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Tuesday, October 26, 2010

राहत साहब के सहारे अल्लाह के बंदों ने संगीत की नैया को संभाला जिसे नॉक आउट ने लगभग डुबो हीं दिया था

ताज़ा सुर ताल ४१/२०१०


विश्व दीपक - सभी दोस्तों को नमस्कार! सुजॊय जी, कैसी रही दुर्गा पूजा और छुट्टियाँ?

सुजॊय - बहुत बढ़िया, और आशा है आपने भी नवरात्रि और दशहरा धूम धाम से मनाया होगा!

विश्व दीपक - पिछले हफ़्ते सजीव जी ने 'टी.एस.टी' का कमान सम्भाला था और 'गुज़ारिश' के गानें हमें सुनवाए।

सुजॊय - सब से पहले तो मैं सजीव जी से अपनी नाराज़गी ज़ाहिर कर दूँ। नाराज़गी इसलिए कि हम एक हफ़्ते के लिए छुट्टी पे क्या चले गए, कि उन्होंने इतनी ख़ूबसूरत फ़िल्म का रिव्यु ख़ुद ही लिख डाला। और भी तो बहुत सी फ़िल्में थीं, उन पर लिख सकते थे। 'गुज़ारिश' हमारे लिए छोड़ देते!

विश्व दीपक - लेकिन सुजॊय जी, यह भी तो देखिए कि कितना अच्छा रिव्यु उन्होंने लिखा था, क्या हम उस स्तर का लिख पाते?

सुजॊय - अरे, मैं तो मज़ाक कर रहा था। बहुत ही अच्छा रिव्यु था उनका लिखा हुआ। जैसा संगीत है उस फ़िल्म का, रिव्यु ने भी पूरा पूरा न्याय किया। चलिए अब आज की कार्यवाही शुरु की जाए। वापस आने के बाद जैसा कि मैं देख रहा हूँ कि बहुत सारी नई फ़िल्मों के गानें रिलीज़ हो चुके हैं। इसलिए आज भी दो फ़िल्मों के गानें लेकर हम उपस्थित हुए हैं। पहली फ़िल्म है 'अल्लाह के बंदे' और दूसरी फ़िल्म है 'नॊक आउट'।

विश्व दीपक - शुरु करते हैं 'अल्लाह के बंदे' से। यह फ़िल्म बाल अपराध विषय पर केन्द्रित है। किस तरह से आज बच्चे गुमराह हो रहे हैं, यही इस फ़िल्म का मुद्दा है। फ़िल्म की कहानी के केन्द्रबिंदु में है दो लड़के जो अपनी ज़िंदगी का पहला मर्डर करते हैं १२ वर्ष की आयु में। उन्हें 'जुवेनाइल प्रिज़न' में भेज दिया जाता है, जहाँ से वापस आने के बाद वो अपने स्लम पर राज करने की कोशिश करते हैं। रवि वालिया निर्मित और फ़ारुक कबीर निर्देशित इस फ़िल्म की कहानी फ़ारुक ने ही लिखी है। १२ नवंबर २०१० को प्रदर्शित होने वाली इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार हैं विक्रम गोखले, ज़ाकिर हुसैन, शरमन जोशी, फ़ारुक कबीर, अतुल कुलकर्णी, और नसीरूद्दीन शाह।

सुजॊय - फ़िल्म के गीत संगीत का पक्ष भी मज़ेदार है क्योंकि इसमें एक नहीं, दो नहीं, बल्कि पाँच संगीतकारों ने संगीत दिया है, जब कि सभी गानें केवल एक ही गीतकार सरीम मोमिन ने लिखे हैं। रवायत तो एक संगीतकार और एक से अधिक गीतकारों की रही है, लेकिन इसमें पासा पलट गया है। भले ही पाँच संगीतकार हैं, लेकिन पूरी टीम को लीड कर रहे हैं चिरंतन भट्ट। बाक़ी संगीतकार हैं कैलाश खेर - नरेश - परेश, तरुण - विनायक, हमज़ा फ़ारुक़ी, और इश्क़ बेक्टर। तो लीजिए फ़िल्म का पहला गीत सुना जाए, चिरंतन भट्ट का संगीत और आवाज़ें हैं हमज़ा फ़ारुक़ी और कृष्णा की।

गीत - मौला समझा दे इन्हें


विश्व दीपक - सूफ़ी रॉक के रंग में रंगा यह गाना था। इस तरह का सूफ़ी संगीत और रॉक म्युज़िक का फ़्युज़न पहली बार सुनने को मिल रहा है। यह गीत आजकल ख़ूब बज रहा है चारों तरफ़ और तेज़ी से लोकप्रियता के पायदान चढ़ता जा रहा है। फ़िल्म के दो प्रमुख चरित्रों पर फ़िल्माया यह गीत फ़िल्म की कहानी को समर्थन देता है। गीत में ऐटिट्युड भी है, मेलडी भी, आधुनिक रंग भी, और आध्यात्मिक अंग भी है इसमें। सरीम मोमिन ने भी अच्छे बोल दिए हैं, जिसमें ग़लत राह पर चलने वालों को सही राह दिखाने की ऊपरवाले से प्रार्थना की जा रही है।

सुजॊय - ऊंची पट्टी पर गाये इस गीत में हमज़ा और कृष्णा ने अच्छी जुगलबंदी की है। इससे पहले कुष्णा का गाया हिमेश रेशम्मिया की तर्ज़ पर फ़िल्म 'नमस्ते लंदन' का गीत मुझे याद आ रहा है, "मैं जहाँ भी रहूँ"। उस गीत में कृष्णा अंतरे में जिस तरह की ऊँची पट्टी पर "कहने को साथ अपने एक दुनिया चलती है, पर छुप के इस दिल में तन्हाई पलती है, बस याद साथ है", और यही वाला हिस्सा इस गीत का आकर्षक हिस्सा है।

विश्व दीपक - आइए अब दूसरे गीत की तरफ़ बढ़ते हैं, यह है कैलाश खेर का गाया "क्या हवा क्या बादल"। संगीत है कैलाश खेर और उनके साथी नरेश और परेश का।

गीत - क्या हवा क्या बादल


सुजॊय - सितार जैसी धुन से शुरू होने वाले इस गीत में एक दर्दीला रंग है। दर्दीला केवल इसलिए नहीं कि जिस तरह से कैलाश ने इसे गाया है या जो भाव यह व्यक्त कर रहा है, बल्कि सबकुछ मिलाकर इस गीत को सुनते हुए थोड़ी सी उदासी जैसे छा जाती है। कैलासा टीम का बनाया यह गीत बिल्कुल उसी अंदाज़ का है। यह फ़िल्म का शीर्षक गीत भी है, और इसी गीत का एक और वर्ज़न भी है जिसकी अवधि है ७ मिनट।

विश्व दीपक - बस कहना है कि इस गीत को सुनकर कैलासा बैण्ड का कोई प्राइवेट ऐल्बम गीत जैसा लगा। लेकिन अच्छे बोल, अच्छा संगीत, कुल मिलाकर अच्छे गीतों की फ़ेहरिस्त में ही शामिल होगा यह गीत। आइए अब मूड को थोड़ा सा बदला जाए और सुना जाए रवि खोटे और फ़ारुक कबीर की आवा्ज़ों में एक छोटा सा गाना "रब्बा रब्बा"। नवोदित संगीतकार जोड़ी तरुण और विनायक की प्रस्तुति, जिसमें है रॉक अंदाज़। ज़्यादा कुछ कहने लायक नहीं है। सुनिए और मन करे तो झूमिए।

गीत - रब्बा रब्बा


सुजॊय - मुझे ऐसा लगता है कि यह गीत और अच्छा बन सकता था अगर इसकी अवधि थोड़ी और ज़्यादा होती। जब तक इस गीत का रीदम ज़हन में चढ़ने लगता है, उसी वक़्त गाना ख़त्म हो जाता है। इसे अगर रॉकक थीम के ऐंगल से सोचा जाए तो उतना बुरा नहीं है, लेकिन गीत के रूप में ज़रा कमज़ोर सा लगता है। चलिए अगले गाने पे चलते हैं और इस बार आवाज़ सुनिधि चौहान की।

