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Sunday, December 3, 2017

ठुमरी पीलू : SWARGOSHTHI – 346 : THUMARI PILU : गायिका राजकुमारी के स्वर




स्वरगोष्ठी – 346 में आज

फिल्मी गीतों में ठुमरी के तत्व – 3 : गायिका राजकुमारी के स्वर

राग पीलू में नायक को रोकने के लिए नायिका की कोशिश – “चले जइयो बेदर्दा मैं रोय मरूँगी...”




गायिका  राजकुमारी 
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी नई श्रृंखला “फिल्मी गीतों में ठुमरी के तत्व” की इस तीसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। पिछली श्रृंखला में हमने आपके लिए फिल्मों में पारम्परिक ठुमरी के साथ-साथ उसके फिल्मी प्रयोग को भी रेखांकित किया था। इस श्रृंखला में भी हम फिल्मी ठुमरियों की चर्चा कर रहे हैं, किन्तु ये ठुमरियाँ पारम्परिक नहीं हैं। इन ठुमरी गीतों को फिल्मों के प्रसिद्ध गीतकारों ने लिखा है और संगीतकारों ने इन्हें विभिन्न रागों में बाँध कर ठुमरी गायकी के तत्वों से अभिसिंचित किया है। हमारी इस श्रृंखला “फिल्मी गीतों में ठुमरी के तत्व” के शीर्षक से ही यह अनुमान हो गया होगा कि इस श्रृंखला का विषय फिल्मों में शामिल किये गए ऐसे गीत हैं जिनमे राग, भाव और रस की दृष्टि से उपशास्त्रीय गायन शैली ठुमरी के तत्वों का उपयोग हुआ है। सवाक फिल्मों के प्रारम्भिक दौर से फ़िल्मी गीतों के रूप में तत्कालीन प्रचलित पारसी रंगमंच के संगीत और पारम्परिक ठुमरियों के सरलीकृत रूप का प्रयोग आरम्भ हो गया था। विशेष रूप से फिल्मों के गायक-सितारे कुन्दनलाल सहगल ने अपने कई गीतों को ठुमरी अंग में गाकर फिल्मों में ठुमरी शैली की आवश्यकता की पूर्ति की थी। चौथे दशक के मध्य से लेकर आठवें दशक के अन्त तक की फिल्मों में सैकड़ों ठुमरियों का प्रयोग हुआ है। इनमे से अधिकतर ठुमरियाँ ऐसी हैं जो फ़िल्मी गीत के रूप में लिखी गईं और संगीतकार ने गीत को ठुमरी अंग में संगीतबद्ध किया। कुछ फिल्मों में संगीतकारों ने परम्परागत ठुमरियों का भी प्रयोग किया है। इस श्रृंखला में हम आपसे ऐसी ही कुछ गैर-पारम्परिक चर्चित-अचर्चित फ़िल्मी ठुमरियों पर बात करेंगे। आज के अंक में हमने वर्ष 1949 में निर्मित फिल्म "बेक़सूर" से गायिका राजकुमारी द्वारा गायी राग "पीलू" में निबद्ध एक ठुमरीगीत को शामिल किया है। इस ठुमरीगीत के गीतकार आरज़ू लखनवी और संगीतकार अनिल विश्वास हैं।


फिल्मी ठुमरियों की इस श्रृंखला की पिछली कड़ी में आपने राधा-कृष्ण की होली का कल्पनाशील चित्रण महसूस किया था; किन्तु आज के ठुमरी गीत में नायिका अपने प्रियतम से बिछड़ना ही नहीं चाहती। उसे रोकने के लिए नायिका तरह-तरह के प्रयत्न करती है, तर्क देती है, यहाँ तक कि वह अपने प्रियतम को धमकी भी देती है। पिछली कड़ी में हम यह भी चर्चा कर चुके हैं कि ठुमरी शैली में रस, रंग और भाव की प्रधानता होती है। ख़याल शैली के द्रुत लय की रचना (छोटा ख़याल) और ठुमरी में मूलभूत अन्तर यही होता है कि छोटा ख़याल में शब्दों की अपेक्षा राग के स्वरों और स्वर संगतियों पर विशेष ध्यान रखना पड़ता है, जबकि ठुमरी में रस के अनुकूल भावाभिव्यक्ति पर ध्यान रखना पड़ता है। प्रायः ठुमरी गायक / गायिका को एक ही शब्द अथवा शब्द समूह को अलग-अलग भाव में प्रस्तुत करना होता है। इस प्रक्रिया में राग के निर्धारित स्वरों में कहीं-कहीं परिवर्तन करना पड़ता है।

