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Wednesday, March 7, 2012

"नीले गगन के तले धरती का प्यार पले" - कैसे न बनती साहिर और रवि की सुरीली जोड़ी जब दोनों की राशी एक है!!

मशहूर गीतकार - संगीतकार जोड़ियों में साहिर लुधियानवी और रवि की जोड़ी ने भी फ़िल्म-संगीत के ख़ज़ाने को बेशकीमती रत्नों से समृद्ध किया है। कैसे न बनती यह अनमोल जोड़ी जब दोनों की जन्मतिथि लगभग साथ-साथ हैं? ३ मार्च को रवि और ८ मार्च को साहिर के जन्मदिवस को ध्यान में रखते हुए आज 'एक गीत सौ कहानियाँ' की दसवीं कड़ी में चर्चा इस जोड़ी की एक कलजयी रचना की, सुजॉय चटर्जी के साथ...


एक गीत सौ कहानियाँ # 10


फ़िल्म जगत में गीतकार-संगीतकार की जोड़ियाँ शुरुआती दौर से ही बनती चली आई हैं। उस ज़माने में भले स्टुडियो कॉनसेप्ट की वजह से यह परम्परा शुरु हुई हो, पर स्टुडियो सिस्टम समाप्त होने के बाद भी यह परम्परा जारी रही और शक़ील-नौशाद, शलेन्द्र-हसरत-शंकर-जयकिशन, मजरूह-नय्यर, मजरूह-सचिन देव बर्मन, साहिर-सचिन देव बर्मन, साहिर-रवि, गुलज़ार-पंचम, समीर-नदीन-श्रवण, स्वानन्द-शान्तनु जैसी कामयाब गीतकार-संगीतकार जोड़ियाँ हमें मिली। इस लेख में आज चर्चा साहिर-रवि के जोड़ी की। कहा जाता है कि जिन लोगों की राशी एक होती हैं, उनके स्वभाव में, चरित्र में, कई समानतायें पायी जाती हैं और एक राशी के दो लोगों में मित्रता भी जल्दी हो जाती है। यह बात ध्रुव सत्य हो न हो, पर अगर गीतकार साहिर लुधियानवी और संगीतकार रवि के लिए यह बात कही जा रही हो तो ग़लत नहीं लगता। रवि का जन्म ३ मार्च १९२६ में हुआ था और साहिर का ८ मार्च १९२१ को। अर्थात् साहिर रवि से ५ साल बड़े थे। मीन राशी वाले ये दोनों कलाकारों का फ़िल्मकार बी. आर. चोपड़ा के माध्यम से सम्पर्क हुआ और दोनों की जोड़ी बेहद कामयाब रही।

बी. आर. चोपड़ा से पहले भी रवि बहुत सी फ़िल्मों में संगीत दे चुके थे जिनमें देवेन्द्र गोयल की फ़िल्में प्रमुख थीं, पर रवि के करीयर का सफल मोड़ बी. आर. चोपड़ा ही ले आए और रवि का स्तरीय साहित्यिक संगीत हमें चोपड़ा कैम्प की फ़िल्मों में ही सुनने को मिला। रवि से पहले चोपड़ा कैम्प के गीतकार-संगीतकार हुआ करते थे साहिर लुधियानवी और एन. दत्ता। इनके बाद रवि का आगमन हुआ और साहिर-रवि की जोड़ी बनी। 'गुमराह' (१९६३), 'वक़्त' (१९६५), 'हमराज़' (१९६७), 'आदमी और इंसान' (१९६९) जैसी फ़िल्मों के गानें चोपड़ा कैम्प में बने तो चोपड़ा कैम्प के बाहर भी सातवें दशक में साहिर और रवि की जोड़ी ने कई फ़िल्मों में नायाब गानें तैयार किए जिनमें 'बहू बेटी' (१९६५), 'काजल' (१९६५), 'आँखें' (१९६५), 'नील कमल' (१९६५), 'दो कलियाँ' (१९६५) शामिल हैं। चोपड़ा कैम्प में बनने वाली फ़िल्मों में रवि ने मुख्य रूप से पहाड़ी और राग भूपाली का प्रयोग करते हुए बहुत ही सुरीली रचनाएँ बनाईं और साहिर के शाब्दिक सौंदर्य ने उन धुनों में जान डाल दी। 'गुमराह' के "इन हवाओं में इन फ़िज़ाओं में", "ये हवा ये फ़िज़ा ये हवा" और 'वक़्त' के "कौन आया कि निगाहों में चमक जाग उठी", "दिन हैं बहार के", "हम जब सिमट के आपकी बाहों में आ गए", "आगे भी जाने न तू" जैसे गीत इस बात का उदाहरण है। 'हमराज़' के "नीले गगन के तले धरती का प्यार पले" गीत में तो पहाड़ी और भूपाली, दोनों के सुरों का मिश्रण सुनाई दे जाता है। प्रकृति की सुषमा का इस गीत से बेहतर फ़िल्मी संस्करण और दूसरा नहीं हो सकता।


"नीले गगन के तले, धरती का प्यार पले, ऐसे ही जग में, आती हैं सुबहें, ऐसे ही शाम ढले", यह न केवल साहिर और रवि की जोड़ी का मील का पत्थर सिद्ध करने वाला गीत रहा, बल्कि इसके गायक महेन्द्र कपूर को भी इस गीत के लिए सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायक का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला था और फ़िल्म 'हमराज़' के गानें शायद महेन्द्र कपूर के करीयर के सबसे महत्वपूर्ण गीत साबित हुए। चोपड़ा कैम्प में शुरु शुरु में रफ़ी साहब ही गाया करते थे। महेन्द्र कपूर के मैदान में उतरने के बाद कुछ गीत उनसे भी गवाए जाने लगे। कहा जाता है कि १९६१ की फ़िल्म 'धर्मपुत्र' के एक क़व्वाली को लेकर रफ़ी साहब से हुए मनमुटाव के बाद बी. आर. चोपड़ा ने आने वाली सभी फ़िल्मों के लिए बतौर गायक महेन्द्र कपूर का चयन कर लिया। रफ़ी साहब की जगह महेन्द्र कपूर को लेकर न बी. आर. चोपड़ा पछताए और महेन्द्र कपूर को भी कुछ लाजवाब गीत गाने को मिले जो अन्यथा रफ़ी साहब की झोली में चले गए होते।

फ़िल्म 'हमराज़' के इस गीत की खासियत यह है कि यह गीत अन्य गीतों की तरह मुखड़ा-अंतरा-मुखड़ा शैली में नहीं रचा गया है। हर अंतरा भी एक मुखड़ा जैसा ही लगता है।

नीले गगन के तले, धरती का प्यार पले,
ऐसे ही जग में, आती हैं सुबहें, ऐसे ही शाम ढले।

शबनम के मोती, फूलों पे बिखरे, दोनों की आस फले,
नीले गगन के तले, धरती का प्यार पले।

बलखाती बेलें, मस्ती में खेलें, पेड़ों से मिलके गले,
नीले गगन के तले, धरती का प्यार पले।

नदिया का पानी, दरिया से मिलके, सागर की ओर चले,
नीले गगन के तले, धरती का प्यार पले।



कितनी सादगी, कितनी सुन्दरता, कितनी सच्चाई है इन शब्दों में। बस एक सुरीली धुन, और कुछ सीधे-सच्चे बोल ही कैसे एक गीत को अमरत्व प्रदान कर देती है यह गीत इस बात का प्रमाण है। यह गीत भले धुन पे लिखा गया हो पर सुनने में आता है कि साहिर साहब यह बिल्कुल पसंद नहीं करते थे कि धुन पहले बना ली जाए और बोल बाद में लिखे जाए। रवि साहब से जब इसी बात की पुष्टि करने को कहा गया तो उन्होंने बताया, "यह मुझे पता नहीं पर एक बार फ़िल्म 'हमराज़' में ऐसा एक गाना बना था जिसका सिचुएशन कुछ ऐसा था कि पहाड़ों में गीत गूंज रहा है। तो मैंने उनको एक धुन सुनाया और कहा कि यह पहाड़ी धुन जैसा लगेगा और इसको हम गाने के रूप में डाल सकते हैं फ़िल्म में। अगले दिन वे गीत लिखकर ले आए "नीले गगन के तले धरती का प्यार पले"। इस गीत में कोई अंतरा नहीं है, अंतरे भी मुखड़े जैसा ही है। कमाल का गीत लिखा है उन्होंने। वो ही ऐसा लिख कर लाए थे, किसी ने ऐसा लिखने को नहीं कहा था।" इस तरह से बस एक ही धुन पर पूरा का पूरा गीत बन गया। राज कुमार और विम्मी पर फ़िल्माया यह गीत कालजयी बन गया है सिर्फ़ और सिर्फ़ अपनी सादगी की वजह से। यह गीत आज भी इसी बात की ओर इंगित करता है कि किसी गीत के कालजयी बनने के पीछे न तो साज़ों ले महाकुम्भ की ज़रूरत पड़ती है और न ही भारी-भरकम शायरी की; बस एक सच्ची सोच, एक प्यारी धुन, एक मधुर आवाज़, बस, ये बहुत है एक अच्छे गीत के लिए!


"नीले गगन के तले" सुनने के लिए नीचे प्लेयर पर क्लिक करें...



तो दोस्तों, यह था आज का 'एक गीत सौ कहानियाँ'। आज बस इतना ही, अगले बुधवार फिर किसी गीत से जुड़ी बातें लेकर मैं फिर हाज़िर हो‍ऊंगा, तब तक के लिए अपने इस ई-दोस्त सुजॉय चटर्जी को इजाज़त दीजिए, नमस्कार!

Thursday, August 11, 2011

आगे भी जाने न तू....जब बदलती है जिंदगी एक पल में रूप अनेक तो क्यों न जी लें पल पल को

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 720/2011/160



जीव सारथी के लिखे कविता-संग्रह 'एक पल की उम्र लेकर' पर आधारित 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की इसी शीर्षक से लघु शृंखला की आज दसवीं और अंतिम कड़ी है। आज जिस कविता को हम प्रस्तुत करने जा रहे हैं, वह इस पुस्तक की शीर्षक कविता है 'एक पल की उम्र लेकर'। आइए इस कविता का रसस्वादन करें...



सुबह के पन्नों पर पायी

शाम की ही दास्ताँ

एक पल की उम्र लेकर

जब मिला था कारवाँ

वक्त तो फिर चल दिया

एक नई बहार को

बीता मौसम ढल गया

और सूखे पत्ते झर गए

चलते-चलते मंज़िलों के

रास्ते भी थक गए

तब कहीं वो मोड़ जो

छूटे थे किसी मुकाम पर

आज फिर से खुल गए,

नए क़दमों, नई मंज़िलों के लिए



मुझको था ये भरम

कि है मुझी से सब रोशनाँ

मैं अगर जो बुझ गया तो

फिर कहाँ ये बिजलियाँ



एक नासमझ इतरा रहा था

एक पल की उम्र लेकर।




ज़िंदगी की कितनी बड़ी सच्चाई कही गई है इस कविता में। जीवन क्षण-भंगुर है, फिर भी इस बात से बेख़बर रहते हैं हम, और जैसे एक माया-जाल से घिरे रहते हैं हमेशा। सांसारिक सुख-सम्पत्ति में उलझे रहते हैं, कभी लालच में फँस जाते हैं तो कभी झूठी शान दिखा बैठते हैं। कल किसी नें नहीं देखा पर कल का सपना हर कोई देखता है। यही दुनिया का नियम है। इसी सपने को साकार करने का प्रयास ज़िंदगी को आगे बढ़ाती है। लेकिन साथ ही साथ हमें यह भी याद रखनी चाहिए कि ज़िंदगी दो पल की है, इसलिए हमेशा ऐसा कुछ करना चाहिए जो मानव-कल्याण के लिए हो, जिससे समाज का भला हो। एक पीढ़ी जायेगी, नई पीढ़ी आयेगी, दुनिया चलता रहेगा, पर जो कुछ ख़ास कर जायेगा, वही अमर कहलाएगा। भविष्य तो किसी नें नहीं देखा, इसलिए हमें आज में ही जीना चाहिए और आज का भरपूर फ़ायदा उठाना चाहिए, क्या पता कल हो न हो, कल आये न आये! इसी विचार को गीत के रूप में प्रस्तुत किया था साहिर नें फ़िल्म 'वक़्त' के रवि द्वारा स्वरवद्ध और आशा भोसले द्वारा गाये हुए इस गीत में - "आगे भी जाने ना तू, पीछे भी जाने ना तू, जो भी है बस यही एक पल है"।



इसी के साथ 'एक पल की उम्र लेकर' शृंखला का समापन करते हुए हम सजीव जी बधाई देते हैं इस ख़ूबसूरत काव्य-संकलन के प्रकाशन पर। इस संकलन में प्रकाशित कुल ११० कविताओं में से १० कविताओं को हमनें इस शृंखला में प्रस्तुत किया। इस पुस्तक के बारे में अतिरिक्त जानकारी के लिए या इसे प्राप्त करने के लिए यहाँ क्लिक करें। और इसी के साथ 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की यह ख़ास शृंखला समाप्त होती है, अपनी राय व सुझाव टिप्पणी के अलावा oig@hindyugm.com पर आप भेज सकते हैं। अगले सप्ताह एक नई शृंखला के साथ उपस्थित होंगे, और मेरी और आपकी अगली मुलाक़ात होगी 'ओल्ड इज़ गोल्ड शनिवार विशेषांक' में। अब आज के लिए अनुमति दीजिए, नमस्कार!







