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Sunday, May 11, 2014

एक समृद्ध तंत्रवाद्य सुरबहार


स्वरगोष्ठी – 167 में आज


संगीत वाद्य परिचय श्रृंखला – 5


तंत्रवाद्य सुरबहार से उपजते गम्भीर और गमकयुक्त सुरों की बहार

 



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी ‘संगीत वाद्य परिचय श्रृंखला’ की पाँचवीं कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, अपने सहयोगी सुमित चक्रवर्ती के साथ सभी संगीतानुरागियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, इस लघु श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के कुछ कम प्रचलित, लुप्तप्राय अथवा अनूठे वाद्यों की चर्चा कर रहे हैं। वर्तमान में प्रचलित अनेक वाद्य हैं जो प्राचीन वैदिक परम्परा से जुड़े हैं और समय के साथ क्रमशः विकसित होकर हमारे सम्मुख आज भी उपस्थित हैं। कुछ ऐसे भी वाद्य हैं जिनकी उपयोगिता तो है किन्तु धीरे-धीरे अब ये लुप्तप्राय हो रहे हैं। इस श्रृंखला में हम कुछ लुप्तप्राय और कुछ प्राचीन वाद्यों के परिवर्तित व संशोधित स्वरूप में प्रचलित वाद्यों का उल्लेख करेंगे। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम आपसे एक ऐसे स्वरवाद्य की चर्चा करेंगे जिसका प्रचलन अब लगभग नहीं के बराबर हो रहा है। आज के सर्वाधिक प्रचलित तंत्रवाद्य सितार से विकसित होकर बना ‘सुरबहार’ वाद्य अब लगभग अप्रचलित सा होकर रह गया है। ‘स्वरगोष्ठी’ के आज के अंक में ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के हमारे साथी लेखक और सहयोगी सुमित चक्रवर्ती लुप्तप्राय तंत्रवाद्य सुरबहार पर चर्चा कर रहे हैं। 
 



उस्ताद इमरत खाँ 
‘परिवर्तन संसार का नियम है’- इस उक्ति को प्रायः हम सब सुनते हैं और प्रयोग भी करते रहते हैं। इस सृष्टि में शायद ही कोई ऐसी रचना हो जिसमें कभी परिवर्तन न आया हो। हमारे आदिकालीन भारतीय संगीत में समय-समय पर कई प्रकार के परिवर्तन होते रहे हैं। संगीत के गायन पक्ष के साथ-साथ वाद्य संगीत भी कई प्रकार के परिवर्तनों से होकर ग़ुज़रता रहा है। वैदिक काल के अनेक तंत्रवाद्य विकसित होकर आज भी प्रचलित हैं। सुरबहार की तंत्रवाद्य श्रेणी के अन्तर्गत गणना की जाती है। वर्तमान में बेहद लोकप्रिय तंत्रवाद्य सितार स्वयं इम्प्रोवाइज़ किया हुआ वाद्य है। परन्तु सितार को भी इम्प्रोवाइज़ कर सुरबहार नामक वाद्य की रचना की गई थी। यूँ तो माना जाता है कि सुरबहार वाद्य का विकास 1825 में सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ उस्ताद इमदाद खाँ के पिता उस्ताद साहेबदाद ख़ाँ ने की थी। परन्तु कई जगहों पर इसके सर्जक के रूप में लखनऊ के सितार वादक उस्ताद ग़ुलाम मुहम्मद का भी उल्लेख पाया जाता है। सुरबहार के तारों पर आघात कर इसे बजाया जाता है। सितार की तरह इसमें स्वरों के परदे होते हैं। इस वाद्य की ऊँचाई लगभग 130 सेंटीमीटर होती है। इसमें चार तार स्वर के, चार तार चिकारी के और 15 से 17 तक अनुकम्पी स्वरों के तार लगाए जाते हैं। इसे धातु के तार से बने शंक्वाकार मिज़राब से बजाया जाता है। वादक अपने दाहिने हाँथ की तर्जनी उँगली में मिज़राब पहन कर सुरबहार के तारों को झंकृत करते हैं। सुरबहार तथा सितार में मूल अन्तर यह है कि सुरबहार को नीचे के नोट्स पर बजाया जाता है। इसी कारण इसे 'बेस सितार' (Bass Sitar) भी कहा जाता है। इसके अतिरिक्त सितार के मुक़ाबले इसका तल भाग थोड़ा चपटा होता है तथा इसके तार भी सितार से भिन्न थोड़े मोटे होते हैं। अपनी इसी बनावट के कारण इससे निकलने वाली ध्वनि गमक से युक्त होती है। सुरबहार की रचना के पीछे मूल उद्देश्य था- पारम्परिक रुद्रवीणा वाद्य के सर्वथा अनुकूल ध्रुपद शैली में आलाप को प्रस्तुत करना। इस वाद्य पर ध्रुपद अंग में आलाप, जोड़ और झाला का वादन अत्यन्त भावपूर्ण अनुभूति कराता है। कुशल वादक पहले सुरबहार पर आलाप, जोड़ और झाला वादन करते हैं, फिर गत बजाने के लिए सितार वाद्य का प्रयोग करते हैं। आइए, अब हम आपको इमदादखानी घराने के सुरबहार और सितार के सुप्रसिद्ध वादक उस्ताद इमरत खाँ का सुरबहार पर बजाया राग यमन कल्याण में आलाप, जोड़ और झाला सुनवाते है।