ठुमरी की उत्पत्ति के विषय में अनेक मत-मतान्तर हैं। सामान्य धारणा है कि 19वीं शताब्दी के मध्यकाल में अवध के नवाब वाजिद अली शाह के दरबार में ठुमरी का जन्म हुआ। परन्तु यह धारणा पूरी तरह ठीक नहीं है। 19वीं शताब्दी से काफी पहले भारतीय संगीत शास्त्र इतना समृद्ध था कि उसमें किसी नई शैली के जन्म लेने की सम्भावना नहीं थी। भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में गीत के मूल तत्वों का जो निरूपण किया गया है, उसके अन्तर्गत सभी प्रकार के गीत किसी न किसी रूप में उपस्थित थे। दरअसल नवाब वाजिद अली शाह संगीत, नृत्य प्रेमी थे और संरक्षक भी। उन्नीसवीं शताब्दी में ही नवाब वाजिद अली शाह और कदरपिया नामक संगीतज्ञ ने कथक नृत्य के साथ गायन के लिए कई प्रयोग किये। द्रुत लय के ख़याल, अवध क्षेत्र की प्रचलित लोक संगीत शैलियों तथा ब्रज क्षेत्र की कृष्णलीला से सम्बन्धित गेय पदों का नृत्य के साथ प्रयोग किया गया। नवाब के दरबारी गायक उस्ताद सादिक अली खाँ का योगदान भी इन प्रयोगों में था। नवाब वाजिद अली शाह ने खुद "अख्तरपिया" उपनाम से इस प्रकार के कई गीत रचे। नवाबी शासनकाल तक नृत्य के लिए तैयार की गईं ऐसी रचनाओं को "नाट्यगीति" या "काव्यगीति" ही कहा जाता था। इस शैली का "ठुमरी" नामकरण 1856 के आसपास प्रचलित हुआ। नवाब वाजिद अली शाह के दरबार से "ठुमरी" की उत्पत्ति हुई; यह कहना उपयुक्त न होगा। हाँ; नवाब के दरबार में यह एक शैली के रूप में विकसित हुई और यहीं पर "ठुमरी" के रूप में इस शैली की पहचान बनी।

"ठुमरी" का विकास-क्रम कथक नृत्य में भाव प्रदर्शन से जुड़ा हुआ है। आज हम आपको जो ठुमरी गीत सुनाने जा रहे हैं, वह भी नृत्य पर फिल्माया गया है। 1949 में निर्मित फिल्म "बेक़सूर" में गायिका राजकुमारी द्वारा गायी राग "पीलू" में निबद्ध इस ठुमरी को शामिल किया गया था। राग पीलू काफी थाट का अत्यन्त लोकप्रिय राग है। इस राग के आरोह में ऋषभ और धैवत वर्जित होता है और अवरोह में सभी सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं। राग का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद है। ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद स्वरों का दोनों रूप प्रयोग किया जाता है। इस राग को गाने-बजाने के समय प्रायः अनेक रागों की छाया दिखाई पड़ती है, इसीलिए इसे संकीर्ण जाति का राग कहा जाता है। यह चंचल और श्रृंगार प्रकृति का राग है, अतः इस राग में ठुमरी, टप्पा, भजन और फिल्मी गीत अधिक प्रचलित हैं। आज हम आपको जो ठुमरी गीत सुनवाने जा रहे हैं, वह एक पारम्परिक ठुमरी है, किन्तु फिल्म के गीतकार आरज़ू लखनवी ने आरम्भ में और अन्तरों के मध्य विषय के अनुकूल उर्दू के शे'र भी जोड़े हैं। पूरब अंग की ठुमरियों में, विशेष रूप से दादरा में ऐसे प्रयोग प्रारम्भ से ही होते रहे हैं। फिल्मों में जब पारम्परिक गीत शामिल किये जाते है तब प्रायः भ्रम की स्थिति बन जाती है। फ़िल्मी ठुमरियों के मामले में यह भ्रम कुछ अधिक ही रहता है। रिकार्ड पर फिल्म के गीतकार का नाम अंकित होता ही है, किन्तु ठुमरी की रचना में गीतकार की भूमिका तय करना कठिन होता है। साहिर लुधियानवी और शैलेन्द्र ऐसे गीतकार हुए हैं, जिन्होंने परम्परागत शास्त्रीय और उपशास्त्रीय रचनाओं से प्रेरणा लेकर फिल्मों में कई सफल गीतों की रचनाएँ की हैं। कुछ गीतकारों ने परम्परागत ठुमरी के स्थायी को बरक़रार रखा, किन्तु अन्तरा की पंक्तियाँ अपनी ओर से जोड़ दीं। इसी प्रकार संगीतकारों की भूमिका भी अलग-अलग रही। इस ठुमरी गीत के संगीतकार अनिल विश्वास ने ठुमरी के अनुकूल वाद्यों का बड़ा प्रभावी उपयोग किया है। अपने समय की सुप्रसिद्ध गायिका राजकुमारी के स्वर में आप राग पीलू की इस ठुमरी का रसास्वादन कीजिए।