और अब एक विशेष सूचना:

२८ सितंबर स्वरसाम्राज्ञी लता मंगेशकर का जनमदिवस है। पिछले दो सालों की तरह इस साल भी हम उन पर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक शृंखला समर्पित करने जा रहे हैं। और इस बार हमने सोचा है कि इसमें हम आप ही की पसंद का कोई लता नंबर प्ले करेंगे। तो फिर देर किस बात की, जल्द से जल्द अपना फ़ेवरीट लता नंबर और लता जी के लिए उदगार और शुभकामनाएँ हमें oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेजिये। प्रथम १० ईमेल भेजने वालों की फ़रमाइश उस शृंखला में पूरी की जाएगी।



और अब वक्त है आपके संगीत ज्ञान को परखने की. अगले गीत को पहचानने के लिए हम आपको देंगें ३ सूत्र जिनके आधार पर आपको सही जवाब देना है-



सूत्र १ - एक एतिहासिक फिल्म है जिसमें एक अमर योद्धा की शहादत का वर्णन है.

सूत्र २ - आवाज़ है मन्ना डे की.

सूत्र ३ - गीत में "जन्मभूमि" की महानता का जिक्र है.



अब बताएं -

गीतकार कौन है - ३ अंक

संगीतकार बताएं - २ अंक

फिल्म का नाम बताएं - २ अंक



सभी जवाब आ जाने की स्तिथि में भी जो श्रोता प्रस्तुत गीत पर अपने इनपुट्स रखेंगें उन्हें १ अंक दिया जायेगा, ताकि आने वाली कड़ियों के लिए उनके पास मौके सुरक्षित रहें. आप चाहें तो प्रस्तुत गीत से जुड़ा अपना कोई संस्मरण भी पेश कर सकते हैं.



पिछली पहेली का परिणाम -

किसी सशक्त प्रतिद्वंधी की अनुपस्तिथि में अमित जी एक बार फिर विजयी हुए है, बहुत बधाई.



खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी






इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Sunday, January 23, 2011

ए मेरे दिले नादाँ तू गम से न घबराना....एक एक बढ़कर एक गीत हुए हैं इन सस्पेंस थ्रिल्लर फिल्मों में

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 576/2010/276

मस्कार! 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की इस नई सप्ताह में आप सभी का फिर एक बार हम हार्दिक स्वागत करते हैं। इन दिनों 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर जारी है लघु शृंखला 'मानो या ना मानो', जिसमें हम चर्चा कर रहे हैं अजीब-ओ-ग़रीब घटनाओं की जिनका ताल्लुख़ आत्मा, भूत-प्रेत और पुनर्जनम से है। हालाँकि विज्ञान कुछ और ही कहता है, लेकिन कभी कभी कुछ ऐसी घटनाएँ हो जाती हैं जिसकी व्याख्या विज्ञान भी नहीं कर पाता। पिछली दो कड़ियों में ऐसे ही कुछ पुनर्जनम के किस्से हमने पढ़े। आइए आज वापस लौटते हैं 'हौण्टिंग् हाउसेस' पर। हमने आपसे वादा किया था कि एक कड़ी हम ऐसी रखेंगे जिसमें हम आपको इंगलैण्ड के कुछ भौतिक जगहों के बारे में बताएँगे, क्योंकि पूरे विश्व के अंदर इंगलैण्ड में भूत-प्रेत की कहानियाँ सब से ज़्यादा मात्रा में पायी जाती है। द्वितीय विश्वयुद्ध में बहुत से वायुसैनिक मारे गये थे। कहा जाता है कि कई एयरफ़ील्ड्स में आज भी अजीब-ओ-गरीब चीज़ें महसूस की जा सकती हैं। इन एयरफ़ील्ड्स में शामिल हैं RAF Bircham Newton Norfolk, RAF East Kirkby Lincolnshire, और RAF East Elsham Wolds North Lincolnshire। इंगलैण्ड कैसेल्स (castles) के लिए प्रसिद्ध है, और बहुत से पुराने कैसेल्स ऐसे हैं जिन्हें आत्माओं के निवास-स्थान होने का गौरव प्राप्त है। ससेक्स का अरुण्डेल कैसेल एक विख्यात कैसेल है जिसमें एक नहीं बल्कि चार चार आत्माओं के मौजूदगी मानी जाती है। इनमें पहला नाम है इस कैसेल के निर्माता का (the spirit of the first Earl of Arundel); दूसरे नंबर पे है उस औरत की आत्मा जिसने प्यार में असफल होने के बाद इस कैसेल की एक टावर से कूद कर अपनी जान दे दी थी। कुछ लोग कहते हैं कि आज भी चांदनी रातों में सफ़ेद लिबास में उस औरत को कैसेल के इर्द-गिर्द घूमते हुए देखा जा सकता है। तीसरी आत्मा है उस 'Blue Man' का जिसे इस कैसेल की लाइब्रेरी में १६३० से लेकर अब तक घूमते हुए देखा जाता है। अनुमान लगाया जाता है इसका ताल्लुख़ King Charles-I के ज़माने से है। और चौथे नंबर पे है उल्लू की तरह दिखने वाला एक पक्षी की आत्मा; ऐसी मान्यता है कि अगर इस पक्षी को इस कैसेल की खिड़की पर पंख फड़फड़ाते हुए देखा जाये तो कैसेल के किसी सदस्य की मौत निश्चित है। आगे बढते हैं और पहुँचते हैं लेइसेस्टर के बेल्ग्रेव हॊल में जो सुर्ख़ियों में आ गया था १९९९ में जब वहाँ के CCTV के कैमरे में एक सफ़ेद आकृति कैद हुई थी। कुछ लोगों ने कहा कि यह इस स्थान के पूर्व-मालिक के बेटी की आत्मा है। लंदन की बात करें तो 50 Berkeley Square यहाँ का सब से विख्यात हौण्टेड हाउस है। एसेक्स के बोर्ले नामक गाँव के बोर्ले रेक्टरी में १८८५ से लेकर बहुत से भौतिक नज़ारे लोगों ने देखे हैं। १९३९ में इस घर को आग लग गई और आज तक यह एक वितर्कित जगह है। ब्रिस्लिंगटन, जो किसी समय ब्रिस्टोल के नज़दीक एक आकर्षक समरसेट विलेज हुआ करता था, आज जाना जाता है भूत-प्रेतों के उपद्रवों की वजह से। पब, होटल और घरों में आये दिन अजीब-ओ-गरीब घटनाओं के घटने के किस्से सुने जाते हैं। उत्तरी लंदन के टोटेन्हैम के ब्रुस कैसेल में एक औरत की आत्मा रहती है जो हर साल ३ नवंबर के दिन दिखाई देती है। कहा जाता है कि यह लेडी कोलरैन की आत्मा है जिसे उस कैसेल के एक चेम्बर में उसके पति ने क़ैद कर रखा था और वहीं उसकी मौत हो गयी थी। इस तरह से हौण्टेड कैसेल्स की फ़ेहरिस्त बहुत बहुत लम्बी है और अगर उन सब का ज़िक्र करने बैठे तो शायद एक किताब लिखनी पड़ जाये।

आज के अंक के लिए हमने जिस सस्पेन्स थ्रिलर फ़िल्म को चुना है, वह है 'टावर हाउस'। १९६२ में बनी इस फ़िल्म में संगीत दिया था रवि ने और गीत लिखे थे असद भोपाली ने। निसार अहमद अंसारी निर्देशित इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे अजीत और शकीला। फ़िल्म की कहानी एक पुरानी परित्यक्त टावर हाउस के इर्द-गिर्द घूमती है, जहाँ पर निश्चित रातों में एक औरत गीत गाती हुई घूमती दिखाई देती है और उन्ही रातों में कोई ना कोई उस टावर पर से कूद कर आत्महत्या कर लेता है। पुलिस जाँचपड़ताल करती है लेकिन उन्हें कुछ नहीं सूझता और यह रहस्य एक रहस्य ही बना रहता है। और रहस्य यह भी है कि वह औरत सेठ दुर्गादास की स्वर्गीय पत्नी है। पुलिस दुर्गादास को पूछताछ करते हैं लेकिन किसी निश्कर्ष तक नहीं पहूँच पाते। ऐसे में एक बार रणजीत (एन. ए. अंसारी) सबीता (शकीला) को शेर के पंजों से बचाता है। सबिता सेठ दुर्गादास की ही बेटी है। शेर से बचाते हुए रणजीत ख़ुद बुरी तरह ज़ख्मी हो जाता है और उसके चेहरे पर हमेशा के लिए गंदे निशान बैठ जाते हैं। सहानुभूतिपूर्वक दुर्गादास रणजीत को अपनी कंपनी में मैनेजर रख लेते हैं, लेकिन जल्द ही रणजीत लालच का शिकार होने लगता है और वह अपने असली रंग दिखाने पर उतर आता है, जिसका अंजाम होता है दुर्गादास की मौत। मुख्य आरोपी के रूप में सुरेश कुमार (अजीत) निश्चित होता है जो सबीता का प्रेमी था। सबीता भी सुरेश को ख़ूनी समझ बैठती है और उसे ठुकरा देती है। सुरेश भी उन सब की ज़िंदगी से दूर चला जाता है, जिसकी पुलिस को तलाश है। रणजीत अब कोशिश करता है कि किसी तरह से सबीता को पागल बना दिया जाये ताकि पूरे जायदाद का वो अकेला मालिक बन सके। एक तरफ़ टावर हाउस में घूमती वो लड़की और दूसरी तरफ़ दुर्गादास की मर्डर मिस्ट्री; क्या कोई समानता है इन दोनों में? यही थी 'टावर हाउस' की कहानी। और दोस्तों, उपर जो हमने लिखा है कि उस टावर हाउस में जो लड़की गीत गाती हुई घूमती है, तो आपको बता दें कि वह गीत कौन सा था। जी हाँ, आज का प्रस्तुत गीत, लता जी की हौण्टिग् वॊयस में, "ऐ मेरे दिल-ए-नादाँ, तू ग़म से ना घबराना, एक दिन तो समझ लेगी दुनिया तेरा अफ़साना..."। एक और रूहानी गीत, एक और सस्पेन्स थ्रिलर, आइए सुनते हैं।



क्या आप जानते हैं...
कि असद भोपाली ने पहली बार फ़ज़ली ब्रदर्स की फ़िल्म 'दुनिया' में गीत लिखने के लिए भोपाल से बम्बई आये थे।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 07/शृंखला 08
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - एक और शानदार सस्पेंस थ्रिल्लर.

सवाल १ - गीतकार बताएं - 2 अंक
सवाल २ - फिल्म के निर्देशक बताएं - 1 अंक
सवाल ३ - फिल्म की प्रमुख अभिनेत्री का नाम बताएं - 1 अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अमित जी आपको बेनिफिट ऑफ डाउट देते हुए २ अंक देते हैं. शरद जी और विजय दुआ जी भी सही जवाब लाये हैं...शृंखला आधी बीत चुकी है, एक बार फिर अमित जी ५ अंकों की बढ़त ले कर चल रहे हैं....क्या शरद जी उन्हें मात दे पायेंगें....पिछली शृंखला में हमें देखा था अमित जी ने कैसे दूसरी पारी में शरद जी को पराजित कर दिया था....क्या इतिहास खुद को दोहराएगा.....लगता है कुछ कुछ न्यूस चैनल वालों जसी बातें कर रहा हूँ मैं :) चलिए देखते हैं. एक बात और अच्छा लगा कि आप सब ने अंसारी साहब के बारे में इतनी बातें शेयर की. ऐसे ही करते रहिएगा.

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Wednesday, January 19, 2011

तुझको पुकारे मेरा प्यार.....पुनर्जन्म के प्रेमी की सदा रफ़ी साहब के स्वरों में भीगी हुई

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 574/2010/274

'मानो या ना मानो' शृंखला में पिछले तीन अंकों में हमने आपको बताया देश विदेश की कुछ ऐसी जगहों के बारे में जिन्हे हौण्टेड माना जाता है, हालाँकि ऐसा मानने के पीछे कोई ठोस वजह अभी तक विज्ञान विकसित नहीं कर पाया है। ख़ैर, आगे बढ़ते हैं इस शृंखला में और आज हम चर्चा करेंगे पुनर्जनम की। जी हाँ, पुनर्जनम, जिसे लेकर भी लोगों में उत्सुक्ता की कोई कमी नहीं है। एक अध्ययन के अनुसार, भारत में ५०% जनता पुनर्जनम में यकीन रखता है। क्या आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि इसके पीछे क्या कारण है? शायद हिंदु आध्यात्म, और शायद समय समय पर मीडिया में पुनर्जनम के क़िस्सों का दिखाया जाना। भोपाल के Government Arts & Commerce College के प्रिंसिपल डॊ. स्वर्णलता तिवारी पुनर्जनम का एक मशहूर उदाहरण है। उनके पुनर्जनम की कहानी दुनिया की उन ७ पुनर्जनम कहानियों में से है जिन पर वैज्ञानिक शोध कर रहे हैं। एक मुलाक़ात में स्वर्णलता जी ने अपने तीन जन्मों के बारे में बताया है। आइए उनके इस दिलचस्प और रहस्यमय पुनर्जनम घटना क्रम को और थोड़ा करीब से देखा जाये। २ मार्च १९४८ में स्वर्णलता का जन्म हुआ था। उन्होंने अपने माता-पिता को उस समय भयभीत कर दिया जब उन्होंने उन्हें बताया कि उनका नाम दरअसल बिया पाठक है और वो पहले कटनी में रहती थीं। तफ़तीश करने पर पता चला कि बिया पाठक नाम की महिला का १९३९ में निधन हुआ था। बिया का फिर जनम हुआ कमलेश के नाम से सन् १९४० में असम के सिल्हेट में (सिल्हेट अब बंगलादेश का हिस्सा है), और बहुत ही कम उम्र में १९४७ में कमलेश का भी निधन हो गया। १९४८ में कमलेश ने फिर जनम लिया स्वर्णलता के रूप में मध्य प्रदेश के शाहपुर तिकमगढ़ ज़िले में। स्वर्णलता को अपने पहले के दोनों जन्मों की कहानी याद है और तीनों बार उनका जन्म ब्राह्मण परिवार में हुआ है। उनके इस पुनर्जनम की कहानी का वर्जिनीया विश्वविद्यालय के मशहूर प्रोफ़ेसर डॊ. इयान स्टीवेन्सन ने तदंत किया और इस सिलसिले में वो १९९७ में भारत भी आये थे। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में स्वर्णलता की कहानी को "authentically correct" करार दिया। वर्तमान में स्वर्णलता भोपाल में अपने पति के. पी. तिवारी के साथ रहती हैं जो एक सीनियर आइ. पी. एस. अफ़सर हैं। स्वर्णलता ख़ुद एक बोटानिस्ट हैं और उनके दो बेटे हैं। दोस्तों, स्वर्णलता के बारे में जानकर शायद आप में से जो लोग अब तक पुनर्जनम पर यकीन नहीं करते थे, हमारी इस रिपोर्ट ने आपको भी सोचने पर मजबूर कर दिया होगा। दोस्तों, अगर यह क़िस्सा किसी अनपढ़ गँवार ग्रामीण महिला से जुड़ा होता तो हम शायद यकीन ना करते, लेकिन जब किसी नामी कॊलेज के प्रिंसिपल ने ख़ुद यह बताया तो इसमें कुछ तो सच्चाई ज़रूर होगी। पुनर्जनम की दो और मशहूर क़िस्सों के बारे में हम कल की कड़ी में फिर से चर्चा करेंगे।

