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Tuesday, February 8, 2011

पिया न रहे मन-बसिया..रंगरेज से दर्द-ए-दिल बयां कर रहे हैं "तनु वेड्स मनु" के संगीतकार कृष्णा ,गीतकार राजशेखर

Taaza Sur Taal (TST) - 05/2011 - TANU WEDS MANU

"तनु वेड्स मनु".. यह नाम सुनकर आपके मन में कोई भी उत्सुकता उतरती नहीं होगी, इसका मुझे पक्का यकीन है। मेरा भी यही हाल था। एक बेनाम-सी फिल्म, अजीबो-गरीब नाम और अजीबो-गरीब जोड़ी मुख्य-पात्रों की। "माधवन" और "कंगना".. मैं अपने सपने में भी इस जोड़ी की कल्पना नहीं कर सकता था..। लेकिन एक दिन अचानक इस फिल्म की कुछ झलकियाँ यू-ट्युब पर देखने को मिलीं. हल्की-सी उत्सुकता जागी और जैसे-जैसे दृश्य बढते गए, मैं इस "बेढब"-सी अजबनी दुनिया से जुड़ता चला गया। झलकियाँ का ओझल होना था और मैं यह जान चुका था कि यह फिल्म बिन देखे हीं नकार देने लायक नहीं है। कुछ तो अलग है इसमें और इन्हीं दृश्यों के बीच जब "कदी साडी गली पुल (भुल) के भी आया करो" के बीट्स ढोलक पर कूदने लगे तो जैसे मेरे कानों ने पायल बाँध लिये और ये दो नटखट उचकने लगे अपनी-अपनी जगहों पर। फिर तो मुझे समझ आ चुका था कि ऐंड़ी पर खड़े होकर मुझे इस फिल्म के गानों की बाट जोहनी होगी। फिर भी मन में एक संशय तो ज़रूर था कि "कदी साडी गली".. ये गाना तो पुराना है और जब एक पुराने गाने के सहारे फिल्म का प्रचार-प्रसार किया जा रहा है तो मुमकिन है कि "ओरिजनल गानों" में कोई दम न हो। लेकिन मैं दुआ कर रहा था कि मेरा शक़ गलत निकले और मेरी दुआ बहुत हद तक कामयाब हुई, इसकी मुझे बेहद खुशी है।

लेम्बर हुसैनपुरी के गाए "कदी साडी गली" में अजब का नशा है। ढोल के बजते हीं पाँव खुद-ब-खुद थिरकने लगते हैं। फिल्म में आने से पहले यह गाना जिस मुकाम पर था, आर०डी०बी० ने रीमिक्स करके उस मुकाम को कुछ और ऊपर कर दिया है। पंजाबी भांगड़ों की तो वैसे हीं धूम और धुन गजब की होती है, लेकिन कई मर्तबा एक तरह के हीं बीट्स इस्तेमाल होने के कारण मज़ा जाता रहता है। अच्छी बात यह है कि इस गाने में नयापन है। बस यही उम्मीद करता हूँ कि यह गाना फिल्म के कथानक को आगे बढाने में मदद करेगा और ठूंसा हुआ-सा नहीं दिखेगा।

फिल्म का पहला गाना हीं आर०डी०बी० का? लेकिन आर०डी०बी० तो बस एक हिप-हॉप या डांस-मस्ती गाने के लिए फिल्म में लाए जाते हैं यानि कि हर फिल्म में इनका बस एक हीं गाना होता है। "तब तो कोई न कोई दूसरा संगीतकार हीं इस फिल्म की नैया को अपने गानों के पतवार और चप्पु के सहारे पार लगाएगा और अगर गाने अच्छे करने हैं तो निर्देशक(आनंद एल राय) कोई जाने-माने संगीतकार को हीं यह बागडोर सौपेंगे ताकि बुरे गानों के कारण फिल्म की लुटिया न डूब जाए..." यही सोच रहे हैं ना आप? अमूमन हर किसी की यही सोच होती है। कोई भी नए संगीतकारों पर एकबारगी भरोसा नहीं कर पाता.. और अगर कोई फिल्म किसी निर्देशक की पहली फिल्म हो तब तो हर एक सुलझे इंसान की यही सलाह होती है कि भाई फिल्म में लगा पैसा निकालना हो तो रिस्क मत लो, सेफ़ खेलो और किसी नामी संगीतकार से गाने तैयार करवा लो ताकि फिल्म भले पिट जाए लेकिन गाने हिट हो जाएँ।

यहीं पर आपसे चूक हो गई। हाँ, लेकिन आनंद साहब ने कोई चूक नहीं की। इन्होंने न सिर्फ़ खुद कुछ नया करने का बीड़ा उठाया, बल्कि अपने साथ-साथ गीत और संगीत में भी नए मोहरे सजाकर पूरी की पूरी बाजी हीं रोमांचक कर दी। नया गीतकार, नया संगीतकार.. चलेंगे तो सब साथ, ढलेंगे तो सब साथ, लेकिन इस बात की तो खुशी होगी कि "फिल्म इंडस्ट्री" के दबाव के आगे झुकना नहीं पड़ा, जो दिल में आया वही किया। तो आईये हम सब स्वागत करते हैं संगीतकार "कृष्णा" (Krsna) एवं गीतकार "राजशेखर" का।

ये कृष्णा कौन हैं, ये राजशेखर पहले किधर थे, इन प्रश्नों का जवाब तो हम ढूँढ नहीं पाये, लेकिन इतना यकीन है कि इन दोनों की यह पहली हिन्दी-फिल्म है। और पहली हीं फिल्म में दोनों ने अपनी छाप छोड़ने की पूरी कोशिश की है।

चलिए तो इस जोड़ी के पहले गीत की बात करते हैं। "ओ रंगरेज मेरे"... इस गीत के बोल बड़े हीं खूबसूरत है। उर्दू और देसी शब्दों के इस्तेमाल से राजशेखर ने एक सूफ़ियाना माहौल तैयार किया है।

रंगरेज तूने अफ़ीम क्या है खा ली,
जो मुझसे तू है पूछे कि कौन-सा रंग?
रंगों का कारोबार है तेरा,
ये तू हीं तो जाने कि कौन-सा रंग?
मेरा बालम रंग, मेरा साजन रंग,
मेरा कातिक रंग, मेरा अगहन रंग,
मेरा फ़ागुन रंग, मेरा सावन रंग..

हद रंग दे, अनहद भी रंग दे,
मंदिर, मस्जिद, मयकद रंग..

आजा हर वसलत रंग दे,
जो आ न सके तो फ़ुरक़त रंग दे..

ऐ रंगरेज मेरे...
ये कौन-से पानी में तूने कौन-सा रंग घोला है?


"मेरे आठों पहर मनभावन रंग दे"- रंगरेज से ब़ड़ी हीं मीठी गुहार लगाई है हमारे आशिक़ ने। अब यहाँ पर रंगरेज खुदा है या फिर इश्क़ के पैरहन रंगने वाली प्रेमिका.. इसका खुलासा तो दिल की दराज़ें खोलकर हीं किया जा सकता है, लेकिन जो भी हो सबसे बड़ा रंगरेज तो खुदा हीं है और खुदा से इस तरह जुड़ने को हीं "निर्गुण" कहते हैं (हिन्दी फिल्मों में निर्गुण का सबसे बड़ा उदाहरण "लागा चुनरी में दाग" है)। जब आशिक़ यह कहता है कि "मेरा क़ातिल तू, मेरा मुंसिफ़ तू" तो चचा ग़ालिब का यह शेर याद आ जाता है:

मोहब्बत में नहीं है फ़र्क, जीने और मरने का,
उसी को देखकर जीते हैं, जिस काफ़िर पर दम निकले!


इस रंगरेज के पास "कृष्णा" दो बार गए हैं एक बार अपनी हीं आवाज़ के साथ तो दूसरी बार "वडाली बंधुओं" की मंडली के साथ। यूँ तो वडाली बंधुओं (पुरनचंद वडाली एवं प्यारेलाल वडाली) पर खुदा की मेहर है (इसलिए इनकी आवाज़ों से सजी हुई हरेक नज़्म दिल को सुकून पहुँचाती है और यहाँ भी इन दोनों ने वही समां बाँधा है), लेकिन इस बार कृष्णा पर भी उस ऊपर वाले ने अपनी रहमत तारी कर दी है। दोनों हीं गाने अपनी जगह पर कमाल के बने हैं। धुन एक हीं है, इसलिए ज्यादा कुछ फ़र्क की उम्मीद भी नहीं थी। लेकिन जहाँ पर वडाली बंधु हों, वहाँ नयापन खुद-ब-खुद आ जाता है, इसलिए कृष्णा को यही कोशिश करनी थी कि वे पूरी तरह से कमजोर न पड़ जाएँ... ऐसा नहीं हुआ, यह सबके लिए अच्छी खबर है!

मोहित चौहान! यह नाम लिख देने/सुन लेने के बाद मन में किसी पहाड़ी वादी की परछाईयाँ उभर आती है और दिखने लगता है एक शख्स जो हाथ में गिटार और आँख में प्रेयसी के ख्वाब लिए पत्तों और गुंचों के बीच से चला जा जा रहा है। पहाड़ों का ठेठ अंदाज़ उसकी आवाज़ में खुलकर नज़र आता है और यही कारण है कि हर संगीतकार मोहित चौहान से "प्यार के दो मीठे बोल" गुनगुनाने की दरख्वास्त कर बैठता है। "कितने दफ़े दिल ने कहा, दिल की सुनी कितने दफ़े" (यूँ हीं).. बोल बड़े हीं सीधे और साधारण हैं, लेकिन मोहित की आवाज़ ने इस गाने में जान डाल दी है।

"पिया न रहे मन बसिया" - रूप कुमार राठौड़ साहब को मैने पहले हज़ारों बार सुना है, लेकिन आज तक इनकी आवाज़ इस तरह की पहले कभी नहीं लगी थी, जैसी कि इस गाने में है। इनकी आवाज़ यहाँ पहचान में हीं नहीं आती। मैंने तो कई जगहों पर "शफ़कत अमानत अली" का नाम लिखा पाया था (और मैं मान भी बैठा था) , लेकिन आठ-दस विश्वस्त सूत्रों और ब्लॉगों के चक्कर लगाने के बाद मुझे यकीन करना पड़ा कि ये अपने रूप साहब हीं हैं। अपनी नई आवाज़ में वही पुराना जादू बिखेरने में ये यहाँ भी कामयाब हुए हैं। ज़रा इस गाने के बोलो पर गौर करें:

पल न कटे अब सखी रे पिया बिन,
नीम-सा कड़वा लागे दिन,
हाय! नीम-सा कड़वा लागे अब दिन,
उस पे ये चंदा हाय.. चंदा भी बना सखी सौतन कि
चंदा भी बना हाय.. सखी सौतन कि
कीसो रात मोरी अमावसिया...
मन बसंत को पतझड़ कर वो
ले गयो, ले गयो, ले गयो... रंग-रसिया


पहले फिल्म के लिहाज से राजशेखर ने बेहतरीन पंक्तियाँ गढी हैं। जहाँ इस गाने में "मन-बसिया" और "रंग-रसिया" की बात हो रही है, वहीं अगले गाने "मन्नु भैया" में "करोलबाग की गलियों", "केसर", "यमुना" और "शर्मा जी" जैसे शब्दों का इस्तेमाल करके इन्होंने गाने में चार-चाँद लगा दिए हैं। नाम से हीं ज़ाहिर है कि "मन्नु भैया" की टाँग खींची जा रही है और इस खेल में सबसे आगे हैं "सुनिधि चौहान" और उनका तबले और ढोलक (मज़ाक वाले) पर संगत दे रहे हैं नीलाद्री देबनाथ, उज्जैनी मुखर्जी, राखी चाँद और विवेक नायक

अंबिया, इलायची, दालचीनी और केसर,
सुखाएगी तन्नु करोलबाग की छत पर,
तब मन्नु भैया का करिहैं..

जब दिल्ली के मिक्सर में घुट जावे कानपुर की भंग,
जब दिल्ली के ऊपर चढ जावे कानपुर का रंग,
जब क़ुतुब से भी ऊपर जावे, कानपुर की पतंग,
तब मन्नु भैया का करिहैं..


मुझे तो यह गाना बेहद पसंद आया। इस गाने में जहाँ एक तरफ़ मस्ती है, मज़ाक है, वहीं दूसरी तरफ़ शब्दों और ध्वनियों की अच्छी धमाचौकड़ी भी है। ऐसे गाने अमूमन "पुरूष-स्वर" (मेल-व्याएस) में तैयार किए जाते है, लेकिन यहाँ कृष्णा की दाद देनी होगी जो इन्होंने सुनिधि को ये गाना सौंपा और वाह! सुनिधि ने दिल खुश कर दित्ता यार ;)

फिल्म का अंतिम गाना है मिका की आवाज़ में "जुगनी"। यह गाना दूसरे "जुगनी" गानों की तरह हीं है, इसलिए कुछ अलग-सा नहीं लगा मुझे। हाँ, मिका पा जी की मेहनत झलकती है और इसमें दो राय नहीं है कि इस गाने के लिए इनसे अच्छा कोई दूसरा गायक नहीं हो सकता था, लेकिन संगीत (संगीतकार) ने इनका साथ नहीं दिया। "बीट्स" प्रेडिक्टेबल हैं.. इसलिए मज़ा रह-रहकर किरकिरा हो जाता है। मुझे किसी भी दिन (any day) "ओए लकी लकी ओए" का "जुगनी" इस "जुगनी" से ज्यादा पसंद आएगा। क्या करें! स्वाद-स्वाद की बात है :)

तो इस तरह से "तनु वेड्स मनु" के संगीत ने गुमनाम से नामचीन का सफ़र आखिरकार तय कर हीं लिया (है)।

आज की समीक्षा आपको कैसी लगी, ज़रूर बताईयेगा। चलिए तो इस बातचीत को यहीं विराम देते हैं। अगले हफ़्ते फिर मुलाकात होगी। नमस्कार!

आवाज़ रेटिंग - 7/10

सुनने लायक गीत - रंगरेज, पिया न रहे, मन्नु भैया, साडी गली

एक और बात: इस फिल्म के सारे गाने(प्रिव्यु मात्र) आप कृष्णा के ओफ़िसियल वेबसाईट पर सुन सकते हैं यहाँ:
http://krsnamusic.com/news/tanu-weds-manu-piya-sung-by-roop-kumar-rathod-or-shafqat-amanat-ali/




अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं। "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है। आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रूरत है उन्हें ज़रा खंगालने की। हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं।

Tuesday, October 12, 2010

कैलाश खेर की सूफियाना आवाज़ है "अ फ़्लैट" मे तो वहीं ज़िंदगी से भरे कुछ गीत हैं "लाइफ़ एक्सप्रेस" में

ताज़ा सुर ताल ३९/२०१०


विश्व दीपक - 'ताज़ा सुर ताल' के सभी श्रोताओं व पाठकों को मेरा नमस्कार और सुजॊय जी, आपको भी!

