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Saturday, June 2, 2018

चित्रकथा - 71: हिन्दी फ़िल्मों में नाग-नागिन (भाग - 2)

अंक - 71

हिन्दी फ़िल्मों में नाग-नागिन (भाग - 2)

"मैं नागन तू सपेरा..." 




रेडियो प्लेबैक इंडिया’ के साप्ताहिक स्तंभ ’चित्रकथा’ में आप सभी का स्वागत है। भारतीय फ़िल्मों में नाग-नागिन शुरू से ही एक आकर्षक शैली (genre) रही है। सांपों को आधार बना कर लगभग सभी भारतीय भाषाओं में फ़िल्में बनी हैं। सिर्फ़ भारतीय ही क्यों, विदेशों में भी सांपों पर बनने वाली फ़िल्मों की संख्या कम नहीं है। जहाँ एक तरफ़ सांपों पर बनने वाली विदेशी फ़िल्मों को हॉरर श्रेणी में डाल दिया गया है, वहीं भारतीय फ़िल्मों में नाग-नागिन को कभी पौराणिक कहानियों के रूप में, कभी सस्पेन्स युक्त नाटकीय शैली में, तो कभी नागिन के बदले की भावना वाली कहानियों के रूप में प्रस्तुत किया गया है जिन्हें जनता ने ख़ूब पसन्द किया। हिन्दी फ़िल्मों के इतिहास के पहले दौर से ही इस शैली की शुरुआत हो गई थी। तब से लेकर पिछले दशक तक लगातार नाग-नागिन पर फ़िल्में बनती चली आई हैं। ’चित्रकथा’ के पिछले अंक में नाग-नागिन की कहानियों, पार्श्व या संदर्भ पर बनने वाली फ़िल्मों पर नज़र डालते हुए हम पहुँच गए थे 60 के दशक के अन्त तक। आइए आज 70 के दशक से इस सफ़र को आगे बढ़ाते हैं। प्रस्तुत है इस लेख की दूसरी व अन्तिम कड़ी।



वाक् फ़िल्म निर्माण के शुरुआती चार दशकों में नाग-नागिन के विषय पर बनने वाली फ़िल्मों में नज़र दौड़ाते हुए यह महसूस किया जा सकता है कि जहाँ 50 के दशक तक इस तरह के विषयवस्तु की पौराणिक या स्टण्ट फ़िल्में दर्शकों में बेहद लोकप्रिय हो जाया करती थीं, वहाँ 60 के दशक में ऐसी बहुत सी फ़िल्में फ़्लॉप होने लगी। दर्शकों की रुचि में बदलाव, बदलता दौर और बदलती पीढ़ी का असर नाग-नागिन के विषय पर बनने वाली पौराणिक और फ़ैन्टसी फ़िल्मों में पड़ने लगी। 70 के दशक में पहली फ़िल्म बनी 1971 में ’नाग पूजा’ शीर्षक से। 1962 में ’नाग देवता’ और 1966 में ’नाग मन्दिर’ निर्देशित करने का अनुभव रखने वाले निर्देशक शान्तिलाल सोनी को ’नाग पूजा’ निर्देशित करने का मौका दिया गया। उधर अभिनेत्री इंदिरा भी सांपों की फ़िल्मों में काफ़ी काम कर चुकी थीं। इस फ़िल्म में उनके साथ पी. जयराज, सुजीत कुमार, संजना, मोहन चोटी आदि कलाकार थे। फ़िल्म के निर्माता को बदलते दौर और दर्शकों के मिज़ाज का अंदाज़ा नहीं था और यह फ़िल्म बुरी तरह पिट गई। फ़िल्म के गीत-संगीत ने भी कोई कमाल नहीं दिखा सका। उषा खन्ना के संगीत में भरत व्यास और इरशाद के लिखे अधिकतर भक्ति रचनाओं की तरफ़ श्रोताओं ने ध्यान नहीं दिया। जिस फ़िल्म से सही मायने में नाग-नागिन की परम्परा हिन्दी फ़िल्मों में शुरू हुई, वह थी 1953 की फ़िल्म ’नाग पंचमी’। निरुपा रॉय अभिनीत यह फ़िल्म ख़ूब चली थी। इसके लगभग 20 साल बाद, 1972 में दोबारा इसी शीर्षक से निर्माता एन. डी. कोठारी ने एक पौराणिक फ़िल्म बनाने का निश्चय किया। निर्देशक के रूप में पौराणिक फ़िल्मों के जानेमाने निर्देशक बाबूभाई मिस्त्री को चुना गया। फ़िल्म में मुख्य भूमिकाएँ निभाईं श्री भगवान, मन्हर देसाई, वत्सला देशमुख, उमा दत्त, जयश्री गडकर, पृथ्वीराज कपूर, शशिकला, आशिष कुमार, जयश्री टी आदि ने। फ़िल्म की कहानी राजकुमारी बेहुला और महादेवी मनसा की पौराणिक कथा पर आधारित थी। नागलोक पर राज करने वाली महादेवी मनसा को पता चलता है कि वो भगवान शिव जी और माता पार्वती की पुत्री हैं। वो उनसे मिलने जाती हैं और उन्हें पता चलता है कि पूरी मानव जाति शिव जी के पूरे परिवार की पूजा करती है। जब महादेवी मनसा ने भी शिव जी से यह इच्छा जतायी कि उनकी भी पूजा हो, तब शिव जी ने उनसे कहा कि इसके लिए वो पहले महाराज चन्द्रधर से आज्ञा ले आए। महादेवी मनसा महाराज चन्द्रधर के पास जाती हैं लेकिन उन्हें पूजे जाने की आज्ञा नहीं ले पातीं। ग़ुस्से में आकर वो चन्द्रधर के सभी पुत्रों का वध कर देती हैं। होश आने पर वो चन्द्रधर को एक पुत्र (लक्ष्मेन्द्र) का पिता बनने का मौका देती हैं, और यह उम्मीद भी करती हैं कि लक्ष्मेन्द्र चन्द्रधर का मन-परिवर्तन करने में सक्षम होगा और महाराज चन्द्रधर उसे पूजने लगेंगे। लक्ष्मेन्द्र बड़ा होता है और उसका विवाह राजकुमारी बेहुला से होता है। अब भी चन्द्रधर मनसा की पूजा करने से मना कर देते हैं जिसकी वजह से ग़ुस्से में आकर मनसा लक्ष्मेन्द्र का वध कर देती हैं। अपने मृत पति को पुनर्जीवित करने के लिए बेहुला चार धामों (जगन्नाथ पुरी, रामेश्वरम, द्वारकाधीश, बद्रीनाथ) की यात्रा करती हैं, लेकिन मनसा उसे अंधा कर देती हैं और उसका मानसिक संतुलन बिगाड़ देती हैं ताकि वो अपने निर्जीव पति को कभी जीवित ना कर सके। 70 के दशक में इस रंगीन पौराणिक फ़िल्म की चर्चा ज़रूर हुई थी लेकिन फ़िल्म ज़्यादा चली नहीं। संगीतकार रवि और गीतकार इंदीवर ने गीत-संगीत के पक्ष पर अच्छा काम ज़रूर किया था। लता मंगेशकर की आवाज़ में "ऐ नागिन जा बस अपने द्वारे, मेरे पिया मेरे प्राणों से प्यारे..." फ़िल्म के उस मोड़ पर आती है जब लक्ष्मेन्द्र (आशिष कुमार) और बेहुला (जयश्री गडकर) के सुहाग-रात के कमरे में नागकन्या नैनत्री (जयश्री टी) आकर अपने नाग-पति के मृत्यु का बदला लेने की धमकी देती है, जिसके नाग-पति को लक्ष्मेन्द्र की रथ के पहिए के नीचे कूचल कर मृत्यु प्राप्त हुआ था। बेहुला इस गीत के माध्यम से नैनत्री से क्षमा की भीख माँग रही है। 1973 में फिर एक बार शान्तिलाल सोनी निर्देशित फ़िल्म आई ’नाग मेरे साथी’। सुजीत कुमार - संजना अभिनीत इस फ़िल्म का शीर्षक 1971 की फ़िल्म ’हाथी मेरे साथी’ से प्रेरित लगता है। संगीतकार एस. एन. त्रिपाठी 70 के दशक के आते आते प्रतियोगिता में पिछड़ चुके थे। भरत व्यास के शुद्ध हिन्दी आधारित गीतों की क़द्र करने वाले लोग फ़िल्म जगत में कम ही रह गए थे। इस फ़िल्म के गीतों में भरत व्यास और एस. एन. त्रिपाठी ख़ास कमाल नहीं दिखा सके, और यह उनकी नाग-नागिन की अन्तिम फ़िल्म सिद्ध हुई।

1954 की फ़िल्म ’नागिन’ के बाद अगर किसी नाग-नागिन की फ़िल्म को ब्लॉकबस्टर का दर्जा प्राप्त हुआ, तो वह थी 1976 की इसी शीर्षक से बनने वाली फ़िल्म। निर्माता-निर्देशक राजकुमार कोहली ने नाग-नागिन को पौराणिक कथाओं से निकाल कर एक रहस्य और रोमांच से भरपूर थ्रिलर फ़िल्म में ले आए। अपने ज़माने के एक से एक बड़े अभिनेताओं को लेकर 1976 की यह फ़िल्म ’नागिन’ ज़बरदस्त कामयाब फ़िल्म साबित हुई, जिसने नाग-नागिन पर बनने वाले फ़िल्मों की धारा को एक नया मोड़, एक नया आयाम दे दिया। जीतेन्द्र और रीना रॉय इस फ़िल्म में इच्छाधारी नाग और नागिन की भूमिकाओं में नज़र आए, और इस मल्टी-स्टारर फ़िल्म में उनके साथ थे सुनील दत्त, फ़िरोज़ ख़ान, संजय ख़ान, विनोद मेहरा, रेखा, मुमताज़, योगिता बाली, कबीर बेदी, अनिल धवन, रणजीत, प्रेमा नारायण, प्रेम नाथ और अरुणा इरानी प्रमुख। ’नागिन’ की कहानी दिलचस्प थी। इच्छाधारी नाग-नागिन की जोड़ी मानव रूप में प्रेमालाप कर रहे हैं। जैसे ही नाग फिर से नाग रूप में परिवर्तित हो जाता है, शिकारियों के दल का एक सदस्य उसे गोली मार देता है यह सोच कर कि वो उन्हें काटने जा रहा है। इसके बाद नागिन (रीना रॉय) कैसे अपने नाग की मृत्यु का बदला लेती है, यही है इस फ़िल्म की कहानी। कहानी के अन्त में केवल विजय (सुनील दत्त) को नागिन ज़िन्दा छोड़ती है और नागिन को अहसास होता है कि वो ग़लत थी और उसके बदले की भावना ने बहुत सी ज़िन्दगियों को बरबाद कर दिया, ठीक वैसे जैसे उसकी ज़िन्दगी बरबाद हुई है। अन्त में नागिन मर जाती है और स्वर्ग में पहुँच कर वो अपने नाग से मिल जाती है। फ़िल्म ’नागिन’ के गीत संगीत ने भी ख़ूब धूम मचाई। वर्मा मलिक के लिखे गीत और लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल का संगीत ज़ररदस्त हिट रहा। लता और महेन्द्र कपूर का गाया "तेरे संग प्यार मैं नहीं तोड़ना, चाहे तेरे पीछे जग पड़े छोड़ना" फ़िल्म का थीम-सॉंग् है जिस पर इच्छाधारी नाग-नागिन गाते, नृत्य करते, प्रेमालाप करते नज़र आते हैं। फ़िल्म के अन्य गीत भी मशहूर रहे, पर वो नाग-नागिन पर नहीं फ़िल्माये गए। 1979 में ’नागिन और सुहागन’ शीर्षक से एक फ़िल्म आई थी जिसकी तरफ़ किसी का ख़ास ध्यान नहीं गया। फिर एक बार यह शान्तिलाल सोनी निर्मित व निर्देशित फ़िल्म थी जिसमें विजय अरोड़ा और रीता भादुड़ी नायक-नायिका की भूमिकाओं में नज़र आए। इस फ़िल्म की कहानी भी लगभग उन्हीं पौराणिक फ़िल्मों की कहानियों जैसी ही है जिनमें नागकन्या के पति की मृत्यु फ़िल्म के नायक के हाथों ग़लतीवश हो जाती है और फिर नागिन बदला लेना चाहती है। ’नागिन’ की तरह यह फ़िल्म बड़ी बजट की फ़िल्म नहीं थी, और यह फ़िल्म नहीं चली। उषा खन्ना के संगीत में कवि प्रदीप का लिखा आरती मुखर्जी का गाया एक गीत है "ओ पाताल के राजा, मेरा दुखड़ा सुन लो राजा..."। इस गीत में पाताल के राजा नागराज से विनती और शिकायत की जा रही है - "मुझ पर है नसीबा रूठा, मुझ पर दुख पर्वत टूटा, मेरे बसे बसाये घर को एक नाग लुटेरे ने लूटा"।

