वह गिलहरी, बगिया में जो है कूदती रहती, तुम उसके पीछे भागते रहते, और मैं तुमको बस देखती रहती"। राजीव बरनवाल द्वारे बुनें इन प्यारे प्यारे बोलों पर श्रेया की सुरीली आवाज़ और नर्म अंदाज़ नें लोरी के मूड को बरक़रार रखा है, और लोरी जौनर के गीतों में बहुत दिनों के बाद एक इजाफ़ा हो गया है। कौशिक दत्ता नें इस गीत के ऒर्केस्ट्रेशन के साथ भी पूरा पूरा न्याय किया है। हमारी तरफ़ से तो इस गीत को भी "थम्प्स-अप"!!!

'सतरंगी पैराशूट' ऐल्बम का तीसरा गीत है शान की आवाज़ में। इस यात्रा-गीत के बोल हैं "चल पड़े हम क्या ठिकाना सोचा नहीं, मंज़िल पता है रस्ता कहाँ पता नहीं, बस चल दिये..."। जी हाँ, मुझे भी इस गीत को सुनते हुए शान का ही गाया प्रसिद्ध ग़ैर फ़िल्मी गीत "आँखों में सपने लिये घर से हम चल तो दिये" की याद आ गई थी। श्रेया की गाई लोरी की ही तरह इस गीत में भी गीतकार नें जो कहना चाहा है, संगीतकार नें धुन और ऒर्केस्ट्रेशन से उनका पूरा पूरा साथ निभाया है, जिस वजह से ऐल्बम में दिलचस्पी बनी रहती है, ठीक वैसे ही जैसे कि इस गीत में ज़िंदगी में बने रहने की सबक दी गई है।

और अब एक महत्वपूर्ण गीत। महत्वपूर्ण इसलिए कि इसे गाया है लता मंगेशकर नें। यह चमत्कार ही है कि ८३ वर्षीय लता जी नें २४ वर्षीय फ़िल्मकार की इस फ़िल्म के इस गीत में एक ८ वर्षीय बच्चे का पार्श्वगायन किया है। "तेरे हँसने से मुझको आती है हँसी, तेरी सारी बातें चुपचाप मैं सुनती" में लता जी की गायन के साथ साथ उनकी वह ख़ास हँसी भी सुनने को मिलती है जो हँसी उनके गाये बहुत से गीतों में हमनें समय समय पर सुना है। कुछ की याद दिलायें? 'प्रेम रोग' में "भँवरे ने खिलाया है फूल", 'सन्यासी' में "सुन बाल ब्रह्मचारी मैं हूँ कन्याकुमारी", 'एक दूजे के लिए' में "हम बने तुम बने", 'सितारा' में "थोड़ी सी ज़मीन थोड़ा आसमान" वगेरह। आपको बता दूँ कि 'सतरंगी पैराशूट' के इस गीत को स्वरबद्ध कौशिक दत्ता ने नहीं बल्कि शमीर टंडन नें किया है। वही शमीर टंडन जिन्होंने लता जी को 'पेज-३' और 'जेल' में गवाया है। शमीर आज के दौर के उन गिनेचुने संगीतकारों में से हैं जिनके साथ लता जी काम करती हैं। हमनें शमीर जी से सम्पर्क किया कि लता जी के साथ उनके ऐसोसिएशन के बारे में हमें कुछ विस्तार से बतायें, तो शमीर जी नें हमसे वादा किया है कि जल्द ही हमें इंटरव्यु देंगे, लेकिन व्यस्तता की वजह से यह संभव नहीं हो सका है। हमारी कोशिशें जारी हैं कि जल्द से जल्द हम उनसे बातचीत कर आप तक पहँचायें। ख़ैर, "तेरे हँसने से" गीत इस ऐल्बम रूपी अंगूठी का नगीना है, और यही सिर्फ़ काफ़ी है कि इसे लता जी नें गाया है। १९४२ में उन्होंने अपना पहला गीत रेकॊर्ड किया था और यह है साल २०११, यानी कि इस गीत के साथ लता जी के करीयर के ७० साल पूरे हो रहे हैं। आश्चर्य, आश्चर्य, आश्चर्य!!!

साधारणत: लोरियों पर माँ दादी नानी का एकतरफ़ा हक़ रहा है और फ़िल्मों की कहानियों में भी लोरी गीत इन्हीं किरदारों पर फ़िल्माये जाते रहे हैं। लेकिन कभी कभार गायकों नें भी लोरियाँ गाये हैं, जैसे कि सहगल साहब नें फ़िल्म 'ज़िंदगी' में "सो जा राजकुमारी सो जा", 'प्रेसिडेण्ट' फ़िल्म में "एक राज्य का बेटा लेकर उड़ने वाला घोड़ा", चितलकर नें 'आज़ाद' में "धीरे से आजा री अखियन में निंदिया", मुकेश नें फ़िल्म 'मिलन' में "राम करे ऐसा हो जाये", रफ़ी साहब नें 'ब्रह्मचारी' में "मैं गाऊँ तुम सो जाओ", और किशोर कुमार नें महमूद की फ़िल्म 'कुंवारा बाप' में "आ री आजा निंदिया तू ले चल कहीं" जैसी लोरियाँ न केवल गाये बल्कि ये लोरियाँ बहुत बहुत मशहूर भी हुईं। लेकिन उस गीत को आप क्या नाम देंगे जो वैसे तो लोरी नहीं है, पर बच्चा बड़ा होनें के बाद अपने बचपन में अपनी माँ से सुनी हुई लोरी को याद करते हुए गाता है? 'सतरंगी पैराशूट' में भी इसी तरह का एक गीत है राहत फ़तेह अली ख़ान का गाया हुआ। "तेरी लोरी याद है आती, तेरे बिना मैं सो न पाऊँ, कैसा है न जाने अंधेरा, देखो मैं डर डर जाऊँ"। मेरे ख़याल से यही गीत इस ऐल्बम का अब तक का सब से अच्छा गीत है, जो दिल को छू जाता है। राहत साहब की आवाज़ वह माध्यम है जो शब्दों को दिल की गहराइयों तक पहुँचाने का काम करती है। जैसा कि हमनें कहा लोरी को याद करते हुए गाया जा रहा है यह गीत, लेकिन इसकी शक्ल भी लोरी जैसी ही है। एक और 'थम्प्स-अप'!

जिस तरह से शमीर टंडन इस फ़िल्म एक अतिथि संगीतकार है वैसे ही पिंकी पूनावाला अतिथि गीतकार के रूप में इस फ़िल्म का एक गीत लिखा है - "कभी लगी हाथों को छू कर ख़ुशी उड गई, कभी लगी कभी न आयेगी हाथ ये मनचली, कभी छू लूँ कभी पा लूँ, कभी आँखें मूंद कोई सपना देख लूँ, कभी चलूँ कभी दौड़ूँ, कभी उड़ने की ख़्वाहिशें दिल में रख लूँ, उड़ जा उड़ जा ऊँचे आसमाँ को छू जा, जी जा जी जा अपने सपनों को जी जा"। और इसे आवाज़ें दी हैं 'ज़ी सा रे गा मा' प्रतियोगिता के प्रतिभागी अभिलाषा, अली शेर और ख़ुर्रम नें। गायकी अच्छी है इन सब की, और इन नई आवाज़ों में इस गीत का भाव भी सटीक बैठता है कि अपनें सपनों को जी जा, ऊँचे आसमाँ पे उड़ जा। एक और आशावादी गीत!
एक और सरप्राइज़ 'सतरंगी पैराशूट' ऐल्बम में आप पा सकते हैं उषा उथुप की आवाज़ में एक गीत, बल्कि एक रीमिक्स गीत। 'मिस्टर नटवरलाल' फ़िल्म का वह मशहूर गीत "मेरे पास आओ मेरे दोस्तों एक क़िस्सा सुनो" अमिताभ बच्चन का गाया हुआ, उसे उषा जी नें अपनी ख़ास शैली में गाया है। इन दोनों की हम तुलना नहीं करना चाहेंगे। उसमें बिग-बी का स्टाइल था, इसमें उषा उथुप की ख़ास अंदाज़-ए-बयाँ है जिसके लिए वो जानी जाती हैं। हम तो बस विनीत खेत्रपाल जी का शुक्रिया ही अदा करेंगे जिन्होंने चार अलग अलग दौर के गायकों को एक साथ इस फ़िल्म में लेकर आये हैं, यानी कि पहले दौर से लता मंगेशकर, उसके बाद उषा उथुप, आज की दौर से श्रेया, शान, राहत, और आनेवाले कल से अभिलाषा, अली शेर और ख़ुर्रम को। 'सतरंगी पैराशूट' ऐल्बम का समापन 'सतरंगी थीम' से होता है जो एक कर्णप्रिय पीस है, जिसका बेस पाश्चात्य है और एक अंतर्राष्ट्रीय अपील है।

हमारी तरफ़ से 'सतरंगी पैराशूट' ऐल्बम को १० में ७.५ की रेटिंग् दी जाती है। और आपके लिए यही सुझाव है कि इस फ़िल्म का संगीत अच्छा है, लेकिन कामयाब होगा कि नहीं यह फ़िल्म पर निर्भर करती है। अगर सही तरीक़े से प्रोमोट किया जाये तो यह संगीत भी कमाल कर सकता है। इस ऐल्बम से हमारा पिक है राहत फ़तेह अली ख़ान क गाया "तेरी लोरी याद है आती"। अब 'ताज़ा सुर ताल' स्तंभ से मुझे इजाज़त दीजिये, शाम को 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर दुबारा मुलाक़ात होगी, नमस्कार!



अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं। "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है। आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रूरत है उन्हें ज़रा खंगालने की। हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं।

Tuesday, January 25, 2011

संगीत समीक्षा - ये साली जिंदगी : मशहूर सितार वादक निशात खान साहब के सुरों से मिली स्वानंद की दार्शनिकता तो उठे कई सवाल जिंदगी के नाम

Taaza Sur Taal (TST) - 03/2011 - YE SAALI ZINDAGI

जिंदगी को कभी किसी ने नाम दिया पहेली का तो कभी इसे एक खूबसूरत सपना कहा गया. समय बदला और नयी सदी के सामने जब जिंदगी के पेचो-ख़म खुले तो इस पीढ़ी ने जिंदगी को ही कठघरे में खड़ा कर दिया और सवाल किया “तुझसे करूँ वफ़ा या खुद से करूँ....”. मगर शायद चुप ही रही होगी ये "साली" जिंदगी या फिर संभव है कि नयी सदी की जिंदगी भी अब तेवर बदल नए जवाब ढूंढ चुकी हो...पर ये तो तय है कि इस नए संबोधन से जिंदगी कुछ सकपका तो जरूर गयी होगी....बहरहाल हम बात कर रहे हैं निशात खान और स्वानंद किरकिरे के संगम से बने नए अल्बम “ये साली जिंदगी” के बारे में. अल्बम का ये पहला गीत सुनिधि और कुणाल की युगल आवाजों में है. ये फ़िल्मी गीत कम और एक सोफ्ट रौक् नंबर ज्यादा लगता है जहाँ गायकों ने फ़िल्मी परिधियों से हटकर खुल कर अपनी आवाजों का इस्तेमाल किया है. सुनिधि की एकल आवाज़ में भी है एक संस्करण जो अधिक सशक्त है. स्वानंद के बोंल शानदार हैं.

“सारा रारा...” सुनने में एक मस्ती भरा गीत लगता है, पर इसमें भी वही सब है -जिंदगी से शिकवे गिले और कुछ छेड छाड भी, स्वानंद के शब्दों से गीत में जान है, “तू कोई हूर तो नहीं थोड़ी नरमी तो ला...”. निशात खान साहब एक जाने माने सितार वादक है, और बॉलीवुड में ये उनकी पहली कोशिश है. गीत के दो संस्करण है, एक जावेद अली की आवाज़ में तो एक है सुखविंदर की आवाज़ में. जहाँ तक सुखविंदर का सवाल है ये उनका कम्फर्ट ज़ोन है, पर अब जब भी वो इस तरह का कोई गीत गाते हैं, नयेपन की कमी साफ़ झलकती है.

जावेद अली और शिल्प राव की आवाजों में तीसरा गीत “दिल दर बदर” एक एक्सपेरिमेंटल गीत है सूफी रौक् अंदाज़ का. पहले फिल्म का नाम भी यही था – दिल दर ब दर. मुझे व्यक्तिगत रूप से ये गीत पसंद आया खास कर जावेद जब ‘दर ब दर..” कहता है....एक बार फिर गाने का थीम है जिंदगी....वही सवालों में डूबे जवाब, और जवाबों से फिसले कुछ नए सवाल.

चौथा गीत है “इश्क तेरे जलवे” जो कि मेरी नज़र में अल्बम का सबसे बढ़िया गीत है. निशात साहब ने हार्ड रोक अंदाज़ जबरदस्त है, कुछ कुछ प्रीतम के “भीगी भीगी (गैंगस्टर)” से मिलता जुलता सा है, पर फिर भी स्वानंद के शब्द और शिल्पा राव की आवाज़ इस गीत को एक नया मुकाम दे देते है. शिल्पा जिस तेज़ी से कमियाबी की सीढियां चढ़ रहीं हैं, यक़ीनन कबीले तारीफ़ है. निशात साहब ने इस गीत में संगीत संयोजन भी जबरदस्त किया है.

पांचवा और अंतिम ऑरिजिनल गीत "कैसे कहें अलविदा" एक खूबसूरत ग़ज़ल नुमा गीत जिसे गाया है अभिषेक राय ने...उन्दा गायिकी, अच्छे शब्द और सुन्दर सजींदगी की बदौलत ये गीत मन को मोह जाता है. हाँ पर दर्द उतनी शिद्दत से उभर नहीं पाता कभी, पर फिर भी निशात साहब का असली फन इसी गीत में जम कर उभर पाया है.

कुल मिलाकर इस अल्बम की सबसे अच्छी बात ये है कि इसमें रोमांटिक गीतों की अधिकता से बचा गया है और कुछ सोच समझ वाली आधुनिक दार्शनिकता को तरजीह दी गयी है, जहाँ जिंदगी खुद प्रमुख किरदार के रूप में मौजूद है जिसके आस पास गीतों को बुना गया है. कह सकते हैं कि निशात खान और स्वानंद की इस नयी टीम ने अच्छी कोशिश जरूर की है पर दुभाग्य ये है कि यहाँ कोई भी गीत “बावरा मन” जैसी संवेदना वाला नहीं बन पाया है जो लंबे समय तक श्रोताओं के दिलों में बसा रह सके.

आवाज़ रेटिंग - 5/10

सुनने लायक गीत - इश्क तेरे जलवे, कैसे कहें अलविदा, ये साली जिंदगी (सुनिधि सोलो)




अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं। "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है। आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रूरत है उन्हें ज़रा खंगालने की। हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं।

Tuesday, January 4, 2011

दिल तो बच्चा है जी.....मधुर भण्डारकर की रोमांटिक कोमेडी में प्रीतम ने भरे चाहत के रंग

Taaza Sur Taal 01/2011 - Dil Toh Bachha Hai ji

'दिल तो बच्चा है जी'...जी हाँ साल २०१० के इस सुपर हिट गीत की पहली पंक्ति है मधुर भंडारकर की नयी फिल्म का शीर्षक भी. मधुर हार्ड कोर संजीदा और वास्तविक विषयों के सशक्त चित्रिकरण के लिए जाने जाते हैं. चांदनी बार, पेज ३, ट्राफिक सिग्नल, फैशन, कोपरेट, और जेल जैसी फ़िल्में बनाने के बाद पहली बार उन्होंने कुछ हल्की फुल्की रोमांटिक कोमेडी पर काम किया है, चूँकि इस फिल्म में संगीत की गुंजाईश उनकी अब तक की फिल्मों से अधिक थी तो उन्होंने संगीतकार चुना प्रीतम को. आईये सुनें कि कैसा है उनके और प्रीतम के मेल से बने इस अल्बम का ज़ायका.

नीलेश मिश्रा के लिखे पहले गीत “अभी कुछ दिनों से” में आपको प्रीतम का चिर परिचित अंदाज़ सुनाई देगा. मोहित चौहान की आवाज़ में ये गीत कुछ नया तो नहीं देता पर अपनी मधुरता और अच्छे शब्दों के चलते आपको पसंद न आये इसके भी आसार कम है. “है दिल पे शक मेरा...” और प्रॉब्लम के लिए “प्रोब” शब्द का प्रयोग ध्यान आकर्षित करता है. दरअसल ये एक सामान्य सी सिचुएशन है हमारी फिल्मों की जहाँ नायक अपने पहली बार प्यार में पड़ने की अनुभूति व्यक्त करता है. संगीत संयोजन काफी अच्छा है और कोरस का सुन्दर इस्तेमाल पंचम के यादगार "प्यार हमें किस मोड पे ले आया" की याद दिला जाता है.

abhi kuch dinon se (dil toh bachha hai ji)



सोनू निगम की आवाज़ में “तेरे बिन” एक और मधुर रोमांटिक गीत है, जो यक़ीनन आपको सोनू के शुरआती दौर में ले जायेगा. कुमार के हैं शब्द जो काफी रोमांटिक है. अगला गीत “ये दिल है नखरे वाला” वाकई एक चौंकाने वाला गीत है. अल्बम के अब तक के फ्लेवर से एकदम अलग ये गीत गुदगुदा जाता है, जैज अंदाज़ का ये गीत है जिसमें कुछ रेट्रो भी है. निलेश ने बहुत ही बढ़िया लिखा है इसे. शेफाली अल्वरिस की आवाज़ जैसे एकदम सटीक बैठती है इस गीत में. ये गीत ‘पिक ऑफ द अल्बम’ है.

tere bin (dil toh bachha hai ji)



ye dil hai nakhre waala (dil toh bachha hai ji)



कुणाल गांजावाला की आवाज़ में अगले २ गीत हैं. “जादूगरी” में उनकी सोलो आवाज़ है तो “बेशुबा” में उनके साथ है अंतरा मित्रा. जहाँ पहला गीत साधारण ही है, दूसरे गीत में जो कि अल्बम का एकलौता युगल गीत है, प्रीतम अपने बहतरीन फॉर्म में है. सईद कादरी से आप उम्मीद रख ही सकते हैं, और वाकई उनके शब्द गीत की जान हैं.

jaadugari (dil toh bachha hai ji)



beshubah (dil toh bachha hai ji)



हमारी राय – साल की शुरूआत के लिए ये नर्मो नाज़ुक रोमांटिक एल्बम एक बढ़िया पिक है. लगभग सभी गीत प्यार मोहब्बत में डूबे हुए हैं. प्रीतम कुछ बहुत नया न देकर भी अपने चिर परिचित अंदाज़ के गीतों से लुभाने में सफल रहे हैं.



अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं। "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है। आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रूरत है उन्हें ज़रा खंगालने की। हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं।

Tuesday, December 21, 2010

वार्षिक समीक्षा....हमें इंतज़ार है आपकी राय का

ताज़ा सुर ताल - वार्षिक समीक्षा

सजीव - नये संगीत के चाहनेवालों का 'ताज़ा सुर ताल' के इस ख़ास अंक में बहुत बहुत स्वागत है, और सुजॊय तथा विश्व दीपक, आप दोनों का भी मैं स्वागत करता हूँ।

सुजॊय - नमस्कार आप दोनों को। कितनी जल्दी समय बीत जाता है, मुझे ऐसा लग रहा है जैसे अभी हाल ही में २०१० की वार्षिक समीक्षा की थी, और देखिए देखते ही देखते एक साल गुज़र गया।

विश्व दीपक - मेरी तरफ़ से भी आप दोनों को और सभी पाठकों को नमस्कार। आज बहुत ही अच्छा लग रहा है क्योंकि यह शायद पहला मौका है कि जब हम तीनों एक साथ किसी स्तंभ को प्रस्तुत कर रहे हैं। तो सजीव जी, आप ही बताइए कि हम तीनों मिलकर किस तरह से इस ख़ास अंक को आगे बढ़ाएँ।

सजीव - ऐसा करते हैं कि कुछ विभाग या कैटेगरीज़ बना लेते हैं ठीक उस तरह से जिस तरह से वार्षिक पुरस्कार दिए जाते हैं, जैसे कि सर्वश्रेष्ठ गीत, सर्वश्रेष्ठ संगीतकार वगैरह। हम तीनों हर विभाग के लिए दो दो गीत सुझाते हैं। इस तरह से हर विभाग के लिए ६ गीत चुन लिए जाएँगे। फिर हम अपने पाठकों पर छोड़ेंगे कि वो हर विभाग के लिए इन ६ गीतों में कौन सा गीत चुनते हैं। कहिए क्या ख़याल है?



सुजॊय - बहुत बढ़िया! तो चलिए शुरु करते हैं पहले कैटगरी से जो है 'सर्वश्रेष्ठ गीत'। इस साल बने इतने सारे गीतों में से किन दो गीतों को चुना जाये, यह एक बड़ी समस्या थी। आख़िर में मैंने सोचा कि दो ऐसे गीतों को चुनूँ जो थोड़े से ऒफ़बीट फ़िल्मों से हों। ये फ़िल्में भले ही ऒफ़बीट या कम चलने वाले रहे हों, लेकिन ये दो गीत उत्कृष्टता में दूसरे गीतों से कम नहीं हैं। पहला गीत है 'माधोलाल कीप वाकिंग' फ़िल्म का - "नैना लागे तोसे", जिसके तीन तीन वर्ज़न थे। मैंने भूपेन्द्र के गाये वर्ज़न को चुना है। और दूसरा गीत है आमिर ख़ान की ऒस्कर में जाने वाली फ़िल्म 'पीपलि लाइव' से रघुवीर यादव और साथियों का गाया "महंगाई डायन खाये जात है"।

विश्व दीपक - वाह! मैंने साल के सर्वश्रेष्ठ गीत के लिए जिन दो गीतों को निर्धारित किया है, उनमें से एक है फ़िल्म 'रावण' से "रांझा रांझा" तथा दूसरा गीत है "सजदा" 'माइ नेम इज़ ख़ान' फ़िल्म का। "रांझा रांझा" गीत के बारे में 'टी.एस.टी' में चर्चा करते वक़्त हमने इस बात का ज़िक्र भी किया था कि यह गीत वार्षिक टॊप-१० में शामिल होगा, और देखिए साल के अंत होने पर इस गीत ने हमारी बात का पूरा पूरा सम्मान किया है। और जहाँ तक "सजदा" की बात है, इसे भी तीन गायकों ने गाया है और यह गीत भी सूफ़ियाना अंदाज़ का है। इस तरह से मेरे चुने हुए दोनों सर्वश्रेष्ठ गीतों में कुछ समानता ज़रूर है। और सजीव जी, अब आप बताइए कि आप ने किन दो गीतों को चुना है।

सजीव - वर्ष २०१० के दो सर्वश्रेष्ठ गीतों के लिए मेरा नामांकन ये है- १. बस इतनी सी तुमसे गुज़ारिश है. २. तेरे मस्त मस्त दो नैन....गुज़ारिश के शीर्षक गीत मुझे क्यों इस हद तक पसंद है इस पर मै अपनी राय अपनी समीक्षा में कर चुका हूँ. इससे पहले भी फ़िल्मी गीतों में गायक/गायिका ने अपने लिए मौत मांगी है पर ये अंदाज़ एकदम अनूठा है और उस पर के के की गहराईयों में डूबी आवाज़ और संजय भंसाली का संगीत जहाँ ओपेरा स्टाइल में कुछ संवाद भी है, इस गीत को एक अलग ही मुकाम दे देते हैं. "तेरे मस्त मस्त दो नैन" सुनते सुनते कब मन में समां गया मै खुद नहीं जानता. वैसे इसके फिल्मांकन का भी इसमें हाथ है. फिल्म देखने से पहले मैंने बस एक दो बार ये गीत सुना था पर फिल्म के बाद इसे लगातार सुनता रहा, राहत साहब ने बहुत कशिश के साथ निभाया है इसे और संगीत संयोजन भी कमाल का है. एक और बात है कि ये गीत हर किसी को पसंद आता है, चाहे वो पुराने संगीत के शौकीन हो या आज के दौर के युवा हों। चलिए अब दूसरे कैटगरी पर आ जाते हैं, यह है 'सर्वश्रेष्ठ ऐल्बम' का। सर्वश्रेष्ठ अल्बम के लिए मैं नामांकित कर रहा हूँ - 'गुज़ारिश' और 'दबंग' को. 'गुज़ारिश' तो एक ऐसी अल्बम है जिसे मैं आज से ५ साल बाद भी इसी उत्साह से सुन पाऊंगा. 'दबंग' के गीतों का खालिस देसीपन मुझे बहुत भाया है. दो मशहूर गीतों के अलावा "चोरी किया", "हमका पीनी है" और शीर्षक गीत भी मुझे बेहद प्रभावी लगे. फिल्म की आपार सफलता में इसके संगीत का योगदान भी कम नहीं है।

सुजॊय - सजीव जी, जहाँ तक 'दबंग' की बात है, सल्लु मियाँ के फ़िल्मों के गानें हमेशा ही सुपर-डुपर हिट होते रहे हैं, और 'गुज़ारिश' में संजय लीला भंसाली ने भी अनोखा संगीत दिया है। आपके चुने इन दोनों फ़िल्मों को पूरा पूरा सम्मान देते हुए मैंने जिन दो फ़िल्मों को चुना है, वो हैं 'माइ नेम इस ख़ान' और 'मिस्टर सिंह ऐण्ड मिसिस मेहता'। 'माइ नेम इज़ ख़ान' की तो ख़ूब चर्चा हुई है, लेकिन दूसरे फ़िल्म के गानें लोगों तक पहुँच ही नहीं पाये जो कि बेहद अफ़सोस की बात है। सजीव और विश्व दीपक जी, आपको याद होगा कि इस फ़िल्म के निर्देशक ने हमें बधाई और धन्यवाद दिया था जब हमने इस फ़िल्म के गीतों का पॊज़िटिव रिव्यू 'टी.एस.टी.’ में पोस्ट किया था।

विश्व दीपक - बिल्कुल याद है और वाक़ई यह अफ़सोस की ही बात है कि इतना अच्छा संगीत अनसुना सा रह गया। और मुझे पूरा यकीन है कि प्रचलित व्यावसायिक पुरस्कारों में इसका कहीं नामोनिशान तक नहीं मिलेगा। इस मामले में 'आवाज़' का यह मंच बिल्कुल अलग है। हम जानते हैं अच्छे संगीत को किस तरह से सराहा जाता है। अच्छा, अब मैं उन दो फ़िल्मों के नाम बता दूँ जिन्हें मैंने चुने हैं। एक तो है 'पीपलि लाइव' और दूसरी फ़िल्म है 'स्ट्राइकर'। क्यों चौंक गये ना आप दोनों?

