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Saturday, March 23, 2013

स्वाधीनता संग्राम और फ़िल्मी गीत (भाग-3)



विशेष अंक : भाग 3


भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में फिल्म संगीत की भूमिका 



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी पाठकों को सुजॉय चटर्जी का नमस्कार! मित्रों, इन दिनों हर शनिवार को आप हमारी विशेष श्रृंखला 'भारत के स्वाधीनता संग्राम में फ़िल्म-संगीत की भूमिका' पढ़ रहे हैं। पिछले सप्ताह हमने इस विशेष श्रृंखला का दूसरा भाग प्रस्तुत किया था। आज प्रस्तुत है, इस श्रृंखला का तीसरा भाग।


गतांक से आगे...

1943 में ही नितिन बोस निर्देशित फ़िल्म ‘काशीनाथ’ में पंडित भूषण का लिखा, पंकज मल्लिक का स्वरबद्ध किया और असित बरन का गाया एक देशभक्ति गीत था “हम चले वतन की ओर, खेंच रहा है कोई हमको”। सन्‍1944 में मुमताज़ शान्ति, मोतीलाल, शेख मुख्तार, कन्हैयालाल अभिनीत ‘रणजीत मूवीटोन’ की फ़िल्म ‘पगली दुनिया’ में रामानन्द का लिखा और बुलो सी. रानी का स्वरबद्ध किया भोला का गाया एक देश भक्ति गीत था “सोए हुए भारत के मुकद्दर को जगा दे”। यह बुलो सी. रानी की पहली फ़िल्म थी बतौर संगीतकार। पहली फ़िल्म की बात करें तो संगीतकार जोड़ी हुस्नलाल-भगतराम की भी इसी वर्ष पहली फ़िल्म आई ‘चाँद’ जिसमें गीत लिखे क़मर जलालाबादी ने। फ़िल्म का सर्वाधिक लोकप्रिय गीत मंजू की आवाज़ में था, जिसके बोल थे “दो दिलों को ये दुनिया मिलने ही नहीं देती”। पर मंजू, दुर्रानी और साथियों का गाया फ़िल्म का एक देशभक्ति गीत “वतन से चला है वतन का सिपाही” भी फ़िल्म का एक महत्वपूर्ण गीत था। भारत के स्वाधीनता संग्राम में जिस तरह पुरुषों ने अपना बलिदान दिया, वैसे ही महिलाएँ भी पीछे नहीं रहीं। किसी ने अपने गहने दिए तो किसी ने अपना बेटा, किसी ने अपना पति दिया तो बहुत सी महिलाएँ ऐसी भी थीं जो ख़ुद ही लड़ाई के मैदान में उतरीं। ऐसे में महिलाओं को प्रोत्साहित करने हेतु ‘फ़िल्मिस्तान’ की 1944 की फ़िल्म ‘चल चल रे नौजवान’ में रफ़ीक ग़ज़नवी का गाया एक देशभक्ति गीत आया - “आया तूफ़ान आया तूफ़ान, जाग भारत की नारी...”।

