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Friday, July 21, 2017

गीत अतीत 22 || हर गीत की एक कहानी होती है || इश्क ने ऐसा शंख बजाया || लव यू फॅमिली || रोब्बी बादल || सोनू निगम || मधुश्री || तनवीर गाज़ी

Geet Ateet 22
Har Geet Kii Ek Kahaani Hoti Hai...
Ishq ne aisa shunkh bajaya
Love U Family
Robby Badal (Music Composer)
Also featuring Tanvir Ghazi, Sonu Nigam & Madhushree 


"जहाँ तक मेरी जानकारी है आज तक बॉलीवुड के किसी गीत में शंख को इश्क से जोड़कर नहीं लिखा गया " -    रोब्बी बादल 

पारिवारिक रोमांटिक फिल्म लव यू फॅमिली का मधुरतम गीत "इश्क ने ऐसा शंख बजाया" के बनने की कहानी आज हमारे साथ बांटने आये हैं संगीतकार रोब्बी बादल, जानिये क्यों मुश्किल में डाल दिया गायक सोनू निगम ने इस गीत के दौरान रोब्बी भाई को. प्ले के बटन पर क्लिक करें और गीत अतीत के इस ताज़ा एपिसोड में सुनें इस मधुर गीत की कहानी, जिसे लिखा है तनवीर गाजी ने और गाया है सोनू निगम और मधुश्री ने...




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सुनिए इन गीतों की कहानियां भी -
हौले हौले (गैर फ़िल्मी सिंगल)
कागज़ सी है ज़िन्दगी (जीना इसी का नाम है) 
बेखुद (गैर फ़िल्मी सिंगल)
इतना तुम्हें (मशीन) 
आ गया हीरो (आ गया हीरो)
ये मैकदा (गैर फ़िल्मी ग़ज़ल)
पूरी कायनात (पूर्णा)
दम दम (फिल्लौरी)
धीमी (ट्रैपड) 
कारे कारे बदरा (ब्लू माउंटेन्स)
रेज़ा रेज़ा (सलाम मुंबई)

Friday, June 9, 2017

गीत अतीत 16 || हर गीत की एक कहानी होती है || रेज़ा रेज़ा | सलाम मुंबई || दिलशाद शब्बीर शैख़

Geet Ateet 16
Har Geet Kii Ek Kahaani Hoti Hai...
Reza Reza
Salaam Mumbai
(Arijit Singh, Hamidreza Monfared, Ritu Shri)
Dilshaad Shabbir Shaikh- Composer


"इस गीत में मैंने पहली बार एक इरानियन स्वर और संगीत शैली को भारतीय श्रोताओं के समक्ष रखा है ..." - दिलशाद शब्बीर शैख़ 
जानिये फिल्म सलाम मुंबई के गीत "रेज़ा रेज़ा" के बनने की कहानी संगीतकार दिलशाद शब्बीर शैख़ से, शब्द लिखे रितु श्री ने और आवाजें हैं अरिजीत सिंह और हमिदरेज़ा मोंफरद की... प्ले पर क्लिक करे और सुनें ....



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Saturday, November 12, 2016

"या तो अभी शुरु में संघर्ष कर लो और बाद में आराम से रहो, या फिर अभी आराम कर लो और बूढ़े होने के बाद संघर्ष करो"


तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी - 18
 
सोनू निगम



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार। दोस्तों, किसी ने सच ही कहा है कि यह ज़िन्दगी एक पहेली है जिसे समझ पाना नामुमकिन है। कब किसकी ज़िन्दगी में क्या घट जाए कोई नहीं कह सकता। लेकिन कभी-कभी कुछ लोगों के जीवन में ऐसी दुर्घटना घट जाती है या कोई ऐसी विपदा आन पड़ती है कि एक पल के लिए ऐसा लगता है कि जैसे सब कुछ ख़त्म हो गया। पर निरन्तर चलते रहना ही जीवन-धर्म का निचोड़ है। और जिसने इस बात को समझ लिया, उसी ने ज़िन्दगी का सही अर्थ समझा, और उसी के लिए ज़िन्दगी ख़ुद कहती है कि 'तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी'। इसी शीर्षक के अन्तर्गत इस नई श्रृंखला में हम ज़िक्र करेंगे उन फ़नकारों का जिन्होंने ज़िन्दगी के क्रूर प्रहारों को झेलते हुए जीवन में सफलता प्राप्त किये हैं, और हर किसी के लिए मिसाल बन गए हैं। आज का यह अंक केन्द्रित है सुप्रसिद्ध पार्श्वगायक सोनू निगम पर।  
  

सोनू निगम का जन्म फ़रिदाबाद में हुआ था, परवरिश उनकी दिल्ली में, और बाद में मुम्बई में हुई। पिता
माता-पिता के साथ बालक सोनू एक शादी के शो में गाते हुए
अगम कुमार निगम और माँ शोभा निगम भी गायक थे पर फ़िल्म जगत में दाखिल नहीं हो सके, और दोनों की गायिकी स्टेज शोज़, शादी और जागरण तक ही सीमित रह गई। सोनू के पिता अगम जी शुरु शुरु में मुंबई फ़िल्मी पार्श्वगायक बनने आए ज़रूर थे, जेब में पैसे नहीं, रेल्वे प्लैटफ़ॉर्म पर सोया किए। अगम कुमार निगम गायक बनने के लिए वो सब नहीं कर सके जो सोनू ने किया। लोगों के पीछे भागना, स्टुडियो के बाहर घंटों इन्तज़ार करना, चपरासी तक के पाँव छूना और ऐसे लोगों के पाँव पकड़ना जो उन जगहों पर विराजमान थे जहाँ होने की उनकी काबलियत ही नहीं थी, ये सब ना कर पाने की वजह से अगम कुमार निगम को किसी ने नहीं पूछा, और हार मान कर वो दिल्ली वापस चले गए और स्टेज शोज़, जागरण और शादी-व्याह में गाने लगे। इसी दौरान स्टेज शोज़ करते हुए गायिका शोभा से उनकी जान-पहचान बढ़ी, दोनों में प्यार हो गया और घर से भाग कर दोनों ने शादी कर ली। जल्दी ही सोनू का जन्म हुआ; और चार वर्ष की आयु से सोनू भी अपने माता-पिता के साथ शोज़ में गाने लगे। 7 से 10 वर्ष की उम्र में सोनू ने कुछ फ़िल्मों में बतौर बाल कलाकार अभिनय किया जैसे कि ’प्यारा दुश्मन’, ’उस्तादी उस्ताद से’, ’हमसे है ज़माना, ’तक़दीर’ और ’बेताब’। सोनू एक होनहार बच्चा था, अपनी कक्षा में वो अव्वल आता था। कक्षा दसवीं तक अव्वल आने के बाद उनके मन में एक वैज्ञानिक बनने की चाह जागृत हुई। लेकिन होनी को कुछ और मंज़ूर थी। 15 वर्ष की आयु में सोनू की आवाज़ खुल गई और उनकी गाती हुई आवाज़ बेहद सुन्दर सुनाई देने लगी, बिलकुल एक फ़िल्मी गायक जैसी।


जब सोनू 15 वर्ष के थे, तब माता, पिता और उनके द्वारा प्रस्तुत शो के लिए कुल 50 रुपये मिला करते थे।
धीरे धीरे राशि बढ़ी और 175 रुपये तक पहुँची। सोनू मुंबई जाकर संघर्ष करने के लिए पैसे बचाने लगे। उनकी दृष्टि लक्ष्य पर थी। बारहवीं उत्तीर्ण करते ही सोनू ने पढ़ाई से किनारा कर लिया और अपने पिता के साथ 18 वर्ष की आयु में 1991 में मायानगरी मुंबई चले आए। सोनू ने संगीत ऑडियो कैसेट्स सुन सुन कर ही सीखा था, पर मुंबई में लोग उनकी तालीम के बारे में सवाल ना खड़ा कर सके, सिर्फ़ इस वजह से उन्होंने दिल्ली में रहते चार महीनों का एक कोर्स किया जिसमें राग और ताल की प्राथमिक शिक्षा उन्हें मिली। पिता अगम कुमार निगम को फ़िल्म-इंडस्ट्री का सबकुछ पता था, इसलिए उनकी दूर-दृष्टि से उन्होंने अपने बेटे की हर क़दम पर मदद की, उन्हें गाइड किया। पिता ने उन्हें चेतावनी दी कि चाहे कुछ भी हो जाए, चाहे कितने भी पैसे मिले, पार्श्वगायक बनने से पहले मुंबई में कभी स्टेज शोज़ या शादी में नहीं गाना। अगम जी को पता था कि अगर एक बार सोनू शोज़ करते हुए पैसे कमाने लग गया तो पार्श्वगायक बनने का जुनूं ख़त्म हो जाएगा और वो भी उन जैसा नाकामयाब गायक बन कर रह जाएगा। मुम्बई में पिता-पुत्र शुरु-शुरु में उनके किसी रिश्तेदार के घर पर ठहरे हुए थे। बाद में उन्होंने दिल्ली का अपना मकान बेच दिया और मुंबई के अन्धेरी में एक कमरे का एक फ़्लैट ख़रीद कर मुंबई शिफ़्ट हो गए। माँ अभी भी दिल्ली में ही थीं क्योंकि उनके शोज़ वहाँ हुआ करते थे। पिता-पुत्र अन्धेरी के एक कमरे वाले फ़्लैट में रहने लगे। सोनू ही खाना पकाते, झाडू लगाते, कपड़े धोते, बरतन माँजते, घर की तमाम साफ़-सफ़ाई करते। आलम यह था कि वहाँ आस-पड़ोस के कुछ लोग उन्हें घर का नौकर समझ बैठे थे!

सोनू के पिता ने उन्हें यह सीख दी थी कि या तो अभी शुरु में संघर्ष कर लो और बाद में आराम से रहो, या फिर अभी आराम कर लो और बूढ़े होने के बाद संघर्ष करो। यह सीख सोनू ने सदा याद रखी। अन्धेरी के फ़्लैट में उनका कोई टेलीफ़ोन नहीं था, उस ज़माने में मोबाइल फ़ोन नहीं आया था, इसलिए सोनू को PCO जाकर सारे म्युज़िक कंपनियों और संगीतकारों को फ़ोन लगा कर उनसे समय माँगना पड़ता था। कई बार दूसरी तरफ़ से बिना कोई जवाब दिए ही फ़ोन काट दिया जाता, कभी कोई ग़लत तरीक़े से जवाब दे देता। पर सोनू ने हिम्मत
नहीं हारी। इन सब बातों को नज़रन्दाज़ करते हुए अपनी नज़र को सिर्फ़ अपनी मंज़िल की तरफ़ रखा, बाक़ी सब भूल गए। संघर्षरत सोनू सुबह से ही संगीतकारों के दफ़्तरों में जाकर बैठ जाते थे, कि आप आओ और मुझे सुनो। सात-आठ घंटे बिना खाये पीये रेकॉर्डिंग् स्टुडिओज़ के बाहर बैठे रहते इस उम्मीद से कि शायद आज मुझे कोई सुन ले। थकने का सवाल ही नहीं था। और अगर जुनून सवार है सर पे कुछ बनने की तो थकावट तो आती ही नहीं। इन्डस्ट्री में सोनू का कोई Godfather नहीं था, उन्हें ख़ुद अपना रास्ता बनाना था, तमाम चुनौतियों का ख़ुद ही मुक़ाबला करना था। सोनू ने एक इन्टरव्यू में यह बताया कि ट्रेन से उतर कर पिता के साथ वो सीधे बान्द्रा के उसी कॉकरोच वाले मानसरोवर होटल में ठहरने के लिए गए जहाँ धर्मेन्द्र ठहरे थे जब वो पहली बार मुंबई आए थे। धर्मेन्द्र की तरह उनकी क़िस्मत का सितारा भी चमका दे यह होटल, क्या पता! पिता-पुत्र ने होटल के कमरे में सामान रखा और सीधे सचिन पिलगाँवकर के पास चल दिए। सचिन ने सोनू को दिल्ले के एक प्रतियोगिता में सुन सुन रखा था और सोनू के पिता को उस समय यह कहा भी था कि जब ये बड़ा हो जाए तो उनके पास ले आएँ। सचिन पिता-पुत्र से बहुत अच्छी तरह से मिले। फिर वो गए अनु मलिक के पास जिन्होंने सोनू को दिल्ली के ही एक अन्य प्रतियोगिता में सुना था। जब सोनू ने उन्हें याद दिलाया कि वो वही लड़का है जिसनी टूटीघुई टाँग के साथ गाना गाया था, तब अनु मलिक को याद आ गया। हालाँकि अनु मलिक के पास सोनू के लिए कोई काम नहीं था उस समय, पर वो अच्छी तरह से मिले।

