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Sunday, October 9, 2016

लोक कजरी : SWARGOSHTHI – 287 : FOLK KAJARI



स्वरगोष्ठी – 287 में आज

पावस ऋतु के राग – 8 : कजरी गीतों के विविध स्वरूप

‘कैसे खेले जइबू सावन में कजरिया, बदरिया घेरि आइल ननदी...’




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला – “पावस ऋतु के राग” की आठवीं और समापन कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। आपको स्वरों के माध्यम से बादलों की उमड़-घुमड़, बिजली की कड़क और रिमझिम फुहारों में भींगने के लिए आमंत्रित करता हूँ। यह श्रृंखला, वर्षा ऋतु के रस और गन्ध से पगे गीत-संगीत पर केन्द्रित है। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपसे वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले रागों और उनमें निबद्ध कुछ चुनी हुई रचनाओं पर चर्चा कर रहे हैं। इसके साथ ही सम्बन्धित राग के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत भी प्रस्तुत कर रहे हैं। भारतीय संगीत के अन्तर्गत मल्हार अंग के सभी राग पावस ऋतु के परिवेश की सार्थक अनुभूति कराने में समर्थ हैं। आम तौर पर इन रागों का गायन-वादन वर्षा ऋतु में अधिक किया जाता है। इसके साथ ही कुछ ऐसे सार्वकालिक राग भी हैं जो स्वतंत्र रूप से अथवा मल्हार अंग के मेल से भी वर्षा ऋतु के अनुकूल परिवेश रचने में सक्षम होते हैं। इस श्रृंखला की आठवीं कड़ी में भी आज हम आपसे कजरी गायन शैली पर चर्चा करेंगे। कजरी अथवा कजली मूलतः लोक संगीत की विधा है, किन्तु इसके कुछ विशेष गुणों के कारण उपशास्त्रीय संगीत के मंचों पर भी यह प्रतिष्ठित हुई। श्रृंखला की पिछली कड़ी में हमने आपको रागदारी संगीत के वरिष्ठ कलासाधकों से एक उपशास्त्रीय कजरी का रसास्वादन कराया था। आज के अंक में हम वर्षा ऋतु की मनभावन लोक शैली की कजरी के विविध प्रयोग पर चर्चा करेंगे। पहले आप उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ और साथियों से शहनाई पर, फिर कजरी अथवा कजली को मूल लोक संगीत के रूप में और अन्त में कजरी का फिल्मी प्रयोग भी सुनेंगे।




उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ
जरी अथवा कजली मूलतः लोक संगीत की विधा है। वर्षा ऋतु के परिवेश और इस मौसम में उपजने वाली मानवीय संवेदनाओं की अभिव्यक्ति में कजरी गीत पूर्ण समर्थ लोक-शैली है। शास्त्रीय और उपशास्त्रीय संगीत के कलासाधकों द्वारा इस लोक-शैली को अपना लिये जाने से कजरी गीत आज राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर सुशोभित है। कजरी गीतों के आकर्षण से शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, सुगम और लोक संगीत विधाओं के कलासाधक स्वयं को मुक्त नहीं कर सके। कजरी गीतों के सौन्दर्य से केवल गायक ही नहीं, वादक कलाकार भी प्रभावित रहे हैं। अनेक वादक कलाकार आज भी वर्षा ऋतु में अपनी रागदारी संगीत-प्रस्तुतियों का समापन कजरी धुन से करते हैं। सुषिर वाद्यों पर तो कजरी की धुन इतनी कर्णप्रिय होती है कि श्रोता मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ की शहनाई पर तो कजरी ऐसी बजती थी, मानो कजरी की उत्पत्ति ही शहनाई के लिए हुई हो। लोक संगीत में कजरी के दो स्वरूप मिलते हैं, जिन्हें हम मीरजापुरी और बनारसी कजरी के नाम में पहचानते हैं। भारतीय संगीत जगत में उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ एक ऐसे अनूठे कलासाधक रहे हैं, जिनकी शहनाई पर समूचा विश्व झूम चुका है। अब हम आपको उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ द्वारा शहनाई पर प्रस्तुत बनारसी कजरी का रसास्वादन कराते हैं। यह मनमोहक कजरी आरम्भ में दादरा और फिर कहरवा ताल में बँधी है।

कजरी : शहनाई पर दादरा और कहरवा ताल में निबद्ध कजरी : उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ



तृप्ति शाक्य
कजरी की उत्पत्ति कब और कैसे हुई, यह कहना कठिन है, परन्तु यह तो निश्चित है कि मानव को जब स्वर और शब्द मिले होंगे और जब लोकजीवन को प्रकृति का कोमल स्पर्श मिला होगा, उसी समय से ये सब लोकगीत हमारे बीच हैं। प्राचीन काल से ही उत्तर प्रदेश का मीरजापुर जनपद माँ विन्ध्यवासिनी के शक्तिपीठ के रूप में आस्था का केन्द्र रहा है। अधिसंख्य प्राचीन कजरियों में शक्तिस्वरूपा देवी का ही गुणगान मिलता है। आज कजरी के वर्ण्य विषय काफी विस्तृत हैं, परन्तु कजरी गीतों के गायन का आरम्भ देवी गीत से ही होता है। कजरी गीतों का गायन वर्षा ऋतु में अधिकतर महिलाएँ करतीं हैं। इसे एकल और समूह में प्रस्तुत किया जाता है। समूह में प्रस्तुत की जाने वाली कजरी को ‘ढुनमुनियाँ कजरी’ कहते हैं। पुरुष वर्ग भी कजरी गायन करते हैं, किन्तु इनके मंच अलग होते हैं। वर्षा ऋतु में पूर्वाञ्चल के अनेक स्थानों पर कजरी के दंगल आयोजित होते है, जिनमें कजरी के विभिन्न अखाड़े दल के रूप में भाग लेते है। ऐसे आयोजनों में पुरुष गायक-वादकों के दो दल परस्पर सवाल-जवाब के रूप में कजरी गीत प्रस्तुत करते हैं। लोक-जीवन में प्रस्तुत की जाने वाली कजरियों के विषय वैविध्यपूर्ण होते हैं, परन्तु वर्षाकालीन परिवेश का चित्रण सभी कजरियों में अनिवार्य रूप से मिलता है।