1944 की एक और उल्लेखनीय फ़िल्म रही ‘पहले आप’। इस फ़िल्म का महत्व इस बात के लिए बढ़ जाता है कि इसमें मोहम्मद रफ़ी का गाया पहला फ़िल्मी गीत मौजूद है। फ़िल्म के संगीतकार नौशाद अली के शब्दों में – “जब मोहम्मद रफ़ी मेरे पास आए, तब वर्ल्ड वार ख़त्म हुआ चाहता था। मुझे साल याद नहीं। उस वक़्त फ़िल्म प्रोड्यूसर्स को कम से कम एक वार-प्रोपागण्डा फ़िल्म ज़रूर बनानी पड़ती थी। रफ़ी साहब लखनऊ से मेरे पास मेरे वालिद साहब का एक सिफ़ारिशी ख़त लेकर आए। छोटा सा तम्बूरा हाथ में लिए खड़े थे मेरे सामने। मैंने उनसे पूछा कि क्या उन्होंने संगीत सीखा है, तो बोले कि उस्ताद बरकत अली ख़ाँ से सीखा है, जो उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ साहब के छोटे भाई थे। मैंने उनको कहा कि इस वक़्त मेरे पास कोई गीत नहीं है जो मैं उनसे गवा सकता हूँ, पर एक कोरस ज़रूर है जिसमें अगर वो चाहें तो कुछ लाइनें गा सकते हैं। और वह गाना था “हिन्दुस्तां के हम हैं हिन्दुस्तां हमारा, हिन्दू मुस्लिम दोनों की आँखों का तारा”। रफ़ी साहब ने दो लाइने गायीं जिसके लिए उन्हें 10 रुपये दिए गए। शाम, दुर्रानी और कुछ अन्य गायकों ने भी कुछ कुछ लाइनें गायीं।” और इस तरह से मोहम्मद रफ़ी का गाया पहला हिन्दी फ़िल्मी गीत बाहर आया। पर रेकॉर्ड पर इस गीत को “समूह गीत” लिखा गया है। यह गीत न केवल रफ़ी साहब के करियर का एक महत्वपूर्ण गीत बना, बल्कि इसके गीतकार डी. एन. मधोक के लिए भी यह उतना ही महत्वपूर्ण था क्योंकि इस गीत में उनके धर्मनिरपेक्षता के शब्दों के प्रयोग के लिए उन्हें “महाकवि” के शीर्षक से सम्मानित किया गया था। ब्रिटिश राज ने इस गीत का मार्च-पास्ट गीत के रूप में विश्वयुद्ध में इस्तमाल किया। यह गीत न तो स्वाधीनता संग्राम के लिए लिखा गया था और न ही ब्रिटिश राज के ख़िलाफ़, पर साम्प्रदायिक एकता का पाठ ज़रूर इस गीत ने पढ़ाया। एक ऐसा ही साम्प्रदायिक सदभाव सिखाता गीत इसी वर्ष आया ‘कारवाँ पिक्चर्स, बम्बई’ की फ़िल्म ‘भाई’ में। गीतकार ख़ान शातिर ग़ज़नवी का लिखा और मास्टर ग़ुलाम हैदर का स्वरबद्ध किया यह गीत था “हिन्दू मुस्लिम सिख इसाई, आपस में है भाई-भाई”। ‘लक्ष्मी प्रोडक्शन्स’ की फ़िल्म ‘मिस देवी’ में अशोक घोष स्वरबद्ध सुरेन्द्र का गाया एक देशभक्ति गीत था “जागो जागो नव जवान, भारत माता की सन्तान” जिसने नौजवानो को देश पर मर-मिटने के लिए उत्साहित किया।

1945 में ‘इन्द्रपुरी प्रोडक्शन्स, बम्बई’ की एक देशभक्ति फ़िल्म आई थी ‘स्वर्ग से सुंदर देश हमारा’ (अंग्रेज़ी में ‘Call of the Motherland’ के शीर्षक से)। देबकी बोस निर्देशित इस फ़िल्म जो देश भक्ति गीत था उसे फ़िल्म में तीन भागों में विभाजित किया गया था। बोल थे “देश हमारा, सुंदर देश, हमारा, स्वर्ग से सुंदर देश हमारा”। इसी वर्ष की फ़िल्म ‘ग़ुलामी’ में एस. के. पाल का संगीत था। इसमें रेणुका देवी और मसूद परवेज़ ने अभिनय के साथ साथ अपने गीत स्वयं ही गाए। जोश मलीहाबादी का लिखा फ़िल्म का एकमात्र गीत एक देशभक्ति गीत था “ऐ वतन, मेरे वतन, तुझपे मेरी जाँ निसार”, जिसे रेणुका और मसूद ने ही गाए। जोश मलीहाबादी 1925 में हैदराबाद के ओसमानिया यूनिवर्सिटी में कार्यरत थे। पर वहाँ के निज़ाम के विरुद्ध नज़्म लिखने की वजह से उन्हें हैदराबाद से निकाल दिया गया। उसके बाद उन्होंने उर्दू पत्रिका ‘कलीम’ को शुरू किया जिसमें उन्होंने बिल्कुल खुले तरीके से अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाया तथा भारत की स्वाधीनता के पक्ष में कड़े विचार व्यक्त किये। उनकी कलम में वह जोश था कि जल्दी ही लोग उन्हें ‘शायर-ए-इनक़िलाब’ कहने लगे। आगे चलकर जोश मलीहाबादी अपनी लेखनी के माध्यम से स्वाधीनता संग्राम में और ज़ोर-शोर से जुट गये और उस समय के कई बड़े राज नेताओं के निकट सम्पर्क में आये। इनमें पंडित जवाहरलाल नेहरु मुख्य रूप से शामिल थे। ब्रिटिश राज के समाप्त होने के बाद 1947 में जोश ‘आज-कल’ नामक प्रकाशन के सम्पादक बने। इस तरह से जोश मलीहाबादी का लिखा फ़िल्म ‘स्वर्ग से सुंदर देश हमारा’ का शीर्षक गीत फ़िल्म जगत और स्वाधीनता संग्राम, दोनों के लिए बहुत महत्व रखता है। सन् 1945 की कुछ और प्रविष्टियों में ‘भावनानी प्रोडक्शन्स’ की फ़िल्म ‘बीसवीं सदी’ का ज़िक्र आना चाहिए जिसमें पन्नालाल घोष का संगीत था। कहा जाता है कि इस फ़िल्म के संगीत का अधिकांश कार्य अनिल बिस्वास ने ही किया था। फ़िल्म के दो देशभक्ति गीत थे “भारत की सन्तान, हम हैं भारत की सन्तान” और “बीसवीं सदी, बीसवीं सदी, आई है इनक्लाब लिए”। इन गीतों के गायकों की जानकारी नहीं मिल पायी है। पंडित गोबिन्दराम के संगीत में ‘अत्रे पिक्चर्स’ की फ़िल्म ‘परिन्दे’ में ज़ोहराबाई की आवाज़ में देशभक्ति गीत था “डूबते भारत को बचाओ मेरे करतार, तूफ़ान में कश्ती है” जिसे राम मूर्ति चतुर्वेदी ने लिखा था।

