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Saturday, December 19, 2015

"आज फिर जीने की तमन्ना है..." - क्यों शुरू-शुरू में पसन्द नहीं आया था देव आनन्द को यह गीत


एक गीत सौ कहानियाँ - 72
 

'आज फिर जीने की तमन्ना है...' 


 रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 72-वीं कड़ी में आज जानिए 1964 की फ़िल्म ’गाइड’ के गीत "आज फिर जीने की तमन्ना है..." के बारे में जिसे लता मंगेशकर ने गाया था। बोल शैलेन्द्र के और संगीत सचिन देव बर्मन का। 


हर फ़िल्मी गीत का निश्चित स्वरूप होता है, पहले मुखड़े से पहले का प्रस्तावना या कुछ शब्द, फिर मुखड़ा, फिर अन्तराल संगीत, फिर अन्तरा। शुरू से लेकर अब तक अधिकांश फ़िल्मी गीत इसी स्वरूप को मानते चले आए हैं। फिर भी कभी कभार कुछ गीतकारों और संगीतकारों ने नए प्रयोग किए और इस स्वरूप से हट कर गीत बनाए। उदाहरण के तौर पर फ़िल्म ’हमराज़’ का गीत "नीले गगन के तले, धरती का प्यार पले" इस स्वरूप को नहीं मानता। इस गीत में कोई अन्तरा नहीं है, बल्कि हर अन्तरा मुखड़े की धुन पर ही आधारित है। इसी तरह से एक गीत ऐसा भी है जो शुरू होता है अन्तरे से और मुखड़ा अन्तरे के बाद आता है। सचिन देव बर्मन की धुन पर शैलेन्द्र का लिखा हुआ यह गीत है फ़िल्म ’गाइड’ का - "आज फिर जीने की तमन्ना है, आज फिर मरने का इरादा है" जो शुरू होता है "काँटों से खींच के यह आँचल" जो अन्तरा है। पिता के इस नवीन प्रयोग को पुत्र पंचम ने भी एक बार अपने एक गीत में प्रयोग किया। फ़िल्म ’बेताब’ का वह गीत था "तेरी तसवीर मिल गई" जो शुरू होता है "यह मेरी ज़िन्दगी बेजान लाश थी" से। ख़ैर, आज हम चर्चा करेंगे "आज फिर जीने की तमन्ना है" का। अपने ज़माने का सुपर-डुपर हिट गीत और आज तक आए दिन रेडियो पर सुनने को मिल जाता है। गीत के 50 वर्ष बाद भी यह उतना ही लोकप्रिय है। और यही नहीं आमिर ख़ान की अगली फ़िल्म का शीर्षक भी ’आज फिर जीने की तमन्ना है’ होने जा रहा है, ऐसी ख़बर मीडिया में आई है। इसी अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि इस जुमले में कितनी शक्ति है! लेकिन जब यह गीत बना था तब देव आनन्द को यह गीत बिल्कुल बकवास लगा था।