पीलू ठुमरी : “चले जइयो बेदर्दा मैं रोय मरूँगी...” : राज कुमारी : फिल्म – बेकसूर




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 346वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको 1953 में प्रदर्शित एक फिल्म से एक ठुमरी गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक ही प्रश्न का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। इस वर्ष के अन्तिम अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के पाँचवें सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का स्पर्श है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस सुप्रसिद्ध पार्श्वगायिका की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 9 दिसम्बर, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 348वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 344वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको 1947 में प्रदर्शित फिल्म “आपकी सेवा में” से एक ठुमरीनुमा गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग - पीलू, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – सोलह मात्रा का जत ताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, स्वर – लता मंगेशकर

इस अंक की पहेली प्रतियोगिता में प्रश्नों के सही उत्तर देने वाले हमारे प्रतिभागी हैं – चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। आशा है कि हमारे अन्य पाठक / श्रोता भी नियमित रूप से साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ का अवलोकन करते रहेंगे और पहेली प्रतियोगिता में भाग लेंगे। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी नई श्रृंखला “फिल्मी गीतों में ठुमरी के तत्व” की आज की कड़ी में आपने 1949 में निर्मित और 1950 में प्रदर्शित फिल्म “बेकसूर” के ठुमरी गीत का रसास्वादन किया। इस श्रृंखला में हम आपसे कुछ ऐसे फिल्मी गीतों पर चर्चा करेंगे जिसमें आपको ठुमरी शैली के दर्शन होंगे। आज आपने जो गीत सुना, उसमें राग पीलू का स्पर्श है। इस श्रृंखला में भी हम आपसे फिल्मी ठुमरियों पर चर्चा कर रहे हैं और शास्त्रीय और उपशास्त्रीय संगीत और रागों पर चर्चा भी करेंगे। हमारी वर्तमान और आगामी श्रृंखलाओं के लिए विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

Saturday, May 31, 2014

"हरि दिन तो बीता शाम हुई..." - जानिये गायिका राजकुमारी के इस अन्तिम गीत की दास्तान


एक गीत सौ कहानियाँ - 32
 

हरि दिन तो बीता, शाम हुई ...’



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारी ज़िन्दगियों से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कम सुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह साप्ताहिक स्तंभ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 32वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म 'किताब' के राजकुमारी की गायी लोरी "हरि दिन तो बीता शाम हुई..." के बारे में। 


1977 की यादगार फ़िल्म 'किताब' आपने ज़रूर देखी होगी। बहुत ही सुन्दर फ़िल्म, किरदार ऐसे कि जैसे हमारी-आपकी ज़िन्दगी के किरदार हों। फ़िल्म की मूल कहानी विख्यात बांग्ला लेखक समरेश बसु की कहानी 'पथिक' थी जिसे गुलज़ार साहब ने 'किताब' के रूप में हिन्दी दर्शकों के लिए प्रस्तुत किया। बांग्ला से हिन्दी में अनुवाद कार्य में भूषण बनमाली और देबब्रत सेनगुप्ता ने गुलज़ार की मदद की। फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे उत्तम कुमार, विद्या सिन्हा, दीना पाठक, मास्टर राजू और मास्टर टिटो प्रमुख। फ़िल्म की हर बात अनोखी थी, और उतने ही अनोखे थे इस फ़िल्म के सभी गानें। गुलज़ार और पंचम की जोड़ी हर बार कुछ न कुछ कमाल कर जाते। पर इस फ़िल्म में तो इनकी जोड़ी ने वह कमाल किया है कि इसके जैसे गानें फिर किसी अन्य फ़िल्म में सुनाई नहीं दिये। फ़िल्म में कुल चार गीत थे - पंचम का गाया "धन्नो की आँखों में रात का सुरमा", पद्मिनी और शिवांगी की आवाज़ों में "मास्टरजी की आ गई चिट्ठी", सपन चक्रवर्ती का गाया "मेरे साथ चले ना साया" और राजकुमारी की आवाज़ में लोरी "हरि दिन तो बीता शाम हुई रात पार करा दे"। पहला और दूसरा गीत जितना मशहूर हुआ उसकी तुलना में बाकी दो गीत ज़्यादा सुनाई नहीं दिये और आज तो इन्हें दुनिया लगभग भुला ही चुकी है। इन चारों गीतों की एक ख़ास बात यह थी कि इन्हें उस दौर के लोकप्रिय गायकों से नहीं बल्कि कमचर्चित या कमसुने गायकों से गवाये गये। एक गीत तो पंचम ने ख़ुद गाया, एक गीत अपने सहयोगी सपन चक्रवर्ती से गवाया; पद्मिनी और शिवांगी को भी पंचम पहले से ही जानते थे, फ़िल्म 'यादों की बारात' से जिसमें इन दोनों ने लता मंगेशकर के साथ फ़िल्म का शीर्षक गीत गाया था। 