‘इण्डियन पीपल थिएटर ऐसोसिएशन’ (IPTA) का गठन 1943-44 में ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ के दौरान हुआ था। इप्टा का उद्देश्य था नामचीन कलाकारों के माध्यम से लोगों में जागरूकता लाना, उनके सामाजिक दायित्वों को याद दिलाना, और राष्ट्रीय एकता के महत्व को समझाना। ख्वाजा अहमद अब्बास (के.ए.अब्बास के नाम से प्रसिद्ध), डॉ. भाभा, अनिल डे’सिल्वा, अली सरदार जाफ़री और दादा शरमालकर द्वारा गठित इप्टा ने बहुत जल्दी ही एक राष्ट्रीय आन्दोलन का दर्जा हासिल कर लिया। भारतीय थिएटर की प्रचलित शैलियों से आगे निकलकर इप्टा ने इस क्षेत्र में नई क्रान्ति ला दी और अगले छह दशकों में इसमें कई बड़े नाम जुड़े जिनमें शामिल हैं पंडित रविशंकर, कैफ़ी आज़मी, मजरूह सुल्तानपुरी, साहिर लुधियानवी, बलराज साहनी, शैलेन्द्र, प्रेम धवन और भी न जाने कितने। थिएटर के अलावा इप्टा ने कई फ़िल्मों का भी निर्माण किया। 1946 में इप्टा ने बनाई ‘धरती के लाल’ जिसमें इप्टा के कलाकारों ने सारा काम किया। के. ए. अब्बास निर्देशित इस फ़िल्म में शम्भु मित्र, ऊषा दत्त, बलराज साहनी जैसे कलाकारों ने अभिनय का पक्ष सम्भाला तो अली सरदार जाफ़री, प्रेम धवन, नैमीचन्द जैन और वामिक ने गीत लिखे। संगीत था रविशंकर का। कहा जाता है कि बिमल राय की इतिहास रचने वाली फ़िल्म ‘दो बीघा ज़मीन’ इसी फ़िल्म की कहानी पर आधारित थी। बतौर गीतकार प्रेम धवन और अली सरदार जाफ़री की यह पहली फ़िल्म थी। प्रेम धवन ने इप्टा में रहते कई ग़ैर फ़िल्मी गीत भी लिखे थे जिनमें एक गीत “अरे भागो लंदन जाओ” बहुत मशहूर हुआ था। ब्रिटिश राज के ख़िलाफ़ लिखा यह गीत कुछ यूं था – “अरे अब भागो, लंदन जाओ, काहे सौ सौ मकर बनाओ, अरे तुमरी नीयत खोटी, तुमरा हर वादा है बोदा, और लड़ने मरने की बातों में ज़ालिम कैसा सौदा, अरे ख़ून का बदला ख़ून है, सुन लो आज़ादी का भाव, अरे अब भागो लंदन जाओ। अरे कैसे भूलें जलियांवाला बाग़ को कैसे भूलें, अरे कैसे भूलें ऐसे गहरे दाग़ को कैसे भूलें, एक नहीं हमरे सीने पे तो लाखों हैं घाव, अरे अब भागो लंदन जाओ। अरे बरसों चुपके चुपके तुमने जेब हमारी काटी, जाग उठे घर के रखवाले अपनी ख़ैर मनाओ, अरे अब भागो लंदन जाओ। और ये भाड़े के टट्टू राजे ये माटी के माधव, अब इनके भी दिन बीते अब इनके भी बिस्तर बांधो, अरे साहिब अपने संग अपने कुत्ते भी ले जाओ, अरे अब भागो लंदन जाओ।” यह गीत लोगों में बहुत लोकप्रिय हो गया था और ब्रिटिश राज के ख़िलाफ़ कई जल्सों और प्रदर्शनों में इस गीत को गाया गया। इप्टा द्वारा निर्मित 1946 की एक और फ़िल्म थी ‘नीचा नगर’ जिसे निर्देशित किया चेतन आनन्द ने। इसमें भी रविशंकर का संगीत था और गीत लिखे विश्वामित्र आदिल और मनमोहन आनन्द ने। “उठो के हमें वक़्त की गरदिश ने पुकारा” और “कब तक घिरी रात रहेगी” जैसे गीत इस फ़िल्म में थे जिन्होंने स्वाधीनता के सपने को लोगों के मन-मस्तिष्क में और भी ज़्यादा बुलंद किया। ‘नीचा नगर’ को ‘कान फ़िल्म महोत्सव’ में दिखाया गया था।
अब आप सुनिए 1944 में प्रदर्शित फिल्म 'पहले आप' का वह गीत जिसमे गायक मुहम्मद रफी को पहली बार गाने का अवसर मिला था।