पारम्परिक कजरियों की धुनें और उनके टेक निर्धारित होते हैं। आमतौर पर कजरियाँ जैतसार, ढुनमुनियाँ, खेमटा, बनारसी और मीरजापुरी धुनों के नाम से पहचानी जाती हैं। कजरियों की पहचान उनके टेक के शब्दों से भी होती है। कजरी के टेक होते हैं- 'रामा', 'रे हरि', 'बलमू', 'साँवर गोरिया', 'ललना', 'ननदी' आदि। कजरी गीतों के विषय पारम्परिक भी होते हैं और अपने समकालीन लोकजीवन का दर्शन कराने वाले भी। ब्रिटिश शासनकाल में अनेक लोकगीतकारों ने ऐसी राष्ट्रवादी कजरियों की रचना की, जिनसे तत्कालीन ब्रिटिश सरकार भी भयभीत हुई थी। इस प्रकार के अनेक लोकगीतों को प्रतिबन्धित कर दिया गया था। इन लोकगीतों के रचनाकारों और गायकों को ब्रिटिश सरकार ने कठोर यातनाएँ भी दीं। परन्तु प्रतिबन्ध के बावजूद लोक-परम्पराएँ जन-जन तक पहुँचती रहीं। इन विषयों पर रची गईं अनेक कजरियों में बलिदानियों को नमन और महात्मा गाँधी के सिद्धांतों को रेखांकित किया गया। ऐसी ही एक कजरी की पंक्तियाँ देखें- "चरखा कातो, मानो गाँधी जी की बतियाँ, विपतिया कटि जइहें ननदी...”। कुछ कजरियों में अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों पर प्रहार भी किया गया। ऐसी ही एक पारम्परिक कजरी की स्थायी की पंक्तियाँ हैं- “कैसे खेले जइबू सावन में कजरिया, बदरिया घेरि आइल ननदी...”। इन पंक्तियों में काले बादलों का घिरना, गुलामी के प्रतीक रूप में चित्रित हुआ है। इसके एक अन्तरे की पंक्तियाँ हैं- “केतनो लाठी गोली खइलें, केतनो डामन (अण्डमान का अपभ्रंस) फाँसी चढ़िले, केतनों पीसत होइहें जेहल (जेल) में चकरिया, बदरिया घेरि आइल ननदी...”। आजादी के बाद कजरी-गायकों ने इस अंतरे को परिवर्तित कर दिया। अब हम आपको परिवर्तित अंतरे के साथ वही कजरी सुनवाते हैं। इस गीत को तृप्ति शाक्य और साथियों ने स्वर दिया है।

कजरी : ‘कैसे खेले जइबू सावन में कजरिया, बदरिया घेरि आइल ननदी...’ : तृप्ति शाक्य



फिल्म बिदेशिया का एक दृश्य
भारतीय फिल्मों का संगीत आंशिक रूप से ही सही, अपने समकालीन संगीत से प्रभावित रहा है। हिन्दी फिल्मों में कजरी गीतों का प्रयोग लगभग नगण्य ही हुआ है, किन्तु कजरी की धुन को आधार बना कर कुछ गीत अवश्य रचे गए हैं। परन्तु ऐसे गीतों में वर्षाकालीन परिवेश का अभाव है। हाँ, कुछ भोजपुरी फिल्मों में पारम्परिक कजरी गीतों का अच्छा प्रयोग हुआ है। 1963 में प्रदर्शित भोजपुरी फिल्म 'बिदेशिया' में कजरी शैली का अत्यन्त मौलिक रूप प्रस्तुत किया गया है। कजरी के जिस परम्परागत रूप का इस फिल्म में प्रयोग किया गया है वह लोक शैली में ‘ढुनमुनिया कजरी’ के नाम से जानी जाती है। इस प्रकार की कजरी प्रस्तुति में महिलाएँ समूह में अर्धवृत्त बना कर गाती हैं। फिल्म 'बिदेशिया' के इस कजरी गीत की रचना अपने समय के सुप्रसिद्ध लोकगीतकार राममूर्ति चतुर्वेदी ने की थी और इसे संगीतबद्ध किया था एस.एन. त्रिपाठी ने। इस गीत को गायिका गीता दत्त और कौमुदी मजुमदार ने अपने स्वरों से फिल्मों में कजरी गायन को मौलिक स्वरूप दिया है। आप यह मनभावन कजरी सुनिए और मुझे इस अंक से यहीं विराम लेने की अनुमति दीजिए। अगले अंक में हम एक नई श्रृंखला के साथ उपस्थित होंगे।

कजरी : फिल्म बिदेशिया : ‘नीक सइयाँ बिन भवनवा...’ : गीता दत्त और कौमुदी मजुमदार




संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 287वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक राग आधारित फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इस गीतांश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 290 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की चौथी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि आपको किस राग की झलक मिल रही है?

2 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गायक की आवाज़ को पहचान सकते हैं? यदि हाँ, तो उनका नाम बताइए।

आप इन तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 15 अक्तूबर, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 289वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 285वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको विदुषी गिरिजा देवी और पण्डित रवि किचालू के युगल कण्ठ-स्वर में उपशास्त्रीय अंग में प्रस्तुत की गई एक कजरी का अंश सुनवाया था और आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- गीत शैली – कजरी अथवा कजली, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल - मध्यलय दादरा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका – विदुषी गिरिजा देवी

इस बार की पहेली के प्रश्नों के सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल और जबलपुर से क्षिति तिवारी ने। हमारे एक नये प्रतिभागी – सागर शर्मा इस बार शामिल हुए हैं। सागर जी का तीन में से एक उत्तर ही सही है, इसलिए इन्हें एक अंक मिलता है। सभी पाँच प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हमारी लघु श्रृंखला ‘पावस ऋतु के राग’ का यह समापन अंक था। अगले अंक से हम भारतीय फिल्म जगत के के महान संगीतकार नौशाद अली के राग आधारित गीतों पर एक नई श्रृंखला आरम्भ कर रहे हैं। इस श्रृंखला के लिए आप अपने पसन्द के गीत, संगीत और राग की फरमाइश कर सकते हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के विभिन्न अंकों के बारे में हमें पाठकों, श्रोताओं और पहेली के प्रतिभागियों की अनेक प्रतिक्रियाएँ और सुझाव मिलते हैं। प्राप्त सुझाव और फरमार्इशों के अनुसार ही हम अपनी आगामी प्रस्तुतियों का निर्धारण करते हैं। आप भी यदि कोई सुझाव देना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। अगले रविवार को प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


 


Sunday, May 29, 2016

राग ललित : SWARGOSHTHI – 272 : RAG LALIT





स्वरगोष्ठी – 272 में आज

मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन – 5 : मन्ना डे और लता के दिव्य स्वर में ललित

‘प्रीतम दरस दिखाओ...’