विश्व दीपक - एक धीमी गति वाला गीत, कम से कम साज़ों का इस्तेमाल, सुनिधि की गायन-दक्षता का परिचय, कुल मिलाकर यह गीत "मायूस" हमें मायूस नहीं करता। इसमें भी दर्द छुपा हुआ है। वैसे फ़िल्म की कहानी से ही पता चलता है कि नकारात्मक सोच ही फ़िल्म का विषय है, ऐसे में फ़िल्म के गानों में वह "फ़ील गूड" वाली बात कहाँ से आ सकती थी भला! इस गीत को स्वरबद्ध किया है हमज़ा फ़ारुक़ी ने।

सुजॊय - जिस तरह का कम्पोज़िशन है, हर गायक इसे निभा नहीं सकता या सकती। सुनिधि जैसी गायिका के ही बस की बात है यह गीत। चलिए सुनते हैं।

गीत - मायूस


विश्व दीपक - और अब जल्दी से फ़िल्म का अंतिम गाना भी सुन लिया जाए इश्क़ बेक्टर और साथियों की आवाज़ में। "काला जादू हो गया रे", जी हाँ, यही है इस गीत के बोल। सुन कर तुरंत हमें हाल ही में आई फ़िल्म 'खट्टा मीठा' का गीत "बुल-शिट" की याद आ जाती है। आम रोज़ मर्रा की ज़िंदगी से उठाये विषयों को लेकर यह पेप्पी नंबर बनाया गया है।

सुजॊय - ख़ासियत कोई नहीं पर सुनने लायक ज़रूर है। इसका रीदम कैची है जो हमें गीत को अंत तक सुनने पर मजबूर करता है। कुछ कुछ अनु मलिक या बप्पी लाहिड़ी स्टाइल का गाना है। अगर अच्छे और निराले ढंग से फ़िल्माया जाए, तो इस गाने को लम्बे समय तक लोग याद रख सकते हैं। सुनिए...

गीत - काला जादू हो गया रे


सुजॊय - 'अल्लाह के बंदे' जिस तरह की फ़िल्म है, उस हिसाब से इसके गानें अच्छे ही बने हैं। मेरा पिक है "मौला" और "क्या हवा क्या बादल"।

विश्व दीपक - मौला मुझे भी बेहद पसंद आया। सरीम ने सोच-समझकर शब्दों का चुनाव किया है। कोई भी लफ़्ज़ गैर-ज़रूरी नहीं लगता। इस तरह से यह गीत बड़ा हीं सुंदर बन पड़ा है। सच कहूँ तो हिन्दी फिल्मों में सूफ़ी-रॉक सुनकर मुझे बहुत खुशी हुई, लगा कि कुछ तो अलग किया जा रहा है। जहाँ तक "क्या हवा क्या बादल" की बात है तो गीत की शुरूआत में मुझे कैलाश थोड़े अटपटे-से लगे, लेकिन अंतरा आते-आते कैलाश-नरेश-परेश अपने रंग में वापस आ चुके थे। सुनिधि का गाया "मायूस" भी अच्छा बन पड़ा है।

सुजॊय - आइए अब आज की दूसरी फ़िल्म 'नॉक आउट' की तरफ़ बढ़ते हैं। फ़िल्म का शीर्षक सुन कर शायक आप अपनी नाक सिकुड़ लें यह सोच कर कि इस तरह की फ़िल्म मे अच्छे गानों की गुंजाइश कहाँ होती है, है न? अगर आप ऐसा ही कुछ सोच रहे हैं तो ज़रा ठहरिए, इस फ़िल्म में कुल ६ गानें हैं, जिनमें से ३ गानें बहुत सुंदर हैं जबकि बाक़ी के ३ गानें चलताऊ क़िस्म के हैं। इसलिए हम आपको यहाँ पर ३ गानें सुनवा रहे हैं।

विश्व दीपक - 'नॉक आउट' के निर्देशक हैं मणि शंकर, संगीतकार हैं गौरव दासगुप्ता, गानें लिखे हैं विशाल दादलानी, पंछी जालोनवी और शेली ने। फ़िल्म के मुख्य चरित्रों में हैं संजय दत्त, कंगना रनौत, इरफ़ान ख़ान, गुलशन ग्रोवर, रुख़सार, अपूर्व लखिया और सुशांत सिंह।

सुजॊय - संगीतकार गौरव दासगुप्ता का नाम अगर आपकी ज़हन में नहीं आ रहा है तो आपको याद दिला दूँ कि इन्होंने इससे पहले २००७ में 'दस कहानियाँ', २००९ में 'राज़-२' और 'हेल्प' जैसी फ़िल्मों में संगीत दे चुके हैं। देखते हैं 'नॊक आउट' में वो कुछ कमाल दिखा पाते हैं या नहीं। आइए हमारा चुना हुआ पहला गाना सुनिए राहत फ़तेह अली ख़ान की आवाज़ में "ख़ुशनुमा सा ये रोशन हो जहाँ"। गीतकार हैं पंछी जालोनवी।

गीत - ख़ुशनुमा सा ये रोशन हो जहाँ


विश्व दीपक - क्या कोई ऐसी फ़िल्म है जिसमें राहत साहब नहीं गा रहे हैं इन दिनों? लेकिन यह जो गीत था, वह राहत साहब के दूसरे गीतों से अलग क़िस्म का है। हम शायद पिछली बार ही यह बात कर रहे थे कि राहत साहब को अलग अलग तरह के गानें गाने चाहिए ताकि टाइपकास्ट ना हो जाएँ, और उन्होंने इस बात का ख़याल रखना शायद शुरु कर दिया है। जहाँ तक इस गीत का सवाल है, बहुत ही आशावादी गीत है, और पंछी साहब ने अच्छे बोल लिखे हैं। आशावाद, शांति और भाईचारे की भावनाएँ गीत में भरी हुई हैं। संगीत संयोजन भी सुकूनदायक है। गौरव दासगुप्ता का शायद अब तक का सर्वश्रेष्ठ गीत यही है।

सुजॊय - बिल्कुल! और पंछी जालोनवी का ज़िक्र आया तो मुझे उनके द्वारा प्रस्तुत 'जयमाला' कार्यक्रम की याद आ गई जिसमें उन्होंने अपने इस नाम "पंछी" के बारे में कहा था। उन्होंने कुछ इस तरह से कहा था - "फ़ौजी भाइयों, आप सोच रहे होंगे कि इस वक़्त जो शख़्स आप से बातें कर रहा है, उसका नाम पंछी क्यों है। लोग अपनी जाति और मज़हब बदल लेते हैं, मैंने अपने जीन्स (genes) बदल डाले और इंसान से पंछी बन गया (हँसते हुए)। वह ख़याल भी फ़ौज से ही जुड़ा हुआ है। आप लोग बिना किसी भेदभाव के एक साथ दोस्तों की तरह रहते हैं और मक़सद भी एक है, देश की सेवा। पंछियों में भी फ़िरकापरस्ती नहीं होती है। कभी मंदिर में बैठ जाते हैं तो कभी मस्जिद में।"

विश्व दीपक - वाह! बड़े ख़ूबसूरत विचार है जालोनवी साहब के। अच्छा, इसी गीत का एक और वर्ज़न है, जिसे थोड़ा सा बदल कर "ख़ुशनुमा सा वह मौसम" कर दिया गया है, और इस बार आवाज़ है कृष्णा की। इस गीत को भी सुनते चलें, गीत को सुनते हुए आपको फ़िल्म 'लम्हा' के "मादनो" गीत की याद आ सकती है। इस गीत में भी कश्मीरी रंग है, रुबाब और सारंगी के इस्तेमाल से दर्द और तड़प के भाव बहुत अच्छी तरह से उभरकर सामने आया है। एक और ज़रूरी बात कि इस वर्ज़न को पंछी जालोनवी ने नहीं बल्कि शेली ने लिखा है।

सुजॊय - गायक कृष्णा को लोग ज़्यादा याद नहीं करते हैं, उनसे गानें भी कम गवाये जाते हैं, लेकिन मेरा ख़याल है कि उनकी गायकी में वो सब बातें मौजूद हैं जो आजकल के गिने चुने सूफ़ी टाइप के गायकों में मौजूद हैं। भविष्य में इनका भी वक़्त ज़रूर आएगा, ऐसी हमारी शुभकामना है कृष्णा के लिए। और आइए अब इस गीत को सुना जाए।

