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Sunday, February 26, 2012

स्वरगोष्ठी में आज- विवाह-पूर्व के संस्कार गीत


February 26, 2012
स्वरगोष्ठी – ५९ में आज

‘हमरी बन्नी के गोरे गोरे हाथ, मेंहदी खूब रचे...’

भारतीय समाज में विवाह एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण संस्कार माना जाता है। एक पर्व की तरह यह संस्कार उत्साह और उल्लास के साथ मनाया जाता है। इस अवसर पर हर धर्मावलम्बी अपने-अपने धार्मिक रीति-रिवाजो के के साथ-साथ लोकाचारों का पालन भी करते हैं। उल्लेखनीय है कि इन लोकाचारों में काफी समानता भी होती है। आपको स्मरण ही होगा कि ‘स्वरगोष्ठी’ में हमने निश्चय किया था कि प्रत्येक मास में कम से कम एक अंक हम लोक संगीत को समर्पित करेंगे। हमारा आज का अंक लोक संगीत पर केन्द्रित है।


लोक संगीत से अनुराग करने वाले ‘स्वरगोष्ठी’ के सभी पाठको-श्रोताओं को कृष्णमोहन मिश्र का नमस्कार और स्वागत है। इस स्तम्भ की ५२ वीं कड़ी में हमने आपसे संस्कार गीत के अन्तर्गत विवाह पूर्व गाये जाने वाले बन्ना और बन्नी गीतों पर चर्चा की थी। वर और बधू का श्रृंगारपूर्ण वर्णन, विवाह से पूर्व के अन्य कई अवसरों पर किया जाता है, जैसे- हल्दी, मेंहदी, लगन चढ़ाना, सेहरा आदि। इनमें मेंहदी और सेहरा के गीत मुस्लिम समाज में भी प्रचलित है। इन सभी अवसरों के संस्कार गीत महिलाओं द्वारा समूह में गाये जाते है। आज सबसे पहले हम आपको अवध क्षेत्र में प्रचलित एक परम्परागत मेंहदी गीत सुनवाते हैं। गीत में दुल्हन का बहुविध श्रृंगार किया जा रहा है, उसके गोरे हाथों पर कलात्मक मेंहदी लगाई जा रही है और सखियाँ मेंहदी गीत गा रहीं हैं। आपके लिए हम यह मेंहदी गीत क्षिति तिवारी और साथियों के स्वरों में सुनवा रहे हैं।

मेंहदी गीत : ‘हमरी बन्नी के गोरे गोरे हाथ...’ : स्वर – क्षिति तिवारी और साथी


मेंहदी का उत्सव कन्या पक्ष के आँगन में सम्पन्न होता है, जब कि हल्दी, तेल और उबटन का उत्सव दोनों पक्षों में अलग-अलग आयोजित होता है। दूसरी ओर कन्या के पिता, वर पक्ष की सलाह पर अपने पुरोहित से विवाह का शुभ लग्न निकलवाते हैं। एक शुभ मुहूर्त में कन्या के पिता और परिवार के अन्य वरिष्ठ सदस्य, पुरोहित द्वारा तैयार लग्न पत्रिका और फल-मिष्ठान्न आदि भेंट वस्तुएँ लेकर वर के परिवार जाते हैं। औपचारिक रूप से वर के पिता उस लग्न के प्रस्ताव को अपनी सहमति देते हैं। भोजपुरी क्षेत्र में इस अवसर का बड़ा महत्त्व होता है। इन क्षेत्रों में इसे लग्न चढ़ाना कहते हैं। कन्या के परिवार की महिलाएँ खूब धूम-धाम से, गाते-बजाते लग्न चढ़ाने वालों को विदा करती हैं। भोजपुरी की चर्चित लोक-गायिका शारदा सिन्हा ने विवाह के अवसर पर गाये जाने वाले अनेक मोहक गीत गाये हैं। लग्न चढ़ाने के लिए वर पक्ष के यहाँ प्रस्थान करने के अवसर पर कोकिलकंठी श्रीमती सिन्हा ने एक बेहद मधुर गीत- ‘पूरब दिशा से चलले बेटी के बाबू, दूल्हा के लगन चढ़ावे जी...’ गाया है। आज हम आपको उन्हीं का गाया लग्न-गीत प्रस्तुत कर रहे हैं।