सचिन और अनु मलिक के बाद सोनू और अगम साहब पहुँचे उषा खन्ना के पास। उन्हें ख़बर थी कि उषा जी
नए कलाकारों को ब्रेक देती हैं। सात घंटे इन्तज़ार करने के बाद सोनू को उषा खन्ना के दर्शन हुए और अपना गीत सुनाने का मौक़ा भी मिल गया। उषा खन्ना को सोनू की आवाज़ बहुत अच्छी लगी और जल्दी ही उनके संगीत में सोनू से उनका पहला गाना गवाया। लेकिन यह गीत सोनू के करीअर में कोई कमाल नहीं दिखा
सका। पिता-पुत्र पूरे मुंबई शहर में बसों में और बाद में एक टू-व्हीलर पर घूमा करते काम की तलाश में। उसके बाद 1992 में सोनू को एक डमी गीत गाने का मौका मिला जो एस. पी. बालसुब्रह्मण्यम् द्वारा गाया जाने वाला था। शूटिंग् डमी वर्ज़न से हुई और इस तरह से फ़िल्म के सेट पर गाना बार बार बजने की वजह से गुल्शन कुमार के दिल-ओ-दिमाग़ पर सोनू की आवाज़ रच बस गई। गुल्शन कुमार को संगीत की समझ थी, हीरा परखना जानते थे, और उन्होंने सोनू को बुलवा भेजा। सोनू को देख कर गुल्शन कुमार बोले, "ओय, कोहली तो कह रहा था कि आप छोटे हो, लेकिन आप तो बहुत छोटे हो!" लेकिन गुलशन कुमार ने सोनू वाला डमी वर्ज़न को ही अप्रूव कर दिया और "ओ आसमाँ वाले" गीत सोनू का पहला ब्रेक सिद्ध हुआ। गुल्शन कुमार ने सोनू से यह वादा लिया कि चाहे वो बाहर कितने भी मूल गीत गाए, लेकिन कवर वर्ज़न सिर्फ़ उन्हीं के लिए गाए। टी-सीरीज़ की कुछ फ़िल्मों में गाने बावजूद सोनू को किसी महत्वपूर्ण फ़िल्म में गाने का मौक़ा नहीं मिला। उस समय कुमार सानू, उदित नारायण और अभिजीत शीर्ष पर चल रहे थे। सोनू ने इसी दौरान टेलीविज़न पर ’अन्ताक्षरी’ में हिस्सा लिया और फिर ’सा रे गा मा’ को होस्ट कर ख़ूब लोकप्रियता हासिल की और घर-घर वो पहचाने जाने लगे। और फिर 1997 में उन्होंने गाया वह गीत जिसके बाद फिर कभी उन्हें पीछे मुड़ कर देखने की ज़रूरत नहीं पड़ी। "संदेसे आते हैं, हमें तड़पाते हैं" गीत ने उन्हें बतौर पार्श्वगायक फ़िल्म जगत में स्थापित कर दिया। सोनू के माता-पिता ने अपने बेटे का साथ देते हुए अपने बेटे के ज़रिए वह मुकाम हासिल किया जो मुकाम वो दोनों हासिल न कर सके। माँ-बाप के लिए इससे ज़्यादा ख़ुशी की बात भला और क्या हो सकती है!  ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की तरफ़ से हम सोनू निगम को ढेरों शुभकामनाएँ देते हैं, साथ ही सलाम करते हैं उनके माता-पिता शोभा निगम और अगम कुमार निगम को। 




आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमे अवश्य लिखिए। हमारा यह स्तम्भ प्रत्येक माह के दूसरे शनिवार को प्रकाशित होता है। यदि आपके पास भी इस प्रकार की किसी घटना की जानकारी हो तो हमें पर अपने पूरे परिचय के साथ cine.paheli@yahoo.com मेल कर दें। हम उसे आपके नाम के साथ प्रकाशित करने का प्रयास करेंगे। आप अपने सुझाव भी ऊपर दिये गए ई-मेल पर भेज सकते हैं। आज बस इतना ही। अगले शनिवार को फिर आपसे भेंट होगी। तब तक के लिए नमस्कार। 

प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी  



Saturday, December 26, 2015

2015 के कमचर्चित सुरीले गीतों की हिट परेड - The Unsung Melodies of 2015



चित्रशाला - नववर्ष विशेष 

2015 के कमचर्चित सुरीले गीतों की हिट परेड

The Unsung Melodies of 2015





रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! प्रस्तुत है फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत के विभिन्न पहलुओं से जुड़े विषयों पर आधारित शोधालेखों का स्तंभ ’चित्रशाला’। वर्ष 2015 हमसे विदा लेना चाहता है। और इसी वर्ष के समाप्त होने से इस दशक का पूर्वार्ध भी समाप्त हो जाएगा। इस दशक में फ़िल्म संगीत का जो स्वरूप अब अक हम सबसे देखा, उससे यही कहा जा सकता है कि वही गाने हिट हो रहे हैं, या उन्हीं गानों को बढ़ावा मिल रहा है जिनमें कोई पंच लाइन, या आइटम वाली बात, और इस तरह का कोई मसाला हो। हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी कुछ ऐसे गुमनाम गीत आए जिनकी तरफ़ किसी का भी ध्यान नहीं गया, पर स्तर की दृष्टि से ये गीत बहुत से लोकप्रिय और हिट गीतों के मुकाबले कहीं अधिक उत्कृष्ट हैं। ऐसे ही दस गीत को चुन कर आज के ’चित्रशाला’ का यह नववर्ष विशेषांक प्रस्तुत कर रहे हैं। तो पेश है वर्ष 2015 का कमचर्चित हिट परेड, The Top-10 Unsung Melodies of 2015.


10: "साईं बाबा के दरबार आ शीष झुका ले" (साईं महिमा)

एक समय था जब सामाजिक फ़िल्मों के साथ-साथ पौराणिक व धार्मिक फ़िल्मों का जौनर भी काफ़ी लोकप्रिय हुआ करता था। भले ऐसे फ़िल्मों को ज़्यादा व्यावसायिक सफलता ना मिला करता हो, पर इन फ़िल्मों का अलग दर्शक-समूह होता है, सिनेमाघरों में ये फ़िल्में लगती थीं। धीरे-धीरे धार्मिक फ़िल्मों का जौनर लगभग समाप्त हो चुका है, बस इक्का-दुक्का फ़िल्में आ जाती हैं कभी कभार। और जहाँ तक भक्ति रचनाओं का सवाल है, तो सूफ़ी श्रेणी की कुछ भक्तिमूलक क़व्वालियाँ ज़रूर फ़िल्मों में सुनने को मिल जाती हैं आजकल। वर्ष 2015 में ’साईं महिमा’ और ’गौड़ हरि दर्शन’ नामक दो फ़िल्में बनी हैं, पर ये फ़िल्में कब आईं कब गईं कुछ पता नहीं चला। ना किसी सिनेमाघर में ये फ़िल्में लगीं और ना इनके गीत रेडियो पर सुनने को मिले। बस यू-ट्युब पर निर्माता ने अपलोड कर दिए हैं। तो लीजिए प्रस्तुत है ’2015 कमचर्चित हिट परेड’ के पायदान नंबर 10 पर फ़िल्म ’साईं महिमा’ की एक भक्ति रचना, जिसे हिमांशु शर्मा ने गाया और स्वरबद्ध किया है, और इसे लिखा है प्रदीप शर्मा ने।




9: "सज के चली है भारत माँ" (जय जवान जय किसान)

जावेद अली
भक्ति रचनाओं की तरह देशभक्ति रचनाओं का भी अकाल पड़ चुका है हिन्दी फ़िल्म- संगीत संसार में। इस सूखे संसार को हरा-भरा करने हेतु मदन लाल खुराना, सीमा चक्रवर्ती और पंकज दुआ जैसे निर्माता सामने आए और बनाई ’जय जवान जय किसान’। ओम पुरी, प्रेम चोपड़ा, रति अग्निहोत्री जैसे वरिष्ठ अभिनेता भी इस फ़िल्म को नहीं बचा सके। संगीतकार रूपेश गिरिश का संगीत भी अनसुना रह गया। इस फ़िल्म के जिस गीत को हमने इस हिट परेड के पायदान नंबर 9 के लिए चुना है, उसकी ख़ास बात यह है कि यह आपको मनोज कुमार की बहुचर्चित देशभक्ति फ़िल्म ’पूरब और पश्चिम’ के मशहूर गीत "बहन चली, दुल्हन चली, तीन रंग की चोली" की याद दिला जाएगी। किशन पालिवाल के लिखे और जावेद अली की आवाज़ में इस गीत के बोलों "देश प्रेम के गहनों से सज के चली है भारत माँ" की समानता ’पूरब और पश्चिम’ के उस गीत से देखी जा सकती है। कुल मिला कर यह एक कर्णप्रिय रचना है, कम से कम वाद्यों का प्रयोग हुआ है और उससे भी बड़ी बात यह कि किसी कृत्रिम यांत्रिक संगीत का बोलबाला नहीं है इस गीत में।




8: "माँ सुन ले ज़रा " (Take it Easy)

सोनू निगम
भारत माँ के बाद अब एक और माँ के लिए एक बेटे के दिल की पुकार पेश है। धार्मिक और देशभक्ति फ़िल्मों के बाद अब जिस जौनर की हम बात करने जा रहे हैं, वह है बाल फ़िल्मों की, और इस जौनर की भी क्या दशा, ज़्यादा कुछ कहने की आवश्यक्ता नहीं है। ’तारे ज़मीन पर’ जैसी फ़िल्में रोज़ नहीं बनती। 2015 में एक बाल-फ़िल्म आई ’Take it Easy'। इसमें मुख्य चरित्रों में दो दस वर्षीय बालक हैं। एक के पिता खिलाड़ी है और वो चाहते हैं कि उनका बेटा उनकी तरह खिलाड़ी बने जबकि बेटे को पढ़ाई-लिखाई में ज़्यादा रुचि है। दूसरी तरफ़ दूसरे लड़के की कहानी बिल्कुल विपरीत है। उसके माता-पिता अपने सपनों को उस पर थोपना चाहते हैं जबकि बेटे को कुछ और ही करना है। ऐसे में बेटा क्या करे! इस परिदृश्य में प्रस्तुत गीत सार्थक है जिसमें बेटा माँ से कह रहा है कि "दिल पे उम्मीदों का बोझ, कुछ माँगे हर कोई रोज़, हँसी मेरी कहीं छुप गई, कहानी कहीं रुक गई, माँ सुन ले ज़रा, कहता है क्या यह दिल मेरा"। सोनू निगम की आवाज़ ने गीत को काफ़ी असरदार बना दिया है। सुनिल प्रेम व्यास, सुशान्त पवार और अमोल पावले के लिखे इस गीत को संगीत से संवारा है सुशान्त-किशोर ने।