80 के दशक के प्रथमार्ध में नाग-नागिन पर कोई फ़िल्म नहीं बनी। फ़िल्म निर्माताओं को लगा होगा कि यह शैली अब पुरानी हो चुकी है जो दर्शकों को अपनी ओर आकृष्ट कर पाने में असमर्थ है। 1976 में ’नागिन’ के सुपरहिट होने के बावजूद जब 1979 में ’नागिन और सुहागन’ पिट गई, तब फ़िल्मकारों ने इस विषय से दूर रहने में ही भलाई समझी। बार बार एक ही तरह की वही नागिन का अपने मरे हुए नाग की मृत्यु का इन्तकाम जैसी कहानियों की फ़िल्मों से एकरसता आ गई थी। लेकिन 1986 में इस शैली में फिर एक बड़ा मोड़ आया जब निर्माता-निर्देशक हरमेश मल्होत्रा श्रीदेवी को लेकर आए ’नगीना’ में। फ़िल्म की नायिका रजनी, एक इच्छाधारी नागिन है, जो कुछ दुष्ट सपेरों से अपने प्रेमी की मृत्यु का बदला लेने के लिए एक साधारण नागरिक से शादी करती है। यह फ़िल्म उस वर्ष की सफलतम फ़िल्मों में से एक थी जिसने दुनियाभर में 130 मिलियन रुपये का कारोबार किया, और 1986 की दूसरी बड़ी फ़िल्म सिद्ध हुई (पहली फ़िल्म थी अमिताभ बच्चन की ’आख़िरी रास्ता’)। 1983-84 में श्रीदेवी तेज़ी से स्टारडम की सीढ़ियाँ चढ़ती जा रही थीं। ’नगीना’ ने उन्हें पहली फ़ीमेल सुपरस्टार बना दिया और आज भी इस फ़िल्म में उनके अभिनय को उनकी श्रेष्ठ फ़िल्मों में गिना जाता है। इस फ़िल्म में हर कलाकार ने अपने अपने चरित्र को बख़ूबी निभाया। फ़िल्म के नायक राजीव (ॠषि कपूर) और उनकी माँ (सुषमा सेठ) अपने महल समान घर में रहते हैं। राजीव और रजनी (श्रीदेवी) एक दूसरे से प्यार करते हैं और शादी कर लेते हैं, लेकिन जल्द ही बिजली टूट पड़ती है जब सपेरों का मुखिया भैरो (अमरीश पुरी) उनके घर आकर राजीव की माँ को ख़बर देते हैं कि रजनी दरसल एक नागिन है। बीन बजा कर भैरो रजनी को सम्मोहित कर सबके सामने नाचने पर मजबूर कर देता है और यह सिद्ध हो जाता है कि वो नागिन है। रजनी घर से भाग निकलती है पर भैरो उसे पकड़ लेता है। भैरो को रजनी से उस मणि का पता लगवाना है जिसके मिलने पर वो दुनिया को अपनी मुट्ठी में कर सकता है। राजीव की मदद से रजनी भैरो ने चुंगल से बच निकलती है और सांपों के काटने से भैरो का अन्त होता है। राजीव और रजनी फिर ख़ुशी-ख़ुशी अपना जीवन व्यतीत करते हैं। आनन्द बक्शी के गीत और लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल का संगीत ज़बरदस्त हिट रहा। फ़िल्म के सभी पाँच गीत सुपरहिट। लेकिन सर्वाधिक लोकप्रिय गीत बना लता मंगेशकर का गाया "मैं तेरी दुश्मन, दुश्मन तू मेरा, मैं नागन तू सपेरा" जो फ़िल्म के क्लाइमैक्स का हिस्सा था। इस गीत और नृत्य को बॉलीवूड के श्रेष्ठ ’स्नेक डान्स नंबर’ में गिना जाता है। इस गीत का शुरुआती बीन संगीत भी यादगार रहा है। श्रीदेवी के नृत्य गीतों में यह शीर्ष पर विराजमान है और iDiva ने इसे "the stuff of movie legends" कह कर सम्मानित किया है। इस गीत से जुड़ा एक विवाद भी है। शुरू में इस गीत को अनुराधा पौडवाल की आवाज़ में रिकॉर्ड किया गया था, लेकिन फ़िल्म के रिलीज़ से पहले इसे लता मंगेशकर से गवाया गया जो अनुराधा पौडवाल को "unethical" लगा। ख़ैर, हक़ीक़त यही है कि आज तक ’नगीना’ सांपों पर बनने वाली फ़िल्मों में एक बहुत ऊंचा मकाम रखती है। 2013 में श्रीदेवी को फ़िल्मफ़ेअर पुरस्कार के तहत उनके ’नगीना’ और ’मिस्टर इंडिया’ में शानदार अभिनय के लिए एक विशेष पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह शायद इसलिए दिया गया क्योंकि 1987 और 1988 में फ़िल्मफ़ेअर पुरस्कार का आयोजन नहीं हुआ, जिस वजह से इन दोनों सालों की फ़िल्मों को पुरस्कृत नहीं किया जा सका था। अगर किया गया होता तो ’नगीना’ के लिए श्रीदेवी सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के पुरस्कार के बहुत क़रीब होतीं। 1989 में ’नगीना’ की सीकुइल फ़िल्म बनी ’निगाहें’ जिसमें राजीव और रजनी की बेटी के रूप में फिर एक बार श्रीदेवी ही नज़र आईं और उनके नायक बने सनी देओल। यह हिन्दी फ़िल्म इतिहास की पहली सीकुइल फ़िल्म थी। हालांकि यह फ़िल्म बॉक्स ऑफ़िस पर नाकामयाब रही, पर फ़िल्म के गीत-संगीत ख़ासा लोकप्रिय रहा। एक बार फिर आनन्द बक्शी और लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल के गीत सर चढ़ कर बोले। और ख़ास बात यह कि इस फ़िल्म में दो गीत सांपों की पार्श्व पर बने - अनुराधा पौडवाल का गाया "किसे ढूंढ़ता है पागल सपेरे, मैं तो सामने खड़ी हूँ तेरे" और कविता कृष्णमूर्ति का गाया "खेल वही फिर आज तू खेला, पहले गुरु आया अब चेला", जो ’नगीना’ के "मैं तेरी दुश्मन..." का ही विस्तार है। गीत अन्तरे से ही शुरू होता है और मुखड़े पर आकर "मैं नागन तू सपेरा" से ख़त्म होता है। इस गीत और इस गीत पर श्रीदेवी के नृत्य को वह लोकप्रियता नहीं मिली जो "मैं तेरी दुश्मन" को मिली थी। समालोचक इसके दो कारण बताते हैं - पहला कारण, इस गीत को लता मंगेशकर से गवाया जाना चाहिए था, दूसरा कारण, इस गीत की कोरियोग्राफ़ी ’नगीना’ के कोरियोग्राफ़ी से कमज़ोर थी। 

’नगीना’ के बाद फिर एक बार फ़िल्मकारों में नाग-नागिन पर फ़िल्में बनाने की होड़ सी लग गई। 1988 में ’नागिन के दो दुश्मन’ शीर्षक से एक सी-ग्रेड फ़िल्म आई थी जिसमें जयश्री टी. ने अभिनय किया था। लक्ष्मी किरण फ़िल्म की संगीतकार थीं। 1989 में वी. मेनन निर्देशित फ़िल्म बनी ’तू नागन मैं सपेरा’ जो ’नगीना’ के गीत के मुखड़े से प्रेरित था। सोनिका गिल, सुमीत सहगल, श्रीप्रदा अभिनीत इस फ़िल्म की कहानी भी ’नगीना’ की कहानी के इर्द-गिर्द घूमती ही महसूस हुई। अनवर उसमान का संगीत और महेन्द्र दहल्वी के गीत लोकप्रिय नहीं हुए। अनुराधा पौडवाल की आवाज़ में "ओ सपेरे मेरे दुश्मन, तेरी दुश्मन हूँ मैं नागन, तूने मारा है मेरा साजन, तुझको मारेगी अब ये नागन" गीत कोई कमाल नहीं दिखा सकी। 1990 में कुल पाँच फ़िल्में बनीं नाग-नागिन पर।  श्रीदेवी को नागिन के रूप में देखने के बाद कई बड़े फ़िल्मकार और अभिनेत्रियों के मन में भी इस शैली की फ़िल्में बनाने और उनमें काम करने का विचार आया। सदाबहार अभिनेतेरी रेखा को लेकर फ़िल्म बनी ’शेषनाग’। फ़िल्म बड़ी बजट की थी और रेखा के अलावा इस फ़िल्म में जीतेन्द्र, ॠषि कपूर, मंदाकिनी, माधवी जैसे कलाकार थे। अमरीश पुरी की जगह दुष्ट सपेरे का किरदार इस फ़िल्म में डैनी ने निभाया। कहानी ’नगीना’ से अलग ज़रूर थी, लेकिन यह फ़िल्म ’नगीना’ जैसा कमाल नहीं दिखा पाया। आनन्द बक्शी - लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल के गीतों में भी "छेड़ मिलन के गीत रे मितवा" (अनुराधा - सुरेश) के अलावा कोई भी गीत लोकप्रिय नहीं हुआ। रेखा के बाद उस दौर की एक और जानीमानी अभिनेत्री मीनाक्षी शेशाद्री ने भी नागिन की भूमिका निभाई ’नाचे नागिन गली गली’ फ़िल्म में। बी. के. जैसवाल के इस फ़िल्म में नायक बने नितिश भारद्वाज (जिन्होंने दूरदर्शन के ’महाभारत’ में श्रीकृष्ण का चरित्र निभाया था)। यह फ़िल्म भी ’नगीना’ के आगे टिक नहीं सकी। अनजान के गीत और कल्याणजी-आनन्दजी के संगीत में फ़िल्म का एक ही गीत कुछ समय तक रेडियो पर गूंजता सुनाई दिया - "नाचे नागिन गली गली, तेरी याद में सजना गली गली" (साधना सरगम)। लेकिन फ़िल्म में दम नहीं था और लोगों ने बहुत जल्द इस फ़िल्म को भुला दिया। ’शेषनाग’ की सह-अभिनेत्री मंदाकिनी को मुख्य नागिन की भूमिका में भी उतारा गया था इसी साल। फ़िल्म ’राम तेरी गंगा मैली’ के स्टार कास्ट (राजीव कपूर, मंदाकिनी, रज़ा मुराद और विजेता पंडित) को लेकर रामकुमार बोहरा ने ’नाग नागिन’ बनाई, लेकिन फ़िल्म बुरी तरह असफल रही और साल की सबसे बड़ी फ़्लॉप फ़िल्म सिद्ध हुई। संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और गीतकार संतोष आनन्द भी फ़िल्म को बचा नहीं सके। फ़िल्म का कविता कृष्णमूर्ति - नितिन मुकेश का गाया "मैं नाग तू नागिन, नहीं जीना तेरे बिन" में कोई नई बात नहीं थी और बीन संगीत भी वही जाना पहचाना ’नगीना’ शैली का। 80 के दशक तक नाग-नागिन पर बनने वाली फ़िल्मों के शीर्षक में भी नाग-नागिन-नगीना का उल्लेख होता था। लेकिन 90 के दशक के आते-आते इस तरह के शीर्षक इतने ज़्यादा बार प्रयोग हो चुके थे कि अब फ़िल्मकार नाग-नागिन-सपेरे की कहानियों के शीर्षक साधारण फ़िल्मों के शीर्षक जैसे रखने लगे। 1990 में आमिर ख़ान - जुही चावला अभिनीत फ़िल्म आई ’तुम मेरे हो’। ’क़यामत से क़यामत तक’ के बाद आमिर-जुही की जोड़ी सर चढ़ कर बोल रही थी उन दिनों। ताहिर हुसैन (आमिर ख़ान के पिता) ने इस फ़िल्म को निर्देशित किया, लेकिन बॉक्स ऑफ़िस पर फ़िल्म असफल रही। सिर्फ़ कामयाब जोड़ी अगली फ़िल्म को भी कामयाब बना दे यह ज़रूरी नहीं। इस फ़िल्म में आमिर ख़ान शिवा नामक सपेरा है जिसे सांपों को वश में करने के जादूई शक्ति प्राप्त है। वो और पारो (जुही चावला) एक दूसरे से प्यार करते हैं दोनों के प्रभावशाली पिताओं की मर्ज़ी के ख़िलाफ़। उधर शिवा के पिता ने शिवा के बालपन में एक इच्छाधारी नागिन की हत्या कर दी थी जिस वजह से नागिन की माँ ने उससे बदला लेने का वचन लिया था। क्या नागिन शिवा को मार कर अपना वचन निभा पाती है, यही थी ’तुम मेरे हो की कहानी’। फ़िल्म फ़्लॉप होने के बावजूद ’क़यामत से क़यामत तक’ के गीतकार-संगीतकार जोड़ी मजरूह - आनन्द-मिलिंद ने सुरीले गीत रचे और फ़िल्म के गीत हिट हुए। हालांकि इसमें सांपों पर कोई गीत नहीं था, लेकिन "जब से देखा तुमको यारा" (उदित-अनुपमा), "जतन चाहे जो करले" (उदित-साधना), "शीशा चाहे टूट भी जाए" (उदित), "आसमां से गिरे खजूर पे अटके" (अनुराधा) जैसे गीत उस ज़माने में ख़ूब चले थे। 