तीन गीतों के गायक कलाकार फ़ाइनल हो गये, पर चौथे गीत की गायिका का चयन अभी बाक़ी था। पंचम और गुलज़ार, दोनों को समझ नहीं आ रहा था कि आख़िर किससे यह गीत गवाया जाए! यह गीत एक लोरी थी जो दीना पाठक पर फ़िल्माया जाना था। इसलिए किसी कम उम्र की आवाज़ या किसी जानी-पहचानी आवाज़ से गवाना उन्हें उचित नहीं लग रहा था। जब दोनों की यह बातचीत चल रही थी तब वहाँ गुलज़ार साहब के ऐसिस्टैण्ट प्रदीप दुबे भी बैठे थे। जानते हैं ये प्रदीप दुबे कौन हैं? गायिका राजकुमारी जी के बेटे। राजकुमारी गुमनामी के अन्धेरे में चली गईं थीं। 40 के दशक के अन्त तक राजकुमारी ने पार्श्वगायन जगत में राज किया, पर लता, आशा, गीता आदि नये दौर की गायिकाओं के आने पर धीरे धीरे पिछड़ती गईं और धीरे धीरे दुनिया उन्हें भुलाती चली गई, और उनकी माली हालत भी गिरती चली गई। घर चलाने के लिए कल की मशहूर गायिका अब कोरस में नज़रे चुरा कर गातीं। 1972 की फ़िल्म 'पाक़ीज़ा' के बैकग्राउण्ड स्कोर की जब रेकॉर्डिंग हो रही थी, तब नौशाद साहब ने अचानक कोरस में खड़ीं राजकुमारी को पहचान लिया। वो चौंक गये। नौशाद साहब को राजकुमारी की यह अवस्था देख कर बहुत बुरा लगा। संगीतकार बनने से पहले जिस गायिका के गानें सुना करते थे, जिनकी वो इतनी इज़्ज़त करते थे, वही गायिका दो वक़्त की रोटी जुटाने के लिए अब उन्हीं के कोरस में गा रही है, यह सोच कर उनकी आँखें नम हो गईं। उन्होंने फ़ौरन फ़िल्म 'पाक़ीज़ा' के लिए एक गीत तैयार किया और राजकुमारी की एकल आवाज़ में रेकॉर्ड किया। यह गीत था "नजरिया की मारी"। लेकिन इस गीत के बाद भी किसी और संगीतकार ने उनकी तरफ़ ध्यान नहीं दिया। अब वापस आते हैं उनके बेटे प्रदीप दुबे पर जो गुलज़ार और पंचम के यहाँ बैठे थे। प्रदीप को देख कर गुलज़ार साहब को अचानक ख़याल आया कि क्यों न यह लोरी राजकुमारी जी से गवाया जाये। पंचम को भी आइडिया अच्छा लगा। दोनों के कहने पर प्रदीप ने पंचम और राजकुमारी की मुलाक़ात फ़िक्स कर दी। राजकुमारी उन दिनों मुंबई के किसी चाल में रहती थीं और अपनी गरीबी से जूझ रही थीं। तो उनसे मिलने पंचम ख़ुद उस चाल में गये। गुलज़ार-पंचम के बनाये गीत को गाने का ऑफ़र सुन कर राजकुमारी चौंक गईं और डर भी गईं कि क्या वो गा पायेंगी, क्या वो गीत के साथ न्याय कर पायेंगी! पंचम के समझाने पर वो मान गईं और इस तरह से रेकॉर्ड हुआ यह नायाब गीत जिसकी तुलना किसी अन्य गीत से नहीं की जा सकती। इस गीत को राजकुमारी जी का गाया अन्तिम फ़िल्मी गीत माना जाता है। पर कुछ लोगों का कहना है कि इसके बाद भी पंचम ने एक और गीत उनकी आवाज़ में रेकॉर्ड किया था, पर उसकी जानकारी उपलब्ध नहीं हो सकी।