गीत - ख़ुशनुमा-सा वो मौसम


विश्व दीपक - और अब आज की प्रस्तुति का आठवाँ और अंतिम गीत। 'नॉक आउट' में एक और सुनने लायक गीत है के.के की आवाज़ में, "तू ही मेरी हमनवा मुझमें रवाँ रहा, तू ही मेरे ऐ ख़ुदा साँसों में भी चला"। इस गीत को गौरव ने प्रीतम - के. के स्टाइल के गीत की तरह रूप देने की कोशिश की है। इस गीत में भी सूफ़ी रंग है, मुखड़ा जके "मौला" पे ख़त्म होता है। कम्पोज़िशन भले ही सुना सुना सा लगे, लेकिन अच्छे बोल और अच्छी आवाज़ को पाकर यह गीत कर्णप्रिय बन गया है।

सुजॊय - के.के. की आवाज़ मे एक ताज़गी रहती है जिसकी वजह से उनका गाया हर गीत सुनने में अच्छा लगता है। मुझे नहीं लगता कि के.के. ने कोई ऐसा गीत गाया है जो सुनने लायक ना हो। आइए आज की प्रस्तुति का समापन इस दिलकश आवाज़ से कर दी जाए।

गीत - तू ही मेरी हमनवा


सुजॊय - 'नॉक आउट' के बाक़ी के तीन गीत हैं विशाल दादलानी का गाया फ़िल्म का शीर्षक गीत, सुनिधि चौहान का गाया "जब जब दिल मिले", तथा सुमित्रा और संजीव दर्शन का गाया "गंगुबाई पे आई जवानी"। इन तीनों गीतों में कोई ख़ास बात नहीं है, बहुत ही साधारण, और "गंगुबाई" तो अश्लील है जिसमें गीतकार लिखते हैं "गंगुबाई पे आई जवानी जब से, सारे लौंडे हैरान परेशान तब से"। बेहतर यही होगा कि इन तीनों गीतों को सुने बग़ैर ही पर्दा गिरा दिया जाए।

विश्व दीपक - आपने सही कहा कि तीन हीं गीत सुनने लायक हैं इस फिल्म के, लेकिन अच्छी बात ये है कि ये तीनों गीत बहुत हीं खूबसूरत हैं। राहत साहब के बारे में कोई नया क्या कह सकता है, वे हैं हीं बेहतरीन। मुझे भी यह बात हमेशा खटकती थी(है) कि उन्हें उनके माद्दे जितना मौका नहीं मिल रहा। मैंने उनकी पुरानी कव्वालियाँ सुनी हैं। कुछ सालों पहले तक हिन्दी फिल्मों में भी कव्वालियाँ बनती थीं, जिन्हें साबरी बंधु गाया करते थे अमूमन.. लेकिन अब बनती हीं नहीं। अब बने तो राहत साहब से बढकर कोई उम्मीदवार न होगा। मेरी तो यही चाहत है कि हिन्दी फिल्मों में फिर से ऐसे सिचुएशन तैयार किये जाएँ। राहत साहब के बाद इन कव्वालियों के लिए अगर कॊई सही उम्मीदवार है तो वो हैं कृष्णा.. इनकी आवाज़ में खालिस सूफ़ियाना अंदाज़ है और पुरअसर कशिश भी। आज की दोनों फिल्मों के गानों में वही गाना अव्वल रहा है, जिसमें कृष्णा की गलाकारी का कमाल है। इससे बढकर और किसी गायक को क्या चाहिए होगा! सुजॉय जी, मैं आपका शुक्रिया अदा करना चाहूँगा कि आपकी बदौलत मैंने इन दों नैपथ्य में लगभग खो चुकी फिल्मों के गानें सुनें। उम्मीद करता है कि अगली बार भी आप ऐसी भी कोई फिल्म (फिल्में) लेकर आएँगे। तब तक के लिए इस समीक्षा को विराम दिया जाए। जय हिन्द!

आवाज़ की राय में

चुस्त-दुरुस्त गीत: मौला और खुशनुमा

लुंज-पुंज गीत: काला जादू

Tuesday, October 12, 2010

कैलाश खेर की सूफियाना आवाज़ है "अ फ़्लैट" मे तो वहीं ज़िंदगी से भरे कुछ गीत हैं "लाइफ़ एक्सप्रेस" में

ताज़ा सुर ताल ३९/२०१०


विश्व दीपक - 'ताज़ा सुर ताल' के सभी श्रोताओं व पाठकों को मेरा नमस्कार और सुजॊय जी, आपको भी!

सुजॊय - नमस्कार! विश्व दीपक जी, आज भी हम पिछले हफ़्ते की तरह दो फ़िल्में लेकर हाज़िर हुए हैं। साल के इन अंतिम महीनो में बहुत सी फ़िल्में प्रदर्शित होती हैं, और इसीलिए बहुत से नए फ़िल्मों के गानें इन दिनों जारी हो रहे हैं। ऐसे में ज़रूरी हो गया है कि जहाँ तक सभव हो हम दो दो फ़िल्मों के गानें इकट्ठे सुनवाएँ। आज के लिए जिन दो फ़िल्मों को हमने चुना है, उनमें एक है ख़ौफ़ और मौत के करीब एक कहानी, और दूसरी है ज़िंदगी से लवरेज़। अच्छा विश्व दीपक जी, क्या आप भूत प्रेत पर यकीन रखते हैं?

विश्व दीपक - देखिए, यह एक ऐसा विषय है कि जिस पर घण्टों तक बहस की जा सकती है। बस इतना कह सकता हूँ कि गीता में यही कहा गया है कि आत्मा अजर और अमर है, वह केवल शरीर बदलता रहता है। वैज्ञानिक दृष्टि से इसका क्या एक्स्प्लेनेशन है, यह तो विज्ञान ही बता सकता है।

सुजॊय - चलिए इतन बताइए कि फ़िल्मी आत्माओं के बारे में आपके क्या विचार हैं?

विश्व दीपक - हाँ, यह एक मज़ेदार सवाल आपने पूछा है। एक पुरानी हवेली, धुंद, पूनम का पूरा चाँद, पेड़ों पर सूखी टहनियाँ, सूखे पत्तों की सरसराहट, एक बूढ़ा चौकीदार जिसकी उम्र का अंदाज़ा लगा पाना किसी के बस की बात नहीं, ये सब हॊरर फ़िल्मों की बेसिक ज़रूरतें हैं। फ़िल्मी आत्माएँ रात के ठीक १२ बजे वाक पर निकलती हैं। वैसे आजकल उन्हें बहुत से टी.वी चैनलों पर रोज़ देखा जा सकता है और उन्हें भरपूर काम मिलने लगा है। फ़िल्मी आत्माओं को अपने बालों को बांधना गवारा नहीं होता, उन्हें खुला छोड़ना ही ज़्यादा पसंद है। एक और ख़ास बात यह कि फ़िल्मी आत्माओं को गीत संगीत में ज़बरदस्त रुचि होती है। बड़े ही सुर में गाती हैं, दिन भर घंटों रियाज़ करने के बाद रात १२ बजे ओपन एयर में अपनी गायकी के जल्वे प्रस्तुत करने निकल पड़ती हैं।

सुजॊय - वाह, क्या सही पहचाना है आपने! मैं भी कुछ जोड़ दूँ इसमें? फ़िल्मी और तेलीविज़न आत्माओं का पसंदीदा रंग होता है सफ़ीद। जॊरजेट उनकी पसंदीदा साड़ी है और एक नहीं बहुत सी होती हैं। तभी तो बरसों बरस भटकने के बावजूद हर रोज़ उनकी साड़ी उतनी ही सफ़ेद दिखाई देती है कि जैसे किसी डिटरजेण्ट का ऐड कर रही हों। मोमबत्ती का बड़ा योगदान है इन आत्माओं के जीवन में। आधुनिक रोशनी के सरंजाम उन्हें पसंद ही नहीं है।