जहाँ तक पुनर्जनम का हिंदी फ़िल्मों से संबंध है, तो इस राह पर भी हमारे फ़िल्मकार चले हैं। 'महल' फ़िल्म की चर्चा हम कर चुके हैं। उसके बाद १९५८ में आयी थी फ़िल्म 'मधुमती' जिसने 'महल' के सारे रिकार्ड्स तोड़ दिये। 'मधुमती' फ़िल्म के बारे में आप भी जानते हैं और हमने भी कई कई बार इस फ़िल्म को 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में शामिल किया है। इसलिए आज 'मधुमती' की यादों को एक तरफ़ रखते हुए आगे बढ़ते हैं, और पहूँच जाते हैं ६० के दशक में। आपको याद होगा एक फ़िल्म आयी थी 'नीलकमल', जिसमें नीलकमल (वहीदा रहमान) का पुनर्जनम हुआ था सीता के नाम से। नीलकमल का प्रेमी था चित्रसेन (राजकुमार) और उस जनम में दोनों का मिलन नहीं हो पाया था, जिस वजह से चित्रसेन की आत्मा भटक रही थी महल में जो एक खण्डहर में परिवर्तित हो चुका था। उधर नीलकमल का दोबारा जन्म होता है सीता के रूप में। लेकिन उसे अपने पिछले जन्म के बारे में कुछ भी याद नहीं। सीता का राम (मनोज कुमार) से विवाह होता है, लेकिन जल्द ही उसे नींद में किसी के पुकारने की आवाज़ें सुनाई देने लगती हैं। और वो नींद में ही उठकर घर से निकल जाती है, जैसे कोई उसे अपनी ओर खींच ले जा रहा हो। ऐसे में सीता के ससुराल वाले उस पर शक़ करते हैं कि रात के वक़्त नई नवेली बहू कहाँ जाती है! और एक रोज़ उसकी सास उसे घर से ही निकाल देती है। अंत में सीता उस महल में पहूँच जाती है जहाँ चित्रसेन की आत्मा उसका इंतज़ार कर रहा होता है। फ़िल्म का अंत कैसे होता है, यह तो आप ख़ुद ही देख लीजिएगा, हम तो बस इतना कहेंगे कि जिस गीत के माध्यम से चित्रसेन की आत्मा नीलकमल को अपनी ओर आकर्षित करती थी, वह गाना था "तुझको पुकारे मेरा प्यार, आजा मैं तो मिटा हूँ तेरी चाह में"। बहुत ही मशहूर गीत इस फ़िल्म का, और सिर्फ़ यह गीत ही क्यों, 'नीलकमल' के तमाम गीत हिट हुए थे। साहिर और रवि की जोड़ी का एक बेहद चर्चित फ़िल्म। रफ़ी साहब की आवाज़ में इस हौण्टिंग् नंबर के आनंद लेने का आज के अंक से बेहतर भला और कौन सा अंक हो सकता है 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर। तो आइए सुनते हैं चित्रसेन की सदा नीलकमल



क्या आप जानते हैं...
कि 'नीलकमल' का यह गीत "तुझको पुकारे मेरा प्यार" राग पहाड़ी पर आधारित है।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 05/शृंखला 08
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - इतना बहुत है इस यादगार गीत को पहचानने के लिए.

सवाल १ - किस मशहूर राग पर आधारित है ये गीत - 2 अंक
सवाल २ - इस फिल्म की सफल जोड़ी ने एक और पुनर्जन्म पर आधारित फिल्म में साथ काम किया था, उस फिल्म का नाम बताएं - 1 अंक
सवाल ३ - गीतकार बताएं - 1 अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
एक बार फिर अमित जी और शरद जी का जलवा है, और अनजाना जी अनजान मत रहिये प्लीस

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Wednesday, December 15, 2010

चौदहवीं का चाँद हो, या आफताब हो....अभिनेता के रूप में भी खासे सफल रहे गुरु दत्त

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 549/2010/249

गुरु दत्त के फ़िल्मी सफ़र का लेखा जोखा इन दिनों आप पढ़ रहे हैं 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में। कल की कड़ी में हम आ पहँचे थे गुरु दत्त साहब के जीवन के उस मुकाम तक जहाँ पर उन्होंने आगे कोई भी फ़िल्म निर्देशित ना करने की क़सम खा ली थी। ऐसे में ६० के दशक की शुरुआत हुई गुरु दत्त निर्मित फ़िल्म 'चौदहवीं का चाँद' से, जिसके लिए उन्होंने निर्देशक चुना सादिक़ साहिब को। मुस्लिम परिवेश की इस फ़िल्म ने ज़बरदस्त कामियाबी बटोरी और फ़िल्म के सभी के सभी गानें सुपर-डुपर हिट हुए। ओ. पी. नय्यर और सचिन देव बर्मन के बाद गुरु दत्त ने इस फ़िल्म में बतौर संगीतकार लिया रवि को। और रवि उनकी सारी उम्मीदों पर खरे उतरे। 'काग़ज़ के फूल' की असफलता और 'चौदहवीं का चांद' की अपार सफलता पर गुरु दत्त ने कहा था - "लाइफ़ में, यार, क्या है? दो ही तो चीज़ें हैं - कामयाबी और हार। इन दोनों के बीच में कुछ नहीं है।" 'चौधहवीं का चांद' फ़िल्म के लिए बरोदा में लोकेशन्स ढूंढते हुए उन्होंने कहा था - "देखो ना, मुझे डिरेक्टर बनना था, डिरेक्टर बन गया, ऐक्टर बनना था, ऐक्टर बन गया, पिक्चर अच्छे बनाने थे, अच्छे बने। पैसा है, सब कुछ है, पर कुछ भी नहीं रहा।" उनकी ऐसी बातों से लोगों को लग ही रहा था कि उनके जीवन का सूर्य अस्त होने की कगार पर है, और ऐसा ही होकर रहा। 'चौदहवीं का चांद' फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे गुरु दत्त और वहीदा रहमान। जैसा कि हमने बताया, इस फ़िल्म के संगीतकार थे रवि और गीत लिखे शक़ील बदायूनी ने। गुरु दत्त को याद करते हुए रवि ने विविध भारती पर कहा था - "मेरी ज़िंदगी ने एक करवट बदली जब गुरु दत्त ने मुझे फ़ोन किया और कहा कि वो मुझे अपनी अगली फ़िल्म में म्युज़िक डिरेक्टर लेना चाहते हैं। मैं उनसे मिलने गया। उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या शक़ील को गीतकार लेना उचित होगा। मैंने कहा कि शक़ील साहब तो बहुत अच्छे शायर हैं, लेकिन एक संशय यह है कि क्या वो नौशाद साहब के बाहर काम करेंगे? ख़ैर, शक़ील साहब आये और हम मिले। वो बहुत ही अच्छे इंसान थे। गुरु दत्त साहब से गानें डिस्कस होने के बाद जब हम बाहर निकले तो शक़ील साहब ने मेरा हाथ पकड़ लिया और कहा, "मैंने बाहर काम नहीं किया है, मुझे सम्भाल लेना।"

आगे उस इंटरव्यु में रवि साहब ने बताया कि 'चौदहवीं का चांद' रिलीज़ होने के बाद एक दिन गुरु दत्त ने उनसे कहा था, "जिस दिन मैंने आपकी 'मेहंदी' देखी थी, उसी दिन मैंने यह डिसाइड कर लिया था कि अगर कभी मुस्लिम सब्जेक्ट पर फ़िल्म बनाया तो म्युज़िक डिरेक्टर आपको ही लूँगा।" दोस्तों, आपको फ़िल्म 'मेहंदी' का वह गीत तो ज़रूर याद होगा, "अपने कीये पे कोई पशेमान हो गया"। वाक़ई मुस्लिम सब्जेक्ट की फ़िल्मों में रवि का संगीत बहुत अच्छा रहा। जब उनसे इसके पीछे का कारण पूछा गया तो उन्होंने बस यही जवाब दिया, "कोई ख़ास कारण नहीं है, मुझे ग़ज़लों से प्यार है और मुजरा टाइप के गानें बनाने का मुझे बहुत शौक है, बस!" तो लीजिए दोस्तों, आज की कड़ी में सुनिए फ़िल्म 'चौदहवीं का चांद' का मशहूर शीर्षक गीत मोहम्मद रफ़ी साहब की आवाज़ में। इस फ़िल्म का एक गीत "बदले बदले से सरकार नज़र आते हैं" हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर सुनवा चुके हैं और बाकी के गीत भी आप भविष्य में सुन पाएँगे, जैसे कि "दिल की कहानी रंग लाई है", "अंदर से बड़े ज़ालिम, बाहर से बड़े भोले", "मिली ख़ाक में मोहब्बत", "मेरा यार बना है दुल्हा", "बालम से मिलन होगा", "ये लखनऊ की सरज़मीं" आदि। लेकिन इस फ़िल्म का जो चार्टबस्टर है, वह आज का प्रस्तुत गीत ही है। राग पहाड़ी पर आधारित गीत सुनने से पहले ये रहे इस गीत के बोल। अपनी प्रेमिका की ख़ूबसूरती का अंदाज़-ए-बयाँ इससे बेहतर भला और क्या हो सकता है! इस गीत में वहीदा का सौंदर्य अधिक था या शकील शायरी, रफ़ी की अदायगी या रवि का संगीत, यह बताना बेहद मुश्किल भरा काम है।

चौदहवीं का चांद हो, या आफताब हो,
जो भी हो तुम ख़ुदा की क़सम लाजवाब हो।

ज़ुल्फ़ें हैं जैसे कांधों पे बादल झुके हुए,
आँखें जैसे मय के प्याले भरे हुए,
मस्ती है जिसमें प्यार की तुम वो शराब हो।

चेहरा है जैसे झील में हँसता हुआ कंवल,
या ज़िंदगी के साज़ पे छेड़ी हुई ग़ज़ल,
जाने बहार तुम किसी शायर का ख़्वाब हो।

होंठों पे खेलती है तबस्सुम की बिजलियाँ,
सजदे तुम्हारी राहों में करती है कहकशाँ,
दुनिया-ए-हुस्न-ओ-इश्क़ का तुम ही शबाब हो।



क्या आप जानते हैं...
कि रवि और शक़ील ने 'चौदहवीं का चांद' फ़िल्म के गानों की सिटिंग् रवि के उस समय बन रहे घर की अधूरी दीवारों के बीच बैठ कर ही की थी।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 10/शृंखला 05
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - बेहद आसान.