लग्न गीत : ‘पूरब दिशा से चलले बेटी के बाबू...’ : स्वर – शारदा सिन्हा और साथी


आज की ‘स्वरगोष्ठी’ में हमने आपसे अवधी और भोजपुरी क्षेत्रों में प्रचलित विवाह-पूर्व के संस्कार गीतों पर चर्चा की। अब हम आपको राजस्थान क्षेत्र की ओर ले चलते हैं, जहाँ आज भी अत्यन्त सुदृढ़ सामाजिक परम्पराएँ कायम हैं। आज़ादी के बाद से यहाँ के समाज में व्याप्त अनेक कुरीतियाँ, तेज़ी से समाप्त हो रही हैं। राजस्थान में प्रचलित बाल विवाह की कुप्रथा में भी धीरे-धीरे कमी आ रही है। रंग-रँगीले राजस्थान में कई लोक संगीतजीवी समुदाय हैं। लंगा, मांगनियार, मिरासी, भाँट आदि कई समुदाय वंश-परम्परा से आज भी जुड़े हैं। इन लोक कलाकारों को देश-विदेश में भरपूर मान-सम्मान भी प्राप्त हो रहा है। आज हम आपसे लंगा समुदाय के बारे में चर्चा करेंगे। लंगा मुस्लिम समुदाय के होते हैं, किन्तु वंश परम्परा के अनुसार ये हिन्दू परिवारॉ के मांगलिक कार्यों में भी न केवल शामिल होते हैं, बल्कि हिन्दू परम्पराओं और देवी-देवताओं पर रचे लोक गीतों का गायन भी करते हैं। हमारे एक पाठक डॉ. खेम सिंह ने लंगा कलाकारों द्वारा प्रस्तुत किए गए गीत सुनने की इच्छा व्यक्त की थी। उन्हीं की फरमाइश पर आज हम इस समुदाय के चर्चित गायक कोहिनूर लंगा और साथियों द्वारा प्रस्तुत एक मेंहदी गीत सुनवाते हैं। वैवाहिक समारोह के अवसर पर प्रस्तुत किये जाने वाले इस मधुर गीत का आप रसास्वादन कीजिये और आज मुझे यहीं विराम लेने की अनुमति दीजिए।

मेंहदी गीत : ‘मेंहदी रो रंग लागो...’ : स्वर – कोहिनूर लंगा और साथी


आज की पहेली



अभी हमने आपको सातवें दशक के एक फिल्मी गीत का अंश सुनवाया है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं।

१ – यह गीत किस फिल्म से लिया गया है? फिल्म का नाम बताइए।
२ – किस राग पर आधारित है यह गीत? राग का नाम बताइए।

आप अपने उत्तर हमें तत्काल swargoshthi@gmail.com पर भेजें। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के ६१वें अंक में सम्मान के साथ प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। हमसे सीधे सम्पर्क के लिए swargoshthi@gmail.com अथवा admin@radioplaybackindia.com पर भी अपना सन्देश भेज सकते हैं।

आपकी बात

‘स्वरगोष्ठी’ के ५७वें अंक में हमने आपको पण्डित भीमसेन जोशी से की गई बातचीत का एक अंश सुना कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। दोनों प्रश्नों के सही उत्तर है- फिल्म बसन्त बहार और गीतकार शैलेंद्र। दोनों प्रश्न का सही उत्तर राजस्थान के राजेन्द्र सोनकर और इन्दौर की क्षिति तिवारी ने दिया है। हमारे दोनों पाठको को रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर से बधाई। इसी के साथ हमारे साथी और रेडियो प्लेबैक इण्डिया के तकनीकी प्रमुख अमित तिवारी, जालन्धर के करणवीर सिंह, नई दिल्ली से रजनीश पाण्डेय, लखनऊ से जुबेर खाँ, नितिन मिश्रा और बंगलुरु से पंकज मुकेश ने फिल्म बसन्त बहार के गीत में पण्डित भीमसेन जोशी और मन्ना डे की जुगलबन्दी को बेहद पसन्द किया है। कानपुर के अवतार सिंह जी ने लिखा है कि आप संगीत-प्रेमियों की अभिरुचि का ध्यान रखते हुए गीतों और रागों का चयन करते हैं, इससे भारतीय संगीत के श्रोताओं की वृद्धि होगी। आप सभी श्रोताओं-पाठको को अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए आभार।