"आज फिर जीने की तमन्ना है" गीत फ़िल्म की कहानी के हिसाब से भी बेहद ज़रूरी और सार्थक था क्योंकि इसी गीत से परिवर्तन होता है फ़िल्म की हीरोइन रोज़ी के चरित्र का। यही गाना बताता है कि अब रोज़ी अपने पति के चंगुल से आज़ाद है और निकल पड़ी है एक नए सफ़र पर, ज़िन्दगी की एक नई शुरुआत के लिए। जब यह फ़िल्म रिलीज़ हुई थी, तब सबसे पहले यही गाना लोगों के ज़बान पर चढ़ गया था। मगर यही लोकप्रिय गाना देव आनन्द के गले नहीं उतर रहा था। वो इस गाने को शूट करना तो दूर, वो इसे दूसरे किसी म्युज़िक डिरेक्टर से दोबारा बनवाना चाहते थे। इतना ना-पसन्द था उन्हें यह गाना। वहीदा रहमान ने अपनी किताब में इस घटना का ज़िक्र किया है कि एक दिन शूटिंग के वक़्त जब इस गाने को शूट करने की बारी आई तो देव आनन्द साहब बहुत अपसेट थे। उन्होंने फ़िल्म के निर्देशक विजय आनन्द, जो उनके भाई थे, से कहा कि "ये बर्मन दादा को क्या हो गया है, ऐसा गाना बना दिया है, मज़ा नहीं आ रहा है। I just can't take it. मुझे दादा से बात करनी पड़ेगी कि गाने में बिल्कुल मज़ा नहीं आ रहा है, किसी और कम्पोज़र से गाना बनवानी पड़ेगी।" देव साहब की यह बात सुन कर गोल्डी को अजीब लगा। पूरी युनिट ने भी यह बात सुनी, सब ने कहा कि "आपको यह गाना बुरा लगा है, कम से कम एक बार यह गाना हमको तो सुनवा दें। शूटिंग् तो उसी दिन करनी है हमको।" देव आनन्द ने बड़े अनमने मन से कहा कि अच्छा नागरे के उपर लगा दो, और सुनो। नागरा एक स्पूल वाली मशीन हुआ करती थी उस ज़माने में, जिस पर गाना लगा देते थे। गाना लगाया गया, गाना सबने सुना, और सब उछल पड़े गाने के बाद। लता जी की बेहतरीन आवाज़, एस. डी. बर्मन का बेहतरीन संगीत, शैलेन्द्र का बेहतरीन गीत, सबको बहुत अच्छा लगा, आपको पसन्द क्यों नहीं आ रहा है? लेकिन देव साहब के उपर कोई असर ही नहीं हुआ। अब सबने सोचा कि शूटिंग् का टाइम आ रहा है, कैसे देव साहब को मनायें? तब भाई विजय आनन्द के दिमाग़ में एक विचार आया। उन्होंने भाई से कहा, "हम सब आपकी जज़्बात की इज़्ज़त करते हैं कि आपको गाना पसन्द नहीं आ रहा है, मगर फिर भी एक हमारी अनुरोध है कि गाना शूट कर लेते हैं, शूट करने के बाद जब आप देखेंगे कि गाना पसन्द नहीं आ रहा है, तो निकाल देंगे।" देव आनन्द मान गए। और इस गीत को राजस्थान के अलग अलग स्थानों पे पाँच दिनों में शूट किया गया। इसी शूटिंग् के दौरान एक बहुत अहम बात हो गई जिसने देव आनन्द के फ़ैसले को बदल दिया। हर दिन शूट के बाद फ़िल्म के कर्मी दल के सदस्य जब होटल लौटते तो सभी की ज़बान पर यही गाना होता था। जहाँ देखो जिसे देखो हर कोई यही गाना गुनगुनाता हुआ नज़र आता था। लोगों की ज़ुबान पर गाना चढ़ गया। तब देव साहब को यह एहसास हुआ कि उनका फ़ैसला हो सकता है कि ग़लत हो। पाँचवे दिन जब वो सेट पे पहुँचे, तो उन्होंने पूरे कर्मी दल से कहा कि "Sorry, I made a mistake, सचमुच यह गाना बहुत अच्छा है और अब यही गाना इस फ़िल्म का हिस्सा भी बनेगा। मैं रखूँगा इस गाने को।" और उसके बाद फिर क्या हुआ, इतिहास गवाह है। 

फिल्म - गाइड : 'काँटों से खींच कर ये आँचल....' : लता मंगेशकर




अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




Saturday, April 27, 2013

‘बूझ मेरा क्या नाम रे...’ भाग 2


पार्श्वगायिका शमशाद बेगम को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की श्रद्धांजलि

‘ना बोल पी पी मोरे अँगना पंछी जा रे जा...'