सवाल १ - गायिका बताएं - १ अंक
सवाल २ - किस अभिनेत्री पर गया है ये गीत फिल्माया - २ अंक
सवाल ३ - संगीतकार बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी ने आते आते बहुत देर कर दी, ये शृंखला भी श्याम जी के ही नाम रहेगी, ऐसा लग रहा है, बधाई जनाब

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Thursday, September 9, 2010

चेहरा छुपा लिया है किसी ने हिजाब में....मजलिस-ए-कव्वाली के माध्यम से सभी श्रोताओं को ईद मुबारक

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 480/2010/180

प सभी को 'आवाज़' परिवार की तरफ़ से ईद-उल-फ़ित्र की दिली मुबारक़बाद। यह त्योहार आप सभी के जीवन में ख़ुशियाँ लेकर आए ऐसी हम कामना करते हैं। ईद-उल-फ़ित्र के साथ रमज़ान के महीने का अंत होता है और इसी के साथ क़व्वालियों की इस ख़ास मजलिस को भी आज हम अंजाम दे रहे हैं। ४० के दशक से शुरु कर क़व्वालियों का दामन थामे हर दौर के बदलते मिज़ाज का नज़ारा देखते हुए आज हम आ गए हैं ८० के दशक में। जिस तरह से ८० के दशक में फ़िल्म संगीत का सुनहरा दौर ख़त्म होने की कगार पर था, वही बात फ़िल्मी क़व्वालियों के लिए भी लागू थी। क़व्वालियों की संख्या भी कम होती जा रही थी। फ़िल्मों में क़व्वालियों के सिचुएशन्स आने ही बंद होते चले गए। कभी किसी मुस्लिम सबजेक्ट पर फ़िल्म बनती तो ही उसमें क़व्वाली की गुंजाइश रहती। कुछ गिनी चुनी फ़िल्में ८० के दशक की जिनमें क़व्वालियाँ सुनाई दी - निकाह, नूरी, परवत के उस पार, फ़कीरा, नाख़ुदा, नक़ाब, ये इश्क़ नहीं आसाँ, ऊँचे लोग, दि बर्निंग्‍ ट्रेन, अमृत, दीदार-ए-यार, आदि। इस दशक की क़व्वालियों का प्रतिनिधि मानते हुए आज की कड़ी के लिए हमने चुनी है फ़िल्म 'निकाह' की क़व्वाली "चेहरा छुपा लिया है किसी ने हिजाब में"। फ़िल्मी क़व्वलियों की बात चलती है तो आशा जी का नाम गायिकाओं में सब से उपर आता है। क़व्वाली गायन में गायिका के गले में जिस तरह की हरकत होनी चाहिए, जिस तरह की शोख़ी, अल्हड़पन और एक आकर्षण होनी चाहिए, उन सभी बातों का ख़्याल आशा जी ने रखा और शायद यही वजह है कि उन्होंने ही सब से ज़्यादा फ़िल्मी क़व्वालियाँ गाई हैं। तो आज का यह एपिसोड भी कल की तरह आशा जी के नाम, और उनके साथ इस क़व्वली में आप आवाज़ें सुनेंगे महेन्द्र कपूर, सलमा आग़ा और साथियों की। हसन कमाल के बोल और रवि का संगीत।

फ़िल्म 'निकाह' एक मुस्लिम सामाजिक फ़िल्म थी और बेहद कमयाब भी साबित हुई थी। बी. आर. चोपड़ा की यह फ़िल्म थी जो डॊ. अचला नागर की लिखी एक नाटक पर आधारित थी। २४ सितंबर १९८२ को प्रदर्शित इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे राज बब्बर, दीपक पराशर, सलमा आग़ा, हिना कौसर प्रमुख। यह फ़िल्म तो आपने देखी ही होगी, फ़िल्म की कहानी तलाक़ और मुस्लिम पुनर्विवाह के मसलों के इर्द गिर्द घूमती है। इस्लामिक मैरिज ऐक्ट के मुताबिक़, किसी तलाक़शुदा महिला से उसका पूर्व पति तभी दुबारा शादी कर सकता है जब वो किसी और से शादी कर के तलाक़ ले आए। बस इसी बात को केन्द्रबिंदु में रख कर लिखी गई थी नाटक 'निकाह' की कहानी, जिस पर आगे चलकर यह फ़िल्म बनी। इस फ़िल्म को बहुत सराहना मिली थी और आज भी मुस्लिम सामाजिक फ़िल्मों के जौनर की सब से मक़बूल फ़िल्म मानी जाती है। फ़िल्म में गायिका अभिनेत्री सलमा आग़ा ने कुछ ऐसे दिल को छू लेने वाले गीत गाए कि वो गानें सदाबहार नग़मों में दर्ज हो चुके हैं। "दिल के अरमाँ आसुओं में बह गए" के लिए उन्हें उस साल फ़िल्मफ़ेयर के सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायिका के ख़िताब से नवाज़ा गया था। इसके अलावा "फ़ज़ा भी है जवाँ जवाँ, हवा भी है रवाँ रवाँ" तथा महेन्द्र कपूर के साथ गाया युगल गीत "दिल की यह आरज़ू थी कोई दिलरुबा मिले" भी ख़ासा लोकप्रिय हुए थे। वैसे इस क़व्वाली में आशा भोसले और महेन्द्र कपूर की आवाज़ें ही मुख्य रूप से सुनाई देती है, सलमा आग़ा बस एक लाइन गाती हैं आख़िर की तरफ़ - "यह झूठ है कि तुमने हमें प्यार किया है, हमने तुम्हे ज़ुल्फ़ों में गिरफ़्तार किया है"। आइए सुना जाए यह दिलकश क़व्वाली जिसमें है प्यार मोहब्बत के खट्टे मीठे गिले शिकवे और तकरारें हैं। और इसी के साथ 'मजलिस-ए-क़व्वाली' शृंखला पूरी होती है। आपको यह शृंखला कैसी लगी, क्या ख़ामियाँ रह गईं, आप अपने विचार हमारे ईमेल पते oig@hindyugm.com पर लिख भेजें। और अगर कोई और क़व्वाली आप सुनना चाहते हैं 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' में, तो उसका भी ज़िक्र आप कर सकते हैं। तो अब आपसे अगली मुलाक़ात होगी शनिवार की शाम, तब तक के लिए इजाज़त दीजिए, और एक बार फिर से आप सभी को ईद-उल-फ़ित्र की हार्दिक शुभकामनाएँ।



क्या आप जानते हैं...
कि हाल ही में आशा भोसले का नाम दुनिया के सब से लोकप्रिय १० कलाकारों में शामिल हुआ है। यह सर्वे सी.एन.एन के तरफ़ से आयोजित किया गया है।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. यह गीत एक अमर प्रेमिक और प्रेमिका की प्रेम कहानी पर बनी फ़िल्म का है जिसका निर्माण ४० के दशक के आख़िर के तरफ़ के किसी साल में हुआ था। फ़िल्म का नाम बताएँ। १ अंक।
२. फ़िल्म में कुल तीन संगीतकार हैं, जिनमें दो जोड़ी के रूप में हैं। इस जोड़ी के एक सदस्य आगे चलकर एक सफल संगीतकार सिद्ध हुए लेकिन एक अन्य नाम से। बताइए इस गीत के तीनों संगीतकारों के नाम। ४ अंक।
३. यह गीत एक पारम्परिक रचना है जिसका इस्तेमाल उसी सफल संगीतकार ने आगे चलकर अपनी एक बेहद उल्लेखनीय फ़िल्म में किया है और जिनसे गवाया है वो भी उनके ही परिवार की एक सदस्या हैं। इस पारम्परिक रचना को पहचानिए। ३ अंक।
४. इस गीत की गायिका का नाम बताएँ जिन्होंने इसी फ़िल्म में जी. एम. दुर्रानी के साथ मिलकर युगल गीत भी गाया है। २ अंक।

पिछली पहेली का परिणाम -
पवन जी और इंदु जी एकदम सही हैं, प्रतिभा जी आपने हसन कमाल को देखिये तो जरा क्या लिख दिया :), रोमेंद्र जी एकदम सही हैं. सभी मित्रों को ईद की बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Sunday, September 5, 2010

ऐ मेरी ज़ोहरा-जबीं, तुझे मालूम नहीं, तू अभी तक है हसीं...बिलकुल वैसे ही जैसे सुनहरे दौर का लगभग हर एक गीत है

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 476/2010/176

मज़ान का मुबारक़ महीना चल रहा है और इस पाक़ मौक़े पर आपके इफ़्तार की शामों को और भी रंगीन और सुरीला बनाने के लिए इन दिनों 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर हम पेश कर रहे हैं कुछ शानदार फ़िल्मी क़व्वालियों से सजी लघु शृंखला 'मजलिस-ए-क़व्वाली'। अब तक आपने इसमें पाँच क़व्वालियाँ सुनी। ४० के दशक के मध्य भाग से शुरू कर हम आ पहुँचे थे १९६० में और उस साल बनी दो बेहद मशहूर क़व्वालियाँ आपको हमने सुनवाई फ़िल्म 'मुग़ल-ए-आज़म' और 'बरसात की रात' से। अब थोड़ा और आगे बढ़ते हैं और आ जाते है साल १९६५ में। इस साल बनी थी हिंदी फ़िल्म इतिहास की पहली मल्टिस्टरर फ़िल्म 'वक़्त'। सुनिल दत्त, साधना, राज कुमार, शशि कपूर, शर्मिला टैगोर, बलराज साहनी, निरुपा रॊय, मोतीलाल और रहमान जैसे मंझे हुए कलाकारों के पुर-असर अभिनय से सजा थी 'वक़्त'। पहले बी. आर. चोपड़ा इस फ़िल्म को पृथ्वीराज कपूर और उनके तीन बेटे राज, शम्मी और शशि को लेकर बनाना चाहते थे, लेकिन हक़ीक़त में केवल शशि कपूर को ही फ़िल्म में 'कास्ट' कर पाए। और पिता के किरदार में पृथ्वीराज जी के बदले लिया गया बलराज साहनी को। 'वक़्त' ने १९६६ में बहुत सारे फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार जीते, जैसे कि धरम चोपड़ा (सर्वश्रेष्ठ सिनेमाटोग्राफ़र), अख़्तर-उल-इमान (सर्वश्रेष्ठ संवाद), यश चोपड़ा (सर्वश्रेष्ठ निर्देशक), अख़्तर मिर्ज़ा (सर्वश्रेष्ठ कहानी), राज कुमार (सर्वश्रेष्ठ सह अभिनेता), और बी. आर. चोपड़ा (सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म)। भले ही इस फ़िल्म के गीत संगीत के लिए किसी को कोई पुरस्कार नहीं मिला, लेकिन असली पुरस्कार तो जनता का प्यार है जो इस फ़िल्म के गीतों को भरपूर मिला और आज भी मिल रहा है। युं तो आशा भोसले और महेन्द्र कपूर ने नई पीढ़ी के अभिनेताओं का प्लेबैक किया, एक क़व्वाली पिछली पीढ़ी, यानी बलराज साहनी और निरुपा रॊय पर भी फ़िल्मायी गयी थी। और यही क़व्वाली सब से मशहूर साबित हुई। मन्ना डे की आवाज़ में बलराज साहब पर्दे पर अपनी पत्नी (अचला सचदेव) की तरफ़ इशारा करते हुए गाते हैं "ऐ मेरी ज़ोहरा-जबीं, तुझे मालूम नहीं, तू अभी तक है हसीं और मैं जवाँ, तुझपे क़ुर्बान मेरी जान मेरी जान"। साहिर लुधियानवी के बोल और रवि का संगीत। फ़िल्म में इस क़व्वाली के ख़त्म होते ही प्रलयंकारी भूकम्प आता है और बलराज साहनी का पूरा परिवार बिखरकर रह जाता है।

दोस्तों, बरसों पहले संगीतकार रवि को विविध भारती पर साहिर लुधियानवी पर चर्चा करने हेतु आमंत्रित किया गया था। उस चर्चा में शामिल थे शायर और उद्‍घोषक अहमद वसी, रज़िया रागिनी और कमल शर्मा। पेश है उसी बातचीत से एक अंश जिसमें रवि जी साहिर साहब के बारे में बता रहे हैं और इस क़व्वाली का भी ज़िक्र है उस अंश में।

रवि जी, अब आप साहिर साहब की शख़्सीयत के बारे में कुछ बताइए।

रवि: साहिर साहब बड़े ही सिम्पल क़िस्म के थे। वो गम्भीर से गम्भीर बात को भी बड़े आसानी से कह डालते थे। एक क़िस्सा आपको सुनाता हूँ। उन दिनों हम ज़्यादातर बी. आर. चोपड़ा की फ़िल्मों के लिए काम करते थे। तो शाम के वक़्त हम मिलते थे, बातें करते थे। तो एक दिन साहिर साहब ने अचानक कहा 'देश में इतने झंडे क्यों है? और अगर है भी तो उनमें डंडे क्यों है?' (इस बात पर वहाँ मौजूद सभी ज़ोर से हँस पड़ते हैं)।

रवि साहब, हमने सुना है कि साहिर साहब अपने गीतों में हेर-फेर पसंद नहीं करते थे, इस बारे में आपका क्या ख़याल है?

रवि: साहिर साहब के गानें ऐसे होते थे कि उनमें किसी तरह का हेर-फेर करना पॊसिबल ही नहीं होता था। अब फ़िल्म 'वक़्त' के "ऐ मेरी ज़ोहरा-जबीं" को ही ले लीजिए। जब उन्होंने यह गीत लिखा तो सभी ने कहा कि आम आदमी "ज़ोहरा-जबीं" को नहीं समझ पाएँगे। पर साहिर साहब ने कहा कि क्यों नहीं समझ पाएँगे, इससे अच्छा शब्द और क्या हो सकता है! और जब यह फ़िल्म रिलीज़ हुई तो यही गीत सब से पॊपुलर साबित हुई। साहिर हर तरह के गानें लिखते थे और बहुत ही कामयाबी के साथ लिखते थे, चाहे भजन हो, क़व्वाली हो, कुछ भी।



क्या आप जानते हैं...
कि रवि की पहली फ़िल्म 'वचन' के गीत "चंदा मामा दूर के पुए पकाए गुड़ के" के मुखड़े और अंतरे के बीच के इंटरल्युड में रवि ने गणेश चतुर्थी पर बजनेवाली एक धुन को पिरोया था, और वर्षों बाद इसी धुन पर लक्ष्मी-प्यारे ने 'तेज़ाब' का सुपरहिट गीत "एक दो तीन" बनाकर माधुरी दीक्षित को रातोंरात सुपरस्टार बना दिया। (सौजन्य: 'धुनों की यात्रा', पंकज राग)

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. कव्वाली में हसीनों का जिक्र है गायिकाओं की आवाज़ में, फिल्म बताएं - १ अंक.
२. केवल कुमार निर्देशित फिल्म के नायक कौन थे - २ अंक.
३. संगीतकार बताएं - २ अंक.
४ मूल गायिका हैं लता मंगेशकर, गीतकार बताएं - ३ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
पवन जी, इंदु जी, क्रिश जी और प्रतिभा जी को बहुत बधाई. अवध जी, पाबला जी और बाकी सब साथियों ने मिलकर जिस प्रकार पूरी फिल्म की कहानी लिख डाली उसमें हमें बहुत मज़ा आया

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Thursday, September 2, 2010

न तो कारवाँ की तलाश है न तो हमसफ़र की क्योंकि ये इश्क इश्क है....कहा रोशन और मजरूह के साथ गायक गायिकाओं की एक पूरी टीम ने