सुजॊय - नमस्कार! विश्व दीपक जी, आज भी हम पिछले हफ़्ते की तरह दो फ़िल्में लेकर हाज़िर हुए हैं। साल के इन अंतिम महीनो में बहुत सी फ़िल्में प्रदर्शित होती हैं, और इसीलिए बहुत से नए फ़िल्मों के गानें इन दिनों जारी हो रहे हैं। ऐसे में ज़रूरी हो गया है कि जहाँ तक सभव हो हम दो दो फ़िल्मों के गानें इकट्ठे सुनवाएँ। आज के लिए जिन दो फ़िल्मों को हमने चुना है, उनमें एक है ख़ौफ़ और मौत के करीब एक कहानी, और दूसरी है ज़िंदगी से लवरेज़। अच्छा विश्व दीपक जी, क्या आप भूत प्रेत पर यकीन रखते हैं?

विश्व दीपक - देखिए, यह एक ऐसा विषय है कि जिस पर घण्टों तक बहस की जा सकती है। बस इतना कह सकता हूँ कि गीता में यही कहा गया है कि आत्मा अजर और अमर है, वह केवल शरीर बदलता रहता है। वैज्ञानिक दृष्टि से इसका क्या एक्स्प्लेनेशन है, यह तो विज्ञान ही बता सकता है।

सुजॊय - चलिए इतन बताइए कि फ़िल्मी आत्माओं के बारे में आपके क्या विचार हैं?

विश्व दीपक - हाँ, यह एक मज़ेदार सवाल आपने पूछा है। एक पुरानी हवेली, धुंद, पूनम का पूरा चाँद, पेड़ों पर सूखी टहनियाँ, सूखे पत्तों की सरसराहट, एक बूढ़ा चौकीदार जिसकी उम्र का अंदाज़ा लगा पाना किसी के बस की बात नहीं, ये सब हॊरर फ़िल्मों की बेसिक ज़रूरतें हैं। फ़िल्मी आत्माएँ रात के ठीक १२ बजे वाक पर निकलती हैं। वैसे आजकल उन्हें बहुत से टी.वी चैनलों पर रोज़ देखा जा सकता है और उन्हें भरपूर काम मिलने लगा है। फ़िल्मी आत्माओं को अपने बालों को बांधना गवारा नहीं होता, उन्हें खुला छोड़ना ही ज़्यादा पसंद है। एक और ख़ास बात यह कि फ़िल्मी आत्माओं को गीत संगीत में ज़बरदस्त रुचि होती है। बड़े ही सुर में गाती हैं, दिन भर घंटों रियाज़ करने के बाद रात १२ बजे ओपन एयर में अपनी गायकी के जल्वे प्रस्तुत करने निकल पड़ती हैं।

सुजॊय - वाह, क्या सही पहचाना है आपने! मैं भी कुछ जोड़ दूँ इसमें? फ़िल्मी और तेलीविज़न आत्माओं का पसंदीदा रंग होता है सफ़ीद। जॊरजेट उनकी पसंदीदा साड़ी है और एक नहीं बहुत सी होती हैं। तभी तो बरसों बरस भटकने के बावजूद हर रोज़ उनकी साड़ी उतनी ही सफ़ेद दिखाई देती है कि जैसे किसी डिटरजेण्ट का ऐड कर रही हों। मोमबत्ती का बड़ा योगदान है इन आत्माओं के जीवन में। आधुनिक रोशनी के सरंजाम उन्हें पसंद ही नहीं है।

विश्व दीपक - सुजॊय, फ़िल्मी आत्माओं की हमने बहुत खिंचाई कर ली, अब इस मज़ाक को विराम देते हुए सीरियस हो जाते हैं और अपने पाठकों को बता देते हैं कि आज की पहली फ़िल्म है 'अ फ़्लैट'। यह लेटेस्ट हॊरर फ़िल्म है अंजुम रिज़्वी की, जिसे निर्देशित किया है हेमन्त मधुकर ने। जिम्मी शेरगिल, संजय सुरी, हज़ेल, कावेरी झा और सचिन खेड़ेकर। बप्पी लाहिड़ी के सुपुत्र बप्पा लाहिड़ी का संगीत है इस फ़िल्म में, और फ़िल्म में गानें लिखे हैं विराग मिश्र ने। तो आइए पहला गाना सुनते हैं कैलाश खेर और सुज़ेन डी'मेलो की आवाज़ों में।

गीत - मीठा सा इश्क़ लगे, कड़वी जुदाई


सुजॊय - "मीठा सा इश्क़ लगे, कड़वी जुदाई, यार मेरा सच्चा लागे, झूठी ख़ुदाई, चांदनी ने तन पे मेरे चादर बिचाई, ओढ़ा जो तूने मुझको सांस लौट आई", विराग मिश्र के ये बोलों में वाक़ई जान है। विराग मिश्र क नाम सुनते ही मुझे यकायक कवि वीरेन्द्र मिश्र की याद आ गई। कहीं ये उनके सुपुत्र तो नहीं! ख़ैर, इन दिनों राहत फ़तेह अली ख़ान की आवाज़ ही ज़्यादा सुनाई दे रही थी, कैलाश खेर कहीं दूर से हो गए थे। बहुत दिनों के बाद इनकी आवाज़ सुन कर अच्चा लगा। कैलाश की आवाज़ में कुछ ऐसी बात है कि सीधे दिल पर असर करती है।

विश्व दीपक - गीत के ओपेनिंग म्युज़िक में सस्पेन्स झलकता है। यानी कि जिसे हम हौंटिंग नोट कहते हैं। सुज़ेन की आवाज़ भी इस गीत के फ़्युज़न मूड के साथ चलती है, और एक सस्पेन्स और हॊरर का अंदाज़ भी उसमें महसूस किया जा सकता है। इस गीत के दो रीमिक्स वर्ज़न भी है, 'अनप्लग्ड' और 'पार्टीमैप मिक्स'।

सुजॊय - आइए अब फ़िल्म का दूसरा गाना सुना जाए जिसे सोनू निगम, तुल्सी कुमार, राजा हसन और अदिती सिंह शर्मा ने गाया है। बोल हैं "दिल कशी"।

गीत - दिल कशी


विश्व दीपक - सोनू निगम का नाम किसी भी ऐल्बम पर देख कर दिल को चैन मिलता है कि चलो कम से कम एक गाना तो इस ऐल्बम में ज़रूर सुनने लायक होगा। और सोनू हर बार सब की उम्मीदों पर खरे उतरते हैं। कशिश भरे गीतों को वो बड़ा ख़ूबसूरत अंजाम देते हैं। और आजकल तो वो चुनिंदे गीत ही गा रहे हैं, इसलिए सुनने वालों की उम्मीदें उन पर लगी रहती हैं और इंतज़ार भी रहता है उनके गीतों का। तुलसी कुमार, जिनसे हिमेश रेशम्मिया ने बहुत से गानें गवाये हैं, उन्हें इस गीत में सोनू के साथ गाने का मौका मिला और उनका पोरशन भी कम नहीं है इस गीत में।

सुजॊय - लेकिन राजा हसन और अदिती सिंह शर्मा को गीत के शुरुआत में ही सुना जा सकता है। गीत की बात करें तो यह पूरी तरह से सोनू का गीत है और उनका जो एक स्टाइल है टिपिकल नशीले अंदाज़ में गाने का, इस गीत में भी वही अंदाज़-ए-बयाँ है। सोनू के इस जौनर के गानें अगर आपको पसंद आते हैं तो यह गीत भी ज़रूर पसंद आयेगा।

विश्व दीपक - फ़िल्म का तीसरा गाना है सुनिधि चौहान, राजा हसन, और बप्पा लाहिड़ी की आवाज़ों में, "चल हल्के हल्के"।

गीत - चल हल्के हल्के


सुजॊय - पूर्णत: सुनिधि चौहान का यह गीत है, राजा और बप्पा ने तो बस सहगायकों की भूमिका निभाई है। एक मस्त गाना जो एक जवान चुलबुली लड़की गाती है जो अपने मन के साथ चलती है और बाहरी दुनिया के किसी चीज़ के बारे में नहीं सोचती। ठीक ठाक गाना है, कोई नयी या ख़ास बात नज़र नहीं आई।

विश्व दीपक - अब तक तीन गानें हमने सुनें, लेकिन कोई भी गाना ऐसा नहीं महसूस हुआ जो एक लम्बी रेस का घोड़ा साबित हो सके। सभी गानें अच्छे हैं, लेकिन वह बात नहीं जिसे सुनने वाले कैच कर ले और गाने को कामयाबी की बुलंदी तक पहुँचाए। लेकिन यह याद रखते हुए कि बप्पा ने अभी अपना करीयर शुरु ही किया है, तो चलिए उन्हें यह मौका तो दे ही दिया जा सकता है। फ़िल्म का अंतिम गीत अब सुनने जा रहे हैं श्रेया घोषाल की आवाज़ में।

सुजॊय - "प्यार इतना ना कर" भी एक प्रेडिक्टेबल ट्रैक है। "ज़रा ज़रा बहकता है" जौनर का गाना है और श्रेया तो ऐसे गानें गाती ही रहती हैं, शायद इसीलिए मैंने "प्रेडिक्टेबल" शब्द का इस्तेमाल किया। चलिए आप ख़ुद ही सुनिए और अपनी राय दीजिए।

गीत - प्यार इतना ना कर


विश्व दीपक - एक बात आपने नोटिस की सुजॊय, कि 'अ फ़्लैट' एक हॊरर फ़िल्म है, लेकिन इसमें कोई भी गीत उस तरह का नहीं है। अब तक जितने भी इस तरह की फ़िल्में बनी हैं, सब में कम से कम एक गीत तो ऐसा ज़रूर होता है जो फ़िल्म के शीर्षक के साथ चलता है। ख़ैर, हॊरर, ख़ौफ़, और मौत के चंगुल से बाहर निकलकर आइए अब हम बैठते हैं 'लाइफ़ एक्स्प्रेस' में।

सुजॊय - 'लाइफ़ एक्स्प्रेस' एक कम बजट फ़िल्म है जिसमें संगीत है रूप कुमार राठौड़ का। इसलिए इस ऐल्बम से कुछ सुरीलेपन की उम्मीद ज़रूर की जा सकती है। संजय कलाटे निर्मित इस फ़िल्म के निर्देशक हैं अनूप दास और गीतकार हैं शक़ील आज़्मी। फ़िल्म के मुख्य कलाकार हैं रितुपर्णा सेनगुप्ता, दिव्या दत्ता, किरण जंगियानी, यशपाल शर्मा। फ़िल्म का पहला गाना सुनते हैं उदित नारायण और श्रेया घोषाल की आवाज़ों में।

गीत - फीकी फीकी सी लगे ज़िंदगी


विश्व दीपक - सुंदर कम्पोज़िशन और एक टिपिकल उदित - अल्का डुएट। माफ़ कीजिएगा, अल्का नहीं, बल्कि अब श्रेया आ गई हैं।

सुजॊय - वैसे श्रेया को पूरा सम्मान देते हुए मैं यह कहना चाहूँगा कि इस गीत में उदित जी के साथ अल्का याज्ञ्निक की आवाज़ ज़्यादा मेल खाती, और जैसे ९० का वह ज़माना भी याद आ जाता!

विश्व दीपक - गीत के बारे में यही कह सकता हूँ कि एक आम रोमांटिक डुएट है, स्वीट ऐण्ड सिम्पल, लेकिन इस तरह के गानें पहले भी बहुत बने हैं। कुछ कुछ 'कोई मिल गया' के शीर्षक गीत की तरह प्रतीत होता है।

सुजॊय - फ़िल्म का दूसरा गीत है स्वयं रूप कुमार राठौड़ की आवाज़ में।

गीत - थोड़ी सी कमी रह जाती है


विश्व दीपक - बहुत ही सुंदर कम्पोज़िशन, दर्द भी है, दर्शन भी है, रोमांस भी है, गीत के बोल ज़रूर "थोड़ी सी कमी रह जाती है" है, लेकिन गीत में कोई भी कमी नज़र नहीं आई।

सुजॊय - वाह, क्या बात कही है आपने! सही में मैं भी रूप कुमार राठौड़ से कुछ इसी तरह के एक गीत की उम्मीद कर रहा था इस ऐल्बम में। संगीत के साथ साथ उन्होंने अपनी आवाज़ से इस गीत को पूर्णता को पहुँचाया है। शायद इसीलिए उन्होंने इसे गाया होगा ताक़ि वो जिस तरह से चाहते थे, उसी तरह का अंजाम इस गीत को मिले।

विश्व दीपक - रूप साहब एक अच्छे गायक तो हैं ही, उन्होंने कुछ फ़िल्मों में इससे पहले भी संगीत दे चुके हैं, जिनमें शामिल हैं - 'वो तेरा नाम था' (२००४), 'मधोशी' (२००४), और 'ज़हर' (२००५)। आइए अब आगे बढ़ा जाए और सुनते हैं जगजीत सिंह की आवाज़ में एक प्रार्थना, "फूल खिला दे शाख़ों पर"।

गीत - फूल खिला दे शाख़ों पर


सुजॊय - बहुत ही गहराई और गंभीर सुनाई दी जगजीत साहब की आवाज़, और इस गीत को ऐसी ही आवाज़ की ज़रूरत थी इसमें कोई शक़ नहीं है। इस गीत के लिए जगजीत सिंह को चुनने के लिए रूप कुमार राठौड़ को दाद देनी ही पड़ेगी। कम से कम साज़ों के इस्तेमाल से इस गीत में और ज़्यादा असर पैदा हो गई है। इस गीत में वायलिन पर जो पीस बार बार आता है, उसी धुन का इस्तेमाल पहले किसी गीत में हो चुका है, लेकिन मुझे बिल्कुल याद नहीं आ रहा कि कौन सा गाना है। शायद अल्का याज्ञ्निक का गाया कोई गाना है।

विश्व दीपक - बोल भी बहुत अच्छे लिखे हैं शक़ील साहब ने। "वक़्त बड़ा दुखदायक है, पापी है संसार बहुत, निर्धन को धनवान बना, निर्बल को बल दे मालिक, कोहरा कोहरा सर्दी है काँप रहा है पूरा गाँव, दिन को तपता सूरज दे रात को कम्बल दे मालिक, बैलों को एक गठरी गाँस इंसानों को दो रोटी, खेतों को भर दे गेहूँ से, काँधों को हल दे मालिक, हाथ सभी के काले हैं, नज़रें सब की पीली हैं, सीना ढाम्प दुपट्टे से सर को आँचल दे मालिक"। ज़िंदगी की बेसिक ज़रूरतों की याचना मालिक से किया जा रहा है इस गीत में। बहुत सुंदर!!!

सुजॊय - और अब आज की प्रस्तुति का अंतिम गीत समूह स्वरों में। यह एक लोरी है, लेकिन कुछ अलग क़िस्म का है। आम तौर पर लोरी में कम से कम साज़ों का इस्तेमाल होता है क्योंकि निंदिया रानी को दावत दी जा रही होती है। लेकिन इस समूह लोरी में रीदम का भी इस्तेमाल किया गया है। सुंदर कम्पोज़िशन है।

विश्व दीपक - "झूले झूले पालना, बन्नी झूले पालना, उड़ ना जाए उड़न खटोला, धीरे से उछालना"। सुनते हैं....