फिल्म पहले आप : ‘हिन्दुस्तान के हम हैं हिन्दुस्तान हमारा...’ : मोहम्मद रफी और साथी




आपको हमारा यह विशेष अंक कैसा लगा, हमे अवश्य लिखिए। आपका प्रिय साप्ताहिक स्तम्भ ‘सिने-पहेली’ बहुत जल्द नई साज-धज के साथ पुनः आरम्भ होगा। आज के इस विशेष अंक के बारे में आप अपने विचार हमे radioplaybackindia@live.com के पते पर अवश्य अवगत कराएँ। 

शोध व आलेख : सुजॉय चटर्जी


Saturday, March 9, 2013

स्वाधीनता संग्राम और फ़िल्मी गीत (भाग-1)


भारत के स्वाधीनता संग्राम में फ़िल्म-संगीत की भूमिका

(भाग-1)

'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी पाठकों को सुजॉय चटर्जी का नमस्कार! मित्रों, आज 'सिने पहेली' के स्थान पर प्रस्तुत है विशेषालेख 'भारत के स्वाधीनता संग्राम में फ़िल्म-संगीत की भूमिका' का प्रथम भाग।                                                                              

1930 के दशक के आते-आते पराधीनता के ज़ंजीरों में जकड़ा हुआ देश आज़ादी के लिए ज़ोर शोर से कोशिशें करने लगा। 14 मार्च 1931 को पहली बोलती फ़िल्म ‘आलम-आरा’ प्रदर्शित हुई तो इसके ठीक नौ दिन बाद, 23 मार्च को भगत सिंह की फाँसी हो गई। समूचे देश का ख़ून खौल उठा। राष्ट्रीयता और देश-प्रेम की भावनाओं को जगाने के लिए फ़िल्म और फ़िल्मी गीत-संगीत मुख्य भूमिकाएँ निभा सकती थीं। पर ब्रिटिश सरकार ने इस तरफ़ भी अपना शिकंजा कसा और समय-समय पर ऐसी फ़िल्मों और गीतों पर पाबंदियाँ लगाई जो देश की जनता को ग़ुलामी के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने के लिए प्रोत्साहित करती थीं। ग़ैर फ़िल्मी गीतों और कविताओं पर भले प्रतिबंध लगा पाना मुश्किल था, पर सेन्सर बोर्ड के माध्यम से फ़िल्मों और फ़िल्मी गीतों पर प्रतिबंध लगाना ज़्यादा मुश्किल कार्य नहीं था। और यही कारण है कि स्वाधीनता से पहले कोई भी फ़िल्म निर्माता शहीद भगत सिंह के जीवन पर फ़िल्म बनाने में असमर्थ रहे। देश आज़ाद होने के बाद उन पर बहुत सी फ़िल्में ज़रूर बनीं।