फिल्म संगीत के सुनहरे दौर की गायिकाओं में शमशाद बेगम का 23 अप्रैल को 94 वर्ष की आयु में निधन हो गया। खनकती आवाज़ की धनी इस गायिका ने 1941 की फिल्म खजांची से हिन्दी फिल्मों के पार्श्वगायन क्षेत्र में अपनी आमद दर्ज कराई थी। आत्मप्रचार से कोसों दूर रहने वाली इस गायिका को श्रद्धांजलि-स्वरूप हम अपने अभिलेखागार से अगस्त 2011 में अपने साथी सुजॉय चटर्जी द्वारा प्रस्तुत दस कड़ियों की लघु श्रृंखला 'बूझ मेरा क्या नाम रे…' के सम्पादित अंश का दूसरा भाग प्रस्तुत कर रहे हैं।

मशाद बेगम के गाये गीतों पर आधारित 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की लघु श्रृंखला 'बूझ मेरा क्या नाव रे' की तीसरी कड़ी में सुजॉय चटर्जी का नमस्कार। कुछ वर्ष पहले वरिष्ठ उद्‍घोषक कमल शर्मा के नेतृत्व में विविध भारती की टीम पहुँची थी शमशाद जी के पवई के घर में, और उनसे लम्बी बातचीत की थी। उसी बातचीत का पहला अंश पिछली कड़ी में हमनें पेश किया था, आइए आज उसी से आगे की बातचीत के कुछ और अंश पढ़ें।

शमशाद जी : मैंने मास्टर जी (गुलाम हैदर) से पूछा कि क्या दूसरा गाना गाउँ? इस पर उन्होने कहा कि नहीं, इतना ठीक है। फिर १२ गानों का ऐग्रीमेण्ट हो गया, हर गाने के लिए 12 रुपये। मास्टरजी नें उन लोगों से कहा कि इस लड़की को वो सब फ़ैसिलिटीज़ दो जो सब बड़े आर्टिस्टों को देते हो। उस ज़माने में 6 महीनों का कांट्रैक्ट हुआ करता था। 6 महीने बाद फिर रेकॉर्डिंग् वाले आ जाते थे। सुबह 10 से शाम 5 बजे तक हम रिहर्सल किया करते, म्युज़िशियन्स के साथ। मास्टरजी भी रहते थे। आप हैरान होंगे कि उन्हीं के गाने गा-गा कर मैं आर्टिस्ट बनी हूँ।

कमलजी : आप में भी लगन रही होगी?

शमशाद जी : मास्टर गुलाम हैदर साहब कहा करते थे कि इस लड़की में गट्स है, आवाज़ भी प्यारी है। शुरु में हर गीत के लिए 12 रूपए देते थे। पूरा सेशन ख़त्म होने पर मुझे पाँच हजार रूपए मिले। जब रब मेहरबान तो सब मेहरबान... (यहाँ शमशाद जी भावुक हो जाती हैं और रो पड़ती हैं) ...जब अच्छा काम करने के बाद रिजल्ट निकलता है तो फिर क्या कहने।

कमल जी : आप फिर रेडियो से भी जुड़ गईं, इस बारे में कुछ बताएँ।

शमशाद जी : जब मैंने गाना शुरू किया था रेडियो नहीं था, सिर्फ ग्रामोफोन कम्पनियाँ थीं, और बहुत मंहगा भी था। 100 रूपए कीमत थी ग्रामोफ़ोन की और एक रेकॉर्ड की कीमत ढाई रुपए होती थी। दो साल बाद जब हम तैयार हो गए, तब रब ने रेडियो खोल दिया और मैं पेशावर रेडियो में शामिल हो गई।

कमल जी : रेडियो में किसी प्रोड्यूसर को आप जानती थीं, आपको मौका कैसे मिला?