सजीव - 'पीपलि लाइव' तो ठीक है, लेकिन 'स्ट्राइकर' का नाम सुन कर थोड़ा चौंक ज़रूर गया था, लेकिन झट से यह अहसास भी हो गया और याद भी आ गया कि 'स्ट्राइकर' का संगीत बहुत अच्छा था। मुझे याद है कि इस फ़िल्म में ६ गीतकार और ६ संगीतकारों ने काम किया है और फ़िल्म के सभी गानें अच्छे बने हैं भले ही फ़िल्म ज्यादा ना चली हो। वैसे इस फिल्म की खासियत यह है कि यह हिन्दुस्तान की पहली फिल्म है, जिसे थियेटर में रीलिज के दिन हीं यूट्युब पर रीलिज किया गया था और यूट्युब पर इसे रिकार्ड हिट्स भी हासिल हुए थे। इस मामले में फिल्म को सफल कहा जा सकता है। 'माधोलाल कीप वाकिंग' और 'मिस्टर सिंह ऐण्ड मिसिस मेहता' की तरह इस कमचर्चित फ़िल्म के अच्छे संगीत को भी हम सलाम करते हैं। चलिए आगे बढ़ते हैं और ज़िक्र करते हैं 'सर्वश्रेष्ठ गायक' की। सुजॊय, तुम पहले बताओ कि कौन से गायकों को तुमने चुना है इस विभाग के लिए।

सुजॊय - पता नहीं क्या बात है उनकी आवाज़ में, लेकिन हर साल मुझे के.के की आवाज़ ही सर्वश्रेष्ठ आवाज़ लगती है, और देखिए इस साल के लिए भी एक नाम मैंने के.के का चुना है। युं तो कई फ़िल्मों में इन्होंने इस साल गाने गाये हैं, लेकिन जिस फ़िल्म में उनके गाये गीत सब से ज़्यादा मकबूल हुए वह फ़िल्म है 'काइट्स'। इस फ़िल्म में उन्ही के गाये दो गीत "ज़िंदगी दो पल की" और "दिल क्यों ये मेरा शोर करे" कामयाबी की बुलंदी तक पहँचे, और मेरी तरफ़ से भी के.के का नामंकन इन दो गीतों के लिए आ रहा है। दूसरा नामांकन है रघुवीर यादव का जिन्होंने 'पीपलि लाइव' में "महंगाई डायन" गाया है। एक और नामांकन देना चाहूँगा, वह है मोहित चौहान के नाम का, जिन्होंने 'वन्स अपोन ए टाइम' में "पी लूँ" गाया था। वैसे इस गीत में कार्तिक का गाया "आइ ऐम इन लव" भी मुझे बहुत पसंद है।

विश्व दीपक - 'सर्वश्रेष्ट गायक' के लिए मैंने दो ऐसे गायकों को चुना है जो सूफ़ी शैली में गायन के लिए जाने जाते हैं। इनमें से एक हैं कैलाश खेर और दूसरे हैं राहत फ़तेह अली ख़ान। कैलाश तो आजकल फ़िल्मी गीतों में थोड़े कम कम ही सुनाई दे रहे हैं, लेकिन राहत साहब के गाये गीत तो लगभग हर फ़िल्म में आ रहे हैं। तो कैलाश खेर का गाया जो गीत मैंने चुना है, वह है 'लव सेक्स और धोखा' फ़िल्म का "तू गंदी लगती है" तथा राहत साहब का गाया "दिल तो बच्चा है जी" फ़िल्म 'इश्क़िया' से। "दिल तो बच्चा है जी" क्यों चुना.. मुझे नहीं लगता कि इसकी वज़ह बताने की जरूरत भी पड़ेगी। हाँ, आप दोनों और सभी श्रोतागण (पाठकगण) "एल एस डी" के गाने के लिए कैलाश खेर का नाम देखकर हैरत में जरूर पड़ गए होंगे। दर-असल इस चुनाव का एक और एकमात्र कारण है "कैलाश खेर" की अनकन्वेशनल गायकी। इस गाने या फिर "एल एस डी" के टाईटल ट्रेक को सुनने के पहले किसी ने यह नहीं सोचा होगा कि कैलाश खेर ऐसा भी गाना गा सकते हैं.. ये गाने उनके अंदाज के थे हीं नहीं। फिर भी इन गानों को जिस तरह से "कैलाश खेर" ने गाया और गायकी की वज़ह से गाना जितना मक़बूल हुआ, उसमें कैलाश के महत्व को थोड़ा भी कम करना मुमकिन नहीं। मैं यहाँ पर "दिबाकर बनर्जी" को भी बधाई देना चाहूँगा, न सिर्फ़ वे ढर्रे से हटकर फिल्म बनाने में कामयाब हुए, बल्कि लीक से हटकर संगीत तैयार करवाने (संगीतकार: स्नेहा खनवल्कर) और बोल लिखने में भी सफल हुए। इस फिल्म ने यह भी साबित किया कि सेक्स शब्द से जुड़ी हर चीज निचले स्तर की नहीं होती.. खैर आगे बढते हैं!!!

सजीव - सुजॊय, तुम्हे यह जानकर अच्छा लगेगा कि सर्वश्रेठ गायक के रूप में एक बार फिर के.के हैं मेरे पसंदीदा 'गुज़ारिश' के शीर्षक गीत के लिए। के.के जो भी गाते हैं दिल से गाते हैं और यहाँ भी उनका वही जलवा बरकरार है। सोनू के क्या कहने, "स्ट्राईकर" का गीत इस वर्ष के सबसे मधुरतम मगर मुश्किल गीतों में से एक है और इसे इतना खास बनाने में सोनू की भूमिका सबसे अधिक है। यह गीत है "चम चम"। चलिए, अब बारी है 'सर्वश्रेष्ठ गायिका' की। सुनिधि चौहान ने जिस ऊर्जा के साथ "उडी" गाया है 'गुज़ारिश' में, वो लाजवाब है। सुनिधि को अधिकतर आईटम नंबर दिए जाते हैं. पर जब भी उन्हें मौका मिलता है वो दूसरे जेनर में भी कमाल कर जाती हैं. रेखा भारद्वाज ने "ससुराल गेंदाफूल" के बाद जैसे एक के बाद एक हिट गीतों की लड़ी लगा दी है. पर विशाल के लिए गाये 'इश्किया' के दो गीत बेमिसाल हैं. "बड़ी धीरे जली" की धुन और संगीत संयोजन पंचम की याद दिलाता है और रेखा ने जिस सहजता ने इस भावपूर्ण गीत को अंजाम दिया है, इसके लिए मेरा नामांकन उन्हें ही जाता है।

सुजॊय - के.के को मैंने 'काइट्स' के लिए चुना और आपने 'गुज़ारिश' के लिए। दोनों में जो बात कॊमन है, वह है हृतिक रोशन। जहाँ तक गायिका का सवाल है, मैंने जिन दो गायिकाओं को चुना है, वो हैं कविता सेठ, जिन्होंने फ़िल्म 'राजनीति' में आदेश श्रीवास्तव के संगीत में शास्त्रीय रचना "मोरा पिया मोसे बोलत नाही" गाया है। समीर ने इस गीत को लिखा है। और दूसरी गायिका हैं नगीन तनवीर, जिन्होंने 'पीपलि लाइव' में "चोला माटी के राम" गाया था। इस गीत को सुनते हुए एक अलग ही अनुभूति होती है। एक अनोखी आवाज़, सब से अलग सब से जुदा। काश उन्हें इस साल का सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायिका का पुरस्कार दिया जाए!

