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Saturday, December 18, 2010

ई मेल के बहाने यादों के खजाने (२१), जब नूरजहाँ की पुण्यतिथि पर उन्हें याद किया पार्श्वगायिका शारदा ने

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार, और बहुत बहुत स्वागत है इस साप्ताहिक विशेषांक में। आज फिर एक बार बारी 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' की। और आज का ईमेल भी बहुत ही ख़ास है। दोस्तों, २३ दिसम्बर २००० को मलिका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ इस दुनिया-ए-फ़ानी को छोड़ कर अपनी अनंत यात्रा पर निकल गईं और पीछे छोड़ गईं अपने गाये गीतों के अनमोल ख़ज़ाने को। आज पूरी दुनिया में नूरजहाँ जी के असंख्य चाहनेवाले हैं। और उनके इन तमाम चाहनेवालों में से एक उल्लेखनीय नाम पार्श्वगायिका शारदा का भी है। जी हाँ, वो ही शारदा जिन्होंने "तितली उड़ी", "दुनिया की सैर कर लो", "चले जाना ज़रा ठहरो", "वो परी कहाँ से लाऊँ", "जानेचमन शोला बदन", "जब भी ये दिल उदास होता है", "देखो मेरा दिल मचल गया" और ऐसे ही बहुत से कामयाब गीतों को गाकर ६० के दशक में फ़िल्म संगीत जगत पर छा गईं थीं। हमें जब उनकी किसी इंटरव्यु से पता चला कि उनकी मनपसंद गायिका नूरजहाँ रहीं हैं, हमने सोचा कि क्यों ना उनसे ईमेल के ज़रिए सम्पर्क स्थापित कर इस बारे में पूछा जाए। तो लीजिए आज 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' में पढ़िए शारदा जी द्वारा नूरजहाँ जी के बारे में कही हुई बातें। २३ दिसंबर को नूरजहाँ जी की पुण्यतिथि पर यह 'आवाज़' मंच की श्रद्धांजली है।

सुजॊय - शारदा जी, आशा है आप सकुशल हैं। २३ दिसंबर को मलिका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ की बरसी है। हम 'हिंद-युग्म' के 'आवाज़' मंच की तरफ़ से उन्हें श्रद्धांजली अर्पित करने की कामना रखते हैं। हमें पता चला है कि नूरजहाँ जी आपकी मनपसंद गायिका रही हैं। इसलिए हम आपसे इस बारे में जानना चाहेंगे। आप हमें और हमारे पाठकों को बताएँ कि आपके दिल में उनके लिए किस तरह के विचार हैं, उनकी गायकी में क्या ख़ास बात आपको नज़र आती है जो उन्हें औरों से अलग करती है?

शारदा - नूरजहाँ जी को मैं एक बेहतरीन गायिका के रूप में याद करती हूँ। मैंने अपने जीवन में जो पहला हिंदी गीत सुना था, वह नूरजहाँ जी का ही गाया हुआ था और उस सुहाने याद को मैं अब तक महसूस करती हूँ और बार बार जीती हूँ। उसके बाद हर बार जब भी मैं उनके गाये हुए गीत सुनती हूँ, मैं यही पता लगाने की कोशिश करती हूँ कि बोल, संगीत और आवाज़ के अलावा वह कौन सी "एक्स्ट्रा" चीज़ वो गाने में डालती हैं कि जिससे उनका गाया हर गीत एक अद्‍भुत अनुभव बन कर रह जाता है, जो दिल को इतना छू जाता है। मेरी ओर से नूरजहाँ जी को भावभीनी श्रद्धांजली।

सुजॊय - उनके कौन से गानें आपको सब से ज़्यादा पसंद हैं?

शारदा - नूरजहाँ और रफ़ी साहब की, वह "यहाँ बदला वफ़ा का बेवफ़ाई के सिवा क्या है" सुनने के लिए मरती थी, क्योंकि वहाँ ना रेडियो था, ना कुछ था सुनने के लिए, और हमारे गली के पीछे चाय की दुकान थी। तो उधर बजाते थे। एक दिन मैं खाना खा रही थी, तो खाना छोड़ कर उपर टेरेस पर भागी सुनने के लिए, और पूरा सुन कर ही नीचे आयी। माँ ने कहा कि क्या हो गया तुमको? मैं खाने के जूठे हाथ से ही खड़ी रही और पूरा सुनकर ही वापस आयी। नूरजहाँ जी से कभी मुलाक़ात नहीं हो पायी। फिर एक और गाना है "आजा मेरी बरबाद मोहब्बत के सहारे"। रेडियो पर जब गाना आता था तो भाग भाग कर लिखती थी, समझ में भी नहीं आता था तब, हिंदी भी बोलना नहीं आता था।