शमशाद जी : उस वक्त प्रोड्यूसर नहीं, स्टेशन डिरेक्टर होते थे, उनके लिए गाने वाले कहाँ से आयेंगे? तो इसके लिए वो ग्रामोफ़ोन कम्पनी वालों से पूछते थे, गायकों के बारे में। जिएनोफ़ोन कम्पनी से भी उन्होंने पूछा और इस तरह से मेरा नाम उन्हें मिल गया। मैंने पेशावर रेडियो से शुरुआत की, पश्तो, परशियन, हिन्दी, उर्दू और पंजाबी प्रोग्राम करने लगी। फिर लाहौर और दिल्ली रेडियो से भी जुड़ी।

दोस्तों, जुड़े हुए तो हम हैं पिछले 6 दशकों से शमशाद बेगम के गाये हुए गीतों के साथ। उनकी आवाज़ में जो आकर्षण है, रौनक है, जो चंचलता है, जो शोख़ी है, उसके जादू से कोई भी नहीं बच सकता। तीन दशकों में उनकी खनकती आवाज़ ने सुनने वालों पर जो असर किया था, वह असर आज भी बरकरार है। आइए आज की कड़ी में भी एक और असरदार गीत सुनते हैं 1949 की फ़िल्म 'दुलारी' से। ग़ुलाम हैदर और राम गांगुली के बाद, आज बारी है संगीतकार नौशाद साहब की। जैसा कि पहली कड़ी में हमनें ज़िक्र किया था कि नौशाद साहब के मुताबिक़ शमशाद जी की आवाज़ में पंजाब के पाँच दरियाओं की रवानी है। आइए शक़ील बदायूनी के लिखे इस गीत को सुनते हुए नौशाद साहब के इसी बात को महसूस करने की कोशिश करते हैं। नौशाद साहब को याद करते हुए शमशाद जी नें अपनी 'जयमाला' में कहा था, "संगीतकार नौशाद साहब के साथ मैंने कुछ 16-17 फिल्मों में गाये है, जैसे- 'शाहजहाँ', 'दर्द', 'दुलारी', 'मदर इण्डिया', 'मुग़ल-ए-आज़म', 'दीदार', 'अनमोल घड़ी', 'आन', 'बैजू बावरा', वगैरह। मेरे पास उनके ख़ूबसूरत गीतों का ख़ज़ाना है। लोग आज भी उनके संगीत के शैदाई हैं। मेरे स्टेज शोज़ में भी लोग ज़्यादातर उनके गीतों की ही फ़रमाइश करते हैं"। लीजिए, नौशाद साहब और शमशाद जी, इन दोनों को समर्पित, फिल्म ‘दुलारी’ का यह गीत सुनते हैं।


फिल्म दुलारी : ‘ना बोल पी पी मोरे अँगना पंछी जा रे जा...' : संगीत – नौशाद


‘शरमाए काहे, घबराए काहे, सुन मेरे राजा...’

दोस्तों, आजकल फ़िल्मों में आइटम नम्बर का बड़ा चलन हो गया है। शायद ही कोई ऐसी फ़िल्म बनती हो जिसमें इस तरह का गीत न हो। लेकिन यह परम्परा आज की नहीं है, बल्कि पचास के दशक से ही चली आ रही है। आज जिस तरह से कुछ विशेष गायिकाओं से आइटम साँग गवाये जाते हैं, उस ज़माने में भी वही हाल था। उन दिनों इस जौनर में शीर्ष स्थान शमशाद बेग़म का था। बहुत सी फ़िल्में ऐसी बनीं, जिनमें मुख्य नायिका का पार्श्वगायन किसी और गायिका नें किया, जबकि शमशाद बेगम से कोई ख़ास आइटम गीत गवाया गया। आज की कड़ी में आप सुनेंगे दादा सचिनदेव बर्मन की धुन पर शमशाद जी की मज़ाहिया आवाज़ और अंदाज़। ऐसा अनुभव होता है कि उस जमाने में किशोर कुमार जिस तरह की कॉमेडी अपने गीतों में करते थे, गायिकाओं में, और इस शैली में उन्हें टक्कर देने के लिए केवल एक ही नाम था, और वह था शमशाद बेगम का। 1951 में 'नवकेतन' की फ़िल्म आई थी 'बाज़ी', जिसमें मुख्य गायिका के रूप में गीता रॉय नें अपनी आवाज़ दीं और एक से एक लाजवाब गीत फ़िल्म को मिले, जिनमें शामिल हैं- “सुनो गजर क्या गाये...”, "तदबीर से बिगड़ी हुई तक़दीर बना ले...”, "देख के अकेली मोहे बरखा सताये", "ये कौन आया" और "आज की रात पिया दिल ना तोड़ो...”। इन कामयाब और चर्चित गीतों के साथ फिल्म में एक गीत शमशाद बेगम का भी था, जिसनें भी ख़ूब मकबूलियत हासिल की उस ज़माने में। वह गीत है, "शरमाये काहे, घबराये काहे, सुन मेरे राजा, ओ राजा, आजा आजा...”। इस गीत में उन्होंने न केवल अपनी गायकी का लोहा मनवाया, बल्कि अजीब-ओ-गरीब हरकतों और तरह-तरह की आवाज़ें निकालकर कॉमेडी का वह नमूना पेश किया जो उससे पहले किसी गायिका नें शायद ही की होगी। और इसी वजह से आज की कड़ी के लिए हमने इस गीत को चुना है। साहिर लुधियानवी का लिखा हुआ यह गीत है।

