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Tuesday, June 7, 2011

तारों की नगरी से चंदा ने एक दिन....आज सुर्रैया सुना ही है एक दर्द भरी कहानी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 673/2011/113

'एक था गुल और एक थी बुलबुल' - कहानी भरे गीतों की इस लघु शृंखला की तीसरी कड़ी में आप सभी का हार्दिक स्वागत है। कुंदनलाल सहगल और शांता आप्टे के बाद आज कहानी सुनाने की बारी है सुरैया की। ३० के दशक से एक छलांग मार कर आज हम पहुँच गये हैं ५० के दशक में। साल १९५४ में एक फ़िल्म आयी थी 'वारिस', जिसका "राही मतवाले" गीत आप सब को याद ही होगा। इसी फ़िल्म में सुरैया की एकल आवाज़ में एक गीत है "तारों की नगरी से चंदा ने एक दिन धरती पे आने की ठानी"। कहिये प्लॉट कैसा है कहानी का? उतावले हो रहे होंगे न आप आगे की कहानी जानने के लिये। बस थोड़ा सा इंतज़ार कीजिये, अभी हम आते हैं कहानी पर, लेकिन उससे पहले इस गीत से जुड़ी कुछ बातें कहना चाहेंगे। "राही मतवाले" गीत इतना ज़्यादा लोकप्रिय हुआ था कि इस फ़िल्म के दूसरे गीतों की तरफ़ लोगों का ध्यान ज़रा कम ही गया है। आज का प्रस्तुत गीत तो बहुत लोगों नें सुना भी नहीं होगा। सुरैया पर ही फ़िल्माये गये इस गीत में पर्दे पर उसे और उसके बेटे को दिखाया जाता है। फ़िल्म की कहानी कुछ इस तरह की है कि एक रेल दुर्घटना में सुरैया अपने पति से बिछड़ जाती हैं। उस वक़्त वो गर्भवती थीं। बच्चे के जन्म के बाद वो अपने बच्चे को पालती-पोसती है, और इस तरह से कहानी में एक सिचुएशन रखा जाता है कि वो अपने बच्चे को सुलाने के लिये लोरी गा रही है, जिसके ज़रिये वो अपनी ही दुखभरी दास्तान कहती है।

क़मर जलालाबादी के लिखे इस गीत को चाहे आप लोरी कह लीजिये या कोई कहानी, बेहद ख़ूबसूरत गीत है। सुरैया इस गीत में अपने बच्चे को सुलाने के लिये लोरी गाती है, लेकिन गीत ख़त्म होते होते वह अपनी ही जीवन की दर्दीली कहानी सुना चुकी होती है। मानवीकरण अलंकार का सुंदर प्रयोग हुआ है, अपने पति के लिये "चांद" का इस्तमाल करती हैं। और अनिल बिस्वास नें भी अपने दूसरे सभी गीतों की तरह ही क्या मधुर संगीत दिया है इस गीत में भी। हमें पूरी उम्मीद है कि आप में से जिन श्रोताओं नें इस गीत को पहले नहीं सुना है, उनको आज पहली बार यह गीत सुनकर उतना ही आनंद आयेगा। गीत सुनने से पहले यह रही कहानी इस गीत की।

तारों की नगरी से चंदा ने एक दिन,
धरती पे आने की ठानी,
सुन मेरे मुन्ना कहानी।

चंदा नें पहने शबनम के गहने,
लहरों पे आयी रवानी।
कब से खड़ी थी व्याकुल चकोरी,
नैना बिछाये हुए!
धरती पे उतरा राजा गगन का,
चुपके से किरणों के रथ में।
आये पिया प्यारे, प्यासे के द्वारे,
फिर भी चकोरी ना जाने।
कहती थी दुनिया हो न सकेगा चंदा चकोरी का मेल,
पल भर में देखो रूठेगी निंदिया टूटेगा सपनों का खेल।
इतने में चंदा बढ़ कर यूं बोला,
मैं राजा तू मेरी रानी।
लेकिन ये दुनिया प्रेमी की बैरन हाये लगा दी नज़रिया,
आये थे जैसे वैसे ही एक दिन सजनी से बिछड़े सांवरिया।
अब तक खड़ी है पथ पर चकोरी, लेकर पिया की निशानी,
जब तक न वापस आयेगा चंदा, पूरी न होगी कहानी।




क्या आप जानते हैं...
कि अनिल बिस्वास स्वरबद्ध फ़िल्म 'राही' की मीना कपूर की गायी लोरी "चांद सो गया तारे सो गये" मेघालय राज्य के खासी जनजाती की एक लोकधुन पर आधारित है।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 4/शृंखला 18
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - बेहद आसान.
सवाल १ - किस सरोद वादक ने इस गीत में अपना योगदान दिया है - ३ अंक
सवाल २ - किस राग पर आधारित है ये गीत - २ अंक
सवाल ३ - गीतकार बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
प्रतीक जी बढ़िया खेल रहे हैं, अविनाश जी बीच बीच में चूक जाते हैं. अमित जी हमें थोडा समय दीजिए पिछली पहेली के संशय को दूर करने का

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Saturday, April 16, 2011

ओल्ड इस गोल्ड - शनिवार विशेष - जब गुड्डो दादी नें बताया पंडित बागा राम व पंडित हुस्नलाल के परिवार के साथ उनके पारिवारिक संबंध के बारे में

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों नमस्कार! फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर के गानें रेकॉर्ड/ कैसेट्स/ सीडी'ज़ के ज़रिये अनंतकाल तक सुरक्षित रहेंगे, इसमें कोई शक़ नहीं है, और इसमें भी कोई संदेह नहीं कि सुनहरे दौर के फ़नकार भी अमर रहेंगे। लेकिन जब हम इन अमर फ़नकारों के बारे में आज जानना चाहते हैं तो कुछ किताबों, पत्र-पत्रिकाओं और विविध भारती के संग्रहालय में उपलब्ध कुछ साक्षात्कारों के अलावा कोई और ज़रिया नहीं है। इन कलाकारों के परिवार वालों से भी जानकारी मिल सकती है लेकिन उन तक पहुँचना हमेशा संभव नहीं होता। ऐसे में अगर हमें कोई मिल जाये जिन्होंने उस ज़माने के कलाकार को या उनके परिवार को करीब से देखा है, जाना है, तो उनसे बातचीत करनें में भी एक अलग ही रोमांच हो आता है। यह हमारा सौभाग्य है कि 'हिंद-युग्म आवाज़' परिवार के श्रोता-पाठकों में भी कई मित्र ऐसे हैं जिन्होंने न केवल उस ज़माने से ताल्लुख़ रखते हैं बल्कि स्वर्णिम युग के कुछ कलाकारों के संस्पर्श में भी आने का उन्हें सौभाग्य प्राप्त हुआ है। ऐसी ही एक शख़्स हैं हमारी गुड्डो दादी।

अभी हाल ही में जब मुझे सजीव जी से पता चला कि गुड्डो दादी बहुत साल पहले पंडित हुस्नलाल के घर गई थीं, मुझे रोमांच हो आया, और मैंने दादी से गुज़ारिश की अपनी यादों के उजालों को 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में बिखेरने की। बड़े ही उत्साह के साथ दादी नें न केवल उस अनुभव के बारे में हमें लिख भेजा, बल्कि अमरीका से ख़ुद मुझे टेलीफ़ोन भी किया। ७२ वर्ष की उम्र में भी टेलीफ़ोन पर उनकी आवाज़ में जिस तरह का उत्साह मुझे मेहसूस हुआ, उससे हम नौजवान बहुत कुछ सीख सकते हैं। बहुत साल पहले की बात होने की वजह से दादी को बहुत ज़्यादा तो याद नहीं, लेकिन जितना भी याद है, वो हमारे लिये कुछ कम नहीं है। तो आइए रोशन करते हैं आज की यह महफ़िल गुड्डो दादी की सुनहरी यादों के उजाले से।

सुजॉय - गुड्डो दादी, एक बार फिर स्वागत है आपका 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में। यकीन मानिए, आप जैसी वरिष्ठ मित्रों के संस्पर्श में आकर हमें बहुत अच्छा लगता है, और एक रोमांच भी हो आता है यह जानकर कि आप सहगल साहब, पं. हुस्नलाल-भगतराम, और सुरिंदर कौर जैसी कलाकारों से मिली हैं, या उन्हें सामने से देखा है। आज हम आपसे जानना चाहेंगे पं. हुसनाल-भगतराम के बारे में। मैंने सुना है कि आपके परिवार का संबंध है उनके परिवार के साथ?

गुड्डो दादी - जी हाँ! पंडित बागा राम जी के साथ हमारा पारिवारिक सम्बन्ध है। मेरे पैदा होने से भी पहले हमारे परिवार का काफी आना जाना था।

सुजॉय - ये पंडित बागा राम जी कौन हैं?

गुड्डो दादी - पं. बागा राम जी हुस्नलाल जी के ससुर थे। और वो ख़ुद भी संगीतकार थे। मेरे ख़याल में उन्होंने कुछ फ़िल्मों में भी संगीत दिया है। और हुस्नलाल भगतराम को भी बहुत कुछ सिखाया है। पंडित बागा राम जी बहुत सीधे सादे किस्म के इंसान थे, बढ़ी सफ़ेद दाढ़ी, खुली कंधे पर लाल कपडे का अंगोछा डाले रखते थे।

सुजॉय - अच्छा!! क्या आप बता सकती हैं कि बागा राम जी नें किन फ़िल्मों में संगीत दिया था?

गुड्डो दादी - पंडित बागा राम जी ने कौन सी फिल्म में संगीत दिया या लिखा मुझे जानकारी नहीं हैं, क्योंकि उन दिनों हमें दूर ही रखा जाता था गीत आदि से, और दूर संचार के साधन भी कम थे। रेडियो तो १९४७ तक किसी किसी के घर में ही होता था।

सुजॉय - मैंने इंटरनेट पर काफ़ी ढूंढा पर बागा राम जी के बारे मे कोई जानकारी प्राप्त नहीं कर सका, और न ही उनके किसी फ़िल्म या गीत की। ऐसे में आप से उनके बारे में सुन कर बहुत ही अच्छा लग रहा है। दादी, मैंने सुना है कि आप हुस्नलाल जी के घर गई थीं। कहाँ पे था उनका घर?

गुड्डो दादी - मुझे जितना याद है या पता है, वह बागा राम जी का घर था। हुस्नलाल जी का वहाँ ख़ूब आना जाना था। उनका घर था दिल्ली के पहाड़गंज में इम्पीरियल सिनेमा के पीछे। एक पारिवारिक वातावरण था, सबसे मिलते थे आदर के साथ, हंस मुख भी थे। हुस्नलाल-भगतराम जी नया गीत अपने मित्र मंडली के साथ तैयार करते थे, जिसमे पंडित बागा राम जी बहुत सहायता करते थे। बहुत से गीत और धुनें दुसरे संगीतकारों ने चोरी कर अपनी फिल्मो में शामिल कर लिया, नाम तो नहीं लिखूँगी। हम भी दिल्ली में रहते थे। बेटी और पति के साथ बहुत बार गई उनके घर। वहाँ एक कमरा वाद्यों से सुज्जित रहता था जिसमें सितार, हारमोनियम, घड़ा, तबला शामिल थे। मसंद गोल तकिये, उन पर सफ़ेद कवर, ज़मीन पर कालीन और कालीन पर सफ़ेद चादर भी बिछी होती थी। उनके घर हमनें खाना भी खाया, बहिन के हाथों बना चाय भी पी, बड़ी बहिन ने खाने पर आमन्त्रण दिया था। बहिन, यानी हुसनाल जी की पत्नी, जिनको मैं बड़ी बहन बोलती हूँ सम्मान के साथ, उन्होंने भी फ़िल्म में गीत गाया है। मुझे जितना याद है फ़िल्म 'चाकलेट' में उन्होंने गीत गाया था।

सुजॉय - अच्छा! हुस्नलाल जी की पत्नी, यानी कि बागा राम जी की बेटी! यह जो फ़िल्म 'चाकलेट' की बात बतायी आपने, इस फ़िल्म में संगीत था मोहन शर्मा का और गीतकार थे सी. एम. कश्यप। यह १९५० की फ़िल्म थी। अच्छा दादी, गायिकाओं की बात करें तो सुरैया जी के साथ हुस्नलाल-भगतराम के सब से ज़्यादा लोकप्रिय गीत हुए। इस बारे में कुछ कहना चाहेंगी?