विश्व दीपक - 'वीर' के लिए सजीव जी ने तो रेखा भारद्वाज का नाम मनोनीत कर ही दिया है, मैं भी करने वाला था। चलिए दो और नाम सुझाता हूँ। एक हैं श्रेया घोषाल, जिन्होंने 'ऐक्शन रीप्ले' में "ओ बेख़बर" गाया है। और दूसरा नाम है शिल्पा राव, जिन्होंने 'लफ़ंगे परिंदे' में "नैन परिंदे" गाया है।

सजीव - वाह! बहुत ही सुरीला पसंद है वी.डी भाई, निस्संदेह ये दोनों गीत इस साल के दो बेहतरीन गीतों में से हैं। अब अगले कैटगरी की बारी। 'सर्वश्रेष्ठ युगल गीत' की बात करें तो 'झूठा ही सही' का जावेद और श्रेया का गाया "क्राई क्राई" मुझे बहुत भाया। गाने का थीम अलग है और एक्सप्रेशंस दोनों के कमाल के हैं। 'खेलें हम जी जान से' में "सपने सलोने" अख्तर साहब ने लिखा है और सोहेल सेन और पामेला जैन ने प्यार और कर्तव्य के द्वंद्व को बहुत खूबी से उभारा है।

सुजॊय - युगल गीतों में पहला गीत मैं चुनूँगा फ़िल्म 'वीर' का, "सलाम आया"। इस साल के शुरु शुरु में यह फ़िल्म आयी थी, फ़िल्म तो नहीं चली लेकिन इस गीत ने काफ़ी लोकप्रियता हासिल कर ली थी। रूप कुमार राठोड़ और श्रेया घोषाल ने इस गीत को गाया है। वैसे सुज़ेन डी'मेलो ने भी अपनी आवाज़ दी है, इस तरह से यह युगल गीत तो नहीं है, लेकिन फिर भी मैंने इसे चुन लिया। साजिद वाजिद ने गुलज़ार के बोलों को बहुत ही मीठे धुनों में पिरोया, और साबित किया कि अच्छे बोल मिले तो संगीतकार अच्छा काम कर ही निकलता है। और दूसरा गाना है फ़िल्म 'खट्टा मीठा' का, "सजदे किए हैं लाखों", के.के और सुनिधि चौहान की आवाज़ों में। लोक शैली (बंगाल की लोकधुनों पर आधारित) में प्रीतम ने इस गीत को स्वरबद्ध किया है जो मुझे पसंद है। विश्व दीपक जी, आपने किन दो युगल गीतों को चुना है?

विश्व दीपक - एक तो है फ़िल्म 'लम्हा' का "मदनो", जिसे क्षितिज तारे और चिनमयी ने गाया है, तथा दूसरा गीत है फ़िल्म 'दबंग' का "चोरी किया रे जिया" जो सोनू निगम और श्रेया घोषाल की आवाज़ों में है। रोमांटिक डुएट्स में साजिद वाजिद हमेशा ही अच्छा काम दिखाते आये हैं, जैसे कि 'मुझसे शादी करोगी' के तमाम गीत और जैसा कि ऊपर आप ने 'वीर' का "सलाम आया" चुना है। 'लम्हा' में संगीत था मिथुन का और इस गीत को भी अच्छा रेस्पॊन्स मिला था, भले ही फ़िल्म बॊक्स ऒफ़िस पर असफल रही हो। चलिए अब आगे बढ़ते हैं अगले कैटगरी की ओर, और यह कैटगरी वह कैटगरी है जिसके बग़ैर शायद आज फ़िल्में बनती ही नहीं है। जी हाँ, आइटम नंबर। 'सर्वश्रेष्ठ आइटम सॊंग' के लिए जो दो गीत मैं सुझा रहा हूँ, उनमें एक है फ़िल्म 'वन्स अपोन ए टाइम' का "परदा"। यह दर-असल एक रीमिक्स नंबर है। ७० के दशक के दो जबरदस्त राहुल देब बर्मन हिट्स "दुनिया में लोगों को" और "मोनिका ओ माइ डारलिंग" को मिलाकर इस गीत का आधार तय्यार किया गया है और उसमें नए बोल डाले गए हैं "परदा परदा अपनों से कैसा परदा"। एक तरह से ट्रिब्यूट सॊंग माना जा सकता है उस पूरे दशक के नाम। सुनिधि चौहान इस तरह के गीतों को तो ख़ूब अंजाम देती है ही है, लेकिन आर. डी. बर्मन जैसी आवाज़ निकालने वाले गायक राना मजुमदार को भी दाद देनी ही पड़ेगी। और दूसरा आइटम सॊंग है फ़िल्म 'राजनीति' का "इश्क़ बरसे"। प्रणब बिस्वास, हंसिका अय्यर और स्वानंद किरकिरे की आवाज़ों में यह गीत एक मस्ती भरा गीत है। 'लागा चुनरी में दाग' फ़िल्म के "हम तो ऐसे हैं भ‍इया" की थोड़ी बहुत याद आ ही जाती है इस गीत को सुनते हुए। स्वानंद किरकिरे क्रमश: एक ऐसे गीतकार की हैसियत रखने लगे हैं जिनकी लेखन शैली में एक मौलिकता नज़र आती है। भीड़ से अलग सुनाई देते हैं उनके लिखे हुए गीत। और भीड़ से अलग है शांतनु का संगीत भी।

सुजॊय - आइटम सॊंग्स में मैं सब से पहले नाम लूँगा मुन्नी का, यानी "मुन्नी बदनाम हुई", फ़िल्म 'दबंग' से। यह गीत जितनी वितर्कित रही, उतनी ही लोकप्रिय भी साबित हुई। और दूसरा गीत है फ़िल्म 'आक्रोश' का "तेरे इसक से मीठा कुछ भी नहीं"। "बीड़ी" जलै ले" जैसी बात तो इन दोनों में ही नहीं आ पायी, लेकिन इस साल के आइटम गीतों की लिस्ट को देखते हुए मुझे ये गीत ही ठीक लगे। सजीव, आपका क्या कहना है?

सजीव - "मुन्नी" को सुजॉय नामांकित कर चुके हैं, तो मैं 'शीला' को चुन लेता हूँ। "शीला, शीला की जवानी", फ़िल्म 'तीस मार खान' का। वैसे गाना एवरेज ही है पर बीट्स और अंतरों में कव्वाली के पुट से गाने में जान आती है। 'हाउसफ़ुल' के "धन्नो" में पुराने अमिताभ के हिट गीत का तडका काफी जमता है. वाकई इसे सुनकर थिरकने का मन होता है। 'सर्वश्रेष्ठ भावप्रधान गीत' की बात करें तो "मिस्टर सिंह और मिसेस मेहता" में दिल्ली की कुड़ी रिचा शर्मा की सशक्त अभिव्यक्ति वाला गीत "फ़रियाद है" और शंकर महादेवन का ऊंची पट्टी पर गाया शुद्ध कवितामय गीत "धुंधली धुंधली शाम हुई" मेरी नज़र में सर्वश्रेष्ठ हैं।

विश्व दीपक - ईमोशनल कैटगरी के लिए पहला गीत मेरी पसंद का होगा फ़िल्म 'झूठा ही सही' का "दो निशानियाँ"। एक और सुंदर कम्पोज़िशन, और सोनू निगम और रहमान का वही पुराना "दिल से" वाला अंदाज़ वापस आ गया है। एक धीमी लय वाला, कोमल और सोलफ़ुल गीत। पियानो की लगातार बजने वाली ध्वनियाँ गीत के ऒरकेस्ट्रेशन का मुख्य आकर्षण है। थोड़ा सा ग़मगीन अंदाज़ का गाना है लेकिन सोनू ने जिस पैशन के साथ इसे निभाया है, यह इस ऐल्बम का एक महत्वपूर्ण ट्रैक बन गया है यकीनन। दूसरा भावप्रधान गीत जो मैं चुन रहा हूँ, वह है फ़िल्म 'अंजाना अंजानी' का "तुझे भुला दिया ओ"। इस गीत की ख़ासियत है कि इसे दो गीतकारों ने लिखा है। विशाल दादलानी ने भी लिखा है, और क़व्वाली वाला हिस्सा लिखा है गीतकार कुमार ने।

सुजॊय - मैं इस कैटगरी के लिए दो भक्तिमूलक गीत चुन रहा हूँ। इस साल यह देखा गया है कि कई फ़िल्मों में सूफ़ी गीतों के अलावा भी भक्ति रस के गीत आये हैं। मेरी नज़र में जो दो श्रेष्ठ रचनाएँ हैं, वो हैं जगजीत सिंह की आवाज़ में "फूल खिला दे शाखों पर", फ़िल्म 'लाइफ़ एक्सप्रेस' का यह गीत, तथा 'माइ नेम इज़ ख़ान' का "अल्लाह ही रहम" जिसे राशिद खान ने गाया है। इन दोनों गीतों के बारे में ज़्यादा कुछ नहीं कहना चाहिए, बल्कि सिर्फ़ सुन कर महसूस करना चाहिए। चलिए बढ़ते हैं आगे और चुनते हैं 'सर्वश्रेष्ठ गीतकार' के लिए दो दावेदार। मैं इस साल दो वरिष्ठ गीतकारों को ही चुन रहा हूँ, जिनके बारे में अलग से कुछ कहने की कोई ज़रूरत ही नहीं है। बस गानें बता रहा हूँ, गुलज़ार ("दिल तो बच्चा है जी" - 'इश्क़िया') तथा जावेद अख़्तर ("ये देस है मेरा" - 'खेलें हम जी जान से')।