7: "इश्क़ फ़ोबिया" (युवा)

इरफ़ान
जसबीर भट्टी लिखित व निर्देशित फ़िल्म ’युवा’ भी बॉक्स ऑफ़िस पर पिट गई। लेकिन इसके गीतों में दम ज़रूर था। फ़िल्म में संगीत देने के लिए चार संगीतकार लिए गए। यह आजकल फ़िल्मों में एकाधिक संगीतकार का ट्रेन्ड चल रहा है, और यह फ़िल्म व्यतिक्रम नहीं। राशिद ख़ाँ, पलक मुछाल, हनीफ़ शेख और प्रवीण-मनोज इस फ़िल्म के संगीतकार हैं और भूपेन्द्र शर्मा ने गीत लिखे हैं। फ़िल्म के तमाम गीतों में एक गीत है मोहम्मद इरफ़ान का गाया हुआ जिसने हमारा ध्यान आकर्षित किया। ये वही इरफ़ान हैं जिन्होंने ’जो जीता वो ही सुपरस्टार’ का ख़िताब जीता था और ’अमूल स्टार वॉयस ऑफ़ इण्डिया’ और ’सा रे गा मा पा’ के जानेमाने प्रतियोगी रहे। मेलडी, रोमान्स और सुफ़ियाना अंदाज़, कुल मिलाकर इस गीत को अच्छी तरह से स्वरबद्ध किया गया है, पर सबसे अच्छी बात है इसके अंतरों के बोल। गीत फ़िल्म में दो बार है, एक बार इरफ़ान की एकल आवाज़ में और एक बार पलक मुछाल और भानु प्रताप की युगल आवाज़ों में।



6: "एक हथेली तेरी हो, एक हथेली मेरी हो" (इश्क़ के परिन्दे)

केका घोषाल
पिछले दौर के गायकों में अगर कोई गायक आज टिका हुआ है तो वो हैं सोनू निगम। आजे के नवोदित गायकों की भीड़ में सोनू निगम आज भी अपने आप को एक अलग मुकाम पर बनाये रखा है और हर साल उनके कुछ अच्छे गीत सुनने को मिलते हैं। केका घोषाल के साथ सोनू निगम के इस युगल गीत के बोल और संगीत दोनों बहुत सुरीले हैं और एक कर्णप्रिय गीत की जितनी विशेषताएँ होती हैं, वो सब मौजूद हैं। हालाँकि इस गीत की धुन में ज़्यादा नई बात नहीं है और इस तरह की धुन पहले भी सुनाई दी है कई बार, पर एक ताज़गी ज़रूर है जिसकी वजह से इस गीत को सुनना अच्छा लगता है। इस गीत में पारम्परिक और समकालीन वाद्यों का संगम सुनने को मिलता है। एक तरफ़ बाँसुरी है तो दूसरी तरफ़ है गिटार। कई लोगों ने यह धारणा बना ली है कि केका घोषाल गायिका श्रेया घोषाल की बहन है, पर यह तथ्य ग़लत है। इन दोनों का कोई रिश्ता नहीं है संगीत के अलावा। केका घोषाल भी ’सा रे गा मा पा’ से रोशनी में आईं हैं। लीजिए इस गीत सुनिए, पर उससे पहले आपको यह बता दें कि इस गीत का एक सैड वर्ज़न भी है सोनू निगम की आवाज़ में और एक और रीमिक्स वर्ज़न है विजय वर्मा और सुप्रिया पाठक की आवाज़ों में।



5: "हमारी अधुरी कहानी" (हमारी अधुरी कहानी)

अरिजीत सिंह
कुछ अभिनेताओं के साथ ऐसा अक्सर हुआ है कि उनकी फ़िल्मों के गानें हमेशा अच्छे हुए हैं। उदाहरण के तौर पर पुराने समय में शम्मी कपूर और राजेश खन्ना की सभी फ़िल्मों के गाने हिट हुआ करते थे चाहे फ़िल्म चले ना चले। आगे चलकर सलमान ख़ान की फ़िल्मों के गाने हिट होते रहते थे। और इस दौर की अगर हम बात करें तो इमरान हाश्मी एक ऐसे अभिनेता हैं जिनकी फ़िल्मों का संगीत ख़ूब चला। 2015 में इमरान हाश्मी और विद्या बालन अभिनीत एक फ़िल्म आई ’हमारी अधुरी कहानी’। फ़िल्म का शीर्षक इमरान हाश्मी अभिनीत फ़िल्म ’गैंगस्टर’ के एक गीत "भीगी भीगी सी है रातें भीगी भीगी" के मुखड़े के अन्तिम तीन शब्द ही हैं। ’हमारी अधुरी कहानी’ मोहित सुरी निर्देशित फ़िल्म है, इसलिए इस फ़िल्म के गीत-संगीत से लोगों को उम्मीदें थीं, मोहित सुरी को अच्छे संगीत की परख जो है। फ़िल्म तो नहीं चली पर इसके गीत-संगीत ने निराश नहीं किया। फ़िल्म के कुल पाँच गीतों के हर गीत में कुछ ना कुछ ख़ास बात है। ’कमचर्चित हिट परेड’ के पायदान नंबर 5 के लिए हमने इस फ़िल्म का शीर्षक गीत ही चुना है जिसे अरिजीत सिंह ने गाया है। रश्मी विराग के लिखे और जीत गांगुली द्वारा स्वरबद्ध इस गीत का स्तर आजे के दौर के आम गीतों से काफ़ी उपर है। प्रेम और विरह के भावों को व्यक्त करता यह गीत सुनने वाले के मन पर असर ज़रूर करता है। और एक बार सुनने के बाद लूप में सुनने का मन होता है। कम से कम साज़ों का इस्तमाल, सुरीली धुन, मनमोहक गायकी, असरदार बोल, कुल मिलाकर यह भावुक गीत इस ऐल्बम का श्रेष्ठ गीत है।





4: "तू, मेरे सारे इम्तिहानों के जवाब तू" (दम लगाके ह‍इशा)


अनु और सानू
वर्ष 2015 हिन्दी सिने संगीत के लिए एक उल्लेखनीय वर्ष माना जा सकता है क्योंकि इस वर्ष पुनरागमन हुआ तीन कलाकारों का जिन्होंने 90 के दशक में काफ़ी धूम मचाई थी। ये हैं संगीतकार अनु मलिक, गायक कुमार सानू और गायिका साधना सरगम। जी हाँ, ’दम लगाके ह‍इशा’ फ़िल्म में अनु मलिक ने 90 के उसी सुरीले रोमान्टिक दौर को वापस लाने की कोशिश की है, और इसमें वो कामयाब भी रहे हैं। इस फ़िल्म में कुल छह गीत हैं जिनमें कुमार सानू का एकल गीत "तू..." और कुमार-सानू-साधना सरगम के युगल गीत "दर्द करारा" ख़ास उल्लेखनीय हैं। ख़ास कर "तू..." तो शायद पिछले दस वर्षों के तमाम श्रेष्ठ रोमान्टिक गीतों में से एक है। और ऐसे गीतों के लिए ही तो कुमार सानू जाने जाते रहे हैं। इस गीत में हमें निराश नहीं करते और इस गीत को सुनते हुए हम उसी 90 के दशक में पहुँच जाते हैं। किसी को अपने स्कूल या कॉलेज के दिन याद आते हैं, तो किसी को अपने दफ़्तर-जीवन के दिन। निस्संदेह यह गीत इस ऐल्बम का श्रेष्ठ गीत है। इसके बारे में ज़्यादा कुछ कहने की आवश्यक्ता नहीं, बस सुनिए...



3: "भोर भयी और कोयल जागे" (बेज़ुबान इश्क़)

ओस्मान मीर
कुछ गीत आज ऐसे भी बन रहे हैं जिहें सुनते हुए मन में यह उम्मीद जागती है कि शायद सुरीले और अच्छे गीतों का दौर अभी समाप्त नहीं हुआ है। इस हिट परेड के तीसरे पायदान के लिए हमने जो गीत चुना है वह है ’बेज़ुबान इश्क़’ फ़िल्म का "भोर भयी और कोयल जागे"। जी नहीं, इस गीत का ’सत्यम शिवम सुन्दरम्’ के "भोर भयी पनघट पे" के साथ कोई समानता नहीं है। इसे राजस्थानी लोक गायक ओस्मान मीर ने गाया है। ओस्मान मीर के लोक गीत लोकप्रिय रहे हैं। प्राकृतिक सुन्दरता को दर्शाता यह गीत भी उतना ही सुन्दर है। राजस्थान की मिट्टी की ख़ुशबू लिए यह गीत ना केवल एक लोक गीत है बल्कि इसमें भक्ति रस का भी एक पुट है। फ़िल्म की नायिका स्नेहा उल्लाल के एन्ट्री सॉंग् के रूप में इस गीत को रखा गया है। स्नेहा ने इसमें एक श्रद्धालु का चरित्र निभाया है। इस गीत में प्रस्तुत ध्वनियाँ और वाद्य तरंगें इतने कर्णप्रिय हैं कि सुबह सुबह सुन कर मन-मस्तिष्क पवित्रा हो जाता है। बाँसुरी, घण्टियों और शंख की ध्वनियों से गीत की आध्यात्मिक्ता और भी निखर कर सामने आई है। ’बेज़ुबान इश्क़’ फ़िल्म के अन्य गीत भी सुनने लायक है, पर प्रस्तुत गीत सबसे ज़्यादा ख़ास है। रूपेश वर्मा के संगीत निर्देशन में इस गीत को लिखा है यशवन्त गंगानी ने।



2: "आजा मेरी जान" (I Love NY)

पंचम
'2015 कमचर्चित हिट परेड’ के शीर्ष के दो गीत ऐसे हैं जिनसे सीधे सीधे जुड़े हैं फ़िल्म-संगीत संसार के दो दिग्गज, दो स्तंभ, दो किंवदन्ती, जिनकी तारीफ़ में कुछ कहना सूरज को दीया दिखाना है। इनमें जो पहला नाम है, उन्हीं का स्वरबद्ध गीत है इस हिट परेड के दूसरे पायदान का गीत। और ये शख़्स हैं राहुल देव बर्मन, हमारे पंचम दा। आश्चर्य हो रहा है आपको? आपको याद होगा 1993 में एक फ़िल्म आई थी ’आजा मेरी जान’, जिसमें अमर-उत्पल का संगीत था। इसमें गुल्शन कुमार ने अपने भाई कृषण कुमार को लौन्च करने के लिए एक गीत राहुल देव बर्मन के कम्पोज़िशन का भी रखा था। उन्हीं दिनों अनुराधा पौडवाल चाहती थीं कि पंचम उनके गाये आठ गीतों के एक ऐल्बम के लिए संगीत तैयार करे। और उन्हीं गीतों में से एक गीत था "आजा मेरी जान", जिसे गुल्शन कुमार ने फ़िल्म ’आजा मेरी जान’ में इस्तमाल किया। इसे अनुराधा पौडवाल और एस. पी. बालसुब्रह्मण्यम ने गाया था। पर इसे फ़िल्म के साउण्डट्रैक में नहीं रखा गया और जो ऐल्बम लोगों के हाथ आया उसमें केवल अमर-उत्पल के स्वरबद्ध गीत ही थे। इस तरह से पंचम का यह गीत गुमनाम ही रह गया (हालाँकि बांगला में पंचम की आवाज़ में इस धुन पर आधारित गीत काफ़ी लोकप्रिय रहा)। 2015 की फ़िल्म ’I Love NY' में इस गीत को DJ फुकन ने बड़ी ख़ूबसूरती से अरेंज कर मौली दवे से गवाया है। गीत के बोल लिखे हैं मयुर पुरी ने। मौली की थोड़ी कर्कश (husky) आवाज़ ने गीत में एक कामुक पुट जोड़ा है। आर. डी. बर्मन के नाम इस हिट परेड का दूसरा पायदान!