ब्रिटिश सरकार की लाख पाबंदियों के बावजूद फ़िल्मकारों ने बार-बार अपनी फ़िल्मों के माध्यम से देश की जनता को देश-भक्ति का पाठ पढ़ाया है। स्वाधीनता संग्रामियों की ही तरह ये फ़िल्मकार भी अपनी फ़िल्मों के माध्यम से हमारी स्वाधीनता संग्राम में अंशग्रहण किया और इस दिशा में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। बोलती फ़िल्मों के शुरुआती दो-तीन वर्षों में देश-भक्ति रचनाएँ फ़िल्मों में सुनने को भले न मिली हों, पर 1935 में संगीतकार नागरदास नायक ने प्रफ़ुल्ल राय निर्देशित ‘भारत लक्ष्मी पिक्चर्स’ की फ़िल्म ‘बलिदान’ में “जागो जागो भारतवासी, एक दिन तुम थे जगद्‍गुरू, जग था उन्नत अभिलाषी” स्वरबद्ध कर जनता को स्वाधीनता की ओर उत्तेजित करने की कोशिश की थी। इस गीत के बाद इसी वर्ष नागरदास की ही धुन पर पंडित सुदर्शन का लिखा हुआ एक और देशभक्ति भाव से ओत-प्रोत गीत आया “भारत की दीन दशा का तुम्हें भारतवालों, कुछ ध्यान नहीं”; फ़िल्म थी ‘कुँवारी या विधवा’। इन दोनो गीतों के गायकों का पता तो नहीं चल सका है पर स्वाधीनता संग्राम के शुरुआती देशभक्ति फ़िल्मी गीतों के रूप में इनका उल्लेख अत्यावश्यक हो जाता है। चन्दुलाल शाह निर्देशित देश-भक्ति फ़िल्म ‘देश दासी’ भी इसी वर्ष आई पर इसके संगीतकार/गीतकार की जानकारी उपलब्ध नहीं है; हाँ इतना ज़रूर बताया जा सकता है कि इस फ़िल्म में भी एक देशभक्ति गीत था “सेवा ख़ुशी से करो देश की रे जीवन हो जाए फूलबगिया”, जिसमें देश-सेवा के ज़रिये देश को एक महकता बगीचा बनाने का सपना देखा गया है। देश सेवा को ईश्वर सेवा बताता हुआ इसी फ़िल्म का एक अन्य गीत था “यही है पूजा यही इबादत, यही है भगवत भजन हमारा, वतन की ख़िदमत…”। ‘वाडिआ मूवीटोन’ की 1935 की फ़िल्मों में ‘देश दीपक’ (‘जोश-ए-वतन’ शीर्षक से भी प्रदर्शित) उल्लेखनीय है जिसमें संगीत दिया था मास्टर मोहम्मद ने और गीत लिखे थे जोसेफ़ डेविड ने। सरदार मन्सूर की आवाज़ में फ़िल्म का एक देशभक्ति गीत “हमको है जाँ से प्यारा, प्यारा वतन हमारा, हम बागबाँ हैं इसके…” लोकप्रिय हुआ था। इन बोलों को पढ़ कर इससे "सारे जहाँ से अच्छा" गीत के साथ समानता नज़र आती है। 1936 में 'वाडिआ मूवीटोन' की ही एक फ़िल्म आई ‘जय भारत’, जिसमें सरदार मंसूर और प्यारू क़व्वाल के अलावा मास्टर मोहम्मद ने भी कुछ गीत गाये थे। मास्टर मोहम्मद का गाया इसमें एक देश भक्ति गीत था “हम वतन के वतन हमारा, भारत माता जय जय जय”। इस तरह से 1935-36 में हिन्दी फ़िल्मों में देशभक्ति गीत गूंजने लग पड़े थे और जैसे ये गीत स्वाधीनता संग्राम की अग्नि में घी का काम किया।