विश्व दीपक - सुजॊय, फ़िल्मी आत्माओं की हमने बहुत खिंचाई कर ली, अब इस मज़ाक को विराम देते हुए सीरियस हो जाते हैं और अपने पाठकों को बता देते हैं कि आज की पहली फ़िल्म है 'अ फ़्लैट'। यह लेटेस्ट हॊरर फ़िल्म है अंजुम रिज़्वी की, जिसे निर्देशित किया है हेमन्त मधुकर ने। जिम्मी शेरगिल, संजय सुरी, हज़ेल, कावेरी झा और सचिन खेड़ेकर। बप्पी लाहिड़ी के सुपुत्र बप्पा लाहिड़ी का संगीत है इस फ़िल्म में, और फ़िल्म में गानें लिखे हैं विराग मिश्र ने। तो आइए पहला गाना सुनते हैं कैलाश खेर और सुज़ेन डी'मेलो की आवाज़ों में।

गीत - मीठा सा इश्क़ लगे, कड़वी जुदाई


सुजॊय - "मीठा सा इश्क़ लगे, कड़वी जुदाई, यार मेरा सच्चा लागे, झूठी ख़ुदाई, चांदनी ने तन पे मेरे चादर बिचाई, ओढ़ा जो तूने मुझको सांस लौट आई", विराग मिश्र के ये बोलों में वाक़ई जान है। विराग मिश्र क नाम सुनते ही मुझे यकायक कवि वीरेन्द्र मिश्र की याद आ गई। कहीं ये उनके सुपुत्र तो नहीं! ख़ैर, इन दिनों राहत फ़तेह अली ख़ान की आवाज़ ही ज़्यादा सुनाई दे रही थी, कैलाश खेर कहीं दूर से हो गए थे। बहुत दिनों के बाद इनकी आवाज़ सुन कर अच्चा लगा। कैलाश की आवाज़ में कुछ ऐसी बात है कि सीधे दिल पर असर करती है।

विश्व दीपक - गीत के ओपेनिंग म्युज़िक में सस्पेन्स झलकता है। यानी कि जिसे हम हौंटिंग नोट कहते हैं। सुज़ेन की आवाज़ भी इस गीत के फ़्युज़न मूड के साथ चलती है, और एक सस्पेन्स और हॊरर का अंदाज़ भी उसमें महसूस किया जा सकता है। इस गीत के दो रीमिक्स वर्ज़न भी है, 'अनप्लग्ड' और 'पार्टीमैप मिक्स'।

सुजॊय - आइए अब फ़िल्म का दूसरा गाना सुना जाए जिसे सोनू निगम, तुल्सी कुमार, राजा हसन और अदिती सिंह शर्मा ने गाया है। बोल हैं "दिल कशी"।

गीत - दिल कशी


विश्व दीपक - सोनू निगम का नाम किसी भी ऐल्बम पर देख कर दिल को चैन मिलता है कि चलो कम से कम एक गाना तो इस ऐल्बम में ज़रूर सुनने लायक होगा। और सोनू हर बार सब की उम्मीदों पर खरे उतरते हैं। कशिश भरे गीतों को वो बड़ा ख़ूबसूरत अंजाम देते हैं। और आजकल तो वो चुनिंदे गीत ही गा रहे हैं, इसलिए सुनने वालों की उम्मीदें उन पर लगी रहती हैं और इंतज़ार भी रहता है उनके गीतों का। तुलसी कुमार, जिनसे हिमेश रेशम्मिया ने बहुत से गानें गवाये हैं, उन्हें इस गीत में सोनू के साथ गाने का मौका मिला और उनका पोरशन भी कम नहीं है इस गीत में।

सुजॊय - लेकिन राजा हसन और अदिती सिंह शर्मा को गीत के शुरुआत में ही सुना जा सकता है। गीत की बात करें तो यह पूरी तरह से सोनू का गीत है और उनका जो एक स्टाइल है टिपिकल नशीले अंदाज़ में गाने का, इस गीत में भी वही अंदाज़-ए-बयाँ है। सोनू के इस जौनर के गानें अगर आपको पसंद आते हैं तो यह गीत भी ज़रूर पसंद आयेगा।

विश्व दीपक - फ़िल्म का तीसरा गाना है सुनिधि चौहान, राजा हसन, और बप्पा लाहिड़ी की आवाज़ों में, "चल हल्के हल्के"।

गीत - चल हल्के हल्के


सुजॊय - पूर्णत: सुनिधि चौहान का यह गीत है, राजा और बप्पा ने तो बस सहगायकों की भूमिका निभाई है। एक मस्त गाना जो एक जवान चुलबुली लड़की गाती है जो अपने मन के साथ चलती है और बाहरी दुनिया के किसी चीज़ के बारे में नहीं सोचती। ठीक ठाक गाना है, कोई नयी या ख़ास बात नज़र नहीं आई।

विश्व दीपक - अब तक तीन गानें हमने सुनें, लेकिन कोई भी गाना ऐसा नहीं महसूस हुआ जो एक लम्बी रेस का घोड़ा साबित हो सके। सभी गानें अच्छे हैं, लेकिन वह बात नहीं जिसे सुनने वाले कैच कर ले और गाने को कामयाबी की बुलंदी तक पहुँचाए। लेकिन यह याद रखते हुए कि बप्पा ने अभी अपना करीयर शुरु ही किया है, तो चलिए उन्हें यह मौका तो दे ही दिया जा सकता है। फ़िल्म का अंतिम गीत अब सुनने जा रहे हैं श्रेया घोषाल की आवाज़ में।

सुजॊय - "प्यार इतना ना कर" भी एक प्रेडिक्टेबल ट्रैक है। "ज़रा ज़रा बहकता है" जौनर का गाना है और श्रेया तो ऐसे गानें गाती ही रहती हैं, शायद इसीलिए मैंने "प्रेडिक्टेबल" शब्द का इस्तेमाल किया। चलिए आप ख़ुद ही सुनिए और अपनी राय दीजिए।

गीत - प्यार इतना ना कर


विश्व दीपक - एक बात आपने नोटिस की सुजॊय, कि 'अ फ़्लैट' एक हॊरर फ़िल्म है, लेकिन इसमें कोई भी गीत उस तरह का नहीं है। अब तक जितने भी इस तरह की फ़िल्में बनी हैं, सब में कम से कम एक गीत तो ऐसा ज़रूर होता है जो फ़िल्म के शीर्षक के साथ चलता है। ख़ैर, हॊरर, ख़ौफ़, और मौत के चंगुल से बाहर निकलकर आइए अब हम बैठते हैं 'लाइफ़ एक्स्प्रेस' में।

सुजॊय - 'लाइफ़ एक्स्प्रेस' एक कम बजट फ़िल्म है जिसमें संगीत है रूप कुमार राठौड़ का। इसलिए इस ऐल्बम से कुछ सुरीलेपन की उम्मीद ज़रूर की जा सकती है। संजय कलाटे निर्मित इस फ़िल्म के निर्देशक हैं अनूप दास और गीतकार हैं शक़ील आज़्मी। फ़िल्म के मुख्य कलाकार हैं रितुपर्णा सेनगुप्ता, दिव्या दत्ता, किरण जंगियानी, यशपाल शर्मा। फ़िल्म का पहला गाना सुनते हैं उदित नारायण और श्रेया घोषाल की आवाज़ों में।

गीत - फीकी फीकी सी लगे ज़िंदगी


विश्व दीपक - सुंदर कम्पोज़िशन और एक टिपिकल उदित - अल्का डुएट। माफ़ कीजिएगा, अल्का नहीं, बल्कि अब श्रेया आ गई हैं।

सुजॊय - वैसे श्रेया को पूरा सम्मान देते हुए मैं यह कहना चाहूँगा कि इस गीत में उदित जी के साथ अल्का याज्ञ्निक की आवाज़ ज़्यादा मेल खाती, और जैसे ९० का वह ज़माना भी याद आ जाता!