पंचम और सपन चक्रवर्ती
"हरि दिन तो बीता शाम हुई" दरअसल एक बांग्ला गीत का हिन्दी संस्करण है। केवल धुन ही नहीं बल्कि गीत के बोल भी बांग्ला गीत के बोलों का ही लगभग अनुवाद है। मूल गीत एक बांग्ला लोकगीत है जिसके बोल हैं "होरि दिन तो गेलो शोन्धा होलो, पार कोरो आमारे" जिसका हिन्दी अनुवाद है "हरि, दिन तो बीता शाम हुई, मुझे पार करा दे", जिसका भाव यह है कि ज़िन्दगी तो बीत चुकी है, अब उस पार पहुँचा दे भगवान। पर 'किताब' के हिन्दी गीत में भाव को थोड़ा सा बदल कर उस पार पहुँचाने के स्थान पर रात पार कराने अर्थात दुखद या मुश्किल की घड़ियों को पार कराने की बात कही गई है। किस चतुराई से एक दार्शनिक भजन को लोरी में परिवर्तित किया है पंचम और गुलज़ार ने। वैसे कहा जाता है कि इस धुन की तरफ़ पंचम का ध्यान सपन चक्रवर्ती ने ही दिलाया था। एक और बात यह कि इस बांग्ला लोकगीत को सत्यजीत रे ने अपनी 1955 की माइलस्टोन फ़िल्म 'पौथेर पाँचाली' में चुनीबाला देवी से गवाया था। 2006 में बांग्ला फ़िल्म 'कृष्ण आमार प्राण' फ़िल्म में शिल्पि पाल ने इस भजन को गाया था। 2012 की बांग्ला फ़िल्म 'इडियट' में इस गीत के मुखड़े को लेकर नये अंदाज़ में एक गीत ज़ुबीन ने गाया था। ऐसी बात नहीं कि हिन्दी फ़िल्मों में इस धुन का इस्तेमाल केवल 'किताब' के इस गीत में ही हुआ है। राजेश रोशन एक ऐसे संगीतकार रहे जिन्होंने एक बार नहीं, दो बार नहीं, बल्कि कई कई बार रबीन्द्रसंगीत और अन्य बांग्ला धुनों का प्रयोग अपने गीतों में किया है। इस धुन का इस्तेमाल उन्होंने 1998 की फ़िल्म 'युगपुरुष' के गीत "चले हम दो जन सैर को चले संग चली हरियाली" में किया था जिसे कुमार सानु और रवीन्द्र साठे ने गाया था। 

रेडियो ब्रॉडकास्टर अमीन सायानी ने जब एक इंटरव्यू में राजकुमारी जी से पूछा कि इतने अच्छे गाने गाने के बाद भी फ़िल्मों में गाना क्यों छोड़ा, तो राजकुमारी जी ने जवाब दिया - "मैंने फ़िल्मों के लिए गाना कब छोड़ा, मैंने छोड़ा नहीं, मैंने कुछ छोड़ा नहीं, वैसे लोगों ने बुलाना बन्द कर दिया। अब यह मैं नहीं बता पायूंगी कि क्यों बुलाना बन्द कर दिया"। कितना कष्ट हुआ होगा उन्हें ये शब्द कहते हुए इसका अन्दाज़ा लगाना कठिन नहीं। संयोग की बात देखिये कि उनके गाये इस अन्तिम गीत के बोल कैसे उन्हीं पर लागू हुए। हरि दिन तो बीता शाम हुई, रात पार करा दे। और एक दिन सचमुच युं लगा मानो मायूसी के अन्धेरों में घिरी हुई उस लम्बी काली रात का अन्त हो गया हो। जैसे निराशा के थपेड़ों में घिरी उस कश्ती को किनारा मिल गया हो। साल 2000 में गरीबी में घिरी राजकुमारी जी सदा के लिए शान्त हो गईं, भगवान ने उनकी रात पार करा दी। बस इतनी सी थी आज की कहानी।

फिल्म - किताब : 'हरि दिन तो बीता, शाम हुई...' : गायिका - राजकुमारी : संगीत - राहुलदेव बर्मन : गीत - गुलजार


 


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खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

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