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 475/2010/175

ज श्रीकृष्ण जन्माष्टमी है। इस पवित्र पर्व पर हम अपने सभी श्रोताओं व पाठकों को अपनी शुभकामनाएँ देते हैं। दोस्तों, आप समझ रहे होंगे कि क्योंकि क़व्वालियों की शृंखला चल रही है, तो जन्माष्टमी पर श्री कृष्ण का कोई गीत तो हम सुनवा नहीं पाएँगे 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में, है न? लेकिन ज़रा ठहरिए, कम से कम एक क़व्वाली ऐसी ज़रूर है जिसमें श्री कृष्ण का भी ज़िक्र है, और साथ ही राधा और मीरा का भी। क्यों चौंक गए न? जी हाँ, यह सच है, इस राज़ पर से अभी पर्दा उठने वाला है। फ़िल्म संगीत में क़व्वालियों को लोकप्रिय बनाने में संगीतकार रोशन का योगदान बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसा नहीं कि उनसे पहले किसी ने मशहूर क़व्वाली फ़िल्मों के लिए नहीं बनाई, लेकिन रोशन साहब ने पारम्परिक क़व्वालियों का जिस तरह से फ़िल्मीकरण किया और जन जन में लोकप्रिय बनाया, ऐसा करने का श्रेय उन्हें ही दिया जाता रहा है। आज 'मजलिस-ए-क़व्वाली' में रोशन साहब की बनाई हुई सब से लोकप्रिय क़व्वाली की बारी, और बहुत लोगों के अनुसार यह हिंदी फ़िल्म संगीत की सब से यादगार क़व्वाली है। दरअसल ये दो क़व्वालियाँ हैं जो ग्रामोफ़ोन रेकॊर पर अलग अलग आती है, लेकिन फ़िल्म के पर्दे पर एक के बाद एक आपस में जुड़ी हुई है। इसलिए हम भी यहाँ आपको ये दोनों क़व्वालियाँ इकट्ठे सुनवा रहे हैं। फ़िल्म 'बरसात की रात' की यह क़व्वाली जोड़ी है "न तो कारवाँ की तलाश है" और "ये इश्क़ इश्क़ है"। मन्ना डे, मोहम्मद रफ़ी, आशा भोसले, सुधा मल्होत्रा, बातिश और साथियों की आवाज़ें, तथा साहिर लुधियानवी के कलम की जादूगरी है यह क़व्वाली। दरअसल रोशन साहब ने पाक़िस्तान में एक बार एक क़व्वाली सुनी "ये इश्क़ इश्क़ है इश्क़ इश्क़" जो उन्हें इतनी पसंद आई कि अनुमति लेकर उन्होंने उस क़व्वाली को ऐसा फ़िल्मी जामा पहनाया कि ना केवल यह क़व्वाली सुपर डुपर हिट साबित हुई, बल्कि अगली फ़िल्म 'दिल ही तो है' में निर्माता ने उनसे एक और क़व्वाली ("निगाहें मिलाने को जी चाहता है") की माँग कर बैठे। पंकज राग अपनी किताब 'धुनों की यात्रा' में लिखते हैं - "'बरसात की रात' का संगीत व्यावसायिक दृष्टि से रोशन का सफलतम संगीत था। "ना तो कारवाँ की तलाश है" का अंजाम हुअ "ये इश्क़ इश्क़ है इश्क़ इश्क़" में और फ़तेह अली ख़ाँ से अनुमति उपरान्त ली गई उनकी धुन पर रोशन ने फ़िल्म संगीत के इतिहास की सब से हिट क़व्वाली बना डाली। यह एक तरह का समझौता तो अवश्य था जिसके लिए ख़य्याम तैय्यार नहीं हुए थे, पर ऐसे समझौते रोशन ने भी कम ही किए। इस क़व्वाली का तरन्नुम, बहाव, बिलकुल अभिभूत कर देने वाला है। इसकी रेकॊर्डिंग् २९ घंटे में सम्पन्न हुई औत तब जाकर वह ऐतिहासिक प्रभाव उत्पन्न हुआ, जैसा रोशन चाहते थे। भले ही धुन की प्रेरणा कहीं और से मिली हो, पर उसका विस्तार इस क़व्वाली की सुंदर विशेषताएँ बनकर आज तक लोगों के ज़हन में ताज़ा है। 'बरसात' में क़व्वालियों की धूम रही। "निगाहें नाज़ के मारों का" और "जी चाहता है चूम लूँ" जैसी क़व्वालियाँ भी अच्छी चली।"

सन् १९९८ में गायक मन्ना डे विविध भारती पर तशरीफ़ लाए थे और कई संगीतकारों की चर्चा हुई थी, जिनमें एक नाम रोशन साहब का भी उन्होंने लिया था, और ख़ास तौर से इस क़व्वाली का ज़िक्र छिड़ा था उद्‍घोषक कमल शर्मा द्वारा ली गई उस इंटरव्यु में। रोशन साहब को याद करते हुए मन्ना दा ने कहा था "रोशन साहब, he was a strict student of good music, यानी वो ख़याल, ठुमरी, ग़ज़लें, फ़ोक, ये सब मिलाके जो एक चीज़ वो लाते थे न, वो अनोखे ढंग से नोट्स का कॊम्बिनेशन करते थे। हम तो पागल थे उनके गानों के लिए। उस्ताद आदमी थे वो और बहुत मेहनती आदमी थे। "ना तो कारवाँ की तलाश है" के लिए मुझे याद है, रामपुर के तरफ़ से क़व्वाल लोगों को बुलाये थे। उनके प्रोग्राम सुना करते थे, नोट कर कर के कर कर के फिर उन्होंने बनाना शुरु किया। और साहिर साहब ने लिखा, और उन्होंने बनाया। और वो जो तकरारें जो हैं ना बीच में, कितने मेहनत किए वो, ओ हो हो, माइ गॊड, और फिर जब हम लोगों को सुनाते थे, बोलते थे 'देखो मज़ा आना चाहिए', वो जैसे क़व्वाल लोग करते थे। वो सब तो हमें मालूम नहीं था, रफ़ी को भी मालूम नहीं था, आशा को भी मालूम नहीं था, लेकिन उन्होंने सब करवाया हमसे। और एक एक कर के ८-१० दिन रिहर्सल करके करवाया।" दोस्तों, ऐसे ऐसे ही वह फ़िल्म संगीत का सुनहरा दौर नहीं हुआ। सुनहरा उसे बनाया उस दौर के फ़नकारों की लगन ने, उनके अथक परिश्रम ने, उनके डेडिकेशन ने। साहिर साहब ने इस क़व्वाली में ऐसे अल्फ़ाज़ लिखे हैं कि इसे सुनते हुए हम ट्रान्स में चले जाते हैं और जैसे उस परम शक्ति के साथ एक कनेक्शन बनने लगता है। बड़ी धर्म निरपेक्ष क़व्वाली है जिसमें साहिर साहब लिखते हैं कि "इश्क़ आज़ाद है, हिंदु ना मुसलमान है इश्क़, आप ही धर्म है और आप ही इमान है इश्क़"। इश्क़ को केन्द्रबिंदु बनाकर चलने वाली इस क़व्वाली में बहुत से विषय शामिल किए गए हैं। यहाँ तक कि श्री कृष्ण, राधा, मीरा, सीता, भगवान बुद्ध, मसीह का भी उल्लेख है, भजन और श्री कृष्ण लीला के साथ साथ लोक-संगीत का भी अंग है। "जब जब कृष्ण की बंसी बाजी, निकली राधा सज के, जान अजान का ध्यान भुला के, लोक लाज को तज के, है बन बन डोली जनक दुलारी, पहन के प्रेम की माला, दर्शन जल की प्यासी मीरा पी गई विष का प्याला"। तो दोस्तों, अब आपको अहसास हो गया ना कि क्यों हमने यह क़व्वाली आज के लिए चुनी है! तो आइए सुना जाए कुल १२ मिनट की यह क़व्वाली। श्री कृष्ण जन्माष्टमी और रमज़ान के मुबारक़ मौक़े पर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का एक और सुरीला नज़राना क़बूल कीजिए।



क्या आप जानते हैं...
कि साल १९६० के अमीन सायानी द्वारा प्रस्तुत बिनाका गीत माला के वार्षिक कार्यक्रम में 'मुग़ल-ए-आज़म', 'चौदहवीं का चांद', 'दिल अपना और प्रीत पराई', 'धूल का फूल', 'छलिया' और 'काला बाज़ार' जैसे फ़िल्मों को पछाड़ते हुए 'बरसात की रात' फ़िल्म का शीर्षक गीत ही बना था उस वर्ष का सरताज गीत।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. एक मल्टी स्टारर फिल्म की है ये कव्वाली, फिल्म बताएं - १ अंक.
२. किस अदाकार पर फिलमाया गयी है ये कव्वाली - २ अंक.
३. गायक बताएं - २ अंक.
४ रवि का है संगीत, फिल्म के निर्देशक बताएं - ३ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
लगता है हमारे प्रोत्साहन का नतीजा निकल, अवध जी ३ अंक चुरा गए. इंदु जी, आपको नाराज़ कर मरना है क्या?, पर ये बात समझ नहीं आती कि आप एक अंक वाले सवालों का ही जवाब क्यों देती हैं. पवन जी सही जवाब के साथ वापसी की बधाई. कनाडा टीम कहाँ गायब रही...खैर अब तक के स्कोर जान लेते हैं - अवध जी ७४, इंदु जी ४०, प्रतिभा जी २८, किशोर जी २६, पवन जी २४, और नवीन जी २२ पर हैं.

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Sunday, July 25, 2010

ये रास्ते हैं प्यार के.....जहाँ कभी कभी "प्रेरणा" भी काम आती है

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 446/2010/146

'ओल्ड इज़ गोल्ड' स्तंभ के सभी संगीत रसिकों का एक बार फिर से स्वागत है इस सुरीली महफ़िल में जो रोशन है फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर के सुनहरे सदाबहार नग़मों से। इन दिनों 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर जारी है लघु शृंखला 'गीत अपना धुन पराई', जिसके अंतर्गत हम कुछ ऐसे हिट गीत सुनवा रहे हैं जिनकी धुन किसी ना किसी विदेशी धुन से प्रेरित है। ये दस गीत दस अलग अलग संगीतकारों के संगीतबद्ध किए हुए हैं। पिछले हफ़्ते इस शृंखला के पहले हिस्से में आपने जिन पाँच संगीतकारों को सुना, वो थे स्नेहल भाटकर, अनिल बिस्वास, मुकुल रॊय, राहुल देव बर्मन और सलिल चौधरी। अब आइए अब इस शृंखला को इस मुक़ाम से आगे बढ़ाते हैं। आज की कड़ी के लिए हमने चुना है संगीतकार रवि को। रवि ने भी कई गीतों में विदेशी धुनों का सहारा लिया था जिनमें से एक महत्वपूर्ण गीत है गीता दत्त का गाया फ़िल्म 'दिल्ली का ठग' का "ओ बाबू ओ लाला, मौसम देखो चला"। यह गीत आधारित है मूल गीत "रम ऐण्ड कोकाकोला" की धुन पर। वैसे आज की कड़ी के लिए हमने रवि साहब के जिस गीत को चुना है वह है फ़िल्म 'ये रास्ते हैं प्यार के' का शीर्षक गीत आशा भोसले की आवाज़ में। और यह गीत प्रेरित है लोकप्रिय गीत "दि ब्रीज़ ऐण्ड आइ" से। इससे पहले कि इस मशहूर विदेशी गीत की थोड़ी जानकारी आपको दें, फ़िल्म 'ये रास्ते हैं प्यार के' के बारे में यह बताना चाहेंगे कि यह फ़िल्म १९६३ की फ़िल्म थी जिसका निर्माण किया था सुनिल दत्त साहब ने और निर्देशन था आर. के. नय्यर का। फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे अशोक कुमार, सुनिल दत्त, लीला नायडु, मोतीलाल, रहमान, राजेन्द्र नाथ और शशिकला। फ़िल्म के गानें लिखे राजेन्द्र कृष्ण ने।

"दि ब्रीज़ ऐण्ड आइ" एक बेहद लोकप्रिय गीत रहा है जो एक स्पैनिश गीत "ऐण्डालुसिआ" पर आधारित है। मूल गीत को लिखा था अर्नेस्टो लेक्योना ने और जिसके स्पैनिश में बोल थे "एमिलियो दि तोरे"। इसके अंग्रेज़ी वर्ज़न के बोल लिखे अल स्टिलमैन ने। इस गीत के भी समय समय पर कई वर्ज़न निकले हैं, जिनमें सब से लोकप्रिय जो दो वर्ज़न हैं, उनमें एक है १९४० में आई जिम्मी डॊरसे का गाया, और दूसरा है १९५५ में कैटरीना वैलेन्टे की आवाज़ में। वैलेन्टे के इस गीत को उस साल अमेरीका में १३-वाँ स्थान और इंगलैण्ड में ५-वाँ स्थान मिला था। जिम्मी डॊरसे वाले वर्ज़न में बॊब एबर्ली का वोकल भी शामिल था, और इस गीत को जारी किया था डेक्का रेकॊर्ड्स ने। इसे बिलबोर्ड मैगज़ीन चार्ट्स में पहली बार एंट्री मिली थी २० जुलाई १९४० के दिन। यानी कि आज से ठीक ६० बरस और ५ दिन पहले। लोकप्रियता की पायदान दर पायदान चढ़ते हुए कुल ९ हफ़्तों तक इस हिट परेड शो की शान बना रहा और दूसरे नंबर तक पहुँच सका था। उधर पॊलीडोर के लिए कैटरीना वैलेन्टे वाला वर्ज़न जारी किया डेर्क्का रेकॊर्ड्स ने ही इंगलैण्ड में, और इसे बिलबोर्ड मैगज़ीन चार्ट्स में प्रथम एंट्री मिली थी ३० मार्च १९५५ को, और यह १४ हफ़्तों तक इस काउण डाउन में रही, और यह १३-वीं पायदान तक ही चढ़ सका था। यह तो था "दि ब्रीज़ ऐण्ड आइ" के बारे में कुछ जानकारी, तो लीजिए सुनिए रवि के संगीत में फ़िल्म 'ये रास्ते हैं प्यार के' का शीर्षक गीत आशा भोसले की आवाज़ में।



क्या आप जानते हैं...
कि संगीतकार हेमंत कुमार के सहायक के रूप में काम करते हुए फ़िल्म 'जागृति' के मशहूर गीत "हम लाए हैं तूफ़ान से कश्ती निकाल के" की धुन दरसल रवि ने बनाई थी। लेकिन फ़िल्म क्रेडिट्स में हेमन्त दा का ही नाम छपवाया गया।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. You won't admit you love me, And so how am I ever to know? You always tell me, Perhaps, perhaps, perhaps....ये है मूल अंग्रेजी गीत, संगीतकार बताएं देसी संस्करण का - २ अंक.
२. गीतकार बताएं - ३ अंक.
३. कौन है इस गीत की गायिका - २ अंक.
४. गुरुदत्त की ये फिल्म थी, किस पर फिल्माया गया था ये नशीला गीत - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी कैसे न माने आपको महागुरु, फिर एक बार सही है जवाब आपका, इंदु जी और अवध जी भी स्पोट ऑन हाँ, किश जी, मुझे लगता है अब आप एकदम सही समझ पाए हैं पहेली को, पहल जवाब गलत हुआ तो क्या हुआ, संभले तो सही, सही जवाब देकर बधाई, आपका खाता खुल चुका है.