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला – ‘मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन’ की पाँचवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र अपने साथी सुजॉय चटर्जी के साथ आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। यह श्रृंखला आप तक पहुँचाने के लिए हमने फिल्म संगीत के सुपरिचित इतिहासकार और ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी का सहयोग लिया है। हमारी यह श्रृंखला फिल्म जगत के चर्चित संगीतकार मदन मोहन के राग आधारित गीतों पर केन्द्रित है। श्रृंखला के प्रत्येक अंक में हम मदन मोहन के स्वरबद्ध किसी राग आधारित गीत की चर्चा और फिर उस राग की उदाहरण सहित जानकारी दे रहे हैं। श्रृंखला की पाँचवीं कड़ी में आज हम राग ललित के स्वरों में पिरोये गए फिल्म ‘चाचा जिन्दाबाद’ गीत का रसास्वादन कराएँगे। राग आधारित गीतों को स्वर देने में दक्ष पार्श्वगायक मन्ना डे और लता मंगेशकर के युगल स्वरो में यह गीत है। संगीतकार मदन मोहन द्वारा राग ललित के स्वर में निबद्ध फिल्म ‘चाचा ज़िन्दाबाद’ के इस गीत के साथ ही राग का यथार्थ स्वरूप उपस्थित करने के लिए हम विश्वविख्यात शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ की राग ललित की एक मनभावन रचना भी प्रस्तुत कर रहे हैं।


दन मोहन के संगीत सफ़र के शुरुआती दिनों के बारे में हमने पिछले अंक में ज़िक्र किया था। आइए कहानी को वहीं से आगे बढ़ाते हैं। 1947 में दिल्ली में आकाशवाणी की नौकरी को छोड़ कर मदन मोहन मायानगरी बम्बई आ पहुँचे। उन्हें गाने का बहुत शौक़ था और वो गाते भी बहुत अच्छा थे। 1947 में ही उन्हें बहज़ाद लखनवी की लिखी दो ग़ज़लें गाने और रेकॉर्ड करवाने का मौक़ा मिल गया। ये ग़ज़लें थीं "आने लगा है कोई नज़र जलवा गर मुझे..." और "इस राज़ को दुनिया जानती है..."। इसके अगले साल, 1948 में उन्हें दो और प्राइवेट ग़ज़ल रेकॉर्ड करने का अवसर मिला जिनके शायर थे दीवान शरार। मदन मोहन की आवाज़ में ये दो ग़ज़लें थीं "वो आए तो महफ़िल में इठलाते हुए आए..." और "दुनिया मुझे कहती है कि मैं तुझको भुला दूँ..."। प्राइवेट रेकॉर्ड से सीधे फ़िल्मी गीत रेकॉर्ड करने के लिए उन्हें ज़्यादा इन्तज़ार नहीं करना पड़ा। उसी साल लता मंगेशकर के साथ मास्टर ग़ुलाम हैदर के संगीत निर्देशन में 1948 की फ़िल्म ’शहीद’ में एक भाई-बहन का गीत गाने का मौक़ा मिला जिसके बोल थे "पिंजरे में बुलबुल बोले, मेरा छोटा सा दिल डोले..."। लेकिन बदक़िस्मती से ना तो यह गीत फ़िल्म में रखा गया और ना ही इसे ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड पर जारी किया गया। फ़िल्म संगीत संसार में उनकी एन्ट्री होते होते रह गई। लेकिन जल्दी ही उन्होंने संगीतकार सचिन देव बर्मन के सहायक के रूप में काम करना शुरू कर दिया फ़िल्म ’दो भाई’ में। 1948-49 में उन्होंने संगीतकार श्यामसुन्दर को असिस्ट किया फ़िल्म ’ऐक्ट्रेस’ और ’निर्दोष’ में। मदन मोहन के पिता राय बहादुर चुन्नीलाल के ’बॉम्बे टॉकीज़’ और फिर ’फ़िल्मिस्तान’ के साथ सम्बन्ध होने की वजह से फ़िल्म जगत में दाख़िल होने में उन्हें कुछ हद तक मदद मिली। पर मदन मोहन ने इस रिश्ते के बलबूते कभी कुछ हासिल करने की कोशिश नहीं की। कारण यह था कि उनके पिता ने दूसरी विवाह कर लिया था, जिससे वो अपने परिवार से दूर हो गए थे। इस पारिवारिक मनमुटाव की वजह से मदन मोहन ने कभी अपने पिता के नाम का सहारा नहीं लिया। बतौर स्वतन्त्र संगीतकार मदन मोहन को उनका पहला ब्रेक कैसे मिला, यह कहानी हम आपको बतायेंगे इस श्रृंखला की अगली कड़ी में।