झरोखा अगले अंक का

फाल्गुन मास का परिवेश मानव को ही नहीं पशु-पक्षियों को भी आह्लादित करता है। इस सप्ताह रस-रंग से परिपूर्ण होली का पर्व उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। मूलतः प्रकृति पर केन्द्रित हमारे भारतीय संगीत की हर विधा- शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, सुगम और लोक संगीत में फाल्गुनी परिवेश और होली पर्व का मनमोहक चित्रण मिलता है। ‘स्वरगोष्ठी’ के आगामी अंक में हम संगीत की विविध विधाओं में होली के इन्द्रधनुषी रंगों में आपके तन-मन को रंग देंगे। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।

कृष्णमोहन मिश्र

Sunday, January 15, 2012

‘बन्ने के नैना जादू बान, मैं वारी जाऊँ...’ : वर-बधू का श्रृंगारपूर्ण चित्रण


मानव जीवन का सबसे महत्त्वपूर्ण संस्कार, विवाह होता है। गृहस्थ जीवन की ओर बढ़ने वाला यह पहला कदम है। मुख्य वैवाहिक समारोह से पूर्व ही अनेक ऐसे प्रसंग होते हैं, जिनके सम्पादन के समय से लोकगीतों का गायन आरम्भ हो जाता है। घर, परिवार और अडोस-पड़ोस की महिलाएँ एकत्र होकर उस अवसर विशेष के गीत गाती हैं। ऐसे गीत वर और कन्या, दोनों पक्षों में गाने की परम्परा है। बन्ना और बन्नी इसी अवसर के श्रृंगार प्रधान गीत है।


SWARGOSHTHI -52 – Sanskar Geet – 4
स्वरगोष्ठी - 52 - संस्कार गीतों में अन्तरंग सम्बन्धों की सोंधी सुगन्ध


स्वरगोष्ठी के एक नये अंक के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र आज की इस सांगीतिक बैठक में एक बार पुनः उपस्थित हूँ। आपको स्मरण ही होगा कि इस स्तम्भ में हम शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, सुगम और लोक-संगीत पर चर्चा करते हैं। गत नवम्बर मास से हमने लोकगीतों के अन्तर्गत आने वाले संस्कार गीतों पर चर्चा आरम्भ की थी। इसी श्रृंखला को आगे बढ़ाते हुए आज हम संक्षेप में यज्ञोपवीत अर्थात जनेऊ संस्कार पर और फिर विवाह संस्कार के गीतों पर चर्चा करेंगे।

मानव जीवन में विवाह संस्कार एक पवित्र समारोह के रूप में आयोजित होता है। इस अवसर के संस्कार गीतों में वर और कन्या, दोनों पक्षों के गीत मिलते हैं। विवाह से पूर्व एक और संस्कार होता है, जिसे यज्ञोपवीत अथवा जनेऊ संस्कार कहा जाता है। वास्तव में यह प्राचीन काल का प्रचलित संस्कार है, जब उच्च शिक्षा के लिए किशोर आयु में माता-पिता का घर छोड़ कर गुरुकुल जाना पड़ता था। रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास ने राजा दशरथ द्वारा अपने चारो पुत्रों को गुरुकुल भेजने से पहले यज्ञोपवीत संस्कार सम्पन्न किये जाने का उल्लेख इन पंक्तियों में किया है-

‘भए कुमार जबहिं सब भ्राता, दीन्ह जनेऊ गुरु पितु माता।
गुरगृह गए पढ़न रघुराई, अलप काल विद्या सब पाई।।’


समय के साथ अब इस संस्कार में केवल औपचारिकता निभाई जाती है। विवाह से ठीक पहले और कहीं-कहीं तो विवाह के साथ ही इस संकार को सम्पन्न कर लिया जाता है। अवधी लोक संगीत के विद्वान राधावल्लभ चतुर्वेदी ने अपने लोकगीत संग्रह- ‘ऊँची अटरिया रंग भरी’ में यज्ञोपवीत संस्कार के कई गीत संग्रहीत किये थे। इन्हीं में से एक गीत अब हम आपको सुनवाते हैं।