1990 की एक और फ़िल्म थी ’दूध का कर्ज़’। सलीम अख़्तर की इस फ़िल्म में जैकी श्रॉफ़ और नीलम थे मुख्य भूमिकाओं में। फ़िल्म की कहानी नाग-नागिन की कहानी तो नहीं थी, लेकिन सांपों के पार्श्व पर ज़रूर थी। सपेरन पार्वती (अरुणा इरानी) अपने नवजात पुत्र सूरज (जैकी श्रॉफ़)के साथ अपने पति को तीन दरिंदों द्वारा चोरी के झूठे इलज़ाम पर पीट पीट कर मारते हुए देखा। पार्वती अपने पति की चिता की अग्नि को छू कर शपथ लेती है उन दरिंदों को उचित सज़ा दिलवाने की। वो सूरज और एक सांप को पालती है। धर्मा लोहार इसमें उनकी मदद करता है। बड़ा होने पर सूरज को रेशमा (नीलम) से प्यार हो जाता है जिसे वो एक सांप के काटने पर उसके ज़हर से बचाता है। जब पार्वती अपने पति के क़ातिल गंगु को मार कर अपना बदला पूरा करने का सोचती हैं, तब उसे पता चलता है कि सूरज की प्रेमिका रेशमा दरसल गंगु की ही बेटी है। आनन्द बक्शी और अनु मलिक की जोड़ी के रचे गीतों ने धूम मचा दी। हालांकि मोहम्मद अज़ीज़ और अनुराधा पौडवाल के गाए "तुम्हें दिल से कैसे जुदा हम करेंगे" और "शुरू हो रही है प्रेम कहानी" फ़िल्म के लोकप्रियतम गीत रहे, सांप और सपेरे पर भी दो गीत थे - "बीन बजाता जा सपेरे बीन बजाता जा, छम छम नाचती जाऊं मैं, तू मुझे नचाता जा" (अनुराधा) और "बीन बजाऊँ तुझे बुलाऊँ, तेरे बदले मैं मर जाऊँ"। 1989 में वी. मेनन ने ’तू नागन मैं सपेरा’ निर्देशित किया था जिसमें सुमीत सहगल नायक थे और सोनिका गिल व श्रीप्रदा नायिकाएँ थीं। 1991 में वी. मेनन ने सुमीत सहगल को ही नायक लेकर बनाई म्युज़िकल फ़िल्म ’नाग मणि’। नायिका के रूप में दिखीं शिखा स्वरूप। दुष्ट सपेरे और नाग मणि की तलाश के बीच नायक-नायिका की मधुर प्रेम कहानी वाली यह फ़िल्म कामयाब रही। फ़िल्म का सर्वाधिक शक्तिशाली पक्ष था इसका गीत-संगीत। अनु मलिक के संगीत में संतोष आनन्द के लिखे गीत बेहद लोकप्रिय हुए। टी-सीरीज़ और अनुराधा पौडवाल उन दिनों मेलडियस गीतों का पर्याय बन गए थे। यह फ़िल्म भी उन्हीं टी-सीरीज़ म्युज़िकल फ़िल्मों में से एक थी। बस अफ़सोस एक ही बात का है कि इस फ़िल्म में नाग-नागिन-सपेरे का कोई गीत नहीं था। 1991 में सलिल परिदा निर्मित व जग मुंध्रा निर्देशित फ़िल्म आई थी ’विषकन्या’ जो पूजा बेदी के बोल्ड दृश्यों की वजह से विवादों में घिर गई थी। यह फ़िल्म भी बदले की कहानी है। निशा (पूजा बेदी) अपने माता-पिता (कबीर बेदी - मुनमुन सेन) की मौत का बदला लेने के लिए एक तांत्रिक से सांप का ज़हर युक्त गोली खा कर विष कन्या बन जाती है। चर्चा में रहने के बावजूद दर्शकों के दिल को छू नहीं सकी यह फ़िल्म और बप्पी लाहिड़ी का संगीत और सैयद गुलरेज़ के गीत कोई कमाल नहीं दिखा सके। पाँच वर्षों के बाद 1996 में गौतम भाटिया निर्मित व निर्देशित कम बजट की फ़िल्म ’हसीना और नगीना’ आई जिसमें किरण कुमार और एकता सोहिनी मुख्य कलाकार थे। फ़िल्म कब आई कब गई पता भी नहीं चला। दिलीप सेन - समीर सेन के संगीत में शोभा जोशी और कविता कृष्णमूर्ति का गाया "मैं हूँ एक हसीना मैं हूँ एक नगीना" में पंक्ति है "नागिन सी बलखाके लहराऊंगी, छेड़ेगा मुझको तो डस जाऊंगी, मैं मार दूंगी या मर जाऊंगी, मैं आज हद से गुज़र जाऊंगी"।

21-वीं सदी आ गई। हालांकि इस नए दौर में नाग-नागिन पर बनने वाली फ़िल्मों की संख्या कम होती जा रही थी, सिलसिला पूरी तरह से ख़त्म नहीं हुई। वर्ष 2000 में दक्षिण की एक डब की हुई फ़िल्म हिन्दी में प्रदर्शित हुई ’एक वरदान नगीना’ शीर्षक से। साई किरण, प्रभाकर, प्रेमा और मल्लिकार्जुन राव अभिनीत यह फ़िल्म थी। 2002 की फ़िल्म ’जानी दुश्मन’ एक डार्क फ़ैन्टसी ऐक्शन फ़िल्म थी। इस मल्टी-स्टारर फ़िल्म में अक्षय कुमार, अरमान कोहली, मनीषा कोयराल, सनी देओल, सुनील शेट्टी, आफ़ताब शिवदासानी, शरद कपूर, सोनू निगम और अरशद वारसी जैसे कलाकार थे। जहाँ तक सांपों की बात है, फ़िल्म की एक नायिका दिव्या (मनीषा कोयराला) को पिछले जनम की बातें याद आती हैं कि उस जनम में वो कपिल (अरमान कोहली) नामक इच्छाधारी नाग से प्यार करती थी। जब इस जनम में दिव्या का कुछ लोग बलात्कार करते हैं जिस वजह से वो आत्महत्या कर लेती है, तब कपिल पुनर्जीवित हो उठता है और इच्छाधारी नाग के शक्तियों से बदला लेता है। 2004 में एक फ़िल्म प्रद्रशित हुई थी ’हत्या’ जिसमें अक्षय कुमार थे। दरसल यह फ़िल्म बहुत पहले की बनी हुई थी, जिसे बरसों बाद 2004 में रिलीज़ कर दिया गया। इस फ़िल्म में अक्षय कुमार को एक इच्छाधारी नाग में परिणत होते हुए दिखाया गया। फ़िल्म में नायिका थीं वर्षा उसगाँवकर और संगीतकार थे नदीम-श्रवण। 2008 में ’Heaven on Earth' शीर्षक से दीपा मेहता की एक कनाडियन फ़िल्म आई थी जिसे भारत में ’विदेश’ शीर्षक से प्रदर्शित की गई थी। प्रीति ज़िंटा और वंश भारद्वाज अभिनीत इस फ़िल्म की कहानी सीधे सीधे सांप की कहानी तो नहीं है, लेकिन नायिका, जिसने बचपन में नाग-नागिन की एक लोकगाथा सुन रखी होती है, उसे शादी के बाद ससुराल में अत्याचारी पति के दुर्व्यवहार की वजह से बार बार बचपन में सुनी हुई वह सांप की लोक-कथा याद आती रहती है, जो उसके जीवन को प्रभावित करती है। हिन्दी फ़िल्मों में सांपों पर बनने वाली फ़िल्मों की श्रॄंखला 2010 में जा कर ख़त्म हो जाती है फ़िल्म ’हिस्स्स’ से। यह एक ऐडवेंचर-हॉरर फ़िल्म थी जिसका निर्देशन किया था Jennifer Chambers Lynch ने। वही जानी-पहचानी इच्छाधारी नागिन की कहानी, लेकिन इस बार एक नए आधुनिक अंदाज़ में पेश की गई जिसमें मुख्य किरदार मल्लिका शेरावत ने निभाई। फ़िल्मों के तकनीकी विकास के साथ-साथ कई असंभव दृश्यों को दिखाना अब आसान काम हो गया था। इस फ़िल्म में मल्लिका शेरावत के इंसान से नागिन बनने का दृश्य बड़ा डरावना दिखाई देता है। अनु मलिक के संगीत निर्देशन में इस फ़िल्म के गीत भी आधुनिक शैली के रहे। "मैं नागिन तू सपेरा" में ना उलझ कर अबकि बार है "I got that poison" (श्वेता पंडित) और "I have been here before" (श्रुति हासन) जैसे गीत।

वर्तमान दशक में अभी तक बॉलीवूड में कोई भी फ़िल्म सांपों के पार्श्व पर नहीं बनी है। इस तरह से 1933 में ’ज़हरी सांप’ से जो सिलसिला शुरू हुआ था, वह 2010 में ’हिस्स्स’ तक आकर रुक गया। लेकिन जब जब इस तरह की फ़िल्मों की बात चलेगी, तब जो तीन फ़िल्में सबसे पहले याद आएंगी, वो हैं ’नागिन’ (1954), 'नागिन’ (1976), और 'नगीना’ (1986)।


आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!




शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Saturday, May 26, 2018

चित्रकथा - 70: हिन्दी फ़िल्मों में नाग-नागिन (भाग - 1)

अंक - 70

हिन्दी फ़िल्मों में नाग-नागिन (भाग - 1)

"मन डोले मेरा तन डोले..." 




’रेडियो प्लेबैक इंडिया’ के साप्ताहिक स्तंभ ’चित्रकथा’ में आप सभी का स्वागत है। भारतीय फ़िल्मों में नाग-नागिन शुरू से ही एक आकर्षक शैली (genre) रही है। सांपों को आधार बना कर लगभग सभी भारतीय भाषाओं में फ़िल्में बनी हैं। सिर्फ़ भारतीय ही क्यों, विदेशों में भी सांपों पर बनने वाली फ़िल्मों की संख्या कम नहीं है। जहाँ एक तरफ़ सांपों पर बनने वाली विदेशी फ़िल्मों को हॉरर श्रेणी में डाल दिया गया है, वहीं भारतीय फ़िल्मों में नाग-नागिन को कभी पौराणिक कहानियों के रूप में, कभी सस्पेन्स युक्त नाटकीय शैली में, तो कभी नागिन के बदले की भावना वाली कहानियों के रूप में प्रस्तुत किया गया है जिन्हें जनता ने ख़ूब पसन्द किया। हिन्दी फ़िल्मों के इतिहास के पहले दौर से ही इस शैली की शुरुआत हो गई थी। तब से लेकर पिछले दशक तक लगातार नाग-नागिन पर फ़िल्में बनती चली आई हैं। आइए आज ’चित्रकथा’ में नज़र डालें उन हिन्दी फ़िल्मों पर जिनमें है नाग-नागिन के चरित्र, उनकी प्रेमकथाएँ, जिनमें है शैतान सपेरों द्वारा सांपों पर अत्याचार, और जिनमें है नागिन का इन्तक़ाम।




1931 में ’आलम आरा’ से बोलती फ़िल्मों की शुरुआत के दो साल के अन्दर 1933 में जहाँ आरा कज्जन और पेशेन्स कूपर अभिनीत फ़िल्म आई थी ’ज़हरी सांप’। फ़िल्म की कहानी उपलब्ध ना होने की वजह से ठीक-ठीक बता पाना मुश्किल है कि क्या वाक़ई इस फ़िल्म में सांप दिखाए गए थे या फिर यह बस सांकेतिक शीर्षक है फ़िल्म के किसी चरित्र के लिए! अगर यह मान लें कि यह सांप की कहानी है, तो यह हिन्दी फ़िल्म इतिहास की पहली फ़िल्म होगी इस शैली की। फ़िल्म के संगीतकार बृजलाल वर्मा और गीतकार पंडित नारायण प्रसाद ’बेताब’ ने गीत रचे और जहाँ आरा कज्जन की आवाज़ में ये तमाम गीत फ़िल्म में सुनाई दिए। हालांकि इस फ़िल्म में दस से भी अधिक गीत थे, लेकिन किसी भी गीत में सांप या उससे मिलता-जुलता कोई संदर्भ नहीं मिला। फ़िल्म इतिहास के उस पहले दौर में स्पेशल इफ़ेक्ट्स के तकनीक विकसीत नहीं हुए थे कि सांपों के दृश्य नाटकीयता के साथ दिखाए जा सके। शायद इसी वजह से किसी भी फ़िल्मकार ने इस शैली पर फ़िल्म बनाने का प्रयास नहीं किया। ’ज़हरी सांप’ बनने के दस साल बाद, 1943 में ’विष कन्या’ नामक फ़िल्म आई। फ़िल्म की शीर्षक भूमिका में थीं साधना बोस, साथ में थे पृथ्वीराज कपूर और लीला मिश्र मुख्य भूमिकाओं में। हिन्दू पौराणिक कथाओं के अनुसार विष कन्या उस लड़की को कहा जाता है जिसके ख़ून में ज़हर हो, जिस वजह से उस देश का राजा उसका इस्तमाल दुश्मनों को ख़त्म करने के लिए करते थे। विष कन्याओं का उल्लेख चाणक्य के ’अर्थशास्त्र’ में मिलता है। यह चन्द्रगुप्त मौर्य के समय काल की बात है (ईसा पूर्व 340-293)। ख़ैर, ’विष कन्या’ फ़िल्म के संगीतकार थे खेमचन्द प्रकाश और गीत लिखे किदार शर्मा ने। इस फ़िल्म में भी दस से अधिक गीत थे, बस एक गीत में "नाग" का उल्लेख मिला - "मतवाले नैना नाग रे..."। 40 के ही दशक में फ़िल्म ’नागन’ का निर्माण शुरू तो हुआ था, लेकिन फ़िल्म अन्त तक बन कर प्रदर्शित नहीं हो सकी। कुछ सूत्रों में इस फ़िल्म को 1950 की फ़िल्म मानी जाती है, लेकिन हक़ीक़त यही है कि यह एक अप्रदर्शित फ़िल्म है। इस फ़िल्म के लिए सुरेन्द्रनाथ और गीता रॉय के गाए कुछ गीत रिकॉर्ड भी हुए थे। फ़िल्म के संगीतकार के रूप में कहीं हुस्नलाल-भगतराम का नाम दिया हुआ है तो कहीं पर पंडित अमरनाथ (हुस्नलाल-भगतराम के बड़े भाई) और हरबंसलाल का। पचास के दशक में 1951 में दलसुख पंचोली ने बनाई फ़िल्म ’नगीना’। मुक्ता के चरित्र में फ़िल्म की नायिका थीं नूतन। फ़िल्म की कथानक कुछ इस तरह की है कि फ़िल्म का नायक नासिर ख़ान अपने पिता के सर से झूठा इलज़ाम हटाने के लिए सबूत इकट्ठा करने के एक पुरानी हवेली/ खंडहर में जाते हैं जहाँ उनकी मुलाक़ात एक रहस्यमयी लड़की (नूतन) से होती है। इस बात पर ध्यान दें कि इस फ़िल्म में नूतन कोई इच्छाधारी नागिन के चरित्र में नहीं है, और ना ही इसमें किसी सपेरा द्वारा किसी नागिन से नगीना या नागमणि छीनने का कोई दृश्य है। बल्कि कहानी के रहस्य को और भी अधिक घनीभूत करने के लिए नागमणि अंगूठी का एक पक्ष रखा गया है। शंकर-जयकिशन, शैलेन्द्र और हसरत के रचे गीत लता, सी. एच. आत्मा, रफ़ी और शमशाद बेगम ने गाए। सी. एच. आत्मा का गाया "रो‍ऊँ मैं सागर किनारे, सागर हंसी उड़ाए" अपने ज़माने का सुपरहिट गीत रहा है। इस तरह से इन सभी शुरुआती फ़िल्मों की कहानियों में अप्रत्यक्ष रूप से सांप या सांप संबंधित पक्ष होते हुए भी ये दरसल नाग-नागिन शैली की फ़िल्में नहीं हैं।