गीत - झूले झूले पालना


सुजॊय - 'अ फ़्लैट' और 'लाइफ़ एक्स्प्रेस' के गानें हमने सुनें। 'अ फ़्लैट' की बात करें, तो एक ही गीत जो मुझे अच्छा लगा वह है कैलाश खेर का गाया "मीठा सा इश्क़ लगे"। और जहाँ तक 'लाइफ़ एक्स्प्रेस' की बात है, इस फ़िल्म के सभी गानें जो हमने सुनें, मुझे अच्छे लगे हैं। जैसा कि आपने कहा था पिछले हफ़्ते, हम रेटिंग का सिल्सिला भी समाप्त करते हैं। लेकिन हम अपने सभी श्रोता व पाठकों से निवेदन कर रहे हैं कि इन नये गीतों को भी सुनें और टिप्पणी में अपनी राय लिखें।

विश्व दीपक - सुजॉय जी, मैंने रेटिंग का सिलसिला समाप्त करने की मांग एक खास वज़ह से की थी। अक्सर ऐसा होता है कि अगर किसी एलबम का एक हीं गाना अच्छा हो तो पूरे एलबम की रेटिंग बहुत नीचे चली जाती है और उस स्थिति में पाठक/श्रोता की नज़र में एलबम का मोल बड़ा हीं कम हो जाता है। अब चूँकि हमारी रेटिंग ३ से ४.५ के बीच हीं होती थी तो जिस एलबम को ३ मिले, वह एलबम बाकियों से निस्संदेह कमजोर होगा। और हम तो कई सारे एलबमों को ३ की रेटिंग दिया करते थे, यानि सब के सब कमजोर। अब कमजोर एलबम पर कौन-सा श्रोता अपना समय नष्ट करना चाहेगा। फिर तो हमारी सारी की सारी मेहनत मिट्टी में हीं मिल गई। हम चाहते थे कि श्रोता अपने विचार रखे, लेकिन विचार तो तब हीं आएँगे ना, जब कोई उन गानों को सुनेगा। बस यही सोचकर मैंने आपसे, सजीव जी से और सभी श्रोताओं से रेटिंग हटाने/हटवाने की दरख्वास्त की थी। आप से और सजीव जी से हरी झंडी पाकर मुझे बहुत खुशी हो रही है। जब मैंने सजीव जी से इस बात का ज़िक्र किया तो उन्होंने मेरी मांग पर मुहर लगाने के साथ-साथ एक सलाह भी दी। उनका कहना था कि अगर हम श्रोताओं को इतना बता दें कि कौन-सा गीत सबसे अच्छा है और कौन-सा सबसे कमजोर तो श्रोताओं को एक सिलसिलेवार ढंग से गीत सुनने में सहूलियत होगी। श्रोता सबसे अच्छा गीत सबसे पहले सुनकर अपने दिन की बड़ी हीं खूबसूरत शुरूआत कर सकता है। मुझे उनका ख्याल बड़ा हीं नेक लगा। और इसी कारण से मैं आज के उन दो गीतों को "चुस्त-दुरुस्त गीत" और "लुंज-पुंज गीत" के तमगों से नवाज़ते हुए नीचे पेश कर रहा हूँ। यह निर्णय मैंने बड़ी जल्दी में ले लिया है, इसलिए सुजॉय जी आपसे और सभी श्रोताओं से मेरा यह आग्रह है कि यह जरूर बताएँ कि रेटिंग हटाकर "आवाज़ की राय में" शुरू करने का निर्णय कितना सही है और कितना गलत। चलिए तो इन्हीं बातों के साथ मैं आज़ की समीक्षा के समाप्त होने की विधिवत घोषणा करता हूँ। अगली कड़ी में फिर से मुलाकात होगी।

आवाज़ की राय में

चुस्त-दुरुस्त गीत: फूल खिला दे शाखों पर

लुंज-पुंज गीत: चल हल्के हल्के

Wednesday, June 30, 2010

हमने काटी हैं तेरी याद में रातें अक्सर.. यादें गढने और चेहरे पढने में उलझे हैं रूप कुमार और जाँ निसार

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #९०

"जाँ निसार अख्तर साहिर लुधियानवी के घोस्ट राइटर थे।" निदा फ़ाज़ली साहब का यह कथन सुनकर आश्चर्य होता है.. घोर आश्चर्य। पता करने पर मालूम हुआ कि जाँ निसार अख्तर और निदा फ़ाज़ली दोनों हीं साहिर लुधियानवी के घर रहा करते थे बंबई में। अब अगर यह बात है तब तो निदा फ़ाज़ली की कही बातों में सच्चाई तो होनी हीं चाहिए। कितनी सच्चाई है इसका फ़ैसला तो नहीं किया जा सकता लेकिन "नीरज गोस्वामी" जी के ब्लाग पर "जाँ निसार" साहब के संस्मरण के दौरान इन पंक्तियों को देखकर निदा फ़ाज़ली के आरोपों को एक नया मोड़ मिल जाता है - "जांनिसार साहब ने अपनी ज़िन्दगी के सबसे हसीन साल साहिर लुधियानवी के साथ उसकी दोस्ती में गर्क कर दिए. वो साहिर के साए में ही रहे और साहिर ने उन्हें उभरने का मौका नहीं दिया लेकिन जैसे वो ही साहिर की दोस्ती से आज़ाद हुए उनमें और उनकी शायरी में क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ. उसके बाद उन्होंने जो लिखा उस से उर्दू शायरी के हुस्न में कई गुणा ईजाफा हुआ."

पिछली महफ़िल में "साहिर" के ग़मों और दर्दों की दुनिया से गुजरने के बाद उनके बारे में ऐसा कुछ पढने को मिलेगा.. मुझे ऐसी उम्मीद न थी। लेकिन क्या कीजिएगा.. कई दफ़ा कई चीजें उम्मीद के उलट चली जाती हैं, जिनपर आपका तनिक भी बस नहीं होता। और वैसे भी शायरों की(या किसी भी फ़नकार की) ज़िन्दगी कितनी जमीन के ऊपर होती हैं और कितनी जमीन के अंदर.. इसका पता आराम से नहीं लग पाता। जैसे कि साहिर सच में क्या थे.. कौन जाने? हम तो उतना हीं जान पाते हैं, जितना हमें मुहय्या कराया जाता है। और यह सही भी है.. हमें शायरों के इल्म से मतलब होना चाहिए, न कि उनकी जाती अच्छाईयों और खराबियों से। खैर........ हम भी कहाँ उलझ गए। महफ़िल जाँ निसार साहब को समर्पित है तो बात भी उन्हीं की होनी चाहिए।

निदा फ़ाज़ली जब उन शायरों का ज़िक्र करते हैं जो लिखते तो "माशा-अल्लाह" कमाल के हैं, लेकिन अपनी रचना सुनाने की कला से नावाकिफ़ होते हैं... तो वैसे शायरों में "जाँ निसार" साहब का नाम काफ़ी ऊपर आता है। निदा कहते हैं:

जाँ निसार नर्म लहज़े के अच्छे रूमानी शायर थे... उनके अक्सर शेर उन दिनों नौजवानों को काफ़ी पसंद आते थे। कॉलेज के लड़के-लड़कियाँ अपने प्रेम-पत्रों में उनका इस्तेमाल भी करते थे– जैसे,

दूर कोई रात भर गाता रहा
तेरा मिलना मुझको याद आता रहा

छुप गया बादलों में आधा चाँद,
रौशनी छन रही है शाखों से
जैसे खिड़की का एक पट खोले,
झाँकता है कोई सलाखों से

लेकिन अपनी मिमियाती आवाज़ में, शब्दों को इलास्टिक की तरह खेंच-खेंचकर जब वह सुनाते थे, तो सुनने वाले ऊब कर तालियाँ बजाने लगाते थे। जाँ निसार आखें बंद किए अपनी धुन में पढ़े जाते थे, और श्रोता उठ उठकर चले जाते थे.

अभी भी ऐसे कई शायर हैं जिनकी रचनाएँ कागज़ पर तो खुब रीझाती है, लेकिन उन्हें अपनी रचनाओं को मंच पर परोसना नहीं आता। वहीं कुछ शायर ऐसे होते हैं जो दोनों विधाओं में माहिर होते हैं.. जैसे कि "कैफ़ी आज़मी"। कैफ़ी आज़मी का उदाहरण देते हुए "निदा" कहते हैं:

कैफ़ी आज़मी, बड़े-बड़े तरन्नुमबाज़ शायरों के होते हुए अपने पढ़ने के अंदाज़ से मुशायरों पर छा जाते थे. एक बार ग्वालियर के मेलामंच से कैफी साहब अपनी नज़्म सुना रहे थे.

तुझको पहचान लिया
दूर से आने वाले,
जाल बिछाने वाले

दूसरी पंक्तियों में ‘जाल बिछाने वाले’ को पढ़ते हुए उनके एक हाथ का इशारा गेट पर खड़े पुलिस वाले की तरफ था. वह बेचारा सहम गया. उसी समय गेट क्रैश हुआ और बाहर की जनता झटके से अंदर घुस आई और पुलिसवाला डरा हुआ खामोश खड़ा रहा

मंच से कहने की कला आए ना आए, लेकिन लिखने की कला में माहिर होना एक शायर की बुनियादी जरूरत है। वैसे आजकल कई ऐसे कवि और शायर हो आए हैं, जो बस "मज़ाक" के दम पर मंच की शोभा बने रहते हैं। ऐसे शायरों की जमात बढती जा रही है। जहाँ पहले कैफ़ी आज़मी जैसे शायर मिनटों में अपनी गज़लें सुना दिया करते थे, वहीं आजकल ज्यादातर मंचीय कवि घंटों माईक के सामने रहते हुए भी चार पंक्तियाँ भी नहीं कह पाते, क्योंकि उन्हें बीच में कई सारी "फूहड़" कहानियाँ जो सुनानी होती हैं। पहले के शायर मंच पर अगर उलझते भी थे तो उसका एक अलग मज़ा होता था.. आजकल की तरह नहीं कि व्यक्तिगत आक्षेप किए जा रहे हैं। निदा ऐसे हीं दो महान शायरों की उलझनों का जिक्र करते हैं -

नारायण प्रसाद मेहर और मुज़्तर ख़ैराबादी, ग्वालियर के दो उस्ताद शायर थे.

मेहर साहब दाग़ के शिष्य और उनके जाँनशीन थे, मुज़्तर साहब दाग़ के समकालीन अमीर मीनाई के शागिर्द थे. दोनों उस्तादों में अपने उस्तादों को लेकर मनमुटाव रहता था, दोनों शागिर्दों के साथ मुशायरों में आते थे और एक दूसरे की प्रशंसा नहीं करते.


अब आप सोच रहे होंगे कि ये आज मुझे क्या हो गया है.. जाँ निसार अख्तर की बात करते-करते मैं ये कहाँ आ गया। घबराईये मत... "मेहर" साहब और "खैराबादी" साहब का जिक्र बेसबब नहीं।

दर-असल "खैराबदी" साहब कोई और नहीं जाँ निसार अख्तर के अब्बा थे और "मेहर" साहब "जाँ निसार" के उस्ताद..

जाँ निसार अख्तर किस परिवार से ताल्लुकात रखते थे- इस बारे में "विजय अकेला" ने "निगाहों के साये" किताब में लिखा है:

जाँ निसार अख्तर उस मशहूर-ओ-मारुफ़ शायर मुज़्तर खै़राबादी के बेटे थे जिसका नाम सुनकर शायरी किसी शोख़ नाज़नीं की तरह इठलाती है। जाँ निसार उस शायरी के सर्वगुण सम्पन्न और मशहूर शायर सय्यद अहमद हुसैन के पोते थे जिनके कलाम पढ़ने भर ही से आप बुद्धिजीवी कहलाते हैं। हिरमाँ जो उर्दू अदब की तवारीख़ में अपना स्थान बना चुकी हैं वे जाँ निसार अख़्तर की दादी ही तो थीं जिनका असल नाम सईदुन-निसा था। अब यह जान लीजिए कि हिरमाँ के वालिद कौन थे। वे थे अल्लामा फ़ज़ल-ए-हक़ खै़राबादी जिन्होंनें दीवान-ए-ग़ालिब का सम्पादन किया था और जिन्हें १८५७ के सिपाही-विद्रोह में शामिल होने और नेतृत्व करने के जुर्म में अंडमान भेजा गया था। कालापानी की सजा सुनाई गयी थी।

शायर की बेगम का नाम साफ़िया सिराज-उल-हक़ था, जिसका नाम भी उर्दू अदब में उनकी किताब ‘ज़ेर-ए-नज़र’ की वजह से बड़ी इज़्ज़त के साथ लिया जाता है। और साफ़िया के भाई थे मजाज़। उर्दू शायरी के सबसे अनोखे शायर। आज के मशहूर विचारक डॉ. गोपीचन्द्र नारंग ने तो इस ख़ानदान के बारें में यहाँ तक लिख दिया है कि इस खा़नदान के योगदान के बग़ैर उर्दू अदब की तवारीख़ अधूरी है।

जाँ निसार अख्तर न सिर्फ़ गज़लें लिखते थे, बल्कि नज़्में ,रूबाईयाँ और फिल्मी गीत भी उसी जोश-ओ-जुनून के साथ लिखा करते थे। फिल्मी गीतों के बारे में तो आपने "ओल्ड इज गोल्ड" पर पढा हीं होगा, इसलिए मैं यहाँ उनकी बातें न करूँगा। एक रूबाई तो हम पहले हीं पेश कर चुके हैं, इसलिए अब नज़्म की बारी है। मुझे पूरा यकीन है कि आपने यह नज़्म जरूर सुनी होगी, लेकिन यह न जानते होंगे कि इसे "जां निसार" साहब ने हीं लिखा था:

एक है अपना जहाँ, एक है अपना वतन
अपने सभी सुख एक हैं, अपने सभी ग़म एक हैं
आवाज़ दो हम एक हैं.