1: "जीना क्या है जाना मैंने" (Dunno Y2 - Life is a Moment)

लता मंगेशकर
अभी हमने दो दिग्गज कलाकारों का उल्लेख किया था, जिनमें एक हैं राहुल देव बर्मन, जिनका गीत अभी हमने सुना। दूसरी किंवदन्ती हैं स्वर-साम्राज्ञी, भारतरत्न लता मंगेशकर। यह किसी विस्मय, किसी आश्चर्य से कम नहीं कि 86 वर्ष की आयु में लता जी ने किसी फ़िल्म में गीत गाया है, वर्ष 2015 के हिट परेड में लता जी का गाया गीत शामिल हो रहा है। 1945 में लता जी ने ’बड़ी माँ’ फ़िल्म में "माता तेरी चरणों में" गीत गाया था, और उससे 70 वर्ष बाद भी उनका गाया नया गीत रिलीज़ हो रहा है। वर्ष 2010 में 'Dunno Y - Na Jaane Kyun' फ़िल्म का शीर्षक गाने के बाद जब 2015 में इस फ़िल्म का सीकुइल बना ’'Dunno Y - Life is a Moment' के शीर्षक से, तब संगीतकार निखिल कामत ने इसमें भी लता जी से गीत गवाने की इच्छा व्यक्त की। गीत लिखा है विमल कश्यप ने। इसी फ़िल्म में सलमा आग़ा ने भी एक गीत गाया है पर उस गीत को सुन कर ऐसा लगता है कि सलमा आग़ा के स्तर की गायिका के लिए यह गीत ज़रा हल्का हो गया है। ख़ैर, हम लता जी के गीत की बात कर रहे थे। आप सुनिए यह गीत और इस हिट परेड को समाप्त करने की मुझे दीजिए अनुमति। नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ मैं, सुजॉय चटर्जी, प्रस्तुति सहायक कृष्णमोहन मिश्र के साथ आपसे विदा लेता हूँ, नमस्कार!




तो यह थी नववर्ष की हमारी विशेष प्रस्तुति। आशा है आपको हमारी यह कोशिश पसन्द आई होगी। अपनी राय टिप्पणी में ज़रूर लिखें। चलते चलते हाप सभी को नववर्ष की एक बार फिर से शुभकामनाएँ देते हुए विदा लेता हूँ, नमस्कार।



प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र

Friday, April 4, 2014

संगीत में उफान और शब्दों में कुछ उबलते सवाल

ताज़ा सुर ताल -2014 - 13

दोस्तों देश भर में चुनावी माहौल गरम है. हर नेता अपने लोकलुभावन नारों से मतदाताओं के दिल जीतने की जुगत में लगा है. गरीबी, बेरोजगारी, महंगाई, मुद्दे सभी वही पुराने हैं, बहुत कुछ बदला पर सोचो तो कुछ भी नहीं बदला, इतने विशाल और समृद्ध देश की संपत्ति पर आज भी बस चंद पूंजीपति फन जमाये बैठे हैं. समाज आज भी भेद भाव, छूत छात जैसी बीमारियों में कैद है. बच्चों और महिलाओं की सुरक्षा से खिलवाड़ है तो न्याय और सच्चाई की आवाज़ भी कहीं राख तले दबी सुनाई देती है. कितने गर्व से हम गाते आये हैं सारे जहाँ से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा... मगर वो सारे जहाँ से अच्छा हिंदुस्तान आज है कहाँ ? यही वो खौलता सा सवाल है जो गीतकार इरशद कामिल ने फिल्म कांची  के गीत में उठाया है. आज ताज़ा सुर ताल में है इसी गीत की बारी. एकदम नए कलाकारों को लेकर आये हैं दिग्गज निर्माता निर्देशक सुभाष घई. घई साहब अपनी फिल्मों में संगीत पक्ष पर ख़ास पकड़ रखते हैं, लम्बे समय तक उनके चेहेते रहे लक्ष्मीकांत प्यारेलाल और आनंद बक्शी. बख्शी साहब के साथ तो उनका काफी लम्बा साथ रहा, और उन्होंने रहमान से भी उनके लिखे गीतों को स्वरबद्ध करवाया. कांची  में उन्होंने लम्बे समय से नदारद इस्माईल दरबार को मौका दिया है. साथ ही चार गीत सलीम सुलेमान ने भी दिए हैं और सबसे दिलचस्प बात तो ये है की एक गीत खुद घई साहब ने भी स्वरबद्ध किया है एल्बम के लिए. प्रस्तुत गीत को सलीम सुलेमान ने रचा है और आवाजें हैं सुखविंदर, मोहित चौहान और राज पंडित की. तो चलिए मिलकर ढूंढते हैं अपने 'सारे जहाँ से अच्छे' हिंदुस्तान को. 


बात देश की समस्याओं पर हो रही है तो जिक्र आता है एक ऐसी समस्या का जो केवल भारत में ही नहीं बल्कि विश्व भर के देशों के लिए चिंता का कारण है. पानी यानी जल के भरपूर स्रोत्र हमें कुदरत ने दिए हैं, पर इंसानों ने इन सोत्रों का जरुरत से अधिक दोहन कर इन अनमोल खजानों की थाली में छेद कर दिया है. अब समय चेतने का है. पानी के गहराते संकट की तरफ हमारा ध्यान आकर्षित करने के लिए फिल्मकार भी अपने अपने तरीकों से जुड़े हुए हैं. कुछ समय पहले आई जलपरी  आपने अवश्य देखी होगी. इसी कड़ी में जल्दी ही आपके सामने होगी गिरीश मलिक की फिल्म जल. फिल्म का संगीत रचा है सोनू निगम ने, सोनू ने बतौर संगीतकार अभी कुछ दिनों पहले ही सिंह साहब दा ग्रेट  से अपने सफ़र की शुरुआत की थी, पर जल  के लिए उन्होंने साथ थामा है मशहूर तबला वादक बिक्रम घोष का. फिल्म की एल्बम में अधिकतर वाध्य रचनाएं हैं जो बेहद अनूठी है. पर आज हम आपके लिए लाये हैं शुभा मुदगल का गाया शीर्षक गीत, जिसे लिखा भी है सोनू निगम ने संजीव तिवारी के साथ मिलकर. शास्त्रीय सरंचना में बुने ऐसे गीत इन दिनों फिल्मों में बेहद कम ही सुनने को मिलते हैं. पर जाहिर है रेडियो प्लेबैक पर आप ऐसे अनमोल नगीनों को अवश्य ही सुन पायेगें. लीजिये सुनिए ये सुन्दर सुरीला नगमा.. 
     

Friday, November 15, 2013

सोनू निगम ने सुर जोड़े 'सिंह साहेब' की ललकार में

न्नी देओल निर्देशक अनिल शर्मा के साथ जोड़ीबद्ध होकर लौटे हैं एक बार फिर, जिनके साथ वो ग़दर -एक प्रेम कथा, और अपने जैसी हिट संगीतमयी फ़िल्में दे चुके हैं. सिंह साहेब द ग्रेट में अनिल ने चुना है सोनू निगम को जो इस फिल्म के साथ बतौर संगीतकार फिल्मों में अपनी नई पारी शुरू कर रहे हैं, पार्श्वगायन में अपने लिए एक खास मुकाम बना लेने के बाद सोनू ने हालाँकि अपनी एल्बम क्लासीकली माईल्ड में संगीत निर्देशन का जिम्मा उठाया था पर सिंह साहेब उनकी पहली फिल्म है इस नए जिम्मे के साथ.

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि सोनू ने फिल्म जगत में कदम रखा था बतौर बाल कलाकार फिल्म बेताब से, जो कि सन्नी देओल की भी पहली फिल्म थी बतौर नायक. अब इसे नियति ही कहेंगें कि सोनू की इस नई कोशिश में भी उन्हें साथ मिला है सन्नी पाजी का. एल्बम में कुल ५ गीत हैं जिसमें एक गीत अतिथि संगीतकार आदेश श्रीवास्तव का रचा हुआ है, आईये एक नज़र डालें इस ताज़ा एल्बम में संकलित गीतों पर. 

शीर्षक गीत में सोनू ने अपने 'कम्फर्ट ज़ोन' से बाहर आकर पंजाबी लोक गीतों के गायकों के भांति ऊंची पिच पर लेकर गाया है और उनका ये प्रयास बहुत ही कामियाब और सुरीला रहा है. सोनू की बहन तीशा निगम ने अपना हिस्सा बहुत ही खूबी से निभाया है. दोनों की गायकों का विरोधाभासी अंदाज़, लोक सुरों से उपजी धुन और सटीक शब्द इस गीत को बेहद खास मुकाम दे देते हैं. 

पंजाबी फ्लेवर की बात हो और जिक्र न हो दारु का तो बात कुछ अधूरी लगती है. दारु बंद कल से एक ऐसा फ्रेस है जो हर शराबी अपने अंतिम जाम के साथ बोलता है और अलगी महफ़िल के सजने तक वो इस वादे को निभाता भी है....खैर वापस आते गईं गीत पर, जहाँ गीतकार ने इस फ्रेस को हुक बनाकर अच्छा खाका रचा है. एक बार फिर सोनू गायकी में ऊर्जा से भरपूर रहे हैं, वास्तव में पूरी एल्बम में उन्होंने खुद को नए पिचों पर आजमाया है, कहा जा सकता है संगीत निर्देशन में उनकी प्रेरणा अपने भीतर के गायक को विविध आयामों में देखना ही है.

पान और पनवाडी का जिक्र लाकर उत्तर पूर्व के दर्शकों /श्रोताओं को रिझाने के लिए बना है आईटम गीत पलंग तोड़ जिसे आदेश श्रीवास्तव ने स्वरबद्ध किया है और गाया भी है प्रमुख गायिका सुनिधि चौहान के साथ मिलकर. गीत इन दिनों चल रहे आईटम गीतों सरीखा ही है. बहुत दिनों तक इसका स्वाद टिका रहेगा, कहना मुश्किल है. 

जब मेहंदी लग लग जाए में सोनू और श्रेया की सदाबहार जोड़ी एक साथ आई है एक सुरीले शादी गीत के साथ. गीत में पंजाबी शादियों की महक भी है और पर्याप्त मस्ती का इंतजाम भी. कदम थिरकाते बीट्स और शब्द भी सार्थक हैं. निश्चित ही एल्बम के बेहतर गीतों में से एक. सोनू ने एल्बम में एक हीर भी गाई है, पारंपरिक हीर का सुन्दर प्रयोग श्रोता सुन चुके हैं फिल्म प्रतिज्ञा के सदाबहार उठ नींद से मिर्ज़ा गीत में. प्रस्तुत हीर को सुनकर उस यादगार गीत की यादें अवश्य ताज़ी हो जाती है पर यहाँ अच्छे शब्दों के अभाव में वो माहौल नहीं बन पाया है जिसकी अपेक्षा थी. 