गुड्डो दादी - गायिका सुरैया की बहुत इज्ज़त करते थे दोनों। एक दूसरी मशहूर गायिका नें जब अपनी गीतों की 'श्रद्धांजली' सी.डी. बनायी तो उन्होंने हुस्न लाल जी के गीत एक भी नहीं शामिल किये। और आप यकीन नहीं करेंगे कई गायक गायिकाओं नें भी उनकी धुनें चुराकर दूसरे संगीतकारों को दी। गायक महेंदर कपूर जी ने भी गायन की शिक्षा हुसनलाल जी से ली थी।

सुजॉय - अच्छा दादी, आप तो उनके परिवार के करीब थीं, आप बता सकती हैं कि हुस्नलाल जी के निकट के मित्रों में कौन कौन से कलाकार हुआ करते थे?

गुड्डो दादी - गीतकार पंडित सुदर्शन जी, अभिनेता सोहराब मोदी, जयराज सहगल जी, जिल्लो बाई, जुबैदा, बोराल जी, डी एन मधोक, वाई बी चोहान, कारदार साहब, हरबंस, डायरेक्टर मुकंद लाल और बहुत से फिल्म के लोग थे उनकी मित्र मंडली में। एक साल पहले तलत अज़ीज़ से फोन पर बात हुई थी हुस्नलाल जी के विषय में, उनके मुख से यही निकला कि चित्रमय संसार में हम उन्हें बहुत याद करते हैं, और बहुत नाम है उनका | कभी कहते भी थे आपके बनाये हुए गीत फलाना फिल्म में बज रहे है, तो उनके मुख से यही निकलता था बजने दो मेरे मन को बहुत शान्ति मिलती है, यहीं सभी कुछ छोड़ जाना है, सभी कुछ!

सुजॉय - हुस्नलाल जी के अंतिम दिनों के बारे में आप कुछ बता सकती हैं?

गुड्डो दादी - उनके अंतिम दिन बहुत ही खराब व दयनीय दशा में निकले। आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। लेकिन किसी के आगे अपना हाथ नहीं फैलाया। कुछ भी हो सुबह के वक़्त सैर अवश्य करने जाते थे। और एक दिन सुबह दिल्ली के ताल कटोरा बाग में दिल की धडकन रूकने से वहीं उनका देहांत हो गया। धुन बनाने वाले, चुराने वाले, गाने वाले, कोई भी कुछ नहीं ले गया, सब कुछ यहीं रह गया, फिल्म 'मेला' का गीत "ये जिंदगी के मेले" दरअसल फिल्म 'मोती महल' का गीत था "जाएगा जब यहाँ से कुछ भी ना साथ होगा"।

सुजॉय - वाक़ई दिल उदास जाता है ऐसे शब्द सुन कर। अच्छा दादी, चलते चलते आप अपनी पसंद का कोई गीत पंडित हुस्नलाल-भगतराम जी का सुनवाना चाहेंगे हमारे श्रोताओं को?

गुड्डो दादी - "वो पास रहे या दूर रहे नज़रों में समाये रहते हैं"

सुजॉय - वाह! आइए सुना जाये यह गीत सुरैया की आवाज़ में, फ़िल्म 'बड़ी बहन' का यह गीत है, क़मर जलालाबादी के बोल और यह वर्ष १९४९ की तस्वीर है।

गीत - वो पास रहे या दूर रहे (बड़ी बहन)


सुजॉय - दादी, आपका बहुत बहुत शुक्रिया, बागा राम जी और हुस्नलाल जी के जीवन और संगीत सफ़र के बारे में युं तो किताबों और पत्रिकाओं से जानकारी प्राप्त की जा सकती है, लेकिन आपनें जो बातें हमें बताईं, वो सब कहीं और से प्राप्त नहीं हो सकती थी। यह हमारा सौभाग्य है आप से बातचीत करना। आगे भी हम आप से सम्पर्क बनाये रखेंगे, आप भी 'आवाज़' पर हाज़िरी लगाते रहिएगा, बहुत बहुत शुक्रिया, नमस्कार!

गुड्डो दादी - मेरी तरफ़ से आप को बहुत बहुत आशिर्वाद और धन्यवाद!

Thursday, February 10, 2011

अलविदा अलविदा....यही कहा होगा सुर्रैया ने दुनिया-ए-फानी को छोड़ते हुए अपने चाहने वालों से

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 590/2010/290

सुरैया के गाये सुमधुर गीतों को सुनते हुए और उनकी चर्चा करते हुए हम आज आ पहुँचे हैं उन पर केन्द्रित 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की लघु शृंखला 'तेरा ख़याल दिल से भुलाया ना जाएगा' की दसवीं और अंतिम कड़ी पर। आइए आज हम सुरैया की उस ज़िंदगी में थोड़ा झाँके जिसे वो फ़िल्मलाइन छोड़ने के बाद अंत तक जी रही थीं। हालाँकि उन्हें आर्थिक तौर पर कोई परेशानी नहीं थी, लेकिन वो बहुत अकेली हो गई थीं। अंतिम दिनों में वो अपने वकील पर निर्भर थीं, जिन्होंने उनका ख़याल भी रखा, और सुरैया ने भी अपनी कुछ सम्पत्ति उनकी बेटियों के नाम कर दीं। लेकिन इसके अलावा भी सुरैया की बहुत सारी स्थायी सम्पत्ति थी, जिसमें थे वर्ली में एक पूरी इमारत जिसमें ६ फ़्लैट्स, गराज और आउटहाउसेस थे; इसके अलावा लोनावला में भी एक बंगला था। इतनी सारी जायदाद की मालकिन होने के बावजूद सुरैया एक किराये के फ़्लैट में रहती थीं। १९९८ में वो गुमनामी से बाहर निकलीं और स्क्रीन विडिओकॊन अवार्ड्स में शरीक हुईं, जिसमें अभिनेता सुनिल दत्त के हाथों से 'लाइफ़टाइम अचीवमेण्ट अवार्ड' ग्रहण किया। सफ़ेद सलवार कमीज़ में उस दिन भी सुरैया कितनी ग्रेसफ़ुल दिख रहीं थीं। उनमें जो अदबी बात थी, वह बात अंत तक उनमें कायम थी। पुरस्कार लेते वक़्त जब उन्होंने माइक हाथ में लिया तो इतनी जज़्बाती हो गईं कि उनका गला चोक हो गया। जावेद जाफ़री ने जब उनसे कुछ गुनगुनाने को कहा तो उन्होंने मना कर दिया, जिसका सभी ने सम्मान किया। ३१ जुलाई २००४ को सुरैया हमें छोड़ कर चली गईं अलविदा अलविदा कहते हुए।

आज के अंक के लिए हमने चुना है फ़िल्म 'शमा परवाना' का गीत "अलविदा अलविदा, ओ जाने तमन्ना अलविदा, हो सके तो बख्श देना"। 'प्यार की जीत' और 'बड़ी बहन' जैसी सुपर-डुपर हिट फ़िल्मों के बाद डी. डी. कश्यप ने सुरैया को १९५४ की इस फ़िल्म 'शमा परवाना' में डिरेक्ट दिया और इसमें पहली बार उनके नायक बनें शम्मी कपूर। अब तक शम्मी कपूर 'जीवन ज्योति', 'गुल सानोबार', 'खोज', 'लैला मजनु', 'रेल का डिब्बा', 'ठोकर' और 'महबूबा' जैसी फ़िल्मों में काम कर चुके थे। इस फ़िल्म में शम्मी कपूर के साथ काम करने की यादों को सुरैया ने कुछ इस तरह से व्यक्त किया था उस 'जयमाला' कार्यक्रम में - "आजकल तो ऐक्टिंग् सीखाने के बाक़ायदा स्कूल खुले हुए हैं, लेकिन फिर भी ज़रा कमज़ोरी दिखायी देती है। मुझे तो ऐसा लगता है कि आज के कलाकार कला की तरफ़ ध्यान कम देते हैं। पुराने कलाकारों में सहगल साहब और मोतीलाल जी ऐसे कलाकार थे जिनकी ऐक्टिंग् और ज़िंदगी में फ़र्क नहीं महसूस होता था। इसकी वजह यह थी कि इन लोगों ने कला को अपने जीवन में ढाल लिया था। फ़िल्म 'शमा परवाना' में मेरा और शम्मी कपूर का साथ था। उन दिनों शम्मी कपूर फ़िल्मों में नये नये आये थे, बहुत दुबले पतले, नाज़ुक से थे। आज की तरह उस समय वो उछल-कूद करते तो मैं कह देती "ज़रा सम्भल के, कहीं कमर में लोच ना आ जाए (हँसते हुए)"। तो लीजिए फ़िल्म 'शमा परवाना' का यह गीत सुनिये जिसे लिखा है मजरूह साहब ने और संगीतकार हैं हुस्नलाल भगतराम। यह फ़िल्म हुस्नलाल-भगतराम की आख़िरी चर्चित फ़िल्मों में से थी। भले ही सुरैया पर केन्द्रित इस शृंखला का समापन हम "अलविदा अलविदा" गीत से कर रहे हैं, लेकिन हक़ीक़त तो यही है कि सुरैया जी, तेरा ख़याल दिल से भुलाया ना जाएगा। आपको यह शृंखला कैसी लगी, ज़रूर लिखिएगा oig@hindyugm.com के ईमेल पते पर। अब आज के लिए दीजिए इजाज़त, शनिवार की शाम साप्ताहिक विशेषांक के साथ दोबारा उपस्थित होंगे। नमस्कार!



क्या आप जानते हैं...
कि फ़िल्म 'जीत' के सेट पर देव आनंद ने सुरैया को ३००० रुपय की एक हीरे की अंगूठी से प्रेम निवेदन किया था। उस ज़माने के लिहाज़ से ३००० की रकम एक बड़ी रकम थी।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 01/शृंखला 10
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र -1938 की फिल्म है ये.

सवाल १ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक
सवाल २ - संगीतकार बताएं - १ अंक
सवाल ३ - गीतकार कौन हैं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अंजनाना जी की जबरदस्त टक्कर के बावजूद अमित जी विजयी रहे...नयी शृंखला के लिए सभी को शुभकामनाएँ, शरद जी वेलकॉम बेक

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Wednesday, February 9, 2011

नुक्ताचीं है ग़म-ए-दिल उसको सुनाये ना बने...ग़ालिब का कलाम और सुर्रैया की आवाज़

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 589/2010/289

"आह को चाहिये एक उम्र असर होने तक, कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक"। मिर्ज़ा ग़ालिब के इस शेर के बाद हम सुरैया के लिये भी यही कह सकते हैं कि उनकी गायकी, उनके अभिनय में वो जादू था कि जिसका असर एक उम्र नहीं, बल्कि कई कई उम्र तक होता रहेगा। 'तेरा ख़याल दिल से भुलाया ना जाएगा', सिंगिंग् स्टार सुरैया को समर्पित 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के इस लघु शृंखला की आज नवी कड़ी में सुनिए १९५४ की फ़िल्म 'मिर्ज़ा ग़ालिब' की एक अन्य ग़ज़ल "नुक्ताचीं है ग़म-ए-दिल उसको सुनाये ना बने, क्या बने बात जहाँ बात बनाये ना बने"। ग़ालिब के इन ग़ज़लों को सुरों में ढाला था संगीतकार ग़ुलाम मोहम्मद ने। इस फ़िल्म का निर्देशन सोहराब मोदी ने किया था। ग़ालिब की ज़िंदगी पर आधारित इस फ़िल्म को बहुत तारीफ़ें नसीब हुए। ग़ालिब की भूमिका में नज़र आये थे भारत भूषण और सुरैया बनीं थीं चौधवीं, उनकी प्रेमिका, जो एक वेश्या थीं। फ़िल्म के अन्य कलाकारों में शामिल थे निगार सुल्ताना, दुर्गा खोटे, मुराद, मुकरी, उल्हास, कुमकुम और इफ़्तेखार। इस फ़िल्म को १९५५ में राष्ट्रीय पुरस्कार के तहत स्वर्ण-कमल से पुरस्कृत किया गया था। सोहराब मोदी और संगीतकार ग़ुलाम मोहम्मद को भी राष्ट्रीय पुरस्कार मिले थे। फ़िल्मफ़ेयर में रुसी के. बंकर को सर्वश्रेष्ठ कला निर्देशन के लिए पुरस्कृत किया गया था। १९५४ में सुरैया की बाकी फ़िल्में आयीं 'वारिस', 'शमा परवाना' और 'बिलवामंगल'। इसके बाद सुरैया ने जिन फ़िल्मों में काम किया उनकी फ़ेहरिस्त इस प्रकार है:
१९५५ - ईनाम
१९५६ - मिस्टर लम्बू
१९५८ - तक़दीर, ट्रॊली ड्राइवर, मालिक
१९६१ - शमा
१९६३ - रुस्तोम सोहराब
१९६४ में सुरैया ने फ़िल्म 'शगुन' का निर्माण किया, १९६५ में फ़िल्म 'दो दिल' में केवल गीत गाये, और यही उनकी अंतिम फ़िल्म थी। उसके बाद सुरैया ने अपने आप को इस फ़िल्म जगत से किनारा कर लिया और गुमनामी में रहने लगीं। वो ना किसी सार्वजनिक जल्से में जातीं, ना ही ज़्यादा लोगों से मिलती जुलतीं। उनके इस पड़ाव का हाल आपको हम कल की कड़ी में बताएँगे।