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Wednesday, March 3, 2010

लाई है हज़ारों रंग होली...और हजारों शुभकामनाएं संगीतकार रवि को जन्मदिन की भी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 362/2010/62

'गीत रंगीले' शृंखला की दूसरी कड़ी में आप सभी का एक बार फिर स्वागत है। दोस्तों, आप ने बचपन में अपनी दादी नानी को कहते हुए सुना होगा कि "उड़ गया पाला, आया बसंत लाला"। ऋतुराज बसंत के आते ही शीत लहर कम होने लग जाती है, और एक बड़ा ही सुहावना सा मौसम चारों तरफ़ छाने लगता है। थोड़ी थोड़ी सर्दी भी रहती है, ओस की बूँदों से रातों की नमी भी बरकरार रहती है, ऐसे मदहोश कर देने वाले मौसम में अपने साजन से जुदाई भला किसे अच्छा लगता है! तभी तो किसी ने कहा है कि "मीठी मीठी सर्दी है, भीगी भीगी रातें हैं, ऐसे में चले आओ, फागुन का महीना है"। ख़ैर, हम तो आज बात करेंगे होली की। होली फागुन महीने की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता, और आम तौर पर फागुन का महीना ग्रेगोरियन कलेण्डर के अनुसार फ़रवरी के मध्य भाग से लेकर मार्च के मध्य भाग तक पड़ता है। और यही समय होता है बसंत ऋतु का भी। दोस्तों, आज हमने जो गीत चुना है इस रंगीली शृंखला में, वह कल के गीत की ही तरह एक होली गीत है। और क्योंकि आज संगीतकार रवि जी का जनमदिन है, इसलिए हमने सोचा कि क्यों ना उन्ही का स्वरबद्ध किया हुआ वह मशहूर होली गीत सुनवा दिया जाए जिसे आशा भोसले और साथियों ने फ़िल्म 'फूल और पत्थर' के लिए गाया था, "लाई है हज़ारों रंग होली, कोई तन के लिए, कोई मन के लिए"!

'फूल और पत्थर' १९६६ की फ़िल्म थी जिसका निर्माण व निर्देशन ओ. पी. रल्हन ने किया था। मीना कुमारी, धर्मेन्द्र और शशिकला के अभिनय से सजी यह फ़िल्म बेहद सराही गई थी। इस फ़िल्म के लिए इन तीनों कलाकारों का नाम फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कारों के लिए क्रम से सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री, सर्वश्रेष्ठ अभिनेता और सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेत्री के लिए नामांकित किया गया था। लेकिन इस फ़िल्म के लिए जिन दो कलाकारों ने पुरस्कार जीते, वो थे शांति दास (सर्वश्रेष्ठ कला निर्देशन) तथा वसंत बोरकर (सर्वश्रेष्ठ एडिटिंग्)। इस फ़िल्म में शक़ील बदायूनी और रवि ने मिलकर कुछ कालजयी गानें हमें दिए हैं, जैसे कि "सुन ले पुकार आई आज तेरे द्वार", "शीशे से पी या पयमाने से पी", "ज़िंदगी में प्यार करना सीख ले" और आज का होली गीत। दोस्तों, जैसा कि हमने बताया कि यह होली गीत शक़ील साहब का लिखा हुआ है, तो मुझे एकाएक यह ख़याल आया कि शक़ील साहब ने अपने करीयर में कुछ बेहद महत्वपूर्ण होली गीत हमारी फ़िल्मों को दे गए हैं। आइए कम से कम दो ऐसे गीतों का उल्लेख यहाँ पर किया जाए। फ़िल्म 'कोहिनूर' में उन्होने लिखा था "तन रंग लो जी आज मन रंग लो", जिसका शुमार सर्वोत्तम होली गीतों में होनी चाहिए। फ़िल्म 'मदर इंडिया' में भी एक ऐसा ही मशहूर होली गीत शक़ील साहब ने लिखा था जो आज भी होली के अवसर पर उसी ताज़गी से सुनें और सराहे जाते हैं। याद है ना शम्शाद बेग़म का गाया "होली आई रे कन्हाई रंग छलके सुना दे ज़रा बांसुरी"! 'फूल और पत्थर' के अलावा शक़ील और रवि के जोड़ी की एक और महत्वपूर्ण फ़िल्म है 'चौधवीं का चाँद', 'दो बदन', 'घराना', 'घुंघट', और 'दूर की आवाज़' प्रमुख। तो दोस्तों, आइए रवि साहब को एक बार फिर से जनमदिन की शुभकानाएँ देते हैं, आप दीर्घायु हों, उत्तम स्वास्थ्य लाभ करें, और ख़ुशियों के सभी रंग आपकी ज़िंदगी को रंगीन बनाए रखे बिल्कुल आपके गीतों की तरह, और ख़ास कर के आप की बनाई हुई आज के इस प्रस्तुत होली गीत की तरह।



क्या आप जानते हैं...
कि गुरु दत्त साहब के अनुरोध पर शक़ील बदायूनी ने पहली बार नौशाद साहब के बग़ैर फ़िल्म 'चौधवीं का चाँद' में संगीतकार रवि के लिए गीत लिखे, काम शुरु करने से पहले शक़ील ने रवि से कहा था कि "मैंने बाहर कहीं काम नहीं किया है, मुझे संभाल लेना"।

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. मुखड़े में शब्द है "उमरिया", गीत बताएं -३ अंक.
2. इस अनूठे गीत के संगीतकार का नाम बताएं - ३ अंक.
3. इस फिल्म के नाम में दो बार एक संख्या का नाम आता है, फिल्म का नाम बताएं- २ अंक.
4. मीना कपूर की आवाज़ में इस गीत के गीतकार कौन हैं -सही जवाब के मिलेंगें २ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
शरद जी आपका जवाब तो सही है, पर बाकी दुरंधर कहाँ गए, लगता है होली का रंग उतरा नहीं अभी :)
खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Wednesday, January 20, 2010

एक धुंध से आना है एक धुंध में जाना है, गहरी सच्चाईयों की सहज अभिव्यक्ति यानी आवाज़े महेंदर कपूर

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 320/2010/20

र आज हम आ पहुँचे हैं 'स्वरांजली' की अंतिम कड़ी में। गत ९ जनवरी को पार्श्वगायक महेन्द्र कपूर साहब की जयंती थी। आइए आज 'स्वरांजली' की अंतिम कड़ी हम उन्ही को समर्पित करते हैं। महेन्द्र कपूर हमसे अभी हाल ही में २७ सितंबर २००८ को जुदा हुए हैं। ९ जनवरी १९३४ को जन्मे महेन्द्र कपूर साहब के गाए कुछ गानें आप 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर सुन चुके हैं। बी. आर. चोपड़ा की फ़िल्मों में अक्सर हमने उनकी आवाज़ पाई है। साहिर लुधियानवी के बोल, रवि का संगीत और महेन्द्र कपूर की आवाज़ चोपड़ा कैम्प के कई फ़िल्मों मे साथ साथ गूंजी। इस तिकड़ी के हमने फ़िल्म 'गुमराह' के दो गानें सुनवाए हैं, "आप आए तो ख़याल-ए-दिल-ए-नाशाद आया" और "चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों"। आज भी हम एक ऐसा ही गीत लेकर आए हैं, लेकिन यह फ़िल्म बी. आर. चोपड़ा की दूसरी फ़िल्मों से बिल्कुल अलग हट के है। यह है १९७३ की फ़िल्म 'धुंध' का शीर्षक गीत, "संसार की हर शय का इतना ही फ़साना है, एक धुंध से आना है एक धुंध में जाना है"। साहिर लुधियानवी के क्रांतिकारी गीतों ने बी. आर. चोपड़ा की फ़िल्मों को एक अलग ही दर्जे तक पहुँचाया है। और रवि के संगीत में और महेन्द्र कपूर की आवाज़ में ये गानें बहुत खुलकर सामने आए हैं और कालजयी बन गए हैं। आज का प्रस्तुत गीत एक दार्शनिक गीत है जिसमें मनुष्य जीवन की क्षणभंगुरता के बारे में कहा गया है। एक सस्पेन्स थ्रिलर होने की वजह से फ़िल्म का नाम 'धुंध' रखा गया और साहिर साहब ने सस्पेन्स को बरक़रार रखते हुए कितनी ख़ूबी से जीवन दर्शन को सामने लाया है इस गीत के माध्यम से। मुझे नहीं लगता कि धुंध पर इससे बेहतर और इससे सरल कोई गीत लिखा जा सकता है!

'धुंध' १९७३ की फ़िल्म थी। बी. आर. चोपड़ा निर्मित और निर्देशित इस फ़िल्म में मुख्य कलाकार थे संजय ख़ान, ज़ीनत अमान, डैनी और नवीन निश्चल। यह फ़िल्म अगाथा क्रिस्टी के नाटक 'ऐन अन-एक्स्पेक्टेड गेस्ट' पर आधारित थी, जिसका हिंदी फिल्मीकरण किया लेखक अख्तर-उल-रहमान, अख़्तर मिर्ज़ा और सी. जे. पावरी ने। इस रोंगटे खड़े कर देने वाली मर्डर मिस्ट्री का प्लॊट कुछ इस तरह से था कि एक रात चन्द्रशेखर (नवीन निश्चल) की गाड़ी गहरे धुंद में ख़राब हो जाती है। कार की हेडलाइट से उन्हे सामने एक मकान नज़र आता है। दरवाज़े पर खटखटाने जाते हैं तो दरवाज़ा खुला हुआ ही पाते हैं। वो अंदर जाते हैं और देखते हैं कि कुर्सी पर एक आदमी बैठा हुआ है। उनसे वो एक टेलीफ़ोन करने की इजाज़त माँगते हैं। उस आदमी से कोई जवाब ना पाकर जैसे ही उन्हे हिलाते हैं तो वो आदमी (डैनी) नीचे गिर जाता है। दरअसल वो उस आदमी की लाश थी। चन्द्रशेखर सामने रखे टेलीफ़ोन से जैसे ही पुलिस को ख़बर करने के लिए आगे बढ़ता है तो अंधेरे से रानी रणजीत सिंह (ज़ीनत अमान, डैनी की पत्नी) हाथ में रिवोल्वर लिए उसके सामने आ जाती है। वो बताती है कि उसी ने अपने उस अत्याचारी पति का ख़ून किया है। चन्द्रशेखर रानी की तरफ़ आकर्षित भी होता है, उस पर दया भी आती है। दोनों मिल कर लाश को ठिकाने लगाने के बारे में सोचता है। क्या होता है आगे चलकर? आख़िर क्या है इस ख़ून का राज़? कौन है ख़ूनी? यही है इस फ़िल्म की कहानी। बड़ी ज़बरदस्त फ़िल्म है, अगर आप ने अब तक नहीं देख रखी है, तो ज़रूर देखिएगा। मेरे अनुसार हिंदी सिनेमा के सस्पेन्स फ़िल्मों में यह एक अव्वल दर्जे का सस्पेन्स थ्रिलर है। ख़ैर, अब वापस मुड़ते हैं आज के गीत पर। 'उजाले उनकी यादों के' कार्यक्रम में ममता सिंह ने जब महेन्द्र कपूर से पूछा था कि इस गीत को गाने के लिए क्या उन्हे कोई विशेष तैयारी करनी पड़ी थी, तो उनका जवाब था - "तब तक मैं बहुत गानें गा चुका था, इसलिए ज़्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी। इस गाने का मूड भी वही था जो "नीले गगन के तले" का था।" चलिए दोस्तों, महेन्द्र कपूर साहब की याद में सुनते हैं यह गीत और 'स्वरांजली' शृंखला को समाप्त करते हुए हम भी यही दोहराते हैं कि "संसार की हर शय का इतना ही फ़साना है, एक धुंध से आना है, एक धुंध में जाना है"। धन्यवाद !



चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम रोज आपको देंगें ४ पंक्तियाँ और हर पंक्ति में कोई एक शब्द होगा जो होगा आपका सूत्र. यानी कुल चार शब्द आपको मिलेंगें जो अगले गीत के किसी एक अंतरे में इस्तेमाल हुए होंगें, जो शब्द बोल्ड दिख रहे हैं वो आपके सूत्र हैं बाकी शब्द बची हुई पंक्तियों में से चुनकर आपने पहेली सुलझानी है, और बूझना है वो अगला गीत. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

मेरी बेकरारियों का सबब मत पूछ,
आजमा मेरे सब्र को तू इस तरह,
रोये हैं मैंने खून के आंसू बरसों,
तेरे साथ को हूँ मैं तरसा इस तरह...