सिंह साहेब द ग्रेट का संगीत सुरीला अवश्य है पर नयेपन का अभाव है. एक दो गीतों को छोड़ दिया जाए तो बाकी गीतों में श्रोताओं को बाँध के रखने का माद्दा नहीं है. फिर भी सोनू की संगीतकार और गायक की दोहरी भूमिका को सराहा जा सकता है. उम्मीद करेंगें कि वो आने वाले दिनों में कुछ और बेहतर गीतों का तोहफा अपने श्रोताओं को देंगें. 

एल्बम के बहतरीन गीत - सिंह साहेब द ग्रेट, जब मेहंदी लग लग जाए, दारू बंद कल से
हमारी रेटिंग - ३.४      

  

Tuesday, January 18, 2011

"यमला पगला दीवाना" का रंग चढाने में कामयाब हुए "चढा दे रंग" वाले अली परवेज़ मेहदी.. साथ है "टिंकू जिया" भी

Taaza Sur Taal 02/2011 - Yamla Pagla Deewana

"अपने तो अपने होते हैं" शायद यही सोच लेकर अपना चिर-परिचित देवल परिवार "अपने" के बाद अपनी तिकड़ी लेकर हम सब के सामने फिर से हाजिर हुआ है और इस बार उनका नारा है "यमला पगला दीवाना"। फिल्म पिछले शुक्रवार को रीलिज हो चुकी है और जनता को खूब पसंद भी आ रही है। यह तो होना हीं था, जबकि तीनों देवल अपना-अपना जान-पहचाना अंदाज़ लेकर परदे पर नज़र आ रहे हों। "गरम-धरम" , "जट सन्नी" और "सोल्ज़र बॉबी"... दर्शकों को इतना कुछ एक हीं पैकेट में मिले तो और किस चीज़ की चाह बची रहेगी... हाँ एक चीज़ तो है और वो है संगीत.. अगर संगीत मन का नहीं हुआ तो मज़े में थोड़ी-सी खलल पड़ सकती है। चूँकि यह एक पंजाबी फिल्म है, इसलिए इससे पंजाबी फ़्लेवर की उम्मीद तो की हीं जा सकती है। अब यह देखना रह जाता है कि फ़िल्म इस "फ़्रंट" पर कितनी सफ़ल हुई है। तो चलिए आज की "संगीत-समीक्षा" की शुरूआत करते हैं।

"यमला पगला दीवाना" में गीतकारों-संगीतकारों और गायक-गायिकाओं की एक भीड़-सी जमा है। पहले संगीतकारों की बात करते हैं। लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल (ओरिजनल "मैं जट यमला पगला दीवाना" .. फिल्म "प्रतिज्ञा" से), अनु मलिक, संदेश सांडिल्य, नौमान जावेद, आर०डी०बी० एवं राहुल बी० सेठ.. इन सारे संगीतकारों ने फिल्म के गानों की कमान संभाली है और इनके संगीत पर जिन्होंने बोल लिखे हैं वे हैं: आनंद बक्षी (ओरिजनल "मैं जट यमला पगला दीवाना"), धर्मेन्द्र (जी हाँ, अपने धरम पा जी भी अब गीतकार हो गए हैं, इन्होंने फिल्म में "कड्ड के बोतल" नाम का गाना लिखा है), इरशाद कामिल, नौमान जावेद, राहुल बी० सेठ एवं आर०डी०बी०।

इस बार से हमने निर्णय लिया है कि हम फिल्म के सारे गाने नहीं सुनवाएँगे, बस वही सुनवाएँगे एलबम का सर्वश्रेष्ठ गाना हो या कि जिसे जनता बहुत पसंद कर रही हो। इसी बात को ध्यान में रखते हुए, आईये हम और आप सुनते हैं "अली परवेज़ मेहदी" की आवाज़ों में "चढा दे रंग":

Chadha de rang



Chadha de rang (Sad version)



हमारा यह सौभाग्य है कि हमें "परवेज़ मेहदी" से कुछ सवाल-जवाब करने का मौका हासिल हुआ। हमारे अपने "सजीव जी" ने इनसे "ई-मेल" के द्वारा कुछ सवाल पूछे, जिनका बड़े हीं प्यार से परवेज़ भाई ने जवाब दिया। यह रही वो बातचीत:

आवाज़: परवेज़ भाई फिल्म "यमला पगला दीवाना" में हम आपका गाना सुनने जा रहे हैं, हमारे श्रोताओं को बताएँ कि कैसा रहा आपका अनुभव इस गीत का।

अली परवेज़: निर्माता-निर्देशक समीर कार्णिक और देवल परिवार के लिए काम करने में बड़ा मज़ा आया, बॉलीवुड के लिए यह मेरा पहला गाना है। मैंने इस गाने के लिए इतनी बड़ी सफ़लता की उम्मीद नहीं की थी, आम लोगों को गाना अच्छा लगा हीं है लेकिन गाने के समझदार लोगों से भी वाह-वाह मिली है..और वो मेरे लिए सबसे ज्यादा खुशी की बात है।

आवाज़: जी सही कहा आपने। अच्छा यह बताईये कि इस गीत को राहत साहब ने भी गाया है, लेकिन एलबम में आपकी आवाज़ को पहली तरजीह दी गई है, इससे बेहतर सम्मान की बात क्या हो सकती है.. आप इस बारे में क्या सोचते हैं।

अली परवेज़: राहत साहब के बारे में जो भी कहूँ वो कम होगा। उनको कौन नहीं जानता, उनको किसने नहीं सुना, ये तो मेरी खुश-नसीबी है कि मुझे भी वो हीं गाना गाने का मौका मिला जो उनसे गवाया गया था। अब मुझे क्यों पहली तरजीह दी गई है, इसे जनता से बेहतर भला कौन बता पाएगा?

आवाज़: अपने अब तक के संगीत-सफ़र के बारे में भी संक्षेप में कुछ कहें।

अली परवेज़: जनाब परवेज़ मेहदी साहब मेरे वालिद थे, और वो हीं मेरे सबसे बड़े गुरू थे और मेरे सबसे बड़े आलोचक भी.. वो हीं मेरे गुणों के पारखी थे। उनका अपना घराना था, अपनी गायकी थी... बस मैं उनकी बनाई हुई इस संगीत की राह पर कुछ सुरीला सफ़र तमाम करूँ, यही अल्लाह से दुआ करता हूँ।

आवाज़: यमला पगला दीवाना के गाने इन दिनों खूब लोकप्रिय हो रहे हैं। क्या आपको फिल्म के कलाकारों या क्रू से मिलने का मौका मिला है कभी?

अली परवेज़: नहीं, मुझे कास्ट से मिलने का मौका नहीं मिला, क्योंकि मैं यू०एस०ए० में सेटल्ड हूँ, और मैंने अपने स्टुडियो में गाना रिकार्ड किया था।

आवाज़: प्राईवेट एलबम्स के बारे में आपके क्या विचार हैं, क्या आप खुद किसी एलबम पर काम कर रहे हैं? आने वाले समय में किन फ़िल्मों में हम आपको सुन पाएँगे?

अली परवेज़: मेरे ख़्याल में हर फ़नकार को कम से कम एक मौका प्राईवेट एलबम बनाने का ज़रूर मिलना चाहिए, क्योंकि उसमें कलाकार को अपनी सोच (प्रतिभा) दिखाने का मौका मिलता है और उसकी गायकी के अलग-अलग रंग दिखते हैं। एलबम कोई फ़िल्म नहीं होता, इसमें कोई स्टोरी-लाईन नहीं होती, इसलिए फ़नकार अपने मन का करने के लिए आज़ाद होता है। इंशा-अल्लाह हम लोग कुछ प्रोजेट्स पर काम कर रहे हैं, जो आपके सामने बहुत हीं जल्द आएँगे।

आवाज़: परवेज़ भाई, आपने हमें समय दिया, इसके लिए आपका हम तह-ए-दिल से शुक्रिया अदा करते हैं।

अली परवेज़: आपका भी शुक्रिया!

फिल्म के सर्वश्रेष्ठ गानों के बाद आईये हम सुनते हैं "जनता की पसंद"। ललित पंडित द्वारा संगीतबद्ध और उन्हीं के लिखे हुए "मुन्नी बदनाम", इसी तरह "विशाल-शेखर" द्वारा संगीतबद्ध और विशाल की हीं लेखनी से उपजे "शीला की जवानी" के बाद शायद यह ट्रेंड निकल आया है कि एक ऐसा आईटम गाना तो ज़रूर हीं होना चाहिए जिसे संगीतकार हीं अपने शब्द दे। शायद इसी सोच ने इस फिल्म में "टिंकु जिया" को जन्म दिया है। इस गाने के कर्ता-धर्ता "अनु मलिक" हैं और "मुन्नी बदनाम" की सफ़लता को भुनाने के लिए इन्होंने "उसी" गायिका को माईक थमा दी है। जी हाँ, इस गाने में आवाज़ें हैं ममता शर्मा और जावेद अली की। यह गाना सुनने में उतना खास नहीं लगता, लेकिन परदे पर इसे देखकर सीटियाँ ज़रुर बज उठती हैं। अब चूँकि गाना मक़बूल हो चुका है, इसलिए हमने भी सोचा कि इसे आपके कानों तक पहुँचा दिया जाए।

Tinku Jiya



हमारी राय – फ़िल्म जनता को भले हीं बेहद पसंद आई हो, लेकिन संगीत के स्तर पर यह मात खा गई। दो-एक गानों को छोड़कर संगीत में खासा दम नहीं है। वैसे बॉलीवुड को "अली परवेज़ मेहदी" के रूप में एक बेहतरीन गायक हासिल हुआ है। उम्मीद और दुआ करते हैं कि ये हमें आगे भी सुनने को मिलेंगे। इन्हीं बातों के साथ आईये आज की समीक्षा पर विराम लगाते हैं। धन्यवाद!



अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं। "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है। आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रूरत है उन्हें ज़रा खंगालने की। हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं।

Tuesday, October 12, 2010

कैलाश खेर की सूफियाना आवाज़ है "अ फ़्लैट" मे तो वहीं ज़िंदगी से भरे कुछ गीत हैं "लाइफ़ एक्सप्रेस" में

ताज़ा सुर ताल ३९/२०१०


विश्व दीपक - 'ताज़ा सुर ताल' के सभी श्रोताओं व पाठकों को मेरा नमस्कार और सुजॊय जी, आपको भी!

सुजॊय - नमस्कार! विश्व दीपक जी, आज भी हम पिछले हफ़्ते की तरह दो फ़िल्में लेकर हाज़िर हुए हैं। साल के इन अंतिम महीनो में बहुत सी फ़िल्में प्रदर्शित होती हैं, और इसीलिए बहुत से नए फ़िल्मों के गानें इन दिनों जारी हो रहे हैं। ऐसे में ज़रूरी हो गया है कि जहाँ तक सभव हो हम दो दो फ़िल्मों के गानें इकट्ठे सुनवाएँ। आज के लिए जिन दो फ़िल्मों को हमने चुना है, उनमें एक है ख़ौफ़ और मौत के करीब एक कहानी, और दूसरी है ज़िंदगी से लवरेज़। अच्छा विश्व दीपक जी, क्या आप भूत प्रेत पर यकीन रखते हैं?