सुर बहार वादन : राग - यमन कल्याण : आलाप, जोड़ और झाला : उस्ताद इमरत खाँ




पण्डित शिवमाथ मिश्र और देवव्रत मिश्र 
उस्ताद इमरत खान सुरबहार और सितार के विश्वविख्यात वादक हैं। खाँ साहब इमदादखानी अर्थात इटावा घराने का प्रतिनिधित्व करते हैं। सुप्रसिद्ध सितार वादक उस्ताद विलायत खाँ इनके बड़े भाई थे। इमरत खाँ ने अनेक वर्षों तक अपने अग्रज के साथ युगल वादन भी किया है। इनके पिता उस्ताद इनायत खाँ (1894-1938) और दादा उस्ताद इमदाद खाँ (1848-1920) ने सुरबहार वादन की विकसित परम्परा को स्थापित किया था। मैहर घराने के संस्थापक उस्ताद अलाउद्दीन खाँ की सुपुत्री और पण्डित रविशंकर की पहली पत्नी विदुषी अन्नपूर्णा देवी भी सुरबहार की कुशल कलासाधिका रही हैं। सेनिया घराने के उस्ताद मुश्ताक खाँ को सुरबहार पर ध्रुपद अंग के उत्कृष्ट वादक के रूप में ख्याति मिली थी। उनका सुरबहार वादन सुनने वालों को लगभग रुद्रवीणा जैसे स्वरों की अनुभूति कराती थी। पिछली आधी शताब्दी में कुछ गुणी कलासाधकों ने सुरबहार को अपनाया और बेहतर प्रयोग किये। संगीतज्ञों ने इस वाद्य को दो शैलियों में बजाया, एक तो पारम्परिक ध्रुपद अंग से और दूसरा, गतकारी अंग से। दुर्भाग्यवश कई कारणों से सुरबहार अन्य तंत्रवाद्यों की तरह लोकप्रिय नहीं हो सका। शायद इसका सबसे प्रमुख कारण है, इसकी विशाल बनावट, जिसके कारण इसे सम्भालने में और यातायात में असुविधा होती है। अब हम आपको सुरबहार पर ध्रुपद अंग की एक तालबद्ध रचना सुनवाते हैं, जो युगलवादन रूप में प्रस्तुत किया गया है। उत्तर भारतीय संगीत का एक प्रमुख केन्द्र वाराणसी भी है। यहाँ भी तंत्रवाद्य की समृद्ध परम्परा रही है। वाराणसी स्थित सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के पूर्व संगीत विभागाध्यक्ष पण्डित शिवनाथ मिश्र और उनके प्रतिभावान सुपुत्र देवव्रत मिश्र ने युगल रूप में सुरबहार वादन प्रस्तुत किया है। आप सुरबहार पर राग जैजैवन्ती, धमार ताल में सुनिए और हमें आज के इस अंक को यहीं विराम लेने की अनुमति दीजिए।


युगल सुर बहार वादन : राग – जैजैवन्ती : धमार ताल में गत : पण्डित शिवनाथ मिश्र और देवव्रत मिश्र





आज की पहेली


स्वरगोष्ठी’ के 167वें अंक की संगीत पहेली में आज आपको लगभग छः दशक पुराने एक फिल्मी गीत में बजाए गए लोकवाद्य वादन का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 170वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – संगीत के इस अंश को सुन कर इस स्वरवाद्य को पहचानिए और हमें उसका नाम लिख भेजिए।

2 – वाद्य संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह किस फिल्म के गीत का अंश है? फिल्म का नाम हमें लिख भेजिए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 169वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 165वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको लोक-ताल-वाद्य नक्कारा वादन का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- नक्कारा अथवा नगाड़ा और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- आठ मात्रा का कहरवा ताल। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी, हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी और चंडीगढ़ के हरकीरत सिंह ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात



मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’के मंच पर जारी श्रृंखला ‘संगीत वाद्य परिचय’ के अन्तर्गत आज हमने आपका परिचय एक कम प्रचलित तंत्र वाद्य सुरबहार से कराया। अगले अंक में हम आपसे एक लोकवाद्य पर चर्चा करेंगे। आप भी यदि ऐसे किसी संगीत वाद्य की जानकारी हमारे बीच बाँटना चाहें तो अपना आलेख अपने संक्षिप्त परिचय के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के ई-मेल पते पर भेज दें। अपने पाठको / श्रोताओं की प्रेषित सामग्री प्रकाशित / प्रसारित करने में हमें हर्ष होगा। आगामी श्रृंखलाओं के लिए आप अपनी पसन्द के कलासाधकों, रागों या रचनाओं की फरमाइश भी कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करेंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-प्रेमियों की हमें प्रतीक्षा रहेगी। 




शोध एवं आलेख : सुमित चक्रवर्ती 
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 
  

Wednesday, September 26, 2012

रबिन्द्र संगीत (पहला भाग) - एक चर्चा संज्ञा टंडन के साथ

प्लेबैक इंडिया ब्रोडकास्ट (१४)

रबिंद्रसंगीत एक विशिष्ट संगीत पद्धति के रूप में विकसित हुआ है। इस शैली के कलाकार पारंपरिक पद्धति में ही इन गीतों को प्रस्तुत करते हैं। बीथोवेन की संगीत रचनाओं(सिम्फनीज़) या विलायत ख़ाँ के सितार की तरह रबिंद्रसंगीत अपनी रचनाओं के गीतात्मक सौन्दर्य की सराहना के लिए एक शिक्षित, बुद्धिमान और सुसंस्कृत दर्शक वर्ग की मांग करता है। १९४१ में गुरूदेव की मृत्यु हो गई परन्तु उनका गौरव और उनके गीतों का प्रभाव अनन्त है। उन्होंने अपने गीतों में शुद्ध कविता को सृष्टिकर्त्ता, प्रकृति और प्रेम से एकीकृत किया है। मानवीय प्रेम प्रकृति के दृश्यों में मिलकर सृष्टिकर्त्ता के लिए समर्पण (भक्ति) में बदल जाता है। उनके 2000 अतुल्य गीतों का संग्रह गीतबितान(गीतों का बागीचा) के रूप में जाना जाता है। (पूरा टेक्स्ट यहाँ पढ़ें )

आईये आज के ब्रोडकास्ट में शामिल होईये संज्ञा टंडन के साथ, रविन्द्र संगीत पर इस चर्चा के पहले भाग में. स्क्रिप्ट है सुमित चक्रवर्ती की और आवाज़ है संज्ञा टंडन की   
या फिर यहाँ से डाउनलोड करें

Sunday, September 4, 2011

वे (रवीन्द्रनाथ ठाकुर) असाधारण गीतकार तथा संगीतकार थे - माधवी बंद्योपाध्याय

सुर संगम - 33 -रवीन्द्रनाथ ठाकुर की सार्द्धशती वर्ष-२०११ पर श्रद्धांजलि (पहला भाग)


बांग्ला और हिन्दी साहित्य की विदुषी श्रीमती माधवी बंद्योपाध्याय से कृष्णमोहन मिश्र की रवीन्द्र साहित्य और उसके हिन्दी अनुवाद विषयक चर्चा
त कर देना शीश को प्रभु, चरण कमल रज के तल में।

