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Sunday, August 29, 2010

रविवार सुबह की कॉफी और एक और क्लास्सिक "अंदाज़" के दो अप्रदर्शित और दुर्लभ गीत

नौशाद अली की रूहानियत और मजरूह सुल्तानपुरी की कलम जब जब एक साथ मिलकर परदे पर चलीं तो एक नया ही इतिहास रचा गया. उस पर महबूब खान का निर्देशन और मिल जाए तो क्या बात हो, जैसे सोने पे सुहागा. राज कपूर और नर्गिस जिस जोड़ी ने कितनी ही नायाब फ़िल्में भारतीय सिनेमा को दीं हैं उस पर अगर दिलीप कुमार का अगर साथ और मिल जाए तो कहने की ज़रुरत नहीं कि एक साथ कितनी ही प्रतिभाओं को देखने का मौका मिलेगा......अब तक तो आप समझ गए होंगे के हमारी ये कलम किस तरफ जा रही है...जी हाँ सही अंदाजा लगाया आपने लेकिन यहाँ कुछ का अंदाजा गलत भी हो सकता है. साहब अंदाजा नहीं अंदाज़ कहिये. साथ में मुराद, कुक्कु वी एच देसाई, अनवरीबाई, अमीर बानो, जमशेदजी, अब्बास, वासकर और अब्दुल. सिनेमा के इतने लम्बे इतिहास में दिलीप कुमार और राज कपूर एक साथ इसी फिल्म में पहली और आखिरी बार नजर आये. फिल्म की कहानी प्यार के त्रिकोण पर आधारित थी जिस पर अब तक न जाने कितनी ही फिल्मे बन चुकी हैं. फिल्म में केवल दस गीत थे जिनमे आवाजें थीं लता मंगेशकर, मुकेश, शमशाद बेगम और मोहम्मद रफ़ी साब की. फिल्म को लिखा था शम्स लखनवी ने, जी बिलकुल वोही जिन्होंने सेहरा १९६३ के संवाद लिखे थे. फिल्म १४८ मिनट की बनी थी जो बाद में काटकर १४२ मिनट की रह गयी. ये ६ मिनट कहाँ काटे गए इसका जवाब हम आज लेकर आये हैं.

फिल्म में जैसे कि मैं कह चुका हूँ और आप भी जानते हैं दस गीत थे लेकिन बहुत कम लोग ये जानते होंगे के इस फिल्म में दो और गीत थे एक मुकेश के अकेली आवाज़ में और दूसरा मोहम्मद रफ़ी तथा लता मंगेशकर कि आवाज़ में. आज हम यहाँ दोनों ही गीतों को सुनवाने वाले हैं.पहला गीत है क्यूँ फेरी नज़र मुकेश कि आवाज़ में जिसकी अवधि कुल २ मिनट ५८ सेकंड है. दूसरा गीत जो युगल मोहम्मद रफ़ी और लता मंगेशकर कि आवाज़ में है जिसकी अवधि २ मिनट ४५ सेकंड है, गीत के बोल हैं सुन लो दिल का अफसाना मेरा अपना जो विचार है कि फिल्म के जो ६ मिनट कम हुए होंगे वो शायद इन्ही दो गीतों कि वजह से हुए होंगे जिनकी कुल अवधि ५ मिनट ५६ सेकंड है. बातें तो इस फिल्म और इसके गीतों के बारे में इतनी है के पूरी एक वेबसाइट बनायीं जा सके लेकिन आपका ज्यादा वक़्त न लेते हुए सुनते हैं ये दोनों गीत.

Song- Kyon feri nazar (mukesh), An Unreleased Song From the movie "Andaaz"


Song - Sun lo dil ka afsana (Lata-Rafi), An Unreleased song from the movie "Andaaz"


प्रस्तुति- मुवीन



"रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत" एक शृंखला है कुछ बेहद दुर्लभ गीतों के संकलन की. कुछ ऐसे गीत जो अमूमन कहीं सुनने को नहीं मिलते, या फिर ऐसे गीत जिन्हें पर्याप्त प्रचार नहीं मिल पाया और अच्छे होने के बावजूद एक बड़े श्रोता वर्ग तक वो नहीं पहुँच पाया. ये गीत नए भी हो सकते हैं और पुराने भी. आवाज़ के बहुत से ऐसे नियमित श्रोता हैं जो न सिर्फ संगीत प्रेमी हैं बल्कि उनके पास अपने पसंदीदा संगीत का एक विशाल खजाना भी उपलब्ध है. इस स्तम्भ के माध्यम से हम उनका परिचय आप सब से करवाते रहेंगें. और सुनवाते रहेंगें उनके संकलन के वो अनूठे गीत. यदि आपके पास भी हैं कुछ ऐसे अनमोल गीत और उन्हें आप अपने जैसे अन्य संगीत प्रेमियों के साथ बाँटना चाहते हैं, तो हमें लिखिए. यदि कोई ख़ास गीत ऐसा है जिसे आप ढूंढ रहे हैं तो उनकी फरमाईश भी यहाँ रख सकते हैं. हो सकता है किसी रसिक के पास वो गीत हो जिसे आप खोज रहे हों.