विश्व दीपक - गीत के बारे में यही कह सकता हूँ कि एक आम रोमांटिक डुएट है, स्वीट ऐण्ड सिम्पल, लेकिन इस तरह के गानें पहले भी बहुत बने हैं। कुछ कुछ 'कोई मिल गया' के शीर्षक गीत की तरह प्रतीत होता है।

सुजॊय - फ़िल्म का दूसरा गीत है स्वयं रूप कुमार राठौड़ की आवाज़ में।

गीत - थोड़ी सी कमी रह जाती है


विश्व दीपक - बहुत ही सुंदर कम्पोज़िशन, दर्द भी है, दर्शन भी है, रोमांस भी है, गीत के बोल ज़रूर "थोड़ी सी कमी रह जाती है" है, लेकिन गीत में कोई भी कमी नज़र नहीं आई।

सुजॊय - वाह, क्या बात कही है आपने! सही में मैं भी रूप कुमार राठौड़ से कुछ इसी तरह के एक गीत की उम्मीद कर रहा था इस ऐल्बम में। संगीत के साथ साथ उन्होंने अपनी आवाज़ से इस गीत को पूर्णता को पहुँचाया है। शायद इसीलिए उन्होंने इसे गाया होगा ताक़ि वो जिस तरह से चाहते थे, उसी तरह का अंजाम इस गीत को मिले।

विश्व दीपक - रूप साहब एक अच्छे गायक तो हैं ही, उन्होंने कुछ फ़िल्मों में इससे पहले भी संगीत दे चुके हैं, जिनमें शामिल हैं - 'वो तेरा नाम था' (२००४), 'मधोशी' (२००४), और 'ज़हर' (२००५)। आइए अब आगे बढ़ा जाए और सुनते हैं जगजीत सिंह की आवाज़ में एक प्रार्थना, "फूल खिला दे शाख़ों पर"।

गीत - फूल खिला दे शाख़ों पर


सुजॊय - बहुत ही गहराई और गंभीर सुनाई दी जगजीत साहब की आवाज़, और इस गीत को ऐसी ही आवाज़ की ज़रूरत थी इसमें कोई शक़ नहीं है। इस गीत के लिए जगजीत सिंह को चुनने के लिए रूप कुमार राठौड़ को दाद देनी ही पड़ेगी। कम से कम साज़ों के इस्तेमाल से इस गीत में और ज़्यादा असर पैदा हो गई है। इस गीत में वायलिन पर जो पीस बार बार आता है, उसी धुन का इस्तेमाल पहले किसी गीत में हो चुका है, लेकिन मुझे बिल्कुल याद नहीं आ रहा कि कौन सा गाना है। शायद अल्का याज्ञ्निक का गाया कोई गाना है।

विश्व दीपक - बोल भी बहुत अच्छे लिखे हैं शक़ील साहब ने। "वक़्त बड़ा दुखदायक है, पापी है संसार बहुत, निर्धन को धनवान बना, निर्बल को बल दे मालिक, कोहरा कोहरा सर्दी है काँप रहा है पूरा गाँव, दिन को तपता सूरज दे रात को कम्बल दे मालिक, बैलों को एक गठरी गाँस इंसानों को दो रोटी, खेतों को भर दे गेहूँ से, काँधों को हल दे मालिक, हाथ सभी के काले हैं, नज़रें सब की पीली हैं, सीना ढाम्प दुपट्टे से सर को आँचल दे मालिक"। ज़िंदगी की बेसिक ज़रूरतों की याचना मालिक से किया जा रहा है इस गीत में। बहुत सुंदर!!!

सुजॊय - और अब आज की प्रस्तुति का अंतिम गीत समूह स्वरों में। यह एक लोरी है, लेकिन कुछ अलग क़िस्म का है। आम तौर पर लोरी में कम से कम साज़ों का इस्तेमाल होता है क्योंकि निंदिया रानी को दावत दी जा रही होती है। लेकिन इस समूह लोरी में रीदम का भी इस्तेमाल किया गया है। सुंदर कम्पोज़िशन है।

विश्व दीपक - "झूले झूले पालना, बन्नी झूले पालना, उड़ ना जाए उड़न खटोला, धीरे से उछालना"। सुनते हैं....

गीत - झूले झूले पालना


सुजॊय - 'अ फ़्लैट' और 'लाइफ़ एक्स्प्रेस' के गानें हमने सुनें। 'अ फ़्लैट' की बात करें, तो एक ही गीत जो मुझे अच्छा लगा वह है कैलाश खेर का गाया "मीठा सा इश्क़ लगे"। और जहाँ तक 'लाइफ़ एक्स्प्रेस' की बात है, इस फ़िल्म के सभी गानें जो हमने सुनें, मुझे अच्छे लगे हैं। जैसा कि आपने कहा था पिछले हफ़्ते, हम रेटिंग का सिल्सिला भी समाप्त करते हैं। लेकिन हम अपने सभी श्रोता व पाठकों से निवेदन कर रहे हैं कि इन नये गीतों को भी सुनें और टिप्पणी में अपनी राय लिखें।

विश्व दीपक - सुजॉय जी, मैंने रेटिंग का सिलसिला समाप्त करने की मांग एक खास वज़ह से की थी। अक्सर ऐसा होता है कि अगर किसी एलबम का एक हीं गाना अच्छा हो तो पूरे एलबम की रेटिंग बहुत नीचे चली जाती है और उस स्थिति में पाठक/श्रोता की नज़र में एलबम का मोल बड़ा हीं कम हो जाता है। अब चूँकि हमारी रेटिंग ३ से ४.५ के बीच हीं होती थी तो जिस एलबम को ३ मिले, वह एलबम बाकियों से निस्संदेह कमजोर होगा। और हम तो कई सारे एलबमों को ३ की रेटिंग दिया करते थे, यानि सब के सब कमजोर। अब कमजोर एलबम पर कौन-सा श्रोता अपना समय नष्ट करना चाहेगा। फिर तो हमारी सारी की सारी मेहनत मिट्टी में हीं मिल गई। हम चाहते थे कि श्रोता अपने विचार रखे, लेकिन विचार तो तब हीं आएँगे ना, जब कोई उन गानों को सुनेगा। बस यही सोचकर मैंने आपसे, सजीव जी से और सभी श्रोताओं से रेटिंग हटाने/हटवाने की दरख्वास्त की थी। आप से और सजीव जी से हरी झंडी पाकर मुझे बहुत खुशी हो रही है। जब मैंने सजीव जी से इस बात का ज़िक्र किया तो उन्होंने मेरी मांग पर मुहर लगाने के साथ-साथ एक सलाह भी दी। उनका कहना था कि अगर हम श्रोताओं को इतना बता दें कि कौन-सा गीत सबसे अच्छा है और कौन-सा सबसे कमजोर तो श्रोताओं को एक सिलसिलेवार ढंग से गीत सुनने में सहूलियत होगी। श्रोता सबसे अच्छा गीत सबसे पहले सुनकर अपने दिन की बड़ी हीं खूबसूरत शुरूआत कर सकता है। मुझे उनका ख्याल बड़ा हीं नेक लगा। और इसी कारण से मैं आज के उन दो गीतों को "चुस्त-दुरुस्त गीत" और "लुंज-पुंज गीत" के तमगों से नवाज़ते हुए नीचे पेश कर रहा हूँ। यह निर्णय मैंने बड़ी जल्दी में ले लिया है, इसलिए सुजॉय जी आपसे और सभी श्रोताओं से मेरा यह आग्रह है कि यह जरूर बताएँ कि रेटिंग हटाकर "आवाज़ की राय में" शुरू करने का निर्णय कितना सही है और कितना गलत। चलिए तो इन्हीं बातों के साथ मैं आज़ की समीक्षा के समाप्त होने की विधिवत घोषणा करता हूँ। अगली कड़ी में फिर से मुलाकात होगी।

आवाज़ की राय में

चुस्त-दुरुस्त गीत: फूल खिला दे शाखों पर

लुंज-पुंज गीत: चल हल्के हल्के

Monday, November 23, 2009

विंटेज इल्लायाराजा का संगीत है "पा" में और अमिताभ गा रहे हैं १३ साल के बालक की आवाज़ में...