सुरैया को फ़िल्म 'मिर्ज़ा ग़ालिब' में अभिनय करने का गर्व था। जब वो विविध भारती के 'जयमाला' कार्यक्रम में तशरीफ़ लायी थीं, उन्होंने आज की इस प्रस्तुत ग़ज़ल को पेश करते हुए कुछ इस तरह से कहा था - "ज़िंदगी में कुछ मौके ऐसे आते हैं जिनपे इंसान सदा नाज़ करता है। मेरी ज़िंदगी में भी एक मौका ऐसा आया था जब फ़िल्म 'मिर्ज़ा ग़ालिब' को प्रेसिडेण्ट अवार्ड मिला और उस फ़िल्म का एक ख़ास शो राष्ट्रपति भवन में हुआ, जहाँ हमने पंडित नेहरु के साथ बैठकर यह फ़िल्म देखी थी। पंडित नेहरु हर सीन में मेरी तारीफ़ करते और मैं फूली ना समाती। इस वक़्त पंडितजी की याद के साथ मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़ल पेश करती हूँ, नुक्ताचीं है ग़म-ए-दिल उसको सुनाये ना बने, क्या बने बात जहाँ बात बनाये ना बने।"



क्या आप जानते हैं...
कि सुरैया ने कोई बसियत नहीं बनवाई थी, इसलिए उनकी मृत्यु के तुरंत बाद महाराष्ट्र सरकार ने उनकी जायदाद सील कर दी और दावेदार के लिए अर्ज़ी आमंत्रित की।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 10/शृंखला 09
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र -बेहद मशहूर गीत.

सवाल १ - फिल्म के निर्देशक बताएं - २ अंक
सवाल २ - संगीतकार बताएं - १ अंक
सवाल ३ - गीतकार कौन हैं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
भाई ये तो हम कहीं पहुँचते हुए नज़र नहीं आ रहे...मुकाबला एकदम बराबरी का है....आज इस शृंखला की अंतिम कड़ी है...देखते हैं :)

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Tuesday, February 8, 2011

धडकते दिल की तम्मना हो मेरा प्यार हो तुम....कितने कम हुए है इतने मासूम और मुकम्मल गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 588/2010/288

सुरैया के गाये सुमधुर गीतों से सजी लघु शृंखला 'तेरा ख़याल दिल से भुलाया ना जाएगा' की आठवीं कड़ी के साथ 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में आप सभी हम हार्दिक स्वागत करते हैं। आज की कड़ी के लिए हमने जो गीत चुना है वह ना केवल सुरैया जी के संगीत सफ़र का एक अहम अध्याय रहा है, बल्कि इस गीत के संगीतकार के लिए भी एक मीलस्तंभ गीत सिद्ध हुआ था। ये कमचर्चित और अण्डर-रेटेड म्युज़िक डिरेक्टर थे ग़ुलाम मोहम्मद। १९६१ की फ़िल्म 'शमा' का बेहद मशहूर और ख़ूबसूरत गीत "धड़कते दिल की तमन्ना हो मेरा प्यार हो तुम, मुझे क़रार नहीं जब से बेक़रार हो तुम"। गीत नहीं, बल्कि ग़ज़ल कहें तो बेहतर होगा। कैफ़ी आज़्मी साहब ने क्या ख़ूब लफ़्ज़ पिरोये हैं इस ग़ज़ल में। ग़ुलाम मोहम्मद की तरह क़ैफ़ी साहब भी अण्डर-रेटेड रहे हैं, और उनकी लेखन प्रतिभा का फ़िल्म जगत उस हद तक लाभ नहीं उठा सका जितना उठा सकता था। आगे बढ़ने से पहले आइए इस ग़ज़ल के बाक़ी के शेर यहाँ लिखें...

धड़कते दिल की तमन्ना हो मेरा प्यार हो तुम,
मुझे क़रार नहीं जब से बेक़रार हो तुम।

खिलाओ फूल किसी के किसी चमन में रहो,
जो दिल की राह से गुज़री है वो बहार हो तुम।

ज़ह-ए-नसीब अता कि जो दर्द की सौग़ात,
वो ग़म हसीन है जिस ग़म के ज़िम्मेदार हो तुम।

चढ़ाऊँ फूल या आँसू तुम्हारे क़दमों में,
मेरी वफ़ाओं की उल्फ़त की यादगार हो तुम।

जितने सुंदर बोल, उतनी ही प्यारी धुन, और उतनी ही सुरीली आवाज़, कुल मिलाकर फ़िल्म संगीत के धरोहर का एक अनमोल नगीना है यह ग़ज़ल। ग़ुलाम मोहम्मद की बात करें तो १९२४ में वे बम्बई आये थे और ८ सालों तक संघर्ष करने के बाद उन्हें सरोज मूवीटोन में बतौर तबला वादक नियुक्ति मिली थी। उसके बाद अनिल बिस्वास और नौशाद के सहायक और वादक के रूप में काम किया। नौशाद साहब के साथ उनकी युनिंग् ख़ूब जमी और नौशाद साहब की रचनाओं में ढोलक और तबले के ठेकों का जो रंग निखर कर आता था, वो ग़ुलाम मोहम्मद साहब की ही देन थी। फ़िल्म 'आन' के बाद ग़ुलाम मोहम्मद एक स्वतंत्र संगीतकार बन गये। 'हूर-ए-अरब', 'पगड़ी', 'पारस', और 'परदेस' जैसी फ़िल्मों में संगीत दिया। जहाँ तक ग़ुलाम मोहम्मद और सुरैया के साथ की बात है, १९४९ की फ़िल्म 'शायर' में एक उल्लेखनीय गीत था सुरैया का गाया हुआ "हमें तुम भूल बैठे हो, तुम्हें हम याद करते हैं"। उस ज़माने में ग़ुलाम साहब ज़्यादातर लता और शम्शाद बेगम को गवा रहे थे। १९५३ में 'दिल-ए-नादान' फ़िल्म से ग़ुलाम मोहम्मद ग़ज़लनुमा गीतों में भी महारथ हासिल कर ली, जिसकी परछाई अगले ही साल 'मिर्ज़ा ग़ालिब' में दिखाई दी। आशा भोसले, सुधा मल्होत्रा और जगजीत कौर को भी गवा लेने के बाद 'मिर्ज़ा ग़ालिब' में सुरैया के साथ उनका उत्कृष्ट काम हुआ। फिर आगे चलकर १९५८ की फ़िल्म 'मालिक' में "मन धीरे धीरे गाये रे मालूम नहीं कौन" एक सदाबहार सुरैया-तलत डुएट रहा है। और इसके बाद १९६१ की फ़िल्म 'शमा' के गानें तो हैं ही। यानी कि कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि भले ग़ुलाम मोहम्मद ने सुरैया को ज़्यादा नहीं गवाया, या युं कहें कि ज़्यादा गवाने का अवसर उन्हें नहीं मिला, लेकिन इस जोड़ी का स्कोर १००% रहा है। जितना भी काम हुआ उत्कृष्ट ही हुआ। तो आइए इस जोड़ी के नाम आज की यह शाम करते हुए फ़िल्म 'शमा' की यह सदाबहार ग़ज़ल सुनते हैं।



क्या आप जानते हैं...
कि मुशायरे के रूप में ढाल कर उर्दू शायरी को ग़ुलाम मोहम्मद ने एक और फ़िल्म 'पाक दमन' (१९५७) में संगीत से सजाया था और रफ़ी, चाँदबाला, मुबारक़ बेगम और शक़ील बदायूनी की आवाज़ों का इस्तेमाल किया था।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 09/शृंखला 09
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र -बेहद मशहूर गीत.

सवाल १ - फिल्म के निर्देशक बताएं - १ अंक
सवाल २ - संगीतकार बताएं - २ अंक
सवाल ३ - गीतकार कौन हैं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
वाह क्या बात है....फिर एक बार वही कहानी, अमित जी २ अंकों से आगे जरूर हैं, पर अंजाना जी जिस तरह की टक्कर उन्हें दे रहे हैं कमाल है...विजय जी और इंदु जी धन्येवाद

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Monday, February 7, 2011

हम इश्क़ के मारों को दो दिल जो दिए होते....एक और खूबसूरत ख्याल सुर्रैय्या की खनकती आवाज़ में

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 587/2010/287

'ओल्ड इज़ गोल्ड' में इन दिनों हम आप तक पहुँचा रहे हैं फ़िल्म जगत की सुप्रसिद्ध सिंगिंग् स्टार सुरैया पर केन्द्रित लघु शृंखला 'तेरा ख़याल दिल से भुलाया ना जाएगा'। दोस्तों, हमने इस शृंखला में आपको बताया था कि सुरैया ने फ़िल्मों में बाल कलाकार के रूप में क़दम रख था। बतौर बालकलाकार उनकी पहली फ़िल्म थी 'उसने क्या सोचा', जो बनी थी १९३७ में। जब वो १२ साल की थीं, उन्होंने फ़िल्म 'ताज महल' में अभिनय किया था जिसका श्रेय उनके मामाजी को जाता है। आइए आज इसी वाक्या के बारे में जान लेते हैं सुरैया के जुबाँ से जो उन्होंने शमिम अब्बास के उसी इंटरव्यु में कहा था। "इसमें भी एक इत्तफ़ाक़ है, मेरा कोई इरादा नहीं था फ़िल्म जॊयन करने का। लेकिन मेरे एक अंकल हैं जो फ़िल्मों में काम किया करते थे, 'ऐज़ ए विलन'। He was a very popular actor of his time। तो मैं स्कूल में पढ़ा करती थी, उस वक़्त छुट्टियाँ थी, वकेशन था, तो मैं उनके साथ शूटिंग् देखने चली गई। तो मोहन स्टुडियो में उनकी शूटिंग् थी। वहाँ एक डिरेक्टर थे नानुभाई वकील। तो वो उस वक़्त एक ऐतिहासिक फ़िल्म बना रहे थे जिसका नाम था 'ताज महल'। उन्हें एक छोटी बच्ची की ज़रूरत थी जो मुमताज़ महल के बचपन का रोल कर सके। तो उन्होंने मुझे देखा तो अंकल से मेरे बारे में पूछने लगे। मेरी आँखें क्योंकि मुग़लीयात जैसे हैं, उनको पसंद आईं, वो कहने लगे कि छोटा रोल है, कुछ ही दिनों की बात है, कर लो। मैं तो नर्वस हो गई। हालाँकि मुझे फ़िल्में देखने का बड़ा शौक था, बचपन से ही हर एक फ़िल्म देखा करती थी, लेकिन जब मुझसे यह पूछा गया कि तुम काम करो, तो मैं नर्वस हो गई। फिर एक टेम्प्टेशन भी हुआ, छुट्टियाँ भी है स्कूल में, तो कर लिया जाए, it will be fun। तो मैंने फ़िल्म की, सब ने फ़िल्म देखी, प्रकाश पिक्चर्स के विजय भट्ट और शंकर भट्ट ने भी फ़िल्म देखी, पूछा कि कौन है यह लड़की, ज़बान बहुत अच्छी है इसकी, उनको भी चाइल्ड रोल के लिए एक बच्ची की ज़रूरत थी, इस तरह से सिलसिला शुरु हो गया।"

सुरैया की जिस फ़िल्म का गीत आज हम आपको सुनवाने के लिए लाये हैं, वह है 'बिल्वामंगल' का। १९५४ की यह फ़िल्म थी जिसमें सुरैया के नायक बने थे सी. एच. आत्मा। डी. एन. मधोक के गीत और बुलो. सी. रानी का संगीत था। इस फ़िल्म में सुरैया के दो गीत बहुत मशहूर हुए थे, जिनमें एक था "परवानों से प्रीत दीख ली शमा से सीखा जल जाना, फिर दुनिया को याद रहेगा तेरा मेरा अफ़साना", और दूसरा गाना था "हम इश्क़ के मारों को दो दिल जो दिए होते, हमने ना कभी उनके अहसान लिए होते", और यही गीत आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की शान है। क्या ग़ज़ब का मुखड़ा है साहब कि सुन कर दिल कह उठता है 'वाह!' इस ग़ज़ल के दो और शेर ये रहे...