मेरे अहं को सतत डुबोना, मेरे वचन अश्रु-जल में।




‘सुर संगम’ का आज का अंक हमने कविगुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर की एक कविता के हिन्दी अनुवाद से किया है।‘गीतांजलि’ के इस पद का हिन्दी काव्यानुवाद विदुषी माधवी बंद्योपाध्याय ने किया है। १२ सितम्बर, १९३७ को उत्तर प्रदेश के अयोध्या में एक प्रवासी बंगाली परिवार में माधवी जी का जन्म हुआ था। पारिवारिक संस्कार और स्वाध्याय से उन्होने बांग्ला भाषा और साहित्य का गहन अध्ययन किया। अँग्रेजी विषय में उन्होने स्नातक तक शिक्षा ग्रहण की। माधवी जी को बाल्यावस्था से कविता, कहानी, निबन्ध आदि लिखने में पर्याप्त रुचि थी। विवाह के उपरान्त पति श्री दिलीप कुमार बनर्जी के सहयोग और प्रोत्साहन से बांग्ला और हिन्दी की मौलिक तथा अनूदित कृतियाँ एक के बाद एक प्रकाशित होती रहीं। अब तक माधवी जी की लगभग डेढ़ दर्जन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। हमारे आग्रह पर माधवी दीदी ने‘सुर संगम’के लिए रवीन्द्र-संगीत, साहित्य और उनके हिन्दी अनुवाद पर चर्चा करने की सहर्ष सहमति दी। हम उनके प्रति आभार प्रकट करते हुए इस बातचीत का सिलसिला आरम्भ करते हैं।



कृष्णमोहन- आदरणीया माधवी दीदी, नमस्कार! और‘सुर संगम’के मंच पर आपका हार्दिक स्वागत है। यद्यपि यह स्तम्भ शास्त्रीय, उपशास्त्रीय और लोक संगीत पर केन्द्रित है किन्तु इस अंक में हम रवीन्द्रनाथ ठाकुर के १५० वें जयन्ती वर्ष के उपलक्ष्य में रवीन्द्र संगीत के साथ-साथ उनके समग्र साहित्य पर आपसे चर्चा करेंगे।



माधवी दीदी- नमस्कार! कृष्णमोहन जी आपको और ‘सुर संगम’के सभी पाठकों का आभार प्रकट करती हूँ कि आपने मुझे विश्वकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर की सार्द्धशती वर्ष में उनको श्रद्धांजलि अर्पण करने का अवसर दिया।



कृष्णमोहन- माधवी जी, आपने रवीन्द्र साहित्य का न केवल गहन अध्ययन किया है, बल्कि उनकी अनेक कृतियों का हिन्दी अनुवाद भी किया है। सर्वप्रथम हमें यह बताएँ कि विश्वकवि और उनका साहित्य आपकी दृष्टि में किस प्रकार उल्लेखनीय है?



माधवी दीदी- विश्वकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर आज हमारे बीच सशरीर उपस्थित नहीं हैं, किन्तु उनकी पवित्र आत्मा सदा हमारे बीच विद्यमान है। वह हमारी अन्तरात्मा के साथ इस प्रकार घुलमिल गए हैं कि अब उन्हें स्वयं से अलग करना सम्भव नहीं है। वायु-प्रकाश सदैव हमारे साथ लिप्त रहते हैं। उनके बिना हम एक पल नहीं जी सकते। हम उन्हें हर समय अनुभव नहीं करते है फिर भी ये दोनों तत्व अनजाने में ही हमारे साथ बने रहते हैं। कविगुरु भी इसी प्रकार अनजाने में सदा हमारे मन में विद्यमान रहते हैं। यद्यपि हम उन्हें हर समय स्मरण नहीं करते हैं पर, वह हमारे मन में इस प्रकार बसे हुए है कि हम उन्हें कभी भूलते भी नहीं हैं। रवीन्द्रनाथ को हम एक शब्द में महामानव कह सकते हैं। उनके गुणों की परिधि की विशालता उनके ६ विराट कर्मकाण्ड तथा उनकी विविधता के बारे में हम निर्वाक होकर केवल सोचते ही रहते है।



एक तरफ है उनकी साहित्यिक कृतियों के अन्तर्गत- कथा साहित्य में उपन्यास, लघुकथाएँ, प्रबन्ध आदि अत्यन्त रोचक है। नाट्य साहित्य में उनके नाटक, नृत्य नाटिकाएँ वास्तव में मनोगुग्धकारी है। कविताओं की जितनी प्रशंसा करें, कम हैं। ‘गीतांजलि’ में उन्होंने नोबेल पुरस्कार प्राप्त किया था, जो हर भारतवासी के लिये गर्व की बात है। रवीन्द्रनाथ का प्रबन्ध अपनी एक अलग गभ्भीरता रखता है। यदि उनके संगीत के बारे में कहा जाय तो वह रस और भाव से भरा हुआ है। वे असाधारण गीतकार तथा संगीतकार थे। स्वयं गीत लिखते थे और स्वयं ही उसकी स्वरलिपि बनाते थे। रवीन्द्र संगीत का एक अलग ही वैशिष्ट्य होता है। गाने से पूरे परिवेश में वह सुर छा जाता है। गीत सुनकर ही पता चल जाता है कि वह रवीन्द्र संगीत है।




कृष्णमोहन- इससे पहले कि हम आपसे रवीन्द्र संगीत की विशेषताओं के बारे में कुछ और प्रश्न करें, हम अपने पाठकों/श्रोताओं को रवीन्द्रनाथ ठाकुर की ही आवाज़ में कुछ काव्य-पंक्तियाँ सुनवाना चाहते हैं।



माधवी दीदी- अवश्य सुनवाइए कृष्णमोहन जी, स्वयं कविगुरु की आवाज़ में उन्हीं की कविता को सुनना मेरे लिए भी दुर्लभ क्षण होगा।



कविता का शीर्षक ‘प्रोश्नों’ : स्वर – रवीन्द्रनाथ ठाकुर





माधवी दीदी- इस आवाज़ को सुनवा कर आपने मेरे कानों को तृप्त कर दिया। अब मैं आपके प्रश्न का उत्तर देने का प्रयास करती हूँ। रवीन्द्र संगीत में ऐसी विशेषताएँ होती हैं कि इसे भारतीय संगीत के क्षेत्र में एक अलग विधा के रूप में मान्यता भी प्राप्त हो चुकी है। रवीन्द्र संगीत, स्वर तथा भाव प्रधान होता है और सादगी में सुन्दरता इसकी विशेषता है। रवीन्द्रनाथ अपने संगीत को तान-तरानों से नहीं सजाते थे। वाद्य संगति में भी सादगी होती है। मात्र स्वर और ताल के लिए एक-एक वाद्य संगति के लिए पर्याप्त होता है। खुले हुए कण्ठ में रवीन्द्र संगीत गाना चाहिए। काव्य के भावों के अनुकूल रागों का चयन और स्वर के साथ-साथ अपनी आत्मा को संतुष्टि देना ही इस संगीत का वैशिष्ट्य है। गाते समय केवल कण्ठ का ही नहीं बल्कि आत्मा की आवाज भी सुनाई देती है। रवीन्द्र संगीत कई पर्वों में विभाजित है। प्रकृति पर्व, प्रेम पर्व, पूजा पर्व, देशात्मबोधक संगीत, भानु सिंह की पदावलि इत्यादि उनके संगीत की विविधता है। एक और विशेषता यह है कि उनका प्रेमपर्व और पूजापर्व मानों एक ही साथ घुल-मिल गया है। यदि वे गीत में प्रेमी को सम्बोधित करते है तो ऐसा प्रतीत होता है कि वह ईश्वर के उद्देश्य से बोल रहे है। ईश्वर ही उनका प्रेमी है।