संस्कार गीत : यज्ञोपवीत : ‘आवो सखी सब मंगल गाओ...’ स्वर – क्षिति तिवारी और साथी


यज्ञोपवीत संस्कार के इस मधुर गीत के बाद अब हम विवाह संस्कार के गीतों का सिलसिला आरम्भ करते हैं। भारतीय जीवन में विवाह एक ऐसा महत्त्वपूर्ण अवसर होता है जिससे जुड़े लोकगीत हर प्रान्त, हर क्षेत्र और हर भाषा के आज भी प्रयोग किये जाते हैं। शहरों में ही नहीं, ग्रामीण क्षेत्रों में भी इन गीतों प्रचलन कम होता जा रहा है। विवाह के अवसर पर कुछ शास्त्रीय, तो कुछ लोकाचार के प्रसंग सम्पादित होते हैं। विवाह के सभी प्रसंगों के अलग-अलग गीत होते हैं। वर और कन्या, दोनों पक्षों की ओर से इन प्रसंगों पर गीत गाने की परम्परा है। वर और कन्या पक्ष के बड़े-बुजुर्ग जब विवाह तय कर देते हैं, उसी समय से ही मंगल गीतों के स्वरों से दोनों पक्षों के आँगन गूँजने लगते हैं। इन लोकाचारों पर गोस्वामी तुलसीदास की लघु कृति ‘रामलला नहछू’ में श्रीराम के विवाह से पूर्व का उल्लास इन पंक्तियों में चित्रित किया गया है-

दूलह के महतारि देखि मन हरखई हो,
कोटिन्ह दीन्हेऊ दान मेघ जनु बरसई हो।


वर और कन्या के नख-शिख श्रृंगार की प्रक्रिया आरम्भ हो जाती है। वर पक्ष के ऐसे गीतों को ‘बन्ना’ और कन्या पक्ष के गीतों को ‘बन्नी’ कहा जाता है। आइए अब हम आपको एक अवधी ‘बन्ना’ सुनवाते है।

संस्कार गीत : बन्ना : ‘बन्ने के नैना जादू बान मैं वारी जाऊँ...’: स्वर – क्षिति तिवारी और साथी


बन्ना हो या बन्नी, इन गीतों में वर और कन्या का श्रृंगारपूर्ण वर्णन होता है। विवाह का दिन निकट आते ही कन्या पक्ष के आँगन भी ढोलक की थाप से गूँजने लगता है। फिल्मों में भी विवाह गीतों का प्रयोग हुआ है, किन्तु बन्ना या बन्नी का प्रयोग कम हुआ है। १९९५ में प्रदर्शित फिल्म ‘दुश्मन’ में राजस्थान की पृष्ठभूमि में एक बन्नी का प्रयोग हुआ है। इस बन्नी गीत को सपना अवस्थी ने स्वर दिया है। फिल्म के संगीतकार आनन्द-मिलिन्द और गीतकार समीर हैं। अपने समय की फिल्मों में सैकड़ों लोकगीतों की रचना के लिए विख्यात गीतकार अनजान के सुपुत्र समीर हैं। आप यह बन्नी गीत सुनिए और मुझे आज यहीं विराम लेने की अनुमति दीजिये।

बन्नी गीत : फिल्म – दुश्मन : ‘बन्नो तेरी अँखियाँ सुरमेदानी...’ : स्वर – सपना अवस्थी और साथी


अब हम आज के अंक को यहीं विराम देते हैं और आपको इस सुरीली संगोष्ठी में सादर आमंत्रित करते हैं। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सब के बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। अपने ५०वें अंक में हमने पहेली की विजेता के रूप में इन्दौर की श्रीमती क्षिति तिवारी के नाम की घोषणा की थी, उन्होने अपने गाये हुए कुछ लोकगीतों के आडियो और वीडियो भेजे हैं। आज के अंक में हमने पहला और दूसरा संस्कार गीत उन्हीं के भेजे गीतों में से ही चुना है। हम आपके सुझाव, समालोचना, प्रतिक्रिया और फरमाइश की प्रतीक्षा करेंगे और उन्हें पूरा सम्मान देंगे। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा admin@radioplaybackindia.com पर अपना सन्देश भेज कर हमारी गोष्ठी में शामिल हो सकते हैं। आज हम आपसे यहीं विदा लेते हैं, अगले अंक में हमारी-आपकी पुनः सांगीतिक बैठक आयोजित होगी।