कवि प्रदीप
1939 में 'बॉम्बे टॉकीज़' की फ़िल्म ‘कंगन’ में कवि प्रदीप ने गीत भी लिखे और तीन गीत भी गाए। यह वह दौर था जब द्वितीय विश्वयुद्ध रफ़्तार पकड़ रहा था। 1 सितम्बर 1939 को जर्मनी ने पोलैण्ड पर आक्रमण कर दिया, और चारों तरफ़ राजनैतिक अस्थिरता बढ़ने लगी। इधर हमारे देश में भी स्वाधीनता के लिए सरगर्मियाँ तेज़ होने लगीं थीं। ऐसे में फ़िल्म ‘कंगन’ में प्रदीप ने एक गीत लिखा “राधा राधा प्यारी राधा, किसने हम आज़ाद परिंदों को बंधन में बांधा”। अशोक कुमार और लीला चिटनिस ने इस गीत को गाया था। ब्रिटिश राज में राष्ट्रीयता वाले गीत लिखने और उसका प्रचार करने पर सज़ा मिलती थी, ऐसे में प्रदीप ने कितनी चतुराई से इस गीत में राष्ट्रीयता के विचार भरे हैं। प्रदीप की राष्ट्रप्रेम की कविताओं और गीतों का असर कुछ ऐसा हुआ कि बाद में वो ‘राष्ट्रकवि’ की उपाधि से सम्मानित हुए। यह भी स्मरण में लाने योग्य है कि अमर देश-भक्ति गीत “ऐ मेरे वतन के लोगों, ज़रा आँख में भर लो पानी” भी उन्हीं के कलम से निकला था। अगर प्रदीप एक देशभक्त गीतकार थे तो उनकी ही तरह एक देश-भक्त संगीतकार हुए अनिल बिस्वास, जिन्होंने संगीत क्षेत्र में आने से पहले कई बार जेल जा चुके थे अपनी राजनैतिक गतिविधियों की वजह से। 1939 में ही ‘सागर मूवीटोन’ की एक फ़िल्म आई ‘कॉमरेड्स’ (हिन्दी में ‘जीवन साथी’ शीर्षक से) जिसमें अनिल दा का संगीत था। सुरेन्द्र, माया बनर्जी, हरीश और ज्योति अभिनीत इस फ़िल्म में सरहदी और कन्हैयालाल के साथ साथ आह सीतापुरी ने भी कुछ गीत लिखे थे। फ़िल्म में एक देशभक्ति गीत “कर दे तू बलिदान बावरे कर दे तू बलिदान, हँसते-हँसते तू दे दे अपने प्राण” स्वयं अनिल बिस्वास ने ही गाया था और इस गीत का फ़िल्मांकन पृष्ठभूमि में हुआ था। देश पर न्योछावर होने का पाठ पढ़ाता यह जोशिला गीत उस ज़माने में काफ़ी चर्चित हुआ था।


चर्चित फ़िल्मों के अलावा कई ऐसी फ़िल्में भी बनीं जो व्यावसायिक दृष्टि से असफल रहीं, पर ये फ़िल्में इस बात के लिए महत्वपूर्ण थीं कि इनमें देश-भक्ति के गीत थे। और उस दौर में जब कि देश पराधीन था, निस्संदेह ऐसे गीतों का महत्व और भी बढ़ जाता है। 1939 की स्टण्ट फ़िल्म ‘पंजाब मेल’ में नाडिया, सरिता देवी, शहज़ादी, जॉन कावस आदि कलाकार थे। पंडित ‘ज्ञान’ के लिखे गीतों को सरिता, सरदार मन्सूर और मोहम्मद ने स्वर दिया । फ़िल्म में दो देशभक्ति गीत थे - “इस खादी में देश आज़ादी दो कौड़ी में बेड़ा पार, देश भक्त ने…” (सरिता, मोहम्मद, साथी) और “क़ैद में आए नन्ददुलारे, दुलारे भारत के रखवारे” (सरिता, सरदार मन्सूर)। संगीतकार एस. पी. राणे का संगीत इस दशक के आरम्भिक वर्षों में ख़ूब गूंजा था और 30 के दशक के आख़िर तक कम होता दिखाई दे रहा था। 1939 में उनकी धुनों से सजी एक ही फ़िल्म आई ‘इन्द्र मूवीटोन’ की ‘इम्पीरियल मेल’ (संगीतकार प्रेम कुमार के साथ)। सफ़दर मिर्ज़ा के लिखे इस फ़िल्म के गीत आज विस्मृत हो चुके हैं, पर इस फ़िल्म में दो देशभक्ति गीत थे “सुनो सुनो हे भाई, भारत माता की दुहाई, ग़ैरों की ग़ुलामी करते…” और “करेंगे देश को आज़ाद, ज़र्रे-ज़र्रे की है ज़बाँ पर भारत की फ़रियाद”। देश को आज़ाद कराने की चाहत देश के हर नागरिक के दिल में तो थी ही, फ़िल्मी देश-भक्ति गीतों में भी यही विचार उभरने लगी। “करेंगे देश को आज़ाद” गीत पर ब्रिटिश राज की प्रतिबंध लगी जो कोई हैरानी की बात नहीं थी। पर जब समूचा देश अपने आप को आज़ाद कराने के सपने देख रहा हो तो ऐसे में कोई भी प्रतिबंध इस जोश को दबा नहीं सकती थी। किसी गीत या फ़िल्म को दबाया जा सकता है पर उस जोश को कैसे दबायें जो हर भारतवासी के दिल में उमड़ रहा था!