अब आते हैं आज के गीत पर। आज का राग है ललित। इस राग के लिए मदन मोहन के जिस गीत को हमने चुना है, वह है फ़िल्म ’चाचा ज़िन्दाबाद’ से। लता मंगेशकर और मन्ना डे की युगल आवाज़ों में "प्रीतम दरस दिखाओ..." शास्त्रीय संगीत पर आधारित बनने वाले फ़िल्मी गीतों में विशेष स्थान रखता है। 1959 में निर्मित इस फ़िल्म का गीत-संगीत बिल्कुल असाधारण था। एक तरफ़ "बैरन नींद ना आए..." और "प्रीतम दरस दिखाओ..." जैसी राग आधारित रचनाएँ थीं तो दूसरी तरफ़ Rock 'N' Roll आधारित किशोर कुमार का गाया "ऐ हसीनों, नाज़नीनों..." जैसा गीत था। बदक़िस्मती से फ़िल्म फ़्लॉप हो गई और इसकी कब्र में इसके गानें भी चले गए। पर अच्छी बात यह है कि शास्त्रीय संगीत आधारित फ़िल्म के दोनों गीतों को कम ही सही पर मकबूलियत ज़रूर मिली थी। "प्रीतम आन मिलो..." गीत के बनने की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है। फ़िल्म में एक सिचुएशन ऐसी थी कि एक लड़की अपने गुरु से शास्त्रीय संगीत सीख रही है। इस सिचुएशन पर मदन मोहन ने राजेन्द्र कृष्ण से "प्रीतम दरस दिखाओ..." गीत लिखवा कर राग ललित में उसे स्वरबद्ध किया। उनकी दिली ख़्वाहिश थी कि इस गीत को उस्ताद अमीर ख़ाँ साहब और लता मंगेशकर गाए। लेकिन जब लता जी के कानों में यह ख़बर पहुँची कि मदन जी उनके साथ उस्ताद अमीर ख़ाँ साहब को गवाने की सोच रहे हैं, वो पीछे हो गईं। उन्होंने निर्माता ओम प्रकाश और मदन मोहन से कहा कि उन्हें इस गीत के लिए माफ़ कर दिया जाए और किसी अन्य गायिका को ख़ाँ साहब के साथ गवाया जाए। मदन मोहन अजीब स्थिति में फँस गए। वो लता जी के सिवाय किसी और से यह गीत गवाने की सोच नहीं सकते थे, और दूसरी तरफ़ ख़ाँ साहब को गवाने की भी उनकी तीव्र इच्छा थी। जब उन्होंने लता जी से कारण पूछा तो लता जी ने उन्हें कहा कि वो इतने बड़े शास्त्रीय गायक के साथ गाने में बहुत नर्वस फ़ील करेंगी जिनकी वो बहुत ज़्यादा इज़्ज़त करती हैं। लता जी ने भले उस समय यह कारण बताया हो, पर कारण कुछ और भी थे। वो नहीं चाहती थीं कि उनके साथ ख़ाँ साहब की तुलनात्मक विश्लेषण लोग करे। दूसरा, एक बार कलकत्ता में बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ साहब के साथ स्टेज शो में लता जी बहुत शर्मनाक स्थिति में पड़ गई थीं जब वहाँ मौजूद दर्शकों ने बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ साहब से ज़्यादा लता जी को तवज्जो देते हुए शोर मचाने लगे थे। ख़ाँ साहब की लता जी बहुत इज़्ज़त करती थीं, पर उस घटना ने उन्हें बेहद लज्जित कर दिया था। लता जी ने क़सम खा लिया कि इसके बाद शास्त्रीय गायकों के साथ कभी शोज़ नहीं करेंगी। ख़ैर, "प्रीतम दरस दिखाओ...” को अन्त में मन्ना डे और लता जी ने गाया। लीजिए, अब आप राग ललित के स्वरों में यह प्यारा युगल गीत सुनिए।


राग ललित : ‘प्रीतम दरस दिखाओ...’ : मन्ना डे और लता मंगेशकर : फिल्म – चाचा ज़िन्दाबाद



आज के अंक में अब हम आपसे राग ललित की संरचना पर कुछ चर्चा कर रहे हैं। राग ललित, भारतीय संगीत का एक अत्यन्त मधुर राग है। राग ललित पूर्वी थाट के अन्तर्गत माना जाता है। इस राग में कोमल ऋषभ, कोमल धैवत तथा दोनों मध्यम स्वरों का प्रयोग किया जाता है। आरोह और अवरोह दोनों में पंचम स्वर पूर्णतः वर्जित होता है। इसीलिए इस राग की जाति षाड़व-षाड़व होती है। अर्थात, राग के आरोह और अवरोह में 6-6 स्वरों का प्रयोग होता है। पंडित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने राग ललित में शुद्ध धैवत के प्रयोग को माना है। उनके अनुसार यह राग मारवा थाट के अन्तर्गत माना जाता है। राग ललित की जो स्वर-संरचना है उसके अनुसार यह राग किसी भी थाट के अनुकूल नहीं है। मारवा थाट के स्वरों से राग ललित के स्वर बिलकुल मेल नहीं खाते। राग ललित में शुद्ध मध्यम स्वर बहुत प्रबल है और यह राग का वादी स्वर भी है। इसके विपरीत मारवा में शुद्ध मध्यम सर्वथा वर्जित होता है। राग का वादी स्वर शुद्ध मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। आपको राग ललित का उदाहरण सुनवाने के लिए हमने विश्वविख्यात शहनाईनवाज उस्ताद बिस्मिलाह खाँ की शहनाई को चुना है। उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ अपनी शहनाई पर राग ललित में तीनताल में निबद्ध एक मोहक रचना प्रस्तुत कर रहे हैं। लीजिए, आप भी इस मधुर शहनाई पर राग ललित का रसास्वादन कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग ललित : शहनाई पर तीनताल की गत : उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ




संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 272वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक बार पुनः संगीतकार मदन मोहन के संगीत से सजे एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 280वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की तीसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश को सुन का आपको किस राग का आभास हो रहा है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गीत की गायिका को पहचान सकते हैं? गायिका का नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 4 जून, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 274वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 270 की संगीत पहेली में हमने आपको मदन मोहन के संगीत निर्देशन में बनी और 1961 में प्रदर्शित फिल्म ‘संजोग’ से एक राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। इस पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – कल्याण अथवा यमन, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है – ताल – दादरा तथा तीसरे प्रश्न का उत्तर है- गायक – मुकेश

इस बार की पहेली में चार प्रतिभागियों ने सही उत्तर देकर विजेता बनने का गौरव प्राप्त किया है। सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं - वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, जिन्होने दो-दो अंक अर्जित किये है। सभी चारो विजेता प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


पिछली श्रृंखला के विजेता


इस वर्ष की दूसरी श्रृंखला की पहेली (261 से 270वें अंक) में प्राप्तांकों की गणना के बाद सर्वाधिक 20 अंक अर्जित कर दो प्रतिभागियों - पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी ने प्रथम स्थान प्राप्त किया है। 18 अंक प्राप्त कर वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया ने दूसरा, 16 अंक पाकर चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल ने तीसरा और 15 अंक अर्जित कर हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी ने श्रृंखला में चौथा स्थान प्राप्त किया है। श्रृंखला के सभी विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में जारी हमारी श्रृंखला ‘मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन’ की आज की कड़ी में आपने राग ललित का परिचय प्राप्त किया। इस श्रृंखला में हम फिल्म संगीतकार मदन मोहन के कुछ राग आधारित गीतों को चुन कर आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। श्रृंखला के अगले अंक में हम संगीतकार मदन मोहन के एक अन्य राग आधारित गीत के साथ प्रस्तुत होंगे। ‘स्वरगोष्ठी’ साप्ताहिक स्तम्भ के बारे में हमारे पाठक और श्रोता नियमित रूप से हमें पत्र लिखते है। हम उनके सुझाव के अनुसार ही आगामी विषय निर्धारित करते है। ‘स्वरगोष्ठी’ पर आप भी अपने सुझाव और फरमाइश हमें भेज सकते है। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करेंगे। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