ताजा सुर ताल TST (36)

दोस्तो, ताजा सुर ताल यानी TST पर आपके लिए है एक ख़ास मौका और एक नयी चुनौती भी. TST के हर एपिसोड में आपके लिए होंगें तीन नए गीत. और हर गीत के बाद हम आपको देंगें एक ट्रिविया यानी हर एपिसोड में होंगें ३ ट्रिविया, हर ट्रिविया के सही जवाब देने वाले हर पहले श्रोता की मिलेंगें २ अंक. ये प्रतियोगिता दिसम्बर माह के दूसरे सप्ताह तक चलेगी, यानी 5 अक्टूबर से १४ दिसम्बर तक, यानी TST के ४० वें एपिसोड तक. जिसके समापन पर जिस श्रोता के होंगें सबसे अधिक अंक, वो चुनेगा आवाज़ की वार्षिक गीतमाला के 60 गीतों में से पहली 10 पायदानों पर बजने वाले गीत. इसके अलावा आवाज़ पर उस विजेता का एक ख़ास इंटरव्यू भी होगा जिसमें उनके संगीत और उनकी पसंद आदि पर विस्तार से चर्चा होगी. तो दोस्तों कमर कस लीजिये खेलने के लिए ये नया खेल- "कौन बनेगा TST ट्रिविया का सिकंदर"

TST ट्रिविया प्रतियोगिता में अब तक-

पिछले एपिसोड में, सीमा जी आश्चर्य, आप जवाब लेकर उपस्थित नहीं हुई, ३ में से मात्र एक जवाब सही आया और वो भी विश्व दीपक तन्हा जी का, तन्हा जी का स्कोर हुआ १६...दूसरे सवाल में जिन फिल्मों के नाम दिए गए थे उन सबमें सोनू निगम-श्रेया घोषाल के युगल गीत थे, और तीसरे सवाल का जवाब है विविध भारती इंदोर स्टेशन....तो चलिए अब बढ़ते हैं आज के एपिसोड की तरफ


सुजॉय - सजीव, आज का 'ताज़ा सुर ताल' बहुत ही ख़ास है, है न?

सजीव - बिल्कुल सुजॉय, आज हम उस फ़िल्म के चर्चा करेंगे और उस फ़िल्म के गानें सुनेंगे जो आजकल सब से ज़्यादा चर्चा में है और जिसका लोग बेसबरी से इंतेज़ार कर रहे हैं, और जिसमें अमिताभ बच्चन ने एक अद्‍भुत भूमिका निभाई है।

सुजॉय - हमारे पाठक भी समझ चुके होंगे कि हम फ़िल्म 'पा' की बात कर रहे हैं। आजकल टीवी पर प्रोमोज़ आ रहे हैं इस फ़िल्म के जिसमें बिग बी को हम एक बड़े ही हैरतंगेज़ लुक्स में दिख रहे हैं। सजीव, क्या आपको पता है कि इस तरह के लुक्स के पीछे आख़िर माजरा क्या है?

सजीव - मैने सुना है कि यह एक तरह की बीमारी है जिसकी वजह से समय से पहले ही आदमी बूढ़ा हो जाता है। यानी कि यह एक जेनेटिक डिसोर्डर है जिसकी वजह से accelerated ageing हो जाती है।

सुजॉय - अच्छा, तभी अमिताभ बच्चन एक छोटे बच्चे की भूमिका में है जो शक्ल से बूढ़ा दिखता है!

सजीव - बिल्कुल! वो एक १३ साल का बच्चा है जो मानसिक तौर से भी १३ साल का ही है, लेकिन शारीरिक रूप से ५ गुणा ज़्यादा आयु का दिखता है। बावजूद इसके वो एक ख़ुशमिज़ाज बच्चा है। इस फ़िल्म में अभिषेक बच्चन बनें हैं उनके पिता और विद्या बालन बनीं हैं बिग बी की मम्मी। बहुत ही इंटरेस्टिंग् है, क्यों?

सुजॉय - सही है! और इस फ़िल्म को लिखा व निर्देशित किया है आर. बालकी ने। अच्छा सजीव, बातें हम जारी रखेंगे, लेकिन उससे पहले यहाँ पर इस फ़िल्म का एक गीत सुन लेते हैं पहले।

गीत - गुमसुम गुम गुमसुम हो क्यों gumsum gumsum ho kyon (paa)



सजीव - गीत तो हमने सुन लिया, अब इस फ़िल्म के संगीत पक्ष की थोड़ी सी चर्चा की जाए। इस फ़िल्म में संगीत है इलय्याराजा का, जिनकी हाल में 'चल चलें' फ़िल्म आई थी। यह फ़िल्म तो नहीं चली, अब देखना यह है कि 'पा' के गानें लोग किस तरह से ग्रहण करते हैं। वैसे यह जो गीत अभी हमने सुना वह दरअसल एक मलयालम गीत है एस.जानकी की आवाज़ में जिसके बोल हैं -"तुम्बी वा...", ये गीत हालाँकि बेहद पुराना है पर आज भी बड़े शौक से सुना जाता है और इसे वहां एक क्लासिक सोंग का दर्जा हासिल है, चूँकि मैं मलयालम समझता हूँ तो बता दूं "तुम्बी" एक उड़ने वाला कीट होता है जिसे उत्तर भारत में बच्चे "हैलीकॉप्टर" कहते हैं, उसके पंख कुछ ऐसे चलते हैं हैं हैलीकॉप्टर का पंखा....वहाँ इस गीत को नायिका बच्चों को मनाने के लिए गा रही है और यहाँ शायद बच्चे बड़ों को मना रहे हैं...:)

सुजॉय - और इस हिंदी संस्करण में भी वही दक्षिणी फ़्लेवर मौजूद है। कर्नाटक शैली और पाश्चात्य जैज़ के फ़्युज़न का प्रयोग इलय्याराजा ने किया है। इसमें पियानो पर बजाया हुआ एक सुंदर जैज़ सोलो सुना जा सकता है, जो बड़ी ही सरलता से वापस शास्त्रीय रंग में रंग जाता है। कुल मिलाकर कुछ नया सुना जा सकता है। अच्छा, इस गीत में आवाज़ें किनकी है, मैं तो पहचान नहीं पाया।

सजीव - इसे दो युवा गायकों ने गाए हैं, ये हैं भवतारिणी और श्रवण। चलो अब एक समूहगीत सुनते हैं इस फ़िल्म से। जैसे कि मैनें कहा समूहगीत, तो दरसल यह एक बच्चों का ग्रूप सॊंग् है। वायलिन ही मुख्य साज़ है और एक प्रार्थना की तरह सुनाई देता है।

गीत - हल्के से बोले कल के नज़ारे...halke se bole..(paa)



सुजॉय - सचमुच it was short and sweet! अच्छा सजीव, इस फ़िल्म में अमिताभ बच्चन ने भी एक गीत गाया है। क्यों ना उस गीत को अब यहाँ सुन लिया जाए!

सजीव - ज़रूर, यही तो इस फ़िल्म का सब से अनोखा गीत है। इस गीत में बच्चन साहब एक ऐसे छोटे बच्चे की तरह आवाज़ निकालते हैं जो इस तरह की बीमारी से पीड़ित है। बच्चन साहब के क्या कहने, वो जो भी करते हैं पूरे पर्फ़ेक्शन के साथ करते हैं, जिसके उपर कुछ भी समालोचना फीकी ही लगती है।

सुजॉय - वाक़ई, इस गीत में उन्होने कुछ ऐसे एक्स्प्रेशन्स और जज़्बात भरे हैं कि सुनने वाला हैरान रह जाता है। यह फ़िल्म का शीर्षक गीत है और इस गीत की चर्चा में इसके संगीत या संगीत संयोजन के बारे में चर्चा निरर्थक है। यह गीत पूरी तरह से बिग बी का गीत है। दिल को छू लेने वाला यह गीत एक नेरेशन की तरह आगे बढ़ता जाता है।

सजीव - और गीतकार स्वानंद किरकिरे के बोल भी उतने ही असरदार! चलो सुनते हैं, हमारे श्रोता भी इसे सुनने के लिए अब बेताब हो रहे होंगे!

गीत - मेरे पा...mere paa (paa)



सुजॉय - वाह! सचमुच क्या गाया है बच्चन साहब ने!