इसके साथ ही कविगुरु प्रकृति-प्रेमी थे। प्रत्येक ऋतु के अनुकूल उन्होंने गीत रचना की है। वर्षा ऋतु पर उनके सबसे अधिक गीत हैं। उनका मानना था कि वर्षा ऋतु का प्रभाव सीधे मनुष्य के मन पर पड़ता है। बरसात की ध्वनि में जो विविधता होती है वह व्यक्ति की मानसिकता पर अलग-अलग प्रभाव का विस्तार करती है। कभी प्रेम तो कभी विरह जगाता है, कभी मन उदास होकर दूर आसमान में उड़ने लगता है, कभी-कभी वर्षा की ध्वनि मनुष्य को बावरा सा बना देता है, उसे घर में, या फिर किसी काम में मन नहीं लगता है। उन्होंने वर्षा ऋतु पर बहुत सारे गीत लिखे और भाष्य के साथ ‘वर्षामंगल’ नामक धारा-भाष्य लिखा है। ‘ऋतुरंग’ उनका दूसरा धारा-भाष्य है।



कृष्णमोहन- माधवी दी’ आपने अभी ‘वर्षामंगल’ की चर्चा की है। यहाँ थोड़ा विराम लेकर हम रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कालजयी रचना ‘वर्षामंगल’ का एक ऋतु आधारित गीत अपने पाठकों/श्रोताओं को सुनवाते हैं।



रवीन्द्र संगीत : "एसो श्यामलो सुन्दरो..." (वर्षामंगल) : स्वर – आशा भोसले





दोस्तों, इस गीत के साथ आज के अंक को यहीं विराम देता हूँ। ‘सुर संगम’ के अगले अंक में भी हम रवीन्द्र साहित्य की विदुषी माधवी वंद्योपाध्याय से की गई यह चर्चा जारी रखेंगे। आप सभी संगीत प्रेमियों की हमें अगले रविवार को प्रतीक्षा रहेगी।



संलग्न चित्र परिचय :- भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद् द्वारा आयोजित कार्यक्रम में व्याख्यान/प्रदर्शन करती हुई श्रीमती माधवी बंद्योपाध्याय.



प्रस्तुति - सुमित चक्रवर्ती

आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

Sunday, July 24, 2011

सुर संगम में आज - सगीत शिरोमणि कुमार गन्धर्व

सुर संगम - 30 - पंडित कुमार गंधर्व

वे अपने गायन में छोटे-छोटे व सशक्त टुकड़ों व तानों के प्रयोग के लिए जाने जाते थे परंतु कैंसर से जूझने के कारण उनकी गायकी में काफ़ी प्रभाव पड़ा

"मोतिया गुलाबे मरवो... आँगना में आछो सोहायो
गेरा गेराई चमेली... फुलाई सुगंधा मोहायो..."


उपरोक्त पंक्तियाँ हैं एक महान शास्त्रीय गायक की रचना के| एक ऐसा नाम जिसे शास्त्रीय भजन गायन में सर्वोत्तम माना गया है, कुछ लोगों का मानना है कि वे लोक संगीत व भजन के सर्वोत्तम गायक थे तो कुछ का मानना है कि उनकी सबसे बहतरीन रचनाएँ हैं उनके द्वारा रचित राग जिन्हें वे ६ से भी अधिक प्रकार के ले व तानों को मिश्रित कर प्रस्तुत करते थे| मैं बात करा रहा हूँ महान शास्त्रीय संगीतज्ञ पंडित कुमार गंधर्व की जिन्हें इस अंक के माध्यम से सुर-संगम दे रहा है श्रद्धांजलि|

कुमार गंधर्व का जन्म बेलगाम, कर्नाटक के पास 'सुलेभवि' नामक स्थान में ८ अप्रैल १९२४ को हुआ, माता-पिता ने नाम रखा ' शिवपुत्र सिद्दरामय्या कोमकलीमठ'| उन्होंने संगीत की शिक्षा उन दिनों जाने-माने संगीताचार्य प्रो. बी. आर. देवधर से ली| बाल्यकाल से ही संगीत में असाधारण प्रतिभा दिखाने के कारण उन्हें 'कुमार गंधर्व' शीर्षक दिया गया - भारतीय पुराणों में गंधर्व को संगीत का देवता माना गया है| उन्होंने १९४७ में भानुमति कांस से विवाह किया तथा देवास, मध्य प्रदेश चले गये| कुछ समय पश्चात वे बीमार रहने लगे तथा टीबी की चिकित्सा शुरू की गयी| चिकित्सा का कोई असर न होने पर उन्हें पुनः जाँचा गया और उनमें फेफड़े का कैंसर पाया गया| कुमार अपने परिवार के अनुनय पर सर्जरी के लिए मान गये जबकि उन्हें भली-भाँति बता दिया गया था की संभवत: सर्जरी के बाद वे कभी न गा सकेंगे| सर्जरी के बाद उनके एक प्रशंसक उनसे मिलने आए जो एक चिकित्सक भी थे| जाँचने पर उन्होंने पाया कि कुमार के सर्जरी के घाव भर चुके हैं तथा उन्हें गायन प्रारंभ करने की सलाह दी| प्रशंसक डाक्टर की चिकित्सा व आश्वासन तथा पत्नी भानुमति की सेवा से पंडित गंधर्व स्वस्थ हो उठे तथा उन्होंने गायन पुनः प्रारंभ किया| तो ये थी बातें पंडित गंधर्व के व्यक्तिगत जीवन की, उनके बारे में और जानने से पहले लीजिए आपको सुनाते हैं उनके द्वारा प्रस्तुत राग नंद में यह सुंदर बंदिश|

राजन अब तो आजा रे - बंदिश(राग नंद)