शोध व आलेख : सुजॉय चटर्जी 
 प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  
 
रेडियो प्लेबैक इण्डिया  

Sunday, January 4, 2015

स्वागत नववर्ष 2015 : SWARGOSHTHI – 201 : RAG BHAIRAVI



स्वरगोष्ठी – 201 में आज

मंगलध्वनि और राग भैरवी

मंगलवाद्य शहनाई-वादन से नववर्ष का अभिनन्दन




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का नए वर्ष के पहले अंक में हार्दिक अभिनन्दन है। इसी 201वें अंक से आपका प्रिय स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पाँचवें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। विगत चार वर्षों से हमें असंख्य पाठकों, श्रोताओं, संगीत शिक्षकों और वरिष्ठ संगीतज्ञों का प्यार, दुलार और मार्गदर्शन इस स्तम्भ को मिलता रहा है। इन्टरनेट पर शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, लोक और सुगम संगीत विषयक चर्चा का सम्भवतः यह एकमात्र नियमित साप्ताहिक स्तम्भ है, जो विगत चार वर्षों से निरन्तरता बनाए हुए है। इस पुनीत अवसर पर मैं कृष्णमोहन मिश्र, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के संचालक मण्डल के सभी सदस्यों- सजीव सारथी, सुजॉय चटर्जी, अमित तिवारी, अनुराग शर्मा, विश्वदीपक और संज्ञा टण्डन के प्रति भी आभार प्रकट करता हूँ, जिनकी आहुतियाँ भी इस यज्ञ में होती हैं। आज पाँचवें वर्ष के इस प्रवेशांक में हम आपसे इस साप्ताहिक स्तम्भ के आरम्भ की कुछ स्मृतियों को बाँटेंगे। इसके साथ ही आज के इस अंक में शुभ अवसरों पर परम्परागत रूप से बजने वाले मंगलवाद्य शहनाई का वादन भी प्रस्तुत करेंगे। वादक हैं, भारतरत्न के सर्वोच्च अलंकरण से विभूषित उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ और राग है सर्वप्रिय भैरवी। इसके अलावा राग भैरवी के स्वरों में पिरोया एक अर्थपूर्ण फिल्मी गीत भी प्रस्तुत करेंगे, जिसे सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक पण्डित राजन मिश्र ने गाया है।




ठीक चार वर्ष पूर्व ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ संचालक मण्डल के प्रमुख सदस्य सुजॉय चटर्जी ने रविवार, 2 जनवरी 2011 को इस स्तम्भ का शुभारम्भ किया था। आरम्भ में यह ‘हिन्दयुग्म’ के ‘आवाज़’ मंच पर हमारे अन्य नियमित स्तम्भों के साथ प्रकाशित हुआ करता था। उन दिनों इस स्तम्भ का शीर्षक ‘सुर संगम’ था। दिसम्बर 2011 से हमने ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ नाम से एक नया मंच बनाया और पाठकों के अनुरोध पर जनवरी 2012 से इस स्तम्भ का शीर्षक ‘स्वरगोष्ठी’ हो गया। तब से हम आपसे निरन्तर यहीं मिलते हैं। समय-समय पर आपसे मिले सुझावों के आधार पर हम अपने सभी स्तम्भों में संशोधन भी करते रहते हैं। इस स्तम्भ के प्रवेशांक में सुजॉय जी ने इसके उद्देश्यों पर प्रकाश डाला था। उन्होने लिखा था-

“नये साल के इस पहले रविवार की सुहानी सुबह में मैं, सुजॊय चटर्जी, आप सभी का 'आवाज़' पर स्वागत करता हूँ। यूँ तो हमारी मुलाक़ात नियमित रूप से 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर होती रहती है, लेकिन अब से मैं 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के अलावा हर रविवार की सुबह आपसे मुख़ातिब रहूँगा इस नये स्तम्भ में जिसकी हम आज से शुरुआत कर रहे हैं। दोस्तों, प्राचीनतम संगीत की अगर हम बात करें तो वो है हमारा शास्त्रीय संगीत, जिसका उल्लेख हमें वेदों में मिलता है। चार वेदों में सामवेद में संगीत का व्यापक वर्णन मिलता है। इन वैदिक ऋचाओं को सामगान के रूप में गाया जाता था। फिर उससे 'जाति' बनी और फिर आगे चलकर 'राग' बनें। ऐसी मान्यता है कि ये अलग-अलग राग हमारे अलग-अलग 'चक्र' (ऊर्जा विंदु) को प्रभावित करते हैं। ये अलग-अलग राग आधार बनें शास्त्रीय संगीत का और युगों-युगों से इस देश के सुरसाधक इस परम्परा को निरन्तर आगे बढ़ाते चले जा रहे हैं, हमारी संस्कृति को सहेजते हुए बढ़े जा रहे हैं। संगीत की तमाम धाराओं में सब से महत्वपूर्ण धारा है शास्त्रीय अर्थात रागदारी संगीत। बाकी जितनी तरह का संगीत है, उन सबसे उच्च स्थान पर है अपना रागदारी संगीत। तभी तो संगीत की शिक्षा का अर्थ ही है शास्त्रीय संगीत की शिक्षा। अक्सर साक्षात्कारों में कलाकार इस बात का ज़िक्र करते हैं कि एक अच्छा गायक या संगीतकार बनने के लिए शास्त्रीय संगीत का सीखना बेहद ज़रूरी है। तो दोस्तों, आज से 'आवाज़' पर पहली बार एक ऐसा साप्ताहिक स्तम्भ शुरु हो रहा है जो समर्पित है, भारतीय परम्परागत शास्त्रीय संगीत को। गायन और वादन, यानी साज़ और आवाज़, दोनों को ही बारी-बारी से इसमें शामिल किया जाएगा। भारतीय संगीत से इस स्तम्भ की हम शुरुआत कर रहे हैं, लेकिन आगे चलकर अन्य संगीत शैलियों को भी शामिल करने की उम्मीद रखते हैं।...”