तो दोस्तों, शारदा जी के बताये इन दो गीतों में से दूसरा जो गीत है, "आजा मेरी बरबाद मोहब्बत के सहारे", आइए आज इस गीत के ज़रिए नूरजहाँ जी को हम अपनी श्रद्धा सुमन अर्पित करें। फ़िल्म 'अनमोल घड़ी', संगीत नौशाद साहब का, और गीतकार हैं तनवीर नक़वी।

गीत - आजा मेरी बरबाद मोहब्बत के सहारे (अनमोल घड़ी)


तो ये था इस सप्ताह का 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने', जो रोशन हो रही थी पार्श्वगायिका शारदा के यादों के उजालों से। २३ दिसंबर को मलिका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ की पुण्यतिथि पर यह अंक उन्हें श्रद्धांजली स्वरूप प्रस्तुत किया गया। अब आज बस इतना ही, कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नियमित अंक के साथ हम पुन: उपस्थित होंगे, इजाज़त दीजिए, नमस्कार!

Wednesday, August 18, 2010

जब भी ये दिल उदास होता है....जब ओल्ड इस गोल्ड के माध्यम से गायिका शारदा ने शुभकामनाएँ दी गुलज़ार साहब को

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 464/2010/164

ज १८ अगस्त है। गुलज़ार साहब को हम अपनी तरफ़ से, 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की तरफ़ से, आवाज़' परिवार की तरफ़ से, और 'हिंद युग्म' के सभी चाहनेवालों की तरफ़ से जनमदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ देते हैं, और ईश्वर से यही प्रार्थना करते हैं कि उन्हें दीर्घायु करें, उत्तम स्वास्थ्य प्रदान करें, और वो इसी तरह से शब्दों के, गीतों के, ग़ज़लों के ताने बाने बुनते रहें और फ़िल्म जगत के ख़ज़ाने को समृद्ध करते रहें। आज उनके जनमदिन पर 'मुसाफ़िर हूँ यारों' शृंखला में हम जिस गीत को चुन लाए हैं वह है फ़िल्म 'सीमा' का। मोहम्मद रफ़ी और शारदा की आवाज़ों में यह गीत है "जब भी ये दिल उदास होता है, जाने कौन आसपास होता है"। वैसे रफ़ी साहब की ही आवाज़ है पूरे गीत में, शारदा की आवाज़ आलापों में सुनाई पड़ती है। यह सन् १९७१ में निर्मित 'सीमा' है जिसका निर्माण सोहनलाल कनवर ने किया था और जिसे सुरेन्द्र मोहन ने निर्देशित किया था। राकेश रोशन, कबीर बेदी, सिमी गरेवाल, पद्मा खन्ना, चाँद उस्मानी, और अभि भट्टाचार्य अभिनीत इस फ़िल्म का संगीत निर्देशन शंकर जयकिशन ने किया था। फ़िल्म तो फ़्लॊप रही, लेकिन इस फ़िल्म का यह गीत आज भी सदाबहार गीतों में शामिल किया जाता है। विविध भारती के 'बायस्कोप की बातें' कार्यक्रम में लोकेन्द्र शर्मा ने एक बार इस फ़िल्म की बातें बताते हुए कहा था कि जयकिशन चाहते थे कि यह गीत लता जी गाएँ, लेकिन शंकर जिन्होंने इस गीत की धुन बनाई थी, वो उन दिनों शारदा को प्रोमोट कर रहे थे, इसलिए उन्होंने शारदा का ही नाम फ़ाइनल कर लिया। इससे शंकर और जयकिशन के बीच थोड़ा सा मनमुटाव हो गया था, और कहा जाता है कि लता जी भी थोड़ी नाराज़ हो गई थीं शंकर पर। दोस्तों, इन सब बातों की मैं पुष्टि तो नहीं कर सकता, लेकिन क्योंकि ये सब विविध भारती पर आया था, इसलिए मान लेते हैं कि ये सच ही होंगे।