स्वस्थ होने के पश्चात कुमारजी ने अपनी पहली प्रस्तुति दी वर्ष १९५३ में| इससे पहले वे अपने गायन में छोटे-छोटे व सशक्त टुकड़ों व तानों के प्रयोग के लिए जाने जाते थे परंतु कैंसर से जूझने के कारण उनकी गायकी में काफ़ी प्रभाव पड़ा, वे उस समय के दिग्गज जैसे पं. भिमसेन जोशी की भाँति उन ऊँचाईयो को तो न छू सके परंतु अपने लिए एक अलग स्थान अवश्य बना पाए| शास्त्रीय गायन के साथ-साथ उन्होंने कई और भी प्रकार के संगीत जैसे निर्गुणी भजन तथा लोक गीतों में अपना कौशल दिखाया जिनमें वे अलग अलग रागों की मिश्रित कर, कभी धीमी तो कभी तीव्र तानों का प्रयोग कर एक अद्भुत सुंदरता ले आते थे| आइए सुनें उनके द्वारा प्रस्तुत ऐसे ही एक निर्गुणी भजन को जिसे उन्होंने गाया है राग भैरवी पर, भजन के बोल हैं - "भोला मन जाने अमर मेरी काया..."|

भोला मन जाने अमर मेरी काया - भजन (राग भैरवी)


पंडित गंधर्व का गायन विवादास्पद भी रहा| विशेष रूप से उनकी विलंबित गायकी की कई दिग्गजों ने, जिनमें उनके गुरु प्रो. देवधर भे शामिल थे, ने निंदा की| १९६१ में उनकी पत्नी भानुमति का निधन हो गया, उनसे कुमार को एक पुत्र हुआ| इसके पश्चात उन्होंने देवधर की ही एक और छात्रा वसुंधरा श्रीखंडे के साथ विवाह किया जिनके साथ आयेज चलकर उन्होंने भजन जोड़ी बनाई| कुमारजी को वर्ष १९९० में पद्म-भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया गया| दुर्भाग्यपूर्ण, १२ जनवरी ११९२ को ६७ वर्ष की आयु में उनका देहांत हो गया परंतु पंडित जी अपने पीछे छोड़ गये अपनी रचनाओं की एक बहुमूल्य विरासत| आइए उन्हें नमन करते हुए तथा इस अंक को यहीं विराम देते हुए सुने उनके द्वारा गाए इस वर्षा गीत को इस वीडियो के माध्यम से|
वर्षा गीत


और अब बारी है इस कड़ी की पहेली की जिसका आपको देना होगा उत्तर तीन दिनों के अंदर इसी प्रस्तुति की टिप्पणी में। प्रत्येक सही उत्तर के आपको मिलेंगे ५ अंक। 'सुर-संगम' की ५०-वीं कड़ी तक जिस श्रोता-पाठक के हो जायेंगे सब से अधिक अंक, उन्हें मिलेगा एक ख़ास सम्मान हमारी ओर से।

पहेली: यह पारंपरिक लोक संगीत शैली उत्तर-प्रदेश में वर्षा ऋतु के समय गायी जाती है|

पिछ्ली पहेली का परिणाम: अमित जी को बधाई| क्षिति जी कहाँ ग़ायब हैं???

अब समय आ चला है आज के 'सुर-संगम' के अंक को यहीं पर विराम देने का। आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आई होगी। हमें बताइये कि किस प्रकार हम इस स्तंभ को और रोचक बना सकते हैं!आप अपने विचार व सुझाव हमें लिख भेजिए oig@hindyugm.com के ई-मेल पते पर। शाम ६:३० बजे कृष्णमोहन जी के साथ 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल में पधारना न भूलिएगा, नमस्कार!

प्रस्तुति - सुमित चक्रवर्ती


आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

Sunday, July 17, 2011

सुर संगम में आज - सुर बहार की स्वरलहरियाँ

सुर संगम - 29 - सुर-बहार

दुर्भाग्यपूर्वक, कई कारणों से सुर-बहार अन्य तंत्र वाद्यों की तरह लोकप्रिय नहीं हो सका। इसका सबसे प्रमुख कारण है इसकी विशाल बनावट जिसके कारण इसे संभालना व इसके यातायात में बाधा आती है।

शास्त्रीय तथा लोक संगीत को समर्पित साप्ताहिक स्तम्भ 'सुर-संगम' के सभी श्रोता- पाठकों का मैं, सुमित चक्रवर्ती हार्दिक स्वागत करता हूँ हमारे २९वें अंक में। हम सबने कहीं न कहीं, कभी न कभी, किसी न किसी को यह कहते अवश्य सुना होगा कि "परिवर्तन संसार का नियम है।" इस जगत में ईश्वर की शायद ही कोई ऐसी रचना हो जिसमें कभी परिवर्तन न आया हो। इसी प्रकार संगीत भी कई प्रकार के परिवर्तनों से होकर ग़ुज़रता रहा है तथा आज भी कहीं न कहीं किसी रूप में परिवर्तित किया जा रहा है तथा भारतीय शास्त्रीय संगीत भी इस परिवर्तन से अछूता नहीं रहा है। न केवल गायन में बल्कि शास्त्रीय वाद्यों में भी कई इम्प्रोवाइज़ेशन्स होते आए हैं। सुर-संगम के आज के अंक में हम चर्चा करेंगे ऐसे ही परिवर्तन की जिसने भारतीय वाद्यों में सबसे लोकप्रिय वाद्य 'सितार' से जन्म दिया 'सुर बहार' को।

यूँ तो माना जाता है कि सुर-बहार की रचना वर्ष १८२५ में सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ उस्ताद इम्दाद ख़ाँ के पिता उस्ताद साहेबदाद ख़ाँ ने की थी; परंतु कई जगहों पर इसके सृजक के रूप में लखनऊ के सितार वादक उस्ताद ग़ुलाम मुहम्मद का भी उल्लेख पाया जाता है। इसमें तथा सितार में मूल अंतर यह है कि सुर-बहार को नीचे के नोट्स पर बजाया जाता है। इसी कारण इसे 'बेस सितार' (bass sitar) भी कहा जाता है। इसके अतिरिक्त सितार के मुक़ाबले इसका तल भाग थोड़ा चपटा होता है तथा इसकी तारें भी सितार से भिन्न थोड़ी मोटी होती हैं। अपनी इसी बनावट के कारण इससे निकलने वाली ध्वनि का वज़न अधिक होता है। सुर-बहार की रचना के पीछे मूल लक्ष्य था पारंपरिक रूद्र-वीणा जैसी ध्रुपद शैली के आलाप को प्रस्तुत करना। चलिए सुर-बहार के बारे में जानकारी आगे बढ़ाने से पहले क्यों न इस प्रस्तुति को सुना जाए जिसमें आप सुनेंगे पं. रवि शंकर की प्रथम पत्नी अन्नपूर्णा देवी को सुर-बहार पर राग खमाज प्रस्तुत करते हुए|