सजीव - गीतकारों में गुज़ारिश के दो नवोदित गीतकारों ने मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया है. इस फिल्म से पहले मैंने इनके नाम भी नहीं सुने थे पर "सौ ग्राम जिंदगी" लिख कर विभु पुरी और "जाने किसके ख्वाब" जैसे गीत लिख कर ए एम् तुराज़ ने इंडस्ट्री में नए और काबिल गीतकारों की सूची में अपना नाम दर्ज करा लिया है।

विश्व दीपक - मैं तीन नाम चुन रहा हूँ - गुलज़ार ("तुमसे क्या कहना है" - दस तोला, "कान्हा" - वीर), अमिताभ भट्टाचार्य ("आज़ादियाँ" - उड़ान, "तरक़ीबें" - बैण्ड बाजा बारात) एवं इरशाद कामिल ("सौदेबाज़ी", "इसक से मीठा" - आक्रोश, "पी लूँ" - वन्स अपोन ए टाइम इन मुंबई)। तीन इसलिए क्योंकि सुजॉय जी गुलज़ार साहब को पहले हीं चुन चुके हैं। इरशाद कामिल ऐसे गीतकार हैं जो सीधे-सादे शब्दों से सौदेबाजी करके सीधे दिल की नसों को पकड़ लेते है। एक हीं गीतकार ऐसा है, जिसने पिछले साल प्यार में डूबे पंछियों को "तेरा होने लगा हूँ" जैसा एंथम दिया था.. और इस बार "पी लूँ" या फिर "भींगी-सी भागी-सी" जैसे नशीले तोहफ़े दिए। मैं इरशाद साहब की लेखनी का कायल हूँ, इसलिए जब गुलज़ार साहब और जावेद साहब का नामांकन हो चुका था, तो मुझे सीधे इनकी याद हुई। जहाँ इरशाद साहब नर्मोनाजुक शब्दों से गीतों का जाल बुनते हैं, वहीं एक गीतकार ऐसा है, जो आज की पीढी को ध्यान में रखकर शब्दों का तानाबाना गढता है। मैंने जब "बैंड बाजा बारात" और "नो वन किल्ड जेसिका" की समीक्षाएँ लिखी थीं, तो इन महानुभाव, जिनका नाम अमिताभ है, का ज़िक्र विशेष तौर पर किया था।

सुजॊय - गीतकार के बाद अब 'सर्वश्रेष्ठ संगीतकार' की बारी। मैं अपने वोट 'मिस्टर सिंह ऐण्ड मिसेस मेहता' तथा 'रावण' को दे रहा हूँ। वैसे तो और भी बहुत से फ़िल्मों में कामयाब गीत आये हैं, लेकिन अगर पूरे ऐल्बम की बात करें तो मुझे ये दो ऐल्बम ठीक लगे, वैसे 'पीपलि लाइव' और 'माइ नेम इज़ ख़ान' भी इसके हक़दार हैं। लेकिन क्योंकि मुझे दो ही नाम चुनने हैं, इसलिए उस्ताद शुजात हुसैन ख़ान और ए. आर. रहमान को ही मैं अपना वोट दे रहा हूँ। विश्वदीपक जी, आपने किन दो संगीतकारों को चुना है?

विश्व दीपक - मैं दो ऐसे संगीतकारों को चुन रहा हूँ जिन्होंने जितनी भी फ़िल्मों में संगीत दिया इस वर्ष, कामयाब दिया। ये हैं अमित त्रिवेदी ('उड़ान', 'आयशा') तथा विशाल-शेखर ('आइ हेट लव स्टोरीज़', 'अंजाना अंजानी', 'ब्रेक के बाद')। सजीव जी, अब आपकी बारी, आपकी राय में कौन हैं सर्वश्रेष्ठ संगीतकार २०१० के?

सजीव - 'गुज़ारिश' के ही "तेरा ज़िक्र" गीत के लिए और "खेले हम जी जान से" के शीर्षक गीत के लिए मेरा नामांकन संजय लीला भंसाली और सोहैल सेन को जाता है संगीतकार श्रेणी में। संजय ने सीमित साजों का इस्तेमाल कर जहाँ संगीत को माधुर्य और शब्द गरिमा दी है वहीं सोहैल ने किशोर लड़कों के लिए बने गीत में परफेक्ट टोन और ओर्केस्टएशन देकर उसे एक यादगार गीत बना दिया है। और अब आख़िरी कैटगरी की बारी, और यह है 'सर्वश्रेष्ठ फ़िल्मांकन'। यानी बेस्ट कोरीओग्राफ़्ड सॊंग। फिल्मांकन की बात करें तो 'गुज़ारिश' के "उडी" का कोई जवाब नहीं। एश्वर्या की सुंदरता और उनका नृत्य दोनों ही किसी जादू से कम नहीं है इस गीत में। "तेरे मस्त मस्त दो नैन" का फिल्मांकन शानदार है। सामान्य सड़क पर चलते हुए, रोज़मर्रा के चेहरों की भीड़ में कैसे कोई व्यक्ति सपनों में पहुँच जाता है जहाँ वही आस पास की दुनिया, वही लोग उसके साथ होते है उसकी खुशी में, बेहद दिलचस्प है सब पर्दे पर देखना।

सुजॊय - पता नहीं इस विभाग में मैं न्याय कर पाऊँगा कि नहीं क्योंकि मैंने इस साल पर्दे पर ज़्यादा फ़िल्में देखी नहीं है, हाँ कुछ गानें टीवी पर ज़रूर देखे हैं। उन्हीं में से मैं दो गीत सुझाता हूँ। एक तो है 'कार्तिक कॊलिंग कार्तिक' का "उफ़ तेरी अदा" और दूसरा है 'हाउसफ़ुल' फ़िल्म का "वाल्युम कम कर पप्पा जग जाएगा"। और विश्व दीपक जी, आप भी बताइए कि आपके हिसाब से कौन से गानों की शानदार फ़िल्मांकन हुआ है।

विश्व दीपक - पहला गीत है "छान के मोहल्ला", फ़िल्म 'ऐक्शन रीप्ले' का, और दूसरा है 'रोबोट' फ़िल्म का "नैना मिले"। "छान के मोहल्ला" एक पारंपरिक होली गीत की तरह पिक्चराईज़ न होकर अलग हीं रंग और ढंग से फिल्मांकित हुआ लगता है। इस गाने में कई सारे डांसरों का इस्तेमाल किया गया है, जो पूरी तरह "सिंक" में हैं। इसलिए मुझे यह गीत बहुत पसंद है। जहाँ तक "रोबोट" की बात है तो इस फिल्म और इस फिल्म से जुड़े हर दृश्य की बात हीं निराली है। बस "नैना मिले हीं क्यों", इस फिल्म में ऐसा कौन-सा गाना है जो किसी खास अंदाज में न फिल्माया गया हो। रजनीकांत और ऐश्वर्या की जोड़ी हर गाने में कमाल की नज़र आई है, लेकिन इस गाने में ऐश्वर्या ने तो "डांस" के अपने पुराने रिकार्ड्स पीछे छोड़ दिए हैं। इसलिए सारे गानों में से मैंने इसे प्राथमिकता दी है। आप दोनों ने शायद यब बात गौर की होगी कि जिन छ: गानों को हमने नामांकित किया है, उनमें से तीन में ऐश्वर्या है। फिर न जाने क्यों लोग ऐश्वर्या की काबिलियत पर ऊंगली उठाते हैं!! चलिए आगे बढते हैं।

सजीव - तो हमें मिल गये हैं इन सभी श्रेणियों के लिए ६ ६ नामांकन, अब हम ज़िम्मा अपने श्रोताओं व पाठकों पर ही छोड़ते हैं कि हर श्रेणी में अपना वोट किसे दें। आपको ऊपर दिए हुए पूल बॉक्स में जाकर अपना मत देना है.

सुजॊय - तो इसी के साथ आज का यह चर्चा हम समाप्त कर सकते हैं, लेकिन आज एक ऐसा गीत ज़रूर सुन सकते हैं जिसकी चर्चा उपर नहीं हुई है। बहुत ही स्पेशल है यह गीत इस लिहाज़ से कि इसे लता मंगेशकर ने गाया है, और हाल ही में रिलीज़ हुई 'डोन्नो व्हाई न जाने क्यों' फ़िल्म का यह गीत है। फ़िल्म के ना चलने से इस गीत की तरफ़ बहुत कम लोगों का ही ध्यान गया है। लता जी का नाम आज के दौर के कलाकारों के साथ नामांकित करना हमें शोभा नहीं देता, इसलिए उन्हें हमने इस चर्चा से अलग ही रखा है। लेकिन इस विशेषांक को समाप्त करते हुए उनका गाया यह गीत ज़रूर सुन सकते हैं।

गीत - डोन्नो व्हाई न जाने क्यों


सजीव - चलिए अब सब हम अपने दोस्तों पर छोड़ते हैं, आपके वोटों का नतीजा हम लेकर उपस्थित होंगें ३१ तारीख़ को टी एस टी के विशेष एपिसोड में, आपके पास वोट करने के लिए २९ तारीख़ रात ११.४५ तक का टाइम है. एक बात और हम आपको बता दें कि अगले साल से टी एस टी संवाद रूप में नहीं होगा, इसे मैं या वी डी आपके लिए लेकर आयेगें एकल प्रस्तुति के रूप में. सुजॉय जी अगले वर्ष से हर रविवार लेकर आयेंगें शास्त्रीय संगीत पर आधारित एक नयी शृंखला. आशा है आप इस नयी शृंखला को भी भरपूर स्नेह देंगें.