क्रमश:

शोध, आलेख व प्रस्तुति: सुजॉय चटर्जी

Tuesday, August 4, 2009

धीरे से जाना खटियन में...किशोर दा की जयंती पर एक बहुत ही विशेष गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 161

वि नीरज ने लिखा था कि "खिलते हैं गुल यहाँ खिल के बिखरने को, मिलते हैं दिल यहाँ मिलके बिछड़ने को"। संसार के एक शाश्वत सत्य को उजागर किया था नीरज ने अपने इस गीत में। पर आत्मा कहती है कि इस संसार में कुछ चीज़ें ऐसी भी हैं जो शाश्वत हैं। विज्ञान कहती है कि आवाज़ शाश्वत होती है। आज से लेकर अगले दस दिनों तक 'आवाज़' के इस मंच पर ऐसी ही एक शाश्वत आवाज़ को नमन। ये वो आवाज़ है दोस्तों जिसने जब हमें हँसाया तो हम हँस हँस कर लोट पोट हो गये, दर्द भरा कोई अफ़साना सुनाया तो दिल को रुलाकर छोड़ दिया, ज़िंदगी की सच्चाई बयान कि तो लगा जैसे जीवन का सही अर्थ पता चल गया हो, मस्ती भरे नग़में गाये तो दिल झूम उठा, और दिल के तराने छेड़े तो जैसे किसी रिश्ते की डोर और मज़बूत हो गयी। ये आवाज़ सिर्फ़ एक आवाज़ ही नहीं है, इनके तो कई कई आयाम हैं। ये हरफ़नमौला कलाकार एक गायक भी हैं और संगीतकार भी, अभिनेता भी हैं और एक संवेदनशील लेखक भी, फ़िल्म निर्माता और निर्देशक भी रहे हैं ये शख्स। हर दिल पर राज करनेवाला ये फ़नकार हैं आभास कुमार गांगुली, यानी कि हमारे, आपके, हम सभी के प्यारे किशोर कुमार। आज, ४ अगस्त, किशोर दा की ८०-वीं जयंती के उपलक्ष पर हम आज से 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर शुरु कर रहे हैं किशोर दा को समर्पित विशेष लघु शृंखला 'दस रूप ज़िंदगी के और एक आवाज़'। इसके तहत किशोर दा आप का परिचय करवायेंगे जीवन के दस अलग अलग रूपों से, अलग अलग भावों से, अलग अलग सौग़ातों से। किशोर दा ने हर रंग के गानें गाये हैं, ज़िंदगी का कोई भी पहलू ऐसा नहीं जो किशोर दा की आवाज़ से बावस्ता न हो। लेकिन किशोर दा के जिस अंदाज़ की वजह से लोग सब से पहले उन्हे याद करते हैं, वह है उनका खिलंदरपन, उनका मज़ाकिया स्वभाव, उनके हास्य रस में डूबे नग़में। शायद इसीलिए, इस शृंखला का पहला गीत भी हमने कुछ इसी रंग का चुना है। सन् १९७३ में बनी फ़िल्म 'छुपा रुस्तम' का गीत "धीरे से जाना खटियन में ओ खटमल"।