अतिरिक्त सूत्र - महिला संगीतकारों में इनका नाम अग्रिणी है

पिछली पहेली का परिणाम-
वाह वाह अवध जी, आपको विजेता के रूप में पाकर आज बड़ी खुशी हो रही है, २ अंक मुबारक हो आपको...

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Thursday, November 19, 2009

दादी अम्मा दादी अम्मा मान जाओ...जब तुतलाती आवाजों में ऐसे बच्चे मनाएं तो कौन भला रूठा रह पाए

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 267

'ब्रच्चों का एक गहरा लगाव होता है अपने दादा-दादी और नाना-नानी के साथ। कहते हैं कि बूढ़ों और बच्चों में ख़ूब अच्छी बनती है। कभी दादी-नानी बच्चों को परियों की कहानी सुनाते हुए रूपकथाओं के देश में ले जाते हैं तो कभी सर्दी की किसी सूनसान रात में बच्चों के ज़िद पर भूतों की ऐसी कहानी सुनाते हैं कि फिर उसके बाद बच्चे बिस्तर से नीचे उतरने में भी डरते हैं। कहानी चाहे कोई भी हो, नानी-दादी से कहानी सुनने का मज़ा ही कुछ और है। ठीक इसी तरह से बच्चे भी अपने इन बड़े बुज़ुर्गों का ख़याल रखते हैं। उनके साथ सैर पे जाना, उनकी छोटी मोटी ज़रूरतों को पूरा करना, चश्मा या लाठी खोजने में मदद करना जैसे काम नाती पोती ही तो करते आए हैं। घर में जब तक बड़े बूढ़े और बच्चे हों, घर की रौनक ही कुछ और होती है। अफ़सोस की बात है कि आज की पीढ़ी के बहुत से लोग अपने बूढ़े माँ बाप से अलग हो जाते हैं। ऐसे में आज के बच्चे भी अपने दादा-दादी से अलग हो जाते हैं। यह एक ऐसी हानि हो रही है बच्चों की जिसकी किसी भी और तरीके से भरपाई होना असंभव है। जो संस्कृति और शिक्षा दादा-दादी और नाना-नानी से मिलती है, वो किसी और सूत्र से मिल पाना संभव नहीं। ख़ैर, अब हम आते हैं आज के गीत पर जिसमें अपनी दादी अम्मा को मनाया जा रहा है। कभी ना कभी हर घर में ऐसा होता है कि जब बच्चे बहुत ज़्यादा शरारत करते हैं, बात नहीं सुनते, तो दादी उनसे रूठ जाती हैं भले ही झूठ मूठ का क्यों ना हो! तो कुछ ऐसी ही रूठने मनाने की बात चल रही है आज के प्रस्तुत गीत में जो है फ़िल्म 'घराना' का। आशा भोसले और कमल बारोट की युगल आवाज़ों में यह गीत है "दादी अम्मा दादी अम्मा मान जाओ, छोड़ो भी यह गुस्सा ज़रा हँस के दिखाओ"।

'घराना' १९६१ की फ़िल्म थी जिसमें मुख्य कलाकार थे राजेन्द्र कुमार, राज कुमार, आशा पारेख और शोभा खोटे। लेकिन एस. एस. वासन निर्देशित इस फ़िल्म के इस गीत में जिस दादी और जिन बच्चों का ज़िक्र हो रहा है वो हैं दादी की भूमिका में ललिता पवार और बच्चे थे डेज़ी इरानी और मास्टर रणदीप। मुखराम शर्मा लिखित इस कहानी के तमाम किरदार इस तरह से थे - शांता (ललिता पवार) एक बहुत ही ग़ुस्सैल औरत जो पूरे परिवार को अपने इशारों पर चलाती है। उनका पति एक धार्मिक और शांत स्वभाव का इंसान जो अपनी पत्नी के रास्ते नहीं आते। परिवार में हैं उनकी बड़ी विधवा बहू और उसके दो छोटे छोटे बच्चे। शांता का मझला बेटा कैलाश (राज कुमार) और छोटा बेटा कमल (राजेन्द्र कुमार) जो एक कॊलेज स्टुडेंट है जिसे उषा (आशा पारेख) नाम की लड़की से प्यार है। अचानक शांता की बिगड़ी हुई लड़की अपना ससुराल छोड़कर मायके चली आती है और घर में फूट डालने की कोशिश करती है। हम फ़िल्म की कहानी पर नहीं जाएँगे क्योंकि फ़िल्म की मूल कहानी से बच्चों का कोई लेना देना नहीं है, हम तो भई आज अपनी दादी अम्मा को मनाने के मूड में हैं। तो इससे पहले कि हम अपना प्रयास शुरु करें, आपको बता दें कि इस फ़िल्म ने उस साल कई पुरस्कार बटोरे थे फ़िल्मफ़ेयर में, जैसे कि सर्वश्रेष्ठ संगीतकार के रूप में रवि, सर्वश्रेष्ठ गीतकार शक़ील बदायूनी ("हुस्नवाले तेरा जवाब नहीं" गीत के लिए)। शोभा खोटे को सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेत्री के लिए और रफ़ी साहब को सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायक ("हुस्नवाले तेरा जवाब नहीं") के लिए नामांकित किया गया था। तो चलिए अब सुना जाए आशा भोसले और कमल बारोट की आवाज़ों में शक़ील - रवि की यह बाल-रचना। ज़रा सुनिए तो सही कि शक़ील के क़लम से कैसे लगते हैं "खाली पीली" जैसे शब्द, और ज़रा याद कीजिए कि कभी आप ने भी अपनी दादी नानी को इसी तरह से मनाया होगा!!!



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (अब तक के चार गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी (दो बार), स्वप्न मंजूषा जी, पूर्वी एस जी और पराग सांकला जी)"गेस्ट होस्ट".अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. बच्चों की आवाजें है इस गीत में सुषमा सेठ और प्रतिभा की.
२. फिल्म में राजेश खन्ना एक यादगार अतिथि भूमिका में दिखे थे.
३. फिल्म के एक अन्य गीत के लिए गीतकार को सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फिल्म फेयर प्राप्त हुआ था.

पिछली पहेली का परिणाम -

अरे ये हम क्या देख रहे हैं..नीलम जी का खाता खुल ही गया..बधाई....जमे रहिये....शरद जी, पराग जी....और आप सब पुराने श्रोताओं से गुजारिश है कि कुछ सुझाव दें जिसे हम ३०१ वें एपिसोड से इस फोर्मेट में कुछ सकारात्मक बदलाव करसकें

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Sunday, November 15, 2009

बच्चे मन के सच्चे....साहिर साहब के बोलों में झलकता निष्पाप बचपन का प्रतिबिम्ब

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 263

न दिनों 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर आप सुन रहे हैं बच्चों वाले गीतों की एक ख़ास लघु शृंखला 'बचपन के दिन भुला ना देना'। आज एक गीत लता मंगेशकर की आवाज़ में हो जाए? इसमें इन्होने प्लेबैक दिया है बाल कलाकार बेबी सोनिया का। बेबी सोनिया का नाम शायद आपने कभी नहीं सुना होगा लेकिन अगर हम यह कहें कि यही बेबी सोनिया आगे चलकर नीतू सिंह के नाम से जानी गई तो फिर कोई और तारुफ़ की मोहताज नही रह जाएँगी बेबी सोनिया। जी हाँ, १९६८ की फ़िल्म 'दो कलियाँ' में बेबी सोनिया के नाम से नीतू सिंह नज़र आईँ थीं एक नहीं बल्कि दो किरदारों में - गंगा और जमुना। यानी कि दो जुड़वा बहनों के लिए उनका डबल रोल था। इस फ़िल्म में युं तो बिस्वजीत और माला सिंहा नायक-नायिका के रोल में थे, लेकिन कहानी में नीतू सिंह की बेहद महत्वपूर्ण भूमिका रही। अजी साहब, फ़िल्म का शीर्षक ही तो बता रही है कि दोनों जुड़वा बहनों को दो कलियाँ कहा गया है। नीतू पर फ़िल्म में कम से कम दो गानें फ़िल्माए गए जिन्हे लता जी ने ही गाए। युं तो फ़िल्म का सब से लोकप्रिय गीत एक लता-रफ़ी डुएट है "तुम्हारी नज़र क्यों ख़फ़ा हो गई", लेकिन बेबी सोनिया पर फ़िल्माया दोनो गीत उस ज़माने में काफ़ी मशहूर हुए थे। इनमें से एक गीत है "मुर्गा मुर्गी प्यार से देखे, नन्हा चूज़ा खेल करे", और दूसरा गीत था वह जो आज हम आपको सुनवाने के लिए लाए हैं और वह गीत है "बच्चे मन के सच्चे सारी जग की आँख के तारे, ये वो नन्हे फूल हैं जो भगवान को लगते प्यारे"। इस गीत को लिखा था साहिर लुधियानवी ने और तर्ज़ बनाई रवि ने। साहिर साहब को याद करते हुए ख़ास इस गीत के बारे में रवि जी ने विविध भारती को बताया था - "साहिर साहब का यह स्वभाव था कि गाने का सिचुयशन लेकर ग़ायब हो जाते थे। रिकार्डिंग् के चंद रोज़ पहले गाना लेकर वापस आते और गाना भी ऐसा कि एक शब्द इधर से उधर करने की कोई गुंजाइश नहीं रहती थी। फ़िल्म 'दो कलियाँ' में "बच्चे मन के सच्चे", इस गाने में उन्होने ऐसे ऐसे शब्दों का प्रयोग किया है कि इससे बेहतर और कुछ हो ही नहीं सकता!"

'दो कलियाँ' का निर्माण किया था एम. कुमारम, एम. सर्वनन और एम. मुरुगन ने और फ़िल्म को निर्देशित किया आर. कृष्णन और एस. पन्जु ने। एन. सितारमण की कहानी पर संवाद लिखे मुखराम शर्मा ने। क्योंकि फ़िल्म की कहानी दो छोटी बच्चियों का अपने माँ बाप के बीच पनपी दूरी को मिटाने का था, तो क्यों ना फ़िल्म की कहानी थोड़ी विस्तार में आपको बताई जाए। अमीर और अहंकारी किरण (माला सिंहा) की मुलाक़ात कॊलेज में होती है एक सीधे सादे साधारण घर के लड़के शेखर (बिस्वजीत) से। कई मतभेदों और ग़लतफ़हमियों के बाद जाकर दोनों में आख़िरकार प्यार हो ही जाता है। जब वे शादी करने का फ़ैसला करते हैं तो किरण की सख़्त मम्मी यह शर्त रख देती है कि शादी के बाद शेखर घर जमाई बन कर रहेगा। अपने प्यार के ख़ातिर शेखर मान तो जाता है लेकिन शादी के बाद ही उसे पता चल जाता है कि उस घर में उसकी हैसियत एक दामाद की नहीं बल्कि एक नौकर की है। वो किरण को लेकर कहीं और जाकर घर बसाने की सोचता है लेकिन किरण उसे धीरज धरने को कहती है। किरण और शेखर के घर दो जुड़वा बेटियों (गंगा और जमुना) का जन्म होता है लेकिन शेखर को घर के हालात में कोई सुधार नहीं दिखाई देता। आख़िर वो तंग आकर गंगा को लेकर घर छोड़ के चला जाता है। गंगा और जमुना अलग अलग बड़ी होने लगती है। क़िस्मत से दोनों बहनों की मुलाक़ात हो जाती है, एक की माँ और एक के पिता ना होने से दोनों समझ जाते हैं कि वे बहने हैं। दोनों एक खेल रचते हैं। गंगा जमुना की जगह चली जाती है अपनी माँ के पास और जमुना अपने पिता के पास। फिर दोनों अपनी कोशिशों से अपने माता पिता को फिर से एक कर देते हैं और फ़िल्म का सुखांत होता है। गंगा और जमुना के डबल रोल में नीतू सिंह का काम बेहद सराहा गया था। इस फ़िल्म के बाद लोग समझ गये थे कि बड़ी होकर यह लड़की नामचीन अदाकारा बनेगी और वैसा ही हुआ। तो आइए अब सुनते हैं यह गीत और याद कीजिए अपने स्कूल के दिनों को जब प्रेयर के वक़्त आप कतार में खड़े होकर कोई भक्ति गीत गाया करते थे!



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (अब तक के चार गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी, स्वप्न मंजूषा जी, पूर्वी एस जी और पराग सांकला जी)"गेस्ट होस्ट".अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. बच्चों को समर्पित इस बेहद प्यारी फिल्म में मास्टर राजू और मास्टर तितो के साथ थे उत्तम कुमार और विध्या सिन्हा.
२. बेहद कमाल के शब्द, और संगीतकार ने इस गीत को जो ट्रीटमेंट दिया है वो बेमिसाल है.
३. दो गायिकाओं ने इसे गाया है जिनमे से एक है पद्मिनी कोल्हापुरी.