इस शायर के बारे में क्या कहूँ और क्या अगली कड़ी के लिए रख लूँ कुछ भी समझ नहीं आ रहा। फिर भी चलते-चलते ये दो शेर तो सुना हीं जाऊँगा:

अश्आर मिरे यूँ तो ज़माने के लिए हैं
कुछ शे’र फ़क़त उनको सुनाने के लिए हैं

सोचो तो बड़ी चीज़ है तहजीब बदन की
वरना तो बदन आग बुझाने के लिए हैं


"जाँ निसार" साहब के बारे में और भी कुछ जानना हो तो यहाँ जाएँ। वैसे इतना तो आपको पता हीं होगा कि "जाँ निसार अख्तर" आज के सुविख्यात शायर और गीतकार "जावेद अख्तर" के पिता थे।

आज के लिए इतना हीं काफ़ी है। तो अब रूख करते हैं आज की गज़ल की ओर। आज जो गज़ल लेकर हम आप सब के बीच हाज़िर हुए हैं उसे तरन्नुम में सजाया है "रूप कुमार राठौड़" ने। लीजिए पेश-ए-खिदमत है यह गज़ल, जिसमें यादें गढने और चेहरे पढने की बातें हो रही हैं:

हमने काटी हैं तेरी याद में रातें अक्सर
दिल से गुज़री हैं सितारों की बरातें अक्सर

और तो कौन है जो मुझको ______ देता
हाथ रख देती हैं दिल पर तेरी बातें अक्सर

हम से इक बार भी जीता है न जीतेगा कोई
वो तो हम जान के खा लेते हैं मातें अक्सर

उनसे पूछो कभी चेहरे भी पढ़े हैं तुमने
जो किताबों की किया करते हैं बातें अक्सर




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "दामन" और शेर कुछ यूँ था-

बस अब तो मेरा दामन छोड़ दो बेकार उम्मीदो
बहुत दुख सह लिये मैंने बहुत दिन जी लिया मैंने

पिछली बार की महफ़िल-ए-गज़ल की शोभा बनीं शन्नो जी। महफ़िल में शन्नो जी और सुमित जी के बीच "गज़लों में दर्द की प्रधानता" पर की गई बातचीत अच्छी लगी। इसी वाद-विवाद में अवनींद्र जी भी शामिल हुए और अंतत: निष्कर्ष यह निकला कि बिना दर्द के शायरों का कोई अस्तित्व नहीं होता। शायर तभी लिखने को बाध्य होता है, जब उसके अंदर पड़ा दर्द उबलने की चरम सीमा तक पहुँच जाता है या फिर वह दर्द उबलकर "ज्वालामुखी" का रूप ले चुका होता है। "खुशियों" में तो नज़्में लिखी जाती हैं, गज़लें नहीं। महफ़िल में आप तीनों के बाद अवध जी के कदम पकड़े। अवध जी, आपने सही पकड़ा है... वह इंसान जो ज़िंदगी भर प्यार का मुहताज रहा, वह जीने के लिए दर्द के नगमें न लिखेगा तो और क्या करेगा। फिर भी ये हालत थी कि "दिल के दर्द को दूना कर गया जो गमखार मिला "। आप सबों के बाद अपने स्वरचित शेरों के साथ महफ़िल में मंजु जी और शरद जी आएँ जिन्होंने श्रोताओं का दामन दर्द और खलिश से भर दिया। आशीष जी का इस महफ़िल में पहली बार आना हमारे लिए सुखदायी रहा और उनकी झोली से शेरों की बारिश देखकर मन बाग-बाग हो गया। और अंत में महफ़िल का शमा बुझाने के लिए "नीलम" जी का आना हुआ, जो अभी-अभी आए नियमों से अनभिज्ञ मालूम हुईं। कोई बात-बात नहीं धीरे-धीरे इन नियमों की आदत पड़ जाएगी :)

ये रहे महफ़िल में पेश किए गए शेर:

जुल्म सहने की भी कोई इन्तहां होती है
शिकायतों से अपनी कोई दामन भर गया. (शन्नो जी)

आसुओ से ही सही भर गया दामन मेरा,
हाथ तो मैने उठाये थे दुआ किसकी थी (अनाम)

मेरे दामन तेरे प्यार की सौगात नहीं
तो कोई बात नही,तो कोई बात नही । (शरद जी)

काँटों में खिले हैं फूल हमारे रंग भरे अरमानों के
नादान हैं जो इन काँटों से दामन को बचाए जाते हैं. (शैलेन्द्र)

अपने ही दामन मैं लिपटा सोचता हूँ
आसमाँ पे कुछ नए गम खोजता हूँ (अवनींद्र जी)

तेरे आने से खुशियों का दामन चहक रहा ,
जाने की बात से दिल का आंगन छलक रहा . (मंजु जी)

कोई भी हो शेख नमाज़ी या पंडित जपता माला,
बैर भाव चाहे जितना हो मदिरा से रखनेवाला,
एक बार बस मधुशाला के आगे से होकर निकले,
देखूँ कैसे थाम न लेती दामन उसका मधुशाला || (हरिवंश राय बच्चन)

दर्द से मेरा दामन भर दे या अल्लाह
फिर चाहे दीवाना कर दे या अल्लाह (क़तील शिफ़ाई)

शफ़क़,धनुक ,महताब ,घटाएं ,तारें ,नगमे बिजली फूल
उस दामन में क्या -क्या कुछ है,वो दामन हाथ में आये तो (अनाम)

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Tuesday, June 29, 2010

"मिस्टर सिंह ऐण्ड मिसेज मेहता" के घर सुमधुर गीतों और ग़ज़लों के साथ आए हैं उस्ताद शुजात खान और शारंग देव

ताज़ा सुर ताल २४/२०१०

विश्व दीपक - ७० के दशक के मध्य भाग से लेकर ८० के दशक का समय कलात्मक सिनेमा का स्वर्णयुग माना जाता है। उस ज़माने में व्यावसायिक सिनेमा और कलात्मक सिनेमा के बीच की दूरी बहुत ही साफ़-साफ़ नज़र आती है। और सब से बड़ा फ़र्क था कलात्मक फ़िल्मों में उन दिनों गीतों की गुजाइश नहीं हुआ करती थी। लेकिन धीरे धीरे सिनेमा ने करवट बदली, और आज आलम कुछ ऐसा है कि युं तो समानांतर विषयों पर बहुत सारी फ़िल्में बन रही हैं, लेकिन उन्हे कलात्मक कह कर टाइप कास्ट नहीं किया जाता। इन फ़िल्मों की कहानी भले ही समानांतर हो, लेकिन फ़िल्म में व्यावसायिक्ता के सभी गुण मौजूद होते हैं। और इसलिए ज़ाहिर है कि गीत-संगीत भी शामिल होता है।

सुजॊय - आपकी इन बातों से ऐसा लग रहा है कि 'ताज़ा सुर ताल' में आज हम ऐसे ही किसी फ़िल्म के गानें सुनने जा रहे हैं।

विश्व दीपक - बिलकुल! आज हमने चुना है आने वाली फ़िल्म 'मिस्टर सिंह ऐण्ड मिसेज मेहता' के गीतों को।

सुजॊय - मैंने इस फ़िल्म के बारे में कुछ ऐसा सुन रखा है कि इसकी कहानी विवाह से बाहर के संबंध पर आधारित है और इस एक्स्ट्रा-मैरिटल संबंध का एक कारण है बांझपन। वैसे इस तरह की कहानी का अंदाज़ा आप फ़िल्म के शीर्षक से ही लगा सकते हैं। विश्व दीपक जी, अभी आप समानांतर सिनेमा की बात कर रहे थे, तो मैं यह जोड़ना चाहूँगा कि इस फ़िल्म के निर्देशक हैं प्रवेश भरद्वाज, जिन्होने फ़िल्म निर्माण की बारिक़ियाँ सीखी है श्याम बेनेगल, गुलज़ार, अरुणा राजे और गोविंद निहलानी जैसे दिग्गज फ़िल्मकारों से जो समानांतर और कलात्मक सिनेमा के स्तंभ माने जाते रहे हैं। तो अब देखना यह है कि प्रवेश ने इस फ़िल्म को कैसी ट्रीटमेण्ट दी है।

विश्व दीपक - तो फ़िल्म की थोड़ी सी भूमिका हमने अपने पाठकों को दी, अब सीधे आ जाते हैं फ़िल्म के गीतों पर। इससे पहले कि गीतों की चर्चा शुरु करें, आइए इस फ़िल्म का पहला गीत यहाँ सुन लिया जाए, फिर बात को आगे बढ़ाएँगे।

गीत: ऐ ख़ुदा तू कुछ तो बता ज़रा


सुजॊय - यह गीत था उस्ताद शुजात हुसैन ख़ान की आवाज़ में। जी हाँ, ये वही शुजात हुसैन ख़ान हैं जो एक जाने माने सितार वादक हैं इमदादख़ानी घराना के। शुजात खान साहब मशहूर सितार वादक उस्ताद विलायत खान के सुपुत्र हैं। इस फ़िल्म का संगीत शुजात खान साहब ने हीं तैयार किया है, सह-संगीतकार शारंग देव पंडित के साथ मिल कर।

विश्व दीपक - गीत सुन कर अच्छा लगा, कुछ-कुछ उस्ताद राशिद ख़ान साहब का गाया 'जब वी मेट' के गीत "आओगे जब तुम ओ साजना" की तरफ़ लगा कुछ जगहों पर। गीत का संगीत साफ़ सुथरा और कर्णप्रिय है, साज़ों के महाकुंभ के ना होने से एक सूदिंग अहसास होता है। एक सुकून का अहसास होता है गीत को सुनते हुए। शास्त्रीय कलाकार होने की वजह से इस मिट्टी के संगीत की मधुरता को शुजात साहब ने इस गीत में भली भांति समा दिया है।

सुजॊय - शुजात हुसैन ख़ान का जन्म १४ अगस्त १९६० में हुआ था। उनके सितार के ६० से उपर ऐल्बम्स बने हैं और उन्हे ग्रैमी नॊमिनेशन भी मिल चुका है। उनकी गायकी के भी चर्चे हैं। वे बैण्ड 'ग़ज़ल' में केहान कल्होर के साथ परफ़ार्म भी कर चुके हैं।

विश्व दीपक - चलिए अब दूसरे गीत की तरह नज़र दौड़ाते हैं। यह गीत है श्रेया घोषाल की आवाज़ में - "बारहाँ दिल में एक सवाल आया, आज सोचा तो ये ख़याल आया, दो क़दम साथ बस चले तुम हम, हमसफ़र तो ना थे ना कभी तुम हम"। न जाने कितने अरसे के बाद इस तरह के ग़ज़लनुमा अल्फ़ाज़ किसी हिंदी फ़िल्मी गीत में सुनने को मिल रहे है। इसके लिए हम धन्यवाद देते हैं फ़िल्म के गीतकार अमिताभ वर्मा को। श्रेया के आवाज़ की मिठास ने गीत की मधुरता को कई गुणा बढ़ा दिया है।

गीत: बारहाँ दिल में एक सवाल आया (श्रेया)


विश्व दीपक - इसी गीत का एक मेल वर्ज़न भी है के.के की आवाज़ में। अगर आप इजाज़त दें तो इसे भी सुनते चले?

सुजॊय - नेकी और पूछ पूछ?

गीत: बारहाँ दिल में एक सवाल आया (के.के)


सुजॊय - जैसा कि मैंने सोचा था, ठीक वैसे ही के.के ने फिर एक बार हमे निराश नहीं किया। मुझे इस दौर के गायकों में के.के. की आवाज़ सब से ज़्यादा अच्छी लगती है। वो अपना एक लो प्रोफ़ाइल मेन्टेन करते हैं, और एक के बाद एक लाजवाब गीत गाते चले जा रहे हैं।

विश्व दीपक - अच्छा सुजॊय जी, ये बताईये कि यह गीत था या ग़ज़ल?

सुजॊय - बढिया मज़ाक करते हैं आप। एक तरफ़ तो ’महफ़िल-ए-ग़ज़ल' आप होस्ट करते हैं, और दूसरी तरफ़ सवाल मुझसे पूछ रहे हैं :-) चलिए यूँ करते हैं, इस गीत के बोल यहाँ लिख डालते हैं, और फिर मैं गेस करता हूँ कि क्या यह ग़ज़ल की परिभाषा को पूरा करती है या नहीं!

"बारहाँ दिल में एक सवाल आया, आज सोचा तो ये ख़याल आया,

दो क़दम साथ बस चले तुम हम, हमसफ़र तो ना थे ना कभी तुम हम।

तेरी बातों पे मुस्कुराए आँखें, तेरी ख़ुशबू से गुनगुनाए साँसें,

मेरे इस दिल को बस एक ही ग़म, हमसफ़र तो न थे कभी तुम हम।

आज फिर तेरी याद आई है, पास मेरे मेरी तन्हाई है,

चलो अच्छा है टूटे सारे भरम, हमसफ़र तो न थे कभी तुम हम।"

सुजॊय - मुझे तो ग़ज़ल ही लग रही है, थोड़ा सा कन्फ़्युज़न है। चलिए आप ही बता दीजिए।

विश्व दीपक - सुजॊय जी, भले हीं महफ़िल-ए-ग़ज़ल मैं होस्ट करता हूँ, लेकिन मैं ग़ज़लों की परिभाषा से दूर हीं रहता हूँ, लेकिन चूँकि प्रश्न मैंने पूछा था तो जवाब भी देना हीं पड़ेगा। रदीफ़ और काफ़िये के हिसाब से तो ये गज़ल है.. बस इसमें मतला नहीं है। लेकिन कई सारी ऐसी ग़ज़लें लिखी गई हैं, जो बिना मतला और बिना मक़ता के होती हैं। अगर मैं "बहर" की बात न करूँ, जो कि मैं जानकारियों के अभाव में कर भी नहीं सकता, तो मेरे हिसाब से ये सोलह आने ग़ज़ल हीं है। अब मैं पाठकों और श्रोताओं से कहूँगा कि जिन किन्हीं को "बहर" की जानकारी हो, वो अंतिम निर्णय दें। खैर "ग़ज़ल" की बाकी बातें फिर कहीं किसी और महफ़िल में की जाएगी। अभी तो आगे बढते हैं और सुनते हैं अगला गीत "फ़रियाद है शिकायत है" जिसे रीचा शर्मा ने गाया है अपने उसी अंदाज़ में। लेकिन आवाज़ को उन्होने उतना ऊँचा नहीं उठाया है जितना वो अक्सर करती हैं, बल्कि कुछ नर्म अंदाज़ में गाने को निभाया है।

सुजॊय - और गीत में एक क़व्वालीनुमा अंदाज़ है... रीदम में और संगीत की शैली में। तो चलिए सुनते हैं यह गाना।

गीत: फ़रियाद है शिकायत है


विश्व दीपक - ’मिस्टर सिंह ऐण्ड मिसेस मेहता' के निर्देशक और संगीतकारों के नाम तो हम बता चुके है, साथ ही गीतकार का नाम भी। अब यह बता दें कि इस फ़िल्म के निर्माता हैं टुटु शर्मा और मनु एस. कुमारन, तथा फ़िल्म में मुख्य कलाकार हैं प्रशांत नारायण, अरुणा शील्ड्स, नावेद असलम और लुसी हसन।

सुजॊय - विश्व दीपक जी, टुटु शर्मा का नाम सुनकर मुझे एक ऐसी बात याद आ गई, जो भले हीं इस फिल्म के गानों से न जुड़ी है, लेकिन इस फिल्म से उसका गहरा नाता है। आपने अभी तक इस बात का जिक्र नहीं किया कि यह फिल्म रीलिज होने के पहले हीं लीक हो चुकी थी। मार्केट में इसकी "सीडी" खुलेआम बिकने लगी थी। इस फिल्म से पहले ऐसी हीं घटना दो और फिल्मों के साथ हो चुकी है। वे फिल्में हैं - "पाँच" और "तेरा क्या होगा जॉनी"... और आश्चर्य की बात तो ये है कि इन तीनों फिल्मों का निर्माता एक हीं इंसान है... टुटु शर्मा।

विश्व दीपक - यानि कि फिल्म लीक करने में टुटु शर्मा का भी हाथ हो सकता है। लेकिन इससे इनका क्या फायदा होगा। खैर हमें क्या लेना.. इन घटनाओं से। हमें तो बस संगीत से दरकार है। इसलिए इन बातों में न उलझते हुए हम अगले गाने की ओर रूख करते हैं, जिसे अपनी आवाज़ें दी हैं उदित नारायण और श्रेया घोषाल ने। यह भी एक नर्मोनाज़ुक रोमांटिक डुएट है "बेहोशी नशा ख़ुशबू, क्या क्या ना हमारी सांसों में"।