जिस फ़िल्म से नाग-नागिन की परम्परा हिन्दी फ़िल्मों में शुरू हुई, वह थी 1953 की फ़िल्म ’नाग पंचमी’। उन दिनों अभिनेत्री निरुपा रॉय पौराणिक फ़िल्मों में अग्रणी नायिकाओं में थीं। विनोद देसाई निर्मित व रमण देसाई निर्देशित इस फ़िल्म में नायक थे मन्हर देसाई। अपनी तरह की पहली फ़िल्म होने की वजह से यह फ़िल्म ख़ूब चली और एक सफल फ़िल्म रही उस वर्ष की। पौराणिक फ़िल्मों में काम करने वाले कलाकार टाइपकास्ट कर दिए जाते थे, जिन्हें सामाजिक फ़िल्मों में मौके नहीं मिल पाते थे आसानी से। इस फ़िल्म के संगीतकार चित्रगुप्त और गीतकार गोपला सिंह नेपाली के साथ भी यही हुआ। फ़िल्म के अधिकांश गीत आशा भोसले ने गाए जिनमें एक गीत था "ओ नाग कहीं जा बसियो रे, मेरे पिया को ना डसियो रे..."। निरुपा रॉय पर फ़िल्माया यह गीत फ़िल्म का लोकप्रिय गीत रहा। और फिर 1954 में एक ऐसी फ़िल्म आई जिसने चारों तरफ़ धूम मचा दी। यह थी ’फ़िल्मिस्तान’ की धमाकेदार फ़िल्म ’नागिन’। नन्दलाल जसवन्तलाल के निर्देशन में वैजयन्तीमाला - प्रदीप कुमार अभिनीत यह आंशिक रूप से रंगीन फ़िल्म एक ब्लॉकबस्टर सिद्ध हुई। फ़िल्म के गीतों ने भी ख़ूब धूम मचाई। हेमन्त कुमार के संगीत में, राजेन्द्र कृष्ण का लिखा और लता का गाया "मन डोले मेरा तन डोले" गीत उस वर्ष ’गीत माला’ का वार्षिक गीत बना। इस फ़िल्म के लिए बीन की धुन कल्याणजी वीरजी शाह और रवि ने तैयार की - कल्याणजी अपने ही बनाए साज़ केवियोलिन पर और रवि हारमोनियम पर। बिना असली बीन का इस्तमाल किए इतनी अच्छी बीन की धुन इससे पहले फ़िल्म संगीत में सुनाई नहीं दी थी। ’नागिन’ फ़िल्म की यह बीन-संगीत इतना मशहूर रहा है कि समय समय पर इसका प्रयोग होता चला आया है। ’नागिन’ की कहानी दो आदिवासी जनजातियों की आपस में तकरार की कहानी है। नागी जनजाति के सरदार की बेटी है माला (वैजयन्तीमाला) और रागी जनजाति के सरदार का बेटा है सनातन (प्रदीप कुमार)। नागी सरदार सनातन को मार डालना चाहता है अपनी पुरानी दुश्मनी का बदला लेने के लिए। उधर माला ग़लती से नागा इलाके में घुस आती है बीन की धुन से आकृष्ट होकर। बीन वादक सनातन से उसकी मुलाक़ात होती है और प्रेमपुष्प खिलते हैं। उस वर्ष की सफलतम फ़िल्मों में से एक ’नागिन’ एक ट्रेन्डसेतर फ़िल्म सिद्ध हुई जिसने फ़िल्मी कहानी की इस नई शैली का द्वार खोल दिया। आगे चल कर इस तरह के कबीलों की आपस की लड़ाई के बीच नायक-नायिका के प्रेम कहानियों पर बहुत सी फ़िल्में बनीं। नागिन का फ़ॉरमुला इतना पसन्द किया गया कि 1956 से 1958 के तीन सालों में कम से कम 6 फ़िल्में और बनीं। ’नाग पंचमी’ फ़िल्म की सफलता को देखते हुए बाबूभाई मिस्त्री ने फिर एक बार निरुपा रॉय और मन्हर देसाई (और साथ में महिपाल) को लेकर 1956 में पौराणिक कथा आधारित ’सती नागकन्या’ फ़िल्म का निर्माण किया। चित्रगुप्त की जगह इस बार संगीतकार बने एक और पौराणिके-ऐतिहासिक फ़िल्म संगीतकार एस. एन. त्रिपाठी। गोपाल सिंह नेपाली के साथ साथ बी. डी. मिश्र और सरस्वती कुमार दीपक ने भी कुछ गीत लिखे। ’नाग पंचमी’ की ही तरह इस फ़िल्म के अधिकांश गीत आशा भोसले ने गाए और कुछ गीतों में रफ़ी और गीता दत्त की आवाज़ें थीं। सती नागकन्या की कहानी रामायण से जुड़ी हुई है। पौराणिक कथा के अनुसार एक सर्प-राजकुमारी लंकाधिपति रावण के पुत्र इन्द्रजीत मेघनाद से विवाह करती है, जो मेघनाद से अपने नाग पति की हत्या का बदला लेने आई है। मेघनाद के रथ के पहिये के नीचे कूचल कर उसके पति की मृत्यु हुई थी। इसी शीर्षक से 1983 में भी एक फ़िल्म बनी थी जिसकी भी यही कहानी है। साथ ही इस फ़िल्म में भगवान विष्णु, लक्ष्मी और शेष नाग का क्रम से राम, सीता और लक्ष्मण के रूप में पुनर्जनम की कथा भी शामिल है। फ़िल्म में जयश्री गडकर, अनीता गुहा, सुलोचना, मन्हर देसाई, अंजना मुमताज़ आदि ने मुख्य भूमिकाएँ निभाईं। 1956 और 1983 की ’सती नागकन्या’ फ़िल्मों में एक समानता यह है कि दोनों फ़िल्मों में मन्हर देसाई नज़र आए, 1983 वाले में रावण की भूमिका में।

1957 में नाग-नागिन की फ़िल्मों ने रफ़्तार पकड़ ली और कुल चार फ़िल्में इस वर्ष बनीं - ’नाग लोक’, ’नाग मणि’, ’नाग पद्मिनी’ और ’शेष नाग’। ’नाग मणि’ और ’शेष नाग’ शीर्षक से 90 के दशक में भी फ़िल्में बनी हैं। ’सती नाग कन्या’ की सफलता के बाद बाबूभाई मिस्त्री फिर एक बार निरुपा रॉय को लेकर बनाई ’नाग लोक’। साथ में थे शाहु मोडक, अजीत और कृषन कुमारी। फ़िल्म के संगीतकार थे रामलाल हीरापन्ना तथा गीत लिखे भरत व्यास, गोपाल सिंह नेपाली, सरस्वती कुमार दीपक, पी. एल. संतोषी और इंदीवर ने। यह फ़िल्म भगवान शिव की पौराणिक कथाओं की फ़िल्म है, इसलिए कुछ गीत शिव भजन भी हैं जैसे कि "हे शिवशंकर हे प्रलयंकर..." (लता), "शंकर भोले भाले..." (आशा-रफ़ी), "सोलह सोमवार जिस घर में जलते सोलह दीप..." और "सोमवार के व्रत का..."। ’नाग मणि’ रमण बी. देसाई की फ़िल्म थी जिसमें निरुपा रॉय त्रिलोक कपूर, मन्हर देसाई, हेलेन मुख्य कलाकारों में थे। निरुपा रॉय और त्रिलोक कपूर की जोड़ी पौराणिक फ़िल्मों की हिट जोड़ी मानी जाती है और दोनों ने शिव-पार्वती की जोड़ी को परदे पर कई फ़िल्मों में साकार किया है। ’नाग मणि’ के संगीतकार थे अविनाश व्यास और गीतकार थे कवि प्रदीप। आशा भोसले और मन्ना डे की आवाज़ों में "ये है पाताल की दुनिया नागों..." फ़िल्म का एकमात्र गीत है नागों को समर्पित। शकीला - महिपाल के अभिनय से सजी लेखराज भाकरी निर्देशित फ़िल्म ’नाग पद्मिनी’ मुल्क राज भाकरी निर्मित फ़िल्म थी। पौराणिक फ़िल्मों में उन दिनों बड़े संगीतकार संगीत देने से कतराते थे टाइपकास्ट हो जाने के डर से। इस वजह से पौराणिक और ऐतिहासिक फ़िल्मों में संगीत देने वाले संगीतकारों की एक अलग श्रेणी ही बन गई थी। इस फ़िल्म में संगीत था सनमुख बाबू का और गाने लिखे प्रेम धवन ने। गीता दत्त और कृष्णा गोयल की आवाज़ों में "सपेरा बीन बजाये गयो, नागन को मस्त बनाये गयो, मैं तो बैठी हूँ दिल को हार, तीर तोरे नयनन का लागा जिगरवा के पार..." एक सुन्दर रचना है जिसमें बीन संगीत के सुन्दर टुकड़े रखे गए हैं। चतुर्भुज दोशी निर्देशित ’शेष नाग’ में शाहु मोडक और सुलोचना मुख्य कलाकारों में थे और त्रिलोक कपूर - निरुपा रॉय की जोड़ी फिर एक बार शंकर-पार्वती के रूप में प्रकट हुए। भरत व्यास के लिखे गीतों को अविनाश व्यास ने स्वरबद्ध किया, तथा सुधा मल्होत्रा और सुलोचना ने गीतों में आवाज़ें दीं। 1958 में विनोद देसाई निर्देशित फ़िल्म आई ’नाग चम्पा’ जिसमें मन्हर देसाई, ललिता पवार और निरुपा रॉय मुख्य कलाकारों में थे। फ़िल्म के गीत-संगीत की ख़ास बात यह थी कि इसके संगीतकार थे मन्ना डे। लेकिन ताज्जुब की बात यह थी कि मन्ना डे ने अपनी आवाज़ में कोई भी गीत नहीं गाया और सभी गीत लता या आशा की आवाज़ में थे। लता की आवाज़ में "नागन बिछड़े नाग से..." फ़िल्म की एक सुन्दर रचना है। 1976 में ’नाग चम्पा’ शीर्षक से दोबारा एक फ़िल्म बनी, निर्माता थे महेन्द्र पटेल ने। एस. एन. त्रिपाठी ना केवल इस फ़िल्म के संगीतकार थे, बल्कि फ़िल्म का निर्देशन भी उन्होंने ही किया और एक चरित्र का अभिनय भी किया। फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे कानन कौशल और शाहि कपूर। भरत व्यास के लिखे "नाग चम्पा हे नटराज बिनती सुनो..." (सुमन कल्याणपुर), "बीन बजा मेरे मस्त सपेरे..." (आशा) और "नाग पंचमी का आया है यह मंगल त्योहार..." (आशा) गीतों में नाग का उल्लेख और वर्णन मिलता है। 50 के दशक में बनने वाली नाग-नागिन के फ़िल्मों की बातें समाप्त करने से पहले 1959 में बनने वाली एक पाकिस्तानी फ़िल्म ’नागिन’ का ज़िक्र ज़रूरी है। ख़लील क़ैसर निर्देशित इस फ़िल्म में नीलो, रतन कुमार, हुस्ना, यूसुफ़ ख़ान आदि नज़र आए। क़तील शिफ़ई के लिखे नग़मों को सफ़दार हुसैन की मौसिक़ी में इक़बाल बानो, ज़ुबेदा ख़ानुम, नहीद नियाज़ी और सलीम रज़ा जैसे गायकों ने आवाज़ दी।

60 के दशक के शुरू में ही आई ’नाचे नागिन बाजे बीन’। कुमकुम, चन्द्रशेखर, हेलेन आदि के अभिनय से सजी इस फ़िल्म में मजरूह सुल्तानपुरी के गीत और चित्रगुप्त का संगीत था। लता, रफ़ी और साथियों की आवाज़ों में फ़िल्म का शीर्षक गीत है, जिसमें लता गाती हैं - "मैं हूँ गोरी नागन देखूंगी रसिया, कैसे आज नहीं बाजे तेरी बीन रे", जिस पर रफ़ी का जवाब है - "किसी परदेसी का छोटा सा जिया, ऐसे नाच के ना हौले हौले छीन रे"। फिर साथियों की आवाज़ में "नाचे रे नागिन बाजे रे बीन" पंक्ति गीत को फ़िल्म का शीर्षक गीत बनाती है। बीन की धुन और नृत्य प्रधान यह सुमधुर गीत लता-रफ़ी के गाए कमचर्चित युगल गीतों में से एक है। फ़िल्म का एक अन्य गीत है सुमन कल्याणपुर और मोहम्मद रफ़ी का गाया हुआ - "गोरी नागन बन के ना चला करो, जादू मारेगा सपेरा कोई आइके, दिल हाथ में लेके चला करो, मैं तो चलूंगी हज़ारों बलखाइके"। लोक धुन आधारित बीन संगीत प्रधान यह नृत्य रचना भी फ़िल्म की एक कर्णप्रिय रचना है। 1962 में शान्तिलाल सोनी निर्देशित फ़िल्म ’नाग देवता’ में अंजलि देवी, महिपाल, शशिकला मुख्य कलाकार थे। एस. एन. त्रिपाठी के संगीत में इस पौराणिक शैली की फ़िल्म में क़मर जलालाबादी ने गीत लिखे (एक गीत प्रकाश मेहरा का लिखा हुआ था)। यह फ़िल्म असफल रही और फ़िल्म के गीत भी नहीं चले। इसी तरह से 1963 की ’नाग मोहिनी’ भी फ़्लॉप रही। इस फ़िल्म में इन्दिरा बंसल, ख़ुर्शीद बावा, विजया चौधरी आदि कलाकार थे। भरत व्यास के गीत और सरदार मलिक का संगीत भी फ़िल्म को बचा नहीं सके। सुमन कल्याणपुर की आवाज़ में "फनवाले महाराज मेरी रखना तू लाज, गुण गाऊँ मैं आजा आजा तुझे कब से बुलाऊँ मैं" में "फनवाले महाराज" का उल्लेख ही नहीं बल्कि उनका गुणगान भी है कि किस तरह से उनके फन पर पूरी दुनिया टिकी हुई है। भरत व्यास ने बड़ी ख़ूबसूरती से इस गीत में नाग देवता पर लिखा है - "नाग देवता तेरा रूप है जैसे धूप और छाया, किसी ने जोखम पार सहे तो प्यार किसी ने पाया, मैं अनाथ सा फिरूँ भटकता किसी ने ना अपनाया, आज प्राण की भीख माँगने द्वार पे तेरे आया"। 1963 में नाग-नागिन फ़िल्मों की फिर एक बार होड़ सी लग गई थी। इसी साल आई ’सुनहरी नागिन’। बाबूभाई मिस्त्री ने अपने 50 के दशक के फ़ॉरमुले को लगा कर महिपाल और केलेन को मुख्य किरदारों में लेकर यह फ़िल्म बनाई। ख़ास बात यह कि इस बार उन्होंने संगीत का भार सौंपा कल्याणजी-आनन्दजी को। इस वजह से अब तक की फ़िल्मों के गीतों में जो एकरसता आई थी, वो थोड़ी दूर हुई। फ़ारूक़ क़ैसर, इंदीवर, गुल्शन बावरा, वेद पाल और आनन्द बक्शी ने फ़िल्म के गीत लिखे। लता मंगेशकर की आवाज़ में "बीन ना बजाना, ये जादू ना जगाना, के देगा ज़माना" एक सुन्दर रचना है। इस गीत में भी बीन की धुन है; इस बात की याद दिला दूँ कि 1954 की ’नागिन’ की वह प्रसिद्ध बीन संगीत कल्याणजी भाई ने अपने क्लेविओलिन पर बजाया था। हो सकता है कि इस फ़िल्म के तमाम बीन संगीत भी उसी साज़ पर तैयार किए गए हों। 1963 की अगली फ़िल्म ’नाग ज्योति’ के मुख्य कलकारों में फिर एक बार पौराणिक फ़िल्मों के कलाकार शामिल थे, जैसे कि महिपाल, अनीता गुहा, उमा दत्त और इंदिरा। फिर एक बार भरत व्यास और सरदार मलिक की जोड़ी ने गीत-संगीत का पक्ष संभाला। फ़िल्म का एक उल्लेखनीय गीत था आशा भोसले का गाया शिव तांडव स्तोत्र - "जटाटवी–गलज्जल–प्रवाह–पावित–स्थले..."। नाग-नागिन पार्श्व के पौराणिक फ़िल्मों में भगवान शिव का उल्लेख ज़रूर मिलता है और यह फ़िल्म कोई व्यतिक्रम नहीं। इसी साल ’बीन का जादू’ शीर्षक से एक फ़िल्म आई थी जिसमें महिपाल, कुमुद त्रिपाठी, हेलेन आदि कलाकार थे और संगीत के लिए फिर एक बार एस. एन. त्रिपाठी को लिया गया था। बी. डी. मिश्र के लिखे गीतों को आवाज़ दी सुमन कल्याणपुर और महेन्द्र कपूर ने। इस फ़िल्म में भी एक शिव भजन था - "शंभु शंबु शंभु शंभु, हर हर महादेव त्रिपुरारी, जटाजुट धारी..."। इसे सुमन कल्याणपुर ने गाया था। 