"एक दिल जो कभी रोता दूजे से बहल जाते,
आहें ना भरी होती, शिकवे ना किए होते।"

"आते कि ना आते परवाह किसे होती,
उल्फ़त में किसी की ना मर मर के जिए जाते।"

फ़िल्म 'बिल्वामंगल' के साथ सुरैया की एक ख़ास याद जुड़ी हुई है, आइए उसी के बारे में जान लेते हैं 'विशेष जयमाला' कार्यक्रम के माध्यम से। "सन् १९५२ के फ़िल्म फ़ेस्टिवल में हॊलीवूड के डिरेक्टर फ़्रैंक काप्रा आये थे। बातचीत के दौरान मैंने उनसे कहा ग्रेगरी पेक की फ़िल्में मुझे बहुत पसंद है और आप उनसे यह ज़रूर कह दीजिएगा। और फिर जब मिस्टर काप्रा ने मेरा फ़ोटो और पता ले जाकर ग्रेगरी पेक को दिया तो उन्होंने मुझे एक ख़त लिखा कि अगर मौका हुआ हिंदुस्तान आकर आपसे ज़रूर मुलाक़ात करूँगा। मैं तो यह समझी थी कि वो क्या आयेंगे और क्या मुलाक़ात करेंगे! फिर दो साल बाद एक दिन मैं फ़िल्म 'बिल्वामंगल' की शूटिंग् से थकी-हारी घर आई और सो गई। रात के करीब १२ बजे मम्मी मुझे जगाने लगी कि 'उठो उठो, देखो बाहर कौन आया है, ग्रेगरी पेक तुमसे मिलने आये हैं'। पहले मैं ख़्वाब समझी, मगर जब नींद टूटी तो यह हक़ीक़त थी। ख़ैर दूसरे दिन जब यह बात अख़बारों में छपी तो मैं 'बिल्वामंगल' का ही गीत पिक्चराइज़ कर रही थी।" तो लीजिए दोस्तों, सुनिए सुरैया की आवाज़ में 'बिल्वामंगल' की एक ख़ूबसूरत ग़ज़ल को।



क्या आप जानते हैं...
कि सुरैया ने अपने छोटे से फ़िल्मी सफ़र में क़रीब ७१ फ़िल्मों में काम किया, और इस दौरान उस दौड़ के लगभग सभी जानेमाने संगीतकारों के लिए गानें गाये और अलग अलग मूड्स के गीत गाकर अपने फ़न के जोहर दिखाये।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 08/शृंखला 09
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र -बेहद मशहूर गीत.

सवाल १ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक
सवाल २ - संगीतकार बताएं - २ अंक
सवाल ३ - गीतकार कौन हैं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
ये मुकाबला तो लगता है आखिरी सिरे तक जाएगा....अमित जी और अंजना जी जबरदस्त मुकाबला कर रहे हैं....विजय जी और अवध जी आपने भी सही पहचाना

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Sunday, February 6, 2011

मनमोर हुआ मतवाला किसने जादू डाला....सुर्रैया के लिए प्रेम वो जादू था जो मन से कभी नहीं उतरा

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 586/2010/286

मस्कार! रविवार की शाम और 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर एक नई सप्ताह का आग़ाज़। दोस्तों नमस्कार, और बहुत बहुत स्वागत है इस महफ़िल में। इन दिनों 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल रोशन है उस गायिका-अभिनेत्री के गाये हुए गीतों से जिन्हें हम जानते हैं सुरैया के नाम से। इस शृंखला के पहले हिस्से में पाँच गानें ४० के दशक के सुनने के बाद, आइए आज क़दम रखते हैं ५० के दशक में। सुरैया की ज़िंदगी का एक अध्याय रहे हैं अभिनेता देव आनंद। सुरैया और देव साहब का प्रेम-संबंध इण्डस्ट्री में चर्चा का विषय बन गया था। सुरैया पर केन्द्रित कोई भी चर्चा देव साहब के ज़िक्र के बिना समाप्त नहीं हो सकती। क्या हुआ था कि वे दोनों मिल ना सके, एक दूजे का हमसफ़र बन ना सके। आइए आज देव साहब की किताब 'रोमांसिंग् विद् लाइफ़' से कुछ अंश यहाँ पेश करें। देव साहब कहते हैं, "मैं सातवें आसमान पर उड़ रहा था क्योंकि हम दोनों अब एन्गेज हो चुके थे। मैं उसे पाना चाहता था, ज़्यादा, और भी ज़्यादा, लेकिन फिर मुझे उसकी तरफ़ से कोई आवाज़ नहीं आई। हमारी फ़िल्मों की शूटिंग् भी ख़त्म हो गई, और अब तो एक दूसरे से मिलने का कोई बहाना ही नहीं बचा था। दिन सप्ताह में बदल गये, लेकिन उसकी कोई ख़बर मुझ तक नहीं पहुँची। न कोई चिट्ठी, न कोई फ़ोन, न तार। मैंने दिवेचा से सम्पर्क किया और उसने वादा किया कि उसका हालचाल लेकर मुझे बताएगा। लेकिन इस बार तो उसे भी उसके (सुरैया के) घर घुसने की इजाज़त नहीं मिली। सुरैया की दादी ने उसके मुंह पर ही दरवाज़ा बंद कर दिया यह कहते हुए कि इन दिनों हम अपने करीबी दोस्तों का भी स्वागत नहीं कर रहे जिसके पीछे कुछ ऐसे कारण हैं जिसे हम बताना नहीं चाहते। फिर भी दिवेचा ने यह पता लगा ही लिया कि सुरैया के घर में बहुत अशांति का माहौल बना हुआ है- उसके और मेरे रिश्ते को लेकर। कोई इस रिश्ते को स्वीकार नहीं रहा सिवाय उसकी माँ के। सुरैया की माँ को बाकी घरवालों ने यह कहकर डराया कि अगर वो इस रिश्ते का समर्थन करेगी तो या तो उसे ही घर से निकल जाना पड़ेगा या फिर उसकी दादी आत्महत्या कर लेंगी। इस तरह से सुरैया पर दबाव बढ़ता गया और उसके लिए आँसू बहाने के अलावा और कोई चारा नहीं बचा था। और सुरैया ने एक दिन निर्णय ले लिया कि वो मुझे अपने दिमाग से निकाल देगी। एक दिन सुरैया ने अपनी उस अंगूठी को, जो मैंने उसे दी थी, समुंदर के किनारे जाकर, उसे अंतिम बार देख कर, दूर समुंदर में फेंक दिया। मेरा दिल टूट गया, लगा जैसे मेरी दुनिया ही उजड़ गई है। उसके बिना मुझे अपनी ज़िंदगी बेमानी लगने लगी। लेकिन अपने आप को मार कर भी तो कुछ साबित नहीं होता, सिवाय अपने आप को कायर ठहराने के। आख़िरकार मैं अपने भाई चेतन के कंधे पर सर रख कर ख़ूब रोया, क्योंकि चेतन को ही पता था कि मैं सुरैया से कितना प्यार करता था। उन्होंने मुझे सांत्वना देते हुए कहा था कि तुम्हारे जीवन का यह अध्याय तुम्हें आगे जीवन में और ज़्यादा मज़बूत बना देगा इससे भी बड़ी मुसीबतों और लड़ाइयों को लड़ने के लिए।" उधर दोस्तों, सुरैया ने भी आजीवन शादी नहीं की और देव आनंद के लिए अपने प्यार को बिकने नहीं दिया, मिटने नहीं दिया, मरने नहीं दिया। सुरैया के इस निष्पाप प्रेम में इतनी शक्ति और सच्चाई थी कि किसी भी फ़िल्मकार की आज तक हिम्मत नहीं हुई उनके जीवन की इस कहानी पर फ़िल्म बनाने की। सुरैया ने जैसे अपने ही गाये हुए उस गीत को सच साबित कर दिया कि "परवानों से प्रीत सीख ली शमा से सीखा जल जाना, फिर दुनिया को याद रहेगा तेरा मेरा अफ़साना"।

दोस्तों, आज के इस अंक के लिए देव आनंद और सुरैया की जिस फ़िल्म का गीत हमने चुना है, वह है 'अफ़सर'। इस फ़िल्म का एक बहुत ही ख़ूबसूरत गीत "मनमोर हुआ मतवाला, किसने जादू डाला"। इस गीत के ज़रिये सुरैया के दिल में यादें जुड़ी थीं सचिन देव बर्मन की। तभी तो उन्होंने उस 'जयमाला' कार्यक्रम में इस गीत को और बर्मन दादा को याद किया था इन शब्दों में - "फ़ौजी भाइयों, आज तक मैंने करीब सौ फ़िल्मों में काम किया है और इसी हिसाब से कई सौ गानें भी गाये होंगे! मगर गाना मैंने बाक़ायदा किसी से सीखा नहीं, इसे ख़ुदा की ही देन कह लीजिए कि म्युज़िक डिरेक्टर्स मुझे जैसा रिहर्स करा देते थे, मैं वैसा ही गा देती थी। देव आनंद की फ़िल्म 'अफ़सर' जब बन रही थी तो बर्मन दादा ने मेरे लिए एक गीत तैयार किया। बर्मन दादा इस गीत को इतना गाते थे कि मैंने देव आनंद से कहा कि क्यों ना सिचुएशन बदल दी जाये और इस गीत को बर्मन दादा ही गाये! लेकिन बर्मन दादा नहीं राज़ी हुए, कहने लगे कि यह गीत ख़ास तौर से तुम्हारे लिए बनाया है, इसलिए तुम्हे ही गाना होगा। ख़ैर, मैंने ही वह गीत गाया"। और दोस्तों, आप भी अब उस गीत का आनंद लीजिए जिसे पंडित नरेन्द्र शर्मा ने लिखा है।



क्या आप जानते हैं...
कि देव आनंद के साथ सुरैया ने कुल ६ फ़िल्मों में काम किया। ये फ़िल्में हैं 'विद्या', 'जीत', 'शायर', 'नीलू', 'दो सितारे' और 'अफ़सर'।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 07/शृंखला 09
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र -इस फिल्म में सुर्रैया के नायक थे सी एच आत्मा.

सवाल १ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक
सवाल २ - संगीतकार बताएं - १ अंक
सवाल ३ - गीतकार कौन हैं - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अरे एक बार फिर वही कहानी...सच है इससे रोचक मुकाबला आज तक नहीं हुआ है...अनजाना जी और अमित जी बधाई के पात्र हैं और बधाई प्रतिभा जी और किशोर संपत जी को भी

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Thursday, February 3, 2011

तेरे नैनों ने चोरी किया....सुर्रैया का नटखट अंदाज़ इस मधुर और सदाबहार गीत में

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 585/2010/285

सुरैया के गाये गीतों से सजी लघु शृंखला 'तेरा ख़याल दिल से भुलाया ना जाएगा' लेकर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल में हम फिर उपस्थित हैं। आज इस शृंखला की पाँचवी कड़ी है। जैसा कि कल हमने बताया था कि सुरैया जी ने संगीत की कोई विधिवत शिक्षा नहीं ली थी; लेकिन सुर को, लय को, बहुत आसान दक्षता से पकड़ लिया करती थीं। उन्होंने नूरजहाँ, ख़ुरशीद, ज़ोहराबाई, अमीरबाई जैसी उस दौर की गायिकाओं के बीच अपनी ख़ास जगह और पहचान बनाई। उनकी मधुर आवाज़ को दुनिया के सामने लाये थे नौशाद, लेकिन बाद में पंडित हुस्नलाल-भगतराम ने उनसे एक से बढ़कर एक गीत गवाया। ४० से लेकर ५० के दशक के बीच उनका फ़िल्मी सफ़र बुलंदियों पर था। उनकी अदाकारी और गायकी परवान चढ़ती गई। हुस्नलाल भगतराम के ज़िक्र से याद आया कि १९४८ में एक फ़िल्म आयी थी 'प्यार की जीत'। 'बड़ी बहन' की तरह इस फ़िल्म के गीतों ने भी अपार कामयाबी हासिल की। इस फ़िल्म को याद करते हुए सुरैया ने 'जयमाला' में कहा था - "फ़ौजी भाइयों, फ़िल्म 'प्यार की जीत' आप लोगों में से बहुतों ने देखी होगी, और इस फ़िल्म का वह गीत भी याद होगा, "एक दिल के टुकड़े हज़ार हुए, कोई यहाँ गिरा कोई वहाँ गिरा" (हँसते हुए)। मुझे और रहमान साहब को इस गीत के बोलों पर बड़ी हँसी आती थी। ख़ैर, रहमान साहब की तो बात ही निराली थी, बड़े पुर-मज़ाक हैं वो, ख़ास कर सीरियस सीन से पहले तो मुझे ज़रूर हँसाते थे। अच्छा, सुनिए उसी फ़िल्म का एक गीत"। और दोस्तों, उस दिन सुरैया जी ने बजाया था "कोई दुनिया में हमारी तरह बरबाद ना हो, दिल तो रोता है मगर होठों पे फ़रियाद ना हो"। लेकिन आज हम यह ग़मज़दा गीत नहीं सुनेंगे, बल्कि इसी फ़िल्म का एक ख़ुशरंग गीत, "तेरे नैनों ने चोरी किया मेरा छोटा सा जिया, परदेसिया"। अपने ज़माने का एक बेहद लोकप्रिय गीत, जो आज भी बेहद चाव से सुना जाता है।