सुजॊय - ये बोल सुन कर लग रहा है कि एक और ग़ज़लनुमा अंदाज़ का गाना। बहुत दिनों के बाद उदित जी की आवाज़ सुनाई दे रही है इस फ़िल्म में। शुजात साहब का सुकूनदायक संगीत और अमिताभ वर्मा के पुर-असर बोल। बस इतना ही कहने को जी चाहता है कि अच्छी गायकी, उम्दा संगीत, पुर-असर बोल, क्या क्या न मौजूद है इस गाने में"! सुनिए, कुल ८ मिनट १९ सेकण्ड्स का यह गीत है।

गीत: बेहोशी नशा ख़ुशबू


विश्व दीपक - और अब हम आ पहुँचे हैं फ़िल्म के अंतिम गीत पर। और इस बार आवाज़ है रूप कुमार राठौड़ की। इसमें भी वही ठहराव, वही मासूमियत, वही सुकून, वही ग़ज़लनुमा अंदाज़। शुजात साहब ने तो जैसे मेलडी और अच्छे संगीत की धारा उतार कर रख दी है फ़िल्म संगीत संसार में, और साथ ही यह सिद्ध भी शायद करने वाले हैं कि अच्छा संगीत किसी युग किसी दौर का मोहताज नहीं होता। अगर कलाकार चाहे तो अच्छा काम किसी भी दौर में, किसी भी परिस्थिति में किया जा सकता है।

सुजॊय - बिलकुल ठीक कहा आपने। इस गीत की बात करें तो इसमें जगजीत सिंह के गायन शैली का प्रभाव सुनाई देता है। गीत के बोल हैं "इन्ही में डूब के एक रोज़ ख़ुद को खोया था, इन्ही की याद में कई रात मैं ना सोया था, इन्ही की हर ख़ुशी हर ग़म में साथ रोया था"। आगे अमिताभ वर्मा लिखते हैं कि "तब ऐसी अजनबी लगती नहीं थीं ये आँखें", इसलिए गीत को शीर्षक दिया गया है "अजनबी आंखें"। वैसे गीत में इस मिट्टी की महक है, लेकिन इसका जो रीदम और ऒरकेस्ट्रेशन है, वह पश्चिमी है। ख़ास कर इंटरल्युड म्युज़िक में तो हेवी इन्स्ट्रुमेण्ट्स का प्रयोग हुआ है, रॊक शैली का।

गीत: अजनबी आँखें


"मिस्टर सिंह ऐण्ड मिसेस मेहता" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ****१/२

सुजॊय - वाह! मज़ा आ गया। सच पूछिए तो एक लम्बे अरसे के बाद इतना उम्दा संगीत किसी हिंदी फ़िल्म में सुनने को मिला। हर गीत अच्छा है, बोल और संगीत, दोनों की दृष्टि से ही। दूसरे गीतकार कुछ सबक ज़रूर लेंगे ऐसी उम्मीद हम करते हैं। सस्ते गीत लिख कर उसे व्यावसायिकता की ज़रूरत करार देते हुए जो गीतकार फ़िल्म संगीत के समुंदर में गंदगी डाल रहे हैं, उनसे यही गुज़ारिश है कि कृपया इस फ़िल्म के गीतों को सुनें।

विश्व दीपक - अच्छा सुजॊय जी, आपने ज़िक्र किया था कि इस फ़िल्म में शारंग देव पंडित भी संगीतकार हैं, तो उन्होने किस गीत की धुन बनाई?

सुजॊय - नहीं, ये सभी गानें शुजात साहब के ही थे। दर-असल इस फ़िल्म के साउण्ड ट्रैक में चार इन्स्ट्रुमेण्टल पीसेस भी शामिल किए गए हैं जो शारंग जी की काम्पोज़िशन्स हैं। तो चलिए... मुझे जितना कहना था मैंने कह दिया, अब आपकी बारी है।

विश्व दीपक - सुजॊय जी, मैं भी आपसे इत्तेफ़ाक़ रखता हूँ कि इस फिल्म के संगीत में सब कुछ खास है। मेरे हिसाब से इतना "मनभावन" संगीत इस साल अभी तक किसी और फिल्म में सुनने को नहीं मिला। फिल्म चलेगी या पिटेगी... यह अलग मुद्दा है, लेकिन यह संगीत हिट है। दुआ करता हूँ कि आने वाले दिनों में किसी और संगीतकार की झोली से भी ऐसा हीं संगीत बरसे। खत्म हो रही मेलोडी और गुम हो रही फिल्मी-ग़ज़लों को बचाने का इससे अच्छा कोई और रास्ता मुझे नज़र नहीं आ रहा। दिल में एक सुकून लेकर चलिए अब हम दोनों श्रोताओं से विदा लेते हैं... खुदा हाफ़िज़!

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ७०- आप ने फ़िल्म 'वैसा भी होता है -२' मे अपने अभिनय के लिए सराहे गए थे और आपने केतन मेहता की फ़िल्म 'रंग रसिया' में भी एक किरदार निभाया था। बताइए हम किस अभिनेता या अभिनेत्री की बात कर रहे हैं?

TST ट्रिविया # ७१- इंगलैण्ड के किस संगीत विद्यालय ने उस्ताद शुजात हुसैन ख़ान का विज़िटिंग्‍ फ़ैकल्टी के रूप में स्वागत किया था?

TST ट्रिविया # ७२- उदित नारायण और श्रेया घोषाल ने 'मिस्टर सिंह....' फ़िल्म में एक युगल गीत गाया है। बताइए कि इन दोनों की आवाज़ में वह कौन सा युगल गीत है जिसमें "बेकल", "सहयोग", "वातावरण", "झरना" जैसे शब्दों का प्रयोग हुआ है।


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. फ़िल्म 'फ़िदा' के गीत "आजा वे माही"।
२. 'रन' (२००४)।
३. फ़िल्म 'दिल माँगे मोर' का "ऐसा दीवाना हुआ ये दिल आप के प्यार में" और फ़िल्म 'राज़' का "आप के प्यार में हम संवरने लगे"।

पिछली बार की बैठक खाली हीं गई... किसी ने हमारी महफ़िल की तरह रूख नहीं किया। सीमा जी, किधर हैं आप? उम्मीद करते हैं कि दुबारा ऐसी स्थिति नहीं आएगी।

Wednesday, April 28, 2010

जब भी चूम लेता हूँ इन हसीन आँखों को.... कैफ़ी की "कैफ़ियत" और रूप की "रूमानियत" उतर आई है इस गज़ल में..

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #८१

पि छली दस कड़ियों में हमने बिना रूके चचा ग़ालिब की हीं बातें की। हमारे लिए वह सफ़र बड़ा हीं सुकूनदायक रहा और हमें उम्मीद है कि आपको भी कुछ न कुछ हासिल तो ज़रूर हुआ होगा। यह बात तो जगजाहिर है कि ग़ालिब शायरी की दुनिया के ध्रुवतारे हैं और इस कारण हमारा हक़ बनता है कि हम उनसे वाकिफ़ हों और उनसे गज़लकारी के तमाम नुस्खे जानें। हमने पिछली दस कड़ियों में बस यही कोशिश की और शायद कुछ सफ़ल भी हुए। "कुछ" इसलिए कहना पड़ रहा है क्योंकि ग़ालिब को पूरी तरह जान लेना किसी के बस में नहीं। फिर भी जितना कुछ हमारे हाथ आया, सारा का सारा मुनाफ़ा हीं तो था। अब जब हमें मुनाफ़े का चस्का लग हीं गया है तो क्यों ना आसमान के उस ध्रुवतारे के आस-पास टिमटिमाते, चमकते, दमकते तारों की रोशनी पर नज़र डाली जाए। ये तारे भले हीं ध्रुवतारा के सामने मंद पड़ जाते हों, लेकिन इनमें भी इतना माद्दा है, इतनी चमक है कि ये गज़ल-रूपी ब्रह्मांड के सारे ग्रहों को चकाचौंध से सराबोर कर सकते हैं। तो अगली दस कड़ियों में (आज की कड़ी मिलाकर) हम इन्हीं तारों की बातें करने जा रहे हैं। बात अब और ज्यादा नहीं घुमाई जाए तो अच्छा....इसीलिए सीधे-सीधे हम मुद्दे पर आते हैं और आज के सितारे से आप सबको रूबरू कराते हैं।

आज की कड़ी जिस शायर के नाम है, उसे मशहूर लेखक और पत्रकार "खुशवन्त सिंह" "आज की उर्दू शायरी का बादशाह" करार देते हैं। अगर यही बात है तो इस सफ़र की शुरूआत के लिए इनसे अच्छा और सटीक शायर और कौन हो सकता है। जी हाँ, हम जिनकी बात कर रहें हैं, उन्हें शायरी की दुनिया में "कैफ़ी" के नाम से जाना जाता है....जबकि उनका पूरा(मूल) नाम सैयद अख़्तर हुसैन रिज़वी है। "कैफ़ी" आज़मी के बारे में खुद कुछ कहने से अच्छा है कि उनकी सुपुत्री "शबानी आज़मी" से उनका परिचय जान लिया जाए। शबाना कहती हैं:

बाप होने के नाते तो अब्बा मुझे ऐसे लगते हैं जैसे एक अच्छा बाप अपनी बेटी को लगेगा, मगर जब उन्हें एक शायर के रूप में सोचती हूँ तो आज भी उनकी महानता का समन्दर अपरम्पार हीं लगता है। मैं ये तो नहीं कहती कि मैं उनकी शायरी को पूरी तरह समझती हूँ और उसके बारे में सब कुछ जानती हूँ, मगर फिर भी उनके शब्दों से जो तस्वीरें बनती हैं, उनके शेरों में जो ताक़त छुपी होती है, उनकी सोच का जो विस्तार है, वो मुझे हैरान-सा कर देता है। वो अपने दु:ख और अपने ग़म को भी दुनिया के दु:ख-दर्द से मिलाकर देखते हैं। उनके सपने सिर्फ़ अपने लिए नहीं, दुनिया के इन्सानों के लिए हैं। चाहे वह झोपड़पट्टी वालों के लिए काम हो या नारी अधिकार की बात या सांप्रदायिकता के विरूद्ध मेरी कोशिश, उन सब रास्तों में अब्बा की कोई न कोई नज़्म मेरी हमसफ़र है। वो "मकान" हो, "औरत" हो या "बहरूपनी" - ये वो मशालें हैं जिन्हें लेकर मैं अपने रास्तों पर चलती हूँ। दुनिया में कम लोग ऐसे होते हैं जिनकी कथनी और करनी एक होती है। अब्बा ऐसे इंसान हैं- उनके कहने और करने में कोई अंतर नहीं है। मैंने उनसे ये हीं सीखा है कि सिर्फ़ सही सोचना और सही कहना हीं काफ़ी नहीं, सही कर्म भी होने चाहिए। अब्बा की ज़िंदगी एक ऐसे इंसान, एक ऐसे शायर की कहानी है, जिसने ज़िन्दगी को पूरी तरह भरपूर जी के देखा है। इनकी शायरी में आप बार-बार देखेंगे- वो अपने दु:खों के मुंडेरों में घिर के नहीं रह जाते बल्कि अपने दु:ख को दुनिया के तमाम लोगों से जोड़ लेते हैं। फिर उनकी बात सिर्फ़ एक इन्सान के दिल की बात नहीं, दुनिया के सारे इन्सानों के दिलों की बात हो जाती है और आप महसूस करते हैं कि उनकी शायरी में सिर्फ़ उनका नहीं, हमारा-आपका-सबका दिल धड़क रहा है।

शबाना जी ने अपने अब्बा को बड़ी हीं बारीकी से याद किया। अब हम ऐसा करते हैं कि कैफ़ी आज़मी की कहानी उन्हीं की जुबानी सुनते हैं:

अपने बारे में यकीन से मैं इतना हीं कह सकता हूँ कि मैं गुलाम हिन्दुस्तान में पैदा हुआ, आज़ाद हिन्दुस्तान में बूढा हुआ और सोशलिस्ट हिन्दुस्तान में करूँगा। समाजवाद के लिए सारे संसार में और स्वयं मेरे देश में एक समय से जो महान संघर्ष हो रहा है, उससे सदैव मेरा और मेरी शायरी का संबंध रहा है। इस विश्वास ने उसी कोख से जन्म लिया है।

मैं उत्तर प्रदेश के जिला आज़मगढ के एक छोटे से गाँव में पैदा हुआ। शायरी तो एक तरह से मुझे खानदानी मिली। मेरे अब्बा सय्यद फ़तह हुसैन रिज़वी मरहूम बाक़ायदा शायर तो नहीं थे, लेकिन शायरी को अच्छी तरह समझते थे। घर में उर्दू-फ़ारसी के दीवान बड़ी संख्या में थे। मैंने ये किताबें उस उम्र में पढीं जब उनका बहुत हिस्सा समझ में नहीं आता था। मुझसे बड़े तीनों भाई भी बाक़ायदा शायर थे यानि बयाज़ (डायरी) रखते थे और तख़ल्लुस भी। सबसे बड़े भाई सैय्यद ज़फ़र हुसैन महरूम की तख़ल्लुस "मज़रूह" थी। उनसे छोटे भाई सैय्यद हुसैन की तख़ल्लुस "बेताब" थी। उनसे छोटॆ भाई सैय्यद शब्बीर हुसैन की तख़ल्लुस "वफ़ा" थी। भाई साहबान जब छुट्टियों में अलीगढ और लखनऊ से घर आते थे तो घर पर अक्सर शे’री महफ़िलें होती थीं जिनमें भाई साहबान के अलावा पूरे क़स्बे के शोअरा शरीक होते थे। भाई साहबान जब अब्बा को अपना कलाम सुनाते और अब्बा उसकी तारीफ़ करते तो मुझे ईर्ष्या होती और मैं बड़ी हसरत से अपने सवाल करता - क्या मैं बःई कभी शे’र कह सकूँगा? लेकिन मैं जब भाईयों के शे’र सुनने के लिए खड़ा हो जाता या चुपचाप कहीं बैठ जाता तो फ़ौरन किसी बुजुर्ग की डाँट पड़ती कि तुम यहाँ क्यों बैठे हो? तुम्हारी समझ में क्या आएगा? घर में जाओ और पान बनवाकर लाओ। मैं पाँव पटकता तक़रीबन रोता हुआ घर में बाजी के पास जाता कि देखिए, मेरे साथ यह हुआ। मैं एक दिन इन सबसे बड़ा शाइर बनकर दिखा दूँगा। बाजी मुस्कुराकर कहती - क्यों नहीं, तुम ज़रूर कभी बड़े शाइर बनोगे, अभी तो यह पान ले जाओ और बाहर दे आओ।

इसी उम्र में एक घटना यह है कि अब्बा बहराइच में थे, क़ज़लबाश स्टेट के मुख़्तार आम या पता नहीं क्या। वहाँ एक तरही मुशायरा हुआ। भाई साहबान लखनऊ से आए थे। बहराइच, गोण्डा, नानपारा और क़रीब-दूर के बहुत से शायर बुलाए गए थे। मुशायरे के अध्यक्ष "मानी जायसी" साहब थे। उनके शेर सुनने का एक खास तरीक़ा था कि वह शे’र सुनने के लिए अपनी जगह पर उकड़ूँ बैठ जाते और अपना सर दोनों घुटनों में दबा लेते और झूम-झूम कर शे’र सुनते और दाद देते। उस वक्त शायर सीनियरिटी से बिठाए जाते थे। एक छोटी-सी चौकी पर क़ालीन बिछा होता और गावतकिया लगा होता। जिस शायर की बारी आती वह इसी चौकी पर आकर एक तरह बहुत आदर से घुटनों के बल बैठता। मुझे मौका मिला तो मैं भी इसी तरह आदर से चौकी पर घुटनों के बल बैठकर अपनी ग़ज़ल जो "तरह" में थी, सुनाने लगा। "तरह" थी "मेहरबां होता, राज़दाँ होता"... वग़ैरह। मैंने एक शे’र पढा:

वह सबकी सुन रहे हैं सबको दाद-ए-शौक़ देते हैं,
कहीं ऐसे में मेरा क़िस्सा-ए-ग़म भी बयाँ होता!