1964 में ’पहाड़ी नागिन’ फ़िल्म बनी थी जिसमें इंदिरा, साधना खोटे, आज़ाद आदि कलाकार थे। इक़बाल का संगीत और फ़ारूक़ क़ैसर के गीत। फ़िल्म की कहानी के बारे में जानकारी उपलब्ध ना होने की वजह से यह कह पाना मुश्किल है कि "पहाड़ी नागिन" से वाक़ई किसी नागिन का कोई सम्पर्क है या फ़िल्म की नायिका के लिए ही ऐसे ही यह शीर्षक दिया गया है। 1966 में बलवन्त भट्ट निर्देशित फ़िल्म ’नागिन और सपेरा’ में मास्टर भगवान, शकीला, बेला बोस, मन्हर देसाई जैसे कलाकार थे और संगीत था कमचर्चित संगीतकार हरबंसलाल का। गीत लिखे सत्य पाल वर्मा ने। आशा भोसले की आवाज़ में "तेरी बीन है जादू मेरा..." गीत नागिन और सपेरे के रिश्ते को दर्शाता है। इसी साल शान्तिलाल सोनी निर्देशित फ़िल्म आई ’नाग मन्दिर’। शान्तिलाल सोनी 1962 में ’नाग देवता’ निर्देशित कर चुके थे। जिस तरह से कल्याणजी-आनन्दजी ने 1963 में ’सुनहरी नागिन’ में संगीत दिया था, उसी तरह से ’नाग मन्दिर’ में लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने संगीत दिया। असद भोपाली, भरत व्यास और शिव कुमार सरोज ने फ़िल्म के गीत लिखे। उन दिनों लता और रफ़ी के बीच बातचीत बन्द होने की वजह से फ़िल्म का एकमात्र युगल गीत लता ने महेन्द्र कपूर के साथ गाया। यह एक बेहद कर्णप्रिय रचना है "एक मंज़िल एक सफ़र है अब हमारा आपका"। लेकिन फ़िल्म के बॉक्स ऑफ़िस पर असफल रहने की वजह से ये गाने चर्चा में नहीं रहे। इस तरह से साल-दर-साल नाग-नागिन पर बनने वाली फ़िल्मों में नज़र दौड़ाते हुए यह महसूस किया जा सकता है कि जहाँ 50 के दशक में इस शैली की पौराणिक या स्टण्ट फ़िल्में हिट हो जाया करती थीं, वहाँ 60 के दशक में ये फ़िल्में फ़्लॉप होने लगी। दर्शकों की रुचि में बदलाव, बदलता दौर और बदलती पीढ़ी का असर नाग-नागिन के विषय पर बनने वाली पौराणिक और फ़ैन्टसी फ़िल्मों में पड़ने लगी। 

अगले अंक में इस शोधालेख का दूसरा व अंतिम भाग पोस्ट किया जाएगा।

आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!




शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Saturday, May 19, 2018

चित्रकथा - 69: स्वर्गीय बालकवि बैरागी की फ़िल्मी रचनाओं में ग्राम्य संस्कृति की सुगंध

अंक - 69

स्वर्गीय बालकवि बैरागी की फ़िल्मी रचनाओं में ग्राम्य संस्कृति की सुगंध

"बन्नी तेरी बिन्दिया की ले लूँ रे बल‍इयाँ..." 



बालकवि बैरागी
(10 फ़रवरी 1931 - 13 मई 2018)


13 मई 2018 को हिन्दी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार, कवि और गीतकार बालकवि बैरागी का 87 वर्ष की आयु में निधन हो जाने से हिन्दी साहित्य के आकाश का एक जगमगाता बुलन्द सितारा अस्त हो गया। 10 फ़रवरी 1931 को मध्यप्रदेश के मंदसौर ज़िले की मनासा तहसील के रामपुर गाँव में जन्में बालकवि बैरागी ने आगे चल कर विक्रम विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए. किया और समय के साथ-साथ एक प्रसिद्ध साहित्यकार व कवि बन कर निखरे। राजनीति में गहन दिलचस्पी की वजह से वो राजनीति में भी सक्रीय रहे और राज्य सभा के सांसद के रूप में भी चुने गए। और इसी रुचि की झलक उनकी लेखि कविताओं में भी मिलती है। कई प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित बालकवि बैरागी मध्यप्रदेश में अर्जुन सिंह सरकार में खाद्यमंत्री भी रहे। बालकवि बैरागी की लिखी कविताओं में ’सूर्य उवाच’, ’हैं करोड़ों सूर्य’, ’दीपनिष्ठा को जगाओ’ जैसी कविताएँ यादगार रहे हैं। ’गीत’, ’दरद दीवानी’, ’दो टूक’, ’भावी रक्षक देश के’, ’आओ बच्चों गाओ बच्चों’ इनकी अन्य महत्वपूर्ण रचनाएं हैं। बालकवि बैरागी का सरल हृदय और हंसमुख व्यवहार आम लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता था। बालकवि बैरागी ने कुछ फ़िल्मों में गीत भी लिखे। जहाँ एक ओर उनकी ग़ैर फ़िल्मी लेखनी में राजनीति की झलक मिलती है, वहीं उनके फ़िल्मी गीतों में ग्रामीण संस्कृति की ख़ुशबू। आइए आज ’चित्रकथा’ में बालकवि बैरागी के लिखे उन फ़िल्मी गीतों की बातें करें जिनसे लोक संस्कृति की भीनी भीनी सुगंध आती है। आज के ’चित्रकथा’ का यह अंक समर्पित है स्वर्गीय बालकवि बैरागी की पुण्य स्मृति को!





फ़िल्म ’गोगोला’ से 1966 में बालकवि बैरागी ने फ़िल्मी गीतलेखन की शुरुआत की थी। उस समय उनकी उम्र 35 वर्ष थी। इस फ़िल्म के बाद 70 के दशक में उन्होंने ’रेशमा और शेरा’, ’वीर छत्रसाल’, ’दो बूंद पानी’, ’क्षितिज’, ’रानी और लालपरी’, ’जादू टोना’ और ’पल दो पल का साथ’ जैसी फ़िल्मों में गीत लिखे। 1985 में उन्होंने फ़िल्म ’अनकही’ में गीत लिख कर अपने फ़िल्मी गीत लेखन के पारी की समाप्ति की घोषणा कर दी। फ़िल्म ’रेशमा और शेरा’ के "तू चंदा मैं चांदनी’ गीत की अपार सफलता के बावजूद उनके लिखे किसी अन्य फ़िल्मी गीत को इस तरह की प्रसिद्धि नहीं मिली। आज हम बात कर रहे हैं बालकवि बैरागी के लिखे उन फ़िल्मी गीतों की जिनमें है ग्रामीण संस्कृति की महक, लोक परम्पराओं की सुगंध। 1966 की स्टण्ट फ़िल्म ’गोगोला’ में रॉय-फ़्रांक का संगीत था। कम बजट की इस फ़िल्म में मीनू पुरुषोत्तम और उषा मंगेशकर का गाया गीत "देखा देखा बलमा प्यारा" उस ज़माने में काफ़ी मशहूर हुआ था। इस तरह का दो गायिकाओं वाला लोक शैली का नृत्य गीत फ़िल्मों में एक लम्बे समय से रहा है। इस गीत में बालकवि बैरागी ने बड़े ही सरल और साधारण शब्दों के प्रयोग से प्यारे बलमा का वर्णन किया है।


"चाँद से गोरा, बेमतवाला
रस का लोभी, मन का काला
चल हट तूने क्या कह डाला"


इस गीत की दो नायिकाओं में एक नायिका नायक की गुणगान करती हुई उसे चाँद से भी गोरा बताती है तो दूसरी नायिका उसे रस का लोभी और मन का काला कहती है। इसी तरह से दूसरे अन्तरे में भी दोनों में मतभेद बना रहता है। इन छोटी-छोटी पर पूरा भाव सुन्दर तरीके से व्यक्त कर देने वाली पंक्तियों की वजह से गीत की सुन्दरता को चार चांद लगा दिया है बैरागी जी ने।


"मैं क्या उसका रूप बखानू
जानू री जानू, सब कुछ जानू
बतियाँ तोरी मैं ना मानू"


इसी फ़िल्म में उषा मंगेशकर और साथियों की आवाज़ों में "मोहे ला दे राजा मछरिया रे" कुछ कुछ लोक शैली में गाए जाने वाले मुजरा गीत की तरह है। इस गीत में "मछरिया" से इशारा समाज के मक्कारों और शैतानों से है जो रिश्वत लेकर भष्टाचार को बढ़ावा देते हैं, समाज को गंदा करते हैं, जो खाने-पीने की चीज़ों में मिलावट करके मासूम लोगों की ज़िन्दगियों के साथ खिलवाड़ करते हैं। एक मस्ती भरे मुजरा शैली के गीत माध्यम से बालकवि बैरागी ने समाज के अंधकार वाले क्षेत्रों पर प्राक्श डालने की कोशिश की है। ऐसे अपराधियों को सज़ा ना देने वाली "कचहरियों" पर लानत है का निशाना साधते हुए "मछरिया" को "कचहरिया" के साथ तुकबन्दी ने गीत को और भी अधिक मज़ेदार बना दिया है।

1971 में ऐतिहासिक फ़िल्म ’वीर छत्रसाल’ में एस. एन. त्रिपाठी का संगीत था। फ़िल्म के पाँच गीतों में एक गीत नीरज ने, एक गीत महाकवि भूषण ने और बाकी के तीन गीत बालकवि बैरागी ने लिखे। इन तीन गीतों में से दो गीत लोक धुन पर आदधारित थे। सुमन कल्याणपुर की आवाज़ में पहला गीत "हाय बेदर्दी पिया काली रात में तो आ रे" फिर एक बार मुजरा शैली का गीत है, जिसके मुखड़े में ही ’क़सम’ शब्द का दो अलग प्रयोग करते हुए बैरागी जी लिखते हैं - "मोरी क़सम झूठी क़समें ना खा रे"। इसी तरह से पहले अन्तरे की पहली पंक्ति में ’बदली’ का दो बार प्रयोग भी बड़ा आकर्षक है।


"प्रेम में बदली बदली में पानी
पानी के बीच मेरी प्यासी जवानी
अब तो कर ले मेरी मनमानी"


बालकवि बैरागी का चाँद और चाँदनी से ख़ासा लगाव सा लगता है, तभी वो गीत में कैसे भी इनका संदर्भ ले ही आते हैं। ’गोगोला’ के गीत में उन्होंने लिखा था "चाँद सा गोरा, बेमतवाला", और इस गीत में वो लिखते हैं "गोरी गोरी रात गई सौतन को"। यहाँ "गोरी गोरी रात" का शाब्दिक अर्थ चाँदनी रात है, पर भाव मिलन की रात से है।


"गोरी गोरी रात गई सौतन को
समझा दिया था मैंने बालपन को
कैसे समझाऊँ हाय राम जोबन को"


’वीर छत्रसाल’ फ़िल्म में ही सुमन कलयाणपुर का ही गाया एक और गीत है "निंबुआ पे आओ मेरे अम्बुआ पे आओ, आओ रे पखेरु मेरी बगिया में आओ"। बालकवि बैरागी ने फिर एक बार प्रकृति से रूपक उधार लेकर कितनी सुनदरता से एक नारी के मन की आस का वर्णन किया है जब वो लिखते हैं - "ना कोई माली ना रखवारा, फगुना ने कस मस अंग कस डाला"।