पंडित हुस्नलाल-भगतराम का संगीत १९४७ में नज़रंदाज़ ही रहा। 'मोहन', 'रोमियो ऐण्ड जुलियट' जैसी फ़िल्में असफल रही थी। १९४८ में 'आज की रात' फ़िल्म में सुरैया ने हुस्नलाल-भगतराम के लिए कुछ गीत गाये थे फिर इन गीतों को भी ज़्यादा मक़बूलीयत हासिल नहीं हुई। और यही हाल मीना कपूर के गाये गीतों वाली १९४८ की फ़िल्म 'लखपति' का भी हुआ। लेकिन इसी साल 'प्यार की जीत' में सुरैया के गाये लाजवाब गीतों ने असफलता के इस क्रम को तोड़ा और हुस्नलाल-भगतराम लोकप्रियता के शिखर पर पहुँच गये। आइए इस फ़िल्म के गीतों की थोड़ी चर्चा करें। "कोई दुनिया में हमारी तरह बर्बाद न हो" और आज का गीत "तेरे नैनों ने चोरी किया" तो लिस्ट में सब से उपर हैं ही, इनके अलावा राग पीलू पर आधारित "ओ दूर जाने वाले, वादा ना भूल जाना" भी एक लाजवाब गीत रहा है। इस फ़िल्म में सुरैया ने मीना कपूर, सुरिंदर कौर और साथियों के साथ मिलकर एक दुर्लभ गीत गाया था "इतने दूर हैं हुज़ूर"। गीतकार थे राजेन्द्र कृष्ण और कमर जलालाबादी. आज के प्रस्तुत गीत के बारे में यही कह सकते हैं कि "तेरे नैनों ने" के बाद का हल्का अंतराल तथा ढोलक-तबले के ठेकों ने गीत की सुंदरता में चार चाँद लगाये। और इस ट्रेण्ड को हुस्नलाल भगतराम ने फिर अपनी आगे की फ़िल्मों में भी किया। तो आइए सुनते हैं यह गीत.



क्या आप जानते हैं...
कि अभिनेता धर्मेन्द्र सुरैया के ज़बरदस्त फ़ैन थे। वो उन दिनों मीलों का फ़ासला तय करके सुरैया की फ़िल्में देखने जाया करते थे। 'दिल्लगी' उन्होंने कुछ ४० बार देखी थी।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 06/शृंखला 09
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र -बेहद आसान.

सवाल १ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक
सवाल २ - संगीतकार बताएं - १ अंक
सवाल ३ - गीतकार कौन हैं - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
वाह एक बार फिर अमित जी और अंजाना जी एक साथ...प्रतिभा जी और किश संपत जी से बहुत दिनों बाद मुलाकात हुई स्वागत है....

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Wednesday, February 2, 2011

एक तुम हो एक मैं हूँ, और नदी का किनारा है....जब सुर्रैया ने याद किया अपने शुरूआती रेडियो के दिनों को

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 584/2010/284

ल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों नमस्कार! 'तेरा ख़याल दिल से भुलाया ना जाएगा' लघु शृंखला की चौथी कड़ी में आज हम फिर एक बार सुरैया के बचपन के दिनों में चलना चाहेंगे, जब वो रेडियो से जुड़ी हुई थीं। दोस्तों, १९७१ में 'विशेष जयमाला' के अलावा भी १९७५ में सुरैया जी को विविध भारती के स्टुडिओज़ में आमंत्रित किया गया था एक इंटरव्यु के लिए। उसी इंटरव्यु से चुनकर एक अंश यहाँ हम पेश कर रहे हैं। सुरैया से बातचीत कर रहे हैं शमीम अब्बास।

शमीम: सुरैया जी, आदाब!

सुरैया: आदाब!

शमीम: सुरैया जी, मुझे आप बता सकती हैं कि कितने दिनों के बाद विविध भारती के स्टुडियो में आप फिर आयी हैं?

सुरैया: देखिए अब्बास साहब, मेरे ख़याल से, वैसे तो मैं सालों के बाद आयी हूँ, लेकिन आपको मैं एक बात बताऊँगी कि मैं पाँच की उम्र से रेडियो स्टेशन में आ गई थी और मेरे लिए यह कोई नयी जगह नहीं है। मैं कैसे आयी यह आपको ज़रूर बताऊँगी। संगीतकार मदन मोहन जी मेरे पड़ोसी हुआ करते थे, और वो बच्चों के कार्यक्रम में हमेशा हिस्सा लिया करते थे। तो वे मुझे खींचकर यहाँ ले आये।

शमीम: विविध भारती तो नहीं था उस वक़्त?

सुरैया: ना! विविध भारती नहीं था, ज़ेड. ए. बुख़ारी साहब स्टेशन डिरेक्टर हुआ करते थे रेडिओ स्टेशन के, और तब से मैं कई साल, हर सण्डे को वह प्रोग्राम हुआ करता था।

शमीम: किस तरह के प्रोग्राम? गानें या ड्रामे?

सुरैया: नहीं, हम तो, मैं, मदन मोहन, राज कपूर, हम सब हिस्सा लिया करते थे और फ़िल्मों के गानें कॊपी करके गाया करते थे।

शमीम: आज भी कुछ गानें कॊपी किए जाते हैं!

सुरैया: (ज़ोर से हँसती हैं)

शमीम: तो आपकी शुरुआत रेडिओ से ही हुई?

सुरैया: जी हाँ! सिंगिंग् करीयर रेडिओ से ही शुरु हुआ था।

शमीम: आपने एक बार किसी रेडिओ प्रोग्राम में कहा था कि आप ने बाक़ायदा गाना किसी से सीखा नहीं, क्या यह सच है?

सुरैया: जी हाँ! सही बात है। मैंने कोई तालीम नहीं ली।

शमीम: जिस वक़्त आपने गाना शुरु किया था, उस वक़्त तो प्लेबैक नहीं था या नया नया शुरु हुआ था!

सुरैया: प्लेबैक सिस्टम तो था लेकिन ज़्यादातर जो काम करते थे वो ख़ुद ही गाते थे।

शमीम: आपने भी कभी किसी का प्लेबैक दिया है?

सुरैया: जी हाँ, नौशाद साहब की एक दो फ़िल्में थीं - 'शारदा', 'कानून' और 'स्कूल मास्टर'। ये तीन फ़िल्में थीं जिनमें मैंने प्लेबैक दिया था।

दोस्तों, इन तीन फ़िल्मों में से फ़िल्म 'शारदा' का गीत हमने पहले अंक में सुना था। आइए आज इन्हीं में से फ़िल्म 'कानून' का एक मशहूर गीत सुनते हैं। "एक तुम हो एक मैं हूँ, और नदी का किनारा हो, समा प्यारा प्यारा हो"। 'कानून' १९४३ की फ़िल्म थी ए. आर. कारदार की। इस फ़िल्म में निर्मला और सुरैया के गाये गीत छाये रहे। आपको बता दें कि ये वही निर्मला देवी हैं जो अभिनेता गोविंदा की माँ हैं और प्रसिद्ध ठुमरी गायिका भी। निर्मला जी ने 'कानून' में "सैंया खड़े मोरे द्वार में" और "आ मोरे सैंया" गाया था तो सुरैया ने आज का पोरस्तुत गीत गाकर ख़ूब लोकप्रियता बटोरी थी। इसी फ़िल्म में सुरैया ने श्याम के साथ "आए जवानी" गीत भी गाया था। बरसों बाद नौशाद साहब ने ही सुरैया और श्याम से फिर एक बार एक युगल गीत गवाया था फ़िल्म 'दिल्लगी' में जो बहुत बहुत हिट हुआ था, गीत था "तू मेरा चाँद मैं तेरी चाँदनी"। १९४३ में सुरैया ने कारदार साहब के कुछ और फ़िल्मों में गीत गाये जैसे कि 'संजोग' और 'नाटक'। तो लीजिए सुनिए फ़िल्म 'कानून' का यह गीत, गीतकार हैं ......



क्या आप जानते हैं...
कि १९४२ की फ़िल्म 'तमन्ना' में गायक मन्ना डे ने पहली बार गीत गाया था और वह भी सुरैया के साथ गाया हुआ एक युगल-गीत

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 05/शृंखला 09
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र -बेहद आसान.

सवाल १ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक
सवाल २ - संगीतकार बताएं - १ अंक
सवाल ३ - गीतकार कौन हैं - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
वाह क्या मुकाबला है, अंजाना जी बधाई....अमित जी और अवध जी तत्पर मिले

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Tuesday, February 1, 2011

मिलने के दिन आ गए....सुर्रैया और सहगल की युगल आवाजों में एक यादगार गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 583/2010/283

फ़िल्म जगत की सुप्रसिद्ध गायिका-अभिनेत्री सुरैया पर केन्द्रित लघु शृंखला 'तेरा ख़याल दिल से भुलाया ना जाएगा' की तीसरी कड़ी लेकर हम हाज़िर हैं 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के महफ़िल की शमा जलाने के लिए। ३० और ४० के दशकों में कुंदन लाल सहगल का कुछ इस क़दर असर था कि उस ज़माने के सभी कलाकार उनके साथ काम करने के लिए एक पाँव पर खड़े रहते थे। और अगर किसी नए कलाकार को यह सौभाग्य प्राप्त हो जाए तो उसके लिए यह बहुत बड़ी बात होती थी। ऐसा ही मौका सुरैया जी को भी मिला जब १९४५ में फ़िल्म 'तदबीर' में उन्हें सहगल साहब के साथ न केवल अभिनय करने का मौका मिला, बल्कि उनके साथ युगल गीत गाने का भी मौका मिला। और क्योंकि सुरैया जी ख़ुद यह मानती थी कि यह उनके लिए एक बहुत बड़ी बात थी, इसलिए हमने सोचा कि सुरैया और सहगल साहब का गाया उसी फ़िल्म का एक युगल गीत इस शृंखला में बजाया जाए। गीत के बोल हैं "मिलने के दिन आ गये"। इस फ़िल्म में संगीत था कमचर्चित संगीतकार लाल मोहम्मद का। उनके बारे में अभी आपको बताएँगे, लेकिन उससे पहले सुनिए सुरैया के शब्दों में सहगल साहब के बारे में, उसी 'जयमाला' कार्यक्रम से - "एक ज़माना था जब मैं फ़िल्मी दुनिया में नहीं आयी थी और उस वक़्त सहगल साहब की फ़िल्मों को बड़े शौक से देखती थी। उनके गानों ने मुझ पर जादू की तरह असर किया था और मैं अकेले में उन्हीं के गीत गाती रहती थी। ये कभी सोचा भी ना था कि उनके साथ मेरी फ़िल्में भी बनेंगी। लेकिन सहगल साहब के साथ मेरी तीन फ़िल्में बनीं - 'तदबीर', 'उमर ख़य्याम', और 'परवाना'। मुझे फ़क्र है कि मैंने उनके साथ काम किया और बहुत कुछ सीखा। एक बार मैंने उनसे पूछा, "सहगल साहब, आप इतना अच्छा कैसे गा लेते हैं?" तो सहगल साहब ने जवाब दिया, "हम जिस गाने को गाते हैं, पहले उसके जज़्बात को समझते हैं, उसकी भावनाओं में डूब जाते हैं और तभी वही भावनाएँ सुरों में ढलकर निकलती हैं"।