सजीव - और अब आगे बढ़ते हुए हम आते हैं इस फ़िल्म के सब से महत्वपूर्ण गीत की तरफ़। यह है शिल्पा राव की आवाज़ में 'उड़ी उड़ी हाँ उड़ी मैं फिर उड़ी इत्तीफ़ाक़ से"।

सुजॉय - यही गीत शान की आवाज़ में भी है जिसमें है "गली मुड़ी"। शिल्पा राव वाला गीत ग्लैमरस है और रीदम भी तेज़ है, जब कि शान वाला वर्ज़न कोमल है और रीदम भी स्लो है। शान ने इस तरह का गीत शायद पहले नहीं गाया होगा। कुल मिलाकर अच्छी धुन है।

सजीव - तो फिर चलो, आज सुनिता राव वाला वर्ज़न सुनते हैं।

गीत - उड़ी उड़ी हाँ उड़ी मैं इत्तीफ़ाक़ से... udi udi main udi (paa)



सजीव - वैसे मुझे ये फिल्म के बाकी गीतों से मूड और मिजाज़ में बहुत अलग सा लगा....कुछ बहुत मज़ा मज़ा नहीं आया... खैर अब आज का आख़िरी गीत। इस फ़िल्म में सुनिधि चौहान ने एक गीत गाया है "हिचकी हिचकी"। इलय्याराजा की धुनें हमेशा ही कुछ अलग हट के होता आया है। और इस गीत को पूरा का पूरा उन्होने रूपक ताल पर बनाया है।

सुजॉय - सिर्फ़ संगीत ही नहीं, इसके बोलों में भी काफ़ी कारीगरी की है स्वानंद किरकिरे ने। और सुनिधि की आवाज़ का बहुत ही अलग इस्तेमाल इलय्याराजा साहब ने किया है। सुनिधि ने अपनी आवाज़ को बहुत दबाकर गाया है। आमतौर पर हम उनकी जिस तरह की बुलंद आवाज़ से वाक़िफ़ हैं, उससे बिल्कुल ही अलग आवाज़ इस गीत में सुनाई देता है। कुल मिलाकर एक अच्छा गीत है। लेकिन सजीव, एक बात भी है, क्योंकि इस फ़िल्म की कहानी बिल्कुल ही अलग है, यानी कि ग़ैर-पारंपरिक है, इसलिए इस तरह के फ़िल्मों में जो गानें होते हैं वो बहुत ज़्यादा हिट नहीं होते हैं, लेकिन फ़िल्म बहुत कामयाब रहती है। फ़िल्म की कहानी इतनी ज़्यादा मज़बूत होती है कि लोगों का ध्यान फ़िल्म के गीतों से ज़्यादा फ़िल्म पर ही टिकी रहती है।

सजीव - चलो यह तो वक़्त ही बताएगा कि यह फ़िल्म ज़्यादा चली या कि इसके गानें। अब हम सुन लेते हैं इस फ़िल्म का पाँचवाँ और इस पेशकश का अंतिम गाना।

गीत - हिचकी हिचकी...hichki hichki (paa)



और अब समय है ट्रिविया का ....

TST ट्रिविया # 31- 'पा' के अतिरिक्त आर. बालकी ने अमिताभ बच्चन को और किस फ़िल्म में डिरेक्ट किया था?

TST ट्रिविया # 32- फ़िल्म 'पा' के निर्देशक आर. बालकी का पूरा नाम क्या है?

TST ट्रिविया # 33- इलय्याराजा उनका असली नाम नहीं है। उनके नाम के साथ 'राजा' शब्द उनके एक संगीत शिक्षक ने जोड़ा था तथा बाद में 'इलय्याराजा' नाम तमिल के एक फ़िल्म निर्देशक ने रखा था। बताइए उस संगीत शिक्षक और उस तमिल फ़िल्म निर्देशक के नाम।


"पा" अल्बम को आवाज़ रेटिंग ***
अल्बम का मुख्य आकर्षण अमिताभ की आवाज़ में "मेरे पा" गीत ही है, "गुमसुम गुमसुम" एक सुरीली मेलोडी है....पर बोल उतने प्रभावी नहीं है....कुल मिला कर अल्बम औसत ही है....और फिल्म की सफलता पर ही संगीत की सफलता निर्भर है.

आवाज़ की टीम ने इस अल्बम को दी है अपनी रेटिंग. अब आप बताएं आपको ये गीत कैसे लगे? यदि आप समीक्षक होते तो प्रस्तुत अल्बम को 5 में से कितने अंक देते. कृपया ज़रूर बताएं आपकी वोटिंग हमारे सालाना संगीत चार्ट के निर्माण में बेहद मददगार साबित होगी.

शुभकामनाएँ....



अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं. क्या आप को भी आजकल कोई ऐसा गीत भा रहा है, जो आपको लगता है इस आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए तो हमें लिखे.

Monday, August 31, 2009

फ़िक्र करे फुकरे....मिका ने दिया खुश रहने का नया मन्त्र

ताजा सुर ताल (18)

ताजा सुर ताल में आज सुनिए प्रीतम और जयदीप सहानी का रचा ताज़ा हिट गीत

सजीव - सुजॉय, कभी कभी मन करता है कि कुछ ऐसे मस्ती भरे गीत सुनें की सारे गम और फ़िक्र दूर हट जाएँ...क्या आपका भी मन होता है ऐसा कभी...

सुजॉय - पंजाबी धुन और बोलों से सजे ढेरों गीत है ऐसे हिंदी फिल्मों में जिसमें मस्ती जम कर भरी है...."नि तू रात खड़ी थी छत पे कि मैं समझा कि चाँद निकला", "ये देश है वीर जवानों का", "नि मैं यार मनाना नी चाहे लोग बोलियाँ बोले", और हाल के बरसों में तो जैसे हिट गीत बनाने का फ़ार्मूला जैसे बन गया है पंजाबी संगीत का आधार.

सजीव - बिल्कुल! 'जब वी मेट' के "मौजा ही मौजा" और "नगाड़ा नगाड़ा" के बाद तो जैसे पंजाबी लोक धुनों के साथ रीमिक्स फ़िल्म संगीत पर छा सा गया है।

सुजॉय - 'जब वी मेट' से याद आया सजीव कि इन दिनों शाहीद कपूर के नए फ़िल्म की प्रोमो ज़ोर शोर से हर चैनल पर चल रहा है।

सजीव - कहीं तुम्हारा इशारा 'दिल बोले हड़िप्पा' की तरफ़ तो नहीं?

सुजॉय - बिल्कुल! शाहीद और पंजाबी धुनों का तो जैसे चोली दामन का साथ रहा है। 'जब वी मेट' के अलावा बरसों पहले आयी फ़िल्म 'फ़िदा' में भी एक गीत था "अज वे माही लेट्स डू बल्ले बल्ले" जो काफ़ी चला था।

सजीव - सुजॉय, ऐसे थिरकते नग़में भले ही बहुत लम्बी रेस के घोड़े न हों, लेकिन जब फ़िल्म रिलीज़ होती है तो ऐसे गानें फ़िल्म को प्रोमोट करने में काफ़ी हद तक सहायक होते हैं। कुछ दिनों के लिए ही सही लेकिन ये गानें लोगों की ज़ुबान पर चढ़ते हैं और फ़िल्म को भी कामयाब बनाते हैं। और फ़िल्म निर्माण एक कला होने के साथ साथ व्यवसाय भी है, इसलिए इस पक्ष को भी नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता।

सुजॉय - ख़ैर! आज हम बात कर रहे हैं 'दिल बोले हड़िप्पा' की। पहली बार रानी मुखर्जी और शाहीद कपूर की जोड़ी बनी है, और इस फ़िल्म से लोगों को काफ़ी सारी उम्मीदें भी हैं।

सजीव - सुजॉय, क्या तुम्हे 'हड़िप्पा' शब्द का अर्थ पता है?