तो यह सन्देश हमारे इस स्तम्भ के प्रवेशांक का था। ‘स्वरगोष्ठी’ की कुछ और पुरानी यादों को ताज़ा करने से पहले आज का चुना हुआ संगीत सुनते हैं। आज ‘स्वरगोष्ठी’ पाँचवें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। इस पावन अवसर पर मंगल वाद्य शहनाई का वादन प्रस्तुत कर रहे हैं। इस अंक में हम देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारतरत्न’ से अलंकृत उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ की शहनाई पर राग भैरवी प्रस्तुत कर रहे हैं।


मंगलध्वनि : राग भैरवी : शहनाई वादन : उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ


हमारे दल के सर्वाधिक कर्मठ साथी सुजोय चटर्जी ने ‘स्वरगोष्ठी’ स्तम्भ की नीव रखी थी। उद्देश्य था- शास्त्रीय और उपशास्त्रीय संगीत-प्रेमियों को एक ऐसा मंच देना जहाँ किसी कलासाधक, प्रस्तुति अथवा किसी संगीत-विधा पर हम आपसे संवाद कायम कर सकें और आपसे विचारों का आदान-प्रदान कर सकें। आज के 201वें अंक के माध्यम से हम कुछ पुरानी स्मृतियों को ताज़ा कर रहे हैं। जैसा कि पहले ही उल्लेख किया गया है कि इस स्तम्भ की बुनियाद सुजॉय चटर्जी ने रखी थी और आठवें अंक तक अपने आलेखों के माध्यम से अनेक संगीतज्ञों की कृतियों से हमें रससिक्त किया था। नौवें अंक से हमारे एक नये साथी सुमित चक्रवर्ती हमसे जुड़े और आपके अनुरोध पर उन्होने शास्त्रीय, उपशास्त्रीय संगीत के साथ लोक संगीत को भी ‘सुर संगम’ से जोड़ा। सुमित जी ने इस स्तम्भ के 30वें अंक तक आपके लिए बहुविध सामग्री प्रस्तुत की, जिसे आप सब पाठकों-श्रोताओं ने सराहा। इसी बीच मुझ अकिंचन को भी कई विशेष अवसरों पर कुछ अंक प्रस्तुत करने का अवसर मिला। सुमित जी की पारिवारिक और व्यावसायिक व्यस्तता के कारण 31वें अंक से ‘सुर संगम’ का पूर्ण दायित्व मेरे मित्रों ने मुझे सौंपा। मुझ पर विश्वास करने के लिए अपने साथियों का मैं आभारी हूँ। साथ ही अपने पाठकों-श्रोताओं का अनमोल प्रोत्साहन भी मुझे मिला, जो आज भी जारी है।

पिछले 200 अंकों में ‘स्वरगोष्ठी’ से असंख्य पाठक, श्रोता, समालोचक और संगीतकार जुड़े। हमें उनका प्यार, दुलार और मार्गदर्शन मिला। उन सभी का नामोल्लेख कर पाना सम्भव नहीं है। ‘स्वरगोष्ठी’ का सबसे रोचक भाग प्रत्येक अंक में प्रकाशित होने वाली ‘संगीत पहेली’ है। इस पहेली में गत वर्ष के दौरान लगभग बारह संगीत-प्रेमियों ने सहभागिता की, जिनमें से चार प्रतिभागी नियमित थे। सभी प्रतिभागियों के पूरे वर्ष भर के प्राप्तांकों की गणना जारी है। अगले अंक में हम प्रथम तीन विजेताओं की घोषणा करेंगे। इस अंक में हम राग भैरवी पर चर्चा कर रहे हैं। राग भैरवी में ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद सभी कोमल स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। राग भैरवी के आरोह स्वर हैं, सा, रे॒ (कोमल), ग॒ (कोमल), म, प, ध॒ (कोमल), नि॒ (कोमल), सां तथा अवरोह के स्वर, सां, नि॒ (कोमल), ध॒ (कोमल), प, म (कोमल), रे॒ (कोमल), सा होते हैं। यूँ तो इस राग के गायन-वादन का समय प्रातःकाल, सन्धिप्रकाश बेला में है, किन्तु आम तौर पर इसका गायन-वादन किसी संगीत-सभा अथवा समारोह के अन्त में किये जाने की परम्परा बन गई है। आइए, इसी राग के स्वरों में निबद्ध एक फिल्मी गीत सुनते हैं। यह गीत हमने 1985 की फिल्म ‘सुर संगम’ से लिया है। फिल्म के संगीतकार लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल और गीतकार बसन्त देव हैं। राग भैरवी पर आधारित जो गीत हम प्रस्तुत कर रहे हैं, उसे सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित राजन मिश्र ने स्वर दिया है। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग भैरवी : ‘धन्यभाग सेवा का अवसर पाया...’ : फिल्म सुर संगम : पण्डित राजन मिश्र और कविता कृष्णमूर्ति




संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 201 अंक की पहेली में आज हम आपको किसी गीत या संगीत का अंश नहीं सुनवा रहे हैं। आज की पहेली के दोनों प्रश्न ऊपर सुनवाए गए मंगलवाद्य शहनाई से सम्बन्धित है। उपरोक्त शहनाई वादन को एक बार पुनः ध्यान से सुनिए। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 210 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2015 की इस पहली श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।

1 – इस वाद्य संगीत को सुन कर क्या आपको किसी लोकप्रिय भक्ति-गीत की प्रचलित धुन का अनुभव हो रहा है? यदि हाँ, तो उस गीत की आरम्भिक पंक्ति बताइए।

2 – यह भी बताइए कि यह भक्ति-काल के किस कवि / कवयित्री की रचना है? 

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 10 जनवरी, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 203वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ की 199वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको 1981 में प्रदर्शित फिल्म ‘कुदरत’ के एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग भैरवी और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका विदुषी परवीन सुल्ताना। इस बार की पहेली में पूछे गए दोनों प्रश्नो के सही उत्तर पूर्व की भाँति जबलपुर से क्षिति तिवारी, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ ने इस अंक के साथ पाँचवें वर्ष में प्रवेश किया है। नए वर्ष में हम आपके लिए कुछ नई श्रृंखलाएँ लेकर उपस्थित हो रहे हैं। हमारी आगामी श्रृंखलाएँ आपके सुझावों पर आधारित है। यदि आपने अभी तक अपने सुझाव और फरमाइश नहीं भेजी हैं तो आविलम्ब हमें भेज दें। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। अगले अंक भी हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 


Sunday, August 17, 2014

कजरी गीतों का स्वतंत्रता संग्राम में योगदान : SWARGOSHTHI – 181 : KAJARI



स्वरगोष्ठी – 181 में आज

वर्षा ऋतु के राग और रंग – 7 : कजरी गीतों का लोक स्वरूप


कजरी का लोक रंग : ‘कैसे खेले जइबू सावन में कजरिया, बदरिया घेरि आइल ननदी...’







‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी लघु श्रृंखला ‘वर्षा ऋतु के राग और रंग’ की सातवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र एक बार पुनः आप सभी संगीतानुरागियों का हार्दिक स्वागत और अभिनन्दन करता हूँ। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम वर्षा ऋतु के राग, रस और गन्ध से पगे गीत-संगीत का आनन्द प्राप्त कर रहे हैं। हम आपसे वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले गीत, संगीत, रागों और उनमें निबद्ध कुछ चुनी हुई रचनाओं का रसास्वादन कर रहे हैं। इसके साथ ही सम्बन्धित राग और धुन के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत भी सुन रहे हैं। पावस ऋतु के परिवेश की सार्थक अनुभूति कराने में जहाँ मल्हार अंग के राग समर्थ हैं, वहीं लोक संगीत की रसपूर्ण विधा कजरी अथवा कजली भी पूर्ण समर्थ होती है। इस श्रृंखला की पिछली कड़ियों में हम आपसे मल्हार अंग के कुछ रागों पर और कजरी गीतों के आभिजात्य स्वरूप पर चर्चा कर चुके हैं। आज के अंक से हम कजरी गीतों के पारम्परिक लोक स्वरूप पर चर्चा करेंगे। 
 


डॉ. वनमाला पर्वतकर
जरी की उत्पत्ति कब और कैसे हुई, यह कहना कठिन है, परन्तु यह तो निश्चित है कि मानव को जब स्वर और शब्द मिले होंगे और जब लोकजीवन को प्रकृति का कोमल स्पर्श मिला होगा, उसी समय से ये सब लोकगीत हमारे बीच हैं। प्राचीन काल से ही उत्तर प्रदेश का मीरजापुर जनपद माँ विन्ध्यवासिनी के शक्तिपीठ के रूप में आस्था का केन्द्र रहा है। अधिसंख्य प्राचीन कजरियों में शक्तिस्वरूपा देवी का ही गुणगान मिलता है। आज कजरी के वर्ण्य विषय काफी विस्तृत हैं, परन्तु कजरी गीतों के गायन का आरम्भ देवी गीत से ही होता है। हम भी अपनी आज की इस गोष्ठी का आरम्भ एक पारम्परिक देवी गीत से ही करते हैं। ऐसे गीतों में शक्तिस्वरूपा देवी माँ का लौकिक रूप में प्रस्तुतीकरण होता है। कजरी गीतों का गायन वर्षा ऋतु में अधिकतर महिलाएँ करतीं हैं। इसे एकल और समूह में प्रस्तुत किया जाता है। समूह में प्रस्तुत की जाने वाली कजरी को ‘ढुनमुनियाँ कजरी’ कहते हैं। पुरुष वर्ग भी कजरी गायन करते हैं, किन्तु इनके मंच अलग होते हैं। वर्षा ऋतु में पूर्वाञ्चल के अनेक स्थानों पर कजरी के दंगल आयोजित होते है, जिनमें कजरी के विभिन्न अखाड़े दल के रूप में भाग लेते है। ऐसे आयोजनों में पुरुष गायक-वादकों के दो दल परस्पर सवाल-जवाब के रूप में कजरी गीत प्रस्तुत करते हैं। लोक-जीवन में प्रस्तुत की जाने वाली कजरियों के विषय वैविध्यपूर्ण होते हैं, परन्तु वर्षाकालीन परिवेश का चित्रण सभी कजरियों में अनिवार्य रूप से मिलता है। परम्परागत रूप से कजरी गीतों का आरम्भ देवी गीत से ही किया जाता है। इस प्रकार के कजरी गीतों में शक्तिस्वरूपा माँ विन्ध्यवासिनी की वन्दना की जाती है। आज हम आपको जो देवी गीत सुनवा रहे हैं उसका संकलन और संगीत, वाराणसी की संगीत परम्परा के विद्वान पण्डित शिवकुमार शास्त्री ने किया है। शास्त्री जी के अनुसार इस देवी गीत का प्रचलन लगभग आठ दशक पूर्व भी रहा है। गीत के अन्तिम अन्तरे में ‘नारायण’ नाम का उल्लेख हुआ है। सम्भवतः यह कजरी गीत के रचनाकार का नाम है। गीत का गायन डॉ. वनमाला पर्वतकर और साथियों के स्वरों में किया गया है। इस कजरी गीत के बोल हैं- ‘संकट दूर करो महारानी संकटा आदि भवानी ना...’


पारम्परिक कजरी : देवी गीत : ‘संकट दूर करो महारानी संकटा आदि भवानी ना...’ : डॉ. वनमाला पर्वतकर और साथी




तृप्ति शाक्य
पारम्परिक कजरियों की धुनें और उनके टेक निर्धारित होते हैं। आमतौर पर कजरियाँ जैतसार, ढुनमुनियाँ, खेमटा, बनारसी और मीरजापुरी धुनों के नाम से पहचानी जाती हैं। कजरियों की पहचान उनके टेक के शब्दों से भी होती है। कजरी के टेक होते हैं- 'रामा', 'रे हरि', 'बलमू', 'साँवर गोरिया', 'ललना', 'ननदी' आदि। कजरी गीतों के विषय पारम्परिक भी होते हैं और अपने समकालीन लोकजीवन का दर्शन कराने वाले भी। ब्रिटिश शासनकाल में अनेक लोकगीतकारों ने ऐसी राष्ट्रवादी कजरियों की रचना की, जिनसे तत्कालीन ब्रिटिश सरकार भी भयभीत हुई थी। इस प्रकार के अनेक लोकगीतों को प्रतिबन्धित कर दिया गया था। इन लोकगीतों के रचनाकारों और गायकों को ब्रिटिश सरकार ने कठोर यातनाएँ भी दीं। परन्तु प्रतिबन्ध के बावजूद लोक-परम्पराएँ जन-जन तक पहुँचती रहीं। दो दिन पहले हमने 68वाँ स्वतंत्रता दिवस मनाया है। इस उपलक्ष्य में आज हम एक विशेष कजरी गीत को रेखांकित कर रहे हैं। इन विषयों पर रची गईं अनेक कजरियों में बलिदानियों को नमन और महात्मा गाँधी के सिद्धांतों को रेखांकित किया गया। ऐसी ही एक कजरी की पंक्तियाँ देखें- "चरखा कातो, मानो गाँधी जी की बतियाँ, विपतिया कटि जइहें ननदी...”। कुछ कजरियों में अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों पर प्रहार भी किया गया। ऐसी ही एक पारम्परिक कजरी की स्थायी की पंक्तियाँ हैं- “कैसे खेले जइबू सावन में कजरिया, बदरिया घेरि आइल ननदी...”। इन पंक्तियों में काले बादलों का घिरना, गुलामी के प्रतीक रूप में चित्रित हुआ है। इसके एक अन्तरे की पंक्तियाँ हैं- “केतनो लाठी गोली खइलें, केतनो डामन (अण्डमान का अपभ्रंस) फाँसी चढ़िले, केतनों पीसत होइहें जेहल (जेल) में चकरिया, बदरिया घेरि आइल ननदी...”। आजादी के बाद कजरी-गायकों ने इस अन्तरे को परिवर्तित कर दिया। अब हम आपको परिवर्तित अन्तरे के साथ वही कजरी सुनवाते हैं। इस गीत को गायिका तृप्ति शाक्य और उनके साथियों ने स्वर दिया है।