Sunday, August 15, 2010

रविवार सुबह की कॉफी और जश्न-ए-आजादी पर जोश से भरने वाला एक अप्रकाशित दुर्लभ गीत रफ़ी साहब का गाया - लहराओ तिरंगा लहराओ

रात कुछ अजीब थी सच कहूँ तो रात चाँदनी ऐसे लग रही थी जैसे आकाश से फूल बरसा रही हो और बादल समय समय पर इधर उधर घूमते हुए सलामी दे रहे हों. और सुबह सुबह सूरज की किरणों की भीनी भीनी गर्मी एक अलग ही अंदाज़ मे अपनी चह्टा बिखेर रही थी. ऐसा लग रहा था के जैसे ये सब अलमतें हमें किसी ख़ास दिन का एहसास क़रना चाहते हैं. रात कुछ अजीब थी सच कहूँ तो रात चाँदनी ऐसे लग रही थी जैसे आकाश से फूल बरसा रही हो और बादल समय समय पर इधर उधर घूमते हुए सलामी दे रहे हों. और सुबह सुबह सूरज की किरणों की भीनी भीनी गर्मी एक अलग ही अंदाज़ मे अपनी छटा बिखेर रही थी. ऐसा लग रहा था के जैसे ये सब अलमतें हमें किसी ख़ास दिन का एहसास क़रना चाहते हैं. शायद आज सचमुच कोई ख़ास दिन ही तो है और ऐसा ख़ास दिन कि जिसकी तलाश करते हुए ना जाने कितनी आँखें पथरा गयीं, कितनी आँखें इसके इंतज़ार मे हमेशा के लिए गहरी नींद मे सो गयीं.

आज हमारे द्वारा 15 ऑगस्ट को मनाने का अंदाज़ सिर्फ़ कुछ भाषण होते हैं या फिर तिरंगे को फहरा देना कुछ देशभक्ति गीत बजाना जो सिर्फ़ इसी दिन के लिए होते हैं. मुझे याद आ रहा है के 90 के दशक की शुरुआत मे 1 हफ्ते पहले ही से देशभक्ति के गीत रेडियो टीवी पर गूंजने लगते थे. रविवार को प्रसारित होने वाली रंगोली 15 दिन पहले से ही इस दिन का एहसास लेकर आती थी, मगर आज क्या होता है कहने की ज़रूरत नहीं है समझना काफ़ी है. आज़ादी पाने के लिए क्या कुछ करना पड़ा कितनी क़ुर्बानियाँ दीं गयी इन पर लाखों किताबें लिखी जा चुकी हैं और भी शायद लिखी जाती रहेंगी. आज़ादी से पहले भी कुछ साहित्य छपता रहता था दैनिक, साप्ताहिक या मासिक पत्र निकाले जाते थे जिनमें क्रांतिकारियों के लिए संदेश या फिर उनमें जोश भरने के लेख होते थे. कई ऐसे पत्रों को अंग्रेज सरकार ने बंद करा दिया, जब्त कर लिया, उनकी प्रतिया बेचने और खरीदने पर पाबंदियाँ लगा दीं मगर इन सब के बावजूद भी वो उस सैलाब को नहीं रोक पाए. लेखन सामग्री के साथ साथ ही भारतीय फिल्मों ने भी इसमें योगदान किया लेकिन फिल्मों का दायरा पत्रों से ज़्यादा बड़ा था और ज़्यादा असर करता था दूसरे इस प्रकार की फ़िल्मे बनाना एक जोखिम का काम था क्योंकि इसमे पैसा ज़्यादा लगता था. लेकिन फिर भी समय समय पर इस प्रकार की फ़िल्मे बनीं जो अंग्रेज हुकूमत पर सीधे सीधे तो नहीं लेकिन शब्दों के बाणों को छुप छुप कर चलाते थे.