और अब कुछ बातें संगीतकार लाल मोहम्मद की। ये बातें हमने बटोरी पंकज राग लिखित किताब 'धुनों की यात्रा' से। लाल मोहम्मद तबले के उस्ताद माने जाते थे और मास्टर ग़ुलाम के भी सहायक रहे थे। जयंत देसाई प्रोडक्शन की सहगल-सुरैया अभिनीत मशहूर फ़िल्म 'तदबीर' का संगीत ख़ूब लोकप्रिय हुआ था और लाल मोहम्मद की सफलतम फ़िल्मों में से एक है। सहगल साहब के गाये इस फ़िल्म के गीतों में "जनम-जनम का दुखिया प्राणी आया शरण तिहारी", "मैं पंछी आज़ाद मेरा कहीं दूर ठिकाना रे", "चाहे तू मिटा दे, चाहे तू बचा ले" और इन सब से बढ़कर राग भीमपलासी पर आधारित 'हसरतें ख़ामोश हैं" तथा बनारसी अंग लिए हुए सम्भवत: राग जौनपुरी पर आधारित "मैं किस्मत का मारा भगवान" ने ख़ूब धूम मचाई थी। सुरैया का "जाग ओ सोने वाले, कोई जगाने आया" और "उड़ने वाले पंछी" भी अच्छे चले थे। इसी फ़िल्म में सुरैया को सहगल के साथ 'रानी खोल दे अपने द्वार' जैसा लोकप्रिय गाना भी गाने का यादगार अवसर मिला था। यह गीत राग देस पर आधारित था। तो आइए, सुनते हैं गुज़रे ज़माने की दो यादगार आवाज़ें, फ़िल्म 'तदबीर' के इस गीत में। गीतकार हैं स्वामी रामानंद।



क्या आप जानते हैं...
कि एक बार जयंत देसाई की फ़िल्म 'सम्राट चन्द्रगुप्त' के एक गीत की रेकॊर्डिंग् में सहगल साहब ने सुरैया को गाते हुए सुना, और अपनी अगली फ़िल्म 'तदबीर' के लिए उन्हें अभिनेत्री चुनने का सुझाव दिया।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 04/शृंखला 09
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - इस फिल्म के निर्देशक थे ए आर कारदार.

सवाल १ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक
सवाल २ - संगीतकार बताएं - १ अंक
सवाल ३ - एक प्रसिद्ध ठुमरी गायिका ने भी इस फिल्म में प्ले बैक किया था जो आज के दौर के एक मशहूर अभिनेता की माँ भी थी, जानते हैं क्या उनका नाम - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अंजाना जी आपको २ अंक मिलते अगर आप दूसरी बार जवाब नहीं देते, अगर आप दूसरे जवाब को डिलीट भी कर देते तो भी ठीक था, पर वास्तव में दो जवाब देकर आपने किसी और का एक अंक छीन लिया, और नियम तो नियम है उसका पालन हमें करना पड़ेगा बेहद दुःख के साथ. चलिए आगे से आपको याद रहेगा.

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Monday, January 31, 2011

तेरा ख्याल दिल से भुलाया न जायेगा....वाकई सुर्रैया को कभी भी भुला नहीं पायेगें हिंदी फिल्म संगीत के रसिक

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 582/2010/282

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों नमस्कार! आज ३१ जनवरी है। आज के ही दिन सन् २००४ में गायिका-अभिनेत्री सुरैया इस दुनिया-ए-फ़ानी को हमेशा के लिए छोड़ कर चली गईं थीं। सुरैया ने गीत गाना ६० के दशक में ही छोड़ दिया था, लेकिन उनकी आवाज़ में कुछ ऐसी बात है कि आज इतने दशकों बाद भी उनके गाये गीतों को हमने अपने कलेजे से लगा रखा है। 'आवाज़' परिवार की तरफ़ से सुरैया जी को हम श्रद्धांजली अर्पित करते हैं और उन्हीं पर केन्द्रित लघु शृंखला 'तेरा ख़याल दिल से भुलाया ना जाएगा' को आगे बढ़ाते हैं। सच ही तो कहा है इस गीत के गीतकार शक़ील बदायूनी ने कि "तेरा ख़याल दिल से भुलाया ना जाएगा, उल्फ़त की ज़िंदगी को मिटाया ना जाएगा"। सुरैया की सुंदरता, अभिनय और गायन, इन तीनों आयामों में ही सुरैया अपने दौर में सब से उपर रहीं। और क्यों ना हो जब उनका नाम ही "सुर" से शुरु होता है! युं तो हर फ़िल्म कलाकार के अपने प्रशंसक होते हैं, 'फ़ैन फ़ॊलोविंग्' होती है, पर अगर कलाकार में रूप के साथ-साथ स्वर का भी संगम हो, बड़ी-बड़ी नशीली आँखों के साथ-साथ शहद जैसी मीठी आवाज़ हो, तो प्रशंसकों और चाहनेवालों की संख्या कई गुणा बढ़ जाती है। धड़कते दिल लिए सिने-प्रेमी भीतर के तरफ़ जैसे खींचे चले जाते हैं, ठीक उसी तरह जैसे सुरैया के ही गाये एक गीत के बोल हैं - "धड़कते दिल की तमन्ना हो, मेरा प्यार हो तुम"। ख़ैर, आज के अंक के लिए सुरैया जी को श्रद्धांजली स्वरूप हमने जो गीत चुना है, वह वही गीत है जो शीर्षक है इस लघु शृंखला का - "तेरा ख़याल दिल से भुलाया ना जाएगा"। १९४९ की फ़िल्म 'दिल्लगी' का यह गीत है, शक़ील साहब के बोल और नौशाद साहब का संगीत।

फ़िल्म 'दिल्लगी' के मशहूर गीत "तू मेरा चांद मैं तेरी चांदनी" से हमने लघु शृंखला 'प्योर गोल्ड' का समापन किया था (अंक-३५०)। इस शुंखला में हमनें ४० के दशक के १० सालों के दस सुपरहिट गीत शामिल किए थे। और १९४९ के साल को रिप्रेज़ेण्ट करने के लिए हमने इस सुरैया - श्याम डुएट को चुना था। 'दिल्लगी' ए. आर. कारदार की फ़िल्म थी और १९४९ में उनकी एक और फ़िल्म 'दुलारी' भी आई थी जिसमें भी शक़ील-नौशाद ने कुछ यादगार रंग भरे। १९४९ का यह साल सुरैया के लिए जितना सुखदायी सिद्ध हुआ, उतना ही सफल रहा नौशाद साहब के लिए भी। 'दिल्लगी' और 'दुलारी' के अलावा महबूब साहब की फ़िल्म 'अंदाज़' और ताजमहल पिक्चर्स की फ़िल्म 'चांदनी रात' के गानें भी ख़ूब चर्चा में रहे। फ़िल्म 'दिल्लगी' के शीर्षक गीत और आज के प्रस्तुत गीत के अलावा भी सुरैय्या के गाए कुछ और बेहद हिट गानें थे इस फ़िल्म में, जैसे कि "मुरलीवाले मुरली बजा सुन सुन मुरली को नाचे जिया", "चार दिन की चांदनी थी फिर अंधेरी रात है", "निराला मोहब्बत का दसतूर देखा", "लेके दिल चुपके से किया मजबूर हाए" और "दुनिया क्या जाने मेरा अफ़साना क्यों गाए दिल उल्फ़त का तराना"। हर गीत में उनका अलग अंदाज़ सुनने को मिला। सुरैया के साथ साथ नौशाद साहब को भी हम सलाम करते हैं जिन्होंने ऐसी ऐसी धुनें बनाईं कि जिनके बारे में आज इतने सालों बाद उल्लेख करते हुए भी अजीब ख़ुशी महसूस हो रही है। दोस्तों, कल हमने शृंखला की शुरुआत की थी कारदार साहब की ही फ़िल्म 'शारदा' के गीत से, जिससे सुरैया जी के फ़िल्मी गायन का शुभारंभ हुआ था, और आगे चलकर सुरैया-कारदार की जोड़ी ने 'दर्द', 'दिल्लगी', 'दास्तान' और 'दीवाना' जैसी चर्चित फ़िल्में हमें दी। तो आइए आज सुरैया की पुण्यतिथि पर उन्हें स्मरण करते हुए सुनते हैं "तेरा ख़याल दिल से भुलाया न जाएगा"। हमें पूरा यकीन है कि आप सब भी इस वक़्त यही सोच रहे होंगे कि वाक़ई सुरैया जी का ख़याल दिल से भुलाया ना जाएगा। 'आवाज़' परिवार की ओर से सुरैया की की स्मृति को श्रद्धा सुमन!



क्या आप जानते हैं...
कि गायिका-अभिनेत्रिओं में सुरैया ने सब से ज़्यादा फ़िल्में की और सब से ज़्यादा गानें गाये।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 03/शृंखला 09
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - ये एक युगल गीत है.

सवाल १ - गीतकार बताएं - १ अंक
सवाल २ - संगीतकार बताएं - २ अंक
सवाल ३ - सह गायक कौन हैं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
वाह मुकाबला दिलचस्प है, अंजाना जी और अमित जी को २-२ अंक मिलेंगें, अवध जी और रोमेंद्र सागर जी सही जवाब लाये हैं बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Sunday, January 30, 2011

पंछी जा पीछे रहा बचपन मेरा....एक कोशिश ओल्ड इस गोल्ड की अमर गायिका सुर्रैया की यादों को ताज़ा करने की

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 581/2010/281

मस्कार! 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों नमस्कार! आज ३० जनवरी, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी का शहीदी दिवस है। आज के इस दिन का हम शहीदी दिवस के रूप में पालन करते हैं। 'आवाज़' परिवार की तरफ़ से हम श्रद्धांजली अर्पित करते हैं इस मातृभूमि पर अपने प्राण न्योचावर करने वाले हर जाँबाज़ वीर को। आज से 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर न केवल एक नई सप्ताह का आग़ाज़ हो रहा है, बल्कि आज से एक नई लघु शृंखला भी शुरु हो रही है। हिंदी फ़िल्मों के पहले और दूसरे दौर में गायक-अभिनेताओं का रिवाज़ हुआ करता था। बहुत से ऐसे सिंगिंग स्टार्स हुए हैं जो न केवल अपने अभिनय से बल्कि अपने गायन से भी पूरी दुनिया पर छा गये। ऐसी ही एक गायिका-अभिनेत्री जिन्होंने जनसाधारण के दिलों पर राज किया, अपने सौंदर्य और सुरीली आवाज़ से लोगों के मनमोर को मतवाला बनाया, जिनके नैनों ने लोगों के छोटे छोटे जिया को चोरी किया, और जिनके गाये गीतों को सुनकर लोगों ने भी स्वीकारा कि उनकी गायकी में एक उम्र तक असर होनेवाली बात है। जी हाँ, हम उसी गायिका अभिनेत्री की बात कर रहे हैं जो ३१ जनवरी २००४ को हमसे जिस्मानी तौर पर हमेशा के लिए जुदा हो गईं। हम बात कर रहे हैं फ़िल्म जगत की सुप्रसिद्ध गायिका-अभिनेत्री सुरैया की। आज से अगले दस अंकों में सुनिए सुरैया के गाये दस यादगार, लाजवाब गीत हमारी नई लघु शृंखला 'तेरा ख़याल दिल से भुलाया ना जाएगा' में। अभिनय और गायन से सुरैया ने युं तो बरसों बरस पहले ही किनारा कर लिया था, लेकिन उनके चाहनेवालों ने उनसे कभी किनारा नहीं किया। युं तो गायन की दुनिया में कई आवाज़ें गूँजती रही हैं और गूँजती रहेंगी, पर सुरैया के गीतों की, उनकी आवाज़ की बात ही कुछ और थी। वो ज़माना जो कभी उनके गाये गीतों पर झूमा करता था, आज उसकी आँखें सुरों की इस मल्लिका की स्मृतिय़ों से भरी हुईं हैं। गुज़रे ज़माने के लगभग सभी दिग्गज संगीतकारों के निर्देशन में सुरैया ने एक से बढ़कर एक गीत गाये हैं, जो आज फ़िल्म संगीत की अनमोल धरोहर बन चुके हैं। दोस्तों, इस शृंखला की शुरुआत हम जिस गीत से करने जा रहे हैं, वह है फ़िल्म 'शारदा' से - जिसमें सुरैया ने सबसे पहला गीत गाया था। गीत के बोल है "पंछी जा, पीछे रहा है बचपन मेरा"। नौशाद का संगीत और डी.एन. मधोक के बोल।

