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Sunday, November 17, 2013

‘दर्शन दो घनश्याम नाथ मोरी अँखियाँ प्यासी रे...’ : राग केदार में भक्तिरस

 

स्वरगोष्ठी – 144 में आज

रागों में भक्तिरस – 12

राग केदार के स्वरों से अभिसिंचित एक कालजयी भक्तिगीत


‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ की बारहवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीतानुरागियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, जारी श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपसे भारतीय संगीत के कुछ भक्तिरस प्रधान राग और उनमें निबद्ध रचनाएँ प्रस्तुत कर रहे हैं। साथ ही उस राग पर आधारित फिल्म संगीत के उदाहरण भी आपको सुनवा रहे हैं। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम आपसे राग केदार में उपस्थित भक्तिरस पर चर्चा करेंगे। आपके समक्ष इस राग के भक्तिरस-पक्ष को स्पष्ट करने के लिए हम तीन भक्तिरस से पगी रचनाएँ प्रस्तुत करेंगे। सबसे पहले हम 1957 में प्रदर्शित फिल्म ‘नरसी भगत’ का राग केदार पर आधारित एक प्रार्थना गीत और इसके बाद पण्डित जसराज के गायन और पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया के बाँसुरी वादन की आकर्षक जुगलबन्दी में एक भजन भी आप सुनेगे। 


न्द्रहवीं शताब्दी के वैष्णव भक्त कवि नरसी मेहता के जीवन पर हिन्दी में दो फिल्मों का निर्माण हुआ था। पहली फिल्म 1940 में बनी थी, जिसमें गायक-अभिनेता विष्णुपन्त पगणीस और अभिनेत्री दुर्गा खोटे ने मुख्य भूमिकाएँ निभाई थी। इस फिल्म के संगीत निर्देशक शंकरराव व्यास थे। दूसरी फिल्म 1957 में बनी थी। राग केदार पर आधारित जो भजन हम आज आपको सुनवा रहे हैं वह इसी फिल्म से है। गीत के बोल हैं- ‘दर्शन दो घनश्याम नाथ मोरी अँखियाँ प्यासी रे...’। इस गीत का एक उल्लेखनीय पक्ष यह है कि इसके गीतकार सुप्रसिद्ध कवि और साहित्यकार गोपाल सिंह नेपाली थे।

गोपाल सिंह नेपाली का जितना योगदान साहित्य जगत में रहा है, फिल्मों के गीतकार के रूप में भी उनका योगदान अतुलनीय रहा है। पाँचवें से सातवें दशक तक वे फिल्मों में सफल गीतकार के रूप में सक्रिय रहे। नेपाली जी ने फिल्मों में लगभग 400 गीतों की रचना की थी। उन्होने अधिकतर धार्मिक और सामाजिक फिल्मों में गीत लिखे। अपने फिल्मी गीतों में भी उन्होने साहित्यिक स्तर में कभी समझौता नहीं किया। 1946 में सचिनदेव बर्मन के संगीत निर्देशन में बनी फिल्म 'आठ दिन', 1953 में प्रदर्शित फिल्म 'नाग पंचमी', 1955 की फिल्म 'शिवभक्त', 1959 की फिल्म 'नई राह' तथा 1961 में प्रदर्शित फिल्म 'जय भवानी' के गीत गोपाल सिंह नेपाली की बहुआयामी प्रतिभा के उदाहरण हैं। फिल्म के इन गीतों के बीच 1957 में श्री नेपाली रचित एक ऐसा गीत फिल्म 'नरसी भगत' में शामिल हुआ जिसने लोकप्रियता के सारे कीर्तिमानों को ध्वस्त कर दिया। संगीतकार रवि द्वारा स्वरबद्ध तथा हेमन्त कुमार, मन्ना डे और सुधा मल्होत्रा के स्वरों में वह गीत है। इस गीत से जुड़ा एक उल्लेखनीय प्रसंग श्री नेपाली के निधन के चार दशक बाद सामने आया। ब्रिटिश फिल्म निर्माता डेनी बोयेल ने 'स्लमडॉग मिलियोनर' का निर्माण किया था। आस्कर पुरस्कार प्राप्त इस फिल्म में नेपाली जी के गीत का इस्तेमाल किया गया था, किन्तु फिल्म में इस गीत का श्रेय भक्तकवि सूरदास को दिया गया था। गोपाल सिंह नेपाली के सुपुत्र नकुल सिंह ने मुम्बई उच्च न्यायालय में फिल्म के निर्माता के विरुद्ध क्षतिपूर्ति का दावा भी पेश किया था। कैसा दुर्भाग्य है कि एक स्वाभिमानी गीतकार को मृत्यु के बाद भी अन्याय का शिकार होना पड़ा। संगीतकार रवि का स्वरबद्ध किया और हेमन्त कुमार, मन्ना डे और सुधा मल्होत्रा की आवाज़ में अब आप यही गीत सुनिए।