दोस्तों, आज के प्रस्तुत गीत में शमशाद जी भले ही हमे ना घबराने और ना शरमाने की सीख दे रही हैं, लेकिन हक़ीक़त यह भी है कि वो ख़ुद मीडिया से दूर भागती रहीं, पब्लिक फ़ंक्शन्स में वो नहीं जातीं, और यहाँ तक कि अपना पहला स्टेज शो भी पचास वर्ष की आयु होने के बाद ही उन्होंने दिया था। शमशाद जी तो सामने नहीं आतीं, लेकिन उनके गाये गीतों के रीमिक्स आज भी बाज़ार में छाये हैं। कैसा लगता है उनको? इस सवाल पर वो कहती हैं- "मुझे रीमिक्स से कोई शिकायत नहीं है। आज शोर-शराबे का ज़माना है, रिदम का ज़माना है, बच्चे लोग ऐसे गाने सुन कर ख़ुश होते हैं, झूमते हैं। मुझे भी अच्छा लगता है, पर कोई इन गीतों में हमारा नाम भी तो ले। लोग जब तक मुझे याद करते हैं, जब तक मेरे गाने बजाए जाते हैं, मैं ज़िन्दा हूँ”। शमशाद जी के गाये गीत हमेशा ज़िन्दा रहेंगे इसमें कोई शक़ नहीं है। तीन दशकों तक उन्होंने फिल्म संगीत जगत पर राज किया है। उनकी आवाज़ की खासियत ही यह है कि उनकी आवाज़ की ख़ुद की अलग पहचान है, खनक है, जो किसी अन्य गायिका से नहीं मिलती, और इसलिए उनकी प्रतियोगिता भी अपने आप से ही रही है। शमशाद जी के गाये ज़्यदातर गानें चर्चित हुए। मास्टर ग़ुलाम हैदर, नौशाद, ओ.पी. नैयर, सी. रामचन्द्र जैसे संगीतकारों ने उनकी आवाज़ को नई दिशा दी, और साज़ और आवाज़ के इस सुरीले संगम से उत्पन्न हुआ एक से एक कामयाब, सदाबहार गीत। आइए आज का सदाबहार गीत सुना जाये, लेकिन संगीतकार हैं, दादा बर्मन और फिल्म है, ‘बाज़ी’।


फिल्म बाज़ी : ‘शरमाए काहे, घबराए काहे, सुन मेरे राजा...’ : संगीत – सचिनदेव बर्मन


अगले अंक में जारी...

आपको हमारा यह विशेष श्रद्धांजलि अंक कैसा लगा, हमें अवश्य लिखिए। इस श्रृंखला का अगला अंक हम गुरुवार, 2 मई को प्रकाशित करेंगे। हमें आपके सुझावों और विचारों की प्रतीक्षा रहेगी। आप हमें radioplaybackindia@live.com पर अपना सन्देश भेज सकते हैं।

शोध व आलेख : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

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