Tuesday, November 30, 2010

मस्ती, धमाल और धूम धडाके में "शीला की जवानी" का पान....यानी तीस मार खान

टी एस टी यानी ताज़ा सुर ताल में आज हम हाज़िर हैं इस वर्ष की अंतिम बड़ी फिल्म “तीस मार खान” के संगीत का जिक्र लेकर. फराह खान ने नृत्य निर्देशिका के रूप में शुरूआत की थी और निर्देशिका बनने के बाद तो उन्होंने जैसे कमियाबी के झंडे ही गाढ़ दिए. “मैं हूँ न” और “ओम शांति ओम” जैसी सुपर डुपर हिट फिल्म देने वाली ये सुपर कामियाब निर्देशिका अब लेकर आयीं हैं – तीस मार खान. जाहिर है उम्मीदे बढ़ चढ़ कर होंगीं इस फिल्म से भी. पहली दो फिल्मों में शाहरुख खान के साथ काम करने वाली फराह ने इस बार चुना है अक्षय कुमार को और साथ में है कटरीना कैफ. संगीत है विशाल शेखर का और अतिथि संगीतकार की भूमिका में हैं शिरीष कुंदर जो फराह के पतिदेव भी हैं और अक्षय –सलमान को लेकर “जानेमन” जैसी फिल्मों का निर्देशन भी कर चुके हैं.

अल्बम की शुरूआत होती है शिशिर के ही गीत से जो कि फिल्म का शीर्षक गीत भी है. इस गीत में यदि आप लचर शब्दों को छोड़ दें तो तीन ऐसी बातें हैं जो इस गीत को तुरंत ही एक हिट बना सकता है. पहला है सोनू की बहुआयामी आवाज़ का जलवा. पता नहीं कितनी तरह की आवाजों में उन्होनें इस गीत गाया है और क्या जबरदस्त अंजाम दिया है ये आप सुनकर ही समझ पायेंगें. दूसरी खासियत है इसका सिग्नेचर गिटार पीस, एक एकदम ही आपका ध्यान अपनी तरफ़ खींच लेता है और तीसरी प्रमुख बात है गीत का अंतिम हिस्सा जो डांस फ्लोर में आग लगा सकता है. कुल मिलकार ये शीर्षक गीत आपका इस अल्बम और फिल्म के प्रति उत्साह जगाने में सफल हुआ है ऐसा कहा जा सकता है.

तीस मार खान


अब बात आइटम गीत “शीला की जवानी” की करें. एक बार फिर सुनिधि चौहान ने यहाँ बता दिया कि जब बात आइटम गीत की हो तो उनसे बेहतर कोई नहीं. अजीब मगर दिलचस्प बोल है विशाल के और अंतरे में हल्की कव्वाली का पुट शानदार है. बीट्स कदम थिरका ही देते है. कोई कितना भी इसे बेस्वदा कहे पर फराह के नृत्य निर्देशन और कटरीना के जलवों की बदौलत ये गीत “मुन्नी बदनाम” की ही तरह श्रोताओं के दिलों-दिमाग पर अपना जादू करने वाला है ये बात पक्की है.

शीला की जवानी


हम आपको बता दें कि फिल्म में सलमान खान एक गीत में अतिथि भूमिका में दिखेंगें. सलमान इन दिनों इंडस्ट्री में सबसे “हॉट” माने जा रहे हैं ऐसे में उनकी उपस्तिथि अगले गीत “वल्लाह रे वल्लाह” को लोगों की जुबान पर चढा दे तो भला आश्चर्य कैसा. परंपरा अनुसार फराह ने इस फिल्म में भी कव्वाली रखी है, यहाँ बोल अच्छे है अन्विता दत्त गुप्तन के विशाल शेखर ने भी रोशन साहब के पसंदीदा जेनर को पूरी शिद्दत से निभाया है.

वल्लाह रे वल्लाह


अगले दो गीत साधारण ही हैं “बड़े दिल वाला” में सुखविंदर अपने चिर परिचित अंदाज़ में है तो दिलचस्प से बोलों को श्रेया ने भी बहुत खूब निभाया है. “हैप्पी एंडिंग” गीत खास फराह ने रियलिटी शोस में दिए अपने वादों को निभाने के लिए ही बनाया है ऐसा लगता है. इंडियन आइडल से अभिजीत सावंत, प्राजक्ता शुक्रे, और हर्शित सक्सेना ने मिलकर गाया है इस गीत को जो संभवता फिल्म के अंतिम क्रेडिट में दिखाया जायेगा. वैसे पहले ३ गीत काफी हैं इस अल्बम को एक बड़ा हिट बनाने को. त्योहारों, शादियों के इस रंगीन मौसम में सोच विचार को कुछ समय के लिए दरकिनार कर बस कुछ गीत मस्ती से भरे सुनने का मन करे तो “तीस मार खान” को एक मौका देकर देखिएगा.

बड़े दिल वाला


हैप्पी एंडिंग

Tuesday, November 16, 2010

जी जान से खेले सोहेल सेन आशुतोष के लिए इस बार और साथ मिला जावेद साहब की अनुभवी कलम का

ताज़ा सुर ताल 45/2010

सुजॊय - 'ताज़ा सुर ताल' के सभी श्रोताओं व पाठकों को मेरा नमस्कार और सजीव जी, आपको भी।

सजीव - आप सभी को मेरा भी नमस्कार और सुजॊय, तुम्हे भी। आज हम एक पीरियड फ़िल्म के गानें सुनने जा रहे हैं। आशुतोष गोवारिकर एक ऐसे फ़िल्मकार हैं जो पीरियड फ़िल्मों के निर्माण के लिए जाने जाते हैं। 'लगान' और 'जोधा अकबर' इस जौनर में आते हैं। और 'स्वदेस' में उन्होंने बहुत अच्छा संदेश पहुँचाया था इस देश के युवाओं को। और अब वो लेकर आ रहे हैं 'खेलें हम जी जान से'। आज इसी फ़िल्म और इसके गीत संगीत का ज़िक्र।

सुजॊय - मैंने सुना है कि इस फ़िल्म का पार्श्व बंगाल की सरज़मीन है और यह कहानी है आज़ादी के पहले की, आज़ादी के लड़ाई की। 'खेलें हम जी जान से' में मुख्य कलाकार हैं अभिषेक बच्चन, दीपिका पादुकोण, सिकंदर खेर, विशाखा सिंह, सम्राट मुखर्जी, मनिंदर सिंह, फ़ीरोज़ वाहिद ख़ान, श्रेयस पण्डित, अमीन ग़ाज़ी, आदि। जावेद अख़्तर के लिखे गीतों को धुनों में इस बार ए. आर. रहमान ने नहीं, बल्कि सोहैल सेन ने पिरोया है। जी हाँ, वही सोहैल सेन, जिन्होंने आशुतोष की पिछली फ़िल्म 'व्हाट्स योर राशी' में संगीत दिया था।

सजीव - हाँ, और आशुतोष साहब को इस बात के लिए दाद देनी ही पड़ेगी कि 'व्हाट्स योर राशी' के गीतों के ज़्यादा ना चलने के बावजूद सोहैल को इस फ़िल्म में संगीत देने का मौका दिया है। अभी कुछ ही देर में शायद हमें इस बात का अंदाज़ा हो जाएगा कि आशुतोष का यह निर्णय कितना सही था। तो आइए इस फ़िल्म का पहला गीत सुनते हैं सोहैल सेन की ही आवाज़ में।

गीत - ये देस है मेरा


सुजॊय - वाह! आशुतोष ने जैसे 'स्वदेस' के रहमान के "ये जो देस है तेरा" का ही पार्ट-२ बनाया है। लेकिन एक अलग ही अंदाज़ में और गायक - संगीतकार सोहैल सेन ने पूरी पूरी मौलिकता कायम रखा है।