पारम्परिक कजरी : ‘कैसे खेले जइबू सावन में कजरिया, बदरिया घेरि आइल ननदी...’ : तृप्ति शाक्य और साथी




उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ
वर्षा ऋतु के परिवेश और इस मौसम में उपजने वाली मानवीय संवेदनाओं की अभियक्ति में कजरी गीत पूर्ण समर्थ लोक-शैली है। शास्त्रीय और उपशास्त्रीय संगीत के कलासाधकों द्वारा इस लोक-शैली को अपना लिये जाने से कजरी गीत आज राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर सुशोभित हो चुकी है। कजरी गीतों के आकर्षण से शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, सुगम और लोक संगीत विधाओं के कलासाधक स्वयं को मुक्त नहीं कर सके। कजरी गीतों के सौन्दर्य से केवल गायक ही नहीं, वादक कलाकार भी प्रभावित रहे हैं। अनेक वादक कलाकार आज भी वर्षा ऋतु में अपनी रागदारी संगीत-प्रस्तुतियों का समापन कजरी धुन से करते हैं। सुषिर वाद्यों पर तो कजरी की धुन इतनी कर्णप्रिय होती है कि श्रोता मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ की शहनाई पर तो कजरी ऐसी बजती थी, मानो कजरी की उत्पत्ति ही शहनाई के लिए हुई हो। लोक संगीत में कजरी के दो स्वरूप मिलते हैं, जिन्हें हम मीरजापुरी और बनारसी कजरी के रूप में पहचानते हैं। भारतीय संगीत जगत में उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ एक ऐसे अनूठे कलासाधक रहे हैं, जिनकी शहनाई पर समूचा विश्व झूम चुका है। अब हम आपको उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ द्वारा शहनाई पर प्रस्तुत बनारसी कजरी का रसास्वादन कराते हैं। यह मनमोहक कजरी दादरा और कहरवा ताल में बँधी है।


पारम्परिक कजरी : शहनाई वादन : दादरा और कहरवा ताल में निबद्ध कजरी धुन : उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ और साथी






आज की पहेली



‘स्वरगोष्ठी’ के 181वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको कण्ठ संगीत की एक प्राचीन रेकार्डिंग का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 190वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।



1 – कण्ठ संगीत की इस रचना के अंश को सुन कर राग पहचानिए और हमे राग का नाम बताइए।

2 – यह भारतीय संगीत के किस महान गायक की आवाज़ है? एक संकेत सूत्र है- ‘पण्डित भीमसेन जोशी इस गायक की आवाज़ से इतने अधिक प्रभावित हुए थे कि अच्छे गुरु की तलाश में घर छोड़ कर निकल पड़े थे’

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 183वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 179वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी गिरिजा देवी के स्वरों में प्रस्तुत कजरी गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका विदुषी गिरिजा देवी और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- उपशास्त्रीय संगीत शैली में कजरी अथवा कजली। इस अंक की पहेली के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी और पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। दोनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात



मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों हम ऋतु के अनुकूल रागों अर्थात वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले संगीत पर चर्चा कर रहे हैं। यह इस लघु श्रृंखला का समापन अंक था। अगले अंक से हम एक नई श्रृंखला की शुरुआत करेंगे। हमारे पिछले अंक पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए पेंसिलवानिया, अमेरिका की सुश्री विजया राजकोटिया लिखती हैं-

Dear Krishnamohanji, 

You have made this topic so interesting by giving beautiful descriptions of subtle Rachana under the Light classical music - Thumri. I can feel the depth of our music in your lines for which I am thankful to you. 
The beautiful piece you included in this Paheli is by Ustad Bismillah Khanji whom I have heard personally in the concerts since my childhood. So coming to the answers: 1 (a) The instrument is called Shehnai which is a wind instrument. (b) It is a kind of Kajari meaning Kajari ka Lok-Swaroop. In other words it is a Lok Geet generally played during auspicious occasions like marriage etc. Shehnai is popular in such occasions. 2. This composition is set initially in Dadra taal and then is changed to Kehrava taal.

With regards, 

Vijaya Rajkotia 
Chalfont, Pennsylvania 
USA 

विजया जी का हार्दिक आभार प्रकट करते हुए आपको सूचित करना चाहूँगा कि ‘स्वरगोष्ठी’ की अगली श्रृंखला उपशास्त्रीय संगीत शैली ठुमरी पर केन्द्रित होगी। इस लघु श्रृंखला में हम एक नया प्रयोग भी कर रहे हैं। आप भी यदि भारतीय संगीत के किसी विषय में कोई जानकारी हमारे बीच बाँटना चाहें तो अपना आलेख अपने संक्षिप्त परिचय के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के ई-मेल पर भेज दें। अपने पाठको/श्रोताओं की प्रेषित सामग्री प्रकाशित/प्रसारित करने में हमें हर्ष होगा। आगामी श्रृंखलाओं के लिए आप अपनी पसन्द के कलासाधकों, रागों या रचनाओं की फरमाइश भी कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करेंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-प्रेमियों की हमें प्रतीक्षा रहेगी। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   

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