पिछली पहेली का परिणाम -

शरद जी मात्र एक जवाब दूर हैं दूसरी बार विजेता का ताज पहनने से बहुत बहुत बधाई. नीलम जी धन्येवाद....अपने बच्चों की (बाल उधान के) हजारी लगाईये अब यहाँ अगले दस दिनों तक....निर्मला जी आभार.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Wednesday, October 14, 2009

किस्मत के खेल निराले मेरे भैया...गायक संगीतकार और गीतकार रवि साहब की जिंदगी को छूती रचना

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 232

हते हैं कि क़िस्मत में जो रहता है, वही होता है। शुरु से ही इस बात पर बहस चलती आ रही है कि क़िस्मत बड़ी है या मेहनत। यक़ीनन इस दुनिया में मेहनत का कोई विकल्प नहीं है, लेकिन इस बात को भी अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि क़िस्मत का भी एक बड़ा हाथ होता है हर किसी की ज़िंदगी में। ख़ैर, यह मंच सही जगह नहीं है इस बहस में जाने का, लेकिन आज का जो गीत हम आपके लिए लेकर आए हैं वह क़िस्मत के खेल की ही बात कहता है। संगीतकार रवि फ़िल्मी दुनिया में आए थे एक गायक बनने के लिए, लेकिन बन गए संगीतकार। शायद यह भी उनके क़िस्मत में ही लिखा था। इसमें कोई दोराय नहीं कि बतौर संगीतकार उन्होने हमें एक से एक बेहतरीन गीत दिए हैं ५० से लेकर ८० के दशक तक। लेकिन शुरुआत में उनकी दिली तमन्ना थी कि वो एक गायक बनें। ख़ुद संगीतकार बन जाने के बाद ना तो उनके फ़िल्मों के निर्माताओं ने उन्हे कभी गाने का मौका दिया और ना ही किसी दूसरे संगीतकार ने उनसे गवाया। हालाँकि उनकी आवाज़ हिंदी फ़िल्मों के टिपिकल हीरो जैसी नहीं थी, लेकिन एक अजीब सी कशिश उनकी आवाज़ में महसूस की जा सकती है जो सुननेवाले को अपनी ओर आकृष्ट कर लेती है। आज हम आपको रवि का गाया फ़िल्म 'एक फूल दो माली' का दार्शनिक गीत सुनवाने के लिए लाए हैं "क़िस्मत के खेल निराले मेरे भ‍इया"। इस फ़िल्म के संगीतकार भी वो ही हैं, और सब से बड़ी बात कि इस गीत को उन्होने ही लिखा है। जी हाँ, फ़िल्म के पर्दे पर ज़रूर प्रेम धवन का नाम दिया गया था, लेकिन रवि जी ने ही अपने एक इंटरव्यू में कहा था कि यह गीत उन्होने ही लिखा था। तो भई, आज के 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर तो एक तरह से रवि जी का ही राज है।

हाल ही में हमने आपको रवि के संगीत निर्देशन में एक भजन सुनवाया था "दर्शन दो घनश्याम" और उनके बचपन का क़िस्सा भी बताया था कि किस तरह से वो सत्संग में जाकर भजन गाया करते थे। क्योंकि आज बात चली है रवि जी की गायकी की, तो आइए उसी इंटरव्यू (उजाले उनकी यादों के, विविध भारती) से कुछ और बातें जानें रवि जी की गायकी के बारे में। इंटरव्यू के इस अंश को पढ़कर आप भी यही बोल पड़ेंगे कि "क़िस्मत के खेल निराले मेरे भ‍इया"। और अब, ओवर टू रवि जी। "आपको पता है रेडियो में गाने के लिए जिन्होने मेरा ऒडिशन लिया था वो और कोई नहीं बल्कि महान सितारिस्ट पंडित रविशंकर जी थे। उन्होने कहा कि मेरी आवाज़ अच्छी है और मुझे और रियाज़ करनी चाहिए। मेरी बहुत इच्छा थी कि मैं अपनी रिकार्ड की हुई आवाज़ सुनूँ। १९४९ के आख़िर में एक बहुत बड़ा 'वर्ल्ड ट्रेड फ़ेयर' दिल्ली के राम लीला मैदान में आयोजित किया गया था। मैं अपने कुछ दोस्तों के साथ वहाँ गया। वहाँ बहुत सारे स्टॊल्स थे, मैनें देखा कि एक स्टॊल में 'वायर रिकार्डर' के नाम से कुछ रखा हुआ है। मैने दुकानदार से पूछा कि यह क्या है। उसने बताया कि इसमें आवाज़ रिकार्ड करके दोबारा बजाया जा सकता है। मैं अपनी रिकार्डेड आवाज़ सुनना चाह रहा था बहुत दिनों से, तो मैने सोचा कि यही अच्छा मौका है, लेकिन मैं दोस्तों के सामने नहीं करना चाहता था। इसलिए मैं अगले दिन फिर अकेला गया और जो गीत रिकार्ड करवाया वह था "तेरे कूचे में अरमानों की दुनिया लेकर आया हूँ"। जब उसने रिकार्डिंग् को बजाया, तो मैं सोच रहा था कि आवाज़ तो रफ़ी साहब से मिल रही है। (यह सुनकर विविध भारती के सारे उद्‍घोषक ज़ोर से हँस पड़े थे)। तो यह पहली बार मैने अपनी आवाज़ सुनी। मेरे दोस्त भी कहते थे कि मेरी आवाज़ अच्छी है और मुझे बम्बई में क़िस्मत आज़माने जाना ही चाहिए। मैं भी मानता था कि मैं बम्बई जाकर ज़िंदगी में कुछ कर सकता हूँ। जब P&T वालों ने मुझे पठानकोट स्थानांतरित करने का नोटिस दिया तो मैने तीन सुझाव दिए - पहला दिल्ली, दूसरा बम्बई, और तीसरा भारत का कोई और शहर। लेकिन मेरे अनुरोध को स्वीकारा नहीं गया और मुझे पठानकोट जाने का आदेश मिला। मैं निराश होकर घर आया और २० दिनों की छुट्टी लेकर बम्बई की ट्रेन में बैठ गया। मैं बम्बई में किसी को नहीं जानता था। यह १९४५ की बात है, तब तक मेरी शादी भी हो गई थी और एक बेटी भी थी। मैंने बम्बई की ट्रेन में गीतों की किताब पढ़कर समय बिताया।" दोस्तों, बम्बई में उतरने के बाद रवि साहब के संघर्ष का दौर शुरु हुआ, और आख़िर में वो हेमन्त कुमार के दरवाज़े तक पहुँच ही गए, जहाँ पर हेमन्त दा ने उन्हे कोरस में शामिल कर लिया। एकल गीत गाने का तो सुयोग नहीं हुया लेकिन हेमन्त दा उनकी संगीत प्रतिभा को पहचान गए और उन्हे अपना सहायक बना लिया। तो दोस्तों, आज बस यहीं तक, रवि साहब की दास्तान आगे भी जारी रहेगी जब भी कभी हम उनके गीत लेकर आएँगे इस महफ़िल में। सुनिए आज का यह गीत और टिप्पणी में ज़रूर लिखिएगा कि क़िस्मत के खेल के बारे में आपके क्या विचार हैं? क्या आप क़िस्मत पर विश्वास करते हैं? क्या आपको लगता है कि चाहे आदमी लाख मेहनत करे, उसकी मेहनत तभी रंग लाएगी जब उसकी क़िस्मत उस पर मुहर लगाएगी? कल फिर मिलेंगे इसी महफ़िल में।



किस्मत के खेल निराले मेरे भैया
किस्मत का लिखा कौन टाले मेरे भैया ।

किस्मत के हाथ में दुनिया की डोर है
किस्मत के आगे तेरा कोई न ज़ोर है
सब कुछ है उसी के हवाले मेरे भैया ।

किस्मत में लिक्खा है जो सुख का सबेरा
कब तक रहेगा ये ग़म का आंधेरा
इक दिन तो मिलेंगे उजाले मेरे भैया ।

ये सच्चा तीरथ ऊँचा हिमालय
ये मन का मन्दिर सुख का शिवालय
धूनी यहीं पे तू रमा ले मेरे भैया ।

दुनिया में प्राणी क्या क्या सपने सजाए
किस्मत की आँधी उन्हे पल में मिटाए
बिगड़ी को कौन संभाले मेरे भैया


और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. इस संगीतकार जोड़ी के एक पार्टनर की जयंती है कल.
२. ऋषिकेश मुखर्जी है इस फिल्म के निर्देशक.
३. इस रोमांटिक दोगाने के मुखड़े में शब्द है - "सर".

पिछली पहेली का परिणाम -

रोहित जी बधाई एक बार फिर आपके ३३ अंक हो चुके हैं, इसी तरह से आते रहेंगें तो पूर्वी जी के लिए मुश्किलें खड़ी पर पायेंगें कुछ हद तक.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Sunday, August 23, 2009

चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाए हम दोनों....साहिर ने लिखा यह यादगार गीत.

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 180

रद तैलंग जी के फ़रमाइशी गीतों को सुनते हुए आज हम आ पहुँचे हैं उनकी पसंद के पाँचवे और अंतिम गीत पर, और साथ ही हम छू रहे हैं 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के १८०-वे अंक को। आज का गीत है निर्माता-निर्देशक बी. आर चोपड़ा की फ़िल्म 'गुमराह' का "चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनो", जिसे महेन्द्र कपूर ने गाया है। इससे पहले भी हम ने 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर इसी फ़िल्म का एक और गीत आप को सुनवाया था महेन्द्र कपूर साहब का ही गाया हुआ, "आप आए तो ख़याल-ए-दिल-ए-नाशाद आया"। इस फ़िल्म के बारे में तमाम जानकारी आप उस आलेख में पढ़ सकते हैं। आज चलिए बात करते हैं महेन्द्र कपूर की। अभी पिछले ही साल २७ सितंबर के दिन महेन्द्र कपूर का देहावसान हो गया। वो एक ऐसे गायक रहे हैं जिनकी गायकी के कई अलग अलग आयाम हैं। एक तरफ़ अगर ख़ून को देश भक्ति के जुनून से गर्म कर देनेवाले देशभक्ति के गीत हैं, तो दूसरी तरफ़ शायराना अंदाज़ लिए नरम-ओ-नाज़ुक प्रेम गीत, एक तरफ़ जीवन दर्शन और आशावादी विचारों से ओत-प्रोत नग़में हैं तो दूसरी तरफ़ ग़मगीन टूटे दिल की सदा भी उनकी आवाज़ में ढलकर कुछ इस क़दर बाहर आयी है कि सीधे दिल पे असर कर गई। "तुम्हे भी कोई उलझन रोकती है पेश कदमी से, मुझे भी लोग कहते हैं के ये जलवे पराये हैं, मेरे हमराह भी रुसवाइयाँ हैं मेरे माज़ी की, तुम्हारे साथ भी गुज़री हुई रातों के साये हैं"। साहिर लुधियानवी के बोल और रवि का संगीत था इस फ़िल्म में।

महेन्द्र कपूर के साथ संगीतकार रवि का एक बहुत लम्बा साथ रहा। वजह शायद यही कि ये दोनों चोपड़ा कैम्प के नियमित सदस्य थे। ऐसा भी कह सकते है कि रवि के संगीत निर्देशन में महेन्द्र कपूर ने बहुत से लोकप्रिय गीत गाए हैं। विविध भारती के 'उजाले उनकी यादों के' कार्यक्रम में महेन्द्र कपूर ने रवि साहब के बारे में कहा था - "रवि जी एक बहुत बड़े संगीतकार हैं, जो 'पोएट्री' समझते हैं, और धुन बनाते वक़्त 'पोएट्री' को 'डिस्टर्ब' नहीं करते। वो हर गाने पर बहुत मेहनत करते हैं। हर गीत के २ से ४ अलग अलग धुनें बनाते हैं और फिर पार्श्व गायक और दूसरे लोगों से सब से अच्छी वाली धुन चुनने के लिए कहते हैं। और तब जाके 'फ़ाइनल ट्युन' निर्धारित होती है।" ९ जनवरी १९३४ को अमृतसर मे जन्मे महेन्द्र कपूर अपने ४० दिन की आयु में ही बम्बई आ गए। ५ वर्ष की आयु में उन्होने गाना शुरु किया। १२ वर्ष की आयु में वे पहुँच गए अपने आदर्श मोहम्मद रफ़ी साहब के पास। रफ़ी साहब ने उन्हे समझाया कि अगर एक अच्छा गायक बनना है तो पहले शास्त्रीय संगीत का सीखना बेहद ज़रूरी है। और हर गायक का अपना एक मौलिक 'स्टाइल' होना चाहिए। १९५७ में जब वे कालेज में पढ़ रहे थे तब 'All India Metro Murphy competition' में उन्होने हिस्सा लिया जिसका विषय था हिंदी फ़िल्मों में पार्श्व गायन का मोहरा। हालाँकि महेन्द्र कपूर ने १९५३ में वी. बल्सारा की फ़िल्म 'मदमस्त' में गा चुके थे, पर इस प्रतियोगिता ने उनके लिए पार्श्व गायन का द्वार खोल दिया। इस प्रतियोगिता में जज थे नौशाद और सी. रामचन्द्र। इस प्रतियोगिता को जीतने के बाद नौशाद और सी. रामचन्द्र, दोनों ने महेन्द्र कपूर से गाने गवाए (नौशाद -सोहनी महिवाल, सी. रामचन्द्र - नवरंग)। फिर उसके बाद महेन्द्र कपूर को कभी पीछे मुड़कर देखने की ज़रूरत नहीं पड़ी। तो दोस्तों, ये तो थी महेन्द्र कपूर की कुछ बातें, आइए अब 'गुमराह' फ़िल्म के उस गीत को सुना जाए जिसकी फ़रमाइश हमें लिख कर भेजी है शरद तैलंग साहब ने।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. मुकेश के गाये गीतों में से ऐसे गीत जो उन्हें खुद हैं सबसे प्रिय, कल है इस शृंखला का पहला गीत.
२. शैलेन्द्र हैं गीतकार.
३. मुखड़े की दूसरी पंक्ति में शब्द है -"खुदा".

पिछली पहेली का परिणाम -
पराग जी फिलहाल के लिए रेस में आप आगे निकल आये १६ अंकों के लिए बधाई....शमिख जी पूरे गीत के लिए धन्येवाद. और मंजूषा जी, आपकी महफिल भी खूब जमी हुई है.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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