मानी साहब को न जाने शे’र इतना क्यों पसन्द आया कि उन्होंने खुश होकर पीठ ठोंकने के लिए मेरी पीठ पर एक हाथ मारा। मैं चौंकी से ज़मीन पर आ रहा। मानी साहब का मुँह घुटनों में छिपा हुआ था इसलिए उन्होंने नहीं देखा कि क्या हुआ, झूम-झूमकर दाद देते रहे और शे’र दुबारा पढवाते रहे और मैं ज़मीन पर पड़ा-पड़ा शेर दुहराता रहा। यह पहला मुशायरा था जिसमें शायर की हैसियत से मैं शरीक़ हुआ। इस मुशायरे में मुझे जितनी दाद मिली उसकी याद से अब तक परेशान रहता हूँ। उस ज़माने में रोज़ ही कुछ न कुछ लिख किया करता था। कोई नौहा, कोई सलाम, कोई ग़ज़ल।

मेरी नज़्मों और गज़लों के अब तक चार संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं:
१. झंकार २. आखिर-ए-शब ३. आवारा सज्दे ४. इब्लिस की मज्लिस-ए-शूरा (दूसरा इज्लास)

आवारा सज्दे देवनागरी लिपि में मेरा पहला प्रकाशन है। यह मेरी कविताओं का प्रतिनिधित्व करता है। इसमें ‘झंकार’ की चुनी हुई चीज़ें भी हैं ‘आख़िर-शब’ की भी। ‘आवारा सज्दे’ मुकम्मल है। मेरी नज़्मों और ग़ज़लों के इस भरपूर संकलन के जरिए मेरे दिल की धड़कन उन लोगों तक पहुँचती है, जिनके लिए वह अब तक अजनबी थी। ’आवारा सज्दे’ की तारीफ़ कई खेमों में हुई। इसी किताब पर मुझे सोवियत लैण्ड नेहरू एवार्ड भी मिला। ’आवारा सज्दे’ पर मुझे साहित्य अकादमी ने भी इनाम दिया। मेरी पूरी साहित्यिक सेवा पर मुझे लोटस एवार्ड भी मिला।

कैफ़ी साहब यूँ तो अपनी क्रांतिकारी गज़लों और नज़्मों के लिए जाने जाते हैं लेकिन चूँकि यहाँ पर हम उनकी एक बड़ी हीं रूमानी गज़ल पेश करने जा रहे हैं तो क्या ना माहौल बनाने के लिए उनका यह शेर देख लिया जाए:

बरस पड़ी थी जो रुख़ से नक़ाब उठाने में
वो चाँदनी है अभी तक मेरे ग़रीब-ख़ाने में


और अब वक़्त है आज की गज़ल से पर्दा उठाने का। तो आज जिस गज़ल से हमारी यह महफ़िल सजने जा रही है, उसे हमने "प्यार का जश्न" एलबम से लिया है। रूप कुमार राठौर की मलाईदार आवाज़ में घुलकर यह गज़ल कुछ ज्यादा हीं मीठी हो गई है। यकीन नहीं होता तो आप खुद हीं आजमा लीजिए। यहाँ पर भले हीं हम यह गज़ल "ओडियो" रूप में आपके सामने पेश कर रहे हैं, लेकिन हम आपसे यह इल्तज़ा करेंगे कि आप इसे युट्युब पर ज़रूर देखें। आखिर "आमिर खान" और "गौरी कार्णिक" को एक-साथ देखने का मौका फिर कहाँ मिलेगा। हमें पूरा विश्वास है कि आपको यह गज़ल अवश्य पसंद आएगी:

जब भी चूम लेता हूँ इन हसीन आँखों को
सौ चिराग अंधेरे में झिलमिलाने लगते हैं।

फूल क्या, ____ क्या, चाँद क्या, सितारे क्या,
सब रक़ीब कदमों पर सर झुकाने लगते हैं।

फूल खिलने लगते हैं उजड़े-उजड़े गुलशन में,
प्यासी-प्यासी धरती पर अब्र छाने लगते हैं।

लम्हे भर को ये दुनिया ज़ुल्म छोड़ देती है,
लम्हे भर को सब पत्थर मुस्कुराने लगते हैं।




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "खयाल" और शेर कुछ यूँ था-

आते हैं ग़ैब से ये मज़ामी खयाल में
"ग़ालिब" सरीर-ए-ख़ामा नवा-ए-सरोश है

इस शब्द ने शायद शरद जी के कई सारे जज़्बात जगा दिए तभी तो शरद जी खयालों की दुनिया में ऐसे खोए कि ५-६ शेरों के बाद हीं उन्हें अपनी मदहोशी का इल्म हुआ। आपकी यह पेशकश हमें खूब पसंद आई:

रोज़ अखबारों में पढ़ कर ये ख़याल आया हमें,
इस तरफ़ आती तो हम भी देखते फ़स्ले-बहार । (दुश्यंत कुमार )

इसी ख़याल से मैं रात भर नहीं सोया,
ख्वाब में आके मुझे फिर से वो तड़पाएंगे । (स्वरचित)

कही बे-खयाल हो कर यूं ही छू लिया किसी ने
कई ख्वाब देख डाले यहाँ मेरी बे-खुदी ने ।

अवध जी, बड़ा हीं बेहतरीन शेर है ये। वाकई साहिर साहब की कलम का कोई जवाब नहीं:

आप आये तो ख्याल-ए-दिल-ए-नाशाद आया.
कितने भूले हुए ज़ख्मों का पता याद आया.

शन्नो जी, आपका इशारा किसकी तरफ़ है.. कहीं नीलम जी तो नहीं :) सच में दिल खोलकर रख दिया है आपने:

अदा का ख्याल क्या आयेगा उसको
जिसे खाकसारी से ही फुर्सत न हो.

मंजु जी, आपके शेरों में आपकी लगन, आपकी मेहनत , आपकी कोशिश झलकती है। मैं इसी का कायल हूँ।

ख़याल की महफिल में तुम जब -जब आए ,
अमावस्या भी पूर्णिमा -सी नजर है आए . (मेरे हिसाब से अमावस और पूनम ज्यादा अच्छे लगते.. )

मनु जी, जगजीत सिंह से आपकी कोई नाराज़गी है क्या। अगर नहीं तो ऐसी टिप्पणी का कारण? :)

उपासना जी (मल्लिका-ए-मक्तूब), आवाज़ पर आपके नक्श-ए-पा देखकर थोड़ी हैरत हुई तो बहुत सारा सुकून भी मिला... भले हीं बहाना "ग़ालिब" का हो, लेकिन जब एक बार आना हो हीं चुका है तो मेरे हिसाब से यह गलती बार-बार की जा सकती है :) क्या कहती हैं आप? और हाँ चचा ग़ालिब के लिए आपका यह शेर भी कमाल का है:

गुफ्तगू में रहे या ख़यालों में हो,
बात ये है कि वो यूँ ही दिल में रहे।

सीमा जी, बड़ी देर कर दी आपने इस बार। खैर.. दिल तो नहीं तोड़ा :) ये रहे आपके शेर:

मिस्ल-ए-ख़याल आये थे आ कर चले गये
दुनिया हमारी ग़म की बसा कर चले गये (फ़ानी बदायूनी )

जब कभी भी तुम्हारा ख़याल आ गया
फिर कई रोज़ तक बेख़याली रही (बशीर बद्र )

पूजा जी, चचा ग़ालिब पर आधारित यह छोटी-सी श्रृंखला पसंद करने के लिए आपका तह-ए-दिल से आभार। आपका यह शेर मैं तो समझ हीं गया था, हाँ आपने शब्दार्थ देकर बाकियों का भला ज़रूर किया है। :)

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Wednesday, January 6, 2010

नहीं मेरे बस में उसे भूल जाना.. इसरार अंसारी के बोलों के सहारे प्यार की कसमें खा रहे हैं रूप कुमार और सोनाली

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #६५

मारी यह महफ़िल इस बात की गवाह रही है कि आज तक सैकड़ों ऐसे फ़नकार हुए हैं जिनके सहारे या यूँ कहिए जिनके दम पर दूसरे फ़नकार संगीत की चोटी पर पहुँच गए, लेकिन उन्हें वह सब कुछ हासिल न हुआ जिनपर उनका पहला हक़ बनता था। अब आज की गज़ल को हीं ले लीजिए। ऐसे कम हीं लोग होंगे (न के बराबर) जिन्होंने इस गज़ल को सुना न होगा, लेकिन शायर को जानने वाला कोई इक्का-दुक्का हीं मिलेगा और वह भी मिल गया तो गनीमत है। वहीं अगर हम इस बात का जिक्र करें कि इस गज़ल को गाया किसने है तब तो जवाबों की झड़ी लग जाएगी..आखिरकार जो दिखता है वही बिकता है। हम यहाँ पर इस बात की वकालत नहीं कर रहे कि गायकों को हद से ज्यादा रूतबा हासिल होता है, बल्कि समाज की कचहरी में यह अर्जी देना चाहते हैं कि शायरों को बराबर न सही तो आधा हीं महत्व मिल जाए..उनके लिए यह हीं काफी होगा। अगर हम आपको यह कहें कि इस शायर ने हीं "ज़िंदगी मौत न बन जाए संभालो यारों(सरफ़रोश)", "आँखें भी होती है दिल की जुबां(हासिल)", "क्या मेरे प्यार में दुनिया को भूला सकते हो(मनपसंद)", आखिरी निशानी(जब दिल करता है पीते हैं)", "आपका मकान बहुत अच्छा है(हम प्यार तुम्हीं से कर बैठे)", "प्यार में चुप चुप के(मितवा)" जैसी गज़लें और नज़्में लिखी थीं, मेरा दावा है कि तब भी आप इन्हें पहचान न पाएँगे। अरे भाई, उदास मत होईये..इसमें आपकी कोई गलती नहीं, यह तो अमूमन हर शायर के साथ होता है, यही तो सच्चाई है शायरों की। आपको बता दें कि इस शायर को सबसे ज्यादा जिन दो फ़नकारों ने गाया है, आज हम उन्हीं की गज़ल लेकर इस महफ़िल में हाज़िर हुए हैं। तो राज़ को ज्यादा देर तक राज़ न रखते हुए, हमें यह बताने में बहुत खुशी हो रही है कि उस शायर का नाम है इसरार अंसारी और वे दोनों फ़नकार हैं रूप कुमार राठौर और सोनाली (आजकल सुनाली) राठौर। आपलोग रूप कुमार और सोनाली से तो बड़े अच्छे तरीके से वाकिफ़ होंगे तो क्या आप यह जानते हैं कि रूप कुमार गायक बनने से पहले अनुप जलोटा के साथ काम किया करते थे, उनके ग्रुप में तबला-वादक थे और सोनाली पहले सोनाली जलोटा हुआ करती थीं। आगे चलकर सोनाली... राठौर हो गईं और रूप कुमार गायक। इस घटना का असर इन दोनों परिवारों पर कितना हुआ, यह तो हमें नहीं पता लेकिन इतना पता है कि सोनाली के राठौर हो जाने से संगीत जगत का बड़ा फ़ायदा हुआ। जरा सोचिए तो..अगर यह न हुआ होता तो क्या हमें रूप कुमार-सोनाली मिलते और क्या ऐसी चाशनी में डूबी हुई गज़लें हमें सुनने को नसीब होतीं। नहीं ना? अब इनके बारे में हम कुछ कहें इससे अच्छा है कि इनकी कहानी इन्हीं की जुबानी सुन ली जाए। तो roopsunali.com से साभार हम ये सारी जानकारियाँ आपके लिए लेकर हाज़िर हुए हैं। मुलाहजा फरमाईयेगा।

यह इंटरव्यु तब का है जब गुलजार साहब की "हु तू तू" रीलिज होने वाली थी कि यानि कि १९९९ की बात है। अपने बारे में रूप कुमार कहते हैं: आज मैं फिल्मों के लिए कुछ चुनिंदा गाने गाकर हीं संतुष्ट हूँ। ज्यादातर वक्त मैं अपनी पत्नी सोनाली के साथ गैर फिल्मी एलबम की तैयारी में हीं व्यस्त रहता हूँ। मुझे खुशी इस बात की है कि बार्डर के बाद मुझे मनमुताबिक गाने का मौका मिल रहा है। रूटीन टाईप के गाने अब मेरे पास नहीं आ रहे। संगीतकार अब मेरी रेंज और मेरी रूचि को काफी हद तक समझने लगे हैं। यह मेरा बहुत बड़ा सौभाग्य है कि गुलज़ार, जावेद अख्तर, राहत इंदौरी जैसे गीतकारों के साथ काम करने का मुझे अवसर मिल रहा है। गुलज़ार साहब के "हु तू तू" में मैने चार गाने गाए हैं, चारों एक से बढकर एक हैं और चारों अलग-अलग मिजाज के हैं। चारों गाने नाना पाटेकर पर फिल्माए गए हैं। यह मेरे लिए एक दिलचस्प चुनौती रही है क्योंकि नाना कोई रोमांटिक या रेगुलर हीरो नहीं है। इन गीतों के नएपन का आलम यह है कि इसके एक गाने "बंदोबस्त है, बंदोबस्त" को मैंने कई बार अलग-अलग ढंग से गाया पर मज़ा नहीं आ रहा था। तब विशाल जी(विशाल भारद्वाज) ने मुझे दिलचस्प बात बताई। उन्होंने कहा कि कल नाना आए थे। उन्होंने पूरा गाना सुना है। उन्होंने कहा कि गाने का सिचुएशन ऐसा है कि लगना चाहिए कि गाने वाले के गले से खून टपक रहा है। यह सुनकर मैंने अपने आप को भुला दिया। मैंने तय किया कि भले हीं यह मेरा आखिरी गाना साबित हो लेकिन मैं वही मूड लाऊँगा जो नाना चाहते हैं। गाना सुनकर नाना ने मुझे गले से लगा लिया। यह मेरी सबसे बड़ी तारीफ़ थी। आजकल जैसे गाने मैं गा रहा हूँ, उन्हें देखकर यह कहा जा सकता है कि फिल्मी गानों के बारे में मेरी जो शास्त्रीय सोच थी मुझे वैसे हीं गाने मिल रहे हैं। मैं इसके लिखे खुद को खुशकिस्मत मानता हूँ। मैंने न सिर्फ़ फिल्मों और एलबमों में गाने गाए हैं, बल्कि कई धारावाहिकों में भी गाया है। श्याम बेनेगल की "भारत एक खोज" में मैने पारंपरिक ध्रुपद गाया है। उस्ताद अमजद अली खान के संगीत निर्देशन में धाराविक "गुफ्तगू" में गज़ल गाई है। संगीतकार वनराज भाटिया ने ध्यान के एक प्रयोगत्माक एलबम में मेरी आवाज़ इस्तेमाल की है। वीनस द्वारा जारी मेरा पहला एलबम "इशारा" काफी लोकप्रिय हुआ। इसकी एक गज़ल "वो मेरी मोहब्बत का गुजरा जमाना" (आज की गज़ल) तो आज भी गज़ल-प्रेमी गुनगुनाते हैं। इस एलबम में मेरे साथ सोनाली भी थी। वीनस द्वारा रीलिज किया गया "खुशबू" भी काफी पसंद किया गया। मेरा नया एलबम है "मितवा"। यह एलबम हमने दिल से बनाया है। हमें यकीन है कि यह हमारे प्रशंसकों के दिलों को उसी तरह धड़का देगा जिस तरह बनाते समय हमारे दिल धड़के हैं। इस पैराग्राफ़ की शुरूआत में हमने बार्डर की बात की। तो क्या आपको मालूंम है कि "संदेशें आते हैं" के लिए रूप कुमार जी को "बेस्ट सिंगर" की श्रेणी(शायद जी सिने अवार्ड्स) में नामांकित नहीं किया गया था। यह गाना भले हीं एक दोगाना हो लेकिन न जाने किस वज़ह से बस सोनू निगम को नामांकित किया गया। सोनू निगम पुरस्कार जीत भी गए..लेकिन उन्होंने इस पुरस्कार को लेने से मना कर दिया यह कहकर कि इस पुरस्कार पर दोनों का बराबर हक़ बनता है। नामांकित न होने से जहाँ रूप कुमार नाराज़ दिखे वहीं पुरस्कार नकारने पर सोनू निगम की काफी प्रशंसा की गई।........ अरे किन पुरानी यादों में खो गए हम। चलिए अब सोनाली राठोर की बारी है। अब उनसे भी रूबरू हो लिया जाए।