राग केदार : ‘दर्शन दो घनश्याम नाथ...’ : हेमन्त कुमार, मन्ना डे और सुधा मल्होत्रा : फिल्म नरसी भगत




भक्तिरस की अभिव्यक्ति के लिए केदार एक समर्थ राग है। कर्नाटक संगीत पद्यति में राग हमीर कल्याणी, राग केदार के समतुल्य है। षाड़व-षाड़व जाति, अर्थात आरोह और अवरोह दोनों में छह-छह स्वरों का प्रयोग होने वाला यह राग कल्याण थाट के अन्तर्गत माना जाता है। प्राचीन ग्रन्थकार राग केदार को बिलावल थाट के अन्तर्गत मानते थे, आजकल अधिकतर गुणिजन इसे कल्याण थाट के अन्तर्गत मानते हैं। इस राग में दोनों मध्यम का प्रयोग होता है। शुद्ध मध्यम का प्रयोग आरोह और अवरोह दोनों में तथा तीव्र मध्यम का प्रयोग केवल आरोह में किया जाता है। आरोह में ऋषभ स्वर और अवरोह में गान्धार स्वर वर्जित होता है। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। इस राग का गायन-वादन रात्रि के पहले प्रहर में किया जाता है। राग केदार में भक्तिरस के तत्त्व का अनुभव करने के लिए अब हम आपको इस राग के स्वरों से अभिसिंचित एक भक्तिपूर्ण रचना जुगलबन्दी रूप में सुनवाते हैं। गायन और बाँसुरी वादन की यह जुगलबन्दी प्रस्तुत कर रहे हैं, विश्वविख्यात संगीतज्ञ, पण्डित जसराज और पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया। इस भक्ति-रचना के बोल हैं, ‘गोकुल में बाजत कहाँ बधाई...’। आप राग केदार की इस भक्ति-रचना का रसास्वादन करें और मुझे इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।



राग केदार : भजन जुगलबन्दी : ‘गोकुल में बाजत कहाँ बधाई...’ : पं. जसराज और पं. हरिप्रसाद चौरसिया




आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 144वें अंक की पहेली में आज हम आपको वाद्य संगीत की एक रचना का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। यह पाँचवें सेगमेंट की चौथी पहेली है। 150वें अंक की समाप्ति तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – इस संगीत रचना के अंश को सुन कर राग पहचानिए और हमे राग का नाम लिख भेजिए।

2 – यह कौन सा संगीत वाद्य है? वाद्य का नाम बताइए।

आप अपने उत्तर केवल radioplaybackindia@live.com या swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 146वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा radioplaybackindia@live.com या swargoshthi@gmail.com पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 142वीं कड़ी में हमने आपको पण्डित विश्वमोहन भट्ट द्वारा तंत्रवाद्य मोहन वीणा पर बजाए राग मियाँ की मल्हार का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग मियाँ की मल्हार और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- तंत्र वाद्य मोहन वीणा। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर हमारे एकमात्र प्रतिभागी जौनपुर से डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने ही दिया है। डॉ. त्रिपाठी को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


झरोखा अगले अंक का


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ के अन्तर्गत आज के अंक में हमने आपसे राग केदार के भक्तिरस के पक्ष पर चर्चा की। आगामी अंक में हम एक और भक्तिरस प्रधान राग में गूँथी रचनाएँ लेकर उपस्थित होंगे। अगले अंक में इस लघु श्रृंखला की तेरहवीं कड़ी के साथ रविवार को प्रातः 9 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों की प्रतीक्षा करेंगे।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

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