१९४२ में निर्देशक ए. आर. कारदार ने बम्बई में कारदार स्टुडियोज़ की शुरुआत की और पहली फ़िल्म 'शारदा' बनाई जिसके मुख्य कलाकार थे उल्हास और महताब। नौशाद अली भी इसी फ़िल्म से सबकी नज़र में आये और इसी फ़िल्म ने इस इण्डस्ट्री को दिया एक सिंगिंग-स्टार, सुरैया। १३ वर्षीय सुरैया ने इस फ़िल्म में अभिनेत्री महताब के लिए प्लेबैक किया था और गीत था "पंछी जा", जो आज हम सुनने जा रहे हैं। इस गीत को ख़ूब लोकप्रियता मिली थी। सुरैया का जन्म १५ जून १९२९ को लाहोर में हुआ था। उन्हें शिक्षा बम्बई के 'न्यु हाइ स्कूल फ़ॊर गर्ल्स' में हुई। साथ ही साथ घर पर उन्हें फारसी की शिक्षा दी जा रही थी। उनकी फारसी साहित्य और क़ुरान में गहरी रुचि और ज्ञान ने उनकी शख्सियत पर गहरा प्रभाव डाला। १९३७ से ही वे फ़िल्मों में बतौर बालकलाकार काम करने लगी थीं और साथ ही साथ पढ़ाई भी कर रही थीं। और इसी दौरान वे 'ऒल इण्डिया रेडियो' में मदन मोहन, शम्मी कपूर और राज कपूर के साथ बच्चों के लिए कार्यक्रम प्रस्तुत किया करती थीं। इसके बारे में हम इस शृंखला में आगे चलकर आपको विस्तार से बताएँगे। फिलहाल इतना बता दें कि बतौर बाल कलाकार सुरैया ने जिन फ़िल्मों में अभिनय किया, उनमें शमिल हैं - 'उसने क्या सोचा' (१९३७), 'मदर इण्डिया' (१९३८), 'सन ऒफ़ अलादिन' (१९३९), 'अबला' (१९४१), 'ताज महल' (१९४१), 'स्टेशन मास्टर' (१९४२) और 'तमन्ना' (१९४२)। आइए आज १९७१ में रेकॊर्ड किया हुआ विविध भारती के 'विशेष जयमाला' कार्यक्रम का एक अंश यहाँ पढ़ते हैं जिसमें सुरैया बता रही हैं उनके शुरुआती दिनों के बारे में। "जब भी मुझे कुछ कहने का मौका मिलता है तो यादों का एक तूफ़ान उमड़ आता है और मैं उसकी ऊँची-नीची लहरों में खो सी जाती हूँ। इस वक़्त भी यही हालत है, हाँ, याद आया जब मेरी पहली फ़िल्म 'स्टेशन मास्टर' बन रही थी तो नौशाद साहब ने मुझसे एक बच्चों का गीत गवाया था। उस फ़िल्म में भी मैंने एक बच्चे का ही रोल किया था। जब लोगों ने यह गीत सुना और पसंद किया तो फ़िल्म 'शारदा' की हीरोइन महताब के लिए नौशाद साहब ने एक और गीत रेकॊर्ड करवाया, जिसके बोल थे "पंछी जा"। रेकोडिंग् के वक़्त महताब ने देखा कि एक छोटी सी बच्ची स्टूल पर खड़ी होकर उनके लिए गा रही है तो वो बड़ी नाराज़ हुई, मुझ पर नहीं, फ़िल्म बनाने वालों पर। और जब यह गाना हिट हुआ तो उनकी नाराज़गी दूर हो गई और फिर मैंने उनके कई गीत गाये"। तो दोस्तों, इन तमाम यादों के बाद, आइए अब उस गुज़रे ज़माने के इस भूले-बिसरे गीत की यादें ताज़ा करते हैं, सुरैया की कम्सिन आवाज़ में फ़िल्म 'शारदा' से।



क्या आप जानते हैं...
कि फ़िल्म 'शारदा' के इस "पंछी जा" गीत में नौशाद ने मटके के रिदम का प्रयोग कर एक नई बात पैदा कर दी थी फ़िल्म संगीत जगत में।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 01/शृंखला 09
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - १९४९ में आई थी ये फिल्म.

सवाल १ - गीतकार बताएं - २ अंक
सवाल २ - संगीतकार बताएं - १ अंक
सवाल ३ - फिल्म का नाम क्या है - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
दो श्रृंखलाओं पर काबिज हो चुके अमित तिवारी जी ने एक बार फिर शानदार शुरूआत की है, अंजाना जी और रोमेंद्र जी भी सही जवाब के साथ हाज़िर हुए...बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Tuesday, November 9, 2010

दूर पपीहा बोला रात आधी रह गई...सुर्रैया की आवाज़ और कवि गीतकार गोपाल सिंह नेपाली के शब्द

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 523/2010/223

पंडित नरेन्द्र शर्मा और वीरेन्द्र मिश्र के बाद 'दिल की कलम से' शृंखला की तीसरी कड़ी में आज जिस हिंदी साहित्यकार व कवि की चर्चा हम करने जा रहे हैं वो प्रकृति के चितेरे तो थे ही, देश भक्ति का जज्बा भी उनमें कूट कूट कर समाया हुआ था। जी हाँ, हम आज बात कर रहे हैं गोपाल सिंह नेपाली की, जिन्हें हम गीतकार जी. एस. नेपाली के नाम से भी जानते हैं। उनका जन्म बिहार के चम्पारन ज़िले में बेदिया नामक स्थान पर ११ अगस्त १९११ को हुआ था। बालावस्था से ही वे घण्टों एकान्त में बैठकर प्रकृति की सुषमा का आनंद लेते और बाद में इसी प्रकृति से जुड़े कविताएँ लिखने लगे। १९३१ में कलकत्ता में आयोजित अखिल भारतीय कवि सम्मेलन में शामिल होने को वे प्रेरीत हुए, जहाँ पे जाकर साहित्य के कई महान विभुतियों से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। १९३२ में काशी में आचार्य महावीर प्रसाद द्वारा आयोजित एक बहुत बड़े कवि सम्मेलन में कुल ११५ कवि शामिल हुए जिनमें से केवल १५ कवियों को कविता पाठ करने का मौका मिला। और इनमें से एक गोपाल सिंह नेपाली भी थे। उस सम्मेलन में उनकी लिखी कविताओं के रंग ख़ूब जमे। सुधा पत्रिका के सम्पादक दुरारेलाल जी ने उन्हें लखनऊ आकर उनकी पत्रिका में काम करने का निमंत्रण दिया जहाँ पर वे सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' के सहायक बनें। १९३४ में वे दिल्ली चले गए और एक सिने पत्रिका 'चित्रपट' में संयुक्त सम्पादक की नौकरी कर ली। फिर दो साल तक वे रतलाम में 'रतलाम टाइम्स' से जुड़े रहे। १९३९ में वे पटना चले गए। १९४४ का साल गोपाल सिंह नेपाली के जीवन का एक महत्वपूर्ण साल था जब पी. एल. संतोषी, पटेल और रामानन्द ने उन्हें आमन्त्रित किया उनकी फ़िल्मों में गीत लिखने के लिए। और इस तरह से जी. एस. नेपाली के नाम से उनका पदार्पण हुआ फ़िल्म जगत में।

जी. एस. नेपाली एक तरफ़ जहाँ कोमल भावनाओं वाली, प्रकृति प्रेम से ओत-प्रोत कविताएँ लिखते रहे, वहीं दूसरी तरफ़ देश भक्ति की झंझनाती रचनाएँ भी क्या ख़ूब लिखे। उनकी लिखी हुई 'दिल्ली चलो' कविता पर फ़िल्मिस्तान ने 'समाधि' नामक फ़िल्म का निर्माण भी किया। लेकिन आज हम जो गीत चुन लाए हैं वह है एक बड़ा ही कोमल प्रेम गीत, जिसमें एक अंग दर्द का भी छुपा हुआ है। फ़िल्म 'गजरे' का गीत "दूर पपीहा बोला रात आधी रह गई, मेरी तुम्हारी मुलाक़ात बाक़ी रह गई"। सुरैय्या की आवाज़ और अनिल बिस्वास का संगीत। साल १९४८ में अनिल बिस्वास के संगीत निर्देशन में कुल तीन फ़िल्में आई थीं - अनोखा प्यार, गजरे, और वीणा, जिनमें से पहले दो फ़िल्मों के गानें ख़ासा लोकप्रिय हुए थे। 'गजरे' के मुख्य भूमिकाओं में थे सुरैय्या और मोतीलाल। १९४६ में फ़िल्मिस्तान के 'सफ़र' में सफल गीत लिखने के बाद नेपाली जी ने 'गजरे' के गीतों को भी महकाया। उन्होंने यह सिद्ध किया कि बिना उर्दू शब्दों के इस्तेमाल किए शुद्ध हिंदी में भी लोकप्रिय गीत लिखे जा सकते हैं। अनिल दा हमेशा इस बात का ख़याल रखते थे कि जिस तरह के शब्द गीत में हों, उसी तरह से एक्स्प्रेशन भी आने चाहिए। तभी तो इस गीत के पहले शब्द "दूर" को लम्बा खींच कर सुरैय्या से गवाया ताकि वाक़ई यह लगे कि दूर कहीं से पपीहा बोल रहा है। इसी फ़िल्म में कुछ और सुरैय्या के गाए एकल गीत थे जैसे कि "रह रह के तेरा ध्यान रुलाता है क्या करूँ, हर दिल में मुझको तू नज़र आता है क्या करूँ" और "जलने के सिवा और क्या है यहाँ, चाहे दिल हो किसी का या हो दीया"। लेकिन लोकप्रियता के पयमाने पर आज का प्रस्तुत गीत ही सर्वोपरी रहा। तो आइए अब इस सुमधुर गीत का आनंद लेते हैं सुरैय्या की सुरीली आवाज़ में।



क्या आप जानते हैं...
कि नेपाल के राणा के साथ मिलकर गोपाल सिंह नेपाली ने 'हिमालय फ़िल्म्स' की स्थापना की और इस बैनर तले तीन फ़िल्मों का निर्माण किया - 'नज़राना', 'संस्कारी', और 'ख़ुशबू'।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली ०४ /शृंखला ०३
ये है गीत का आरंभिक शेर -


अतिरिक्त सूत्र - आवाज़ है मन्ना दा की.

सवाल १ - किस कवि का जिक्र होगा कल - २ अंक
सवाल २ - इस सफल फिल्म के संगीतकार बताएं - १ अंक
सवाल ३ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
श्याम कान्त जी बढ़त ले चुके हैं मगर अमित जी और शरद जी भी पीछे नहीं हैं. बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Thursday, June 17, 2010

"धड़क धड़क तेरे बिन मेरा जियरा" - दो नामी गायिकाएँ लेकिन उनकी दुर्लभ जोड़ी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 420/2010/120

'ओल्ड इज़ गोल्ड' में हम पिछले नौ दिनों से सुन रहे हैं दुर्लभ गीतों से सजी लघु शृंखला 'दुर्लभ दस'। इन गीतों को सुनते हुए आपने महसूस किया होगा कि ये सभी बेहद कमचर्चित फ़िल्मों के गानें हैं। बस 'बिलवा मंगल' को छोड़ कर बाकी सभी फ़िल्में बॊक्स ऒफ़िस पर असफल रहीं, जिनमें अधिकतर धार्मिक और स्टण्ट फ़िल्में हैं। आपने यह भी महसूस किया होगा कि इन गीतों के गायक भी कमचर्चित गायकों में से ही थे। लेकिन आज इस शृंखला की दसवीं और अंतिम कड़ी के लिए हमने जिस गीत को चुना है, वह गीत है तो दुर्लभ और भूला बिसरा, लेकिन इसमें दो ऐसी आवाज़ें शामिल हैं जिन्होने अपार शोहरत व सफलता हासिल की है अपने अपने करीयर में। इन दोनों गायिकाओं ने असंख्य लोकप्रिय गीत हमें दिए हैं, जिनकी फ़ेहरिस्त इतनी लम्बी है कि अगर हिसाब लगाने बैठें तो न जाने कितने दिन गुज़र जाएँगे। लेकिन अगर आपसे हम यह कहें कि इन दोनों गायिकाओं के साथ में गाए हुए गीतों के बारे में बताइए, तो शायद आप झट से कोई गीत याद ही न कर पाएँ। तभी तो यह जोड़ी एक दुर्लभ जोड़ी है और आज के कड़ी की शान है यह जोड़ी। यह जोड़ी है फ़िल्म संगीत संसार के दो बेहद महत्वपूर्ण आवाज़ों की - सुरैय्या और आशा भोसले की। जी हाँ, इन दोनों ने बहुत ही कम गीत साथ में गाए हैं, और हमने जिस गीत को खोज निकाला है, वह है १९४९ की फ़िल्म 'सिंगार' का - "धड़क धड़क तेरे बिन मेरा जियरा...तेरे बिन चैन न आए रे"। फ़िल्म मे संगीत दिया था ख़ुरशीद अनवर ने, और गानें लिखे थे डी. एन. मधोक, नक्शब जराचवी और शक़ील बदायूनी ने। प्रस्तुत गीत मधोक साहब का लिखा हुआ है। जयराज, मधुबाला व सुरैय्या अभिनीत 'सिंगार' में सुरैय्या की आवाज़ में एकल गीत "नया नैनों में रंग नई ऊँची उमंग जिया बोले मीठी बानी, एक तुम हो साथ दूजे हाथ में हाथ तीजे शाम सुहानी" गीत लोकप्रिय हुआ था। सुरिंदर कौर ने भी इस फ़िल्म में पाँच गीत गाए थे।