सोनाली कहती हैं: मेरी गायिकी का आधार शास्त्रीय गायन है। पर सच कहूँ तो बचपन में गायन की प्रति मेरा आकर्षण फिल्मी गानों के चलते हीं हुआ था। मेरी माँ लीना सेठ शास्त्रीय नृत्य के क्षेत्र में काफी नाम कमा चुकी थीं। दादा जी अमृतलाल सेठ गुजराती अखबार "जन्म-भूमि" के संपादक थे। जाहिर है कला और साहित्य का मुझपर गहरा प्रभाव था। उन दिनों मैं स्टेज पर रफ़ी जी और आशा जी के गाने खूब गाती थी। ऐसे हीं एक कार्यक्रम में हृदयनाथ मंगेशकर जी से मेरा परिचय माँ ने करवाया। दस साल की छोटी उम्र से मैं हृदयनाथ जी की शिष्या हूँ। शास्त्रीय गायन की तरफ मेरा झुकाव उन्हीं की वजह से हुआ। बीच में गले की खराबी की वज़ह से मैं गायन से दूर हो गई थी। तब उन्हीं ने सुझाव दिया कि मैं कोई साज बजाना शुरू कर दूँ। मैंने सितार बजाने में अपना सारा ध्यान लगा दिया। आज जबकि ईश्वर की दुआ से मैं फिर गा रही हूँ तो सितार बजाना मैंने छोड़ दिया है। मुझे पहली बार शोहरत मिली गुजराती गानों की एक डिस्क से, जिसका संगीत संयोजन पुरूषोत्तम उपाध्याय ने किया था। १९८५ में मेरा पहला गज़ल एलबम "आगाज़" रीलिज हुआ। इस एलबम की सफलता के बाद मेरे पाँच एलबम "भजन-कलश", "दिलकश", "खजाना-८५", "भजन-यात्रा-८६" और "शबनम" रीलिज हुए। मैंने धारावाहिक "जान-ए-आलम" और "बहादुर शाह ज़फ़र" के लिए भी गाया। १९८६ में मुझे अमीरात इंटरनेशनल की ओर से सर्वश्रेष्ठ गज़ल-गायिका का पुरस्कार मिला। मैंने गुजराती के आधुनिक गानों के एक एलबम "मोगरा नो फूल" में भी गाने गाए। हिन्दी फिल्मों में मैंने "बार्डर" के लिए "हिन्दुस्तान-हिन्दुस्तान" गाया था, लेकिन चूँकि उसे फिल्म से काट दिया गया इसलिए उसकी ज्यादा चर्चा न हो सकी। मेरे पति रूप एक बहुत अच्छे गायक हैं। हम दोनों मोहब्बत से भरी गज़लें सिर्फ़ गाते हीं नहीं हैं, उन्हें वास्तविक जीवन में जीते भी हैं। सोनाली जी के बारे में इस तरह हमें बहुत कुछ जानने को मिला। अभी और भी ऐसी चीजें हैं जो हम आपसे शेयर करना चाहते हैं, लेकिन वो सब फिर कभी। अभी तो हम बढते हैं आज की गज़ल की ओर। उससे पहले आज के गज़लगो के चंद शेरों पर गौर फरमा लिया जाए। यह करना इसलिए भी लाजिमी हो जाता है क्योंकि इसके अलावा हम इनके सम्मान में और कुछ कर भी नहीं सकते हैं। तो यह रही वो पेशकश:

दामन मे कंकड़ों के अंबार हैं तो क्या है,
बन जाएँगे ये गौहर अल्लाह के सहारे।

तय कर लिया समंदर अल्लाह के सहारे,
बदला मेरा मुकद्दर अल्लाह के सहारे।


इन दो शेरों के बाद हम रूख करते हैं आज की गज़ल की ओर। इस गज़ल को हमने लिया है "रूप कुमार-सोनाली" के पहले एलबम "इशारा" से। यह गज़ल तब भी बड़ी मकबूल थी और आज भी उतनी हीं मकबूल है। और हो भी क्यों न जब असल ज़िंदगी के जोड़ीदार गज़ल में अपनी ज़िंदगी को पिरो रहे हों..। जमाने-भर की रूमानियत मखमली आवाज़ के बहाने ओठों से टपक न पड़े तो और क्या हो.. क्या कहते हैं आप? और हाँ सुनते-सुनते आप इसरार साहब के बोलों को गुनना मत भूल जाईयेगा:

वो मेरी मोहब्बत का गुजरा जमाना,
नहीं मेरे बस में उसे भूल जाना।

हवा, तेज बारिश, वो तूफ़ां की आमद,
और ऐसे में भी तेरा वादा निभाना।
नहीं मेरे बस में उसे भूल जाना॥

समुंदर किनारे वो रेतों पे अक्सर,
मेरा नाम लिखना, लिखके मिटाना।
नहीं मेरे बस में उसे भूल जाना॥

कुछ ऐसी अदा से तेरा देख लेना,
बिना कुछ पिए हीं मेरा लड़खड़ाना।
नहीं मेरे बस में उसे भूल जाना॥

वो एकबार तेरी _____ से तौबा,
मेरा रूठ जाना तेरा मनाना।
नहीं मेरे बस में उसे भूल जाना॥




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "कुदरत" और शेर कुछ यूं था -

खुसरो कहै बातें ग़ज़ब, दिल में न लावे कुछ अजब
कुदरत खुदा की है अजब, जब जिव दिया गुल लाय कर।

सीमा जी ने सबसे पहले इस शब्द को पहचाना। ये रहे वो शेर जो आपने महफ़िल में पेश किए:

वो आये घर में हमारे ख़ुदा की कुदरत है
कभी हम उन को कभी अपने घर को देखते हैं (ग़ालिब)

चश्म्-ए-मयगूँ ज़रा इधर कर दे
दस्त-ए-कुदरत को बे-असर कर दे (फ़ैज़ अहमद फ़ैज़)

जिस्म के ज़िन्दाँ में उम्रें क़ैद कर पाया है कौन.
दख्ल कुदरत के करिश्मों में भला देता है कौन. (ज़ैदी जाफ़र रज़ा)

नीलम जी और निर्मला जी, यह आप लोगों का प्यार हीं है जो हमें प्रोत्साहित करता रहता है और फिर हमें भी तो हर बार किसी न किसी भूल-बिछड़े(गीत) को जानने का मौका मिल जाता है। बस यही आग्रह है कि आप लोग यह स्नेह हमेशा बरकरार रखिएगा।

मंजु जी, शायद यह आपका स्वरचित शेर हीं है। है ना?

कुदरत की महिमा की नहीं है मिसाल ,
सृष्टि में भरे हैं रंग बेमिसाल .

अवध जी, किस शायर के नाम यह शेर डालूँ? :) स्वरचित हो तो स्वरचित डाल दें बगल में नहीं तो शायर का हीं जिक्र कर दें...हमें सहुलियत होगी:

कुछ ऐसी प्यारी शक्ल मेरे दिलरुबा की है.
जो देखता है कहता है कुदरत ख़ुदा की है

शामिख जी, इतनी देर कहाँ लगा दी आपने? समय का ख्याल रखा करें और आप तो कभी हमारी महफ़िल की शोभा हुआ करते थे..क्या हुआ? अगली बार से ध्यान रखिएगा :) यह रही आपकी पेशकश:

कुदरत ने देखो पत्तों को
है एक नया परिधान दिया
दुल्हन जैसे करके श्रृंगार
सकुची शरमाई है
क्या पतझड़ आया है? (तेजेन्द्र शर्मा)

खेत, शजर, गुल बूटे महके, पग—पग पर हरियाली लहके
लफ़्ज़ों में क्या रूप बयाँ हो कुदरत के इस पैराहन का (सुरेश चन्द्र)

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Thursday, October 22, 2009

शुक्रान अल्लाह वल हम्दुल्लाह....खुदा की नेमतों पर झुके सोनू निगम, श्रेया और सलीम के स्वर

ताजा सुर ताल TST (32)

दोस्तों, ताजा सुर ताल यानी TST पर आपके लिए है एक ख़ास मौका और एक नयी चुनौती भी. TST के हर एपिसोड में आपके लिए होंगें तीन नए गीत. और हर गीत के बाद हम आपको देंगें एक ट्रिविया यानी हर एपिसोड में होंगें ३ ट्रिविया, हर ट्रिविया के सही जवाब देने वाले हर पहले श्रोता की मिलेंगें 2 अंक. ये प्रतियोगिता दिसम्बर माह के दूसरे सप्ताह तक चलेगी, यानी 5 अक्टूबर से 14 दिसम्बर तक, यानी TST के 40 वें एपिसोड तक. जिसके समापन पर जिस श्रोता के होंगें सबसे अधिक अंक, वो चुनेगा आवाज़ की वार्षिक गीतमाला के 60 गीतों में से पहली 10 पायदानों पर बजने वाले गीत. इसके अलावा आवाज़ पर उस विजेता का एक ख़ास इंटरव्यू भी होगा जिसमें उनके संगीत और उनकी पसंद आदि पर विस्तार से चर्चा होगी. तो दोस्तों कमर कस लीजिये खेलने के लिए ये नया खेल- "कौन बनेगा TST ट्रिविया का सिकंदर"

TST ट्रिविया प्रतियोगिता में अब तक-

पिछले एपिसोड में फिर एक बार सीमा जी छाई रही, पर जवाब बस दो ही सही दिए उन्होंने, खैर आपका स्कोर हुआ 20. यदि किसी ने तीसरे जवाब के लिए कोशिश किया होता तो यकीनन दो अंक मिल सकते थे, तीसरे सवाल का सही जवाब है गीतकार प्रवीण भारद्वाज. अगले 9 एपिसोड में 18 सवाल और आयेंगें आपके सामने, उसके बाद विजेता कौन होगा ये तो हम अभी से नहीं कह सकते, पर ये तय है कि सीमा जी को टक्कर देना अब वाकई बहुत मुश्किल होगा. पर चुनौतियाँ आपको मजबूत बनाती है, तो कमर कसिये इन नयी चुनौतियों के लिए

सुजॉय - सजीव, आज TST में तरोताज़ा क्या सुनवाने जा रहे हैं?

सजीव - धर्मा प्रोडक्शन्स् की नवीन प्रस्तुति 'क़ुर्बान' फ़िल्म के गीत से आज हम शुरुआत कर रहे हैं। करण जोहर निर्मित, रेन्सिल डी'सिल्वा निर्देशित इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार हैं सैफ़ अली ख़ान और करीना कपूर।

सुजॉय - मैने सुना है इस फ़िल्म की कहानी जिहाद पर आधारित है। आप ने सुना है कुछ इस बारे में?

सजीव - सुना तो मैने भी यही है। सैफ ने एक ताजा बयान में कहा है कि एक मुसलमान हो कर इस फिल्म को करने में उन्हें गर्व है और उनके साथ करीना का होना भी लोगों में दिलचस्पी पैदा करेगा. फ़िल्म के संगीत में सुफ़ियाना अंदाज़ है। पता है कौन हैं इस फ़िल्म के संगीतकार?

सुजॉय - हाँ, सलीम-सुलेमान की जोड़ी ने संगीत दिया है। इस फ़िल्म के कुल पाँच गीतों में से आज कौन सा गीत आप लेकर आए हैं?

सजीव - आज जो गीत हम सुनेंगे वो मेरे ख़याल से इस ऐल्बम का सब से अच्छा गीत है, "शुक्रां अल्लाह"। इस गीत को सुनते हुए तुम्हे फ़िल्म 'फ़ना' के गीत "सुभानल्लाह सुभानल्लाह" की शायद याद आए।

सुजॉय - एक मिनट सजीव, 'फ़ना' का बैकग्राउंड म्युज़िक सलीम-सुलेमान ने ही बनाया था न?

सजीव - बिल्कुल, और मैने तो यह भी सुना है कि "सुभानल्लाह" वाली धुन भी इसी जोड़ी ने बनाई थी जिसे जतिन-ललित ने इस्तेमाल की अपनी धुन "चाँद सिफ़ारिश जो करता हमारी" के साथ। यानी कि "सुभानल्लाह" वाली धुन सलीम-सुलेमान की थी और "चाँद सिफ़ारिश" वाली जगह जतीन-ललित की।

सुजॉय - सोनू निगम, श्रेया घोषाल और सलीम मर्चैंट ने गाया है 'कुर्बान' का यह गीत। ऐज़ युज़ुयल सोनू और श्रेया के नर्म और मासूम अंदाज़ इस गीत में भी सुनाई देती है। और सलीम ने इस गीत में जिस तरह से "शुक्रन अल्लाह" वाली जगह गाया है, एक पाक़ समां सा बंध जाता है।

सजीव - और गीतकार निरंजन अय्यंगर ने लिखा भी है बढ़िया इस गीत को। तो चलो सुनते हैं यह गीत

सुजॉय - चलते चलते बता दें कि "शुक्रां अल्लाह वल हम्दुल्लाह" का मतलब है है- खुदा तेरा शुक्रिया खुदा तेरा करम है....और श्रेय घोषाल अवश्य ही इन दिनों ये मंत्र दोहरा रही होंगी, कल राष्ट्रपति भवन में उन्हें तीसरी बार सर्वश्रेष्ठ गायिका का सम्मान दिया गया, और उन्होंने वहां "ये इश्क हाय" गाकर सबको मन्त्र मुग्ध कर दिया, श्रेया को बधाई देते हुए सुनें उनका ये नया गीत.