"दिन नहीं चैन रात नहीं निंदिया
तुमको पुकारे मेरी भौरी अमरैया
भौरी अमरैया को मत तरसाओ रे
आओ मेरी अम्बिया में चोंच गढ़ाओ"


1971 के वर्ष ही आई थी ’रेशमा और शेरा’ जिसके "तू चंदा मैं चांदनी" ने बालकवि बैरागी को, कुछ समय के लिए ही सही, चर्चित गीतकारों की श्रेणी में ला खड़ा कर दिया। फिर एक बार चाँद और चांदनी के रूपक का प्रयोग कर एक ख़ूबसूरत मांड आधारित रचना का सृजन किया। मांड पर बनने वाली फ़िल्मी रचनाओं में इस रचना का स्थान शीर्ष पर है और इसके बाद फिर कभी किसी फ़िल्म में मांड की इतनी सुन्दर रचना सुनने को नहीं मिली। ’तू ये है तो मैं वो हूँ’ शैली के गीत शुरू से ही बनते चले आए हैं हिन्दी फ़िल्म संगीत में। "तू मेरा चाँद मैं तेरी चाँदनी", "तू सूरज है मेरी तेरी किरण", "तू दीपक है, मैं ज्योति हूँ" आदि गीतों के बीच फ़िल्म ’रेशमा और शेरा’ का यह मांड भीड़ से बिल्कुल अलग सुनाई देता है।


"तू चंदा मैं चांदनी, तू तरुवर मैं शाख रे
तू बादल मैं बिजुरी, तू पंछी मैं पात रे"


राजस्थान के रेगिस्तानों की बंजर तपती धरती और साथ ही नायिका के स्वयमावस्था और पिया मिलन की आस को व्यक्त करने के लिए बैरागी जी कितने सुन्दर शब्दों में लिखते हैं -


"ना सरोवर, ना बावड़ी, ना कोई ठंडी छांव
ना कोयल, ना पपीहरा, ऐसा मेरा गांव रे
कहाँ बुझे तन की तपन, ओ सैयां सिरमोड़
चंद्र-किरन को छोड़ कर, जाए कहाँ चकोर
जाग उठी है सांवरे, मेरी कुँवारी प्यास रे
(पिया) अंगारे भी लगने लगे, आज मुझे मधुमास रे"


गीत के पहले अन्तरे में जहाँ वर्तमान अवस्था का वर्णन है, वहीं दूसरे अन्तरे में कवि नायिका के मन की इच्छा को व्यक्त करते हुए लिखते हैं - 


"तुझे आंचल मैं रखूँगी ओ सांवरे
काली अलकों से बाँधूँगी ये पांव रे
गल बैयाँ वो डालूं की छूटे नहीं
तेरा सपना साजन अब टूटे नहीं
मेंहदी रची हथेलियाँ, मेरे काजर-वारे नैन रे
(पिया) पल पल तुझे पुकारते, हो हो कर बेचैन रे"


और अन्तिम अन्तरे में साजन को सावन का रूपक दिया गया है। जिस तरह से रेगिस्तान की तपती बंजर धरती पर सावन की फुहार किसी अमृत वर्षा से कम नहीं होती, वैसे ही अपने साजन का सान्निध्य पा कर जैसे मन मयूर बन नाचने लगा है। 


"ओ मेरे सावन साजन, ओ मेरे सिंदूर
साजन संग सजनी बनी, मौसम संग मयूर"


फिर से ’चांदनी’ पे वापस आते हुए वो लिखते हैं - 


"चार पहर की चांदनी, मेरे संग बिता
अपने हाथों से पिया मोहे लाल चुनर उढ़ा
केसरिया धरती लगे, अम्बर लालम-लाल रे
अंग लगा कर साहेबा रे, कर दे मुझे निहाल रे"


बैरागी जी के निधन पर फ़िल्म ’रेशमा और शेरा’ के इस गीत के संबंध में विविध भारती के लोकप्रिय उद्‍घोषक यूनुस ख़ान ने अपने फ़ेसबूक पेज पर लिखा है - "रेशमा और शेरा की प्रसिद्ध मांड पर हमेशा गर्व से अनाउन्स किया, गीतकार बालकवि बैरागी"। जयदेव के संगीत में यह गीत इतना लोकप्रिय हुआ कि अगले ही साल जयदेव के संगीत से सजी फ़िल्म ’दो बूंद पानी’ में कैफ़ी आज़मी जैसे गीतकार के होने के बावजूब एक गीत बालकवि बैरागी से लिखवाया गया। दरसल यह फ़िल्म भी राजस्थान की पृष्ठभूमि पर बनी जिसमें पानी की समस्या को दर्शाया गया है। लक्ष्मी शंकर और सखियों की आवाज़ में यह गीत है "बन्नी तेरी बिंदिया की ले लूँ रे बल‍इयाँ..."। जितना सुमधुर जयदेव का संगीत है, उतनी ही सुरीली आवाज़ लक्ष्मी शंकर की, और ग्राम्य भाषा में बालकवि बैरागी के बोलों ने इस गीत को फ़िल्म संगीत के धरोहर का एक अनमोल गीत बना दिया है। फ़िल्म के नायक जब शादी करके अपनी दुल्हन ले आता है, तो नायक की बहन और उसकी सखियाँ किस तरह से नई भाभी का स्वागत करती हैं, कैसे कैसे शब्दों से उसे दुआएँ देती हैं, ये ही सब बातें हैं इस गीत में।


"बन्नी तेरी बिन्दिया की ले लूँ रे बल‍इयाँ
भाभी तेरी बिन्दिया की ले लूँ रे बल‍इयाँ
दियेना सी दमके लाजो की सुरतिया
कर दी उजारी मेरे भैया की रतियाँ
महका दी गोरी तूने ये फुलवारी
देवी मैया दे तुझे लाल हजारी
लछमी सी मेरी रानी
भतीजे की मीठी बानी मांगे रे ननंदिया"


दो अन्तरों वाले इस गीत के पहले अन्तरे में दुआओं में अपनी भाभी को ननंद पुत्रवती होने की दुआ दे रही है तो दूसरे अन्तरे में उसे सौभाग्यवती (सदा सुहागन) और समृद्ध होने का आशिर्वाद दे रही है। इसमें कोई संदेह नहीं कि जब जब लोक धुनों पर आधारित फ़िल्मी गीतों की चर्चा होगी, फ़िल्म ’दू बूंद पानी’ के बालकवि बैरागी के लिखे इस गीत को बड़े सम्मान के साथ लिया जाएगा। ख़्वाजा अहमद अब्बास निर्देशित इस फ़िल्म को यादगार बनाने में इसके अनोखे गीतों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है, और इसके लिए जिन कलाकारों को श्रेय जाता है, उनमें एक नाम बैरागी जी का भी है।


"लाली लाली रहे तेरी लाली रे चुनरिया
जोड़वे को लग जाए मेरी रे उमरिया
चांद सूरज हों तेरे पनिहारे
चाकर हों तेरे नौ लख तारे
भैया जी की बगिया से
बन्नी तेरी बगिया से बिछड़े ना छैयां"


1977 में एक फ़िल्म आई थी ’जादू टोना’ जिसमें आशा भोसले के बेटे हेमन्त भोसले संगीतकार थे और उनकी बेटी वर्षा भोसले ने कुछ गीत गाए। बालकवि बैरागी ने इस फ़िल्म में एक ख़ूबसूरत गीत लिखा "ये गाँव प्यारा प्यारा ये लवली लवली गाँव"। इस गीत की ख़ास बात यह है कि यह एक बाल गीत है, जिसमें गाँव की बातें हैं, लेकिन इन बातों को देहाती भाषा में ना कह कर आधुनिक भाषा में कहा गया है और अंग्रेज़ी के "लवली" शब्द को भी बड़ी ख़ूबसूरती से इसमें शामिल किया गया है। बालकवि बैरागी की लिखी बाल कविताएँ बहुत प्रचलित रही हैं। ’शिशुओं के लिए पाँच कविताएँ’ के पाँच खण्ड प्रकाशित हुए हैं। यह गीत भी दरसल एक बाल कविता ही है। यह अफ़सोसजनक बात है कि सिने संगीत जगत में बच्चों के गीत बहुत कम होने के बावजूद इस सुन्दर रचना की तरफ़ ज़्यादा ध्यान किसी का नहीं गया।


"ये गाँव प्यारा प्यारा, ये लवली लवली गाँव
ये हरियाली पीपल की घनी छाँव
राजा बेटा धरती का प्यारा प्यारा गाँव

ये फूल सा जहाँ इसमें आग ही कहाँ
प्यार के सिवा कुछ भी क्यों नहीं यहाँ
क्या हो गया मुझे ये प्यार ये लगाव
अब मेरा ये हो गया है दादी तेरा गाँव

आज़ाद है हवा आकाश है खुला
रंग जिस कदर ये तालाब में बुना
हसीन दादी सा श्रॄंगार ना बना
तेरे ही जैसा है ये दादी तेरा गाँव"


1978 में ’पल दो पल का साथ’ शीर्षक से एक कमचर्चित फ़िल्म आई थी जिसमें श्याम सागर का संगीत था और फ़िल्म के चार गीत चार अलग-अलग गीतकारों के लिखे हुए थे - देव कोहली, नक्श ल्यालपुरी, योगेश और बालकवि बैरागी। बैरागी जी का लिखा आशा भोसले का गाया गीत "सजा ली तेरी बिन्दिया, रचा ली तेरी मेहंदी" लोक शैली का गीत है। मुखड़े की दूसरी पंक्ति में बैरागी जी ने "ये राधा कन्हैया का नाम कैसे ले" के प्रयोग से गीत के स्तर को ऊँचा कर दिया है।


"इधर झांके पर्वत, उधर देखे नदियाँ
ये झरनों के पहरे लगे हैं सांवरे
तू मनचआही सैयां की बैयां थाम कैसे ले
ये राधा कन्हैया का नाम कैसे ले"


1985 में अमोल पालेकर द्वारा निर्मित व निर्देशित फ़िल्म ’अनकही’ आई थी जो काफ़ी चर्चा में रही। अमोल पालेकर, दीप्ति नवल, श्रीराम लागू के अभिनय से सजी इस फ़िल्म का संगीत जयदेव ने तैयार किया व फ़िल्म के चार गीतों में से दो में आशा भोसले की और बाकी दो गीतों में भीमसेन जोशी की आवाज़ें थीं। फ़िल्म के गीतकार के रूप में एक गीत पारम्परिक, एक गीत तुलसीदास रचित, एक गीत कबीरदास की रचना, और एक गीत के गीतकार थे बालकवि बैरागी। बैरागी जी का लिखा भक्ति रस आधारित रचना "मुझको भी राधा बना ले नन्दलाल" एक अत्यन्त सुमधुर व उच्चस्तरीय रचना है जिसे बहुत कम सुना गया है। फ़िल्म की कहानी में कैसे इस राधा-कृष्ण आधारित भक्ति रचना को जगह दी गई होगी, यह तो नहीं पता, लेकिन इसमें कोई संशय नहीं कि इस गीत का इशारा नायिका के मन के भाव से ही संबंधित रहा होगा। सितार के सुन्दर प्रयोग ने भक्ति रस को भी गहरा कर दिया है। शास्त्रीय संगीत के साथ-साथ लोक शैली का एक अंग है इस गीत में जिसने इसकी मधुरता में चार चाँद लगा दिया है। बालकवि बैरागी के लिखे जितने भी लोक शैली की रचनाओं का अब तक उल्लेख किया गया है, वो सभी ऐसी रचनाएँ हैं जिनमें नारी के मनोभाव का वर्णन है। कभी छोटी बच्ची, कभी प्रेमिका, कभी पत्नी, कभी कोठे की नर्तकी, और कभी ननंद के होठों पर सजे बालकवि बैरागी की ये फ़िल्मी रचनाएँ।


"जसोदा के अंगना में दूंगी गुहारी
तेरी मुरलिया को दूंगी ना गारी
मटकी लुटा दूंगी माखन की सारी
जमुना किनारे रखूंगी सजाके
काया का केसरिया थाल
मुझको भी राधा बना ले नन्दलाल"


बालकवि बैरागी ने केवल नौ हिन्दी फ़िल्मों में गीत लिखे हैं, और इनमें से अधिकतर फ़िल्मों में उन्होंने कम से कम एक गीत हमारी ग्राम्य संस्कृति के पार्श्व पर ज़रूर लिखा है। उनके लिखे हर गीत को सुनते हुए यह महसूस होता है कि वो दूसरे गीतकारों से कितने अलग रहे। उनके लिखे फ़िल्मी गीतों की संख्या अधिक नहीं है, लेकिन उनका हर गीत मास्टरपीस कहलाने लायक है। ’रेडियो प्लेबैक इंडिया’ करता है इस अनोखे गीतकार को सलाम!




आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!




शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Saturday, May 12, 2018

चित्रकथा - 68: इस दशक के नवोदित नायक (भाग - 10)

अंक - 68

इस दशक के नवोदित नायक (भाग - 10)

"नहीं समझे हैं वो हमें, तो क्या जाता है..." 