संगीतकार ख़ुरशीद अनवर पर 'लिस्नर्स बुलेटिन' पत्रिका में सन् १९८५ के अगस्त महीने के अंक में एक लेख प्रकाशित हुआ था कैयुम अज़ीज़ का लिखा हुआ। उसी लेख का एक अंश आज यहाँ पेश कर रहे हैं। "भारत विभाजन के बाद विशुद्ध व्यावसायिकता को दृष्टिगत रखते हुए पाकिस्तान जा बसने वाले, अपने समय के प्रसिद्ध संगीतकार ख़ुरशीद अनवर का ३० अक्तुबर १९८४ को लाहौर में दुखद निधन हो गया। वे लगभग ७० वर्ष के थे। ख़ुरशीद अनवर ने अपने संगीत जीवन की शुरुआत आल इण्डिया रेडियो के संगीत विभाग में प्रोड्युसर-इन-चार्ज की हैसियत से की थी। फ़िल्मों में संगीत निर्देशक के रूप में पहली बार उन्हें पंजाबी फ़िल्म 'कुड़माई' में सन् १९४१ में संगीत देने का अवसर मिला जिसमें वास्ती, जगदीश, राधारानी, जीवन आदि कलाकारों ने अभिनय किया था। निर्देशक थे जे. के. नन्दा। उनके मधुर संगीत से सजी पहली हिंदी फ़िल्म थी 'इशारा' जो सन् १९४३ में प्रदर्शित हुई थी। फ़िल्म के डी. एन. मधोक लिखित सभी ९ गीतों को सुरैय्या के गाए "पनघट पे मुरलिया बाजे" तथा गौहर सुल्ताना के गाए "शबनम क्यों नीर बहाए" विशेष लोकप्रिय हुए थे। अभिनेत्री वत्सला कुमठेकर ने भी फ़िल्म में दो गीत गाए थे - "दिल लेके दगा नहीं देना" तथा "इश्क़ का दर्द सुहाना"।" ख़ुरशीद अनवर के शुरुआती फ़िल्मों के बारे में हमने आपको जानकारी दी, उनसे जुड़ी कुछ और बातें हम आगे चलकर फिर कभी देंगे जब भी कभी उनका स्वरब्द्ध किया हुआ गीत इस महफ़िल में पेश होगा। फिलहाल वक़्त हो चला है सुरैय्या, आशा भोसले और साथियों के गाए फ़िल्म 'सिंगार' के इस गीत को सुनने का। और इसके साथ ही 'दुर्लभ दस' शृंखला को समाप्त करने की दीजिए हमें इजाज़त, अपनी राय व वि़चारों का हम oig@hindyugm के पते पर इंतज़ार करेंगे। नमस्कार!



क्या आप जानते हैं...
कि पाकिस्तान में ख़ुरशीद अनवर की जो फ़िल्में मशहूर हुईं थीं उनमें शामिल हैं 'ज़हरे-इश्क़', 'घुंघट', 'चिंगारी', 'इंतज़ार', 'कोयल', 'शौहर', 'चमेली', 'हीर रांझा' इत्यादि।।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. इस संगीतकार जोड़ी के एक पार्टनर का जन्मदिन ३० जून को आता है, कौन सी है ये जोड़ी -३ अंक.
२. १९५९ में आई इस फिल्म के इस मशहूर गीत में इन्होने उस वाध्य का प्रमुखता से इस्तेमाल किया था, जिसे बजा कर वो कभी संगीत की दुनिया पे छा गए थे, फिल्म का नाम बताएं - २ अंक.
३. इस युगल गीत में एक आवाज़ मुकेश की है, गीतकार का नाम बताएं - २ अंक.
४. मुखड़े में शब्द है "नज़रें" - गीत के बोल बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
बहुत अच्छे, इंदु जी और शरद जी ने तीन -तीन अंक बाँट लिए, बहुत बढ़िया

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Friday, April 2, 2010

बेताब है दिल दर्द-ए-मोहब्बत के असर से...सुरैया और उमा देवी के युगल स्वरों में ये गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 392/2010/92

'सखी सहेली' की दूसरी कड़ी में आप सभी का एक बार फिर स्वागत है। महिला युगल गीतों की इस शृंखला में कल आप ने ज़ोहराबाई अम्बालेवाली और शमशाद बेग़म का गाया एक बच्चों वाला गाना सुना था। आज हमने जिन दो गायिकाओं को चुना है वे हैं सुरैय्या और उमा देवी। बहुत ही दुर्लभ जोड़ी है, और इस जोड़ी की याद आते ही हमें झट से याद आती है १९४७ की फ़िल्म 'दर्द' का वही सुरीला गीत, याद है ना "बेताब है दिल दर्द-ए-मोहब्बत के असर से, जिस दिन से मेरा चांद छुपा मेरी नज़र से"। बहुत दिनों से आपने यह गीत नहीं सुना होगा, है ना? तो चलिए आज उन पुरानी यादों को एक बार फिर से ताज़ा कीजिए शक़ील बदायूनी के लिखे इस गीत से जिसकी तर्ज़ बनाई थी नौशाद अली ने। फ़िल्म 'दर्द' का निर्माण व निर्देशन किया था अब्दुल रशीद कारदार ने, जिन्हे हम ए. आर. कारदार के नाम से बेहतर जानते हैं। श्याम, नुसरत, मुअव्वर सुल्ताना, सुरैय्या, बद्री प्रसाद, हुस्न बानो, प्रतिमा देवी प्रमुख अभिनीत इस फ़िल्म से ही शक़ील और नौशाद की जोड़ी शुरु हुई थी। इस फ़िल्म के कुछ गीत उमा देवी ने गाए, कुछ सुरैय्या ने, और शमशाद बेग़म की भी आवाज़ थी इस फ़िल्म में। मैं पूरी यक़ीन के साथ तो नहीं कह सकता, लेकिन जितना मैंने जाना है कि इस फ़िल्म में किसी पुरुष गायक की आवाज़ नहीं थी। इस फ़िल्म की जब भी बात चलती है तो सब से पहले उमा देवी का गाया "अफ़साना लिख रही हूँ" गीत ज़हन में आता है। इस गीत को हमने कमचर्चित पार्श्वगायिकाओं पर केन्द्रित शृंखला 'हमारी याद आएगी' में हमने सुनवाया था। इस गीत का फ़िल्मांकन मुनव्वर सुल्तना पर हुआ था। अब क्योंकि इस फ़िल्म में सुरैय्या भी थीं, तो ज़ाहिर है कि उन पर फ़िल्माए गीत उन्होने ही गाए होंगे। आज का प्रस्तुत युगल गीत मुनव्वर सुल्ताना और सुरैय्या पर फ़िल्माया हुआ है, और ऐसा लगता है कि प्रेम त्रिकोण की कहानी रही होगी यह फ़िल्म, और ये दोनों नायिकाएँ अपने अपने दिल की बातें गीत के शक्ल में बयाँ कर रही हैं, लेकिन एक ही पुरुष के लिए। पहला और तीसरा अंतरा उमा देवी ने गाया है जब कि दूसरा अंतरा सुरैय्या की आवाज़ में है। हैरत की बात है कि इन दोनों की आवाज़ों में बहुत ज़्यादा कंट्रास्ट सुनाई नहीं देता इस गीत में। इस गीत की अदायगी जितनी प्यारी है, उतने ही सुंदर हैं शक़ील साहब के बोल, और नौशाद साहब ने भी क्या धुन बनाई है। गाने का जो मूल रीदम है, वह बंगाल के कीर्तन शैली की तरह सुनाई देता है।

१९९१ में उमा देवी विविध भारती पर तशरीफ़ लाई थीं और सुरैय्या के साथ उनके गाए हुए इस गीत को बजाया भी था और इसके बारे में बताया भी था। पेश है उस कार्यक्रम का वह अंश: "मेरे सज्जनों, मैं तुम्हे थोड़ी सी आप बीती सुनाती हूँ। मशहूर हीरोइन सुरैय्या, फ़िल्म स्टार सुरैय्या, हाय हाय हाय हाय, सुरैय्या के साथ मैंने फ़िल्म 'दर्द' का यह गाना गाया था। आप लोग ख़ूब सुनते हैं यह गाना। उसमें मैं भी उनके साथ खड़ी होकर, बिल्कुल उनसे लिपटी खड़ी गा रही थी, "बेताब है दिल दर्द-ए-मोहब्बत के असर से"। इसमे हम दोनों ने अपने अपने गाने की अदायगी की थी, ज़रा सुनिए तो..." और इस गीत के ख़त्म होते ही उमा जी कहती हैं, "क्यों, अच्छा लगा ना? मैं आपको अच्छी लगती हूँ ना? आप भी मुझे बड़े अच्छे लगते हैं। अरे, अगर आप यहीं सामने खड़े होते तो तुम्हे गले से चिपड चिपड कर जाने ही नहीं देती।" दोस्तों, क्योंकि उमा देवी उसके बाद टुनटुन बन चुकी थीं, इसलिए विविध भारती के उस 'जयमाला' कार्यक्रम में उनकी बातों का अंदाज़ टुनटुन जैसा था और जो गानें उन्होने सुनवाए, वो उमा देवी ने सुनवाए। बहुत ही प्रतिभाशाली अदाकारा थीं वो। भली ही गायन में बहुत दूर तक नहीं पहुँचीं, लेकिन अपने हास्य अभिनय से न जाने कितने हज़ारों लाखों लोगों की होठों पर मुस्कान बिखेरा है उन्होने। और किसी के चेहरे पर मुस्कान खिलाने से बेहतर और कोई दूसरी इबादत नहीं हो सकती। दोस्तों, आप सोच रहे होंगे कि हमने केवल उमा देवी के बारे में ही बातें कीं, और सुरैय्या को भूल गए। हम वादा करते हैं कि इसके बाद जिस किसी भी दिन सुरैय्या जी का गाया हुआ कोई गीत सुनवाएँगे, उस दिन उनके जीवन से जुड़ी कुछ और बातें आप तक ज़रूर पहुँचाएँगे, वैसे उनसे जुड़ी बहुत सारी बातें हम पहले भी बता चुके हैं। और क्यों कि आज अभी आप बेताब होंगे इस बेताबी भरे गीत को सुनने के लिए, इसलिए हम आज यहीं रुक जाते हैं, सुनिए यह प्यारा सा गीत।



क्या आप जानते हैं...
कि युं तो लोग यही जानते हैं कि उमा देवी को पहली बार नौशाद साहब ने फ़िल्म 'दर्द' में गवाया था, लेकिन हक़ीक़त यह है कि १९४६ में उमा देवी ने 'वामिक़ अज़रा' नामक एक फ़िल्म में गीत गाया था जिसके संगीतकर थे ए.आर. क़ुरेशी।

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. मुखड़े में शब्द है -"दुनिया", गीत बताएं -३ अंक.
2. दो गायिका बहनों ने गाया है इसे, एक लता है दूसरी का नाम बताएं- २ अंक.
3. निर्माता एस. एम. एस. नायडू की इस फिल्म के संगीतकार बताएं -२ अंक.
4. इस नटखट मस्ती भरी गीत के गीतकार कौन हैं-२ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
क्या बात सब के सब चूके इस बार, पर शरद जी ने फिल्म का नाम सही बताया है, २ अंक जरूर मिलेंगें

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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