विश्व दीपक - देखिए, यह एक ऐसा विषय है कि जिस पर घण्टों तक बहस की जा सकती है। बस इतना कह सकता हूँ कि गीता में यही कहा गया है कि आत्मा अजर और अमर है, वह केवल शरीर बदलता रहता है। वैज्ञानिक दृष्टि से इसका क्या एक्स्प्लेनेशन है, यह तो विज्ञान ही बता सकता है।

सुजॊय - चलिए इतन बताइए कि फ़िल्मी आत्माओं के बारे में आपके क्या विचार हैं?

विश्व दीपक - हाँ, यह एक मज़ेदार सवाल आपने पूछा है। एक पुरानी हवेली, धुंद, पूनम का पूरा चाँद, पेड़ों पर सूखी टहनियाँ, सूखे पत्तों की सरसराहट, एक बूढ़ा चौकीदार जिसकी उम्र का अंदाज़ा लगा पाना किसी के बस की बात नहीं, ये सब हॊरर फ़िल्मों की बेसिक ज़रूरतें हैं। फ़िल्मी आत्माएँ रात के ठीक १२ बजे वाक पर निकलती हैं। वैसे आजकल उन्हें बहुत से टी.वी चैनलों पर रोज़ देखा जा सकता है और उन्हें भरपूर काम मिलने लगा है। फ़िल्मी आत्माओं को अपने बालों को बांधना गवारा नहीं होता, उन्हें खुला छोड़ना ही ज़्यादा पसंद है। एक और ख़ास बात यह कि फ़िल्मी आत्माओं को गीत संगीत में ज़बरदस्त रुचि होती है। बड़े ही सुर में गाती हैं, दिन भर घंटों रियाज़ करने के बाद रात १२ बजे ओपन एयर में अपनी गायकी के जल्वे प्रस्तुत करने निकल पड़ती हैं।

सुजॊय - वाह, क्या सही पहचाना है आपने! मैं भी कुछ जोड़ दूँ इसमें? फ़िल्मी और तेलीविज़न आत्माओं का पसंदीदा रंग होता है सफ़ीद। जॊरजेट उनकी पसंदीदा साड़ी है और एक नहीं बहुत सी होती हैं। तभी तो बरसों बरस भटकने के बावजूद हर रोज़ उनकी साड़ी उतनी ही सफ़ेद दिखाई देती है कि जैसे किसी डिटरजेण्ट का ऐड कर रही हों। मोमबत्ती का बड़ा योगदान है इन आत्माओं के जीवन में। आधुनिक रोशनी के सरंजाम उन्हें पसंद ही नहीं है।

विश्व दीपक - सुजॊय, फ़िल्मी आत्माओं की हमने बहुत खिंचाई कर ली, अब इस मज़ाक को विराम देते हुए सीरियस हो जाते हैं और अपने पाठकों को बता देते हैं कि आज की पहली फ़िल्म है 'अ फ़्लैट'। यह लेटेस्ट हॊरर फ़िल्म है अंजुम रिज़्वी की, जिसे निर्देशित किया है हेमन्त मधुकर ने। जिम्मी शेरगिल, संजय सुरी, हज़ेल, कावेरी झा और सचिन खेड़ेकर। बप्पी लाहिड़ी के सुपुत्र बप्पा लाहिड़ी का संगीत है इस फ़िल्म में, और फ़िल्म में गानें लिखे हैं विराग मिश्र ने। तो आइए पहला गाना सुनते हैं कैलाश खेर और सुज़ेन डी'मेलो की आवाज़ों में।

गीत - मीठा सा इश्क़ लगे, कड़वी जुदाई


सुजॊय - "मीठा सा इश्क़ लगे, कड़वी जुदाई, यार मेरा सच्चा लागे, झूठी ख़ुदाई, चांदनी ने तन पे मेरे चादर बिचाई, ओढ़ा जो तूने मुझको सांस लौट आई", विराग मिश्र के ये बोलों में वाक़ई जान है। विराग मिश्र क नाम सुनते ही मुझे यकायक कवि वीरेन्द्र मिश्र की याद आ गई। कहीं ये उनके सुपुत्र तो नहीं! ख़ैर, इन दिनों राहत फ़तेह अली ख़ान की आवाज़ ही ज़्यादा सुनाई दे रही थी, कैलाश खेर कहीं दूर से हो गए थे। बहुत दिनों के बाद इनकी आवाज़ सुन कर अच्चा लगा। कैलाश की आवाज़ में कुछ ऐसी बात है कि सीधे दिल पर असर करती है।

विश्व दीपक - गीत के ओपेनिंग म्युज़िक में सस्पेन्स झलकता है। यानी कि जिसे हम हौंटिंग नोट कहते हैं। सुज़ेन की आवाज़ भी इस गीत के फ़्युज़न मूड के साथ चलती है, और एक सस्पेन्स और हॊरर का अंदाज़ भी उसमें महसूस किया जा सकता है। इस गीत के दो रीमिक्स वर्ज़न भी है, 'अनप्लग्ड' और 'पार्टीमैप मिक्स'।

सुजॊय - आइए अब फ़िल्म का दूसरा गाना सुना जाए जिसे सोनू निगम, तुल्सी कुमार, राजा हसन और अदिती सिंह शर्मा ने गाया है। बोल हैं "दिल कशी"।

गीत - दिल कशी


विश्व दीपक - सोनू निगम का नाम किसी भी ऐल्बम पर देख कर दिल को चैन मिलता है कि चलो कम से कम एक गाना तो इस ऐल्बम में ज़रूर सुनने लायक होगा। और सोनू हर बार सब की उम्मीदों पर खरे उतरते हैं। कशिश भरे गीतों को वो बड़ा ख़ूबसूरत अंजाम देते हैं। और आजकल तो वो चुनिंदे गीत ही गा रहे हैं, इसलिए सुनने वालों की उम्मीदें उन पर लगी रहती हैं और इंतज़ार भी रहता है उनके गीतों का। तुलसी कुमार, जिनसे हिमेश रेशम्मिया ने बहुत से गानें गवाये हैं, उन्हें इस गीत में सोनू के साथ गाने का मौका मिला और उनका पोरशन भी कम नहीं है इस गीत में।

सुजॊय - लेकिन राजा हसन और अदिती सिंह शर्मा को गीत के शुरुआत में ही सुना जा सकता है। गीत की बात करें तो यह पूरी तरह से सोनू का गीत है और उनका जो एक स्टाइल है टिपिकल नशीले अंदाज़ में गाने का, इस गीत में भी वही अंदाज़-ए-बयाँ है। सोनू के इस जौनर के गानें अगर आपको पसंद आते हैं तो यह गीत भी ज़रूर पसंद आयेगा।

विश्व दीपक - फ़िल्म का तीसरा गाना है सुनिधि चौहान, राजा हसन, और बप्पा लाहिड़ी की आवाज़ों में, "चल हल्के हल्के"।

गीत - चल हल्के हल्के


सुजॊय - पूर्णत: सुनिधि चौहान का यह गीत है, राजा और बप्पा ने तो बस सहगायकों की भूमिका निभाई है। एक मस्त गाना जो एक जवान चुलबुली लड़की गाती है जो अपने मन के साथ चलती है और बाहरी दुनिया के किसी चीज़ के बारे में नहीं सोचती। ठीक ठाक गाना है, कोई नयी या ख़ास बात नज़र नहीं आई।

विश्व दीपक - अब तक तीन गानें हमने सुनें, लेकिन कोई भी गाना ऐसा नहीं महसूस हुआ जो एक लम्बी रेस का घोड़ा साबित हो सके। सभी गानें अच्छे हैं, लेकिन वह बात नहीं जिसे सुनने वाले कैच कर ले और गाने को कामयाबी की बुलंदी तक पहुँचाए। लेकिन यह याद रखते हुए कि बप्पा ने अभी अपना करीयर शुरु ही किया है, तो चलिए उन्हें यह मौका तो दे ही दिया जा सकता है। फ़िल्म का अंतिम गीत अब सुनने जा रहे हैं श्रेया घोषाल की आवाज़ में।

सुजॊय - "प्यार इतना ना कर" भी एक प्रेडिक्टेबल ट्रैक है। "ज़रा ज़रा बहकता है" जौनर का गाना है और श्रेया तो ऐसे गानें गाती ही रहती हैं, शायद इसीलिए मैंने "प्रेडिक्टेबल" शब्द का इस्तेमाल किया। चलिए आप ख़ुद ही सुनिए और अपनी राय दीजिए।

गीत - प्यार इतना ना कर


विश्व दीपक - एक बात आपने नोटिस की सुजॊय, कि 'अ फ़्लैट' एक हॊरर फ़िल्म है, लेकिन इसमें कोई भी गीत उस तरह का नहीं है। अब तक जितने भी इस तरह की फ़िल्में बनी हैं, सब में कम से कम एक गीत तो ऐसा ज़रूर होता है जो फ़िल्म के शीर्षक के साथ चलता है। ख़ैर, हॊरर, ख़ौफ़, और मौत के चंगुल से बाहर निकलकर आइए अब हम बैठते हैं 'लाइफ़ एक्स्प्रेस' में।

सुजॊय - 'लाइफ़ एक्स्प्रेस' एक कम बजट फ़िल्म है जिसमें संगीत है रूप कुमार राठौड़ का। इसलिए इस ऐल्बम से कुछ सुरीलेपन की उम्मीद ज़रूर की जा सकती है। संजय कलाटे निर्मित इस फ़िल्म के निर्देशक हैं अनूप दास और गीतकार हैं शक़ील आज़्मी। फ़िल्म के मुख्य कलाकार हैं रितुपर्णा सेनगुप्ता, दिव्या दत्ता, किरण जंगियानी, यशपाल शर्मा। फ़िल्म का पहला गाना सुनते हैं उदित नारायण और श्रेया घोषाल की आवाज़ों में।

गीत - फीकी फीकी सी लगे ज़िंदगी


विश्व दीपक - सुंदर कम्पोज़िशन और एक टिपिकल उदित - अल्का डुएट। माफ़ कीजिएगा, अल्का नहीं, बल्कि अब श्रेया आ गई हैं।

सुजॊय - वैसे श्रेया को पूरा सम्मान देते हुए मैं यह कहना चाहूँगा कि इस गीत में उदित जी के साथ अल्का याज्ञ्निक की आवाज़ ज़्यादा मेल खाती, और जैसे ९० का वह ज़माना भी याद आ जाता!