अन्नपूर्णा देवी - सुर-बहार - राग खमाज


सुर-बहार को दो शैलियों में बजाया जाता है - पारंपरिक ध्रुपद शैली और, सितार शैली। पारंपरिक ध्रुपद शैली में सुर-बहार के सबसे उत्कृष्ट वादक माना जाता है सेनिया घराने के उस्ताद मुश्ताक़ ख़ाँ को। उनका सुर-बहार वादन सुनने वालों लगभग रूद्र-वीणा जैसा ही जान पड़ता है। सितार शैली में इसके दिग्गज माना जाता है उस्ताद इम्दाद ख़ाँ(१८४८-१९२०) को जो कि आज के दौर के सुप्रसिद्ध सितार वादक उस्ताद विलायत ख़ाँ के दादा थे। दुर्भाग्यपूर्वक, कई कारणों से सुर-बहार अन्य तंत्र वाद्यों की तरह लोकप्रिय नहीं हो सका। इसका सबसे प्रमुख कारण है इसकी विशाल बनावट जिसके कारण इसे संभालना व इसके यातायात में बाधा आती है। आइये आज की चर्चा को समाप्त करने से पहले हम सुनें एक और प्रस्तुति जिसमें सुर-बहार पर राग यमन प्रस्तुत कर रहे हैं इटावा घराने के सुप्रसिद्ध सितार एवं सुर-बहार वादक उस्ताद इमरात अली ख़ान साहब|

उस्ताद इमरात अली ख़ान - राग यमन


और अब बारी है इस कड़ी की पहेली की जिसका आपको देना होगा उत्तर तीन दिनों के अंदर इसी प्रस्तुति की टिप्पणी में। प्रत्येक सही उत्तर के आपको मिलेंगे ५ अंक। 'सुर-संगम' की ५०-वीं कड़ी तक जिस श्रोता-पाठक के हो जायेंगे सब से अधिक अंक, उन्हें मिलेगा एक ख़ास सम्मान हमारी ओर से।

पहेली: सुनिए और पहचानिए इस आवाज़ को जो है एक सुप्रसिद्ध हिन्दुस्तानी शास्त्रीय शैली के दिग्गज की|



पिछ्ली पहेली का परिणाम: क्षिति जी को बधाई!

अब समय आ चला है आज के 'सुर-संगम' के अंक को यहीं पर विराम देने का। आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आई। हमें बताइये कि किस प्रकार हम इस स्तंभ को और रोचक बना सकते हैं!आप अपने विचार व सुझाव हमें लिख भेजिए oig@hindyugm.com के ई-मेल पते पर। शाम ६:३० बजे कृष्णमोहन जी के साथ 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल में पधारना न भूलिएगा, नमस्कार!

प्रस्तुति - सुमित चक्रवर्ती


आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

Sunday, July 10, 2011

उर्जा से भरी तान और ठेके "टप्पे" के

सुर संगम - 28 - पारंपरिक संगीत शैली - टप्पा

टप्पों को एकाएक प्रस्तुत करने हेतु नियमानुसार पहले आलाप को ठुमरी अंग में गाया जाता है तथा उसके पश्चात तेज़ी से असमान लयबद्ध लहज़े में बुने शब्दों के उपयोग से तानायत की ओर बढ़ा जाता है|

सुर-संगम के सभी श्रोता-पाठकों को सुमित चक्रवर्ती का स्नेह भरा नमस्कार! तो कहिए कैसे बीते गर्मियों के दिन? जैसे किसी किसी मुसाफ़िर का मंज़िल पाने पर संघर्ष समाप्त हो जाता है, मानो ठीक उसी प्रकार गर्मियों के ये झुलसा देने वाले दिन भी अब बीत चुके हैं| और आ गयी है वर्षा ऋतु सबके जीवन में हर्ष की नई फुहार लिए| तो हम ने भी सोचा की क्यों न इस बार के अंक में कुछ अलग प्रकार का संगीत चर्चा में लाया जाए| आज का सुर-संगम आधारित है पंजाब व सिंध प्रांतों की प्रसिद्ध उप-शास्त्रीय गायन शैली 'टप्पा' पर|

टप्पा भारत की प्रमुख पारंपरिक संगीत शैलियों में से एक है| यह माना जाता है की इस शैली की उत्पत्ति पंजाब व सिंध प्रांतों के ऊँट चलाने वालों द्वारा की गई थी| इन गीतों में मूल रूप से हीर और रांझा के प्रेम व विरह प्रसंगो को दर्शाया जाता है| खमाज, भैरवी, काफ़ी, तिलांग, झिन्झोटि, सिंधुरा और देश जैसे रागों तथा पंजाबी, पश्तो जैसे तालों द्वारा प्रेम-प्रसंग अथवा करुणा भाव व्यक्त किए जाते हैं| टप्पा की विशेषता हैं इसमें लिए जाने वाले ऊर्जावान तान और असमान लयबद्ध लहज़े| टप्पा गायन को एक लोक-शैली से ऊपर उठाकर एक शास्त्रीय शैली का रूप दिया था मियाँ ग़ुलाम नबी शोरी नें जो अवध के नवाब असफ़-उद्-दौलह के दरबारी गायक थे| इस शैली के बारे में और जानने से पहले क्यों न एक अल्प-विराम ले कर प्रसिद्ध टप्पा गायिका विदुषी मालिनी राजुर्कर द्वारा राग भैरवी में प्रस्तुत इस टप्पे का आनंद लें!