दोस्तों, शारदा जी इन्टरनेट पर सक्रीय हैं, और इसी बात का फ़ायदा उठाते हुए हमने उनसे ईमेल द्वारा सम्पर्क किया और उनसे इस गीत से जुड़ी हुई उनकी यादें जाननी चाही। ईमेल के जवाब में उन्होंने जो कुछ लिखा था, उसका हिंदी अनुवाद ये रहा - "शुक्रिया सुजॊय जी! जब भी ये दिल उदास होता है गीत को याद करना ही एक बेहद सुखद अनुभव होता है। यह गीत जब बना था उस समय को याद करते हुए बहुत रोमांच हो आता है। मेरे लिए तो एक सपना जैसा था कि रफ़ी साहब मेरे बगल में खड़े होकर मेरे साथ गा रहे हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि गुलज़ार साहब ने असंख्य गीत लिखे हैं एक से बढ़कर एक, लेकिन यह गीत भीड़ में अलग नज़र आता है। इस गीत का कॊनसेप्ट और बोल, दोनों ही यूनिक हैं। गुलज़ार साहब को उनके जनमदिन पर मेरी ओर से बहुत बहुत शुभकामनाएँ और आशा करती हूँ कि वो इसी तरह से आगे भी हमें बहुत सारे सुंदर गानें देते रहेंगे"। आशा है शारदा जी की ये बातें गुलज़ार साहब तक 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के माध्यम से पहुँच गई होंगी। दोस्तों, यह पहला मौका था कि जब 'ओल्ड इज़ गोल्ड' ने किसी कलाकार से सीधे सम्पर्क स्थापित कर उनके विचारों को आलेख का हिस्सा बनाया, जिसे हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का एक और नया क़दम ही कहेंगे। हम कोशिश करेंगे कि आगे भी कई और कलाकारों के उद्‍गार हम इसी तरह आप तक पहुँचा पाएँगे। आइए अब हम सब मिलकर सुनते हैं फ़िल्म 'सीमा' का यह गीत, और गुलज़ार साहब को एक बार फिर से सालगिरह की ढेरों शुभकामनाएँ!



क्या आप जानते हैं...
कि गुलज़ार साहब ने टीवी धारावाहिक 'मिर्ज़ा ग़ालिब' और 'किरदार' का निर्देशन किया, तथा 'दि जंगल बूक', ''एक कहानी और मिली', 'पोटली बाबा की', 'गुच्छे', 'दाबे अनार के' और 'ऐलिस इन वंडरलैण्ड' जैसे धारावाहिकों के शीर्षक गीत भी लिखे।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. फिल्म में नायक एक ट्रक चालक की भूमिका में हैं, किसने निभाया है इस किरदार को - २ अंक.
२. इस फिल्म का निर्देशन भी गुलज़ार साहब ने किया था, किनकी कहानी पर अधर्तित थी ये फिल्म - ३ अंक.
३. इसी कहानीकार की एक और कहानी पर गुलज़ार फिल्म बना चुके थे, कौन सी थी वो फिल्म - २ अंक.
४. किस गायक की मधुर आवाज़ है इस गीत में - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी सेहत का ध्यान रखिये आपको हम सब ने मिस किया, कनेडा वाले किशोर जी, प्रतिभा जी और नवीन जी तैयार मिले जवाबों के साथ. मनु जी और इंदु जी का आना भी सुखद लगा...