विश्व दीपक - गीत के बारे में यही कह सकता हूँ कि एक आम रोमांटिक डुएट है, स्वीट ऐण्ड सिम्पल, लेकिन इस तरह के गानें पहले भी बहुत बने हैं। कुछ कुछ 'कोई मिल गया' के शीर्षक गीत की तरह प्रतीत होता है।

सुजॊय - फ़िल्म का दूसरा गीत है स्वयं रूप कुमार राठौड़ की आवाज़ में।

गीत - थोड़ी सी कमी रह जाती है


विश्व दीपक - बहुत ही सुंदर कम्पोज़िशन, दर्द भी है, दर्शन भी है, रोमांस भी है, गीत के बोल ज़रूर "थोड़ी सी कमी रह जाती है" है, लेकिन गीत में कोई भी कमी नज़र नहीं आई।

सुजॊय - वाह, क्या बात कही है आपने! सही में मैं भी रूप कुमार राठौड़ से कुछ इसी तरह के एक गीत की उम्मीद कर रहा था इस ऐल्बम में। संगीत के साथ साथ उन्होंने अपनी आवाज़ से इस गीत को पूर्णता को पहुँचाया है। शायद इसीलिए उन्होंने इसे गाया होगा ताक़ि वो जिस तरह से चाहते थे, उसी तरह का अंजाम इस गीत को मिले।

विश्व दीपक - रूप साहब एक अच्छे गायक तो हैं ही, उन्होंने कुछ फ़िल्मों में इससे पहले भी संगीत दे चुके हैं, जिनमें शामिल हैं - 'वो तेरा नाम था' (२००४), 'मधोशी' (२००४), और 'ज़हर' (२००५)। आइए अब आगे बढ़ा जाए और सुनते हैं जगजीत सिंह की आवाज़ में एक प्रार्थना, "फूल खिला दे शाख़ों पर"।

गीत - फूल खिला दे शाख़ों पर


सुजॊय - बहुत ही गहराई और गंभीर सुनाई दी जगजीत साहब की आवाज़, और इस गीत को ऐसी ही आवाज़ की ज़रूरत थी इसमें कोई शक़ नहीं है। इस गीत के लिए जगजीत सिंह को चुनने के लिए रूप कुमार राठौड़ को दाद देनी ही पड़ेगी। कम से कम साज़ों के इस्तेमाल से इस गीत में और ज़्यादा असर पैदा हो गई है। इस गीत में वायलिन पर जो पीस बार बार आता है, उसी धुन का इस्तेमाल पहले किसी गीत में हो चुका है, लेकिन मुझे बिल्कुल याद नहीं आ रहा कि कौन सा गाना है। शायद अल्का याज्ञ्निक का गाया कोई गाना है।

विश्व दीपक - बोल भी बहुत अच्छे लिखे हैं शक़ील साहब ने। "वक़्त बड़ा दुखदायक है, पापी है संसार बहुत, निर्धन को धनवान बना, निर्बल को बल दे मालिक, कोहरा कोहरा सर्दी है काँप रहा है पूरा गाँव, दिन को तपता सूरज दे रात को कम्बल दे मालिक, बैलों को एक गठरी गाँस इंसानों को दो रोटी, खेतों को भर दे गेहूँ से, काँधों को हल दे मालिक, हाथ सभी के काले हैं, नज़रें सब की पीली हैं, सीना ढाम्प दुपट्टे से सर को आँचल दे मालिक"। ज़िंदगी की बेसिक ज़रूरतों की याचना मालिक से किया जा रहा है इस गीत में। बहुत सुंदर!!!

सुजॊय - और अब आज की प्रस्तुति का अंतिम गीत समूह स्वरों में। यह एक लोरी है, लेकिन कुछ अलग क़िस्म का है। आम तौर पर लोरी में कम से कम साज़ों का इस्तेमाल होता है क्योंकि निंदिया रानी को दावत दी जा रही होती है। लेकिन इस समूह लोरी में रीदम का भी इस्तेमाल किया गया है। सुंदर कम्पोज़िशन है।

विश्व दीपक - "झूले झूले पालना, बन्नी झूले पालना, उड़ ना जाए उड़न खटोला, धीरे से उछालना"। सुनते हैं....

गीत - झूले झूले पालना


सुजॊय - 'अ फ़्लैट' और 'लाइफ़ एक्स्प्रेस' के गानें हमने सुनें। 'अ फ़्लैट' की बात करें, तो एक ही गीत जो मुझे अच्छा लगा वह है कैलाश खेर का गाया "मीठा सा इश्क़ लगे"। और जहाँ तक 'लाइफ़ एक्स्प्रेस' की बात है, इस फ़िल्म के सभी गानें जो हमने सुनें, मुझे अच्छे लगे हैं। जैसा कि आपने कहा था पिछले हफ़्ते, हम रेटिंग का सिल्सिला भी समाप्त करते हैं। लेकिन हम अपने सभी श्रोता व पाठकों से निवेदन कर रहे हैं कि इन नये गीतों को भी सुनें और टिप्पणी में अपनी राय लिखें।

विश्व दीपक - सुजॉय जी, मैंने रेटिंग का सिलसिला समाप्त करने की मांग एक खास वज़ह से की थी। अक्सर ऐसा होता है कि अगर किसी एलबम का एक हीं गाना अच्छा हो तो पूरे एलबम की रेटिंग बहुत नीचे चली जाती है और उस स्थिति में पाठक/श्रोता की नज़र में एलबम का मोल बड़ा हीं कम हो जाता है। अब चूँकि हमारी रेटिंग ३ से ४.५ के बीच हीं होती थी तो जिस एलबम को ३ मिले, वह एलबम बाकियों से निस्संदेह कमजोर होगा। और हम तो कई सारे एलबमों को ३ की रेटिंग दिया करते थे, यानि सब के सब कमजोर। अब कमजोर एलबम पर कौन-सा श्रोता अपना समय नष्ट करना चाहेगा। फिर तो हमारी सारी की सारी मेहनत मिट्टी में हीं मिल गई। हम चाहते थे कि श्रोता अपने विचार रखे, लेकिन विचार तो तब हीं आएँगे ना, जब कोई उन गानों को सुनेगा। बस यही सोचकर मैंने आपसे, सजीव जी से और सभी श्रोताओं से रेटिंग हटाने/हटवाने की दरख्वास्त की थी। आप से और सजीव जी से हरी झंडी पाकर मुझे बहुत खुशी हो रही है। जब मैंने सजीव जी से इस बात का ज़िक्र किया तो उन्होंने मेरी मांग पर मुहर लगाने के साथ-साथ एक सलाह भी दी। उनका कहना था कि अगर हम श्रोताओं को इतना बता दें कि कौन-सा गीत सबसे अच्छा है और कौन-सा सबसे कमजोर तो श्रोताओं को एक सिलसिलेवार ढंग से गीत सुनने में सहूलियत होगी। श्रोता सबसे अच्छा गीत सबसे पहले सुनकर अपने दिन की बड़ी हीं खूबसूरत शुरूआत कर सकता है। मुझे उनका ख्याल बड़ा हीं नेक लगा। और इसी कारण से मैं आज के उन दो गीतों को "चुस्त-दुरुस्त गीत" और "लुंज-पुंज गीत" के तमगों से नवाज़ते हुए नीचे पेश कर रहा हूँ। यह निर्णय मैंने बड़ी जल्दी में ले लिया है, इसलिए सुजॉय जी आपसे और सभी श्रोताओं से मेरा यह आग्रह है कि यह जरूर बताएँ कि रेटिंग हटाकर "आवाज़ की राय में" शुरू करने का निर्णय कितना सही है और कितना गलत। चलिए तो इन्हीं बातों के साथ मैं आज़ की समीक्षा के समाप्त होने की विधिवत घोषणा करता हूँ। अगली कड़ी में फिर से मुलाकात होगी।

आवाज़ की राय में

चुस्त-दुरुस्त गीत: फूल खिला दे शाखों पर

लुंज-पुंज गीत: चल हल्के हल्के

Tuesday, September 28, 2010

अब्बास टायरवाला और रहमान आये साथ एक बार फिर और कहा जवां दिलों से - "कॉल मी दिल..."

ताज़ा सुर ताल ३७/२०१०


सुजॊय - दोस्तों, नमस्कार, और एक बार फिर स्वागत है 'ताज़ा सुर ताल' में। जैसा कि पिछले हफ़्ते विश्व दीपक जी ने थोड़ा सा हिण्ट दिया आज के फ़िल्म के बारे में, कि उनके मनपसंद संगीतकार का संगीत होगा आज की फ़िल्म में, तो चलिए अब वह वक़्त आ गया है कि आपको आज की फ़िल्म का नाम बता दिया जाए। आज हम लेकर आये हैं आने वाली फ़िल्म 'झूठा ही सही' के गानें।

विश्व दीपक - ए. आर. रहमान मेरे मनचाहे संगीतकार हैं, और सिर्फ़ मेरे ही नहीं, आज वो सिर्फ़ इस देश के ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व में अपने संगीत के जल्वे बिखेर रहे हैं। वो एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर के संगीतकार बन चुके हैं और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व भी कर रहे हैं। तभी तो राष्ट्रमण्डल खेल के शीर्षक गीत के संगीत के लिए उन्ही को चुना गया है।

सुजॊय - 'झूठा ही सही' अब्बास टायरवाला की फ़िल्म है जिसका निर्माण आइ.बी.सी मोशन पिक्चर्स के बैनर तले हो रही है, जिसके मुख्य कलाकार हैं जॊन एब्राहम और पाखी, जो अब्बास साहब की धर्मपत्नी हैं। सोहेल ख़ान, अरबाज़ ख़ान और नसीरुद्दिन शाह ने भी फ़िल्म में अभिनय किया है और सुनने में आया है कि फ़िल्म में माधवन और नंदना सेन अतिथि कलाकार के रूप में नज़र आयेंगे। १५ अक्तुबर २०१० का दिन निर्धारित किया गया है फ़िल्म की शुभमुक्ति के लिए, यानी कि इस साल का यही होगा दशहरा रिलीज़।

विश्व दीपक - सुना है कि पहले इस फ़िल्म का शीर्षक '1-800-Love' रखा गया था, उसके बाद 'Call Me Dil' रखा गया, लेकिन आख़िर में 'झूठा ही सही' का शीर्षक ही फ़ाइनल हुआ। फ़िल्म के प्रोमोज़ देखते हुए ऐसा लग रहा है कि कहानी में कुछ नई बात ज़रूर होगी। जॊन भी एक नए लुक में नज़र आ रहे हैं इस फ़िल्म में। जहाँ तक फ़िल्म के गीत संगीत का सवाल है, साउण्डट्रैक को अच्छा रेस्पॊन्स मिल रहा है।

सुजॊय - तो आइए गीतों का सिलसिला शुरु करते हैं, पहला गीत सुनवा रहे हैं राशिद अली और श्रेया घोषाल की आवाज़ों में।

गीत - क्राई क्राई


विश्व दीपक - एक संक्रामक ट्रैक जिसे कहा जा सकता है, और शायद इसी वजह से यह गीत एक इन्स्टैण्ट हिट भी बन गया है। वैसे भी शुरु से ही अब्बास टायरवाला इस तरह के कैची शब्दों का इस्तेमाल करते आये हैं। "पप्पु काण्ट डान्स साला" के बाद अब्बास और रहमान फिर एक बार एक ऐसा गीत लेकर आये हैं जिसे जनता ने हाथों हाथ लिया है।

सुजॊय - राशिद अली और श्रेया का कम्बिनेशन भी अच्छा लगा, ख़ास कर जहाँ जहाँ राशिद "no no no, kabhi nahi" कहते हैं, बड़ा ही मज़ेदार लगता है। गाना सीधा सरल है, और इस सरलता की वजह से ही यह हिट हो रहा है। एक बार सुनने के बाद जैसे 'क्राई क्राई' दिमाग़ में बैठ जाता है। राशिद अली की आवाज़ जॊन पर फ़िट बैठी है।

विश्व दीपक - रहमान ने अलग अलग साज़ों का इस्तेमाल किया है इस गीत में। जैसे टुकड़ों में बना है यह गीत, लेकिन हर एक टुकड़ा उतना ही आकर्षक, उतना ही लुभाने वाला।

सुजॊय - आइए अब दूसरे गीत की तरफ़ बढ़ा जाए! सुनते हैं जावेद अली और चिनमयी की आवाज़ों में "मैया यशोदा"।