झरोखा अगले अंक का

आगामी २३जनवरी को अपने समय के सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ, शिक्षक, लेखक और प्रारम्भिक दौर की फिल्मों के संगीतकार पण्डित शंकरराव व्यास की ११३वीं जयन्ती है। २२जनवरी के अंक में हम उनकी फिल्म के एक बहुचर्चित गीत- ‘वीणा मधुर मधुर कछु बोल...’ के बहाने भारतीय संगीत के एक श्रृंगार रस प्रधान राग पर चर्चा करेंगे। यदि आप गीत के राग का अनुमान लगाने में सफल हो रहे हों तो हमें राग का नाम बताइए। अगले अंक में हम विजेता के रूप में आपका नाम घोषित करेंगे।

कृष्णमोहन मिश्र 

Sunday, December 4, 2011

‘झगड़े नउवा मूँडन की बेरिया...’ समाज के हर वर्ग का सम्मान है, संस्कार गीतों में

आज की कड़ी में बालक के मुंडन संस्कार पर ही हम केन्द्रित रहेंगे। पिछले दो अंकों में हमने जातकर्म अर्थात जन्म संस्कार तक की चर्चा की थी। जन्म और मुंडन के बीच नामकरण, निष्क्रमण और अन्नप्राशन संस्कार होते हैं। इन तीनों संस्कारों के अवसर पर क्रमशः शिशु को एक नया नाम देने, पहली बार शिशु को घर के बाहर ले जाने और छः मास का हो जाने पर शिशु को ठोस आहार देने के प्रसंग उत्सव के रूप में मनाए जाते हैं। मुंडन संस्कार अत्यन्त हर्षपूर्ण वातावरण में मनाया जाता है। बालक के तीन या पाँच वर्ष की आयु में उसके गर्भ के बालों का मुंडन कर दिया जाता है। इससे पूर्व बालक के बालों को काटना निषेध होता है। इस अवसर को चूड़ाकर्म संस्कार भी कहा जाता है।

Sunday, November 20, 2011

‘सिया रानी के जाये दुई ललनवा, विपिन कुटिया में...’ सोहर से होता है नवागन्तुक का स्वागत

सुर संगम- 44 – संस्कार गीतों में अन्तरंग पारिवारिक सम्बन्धों की सोंधी सुगन्ध

संस्कार गीतों की नयी श्रृंखला - पहला भाग

‘सुर संगम’ स्तम्भ के एक नये अंक के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र एक बार पुनः उपस्थित हूँ। पिछले अंकों में आपने शास्त्रीय गायन और वादन की प्रस्तुतियों का रसास्वादन किया था, आज बारी है, लोक संगीत की। आज के अंक से हम आरम्भ कर रहे हैं, लोकगीतों के अन्तर्गत आने वाले संस्कार गीतों का सिलसिला।

किसी देश के लोकगीत उस देश के जनमानस के हृदय की अभिव्यक्ति होते हैं। वे उनकी हार्दिक भावनाओं के सच्चे प्रतीक हैं। प्रकृतिक परिवेश में रहने वाला मानव अपने आसपास के वातावरण और संवेदनाओं से जुड़ता है तो नैसर्गिक रूप से उनकी अभिव्यक्ति के लिए एकमात्र साधन है, लोकगीत अथवा ग्राम्यगीत। भारतीय उपमहाद्वीप के निवासियों का जीवन आदिकाल से ही संगीतमय रहा है। वैदिक ऋचाओं को भी तीन स्वरों में गान की प्राचीन परम्परा चली आ रही है। भारतीय परम्परा के अनुसार प्रचलित लोकगीतों को हम चार वर्गों में बाँटते हैं। प्रत्येक उत्सव, पर्व और त्योहारों पर गाये जाने वाले गीतों को हम ‘मंगल गीत’ की श्रेणी में, तथा घरेलू और कृषि कार्यों के दौरान श्रम को भुलाने के लिए गाने वाले गीतों को ‘श्रम गीत’ के नाम से पुकारा जाता है। तीसरी श्रेणी के गीतों को ‘ऋतु गीत’ कहा जाता है, जिसके अन्तर्गत चैती, कजरी, सावनी आदि का गायन होता है। लोकगीतों की चौथी श्रेणी है- ‘संस्कार गीत’ की, जिसका गायन मानव जीवन से जुड़े १६ संस्कार के अवसरों पर किया जाता है।