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Wednesday, April 7, 2010

ये मूह और मसूर की दाल....मुहावरों ने छेड़ी दिल की बात और बना एक और फिमेल डूईट

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 397/2010/97

भाषा की सजावट के लिए पौराणिक समय से जो अलग अलग तरह के माध्यम चले आ रहे हैं, उनमें से एक बेहद लोकप्रिय माध्यम है मुहावरे। मुहावरों की खासियत यह होती है कि इन्हे बोलने के लिए साहित्यिक होने की या फिर शुद्ध भाषा बोलने की ज़रूरत नहीं पड़ती। ये मुहावरे पीढ़ी दर पीढ़ी ज़बानी आगे बढ़ती चली जाती है। क्या आप ने कभी ग़ौर किया है कि हिंदी फ़िल्मी गीतों में किसी मुहावरे का इस्तेमाल हुआ है या नहीं। हमें तो भई कम से कम एक ऐसा मुहवरा मिला है जो एक नहीं बल्कि दो दो गीतों में मुखड़े के तौर पर इस्तेमाल हुए हैं। इनमें से एक है लता मंगेशकर का गाया १९५७ की फ़िल्म 'बारिश' का गीत "ये मुंह और दाल मसूर की, ज़रा देखो तो सूरत हुज़ूर की"। और दूसरा गीत है फ़िल्म 'अराउंड दि वर्ल्ड' फ़िल्म का "ये मुंह और मसूर की दाल, वाह रे वाह मेरे बांके लाल, हुस्न जो देखा हाल बेहाल, वाह रे वाह मेरे बांके लाल"। जी हाँ, मुहावरा है 'ये मुंह और मसूर की दाल', और 'अराउंड दि वर्ल्ड' के इस गीत को गाया था जो गायिकाओं ने - शारदा और मुबारक़ बेग़म। आज 'सखी सहेली' शृंखला की सातवीं कड़ी में प्रस्तुत है इन्ही दो गायिकाओं की आवाज़ों में यह यादगार गीत। शैलेन्द्र का गीत, शंकर जयकिशन का संगीत। 'अराउंड दि वर्ल्ड' १९६७ की फ़िल्म थी जिसका निर्माण व निर्देशन पछी ने किया था और फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे राज कपूर, राजश्री और अमीता। मेरी थोड़ी बहुत हिंदी की जो जानकारी है, उसके अनुसार यह मुहावरा उस आदमी के लिए कहा जाना चाहिए जिसे कुछ हासिल हुआ है लेकिन जिसका वो लायक नहीं है। अगर मैं ग़लत हूँ तो इसका सुधार ज़रूर कीजिएगा और यह मुहावरा कैसे बना, उसके पीछे की कहानी भी लिखिएगा टिप्पणी में। हर मुहावरे के पीछे कोई ना कोई पौराणिक कहानी ज़रूर होती है और इस मुहावरे के पीछे भी यकीनन होगी।

पाश्चात्य शैली में स्वरबद्ध इस गीत के साथ शारदा की यादें जुड़ी हुईं हैं जो उन्होने विविध भारती पर हाल ही में 'उजाले उनकी यादों के' कार्यक्रम में व्यक्त किए थे।

प्र: कोई घटना या कोई गाना आपको याद आ रहा है जो बहुत दिलचस्प तरीके से बना था?

उ: "ये मुंह और मसूर की दाल"! ऐसे ही किसी ने बात करते करते कहा था कि ये मुंह और मसूर की दाल। शंकर साहब ने बोला कि इसको रखो मेरे लिए किसी गाने में, और तुरंत वह गाना ऐसे बन गया। और बहुत मशहूर हुआ था यह गाना।

प्र: वाह! तो शंकर जयकिशन का जो क्रीएटिव प्रोसेस है, किस तरह से वो काम करते थे और किस तरह से एक पूरा गाना कम्प्लीटे करते थे?

उ: इसके लिए तो एक किताब लिख सकते थे, क्योंकि मेरा तो लास्ट के कुछ दिन ही उनके साथ उठना बैठना रहा और I used to go to the studio 2-3 times a week। जब वो शाम को सिटिंग्‍ करते थे, शाम ४ से ८ बजे, तो वो फ़्लोर सिटिंग्‍ करते थे और हर दिन कुछ ना कुछ कॊम्पोज़िंग्‍ का काम चलता था। शैलेन्द्र जी और हसरत जी, दोनों बैठे रहते थे, कुछ ना कुछ मुखड़ा, शकर जी ट्युन बजाते थे, और वो मुखड़ा कह देते थे तो उसको बिठा देते थे। इस तरह से कॊम्पोज़िंग् का काम चलता था।


दोस्तों, शारदा ने शंकर जयकिशन के बारे में और भी बहुत सी बातें बताई थीं उस मुलाक़ात में जिन्हे हम धीरे धीरे 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में शामिल करते चलेंगे। लेकिन फिलहाल वक़्त हो चला है आज के गीत को सुनने का, सुनते हैं दो कमचर्चित गायिकाएँ, शारदा व मुबारक़ बेग़म की अनूठी आवाज़ों में यह सदाबहार गीत।



क्या आप जानते हैं...
कि कई जगहों पर यह सुनने व पढ़ने को मिलता है कि गायिका शारदा शंकर जयकिशन की खोज है, लेकिन हक़ीक़त यह है कि शारदा राज कपूर की खोज है। राज कपूर ने शारदा को तेहरान में पहली बार सुना था और उसी वक़्त उन्हे बम्बई आकर ऒडिशन देने का सुझाव दिया था।