टप्पा - राग भैरवी - विदुषी मालिनी राजुर्कर


टप्पा गायन शैली में ठेठ 'टप्पे के तान' प्रयोग में लाए जाते हैं| पंजाबी ताल, जिसे 'टप्पे का ठेका' भी कहा जाता है, में ताल के प्रत्येक चक्र में तान के खिंचाव और रिहाई का प्रयोग आवश्यक होता है| टप्पों को एकाएक प्रस्तुत करने हेतु नियमानुसार पहले आलाप को ठुमरी अंग में गाया जाता है तथा उसके पश्चात तेज़ी से असमान लयबद्ध लहज़े में बुने शब्दों के उपयोग से तानायत की ओर बढ़ा जाता है| टप्पा गायकी में जमजमा, गीतकारी, खटका, मुड़की व हरकत जैसे कई अलंकार प्रयोग में लाए जाते हैं| यह शैली मूलतः ग्वालियर घराने तथा बनारस घराने की विशेषता है| दोनो घरानों के टपपों में ताल और आशुरचना की शैली का उपयोग जैसे कुछ संरचनात्मक मतभेद हैं, लेकिन मौलिक सिद्धांत एक जैसे ही हैं| आइए सुनते हैं ग्वालियर घराने की प्रसिद्ध गायिका श्रीमती शाश्वती मंडल पाल द्वारा राग खमाज में गाए इस टप्पे को|

टप्पा - राग खमाज - शाश्वती मंडल पाल


आज के दौर में टप्पा प्रदर्शन के परिदृश्य में जब कलाकारों की बात आती है तो निस्संदेह सबसे शानदार माना जाता है विदुषी मालिनी राजुर्कर को| ७० के दशक से इन्होंने इस शैली को जनप्रिय बनाने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है| अपने स्पष्ट व उज्ज्वल तानों से न कावेल इन्होंने कई उत्कृष्ट प्रस्तुतियां दी हैं बल्कि टपपों में मूर्छना जैसी तकनीकों का प्रयोग करा इस शैली को एक नया रूप दिया है| इनके अलावा ग्वालियर घराने से आरती अंकालिकर, आशा खादिलकर, शाश्वती मंडल पाल जैसी गायिकाओं नें इस गायन शैली को लोकप्रिय किया| बनारस घराने से बड़े रामदासजी, सिद्धेश्वरी देवी, गिरिजा देवी, पंडित गणेश प्रसाद मिश्र तथा राजन व साजन मिश्र जैसे दिग्गजों ने भी इस शैली में उल्लेखनीय प्रस्तुतियाँ दी हैं| आइए आज की चर्चा को समाप्त करते हुए सुनें पंडित गणेश प्रसाद मिश्र द्वारा राग काफ़ी में गाए इस टप्पे को|

टप्पा - राग काफ़ी - पंडित गणेश प्रसाद मिश्र


और अब बारी है इस कड़ी की पहेली की जिसका आपको देना होगा उत्तर तीन दिनों के अंदर इसी प्रस्तुति की टिप्पणी में। प्रत्येक सही उत्तर के आपको मिलेंगे ५ अंक। 'सुर-संगम' की ५०-वीं कड़ी तक जिस श्रोता-पाठक के हो जायेंगे सब से अधिक अंक, उन्हें मिलेगा एक ख़ास सम्मान हमारी ओर से।

पहेली: यह सितार से मिलता जुलता वाद्य है जिसमें सितार की तुलना में नीचे के नोट्स का प्रयोग किया जाता है|

पिछ्ली पहेली का परिणाम: क्षिति जी ने एक बार फिर सही उत्तर दिया, अमित जी कहाँ ग़ायब हो गये?

अब समय आ चला है आज के 'सुर-संगम' के अंक को यहीं पर विराम देने का। आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आई। हमें बताइये कि किस प्रकार हम इस स्तंभ को और रोचक बना सकते हैं!आप अपने विचार व सुझाव हमें लिख भेजिए oig@hindyugm.com के ई-मेल पते पर। शाम ६:३० बजे सुजॉय के साथ 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल में पधारना न भूलिएगा, नमस्कार!

प्रस्तुति - सुमित चक्रवर्ती


आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

Sunday, July 3, 2011

परदेस में जब घर-परिवार और सजनी की याद आई तब उपजा लोक संगीत "बिरहा"

सुर संगम - 27 - लोक गीत शैली -बिरहा

बिरहा गायन के मंचीय रूप में वाद्यों की संगति होती है| प्रमुख रूप से ढोलक, हारमोनियम और करताल की संगति होती है|

शास्त्रीय और लोक संगीत के साप्ताहिक स्तम्भ "सुर संगम" के इस नए अंक में आप सभी संगीत-प्रेमियों का, मैं कृष्णमोहन मिश्र हार्दिक स्वागत करता हूँ| दोस्तों; भारतीय लोक संगीत में अनेक ऐसी शैलियाँ प्रचलित हैं जिनमें नायक से बिछड़ जाने या नायक से लम्बे समय तक दूर होने की स्थिति में विरह-व्यथा से व्याकुल नायिका लोकगीतों के माध्यम से स्वयं को अभिव्यक्त करती है| देश के प्रायः प्रत्येक क्षेत्र में नायिका की विरह-व्यथा का प्रकटीकरण करते गीत बहुतेरे हैं, परन्तु विरह-पीड़ित नायक की अभिव्यक्ति देने वाले लोकगीत बहुत कम मिलते हैं| उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र में लोक-संगीत की एक ऐसी विधा अत्यन्त लोकप्रिय है, जिसे "बिरहा" नाम से पहचाना जाता है|


चित्र परिचय
बिरहा गुरुओं का यह 1920 का दुर्लभ चित्र है; जिसके मध्य में बैठे हैं, बिरहा को एक प्रदर्शनकारी कला के रूप में प्रतिष्ठित करने वाले गुरु बिहारी यादव, बाईं ओर है- रम्मन यादव तथा दाहिनी ओर हैं- गुरु पत्तू सरदार (यादव)|


इस लोक-संगीत की उत्पत्ति के सूत्र उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में मिलते हैं| ब्रिटिश शासनकाल में ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन कर महानगरों में मजदूरी करने की प्रवृत्ति बढ़ गयी थी| ऐसे श्रमिकों को रोजी-रोटी के लिए लम्बी अवधि तक अपने घर-परिवार से दूर रहना पड़ता था| दिन भर के कठोर श्रम के बाद रात्रि में छोटे-छोटे समूह में यह लोग इसी लोक-विधा के गीतों का ऊँचे स्वरों में गायन किया करते थे| लगभग 55 वर्ष पहले वाराणसी के ठठेरी बाज़ार,चौखम्भा आदि व्यावसायिक क्षेत्रों में श्रमिकों को 'बिरहा' गाते हुए मैंने प्रत्यक्ष देखा-सुना है| प्रारम्भ में 'बिरहा' श्रम-मुक्त करने वाले लोकगीत के रूप में ही प्रचलित था| बिरहा गायन के आज दो प्रकार हमें मिलते हैं| पहले प्रकार को "खड़ी बिरहा" कहा जाता है| गायकी के इस प्रकार में वाद्यों की संगति नहीं होती, परन्तु गायक की लय एकदम पक्की होती है| पहले मुख्य गायक तार सप्तक के स्वरों में गीत का मुखड़ा आरम्भ करता है और फिर गायक दल उसमें सम्मिलित हो जाता है| बिरहा गायन का दूसरा रूप मंचीय है, परन्तु उसकी चर्चा से पहले आइए सुनते हैं "खड़ी विरहा" का एक उदाहरण-