आज से हम ‘सुर संगम’ के आगामी अंकों में संस्कार गीतों पर आपसे चर्चा करेंगे। भारतीय समाज में व्यक्ति के जन्म से लेकर मृत्यु तक के जीवन को १६ संस्कारों में बाँटा जाता है। भारत के गैर हिन्दू समुदाय में भी इन अवसरों पर थोड़े नाम परिवर्तन और भिन्न रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है। १६ संस्कारों में से आज हम ‘जातकर्म संस्कार’ अर्थात पुत्र-जन्म के अवसर पर मनाए जाने वाले उत्सव और इस अवसर पर गाये जाने वाले गीतों की चर्चा करेंगे। इस विधा के गीतों में सन्तान के जन्म का उल्लास होता है, नवगन्तुक शिशु के प्रति मंगल-कामनाएँ प्रकट की जाती है और शिशु की माता को बधाई दी जाती है। शिशु जन्मोत्सव के गीतों का चलन देश के हर प्रान्त और हर क्षेत्र में है। भाषा में आंचलिक परिवर्तन के होते हुए भी गीतों का मूलभाव सर्वत्र एक ही रहता है। समूचे उत्तर भारत में इस प्रकार के गीत को ‘सोहर’ के नाम से जाना जाता है। सोहर-गायन की कई धुने प्रचलित हैं। एक सर्वाधिक लोकप्रिय धुन में बँधे सोहर से हम आज शुरुआत करते हैं। जाने-माने शास्त्रीय गायक पण्डित छन्नूलाल मिश्र इस पारम्परिक सोहर में प्रयुक्त स्वरों के माध्यम से सामवेद की ऋचाओं के स्वरों की व्याख्या और तुलना कर रहे हैं। लीजिए पहले आप सुनिए यह सोहर-

भोजपुरी सोहर : ‘मोरे पिछवरवा चन्दन गाछ....’ : स्वर – पण्डित छन्नूलाल मिश्र


‘जातकर्म संस्कार’ पुत्र-जन्म के अवसर पर मनाया जाता है। परन्तु १६ संस्कारों की सूची में यह चौथे क्रमांक पर है। जातकर्म से पूर्व के तीन संस्कार और मनाए जाते हैं, जिन्हें गर्भाधान, पुंसवन और सीमान्त संस्कार कहते हैं। इन अवसरों पर प्रस्तुत किए जाने वाले गीतों में गर्भस्थ शिशु और माँ के स्वास्थ्य की कामना की जाती है। अवध क्षेत्र में इन गीतों को ‘सरिया’ कहा जाता है। सरिया गीतों में प्रायः ननद-भाभी के बीच रोचक और कटाक्षपूर्ण वार्तालाप भी उपस्थित रहता है। सोहर गीतों के वर्ण्य विषयों में पर्याप्त विविधता होती है। इन गीतों में कहीं सास और ननद पर कटाक्ष होता है तो ससुर से धन-धान्य का मुक्त-हस्त दान का अनुरोध होता है। नवजात शिशु के स्वस्थ रहने, बुद्धिमान बनने और भावी जीवन में सफलता पाने की कामना भी इन गीतों में की जाती है। ब्रज, बुन्देलखण्ड, अवध और भोजपुर क्षेत्र के सोहर गीतों में राम और कृष्ण के जन्म के प्रसंग सहज और सरल लौकिक रूप में चित्रण अनिवार्य रूप से मिलता है। कुछ सोहर गीतों में बाल्मीकि आश्रम में सीता के पुत्रों- लव और कुश के जन्म का प्रसंग भी वर्णित होता है। आइए, अब हम आपको एक ऐसा ही सोहर सुनवाते हैं, जिसमे लव-कुश के जन्म का प्रसंग है। यह सोहर गीत पारम्परिक नहीं है। इसकी रचना और गायन लखनऊ के भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय की सेवानिवृत्त प्रोफेसर तथा शास्त्रीय, उपशास्त्रीय और लोक संगीत की विदुषी कमला श्रीवास्तव ने किया है। आइए सुनते हैं, यह मनमोहक अवधी सोहर गीत-