सुजॉय - अब तक तो पता नहीं था, लेकिन क्योंकि मैं चंडीगढ़ में रहता हूँ, इसलिए मेरे काफ़ी सारे पंजाबी दोस्त हैं, जिन्होने मुझे बताया कि 'हड़िप्पा' का क्या मतलब है। दरसल 'हड़िप्पा' भंगड़ा में इस्तेमाल होने वाला एक शब्द है, ठीक वैसे ही जैसे 'बल्ले बल्ले' का इस्तेमाल होता है। जिस तरह से 'बल्ले बल्ले' का अर्थ होता है 'hurray', उसी तरह से 'हड़िप्पा' का अर्थ होता है 'bravo'! 'चक दे' भी कुछ कुछ इसी तरह का शब्द है।

सजीव - वाह! ये तो तुमने बड़ी अच्छी जानकारी दी। वैसे मैने सुना है कि पहले इस फ़िल्म का नाम सिर्फ़ 'हड़िप्पा' सोचा गया था। लेकिन बाद में फ़िल्म के निर्माता आदित्य चोपड़ा को पता चला कि 'हड़िप्पा' शीर्षक संजय लीला भंसाली ने पहले से ही अपने नाम दर्ज कर चुके हैं। इसलिए इसे बदल कर 'दिल बोले हड़िप्पा' कर दिया गया।

सुजॉय - यह तो बड़ी नई बात पता चली। इसका मतलब यह कि भंसाली जी की भी फ़िल्म आने वाली है 'हड़िप्पा'। अच्छा सजीव, इससे पहले कि हम आज के गीत जो कि है इस फ़िल्म का शीर्षक गीत, सुनवाएँ, क्या आप को कोई ऐसा हिंदी फ़िल्मी गीत याद आ रहा है जिसमें 'हड़िप्पा' शब्द का इस्तेमाल हुआ था?

सजीव - बिल्कुल सुजॉय, मुझे कम से कम एक गीत तो ज़रूर याद है। लता जी और किशोर दा ने ज़ीनत अमान और देव आनंद की फ़िल्म 'वारैंट' में एक गीत गाया था "लड़ी नजरिया लड़ी, चली रे फुलझड़ी, पड़ी शुभ घड़ी, ये घड़ी खड़ी है हाथों में लिए प्रेम हथकड़ी, हड़िप्पा लड़ी हड़िप्पा लड़ी"।

सुजॉय - बिल्कुल, मैं भी इसी गीत की ओर इशारा कर रहा था। अब आइए बात करते हैं 'दिल बोले हड़िप्पा' के टाइटल गीत की। मिका सिंह, सुनिधि चौहान और साथियों का गाया यह गीत है। जयदीप साहनी ने लिखा है। सजीव, जयदीप साहनी आज के दौर के एक ऐसे फ़िल्म लेखक और गीतकार हैं जो इस पीढ़ी के चंद अग्रणी लेखकों में से एक हैं।

सजीव - हाँ, प्रसून जोशी के बाद तो मुझे जयदीप ही ऐसे हैं जो कहानी, संवाद, स्क्रीनप्ले और साथ ही गीतकारिता भी बाख़ूबी निभा रहे हैं। क्या तुम जयदीप के करीयर की महत्वपूर्ण फ़िल्मों के बारे में कुछ बता सकते हो?

सुजॉय -सन् २००० में 'जंगल', २००२ में 'कंपनी' जैसी फ़िल्में लिख कर जयदीप का काफ़ी नाम हो गया था। लेकिन सब से ज़्यादा ख्याति उन्हे जिन तीन फ़िल्मों से मिली, वो फ़िल्में हैं सन् २००५ की 'बण्टी और बबली' (स्क्रीनप्ले व संवाद), २००६ का 'खोंसला का घोंसला' (कहानी, स्क्रीनप्ले व संवाद), २००७ की सुपरहिट फ़िल्म 'चक दे इंडिया' (कहानी, गीतकार)। इन सब के अलावा 'आजा नचले', 'ब्लफ़ मास्टर', 'जॉनी ग़द्दार' और 'रब ने बना दी जोड़ी' में उनके लिखे गानें ख़ूब पसंद किए गए। और अब 'दिल बोले हड़िप्पा'।

सजीव - इस गीत के बोल हैं "भूल फ़िकरा, है जिगरा, तो संग मेरे बोल हड़िप्पा"।

सुजॉय - यानी कि अगर जिगरवाले हो तो सब फ़िक्र छोड़ कर मेरे साथ साथ बोल 'हड़िप्पा'। मैनें इस फ़िल्म की कहानी पढ़ी है, लेकिन मैं यहाँ नहीं बताउँगा क्योंकि जो लोग थियटर में जा कर इस फ़िल्म को देखने की सोच रहे हैं वो शायद मुझ से नाराज़ हो जाएँ, और होना भी चाहिए।

सजीव - इस फ़िल्म के संगीतकार हैं प्रीतम, जो कि इस तरह के पंजाबी धुनों के लिए जाने जाते हैं। जब भी कोई फ़िल्म निर्माता उन्हे अपनी फ़िल्म के साइन करवाते हैं तो उनसे इस तरह का एक गीत ज़रूर बनवा लेते हैं। पता है प्रीतम जब विविध भारती पर इन्टरव्यू देने के लिए आए थे तो उन्होने उसमें कहा था कि जब 'जब वी मेट' के बाद वो पंजाब गए तो वहाँ बैनर पर उनका नाम लिखा गया था 'प्रीतम सिंह'। लोग अक्सर भूल जाते हैं कि इस तरह का चुस्त पंजाबी धुनें बनाने वाले संगीतकार प्रीतम सिंह नहीं बल्कि बंगाली बाबूमोशाय प्रीतम चक्रबर्ती हैं।

सुजॉय - तो चलिए, अब देर किस बात की, सुनते हैं 'दिल बोले हड़िप्पा', जो आज कल लोगों के होठों की शान बना हुआ है।

सजीव - बोलों में बहुत ही गूढ़ पंजाबी भाषा का इस्तेमाल हुआ है. मुझे और सुजॉय दोनों को पंजाबी तो नहीं आती है, इसलिए यदि प्रस्तुत बोलों में कोई गलती रह गयी हो तो हमें बताएं -

दुनिया फिरंगी स्यापा है,
फ़िक्र ही गम का पापा है,
अपना तो बस ये जापा है
फ़िक्र करे फुकरे,
चुन्गम है चब्बी जा,
हैण्ड पम्प है डब्बी जा,
लाइफ का जूस कड्डी जा,
फ़िक्र करे फुकरे,
खुश रहने का नहीं लगता कोई टैक्स ओये रब्बा,
ओये भूल फिकरा है जिगरा, तो संग मेरे बोल हडिप्पा,
ओये भूल फिकरा है जिगरा, तो संग मेरे बोल हडिप्पा...

कोठी न माल हडिप्पा,
न गोरे गाल हडिप्पा,
नहीं जाने तेरे नाल, चाहे जितना संभाल,
छड़ मिटटी डाल हडिप्पा,
खुशियाँ तू घर कर ले,
हाथ दोनों विच भर ले,
अरे खब्बा हो या सज्जा, (कोई इसके माने बताएं हमें :)

नज़रों से बोल हडिप्पा,
कोई जो कोल हडिप्पा,
न करी ज्यादा गोल मोल,
तेरी खुल जानी पोल,
ये दिल का ढोल हडिप्पा,
डर्बी हो या ढाका,
रब तेरा हो राखा,
पड़ने दे तू टिप्पा (कोई इस लाइन के माने भी बताएं )

ओये भूल फिकरा...

और अब सुनिए ये गीत -



आवाज़ की टीम ने दिए इस गीत को 3 की रेटिंग 5 में से. अब आप बताएं आपको ये गीत कैसा लगा? यदि आप समीक्षक होते तो प्रस्तुत गीत को 5 में से कितने अंक देते. कृपया ज़रूर बताएं आपकी वोटिंग हमारे सालाना संगीत चार्ट के निर्माण में बेहद मददगार साबित होगी.

क्या आप जानते हैं ?
आप नए संगीत को कितना समझते हैं चलिए इसे ज़रा यूं परखते हैं.किस नयी फिल्म में जावेद अख्तर और शंकर एहसान लॉय की जोड़ी लौटी है, कौन सी है वो जल्द आने वाली फिल्म? बताईये और हाँ जवाब के साथ साथ प्रस्तुत गीत को अपनी रेटिंग भी अवश्य दीजियेगा.

पिछले सवाल का सही जवाब दिया विश्व दीपक तनहा जी, बधाई. आप सब श्रोताओं का रेटिंग देने के लिए बहुत बहुत आभार.


अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं. क्या आप को भी आजकल कोई ऐसा गीत भा रहा है, जो आपको लगता है इस आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए तो हमें लिखे.

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