मुझे याद आ रहा है 1944 मे नौशाद अली के संगीत निर्देशन मे बनी “पहले आप” का गीत “हिन्दुस्तान के हम हैं हिन्दुस्तान हमारा, हिंदू मुस्लिम दोनो की आँखों का तारा” इस गीत मे सभी धर्मो को एक साथ मिलकर देश प्रेम की शिक्षा दी गयी है, जो अंगेजों की फुट डालो और शासन करो की नीति को चुनौती देता है यानी एक साथ मिलजुल के रहेंगे तो किसी भी मुसीबत का मुक़ाबला कर सकते हैं. इससे पहले भी 1936 मे आई फिल्म जन्मा भूमि के गीत “ जाई जाई प्यारी जन्मा भूमि” , “ माता ने जानम दिया” और ना जाने कितने ही…….

एक बात जो हम सब पर लागू होती है के जब कोई चीज़ हमें नयी नयी मिलती है तो उसका उन्माद कुछ ज़्यादा होता है जैसे जैसे वक़्त गुज़रता जाता है ये उल्लास कम होता जाता है मगर अपनी आज़ादी के बारे मे ऐसा नहीं है 63 साल गुज़र जाने के बाद भी ये उन्माद कम नहीं हुवा. आज़ादी के बाद जब 31 जनवरी 1948 को राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी “बापू” वीरगति को प्राप्त हुए तो ‘हुसनलाल भगातराम’ के संगीत मे सुर मिलाए ‘राजेन्द्र कृष्णा’ ने और आवाज़ दी मोहम्मद रफ़ी ने. उसके बाद तो फिल्मकारों के जज़्बात ने ऐसा जोश मारा के आज़ादी और देश प्रेम को लेकर फिल्म की जो झड़ी लगी तो ये बारिश अब तक रुकने का नाम नहीं ले रही है शहीद (1948), हिन्दुस्तान हमारा (1950), जलियाँवाला बाग की ज्योति (1953), झाँसी की रानी (1953), शहीद ए आज़म भगत सिंह (1954), वतन (1954), शहीद भगत सिंह (1963), हक़ीक़त (1964), शहीद (1965), नेताजी सुभाष चंद्र बोस् (1966), क्रांति (1980) बॉर्डर (1997), लगान (2001), मंगल पांडे (2005) आदि फ़ेरहिस्त बहुत लंबी है वक़्त बहुत कम.

अच्छा दोस्तो कभी आपने गौर किया है के आज़ादी का पहला जनमदिन कैसे मनाया गया होगा. मैं कभी कभी सोचता हूँ के 15 आगस्त 1948 को आज़ाद देश मे साँस लेने वाले लोगों के लिए कितना सुखदाई होगा वो दिन, क्या जोश रहा होगा, क्या जज़्बात रहे होंगे, किस प्रकार से एक दूसरे को बधाइयाँ दीं गयीं होंगी.

उस वक़्त 15 आगस्त महज़ कोई छुट्टी का दिन नहीं रहा होगा बल्कि एक त्योहार के रूप मे मनाया गया होगा.. इसी से संबंधित एक गीत आज यहाँ पेश किया जा रहा है मोहम्मद रफ़ी साहब की आवाज़ मे इस गीत के बोल नीचे लिखे हैं इन पर ज़रा ध्यान देने की ज़रूरत है क्योंकि सुनते वक़्त इतना ध्यान नहीं दे पाते…

आओ एक बरस की आज़ादी का आओ सब त्योहार मनाओ
नगर नगर और डगर डगर लहराओ तिरंगा लहराओ

यही तिरंगा प्राण हमारा यही हमारी माया
हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सब पर इसकी छाया
आज इसी झंडे के नीचे आए भारत के बेटों सोचो
आज़ादी के एक बरस मे क्या खोया क्या पाया
आज ईद है आज दीवाली आओ गले लग जाओ
तिरंगा लहराओ

आज के दिन तुम भूल ना जाना बापू जी की अमृत वाणी
दूर ले गयी हमसे उनको एक हमारी नादानी
कब समझोगे राम, मोहम्मद और नानक के बेटों
कब लाएगी रंग हमारे देश पिता की कुर्बानी
जिसने दिया तिरंगा तुमको उसको भूल ना जाओ
तिरंगा लहराओ

आओ आज तिरंगे के नीचे खा लें हम कसमे
प्यार की रीत से बदल डालेंगे नफ़रत की सब रस्मे
वीर जवाहर की सेना बन दुनिया पर छा जाओ
जय हिंद कहो- (4) लहराओ तिरंगा लहराओ
नगर नगर और डगर डगर लहराओ तिरंगा लहराओ