शुक्रान अल्लाह (कुर्बान)
आवाज़ रेटिंग - ****1/2



TST ट्रिविया # 16- तुलिप जोशी अभिनीत किस "रियलिस्टिक" फिल्म में सलीम सुलेमान ने संगीत दिया था.?

सुजॉय - वाक़ई बहुत अच्छा गाना था। अब किस गीत की बारी?

सजीव - इस हफ़्ते रिलीज़ हुई है फ़िल्म 'ब्लू'। काफ़ी उत्सुकता से लोग इस फ़िल्म का इंतेज़ार कर रहे थे। तो क्यों ना इसी फ़िल्म से एक और गीत हम अपने श्रोताओं को सुनवाएँ!

सुजॉय - बिल्कुल सुनवाते हैं। लेकिन पहले यह बताइए कि आप ने यह फ़िल्म देखी है? मैने तो नहीं अभी नहीं देखी लेकिन मेरे दफ़्तर के दोस्तों ने देखी है और अफ़सोस की बात है कि लोगों को फ़िल्म कुछ ख़ास पसंद नहीं आ रही है।

सजीव - मैंने भी प्रशेन की समीक्षा पढ़ी तो मन ही नहीं हुआ फिल्म देखने का. यह वाक़ई अफ़सोस की बात है! बॉलीवुड की सब से महँगी फ़िल्म अगर पिट जाए तो अफ़सोस के साथ साथ हैरत भी होती है। लेकिन इस तरफ़ के हादसे पहले भी हुए हैं। याद है ९० के दशक में अनिल कपूर और श्रीदेवी की एक फ़िल्म आयी थी 'रूप की रानी चोरों का राजा', जो उस ज़माने की सब से महँगी फ़िल्म थी और कितनी बुरी से पिटी थी?

सुजॉय - बिल्कुल याद है सजीव। लेकिन अभी 'ब्लू' के बारे में किसी निश्कर्ष पर पहुँचना जल्द बाज़ी होगी। कई बार ऐसा भी देखा गया है कि फ़िल्म दूसरे या तीसरे सप्ताह से तेज़ी पकड़ लेती है और फिर हिट हो जाती है। वैसे खबर है कि इस फिल्म की टीम ने ब्लू का दूसरा भाग बनाने की योजना को भी अंतिम रूप दे दिया है, इसमें ज्यादा खतरनाक शार्क मछलियाँ होंगी, यानी बजट भी और खतरनाक... ख़ैर, अब बताइए कौन सा गीत हम बजा रहे हैं?

सजीव - यह है विजय प्रकाश और श्रेया घोषाल का गाया "फ़िक़राना होके हम जीयें"। ए. आर. रहमान ने काफ़ी इलेक्ट्रॊनिक्स का इस्तेमाल किया है।

सुजॉय - गाना बुरा नहीं है, लेकिन मुझे कहीं ऐसा लगता है कि ज़्यादा इलेक्ट्रॊनिक्स के इस्तेमाल से गीत में शार्पनेस तो आई है लेकिन गोलाई कहीं दूर चली गई है। बहुत ज़्यादा कृत्रिम सुनाई देता है।

सजीव - तुम्हारी बात सही है, लेकिन एक नयापन भी है गीत में। रहमान ने कम से कम अपने आप को उस वृत्त से बाहर निकालना चाहा जिसके अंदर वो कुछ सालों से फँस गए थे और एक ही तरह का संगीत उनकी तरफ़ से आ रहे थे। पर वाद्यों का शोर इस हद तक हावी है कि कई जगह तो शब्द समझ ही नहीं आते. वैसे धुन ऐसी है कि आप गुनगुना सकें.

सुजॉय - तो चलिए सुनते हैं यह गीत।

फिकराना (ब्लू)
आवाज़ रेटिंग - ***



TST ट्रिविया # 17- किस संगीत कंपनी ने "ब्लू" का एल्बम रीलिस किया है ?

सुजॉय - और अब आज के तीसरे और अंतिम गीत की बारी। कौन सा गीत है?

सजीव - फ़िल्म 'लंदन ड्रीम्स' के चार गानें हमने सुने हैं, आज इसी फ़िल्म के पाँचवे गीत की बारी। इस फ़िल्म में वैसे कुल ८ गानें हैं, और हर एक में कुछ ना कुछ बात ज़रूर है, और शायद इसी वजह से हम इस फ़िल्म के गानें सुनते और सुनवाते चले जा रहे हैं।

सुजॉय - फ़िल्म की कहानी भी शायद रॊक बैंड पर आधारित है। सलमान ख़ान और अजय देवगन की दोस्ती नज़र आएगी इस फ़िल्म में। 'हम दिल दे चुके सनम' के बाद शायद इसी फ़िल्म में ये दोनों साथ साथ नज़र आएँगे। अच्छा, आज किस गीत को आप चुन लाए हैं?

सजीव - "बरसो रे", जिसे गाया है विशाल दादलानी और रूप कुमार राठौड़ ने। याद दिला दूँ कि इस फ़िल्म में विशाल-शेखर का नहीं बल्कि शंकर अहसान लॉय का संगीत है।

सुजॉय - यह आप ने अच्छी बात की तरफ़ इशारा किया है। एक संगीतकार का किसी दूसरे संगीतकार से अपनी फ़िल्म में गानें गवाना बहुत बड़ी और स्पोर्टिंग्‍ स्पिरिट वाली बात होती है। विशाल से राजेश रोशन तक ने गानें गवाए हैं फ़िल्म 'क्रेज़ी फ़ोर' में।

सजीव - शायद इसी वजह से कि बहुत दम है विशाल की आवाज़ में। एक जो रॉक की फ़ील होती है न, उसे हर गायक नहीं निभा सकते। विशाल और के.के जैसे गायक आज के दौर में इस तरह के रॊक शैली के गीतों को बख़ूबी निभाते हैं। वैसे मैं व्यक्तिगत तौर पर इनकी आवाज़ का कायल नहीं हूँ, पर लगता है हमारे सभी संगीतकार उनके जबरदस्त फैन बन चुके हैं.

सुजॉय - हाँ, और इस गीत में भी वही रॉक अंदाज़ है। पर्काशन और माडर्न साज़ों का भरपूर इस्तेमाल हुआ है। पूरे जोश और ज़िंदादिली से इस गीत को हर एक कलाकार ने निभाया है। बेशक़ इस गीत को युवा पीढ़ी को आकृष्ट करने के लिए बनाया गया होगा। जैसे जैसे गीत आगे बढ़ती है, उसमें देसीपन बढ़ती चली जाती है। और तब देती है सुनाई रूप कुमार राठौड़ की आवाज़ और एक नाज़ुकी सी छा जाती है गीत में।

सजीव - और अंत में एक बार फिर से वही रॉक अंदाज़। रॉक होते हुए भी गीत समाप्त होता है "हनुमान की जय" के साथ। और यही अंतिम हिस्सा इस गीत एक साधारण गीत ख़ास बना देता है तो चलो सुनते हैं यह गीत। ये गानें हम पहली पहली बार सुन रहे हैं, इसलिए शायद एक ही बार में बहुत अच्छा ना लगे सुनने में, लेकिन धीरे धीरे हो सकता है कि हमारे कानों से होते हुए ये दिल में भी जगह बना लें। देखते हैं क्या होता है, फिलहाल सुनते हैं यह गीत

बरसो (लन्दन ड्रीम्स)
आवाज़ रेटिंग -****



TST ट्रिविया # 18- लन्दन ड्रीम्स के निर्देशक ने अपनी एक हिट फिल्म में एक मशहूर होली गीत फिल्माया था, कौनसा था ये गीत और कौन थे इस गीत के संगीतकार ?

आवाज़ की टीम ने इन गीतों को दी है अपनी रेटिंग. अब आप बताएं आपको ये गीत कैसे लगे? यदि आप समीक्षक होते तो प्रस्तुत गीतों को 5 में से कितने अंक देते. कृपया ज़रूर बताएं आपकी वोटिंग हमारे सालाना संगीत चार्ट के निर्माण में बेहद मददगार साबित होगी.

शुभकामनाएँ....



अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं. क्या आप को भी आजकल कोई ऐसा गीत भा रहा है, जो आपको लगता है इस आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए तो हमें लिखे.

Monday, June 29, 2009

रूप कुमार राठोड और साधना सरगम के युगल स्वरों का है ये -"वादा"

बात एक एल्बम की (10)
फीचर्ड एल्बम ऑफ़ दा मंथ - वादा
फीचर्ड आर्टिस्ट ऑफ़ दा मंथ - उस्ताद अमजद अली खान, गुलज़ार, रूप कुमार राठोड, साधना सरगम.


बात एक एल्बम की में इस माह हम चर्चा कर रहे हैं चार बड़े फनकारों से सजी एल्बम "वादा' के बारे में. गीतकार गुलज़ार और संगीतकार उस्ताद अमजद अली खान साहब के बारे में हम बात कर चुके हैं, आज जिक्र करते हैं इस एल्बम के दो गायक कलाकारों का. इनमें से एक हैं शास्त्रीय संगीत के अहम् स्तम्भ माने जाने वाले पंडित चतुर्भुज राठोड के सुपुत्र और श्रवण राठोड (नदीम श्रवण वाले) और विनोद राठोड के भाई, जी हाँ हम बात कर रहे हैं गायक और संगीतकार रूप कुमार राठोड की. अपने पिता (जिन्हें इंडस्ट्री में कल्याणजी आनंदजी और गायक अनवर के गुरु भी कहा जाता है) के पदचिन्हों पर चलते हुए रूप ने तबला वादन सीखने से अपना संगीत सफ़र शुरू किया. पंकज उधास और अनूप जलोटा के साथ उन्होंने संगत की. श्याम बेनेगल की "भारत एक खोज" में भी उन्होंने तबला वादन किया. १९८४ में अपने इस जूनून को एक तरफ रख उन्होंने गायन की दुनिया में खुद को परखने का अहम् निर्णय लिया ये एक बड़ा "यु-टर्न" था उनके जीवन का. उस्ताद नियाज़ अहमद खान से तालीम लेकर उन्होंने ग़ज़ल गायन से शुरुआत की. पार्श्व गायन में उन्हें लाने का श्रेय जाता है संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत प्यारेलाल को, जिन्होंने शशि लाल नायर की फिल्म "अंगार" में उन्हें गाने का मौका दिया. पर असली सफलता उन्हें मिली फिल्म "बॉर्डर" के साथ. अनु मालिक के संगीत निर्देशन में "तो चलूँ" और "संदेसे आते हैं" गीतों ने उन्हें कमियाबी का असली स्वाद चखाया, अनु के साथ उसके बाद भी उन्होंने बहुत बढ़िया और लोकप्रिय गीतों को अपनी आवाज़ से सजाया. "ले चले डोलियों में तुम्हें", "मौला मेरे" और "तुझमें रब दिखता है" उनकी आवाज़ में ढले कुछ ऐसे गीत हैं जिन्हें सुनकर लगता है कि इन्हें इतना सुंदर कोई और गायक गा ही नहीं सकता था. प्राइवेट अल्बम्स में भी उन्होंने जम कर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया है. हमारी फीचर्ड एल्बम "वादा" भी इसका अपवाद नहीं है. यकीन न हो तो सुनिए हलकी फुल्की शरारतों और छेड़ छाड़ से गुदगुदाता ये नगमा -

चोरी चोरी की वो झाँखियाँ...


और ये सुनिए मखमली एहसासों से सजे गुलज़ार साहब के "ट्रेड मार्क" शब्दों में गुंथे इस गीत को -
ये सुबह साँस लेगी....


एल्बम वादा से रूप कुमार की आवाज़ में ये नायाब गीत भी हैं -

ऐसा कोई जिंदगी से वादा तो नहीं था...
डूब रहे हो और बहते हो...
रोजे-अव्वल से ही आवारा हूँ....

बढ़ते हैं इस एल्बम के चौथे फनकार की तरफ. इससे पहले की हम उनके बारे में कुछ कहें सुनिए इसी एल्बम से उनकी आवाज़ में ये दर्द भरी ग़ज़ल -

आँखों की हिचकी रूकती नहीं है,
रोने से कब गम हल्का हुआ है...

सीने में टूटी है चीज़ कोई,
खामोश सा एक खटका हुआ है....


वाह.... सुनिए आँखों में सावन अटका हुआ है.....


ये मधुर और चैन से भरी आवाज़ है साधना सरगम की. एक ऐसी गायिका जिनकी आवाज़ और कला का हमारी फिल्म इंडस्ट्री में कभी भी भरपूर इस्तेमाल नहीं हुआ. पंडित जसराज की इस शिष्या में गजब की प्रतिभा है और उनके कायल संगीतकार ए आर रहमान भी हैं. एक ताज़ा साक्षात्कार में रहमान में स्वीकार किया कि वही एकमात्र भारतीय गायिका हैं जो हमेशा उन्हें उम्मीद से बढ़कर परिणाम देती है अपने हर गीत में. इन पक्तियों के लेखक की राय में भी लता मंगेशकर की गायन विरासत को यदि कोई गायिका निभा पायी है तो वो साधना सरगम ही है. फिल्म "लगान" के गीत "ओ पालनहारे" एल्बम में लता की आवाज़ में है पर फिल्म के परदे पर नायिका के लिए साधना की आवाज़ का इस्तेमाल हुआ है, और देखिये लता जी गाये मुखड़े के बाद साधना की आवाज़ में अंतरा आता है और लगता है जैसे दोनों आवाजें एक दूजे में घुल-मिल ही गयी हों. रहमान ने उस साक्षात्कार में यह भी कहा कि वो हर बार अपनी गायिकी से मुझे चौका देती है. वो दिए हुए निर्देशों से भी बढ़कर हर गीत में कुछ ऐसा कर जाती है कि गीत एक स्तर और उपर हो जाता है. चलिए सुनते हैं साधना की आवाज़ में एक और गीत इसी एल्बम से -

सारा जहाँ चुप चाप है....


और अब सुनिए रूप कुमार और साधना सरगम की युगल आवाजों में ये शानदार गीत -
हर बात पे हैरान है....(उस्ताद अमजद अली खान साहब ने इस गीत में एक कश्मीरी लोक धुन का खूबसूरत सामंजस्य किया है)


एल्बम वादा के अन्य गीत यहाँ सुनें -

दिल का रसिया...
ऐसा कोई -(सरोद पर)



"बात एक एल्बम की" एक मासिक श्रृंखला है जहाँ हम बात करेंगे किसी एक ख़ास एल्बम की, एक एक कर सुनेंगे उस एल्बम के सभी गीत और जिक्र करेंगे उस एल्बम से जुड़े फनकार/फनकारों की.यदि आप भी किसी ख़ास एल्बम या कलाकार को यहाँ देखना सुनना चाहते हैं तो हमें लिखिए.

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