खड़ी बिरहा : गायक - मन्नालाल यादव और साथी


कालान्तर में लोक-रंजन-गीत के रूप में इसका विकास हुआ| पर्वों-त्योहारों अथवा मांगलिक अवसरों पर 'बिरहा' गायन की परम्परा रही है| किसी विशेष पर्व पर मन्दिर के परिसरों में 'बिरहा दंगल' का प्रचलन भी है| बिरहा के दंगली स्वरुप में गायकों की दो टोलियाँ होती है और बारी-बारी से बिरहा गीतों का गायन करते हैं| ऐसी प्रस्तुतियों में गायक दल परस्पर सवाल-जवाब और एक दूसरे पर कटाक्ष भी करते हैं| इस प्रकार के गायन में आशुसर्जित लोक-गीतकार को प्रमुख स्थान मिलता है| 'बिरहा' के अखाड़े (गुरु घराना) भी होते है| विभिन्न अखाड़ों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा का भाव रहता है| लगभग पाँच दशक पहले एक ऐसे ही अखाड़े के गुरु -पत्तू सरदार को मैं निकट से जानता था| वह बिरहा-गीतों के अनूठे रचनाकार और गायक थे| उनके अखाड़े के सैकड़ों शिष्य थे, जिन्हें समाज में लोक गायक के रूप में भरपूर सम्मान प्राप्त था| गुरु पत्तू सरदार निरक्षर थे| प्रायः वह शाम को अपने घर के छज्जे पर बैठ कर मेरे विद्यालय से लौटने की प्रतीक्षा किया करते थे, मैं उनके गीतों को लिपिबद्ध जो करता था| गुरु पत्तू वेदव्यास की तरह बोलते जाते थे और मैं गणेश की तरह लिखता जाता था| उनके रचे गए अनेक बिरहा-गीत आज भी मेरी स्मृतियों में सुरक्षित हैं| विरहा-गीतों के प्रसंग अधिकतर रामायण, महाभारत और पौराणिक कथाओं पर आधारित होते हैं| कभी-कभी लोकगीतकार सामयिक विषयों पर भी गीत रचते हैं| गुरु पत्तू सरदार ने 1965 के भारत-पाक युद्ध में भारत की विजय-गाथा को इन पंक्तियों में व्यक्त किया था -"चमके लालबहादुर रामनगरिया वाला, अयूब के मुह को काला कर दिया..."| इसी प्रकार टोकियो ओलम्पिक से स्वर्ण पदक जीत कर लौटे भारतीय हाकी दल के स्वागत के लिए भी उन्होंने विरहा गीत की रचना की थी| विगत चार-पाँच दशकों में अनेक बिरहा गायकों ने लोक संगीत की इस विधा को लोकप्रिय करने में अपना योगदान किया| इनमें से दो गायकों- वाराणसी के हीरालाल यादव और इलाहाबाद के राम कैलाश यादव के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं| आइए यहाँ रुक कर राम कैलाश यादव और उनके साथियों द्वारा प्रस्तुत विरहा का आनन्द लेते हैं| इस विरहा गीत में शिव विवाह का अत्यन्त रोचक प्रसंग है|

बिरहा - शिव विवाह भाग - 1 : गायक - राम कैलाश यादव और साथी


बिरहा - शिव विवाह भाग - 2 : गायक - राम कैलाश यादव और साथी


बिरहा गायन के मंचीय रूप में वाद्यों की संगति होती है| प्रमुख रूप से ढोलक, हारमोनियम और करताल की संगति होती है| करताल गुल्ली के आकार में लगभग 8 -9 इंच लम्बे स्टील के दो टुकड़े होते हैं, जिसे गायक अपनी दोनों हथेलियों के बीच रख कर आपस में टकराते हुए बजाते हैं| बिरहा लोकगीत का फिल्मों में प्रायः नहीं के बराबर उपयोग हुआ है| आश्चर्यजनक रूप से 1955 की फिल्म "मुनीमजी" में "बिरहा" का अत्यन्त मौलिक रूप में प्रयोग किया गया है| देवानन्द और नलिनी जयवन्त अभिनीत इस फिल्म के संगीतकार सचिनदेव बर्मन हैं तथा हेमन्त कुमार और साथियों के स्वरों में इस बिरहा का गायन किया गया है| इस बिरहा में भी शिव विवाह का ही प्रसंग है| गीत की अन्तिम पंक्तियों में दो नाम लिये गए है - पहले "बरसाती" और फिर "दुखहरण" | पहला नाम अखाड़े के गुरु का और दूसरा नाम गायक का है| यह गीत बरसाती यादव अखाड़े का है और इसे किसी दुखहरण नामक गायक ने गाया था| आइए सुनते हैं लोकगीत "बिरहा" का यह फ़िल्मी रूप -

बिरहा गीत -"शिवजी बियाहने चले पालकी सजाय के..." : फिल्म - मुनीमजी : गायक - हेमन्त कुमार और साथी


और अब बारी इस कड़ी की पहेली का जिसका आपको देना होगा उत्तर तीन दिनों के अंदर इसी प्रस्तुति की टिप्पणी में। प्रत्येक सही उत्तर के आपको मिलेंगे ५ अंक। 'सुर-संगम' की ५०-वीं कड़ी तक जिस श्रोता-पाठक के हो जायेंगे सब से अधिक अंक, उन्हें मिलेगा एक ख़ास सम्मान हमारी ओर से।

पहेली: शास्त्रीय गायन की यह शैली पंजाब में उपजी तथा यही शैली बंगाल में जाकर 'पुरातनी' के नाम से प्रसिद्ध हुई|

पिछ्ली पहेली का परिणाम: अमित जी यह क्या? आपने तो हथियार ही डाल दिये!!! खैर, क्षिती जी ने पुनः सटीक उत्तर दे कर ५ और अंक अर्जित कर लिये है, बधाई!

इसी के साथ 'सुर-संगम' के आज के इस अंक को यहीं पर विराम देते हैं| आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आई। हमें बताइये कि किस प्रकार हम इस स्तंभ को और रोचक बना सकते हैं! आप अपने विचार व सुझाव हमें लिख भेजिए oig@hindyugm.com के ई-मेल पते पर। शाम ६:३० बजे हमारे प्रिय सुजॉय चटर्जी के साथ 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल में पधारना न भूलिएगा, नमस्कार!

आलेख -कृष्ण मोहन मिश्र
प्रस्तुति - सुमित चक्रवर्ती


आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

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