हर रोज़ देश के कोने कोने से न जाने कितने युवक युवतियाँ आँखों में सपने लिए माया नगरी मुंबई के रेल्वे स्टेशन पर उतरते हैं। फ़िल्मी दुनिया की चमक-दमक से प्रभावित होकर स्टार बनने का सपना लिए छोटे बड़े शहरों, कसबों और गाँवों से मुंबई की धरती पर क़दम रखते हैं। और फिर शुरु होता है संघर्ष। मेहनत, बुद्धि, प्रतिभा और क़िस्मत, इन सभी के सही मेल-जोल से इन लाखों युवक युवतियों में से कुछ गिने चुने लोग ही ग्लैमर की इस दुनिया में मुकाम बना पाते हैं। और कुछ फ़िल्मी घरानों से ताल्लुख रखते हैं जिनके लिए फ़िल्मों में क़दम रखना तो कुछ आसान होता है लेकिन आगे वही बढ़ता है जिसमें कुछ बात होती है। हर दशक की तरह वर्तमान दशक में भी ऐसे कई युवक फ़िल्मी दुनिया में क़दम जमाए हैं जिनमें से कुछ बेहद कामयाब हुए तो कुछ कामयाबी की दिशा में अग्रसर हो रहे हैं। कुल मिला कर फ़िल्मी दुनिया में आने के बाद भी उनका संघर्ष जारी है यहाँ टिके रहने के लिए। ’चित्रकथा’ के अन्तर्गत पिछले कुछ समय से हम चला रहे हैं इस दशक के नवोदित नायकों पर केन्द्रित यह लघु श्रॄंखला जिसमें हम बातें करते हैं वर्तमान दशक में अपना करीअर शुरु करने वाले नायकों की। प्रस्तुत है ’इस दशक के नवोदित नायक’ श्रॄंखला की दसवीं कड़ी।



Johny Baweja, Kanan Gill
छोटे-बड़े शहरों से नवयुवकों का मायानगरी मुंबई आ कर फ़िल्म जगत में नायक बनने का सपना कोई नई बात नहीं है। यह सिलसिला शुरू से ही चली आ रही है। लेकिन वर्तमान दशक में नवागंतुकों की संख्या में बहुत बड़ी वृद्धि हुई है। इस श्रॄंखला में अब तक इस दशक के नवोदित कुल 97 अभिनेता नायकों की बात हम कर चुके हैं और सूची अभी भी काफ़ी लम्बी है। आज शुरू करते हैं जॉनी बवेजा से। पंजाब के लुधियाना में जन्में जॉनी बवेजा फ़िल्म निर्माता व वितरक तरलोचन (त्रिलोचन) एस. बवेजा के सुपुत्र हैं और जानेमाने अभिनेता हरमन बवेजा के चचेरे भाई भी। उनका असली नाम है गुरजोत सिंह बवेजा। लुधियाना के गुरु नानक पब्लिक स्कूल से पढ़ाई करने के बाद गुरजोत जलंधर जा कर Apeejay Institute of Management से BCA की डिग्री ली। बचपन से ही ग्लैमर जगत में नाम कमाने की तमन्ना रखने वाले गुरजोत चंडीगढ़ जा कर दो साल तक थिएटर में अभिनय किया और इस तरह से अपने अभिनय क्षमता का आंकलन किया। गुरजोत ने अपना नाम बदल कर जॉनी रख लिया और मुंबई का रुख़ किया। सुन्दर चेहरे और सुडौल कदकाठी के चलते उन्हें मॉडलिंग् के काम मिलने लगे। साथ ही उन्होंने रोशन तनेजा स्कूल ऑफ़ ऐक्टिंग् में अभिनय की बारीकियाँ सीखने के लिए भर्ती हो गए। वर्ष 2006 में जॉनी बवेजा ने 'Grasim Mr. India' प्रतियोगिता में भाग लिया और फ़ाइन राउण्ड तक पहुँचे। इससे उनका आत्मविश्वास बहुत बढ़ गया। लेकिन फ़िल्मों में ब्रेक के लिए उन्हें और छह साल का इन्तज़ार करना पड़ा। 2012 में जॉनी बवेजा और उनकी दोस्त रीत मजुमदार ने मिल कर एक फ़िल्म में पैसा लगाया और इन दोनों के लिए यह फ़िल्म एक तरह से लौंच पैड बनी। ’SWEN’ (short form of South West East North) नामक इस फ़िल्म की कहानी चार अलग तरह की लड़कियों और उन चारों का एक लड़के अभय से रिश्ते की कहानी थी। अभय की भूमिका में जॉनी ने अच्छा काम तो किया, लेकिन लो बजट की इस फ़िल्म में वह बात नहीं थी जो दर्शकों को अपनी ओर आकर्षित करती। चार साल बाद जॉनी और रीत ने मिल कर फिर एक बार एक फ़िल्म का निर्माण किया। ’A Scandall' नामक यह फ़िल्म चर्चा में रही विवादों की वजह से। इस फ़िल्म में जॉनी और रीत के कुछ ऐसे अन्तरंग दृश्य दिखाए गए जो इससे पहले कभी किसी हिन्दी फ़िल्म में नहीं देखा गया था। साथ ही फ़िल्म के निर्माण के दौरान उन दोनों का एक आपत्तिजनक MMS लीक हो जाने पर विवाद खड़ा हो गया था क्योंकि कुछ लोगों का यह मानना था कि उस MMS को जान बूझ कर फ़िल्म की पब्लिसिटी के लिए लीक किया गया था। लेकिन ये तमाम स्कैन्डल ’A Scandall' को डूबने से बचा ना सके। जॉनी बवेजा ने हार नहीं मानी और अपनी तीसरी फ़िल्म ’अमीरा’ का निर्माण शुरू कर दिया। 2017 में आई इस फ़िल्म में जॉनी ने रीत को अपने से अलग करते हुए अमरीकी अभिनेत्री Candace McAdams के साथ मिल कर इस फ़िल्म का निर्माण किया और उन्हें फ़िल्म की नायिका के रूप में भी कास्ट किया। जॉनी बवेजा की ख़ास बात यह है कि वो अपने तीनों फ़िल्मों में अलग अलग भूमिकाओं में नज़र आए और हर बार कुछ नया करने की कोशिश की है। हम उम्मीद करते हैं कि भविष्य में कामयाबी उनके क़दम चूमे। अगर यह पूछा जाए कि एक ऐसे हास्य कलाकार का नाम बताएँ जो आगे चल कर फ़िल्मी नायक बने हैं, तो शायद सबसे पहले कपिल शर्मा का नाम याद आए। लेकिन इस सवाल का एक जवाब कानन गिल भी है। कानन गिल भी एक स्टैंड-अप कमीडियन हैं जिन्होंने हाल ही में फ़िल्म जगत में पदार्पण किया है। बरेली में जन्में कानन के पिता एक आर्मी अफ़सर रहे। कानन की शिक्षा Ahlcon Public School और Frank Anthony Public School में हुई। Computer Science में B.E. करने के बाद वो software engineer की नौकरी तीन सालों तक करते रहे। इसी दौरान उन्होंने Punchline Bangalore नामक हास्य प्रतियोगिता में भाग लेकर प्रथम स्थान प्राप्त किया। फिर मुंबई में Comedy Store प्रतियोगिता भी जीता। इसके बाद उन्होंने कॉमेडी में अपना करीअर बनाने की सोची। उन्होंने एक म्युज़िक बैण्ड बनाई जिसके वो मुख्य गायक बने और मज़ेदार गीतों की रचना करने लगे। Youtube पर उनकी सीरीज़ Pretentious Movie Reviews को काफ़ी प्रसिद्धी मिली। 2017 में सुनील सिप्पी की हास्य-ड्रामा फ़िल्म ’नूर’ में उन्हें कास्ट किया गया। फ़िल्म की नायिका और शीर्षक चरित्र की भूमिका में सोनाक्षी सिंहा थीं। साद सहगल की भूमिका में कानन गिल ने अपने अभिनय से दर्शकों को गुदगुदाया। फ़िल्म की कहानी आम फ़िल्मी कहानियों से अलग हट कर होने के बावजूद कुछ ख़ास नहीं चली। अब देखना यह है कि क्या कानन फ़िल्मों में बने रहते हैं या फिर वो केवल हास्य कार्यक्रमों का ही हिस्सा बनते हैं। 

Kashyap, Ankur Verma
2017 में ’लव यू फ़ैमिली’ और ’सल्लु की शादी’ जैसी फ़िल्मों के ज़रिए फ़िल्म जगत में पदार्पण करने वाले नवोदित नायक हैं कश्यप। सुन्दर चेहरा, प्रतिभा और मेहनत करने की क्षमता व इच्छा के धनी कश्यप ने 2017 में इन दो फ़िल्मों के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। ख़ास तौर से ’लव यू फ़मिली’ में उनके अभिनय की प्रशंसा फ़िल्म समालोचकों ने की है। महानगरों में भले ये दोनों फ़िल्में ख़ास ना चली हों, लेकिन मध्यम और छोटे शहरों में प्रदर्शन अच्छा रहा। कश्यप बताते हैं कि वो अभिनेता सलमान ख़ान के बहुत बड़े फ़ैन हैं, और इसी वजह से ’सल्लु की शादी’ फ़िल्म में उनके द्वारा निभाए चरित्र में पूरी तरह से ढल गए, और इसी वजह से उनकी तारीफ़ें हुईं। कश्यप फ़िल्म जगत के जाने-माने टेक्निकल स्पेशलिस्ट व फ़ैशन फ़ोटोग्राफ़र महेश जॉली के सुपुत्र हैं। बचपन से अपने पिता को फ़िल्म जगत से जुड़ा देख कर बड़े होने वाले कश्यप के मन में भी बचपन से ही फ़िल्मी क्षेत्र में कुछ करने का मन था। युवावस्था में उनकी रुचि अभिनय में हुई और इस तरह से वो अपने सपनों और इच्छाओं को रूप प्रदान करने इस क्षेत्र में कूद पड़े हैं। जॉनी बवेजा की तरह कश्यप ने भी रोशन तनेजा से अभिनय की बारीकियाँ सीखी और ऐनिमेशन में डिग्री कोर्स भी किया। मार्शल आर्ट्स और नृत्य में भी उनकी गहरी रुचि है, जो उन्हें बहुमुखी प्रतिभा के धनी बनाते हैं। उनकी शुरुआती दो फ़िल्मों में उनके अभिनय से प्रभावित होकर कई फ़िल्मकारों ने उन्हें आनेवाली फ़िल्मों के लिए न्योता दिया है, जिनमें वरिष्ठ अभिनेता अनुपम खेर के साथ एक फ़िल्म भी शामिल है। कुल मिला कर यह कहा जा सकता है कि युवा अभिनेता कश्यप फ़िल्म जगत में अपने क़दम जमाने शुरु कर दिए हैं और यकीनन वो एक लम्बी रेस दौड़ने वाले हैं। 2018 में अपना फ़िल्मी सफ़र शुरू करने वाले
Arpit Soni
अभिनेताओं में एक नाम है
मोहित अरोड़ा का। फ़िल्म थी ’हसीना’। इस फ़िल्म में उन्होंने राजन का किरदार निभाया था। विक्की राणावत द्वारा निर्मित व निर्देशित यह फ़िल्म युवाओं की फ़िल्म है जिसमें तीन युवक हैं जो एक सुन्दर हसीना को पाने के लिए अपने अपने तरीके इख़्तियार करते हैं। ये तीन युवक हैं रोहित, राहुल और राजन। रोहित की भूमिका में अर्पित सोनी, राहुल की भूमिका में अंकुर वर्मा और राजन की भूमिका में मोहित अरोड़ा हसीना (लीना कपूर) को रिझाने की कोशिश करते हैं। 5 जनवरी 2018 को प्रदर्शित यह फ़िल्म अपनी कमज़ोर कहानी की वजह से असफल सिद्ध हुई, और मोहित अरोड़ा के साथ-साथ अन्य दो अभिनेता भी नज़रंदाज़ हो गए। 28-वर्षीय अंकुर वर्मा रोहतक, हरियाणा से ताल्लुख रखते हैं। उन्होंने टेलीविज़न से अपना करिअर शुरू किया, धारावाहिक का नाम - ’जमुना पार’। उन्हें प्रसिद्धी मिली ’सुहानी सी एक लड़की’ में कृष्णा के किरदार से। उनके सुन्दर मुखमंडल और सुन्दर आँखों की वजह से उन्हें पौराणिक धारावाहिक ’संकटमोचन महाबली हनुमान’ में लक्ष्मण का चरित्र निभाने का अवसर मिला। 2016 में ’हमको तुमसे हो गया है प्यार क्या करें’ धारावाहिक में भी वो लोकप्रिय रहे। फ़िल्मों में उनका आगमन ’हसीना’ में हुआ, और अब आने वाले समय में उनके अभिनय से सजी और भी फ़िल्मों का इन्तज़ार उनके चाहनेवालों को रहेगा। इसी फ़िल्म से अपना फ़िल्मी शुरू करने वाले तीसरे अभिनेता अर्पित सोनी भी अपने कॉलेज के दिनों से ही तरह तरह के सांस्कृतिक कार्यक्रमों व प्रतियोगिताओं में भाग लिया करते थे, जिनमें स्टेज ड्रामा भी शामिल थे। पढ़ाई के दौरान ही अर्पित थिएटर से जुड़े और दो सालों तक पूरी शिद्दत के साथ नाटकों में हिस्सा लिया। पढ़ाई ख़त्म होते ही उन्होंने मुंबई का रुख़ किया और अभिनय के कोर्स में भर्ती हो गए। टेलीविज़न पर उन्हें मौका मिला ’लव बाइ चान्स’ और ’गुमराह’ जैसे शोज़ में। फ़िल्म ’हसीना’ के लिए जब विक्की राणावत नए चेहरों की तलाश कर रहे थे तब बहुत से नए युवाओं के साथ साथ इन तीनों ने भी ऑडिशन दिया, और फ़िल्म के तीनों चरित्रों के लिए इन तीनों का नाम आख़िर में फ़ाइनल किया गया। फ़िल्म के निर्माण के संबंध में लिए गए साक्षात्कार में अर्पित, अंकुर और मोहित बताते हैं कि साथ में अभिनय करते हुए उनकी आपस में बहुत अच्छी दोस्ती हो गई है और फ़िल्म पूरी हो जाने के बाद भी वो तीनों एक दूसरे के सम्पर्क में हैं और जब भी मौका मिलता है, वो एक दूसरे से मिलते हैं या फ़ोन पर बातें करते हैं। एक ही फ़िल्म से शुरुआत करने वाले इन तीनों अभिनेताओं के भविष्य में क्या लिखा है, यह कोई नहीं बता सकता। इस वक़्त तीनों एक ही पायदान पर खड़े हैं, और यह तो आने वाला समय ही बताएगा कि अर्पित, अंकुर और मोहित में कौन कितना कामयाब हो पाता है।