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. फिल्म का शीर्षक भी इस गाने में आता है, गीतकार बताएं-३ अंक.
2. आशा भोसले का साथ इस जबरदस्त गाने में एक शानदार गायिका ने दिया है, नाम बताएं- २ अंक.
3. उस संगीतकार का नाम बताएं जिसने इस तदाकते फडकते गीत को रचा -२ अंक.
4. जीनत अमान इस फिल्म में एक अहम भूमिका में थी, फिल्म का नाम बताएं-२ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
इंदु जी ३ अंक, शरद जी, पदम जी और अनीता जी २-२ अंकों का इजाफा हुआ आपके भी स्कोर में, उम्मीद है अब आप शारदा जी के बारे में थोडा बहुत जाँ गयी होंगीं.

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Monday, February 8, 2010

तितली उडी, उड़ जो चली...याद कीजिये कितने संस्करण बनाये थे शारदा के गाये इस गीत के आपने बचपन में

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 339/2010/39

फ़िल्म जगत के श्रेष्ठतम फ़िल्मकारों में से एक थे राज कपूर, जिनकी फ़िल्मों का संगीत फ़िल्म का एक बहुत ही अहम पक्ष हुआ करती थी। क्योंकि राज कपूर को संगीत का अच्छा ज्ञान था, इसलिए वो अपनी फ़िल्म के संगीत में भी अपना मत ज़ाहिर करना नहीं भूलते थे। राज कपूर कैम्प की अगर पार्श्वगायिका का उल्लेख करें तो कुछ फ़िल्मों में आशा भोसले के गाए गीतों के अलावा उस कैम्प की प्रमुख गायिका लता जी ही हुआ करती थीं। ऐसे मे अगर राज कपूर किसी तीसरी गायिका को नायिका के प्लेबैक के लिए चुनें तो उस गायिका के लिए यह बहुत अहम बात थी। और अगर वो गायिका बिल्कुल नयी नवेली हो तो यह और भी ज़्यादा उल्लेखनीय हो जाती है। जी हाँ, राज साहब ने ऐसा किया था। ६० के दशक में एक बार राज कपूर तेहरान गए थे। वहाँ पर उनके सम्मान में एक पार्टी का आयोजन किया गया था। उन्ही दिनों तेहरान में एक तमिल लड़की थी जो पार्टियों में गानें गाया करती थी। संयोग से राज साहब की उस पार्टी में इस गायिका को गाना गाने क मौका मिला। राज साहब को उस गायिका की आवाज़ इतनी पसंद आई कि उन्होने उसे अपनी फ़िल्म में गवाने का वादा किया और बम्बई आ कर ऒडिशन देने को कहा। बस फिर क्या था, ऒडिशन भी हो गया और उस गायिका को भेज दिया गया शंकर जयकिशन के पास फ़िल्मी गायन की विधिवत तालीम हासिल करने के लिए। और आगे चलकर राज कपूर की तमाम फ़िल्मों में इस गायिका ने कई मशहूर गीत गाए, और राज साहब के बैनर के बाहर भी शंकर जयकिशन ने समय समय पर इनसे गीत गवाए। अब तक अप समझ ही गए होंगे कि ये गायिका और कोई नहीं, बल्कि शारदा हैं। कई सुपरहिट गीत गाने के बावजूद शारदा को फ़िल्म जगत ने कभी वो मुक़ाम हासिल करने नहीं दिया जिसकी वो सही मायने में हक़दार थीं। उन्ही के शब्दों में (सौजन्य: जयमाला, विविध भारती): "जब शुरु शुरु में मेरे गीत फ़िल्मों में आए तो आप सभी ने सराहा, सारे देश से मुझे प्रेरणा मिली। मेरे बहुत से गीत लोकप्रियता की चोटी पे गए, लेकिन न जाने क्यों फ़िल्मी दुनिया के कुछ लोगों ने मुझे पसंद नहीं किया। यही नहीं, उन्होने मेरी करीयर को ख़त्म करने की भी कोशिश की, कुछ हद तक शायद सफल भी हुए होंगे। पर इससे भला उन्हे क्या फ़ायदा हुआ होगा! मैं तो अलग ही ढंग से गाती थी, गाती हूँ। मेरी आवाज़ भी किसी से नहीं मिलती। और सब से बड़ी बात यह कि जब सभी लोगों ने मेरे गीतों को पसंद भी किया तो यह बात क्यों? मैं तो समझती हूँ कि ज़माने की रफ़तार के साथ साथ कला की दुनिया में भी नया रंग, नया मोड़, नया दौर आना ही चाहिए और नई दिशाएँ भी खुलनी ही चाहिए।"