गीत - मैया यशोदा (जमुना मिक्स)


गीत - मैया यशोदा (टेम्स मिक्स)


विश्व दीपक - एक और अच्छा गाना, एक और सुरीला कम्पोज़िशन। रहमान ने जावेद अली और चिनमयी पर जो भार सौंपा, इन दोनों ने उसका पूरा पूरा मान रखा। चिनमयी को बिना सांस छोड़े एक लम्बा सा लाइन इस गीत में गाना पड़ा, जिसे उन्होंने बहुत ही ख़ूबसूरती से निभाया, अंग्रेज़ी में जिसे कहते हैं 'effortlessly'। "मय्या यशोदा" गीत का आधार वही कृष्ण लीला ही है, लेकिन अंतिम अंतरे में यह एक संदेश भी देता है कि बांटने का। अच्छा लिखा हुआ गाना है और शायद इस साल के नवरात्री में डांडिया खेलने वालों को अपना नया गाना मिल गया।

सुजॊय - और इस गीत के बीच में सितार का वह पीस कितना सुरीला, कितना मधुर सुनाई देता है! "मय्या यशोदा" सुनते ही 'हम साथ साथ हैं' का वह हिट गीत भी याद आ जाता है जिसे अनुराधा पौडवाल, अल्का याज्ञ्निक और कविता कृष्णामूर्ती ने गाया था। लेकिन जावेद और चिनमयी का गाया यह गीत उससे बिल्कुल अलग है। दोनों अपने अपने जगह यूनिक है।

विश्व दीपक - यूनिक तो है, लेकिन इस जौनर में रहमान ने इससे पहले जो गीत बनाया था फ़िल्म 'लगान' के लिए, "राधा कैसे ना जले", उसके मुक़ाबले यह गीत बहुत पीछे है। वैसे यह बत भी सच है कि बार बार "राधा कैसे ना जले" जैसा गीत तो नहीं बन सकता ना! ख़ैर, "मैया यशोदा" के दो वर्ज़न हैं, एक है 'जमुना मिक्स', जिसमें भारतीय बीट्स और भारतीय स्वाद है। बांसुरी, सितार आदि साज़ों का इस्तेमाल, लेकिन पूरा गीत परक्युशन और बेस पर आधारित है। साज़िंदों ने भी कमाल का बजाया है।

सुजॊय - इसी गीत का दूसरा वर्ज़न है 'थेम्स मिक्स', जिसमें रहमान ने कुछ और ज़्यादा परक्युशन और ईलेक्ट्रॊनिक बीट्स का इस्तेमाल किया है। और टेलीफ़ोन के टोन्स को भी मिक्स किया गया है। दोनों को सुनने के बाद आप भी यही कहेंगे कि जमुना थेम्स पर हावी है। आइए अब तीसरे गीत की तरफ़ बढ़ा जाए, यह है "हैलो हैलो" कार्तिक और हेनरी कुरुविला की आवाज़ों में।

गीत - हैलो हैलो


विश्व दीपक - "हैलो हैलो" और उस पर कार्तिक की आवाज़, ऐसे में तो "कार्तिक कॊलिंग कार्तिक" की याद आ जाना ही स्वाभाविक है। औएर वैसे भी दोनों गीतों का मूड एक जैसा है, मतलब वही रिंगटोन न और बीप्स की ध्वनियों का इस्तेमाल।

सुजॊय - कार्तिक ने इस गीत को खुले दिल से गाया है, एक केयरफ़्री अंदाज़ में। रहमान कार्तिक से आजकल अपनी हर फ़िल्म में कम से कम एक गीत ज़रूर गवा रहे हैं। कार्तिक और जावेद अली रहमान के मनपसंद गायक बनते जा रहे हैं ऐसा लग रहा है।

विश्व दीपक - वाक़ई कार्तिक की आवाज़ में एक ताज़गी है, और हिंदी फ़िल्मी नायक के प्राश्वगायन के लिए तो बिल्कुल सटीक है। उनके गाये इस गीत में "मुझे छोड़ दो, मुझे थाम लो, खो जाने दो, मेरा नाम लो, सब ठीक है, जो जाएगा" एक बहुत ही सुंदर प्रवाह में चल पड़ता है। पता नहीं यह गीत लम्बी रेस का घोड़ा बन पाएगा या नहीं, लेकिन फ़िल्हाल तो इसे सुनने में अच्चा ही लग रहा है।

सुजॊय - जहाँ तक साज़ों की बात है, तो इसमें रहमान ने वायलिन और चेलो का इस्तेमाल किया है, टेलीफ़ोन के डायल टोन्स तो हैं ही। और इन सब के पीछे ड्रमिंग्‍ बीट्स। रहमान का वैसे टेलीफ़ोन से नाता पुराना है, याद है न आपको 'हिंदुस्तानी' फ़िल्म का गाना "टेलीफ़ोन धुन में हँसने वाली"? चलिए, आगे बढ़ते हैं और सुनते हैं सोनू निगम की आवाज़ में "दो निशानियाँ"।

गीत - दो निशानियाँ


विश्व दीपक - एक और सुंदर कम्पोज़िशन, और सोनू निगम और रहमान का वही पुराना "दिल से" वाला अंदाज़ वापस आ गया है। एक धीमी लय वाला, कोमल और सोलफ़ुल गीत। पियानो की लगातार बजने वाली ध्वनियाँ गीत के ऒरकेस्ट्रेशन का मुख्य आकर्षण है। थोड़ा सा ग़मगीन अंदाज़ का गाना है लेकिन सोनू ने जिस पैशन के साथ इसे निभाया है, यह इस ऐल्बम का एक महत्वपूर्ण ट्रैक बन गया है यकीनन।

सुजॊय - गीत के बोलों की बात करें तो वो भी सुंदर हैं, गहरे अर्थ वाले हैं, बस एक झटका आपको तब लगा होगा जब इन ख़्वाबों ख़यालों वाले बोलों के बीच भी "फ़ोन" शब्द का ज़िक्र आता है। लेकिन फिर यह गीत के बोलों के साथ इस क़दर घुलमिल गया है कि गीत का अभिन्न अंग बन गया है। इस गीत का एक और वर्ज़न है ऐल्बम में जिसका शीर्षक है 'Heartbreak Reprise'।

विश्व दीपक - टूटे दिल की सदा है यह गीत जो एक मल्हम का काम करती है। "दो निशानियाँ" में सोनू निगम के अलावा बहुत से गायकों ने भी आवाज़ें मिलाई जैसे कि ऋषीकेश कामेरकर, थमसन ऐण्ड्रूज़, नोमान पिण्टो, बियांका गोम्स, डॊमिनिक सेरेजो, समंथा एडवार्ड्स, विविएन पोचा और क्लिण्टन सेरेजो। चलिए आगे निकला जाए, अब की बार आवाज़ श्रेया घोषाल और सुज़ेन डी'मेलो के। "पम प रा", यह है गीत, जो फ़िल्म के दूसरे गीतों की तुलना में एक ऐवरेज गीत है।

सुजॊय - श्रेया और सेज़ेन के गाये इस गीत में ना तो "लट्टू" कर देने वाली कोई बात है और ना ही "ऐ बच्चू" वाला ऐटिट्युड है। चलिए सुनते हैं।

गीत - पम प रा


सुजॊय - इस गीत में जो सब से अच्छी बात है वह है श्रेया की गायकी। उन्हें इस गीत में अपने वोकल रेंज के प्रदर्शन का मौका मिला और उन्होंने साबित भी किया अपने रेंज को, अपने टोनल क्वालिटी को। जैज़ शैली का गाना है, रहमान ने श्रेया से स्कैट सिंगिंग्‍ कर दिखाया है, जिसे श्रेया बख़ूबी निभाया है।

विश्व दीपक - अब अगले गीत में एक नई आवाज़। विजय येसुदास की। क्या ये येसुदास जी के साहबज़ादे हैं? जी हाँ, मेरी तरह आपका अंदाज़ा भी सही है। हिंदी फ़िल्मों के लिए भले उनकी आवाज़ नई हो, लेकिन दक्षिण में ये करीब करीब एक दशक से सक्रीय हैं। बहुत ही अच्छा लग रहा है कि रहमान ने विजय येसुदास से हिंदी गीत गवाया है। येसुदास जी के लिए लोगों के दिलों में बहुत ज़्यादा प्यार है। उनका गाया हर एक गीत उत्कृष्ट रहा है। इसलिए हमे पूरी उम्मीद है कि विजय का भी उसी प्यार से हिंदी फ़िल्म संगीत में स्वागत होगा।

सुजॊय - विजय येसुदास के गाये गीत को पहले सुनते है, फिर गीत की चर्चा करेंगे।

गीत - 'I'll be waiting'


सुजॊय - वाह! अंग्रेज़ी और हिंदी, दोनों के शब्दों को विजय ने आसानी से निभाया है, और एक भाषा से दूसरे भाषा का जो ट्रान्ज़िशन है, उसे भी भली भाँति अंजाम दिया है। अपने पिता की तरह उनकी आवाज़ में भी एक सादगी है, उनके गायन में भी वही सरलता है।

विश्व दीपक - इस गीत को हिंग्लिश कहें तो बेहतर होगा, जैज़ शैली की धुन, लेकिन अंत होता है बड़े ही कोमल तरीके से। गीत की अवधि कम होने की वजह से ऐसा लगता है जैसे दिल नहीं भरा। रहमान सर, आशा है आप अपनी अगली फ़िल्म में भी विजय को मौका देंगे, और हमें मौका देंगे उन्हें सुनने का। और अब हम आपको मौका दे रहे हैं 'झूठा ही सही' फ़िल्म के अंतिम गीत को सुनने का, "call me dil - झूठा ही सही", जिसे गाया है राशिद अली ने।

सुजॊय - जैसा कि शुरु में हमने कहा था कि पहले पहले इस फ़िल्म के शीर्षक के लिए 'Call Me Dil' सोचा गया था, शायद इसीलिए इस गीत को बनाया गया है कि दोनों ही शीर्षक इसमें समा जाये। सुंदर बोल, सुंदर संगीत, सुंदर गायकी, बस इतना ही कहेंगे इस गीत के बारे में।

गीत - call me dil - झूठा ही सही


सुजॊय - हाँ तो दोस्तों, कैसे लगे ये गानें? किसी ख़ास गीत का उल्लेख ना करते हुए मैं इस ऐल्बम को अपनी तरफ़ से ४ की रेटिंग्‍ दे रहा हूँ।

विश्व दीपक -

आवाज़ रेटिंग्स: झूठा हीं सही: ****

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # १०९- चिनमयी ने इसी साल एक और फ़िल्म में गीत गाया है जिसे हमने 'ताज़ा सुर ताल' में शामिल किया है। बताइए कौन सी है वह फ़िल्म?

TST ट्रिविया # ११०- राष्ट्रमण्डल खेल २०१० के लिए ए. आर. रहमान द्वारा रचित गीत के बोल क्या हैं?

TST ट्रिविया # १११- सोनू निगम ने बम्बई आने के बाद सब से पहले संगीतकार उषा खन्ना के संगीत में ऋषीकेश मुखर्जी की एक टीवी धारावाहिक के लिए गीत गाया था। क्या आपको याद है उस धारावाहिक का नाम?


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. बेस्ट फ़िल्म ऒन फ़ैमिली वेलफ़ेयर
२. फ़िल्म 'राही' की लोरी "चाँद सो गया, तारे सो गए"।
३. तीन बार।

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