सजीव - सचमुच एक सुरीली शुरुआत इस ऐल्बम की हुई है इस देशभक्ति गीत से। 'स्वदेस' के गीत में था "ये जो देस है तेरा", इसमें है "ये देस है मेरा"। केवल संगीत के लिहाज़ से ही नहीं, एक गायक के रूप में भी सोहैल ने इस गीत को बहुत ही अच्छा निभाया है। वैसे थोड़ा सा रहमान का स्टाइल नज़र आ तो रहा है। हो सकता है कि यह रहमान का नहीं बल्कि आशुतोष का स्टाइल हो, क्या पता! गीत के बोलों की बात की जाए तो जावेद साहब से हम ये तो उम्मीद रख ही सकते हैं। इस गीत के बोल, जैसे कि हमने सुना, हमारे देश के सारे अंधकार दूर करने के करता है, आज़ादी और ख़ुशियों की रोशनी इस देश में वापस आये।

सुजॊय - चलिए इस देशभक्ति के जस्बे को अपने अंदर समाहित कर हम अब बढ़ते हैं ऐल्बम के दूसरे गीत की तरफ़। यह है पामेला जैन और रंजिनी जोसे की युगल आवाज़ों में एक फ़ीमेल डुएट "नैन तेरे झुके झुके क्यों है ये बता, कोई तो है मन में तेरे हमसे सखी ना छुपा"।

गीत - नैन तेरे झुके झुके क्यों है ये बता


सुजॊय - वाह वाह वाह! मुझे इस गीत को सुनते हुए जितनी ख़ुशी हुई, उससे भी अधिक ताज्जुब हुआ यह देख कर कि बंगाल के लोकसंगीत का किस ख़ूबसूरती से इस्तेमाल इस नटखट चंचल गीत में हुआ है! यह धुन बंगाल के बाउल लोक संगीत की धुन है। एक तो संगीत संयोजन का कमाल, और उस धुन पर जावेद साहब ने किस ख़ूबसूरती से अपने शब्दों के मोतियों को पिरोया है! मैं बाक़ी के गीतों को सुने बग़ैर ही कह सकता हूँ कि यह गीत मेरा इस ऐल्बम का सबसे पसंदीदा गीत बना रहेगा।

सजीव - वाक़ई, बहुत दिनों के बाद इस तरह के बंगला के लोकशैली का गीत सुनने को मिला है। बस एक बात जो थोड़ी सी खटकती है, वह यह कि पामिला जैन और रंजिनी की आवाज़ों में ज़्यादा कॊन्ट्रस्ट नहीं है, जिसकी वजह से साफ़ साफ़ पता नहीं चलता कि कौन सी आवाज़ किसकी है, मेरा यह मानना है कि अगर दो आवाज़ें अलग क़िस्म के चुने जाते तो गीत का इम्पैक्ट और भी कई गुणा बढ़ जाता। लेकिन जो भी है, वाक़ई बहुत ही मीठा, सुरीला गीत है।

सुजॊय - इन दो गीतों को सुनने के बाद मेरी तो उम्मीदें बहुत ज़्यादा बढ़ गई हैं इस ऐल्बम से, आइए जल्दी जल्दी तीसरा गाना सुनते हैं, मुझसे तो सब्र नहीं हो रहा।

गीत - खेलें हम जी जान से


सजीव - फ़िल्म का शीर्षक गीत हमने सुना, और अब कि बार एक ऐसा गीत जो फ़िल्म के शीर्षक को सार्थक करे, फ़िल्म की कहानी को सार्थक करे, पूरी जोश के साथ 'सुरेश वाडकर आजीवासन म्युज़िक अकादमी' के बच्चों द्वारा गाये इस समूह गीत में हम 'लगान' के "बार बार हाँ, बोलो यार हाँ" गीत के साथ बहुत कुछ मिलता जुलता अनुभव कर सकते हैं।

सुजॊय - एक अलग तरह का गीत, पहले के दो गीतों से बिल्कुल अलग, कोरस और साज़ों का अच्छा तालमेल। संगीत संयोजन में भी सोहैल ने स्तरीय काम किया है। आइए अब एक नर्मो नाज़ुक रुमानीयत से लवरेज़ युगल गीत सुनते हैं सोहैल सेन और पामिला जैन की आवाज़ों में।

गीत - सपने सलौने


सजीव - इस गीत के अरेंजमेण्ट में भी हम बंगाल के संगीत की झलक पा सकते हैं। गीत के शब्द भी बहुत अच्छे हैं, जिसमें एक प्रेमी कह रहा है कि वो अपने प्यार के सपने और वादे पूरे करेगा लेकिन पहले अपनी देश के प्रति ज़िम्मेदारियों को पूरा करने के बाद ही। और यही बात इस रोमांटिक डुएट की खासियत है।

सुजॊय - मुझे भी यह गीत पसंद आया, लेकिन मास लेवेल पर कितना कामयाब हो पाएगा कह नहीं सकते। ख़ैर, अगले गीत की तरफ़ बढ़ते हैं, अब कि बार "वंदेमातरम"। इसे भी एक ग्रूप ने गाया है, 'सिने सिंगर्स ऐसोसिएशन ग्रूप कोरस'। न जाने क्यों ए. आर. रहमान की थो़ड़ी बहुत छाप नज़र आती है इस गीत में भी।

गीत - वंदेमातरम


सजीव - इस "वंदेमातरम" की खासियत है कि संस्कृत के मूल गीत को हिंदी में अनुवाद कर इसे लिखा व रचा गया है। एक और देशभक्ति गीत इस तरह से फ़िल्म संगीत के ख़ज़ाने को समृद्ध किया। और फ़िल्म के ट्रेलरों में इसी गीत को दिखाया जा रहा है। और ऐसा प्रतीत हो रहा है कि फ़िल्म में इसे पार्श्वसंगीत के तौर पर इस्तेमाल किया जाएगा, जो कहानी या सीन को और भी ज़्यादा असरदार या भावुक बनाएगा।

सुजॊय - इस फ़िल्म में बस इतने ही गानें हैं, बाक़ी कुछ इन्स्ट्रुमेण्टल वर्ज़न हैं इन्हीं गीतों के, जैसे कि Long Live Chittagong, The Teenager's Whistle, Surjya's Sorrow, Vande Mataram, The Escape, तथा Revolutionary Comrades. आइए इनमें से कम से कम एक यहाँ पर सुन लेते है।

धुन - Revolutionary Comrades


सुजॊय - मज़ा आ गया आज सजीव जी। बहुत दिनों के बाद एक अच्छा ऐल्बम सुनने को मिला जिसे सुनकर दिल को बहुत ही सुकून और शांति मिली है। और जैसा कि मैंने पहले कहा था, अब भी मैं अपने उसी बात पर बरकरार रहते हुए यह ऐलान करता हूँ कि "नैन तेरे झुके झुके" ही मेरा फ़ेवरीट नंबर है इस फ़िल्म का। आशुतोष गिवारिकर, सोहैल सेन और जावेद अख़्तर को मेरी तरफ़ से "थम्प्स अप"!!! आपके क्या विचार हैं सजीव जी?

सजीव - देखिये सुजॉय, अक्सर हम कहते हैं कि पुराना संगीत बहुत अच्छा था, बात में सच्चाई भी नज़र आती है क्योंकि आज इतने सालों के बाद भी वो हमें मधुर लगते हैं, जानते हैं वजह क्या है ?....उन गीतों को, गीतकार, संगीतकार, निर्देशक, गायक और जितने भी साजिन्दे उससे जुड़े हुए हैं उन सब का भरपूर स्नेह मिलता था मतलब हर गीत को एक शिशु की तरह संवार कर सबके सामने लाया जाता था. अब मेकिंग में वो प्यार नहीं रहा सब कुछ आनन् फानन में होता है....मगर जब भी कोई काम दिल से होता है वो दिल तक अवश्य पहुँचता है, अभी हाल में गुज़ारिश के गीत भी इसी श्रेणी में आते हैं और अब इस फिल्म के गीतों को देखिये, इन्हें सुनकर पता लगता है कि इन पर कितनी मेहनत की गयी, इन्हें प्यार से संवारा गया है, दिल से संजोया गया है तभी तो देखिये दिल को छू पा रहे हैं, आशुतोष, सोहेल और जावेद भाई को इस शानदार प्रस्तुति के लिए बधाई. मुझे तो सभी गीत बेहद पसंद आये पर शीर्षक गीत बेहद खास लगा उसके कोरस के चलते. इसे सुनकर सचमुच ४० वें दशक की एक युवा टीम सामने साकार हो जाती है.

सुजॊय - और आज की इस प्रस्तुति को समाप्त करने से पहले मैं 'ताज़ा सुर ताल' के अपने दोस्तों को यह बता दूँ कि अगले हफ़्ते से मैं इस स्तंभ का हिस्सा नहीं रहूँगा, कम से कम अगले कुछ हफ़्तों या महीनों के लिए, लेकिन 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर हमारी मुलाक़ात युंही होती रहेगी। 'ताज़ा सुर ताल' के महफ़िल की शमा सजीव और विश्वदीपक युंही जलाते रहेंगे। इसी बात पर अब हमें आज के इस अंक को समाप्त करने की इजाज़त दीजिए, नमस्कार!

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