Mohit Marwah, Namit Khanna, Nishant Dahiya
फ़िल्मी परिवार से ताल्लुख़ रखने वाले नवोदित नायकों में एक नाम मोहित मारवाह का है। 1984 में जन्में 34-वर्षीय मोहित मारवाह नोएडा फ़िल्म सिटी के संस्थापक संदीप मारवाह के सुपुत्र हैं। उनकी माँ रीना मारवाह सुरिन्दर कपूर की सुपुत्री अर्थात् बोनी कपूर, अनिल कपूर और संजय कपूर की बहन हैं। मोहित का विवाह टिना मुनीम की भांजी अन्तरा मोतीवाला से हाल ही में सम्पन्न हुई। इसी समारोह में सम्मिलित होने के लिए मोहित की मामी श्रीदेवी दुब‍ई गईं थीं जहाँ उनका निधन हुआ। Don Bosco School और दिल्ली विश्वविद्यालय से पढ़ाई करने के बाद मोहित Asian Academy of Film & Television में दाख़िल हुए जहाँ उन्होंने फ़िल्म निर्माण के विभिन्न पक्षों के बारे में जाना, सीखा। इसके बाद वो विक्रम भट्ट के सहायक निर्देशक बने और फ़िल्म निर्माण के वास्तविक रूप को क़रीब से देखा। फ़िल्म निर्माण से जुड़े तमाम अनुभवों को अपने में समा कर मोहित मारवाह अपने अभिनय क्षमता को और भी ज़्यादा निखारने के लिए अमरीका के न्यु यॉर्क स्थित Lee Strasberg Acting School में भर्ती हो गए। उनके इस रुझान और मेहनत करने की चाह से उनके परिवार के सभी सदस्य प्रभावित हुए। विक्रम भट्ट के साथ काम करते समय उन्होंने वर्ष 2005 की कई फ़िल्मों की निर्माण प्रक्रिया को क़रीब से देखा जिनमें शामिल हैं ’ऐलान’, 'जुर्म’, और ’दीवाने हुए पागल’। मोहित के छोटे भाई अक्षय मारवाह द्वारा निर्मित लघु फ़िल्म ’The Audition’ में अभिनय से उनका अभिनय सफ़र शुरु हुआ। आगे चल कर करण जोहर की एक लघु फ़िल्म ’Strangers in the Night’ में भी उन्होंने अभिनय किया। बॉलीवूड में उन्हें पहला ब्रेक मिला 2014 में जब अक्ष्य कुमार ने अपनी फ़िल्म ’फ़गली’ के लिए उन्हें चुना। इस फ़िल्म के बाद मोहित मारवाह को लोग पहचानने लगे और 2014 में ही GQ India ने उन्हें Best Dressed Men in Bollywood के ख़िताब से सम्मानित किया। कई बड़े फ़ैशन डिज़ाइनरों की पहली पसंद रह चुके मोहित मारवाह कई कंपनियों और उत्पादों के ब्रैंड ऐम्बासैडर भी रहे हैं। 2017 में टिग्मांशु धुलिया निर्देशित उल्लेखनीय फ़िल्म आई थी ’राग देश’। यह पीरियड फ़िल्म भारतीय सेना के तीन अफ़सरों के कोर्ट मार्शल की कहानी थी। ये आर्मी अफ़सर थे कर्नल प्रेम सहगल, कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों और मेजर शाह अनाव ख़ाँ। क्रम से इन तीन चरित्रों को निभाया मोहित मारवाह, अमित साध और कुणाल कपूर ने। यह फ़िल्म व्यावसायिक फ़िल्म नहीं थी, इसलिए आम जनता में ख़ास चर्चित नहीं हुई, लेकिन ’राज्य सभा टीवी’ द्वारा निर्मित इस फ़िल्म को "क्रिटिकल अक्लेम" मिला। मोहित मारवाह का सफ़र जारी है, उनके अगले फ़िल्म की प्रतीक्षा सभी को है। लंदन में जन्में नमित खन्ना मॉडलिंग् की दुनिया का एक जानामाना नाम रहे हैं। 24-वर्षीय नमित के पसंदीदा नायक रहे हैं शाहरुख़ ख़ान, इरफ़ान ख़ान और आमिर ख़ान। निर्देशकों में वो मीरा नायर और ज़ोया अख़्तर की फ़िल्मों से प्रभावित हुए हैं। फ़ैशन जगत में अपना मुकाम बना चुके नमित खन्ना वर्ष 2013 में फ़िल्म जगत के मैदान में उतरे फ़िल्म ’बैंग् बैंग् बैंकॉक’ से। इस फ़िल्म में उनके अभिनय को काफ़ी सराहा गया था, लेकिन फ़िल्म के ना चलने से उनकी तरफ़ दर्शकों का ध्यान कम ही गया। इस फ़िल्म के बाद अभी तक वो किसी अन्य फ़िल्म में नज़र तो नहीं आए, लेकिन एक वेब-सीरीज़ में उनका काफ़ी नाम हुआ। ’ट्विस्टेड’ नामक इस कामुक व रहस्य आधारित वेब सीरीज़ के लिए इसके निर्देशकों को एक ऐसे नायक की तलाश थी जो अपने शरीर, चेहरे, आँखों और अभिनय से इस सीरीज़ में जान फूंक सके। ये तमाम बातें उन्हें नमित में दिखीं। यह सीरीज़ हिट साबित हुई। इन दिनों नमित खन्ना छोटे परदे पर नज़र आ रहे हैं नई धारावाहिक ’ये प्यार नहीं तो क्या है’ में। सिद्धांत के चरित्र में नमित अपने आप को बख़ूबी ढाल लिया है, जिस वजह से बहुत ही कम समय में इस धारावाहिक की TRP काफ़ी उपर जा चुकी है। जहाँ तक फ़िल्मों की बात है, यह वक़्त ही बताएगा कि नमित कितने सफल हो पाते हैं। मध्यप्रदेश के मऊ में जन्में निशान्त दहिया आर्मी अफ़सर राजेन्द्र दहिया के सुपुत्र हैं। मूलत: सोनीपत हरियाणा के, पर बचपन में कई जगहों पर रह चुके निशान्त अन्त में दिल्ली आकर बसे। हाइ स्कूल के बाद मेधावी छात्र निशान्त हरियाणा के कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से कम्प्युटर साइन्स में इंजिनीयरिंग् (B.Tech) की। लेकिन इसके तुरन्त बाद उन्होंने यूंही Grasim Mr. India प्रतियोगिता में हिस्सा लिया और दूसरे स्थान पर विराजमान हुए। उनकी मुस्कान को श्रेष्ठ मुस्कान का पुरस्कार भी मिला। यह 2006 की बात थी। कई और ग्लैमर पुरस्कारों के विजेता रह चुके निशान्त दहिया के लिए मॉडलिंग् का द्वार खुल गया। बहुत से विज्ञापनों में नज़र आने के बाद ’यश राज फ़िल्म्स’ की नज़र उन पर पड़ी और 2011 में उन्हें कास्ट किया गया ’मुझसे फ़्रेन्डशिप करोगे’ फ़िल्म में। इस फ़िल्म में निशान्त के अभिनय की प्रशंसा हुई। दो नायकों वाली इस फ़िल्म से शुरुआत करने की वजह से निशान्त को फ़िल्म के मुख्य नायक साक़ीब सलीम से अभिनय का टक्कर लेना पड़ा, जिसमें वो खरे उतरे।  इसके बाद 2014 में ’टिटू एम.बी.ए’ में वो फिर एक बार नज़र आए और इस बार वो एकल नायक के रूप में फ़िल्म की बागडोर संभाली। फ़िल्म में उनका चरित्र मिला-जुला था। फ़िल्म के शीर्षक में MBA को MBA की डिग्री ना समझा जाए, MBA का अर्थ है ’married but available'। इससे आप टिटू के चरित्र की कल्पना कर सकते हैं। इस तरह के चरित्र के साथ निशान्त ने पूरा-पूरा न्याय किया जो इस फ़िल्म को देख कर पता चलता है। निशान्त दहिया की तीसरी फ़िल्म 2017 में प्रदर्शित हुई - ’मेरी प्यारी बिंदू’ जिसमें आयुष्मान खुराना और परिनीति चोपड़ा मुख्य किरदारों में दिखे। इस फ़िल्म में निशान्त की एक छोटी सी भूमिका रही। निशान्त की कदकाठी, शख्सियत और अभिनय क्षमता को देखते हुए लगता है कि आने वाले समय में वो और भी कई फ़िल्मों में नज़र आएंगे, बाक़ी क़िस्मत की बात क़िस्मत ही जाने!

Chirag Malhotra, Pranay Pachauri
वर्ष 2015 में समलैंगिक्ता पर रिखिल बहादुर ने एक फ़िल्म बनाई थी - ’टाइम आउट’। जिस तरह से युवराज पराशर और कपिल शर्मा ने ’Dunno Y...' जैसी समलैंगिक फ़िल्म से अपनी पारी की शुरुआत की थी, वैसे ही ’टाइम आउट’ में दो नवयुवक मुख्य भूमिकाओं में नज़र आए - प्रणय पचौरी और चिराग मल्होत्रा। इस तरह की ऑफ़बीट फ़िल्म से अपना करिअर शुरू करना ख़तरे से ख़ाली नहीं, यह जानते हुए भी ये दोनों अभिनेता ने इस चुनौती को स्वीकारा। प्रणय पचौरी ने एक साक्षात्कार में बताया कि उनके माता-पिता इस फ़िल्म को करने के उनके फ़ैसले से ख़ुश नहीं थे, पर प्रणय का यह मानना था कि एक अभिनेता के लिए यह कोई मायने नहीं रखता कि वो कौन सा किरदार निभा रहा है। अलग अलग तरह के किरदार निभाने की लालसा के चलते उन्होंने यह फ़िल्म साइन कर ली। आमतौर पर फ़िल्मों में समलैंगिक चरित्र को हास्य का पात्र बना दिया जाता है, लेकिन कुछ फ़िल्मकार हैं जो समलैंगिकता को बहुत समझदारी से चित्रित करते हैं। ’टाइम आउट’ एक ऐसी ही फ़िल्म है जिसमें प्रणय द्वारा निभाया चरित्र अपनी समलैंगिक्ता को दुनिया के सामने बताने में झिझकता है। दिल्ली में पले बढ़े प्रणय 2014 में मुंबई स्थानान्तरित हुए थे। दिल्ली के ’शहीद भगत सिंह कॉलेज’ से स्नातक करने के बाद उनके पिता चाहते थे कि वो CA बने, लेकिन अभिनय में गहरी दिलचस्पी रखने वाले प्रणय ने मुंबई का रास्ता इख़्तियार किया। कुछ दिन रहने के बाद पंकज की एक दोस्त ने उन्हें बताया कि रिखिल बहादुर एक नए चेहरे की तलाश कर रहे हैं अपनी समलैंगिक्ता विषय की फ़िल्म के लिए जिसे बास्केटबॉल खेलना आता हो। प्रणय ने ऑडिशन दिया, पास हुए पर इस शर्त से कि वो एक महीने के अन्दर 13 किलो वज़न घटा लेंगे। प्रणय ने चुनौती स्वीकारा और कर दिखाया। प्रणय पचौरी कहानियाँ भी लिखते हैं और उनकी मनोकामना है कि एक दिन उनकी लिखी कहानी पर फ़िल्म बने। शाहरुख़ ख़ान और रॉबर्ट डी नीरो से प्रेरणा लेने वाले प्रणय पचौरी आने वाले समय में अयन मुखर्जी, आशुतोष गोवारिकर, राकेश ओमप्रकाश मेहरा और यश राज फ़िल्म के साथ काम करना चाहते हैं। 2015 में ही प्रणय ’अलिशा’ और 2018 में ’पी.एम. सेल्फ़ीवाले’ जैसे टीवी शोज़ में नज़र आए हैं। फ़िल्मों में उनके क़िस्मत का सितारा कितना बुलंद रहता है, यह आने वाला समय ही बताएगा। ’टाइम आउट’ के दूसरे नायक चिराग मल्होत्रा की भी यह पहली फ़िल्म थी। बचपन से चिराग अपने स्कूल के नाटकों में हिस्सा लिया करते थे और वहीं पर अभिनय की बीज उनके अन्दर अंकुरित हुई। आगे चल कर जब उन्होंने अभिनय को अपना करिअर बनाने का निर्णय लिया, तब मुंबई आ कर ऐक्टिंग् की कोर्स में भर्ती हो गए। बास्केटबॉल खेल पाने की काबिलियत की वजह से उन्हें भी इस फ़िल्म के लिए रिखिल ने चुन लिया। फ़िल्म की व्यावसायिक तौर पर ना चलने की वजह से चिराग के अभिनय की तरफ़ लोगों का ध्यान नहीं गया और वो आज अपनी दूसरी फ़िल्म का इन्तज़ार कर रहे हैं। फ़िल्म जगत एक ऐसी जगह है जहाँ कई युवक बड़े-बड़े सपने लेकर तो आए, लेकिन सफलता के लिए न जाने कितने सालों तक के संघर्ष का सफ़र तय करना पड़ा। एक ऐसे ही युवक हैं राहुल शर्मा जो पहली बार 2015 में रिखिल बहादुर की फ़िल्म ’टाइम आउट’ में ही एक छोटी सी भूमिका में नज़र आए थे। पंकज और चिराग तो फ़िल्म के नायक थे, बास्केटबॉल के कोच पी.के की भूमिका में नज़र आए राहुल शर्मा। इस फ़िल्म के बाद 2016 में ’मिस टीचर’ फ़िल्म में वो बतौर नायक नज़र आए। उनके एक साक्षात्कार में उन्होंने बताया कि इस फ़िल्म में अभिनय करने के लिए उन्हें बहुत अफ़सोस है। फ़िल्म जगत में नए नए आने की वजह से उन्हें इस बात का अहसास नहीं था कि वो किस तरह की फ़िल्म में काम करने जा रहे हैं। जब तक उन्हें पता चला कि ’मिस टीचर’ दरसल एक सी-ग्रेड घटिया कामुक फ़िल्म है, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। अनिच्छा के बावजूद आउटडोर शूटिंग् पर पहुँच जाने के बाद उन्हें पता चला कि किस तरह के सीन उन्हें करने हैं। उस समय ना कहने की कोई गुंजाइश नहीं थी। इस फ़िल्म को वो एक बुरा सपना समझ कर भूल जाना चाहते हैं और आने वाले समय में एक दायित्वशील अभिनेता के रूप में उभरना चाहते हैं। राहुल शर्मा की तरह हर संघर्षरत अभिनेता को ’रेडियो प्लेबैक इंडिया’ की तरफ़ से ढेरों शुभकामनाएँ।



आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!





शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 



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