'छुपा रुस्तम' फ़िल्म का निर्माण व निर्देशन किया था विजय आनंद ने, और फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे देव आनंद और हेमा मालिनी। सचिन देव बर्मन के संगीत में ढलकर इस फ़िल्म का सब से लोकप्रिय गीत किशोर कुमार ने गाया था। जी हाँ, हम प्रस्तुत गीत की ही बात कर रहे हैं। यह फ़िल्म संगीत के इतिहास का शायद एकमात्र गीत होगा जो खटमल पर बना है। बर्मन दादा की इस धुन में बंगाल के लोकसंगीत की झलक है, लेकिन किशोर दा ने अपनी निजी अंदाज़ से गीत को कुछ ऐसी शक्ल दे दी है कि गाना बस किशोर दा का ही बनकर रह गया है। अगर आप को याद हो तो १९५८ की फ़िल्म 'चलती का नाम गाड़ी' में एक गीत था "मैं सितारों का तराना.... पाँच रुपया बारह आना", जिसके हर अंतरे में किशोर दा कुछ अजीब-ओ-ग़रीब सी हरकत कर जाते हैं। ऐसे एक अंतरे में वो सचिन दा की आवाज़ को नकल कर गा उठते हैं "धीरे से जाना बगियन में रे भँवरा, धीरे से जाना बगियन में"। दरसल यह सचिन दा का बनाया और उन्ही का गाया हुआ एक ग़ैर फ़िल्मी लोक गीत है। सचिन दा की आवाज़ में इस औरिजिनल गीत को भी आज हम आपको सुन्वायेंगें, तभी आज पहली बार आप ओल्ड इस गोल्ड पर दो प्लेयर पायेंगें। अब वापस आते हैं किशोर दा पर। तो 'चलती का नाम गाड़ी' के उस गीत में बर्मन दा के इस ग़ैर फ़िल्मी गीत की एक छोटी सी झलक मिलती है, और उसके बाद, करीब करीब १५ साल बाद, जब फ़िल्म 'छुपा रुस्तम' के गीत संगीत की बात चली तो इसी धुन पर 'बगियन' को 'खटियन' बना दिया गया और 'भँवरे' को 'खटमल'। वैसे गीत के आख़िर में किशोर दा 'बगियन' और 'भँवरे' पर आ ही जाते हैं, और फिर से उसी सचिन दा वाले अंदाज़ में। गीतकार नीरज ने भी बड़ी दक्षता का परिचय देते हुए इस गीत को शीर्षक गीत बना दिया है यह लिख कर कि "क्यों छुप छुप के प्यार करे तू, बड़ा छुपा हुआ रुस्तम है तू, ले ले हमको भी शरण में ओ खटमल, धीरे से जाना खटियन में"। तो सुनिए इस गीत को और आनंद उठाइए किशोर दा के उस अंदाज़ का जो उन्हे दूसरे सभी गायकों से अलग करती है।



अब ये भी सुनिए वो मूल गीत बर्मन दा (सीनीयर) की आवाज़ में -



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. किशोर दा एक भावपूर्ण गीत.
2. कल के गीत का थीम है - रिश्ते.
3. मुखड़े में शब्द है -"उमर'.

कौन सा है आपकी पसंद का गीत -
अगले रविवार सुबह की कॉफी के लिए लिख भेजिए (कम से कम ५० शब्दों में ) अपनी पसंद को कोई देशभक्ति गीत और उस ख़ास गीत से जुडी अपनी कोई याद का ब्यौरा. हम आपकी पसंद के गीत आपके संस्मरण के साथ प्रस्तुत करने की कोशिश करेंगें.

पिछली पहेली का परिणाम -
दिशा जी बधाई आप पराग जी के बराबर अंकों पर आ गयी हैं अब, पराग जी कहाँ हैं आप, जागिये ज़रा....मनु जी आप भी फुर्ती दिखाईये अब तनिक...:) स्वप्न जी और शरद यकीन मानिये हम भी आप दोनों की हाजिरजवाबी को बहुत "मिस" कर रहे हैं. दिलीप जी, पोस्ट तो शाम ६.३० भारतीय समयानुसार आ चुकी थी, पता नहीं आप क्यों नहीं देख पाए....

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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