दोस्तों, आज शारदा जी की आवाज़ में हम सुनने जा रहे हैं फ़िल्म 'सूरज' का बड़ा ही कामयाब गीत "तितली उड़ी, उड़ जो चली"। अभी हाल ही में शारदा जी फिर एक बार विविध भारती में पधारीं थीं और 'उजाले उनकी यादों के' कार्यक्रम के लिए एक लम्बा सा इंटरव्यू रिकार्ड करवाया था। उसमें उन्होने इस गीत के बारे में विस्तार से जो बातें बताईं, आइए उन्ही पर एक नज़र डालें। "इसको generation song भी बोल सकते हैं। इसको अभी के लोग भी पसंद करते हैं। जब भी मैं प्रोग्राम्स में जाती हूँ तो लोग कहते हैं कि मेरी बच्ची ने इस गाने पे डांस किया, किसी ने मुझसे पूरा लिरिक्स मंगवाया कि मेरी बच्ची के प्रोग्राम के लिए चाहिए, so it is going on like this. Its really surprising because this is a very simple song. इसके पीछे ना ऐसा कोई डांस है, ना कोई romantic scene है, बहुत simple song है, एक घोड़ा गाड़ी में जा रही है राजकुमारी और वो गा रही है। और इस गाने में क्या है कि वो अब तक लोगों को attract कर रहा है। मैंने इस गाने के लिए बहुत research किया और पिछले कुछ सालों में मेरे दिमाग़ में आया कि शैलेन्द्र जी कुछ ना कुछ दर्शन रखते थे हर गीत में। आत्मा को हम पक्षी या तितली कहते हैं। आत्मा wants to go to source, आत्मा भगवान की तरफ़ जाना चाहती है, आकाश में जाना चाहती है। लेकिन फूल और पत्ते जो हैं माया की तरह उसको ज़मीन पर खींचना चाहते हैं। लेकिन तितली कहती है कि मुझे जाना है अपने source। "तितली उड़ी, उड़ जो चली, फूल ने कहा आजा मेरे पास, तितली कहे मैं चली आकाश"। देखा दोस्तो, शारदा जी ने इस गीत में छुपे हुए दार्शनिक पक्ष को किस तरह से ख़ुद ढ़ूंढ निकाला है। ऐसे न जाने शैलेन्द्र के लिखे और कितने गीत होंगे जिन्हे हम रोज़ गुनगुनाते हैं लेकिन उनमें छुपे दर्शन को शायद ही महसूस करते होंगे! ख़ैर, आइए सुनते हैं "तितली उड़ी" और शुभकामनाएँ देते हैं शारदा जी को एक ख़ुशनुमा ज़िंदगी के लिए।



चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम रोज आपको देंगें ४ पंक्तियाँ और हर पंक्ति में कोई एक शब्द होगा जो होगा आपका सूत्र. यानी कुल चार शब्द आपको मिलेंगें जो अगले गीत के किसी एक अंतरे में इस्तेमाल हुए होंगें, जो शब्द बोल्ड दिख रहे हैं वो आपके सूत्र हैं बाकी शब्द बची हुई पंक्तियों में से चुनकर आपने पहेली सुलझानी है, और बूझना है वो अगला गीत. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

मौत का अँधेरा छाया है,
फिर से घनी परछाईयों जैसे,
दुनिया की गर्द और हम हैं,
राख में दबी चिंगारियों जैसे...

अतिरिक्त सूत्र- जितनी कमचर्चित रहीं ये गायिका उतने ही कम चर्चिते रहे इस अमर गीत के संगीतकार भी

पिछली पहेली का परिणाम-
शरद जी, एकदम सही गीत है....आपका स्कोर हुआ २४. बधाई...इंदु जी ये तटस्थ रहने का निर्णय क्यों ? आप रहेंगीं तो शरद जी को जरा तक्दी टक्कर मिल सकेगी...

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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