अवधी सोहर : ‘सिया रानी के जाये दुई ललनवाँ...’ : स्वर – विदुषी कमला श्रीवास्तव


सोहर गीतों का वर्ण्य विषय कुछ भी हो, कोई भी भाषा हो अथवा किसी भी क्षेत्र की हो, नवजात शिशु के स्वागत और उसके भावी सुखमय जीवन की कामना तथा उल्लास का भाव हर गीत में मौजूद होता है। एक भोजपुरी सोहर की एक पंक्ति है- ‘सासु लुटावेली रुपैया, त ननदी मोहरवा रे....’, जिसका भाव यह है कि शिशु के आगमन से हर्षित सास रूपये का और ननद सोने की मोहरों का दान करतीं हैं। सोहर का ही एक प्रकार होता है- ‘मनरजना’, जिसे प्रसव से ठीक पहले गाया जाता है। नाम से ही सहज अनुमान हो जाता है इन गीतों का उद्देश्य परिवार के सदस्यों का मनोरंजन करना होता है। मनरजना गीतों का एक उद्देश्य यह भी होता है कि गर्भवती के कष्ट को कम किया जा सके। ऐसी ही एक अवधी मनरजना गीत की एक पंक्ति देखें- ‘ननदी जो तोरे हुईहैं भतीजवा, तोहे देहों गले की तिलरी...’। इस गीत में वर्णित ‘तिलरी’ का अर्थ है, तीन लड़ियों वाला गले का आभूषण। अब हम आपको अवध क्षेत्र का एक लोकप्रिय सोहर गीत सुनवाते हैं, जिसके बारे में कहा जाता है कि इस सोहर की रचना गोस्वामी तुलसीदास ने किया था। इस सोहर गीत को स्वर दिया है, सुपरिचित गायिका इन्दिरा श्रीवास्तव ने।

अवधी सोहर : ‘चैतहि के तिथि नौमी त नौबत बाजै हो...’ : स्वर – विदुषी इन्दिरा श्रीवास्तव


और अब बारी है इस कड़ी की पहेली की जिसका आपको देना होगा उत्तर तीन दिनों के अन्दर इसी प्रस्तुति की टिप्पणी में। प्रत्येक सही उत्तर के आपको मिलेंगे ५ अंक। 'सुर-संगम' की ५०-वीं कड़ी तक जिस श्रोता-पाठक के हो जायेंगे सब से अधिक अंक, उन्हें मिलेगा एक ख़ास सम्मान हमारी ओर से।

सुर संगम 45 की पहेली : एक भोजपुरी फिल्म में सोहर गीत शामिल किया गया था। इस ऑडियो क्लिप को सुन कर गीत की गायिका को पहचानिए। गायिका के नाम की सही पहचान करने पर आपको मिलेंगे 5 अंक।


पिछ्ली पहेली का परिणाम : सुर संगम के 44 वें अंक में पूछे गए प्रश्न का सही उत्तर है- सोहर, और पहेली का सही उत्तर दिया है- क्षिति जी ने, जिन्हें मिलते हैं 5 अंक, बधाई।

अब समय आ चला है आज के 'सुर-संगम' के अंक को यहीं पर विराम देने का। परन्तु सोहर गीतों पर यह चर्चा हम ‘सुर संगम’ के अगले अंक में भी जारी रखेंगे। अगले रविवार को हम पुनः उपस्थित होंगे। आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आई होगी। हमें बताइये कि किस प्रकार हम इस स्तम्भ को और रोचक बना सकते हैं। आप अपने विचार और सुझाव हमें लिख भेजिए oig@hindyugm.com के ई-मेल पते पर। शाम ६-३० बजे 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल में पधारना न भूलिएगा, नमस्कार!



आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

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