इतना तो तय है कि ये गीत 15 आगस्त 1948 से पहले गाया गया होगा इसकी पहली कड़ी पर ध्यान दें तो आखिरी पंक्ति मे क्या खोया क्या पाया एक बरस मे ही खोने और पाने की बात करने से पता चलता है कि शायर भारत को किस मुकाम पर देखना चाहता है. खैर अब मैं इस गीत के बारे मे ज़्यादा नहीं कहूँगा वरना सुनने का मज़ा कम हो जाएगा मगर इसके साथ ही एक वादा ज़रूर करूँगा के भविष्य मे गीतों की शायराना खूबसूरती को बाहर निकालूँगा, आज़ादी को लेकर फ़िल्मे तो बनती रहीं वहीं प्राइवेट गीत भी कम नहीं गाए गये मगर वो गीत आज श्रोताओं के कुछ ख़ास वर्ग के ही पास हैं और वो उनको आम श्रोताजन को नहीं पहुँचाते हैं इसकी एक ख़ास वजह जो मैं समझता हूँ वो ये हैं कि इन गीतो का मुकाम संगीत प्रेमियों की नज़र मे काफ़ी उँचा होता है और कुछ असामाजिक तत्व जिन्हें संगीत से ख़ास लगाव नहीं होता है इसकी कीमत वसूल करने लग जाते हैं वहीं एक संगीत प्रेमी कभी ये नहीं चाहेगा की इस धरोहर का गलत उपयोग किया जाए.

इस गीत के बारे मे ज़्यादा जानकारी मुझे नहीं मिल पर अगर किसी संगीत प्रेमी के पास हो तो बताएँ.

LAHRAAO TIRANGA LAHRAAO- UNRELEASED RARE SONG BY MD. RAFI



प्रस्तुति- मुवीन



"रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत" एक शृंखला है कुछ बेहद दुर्लभ गीतों के संकलन की. कुछ ऐसे गीत जो अमूमन कहीं सुनने को नहीं मिलते, या फिर ऐसे गीत जिन्हें पर्याप्त प्रचार नहीं मिल पाया और अच्छे होने के बावजूद एक बड़े श्रोता वर्ग तक वो नहीं पहुँच पाया. ये गीत नए भी हो सकते हैं और पुराने भी. आवाज़ के बहुत से ऐसे नियमित श्रोता हैं जो न सिर्फ संगीत प्रेमी हैं बल्कि उनके पास अपने पसंदीदा संगीत का एक विशाल खजाना भी उपलब्ध है. इस स्तम्भ के माध्यम से हम उनका परिचय आप सब से करवाते रहेंगें. और सुनवाते रहेंगें उनके संकलन के वो अनूठे गीत. यदि आपके पास भी हैं कुछ ऐसे अनमोल गीत और उन्हें आप अपने जैसे अन्य संगीत प्रेमियों के साथ बाँटना चाहते हैं, तो हमें लिखिए. यदि कोई ख़ास गीत ऐसा है जिसे आप ढूंढ रहे हैं तो उनकी फरमाईश भी यहाँ रख सकते हैं. हो सकता है किसी रसिक के पास वो गीत हो जिसे आप खोज रहे हों.

Sunday, August 8, 2010

रविवार सुबह की कॉफी और एक बेहद दुर्लभ अ-प्रकाशित गीत फिल्म मुग़ल-ए-आज़म से (26)...हुस्न की बारात चली

ज़रा गौर कीजिये कि आप किसी काम को दिल से करें उसका पूरा मेहनताना तो मिले लेकिन उसका वो इस्तेमाल न किया जाए जिसके लिए आपने इतनी मेहनत की है. तो आपको कैसा लगेगा. शायद आपका जवाब भी वही होगा जो मेरा है कि बहुत बुरा लगेगा. संगीतकार ने दिन रात एक करके धुन बनाई, गीतकार के शब्दों के भण्डार में डूबकर उसपर बोल लिखे तो वही गायक या गायिका के उस पर मेहनत का न जाने कितने रीटेक के बाद रंग चढ़ाया मगर वो गीत श्रोताओं तक नहीं पहुँच पाया तो इस पर तीनों की ही मेहनत बेकार चली गयी क्योंकि एक फनकार को केवल वाह वाह चाहिए जो उसे नहीं मिली.

लेकिन ऐसे गीतों की कीमत कुछ ज्यादा ही हुआ करती है इस बात को संगीत प्रेमी अच्छी तरह से जानते है, अगर ये गीत हमें कहीं से मिल जाए तो हम तो सुनकर आनंद ही उठाते हैं. लेकिन इतना तो ज़रूर है की इन गीतों को सुनने के बाद आप ये अंदाजा लगा सकते हैं की अगर ये गीत फिल्म के साथ प्रदर्शित हो जाता तो शायद फिल्म की कामयाबी में चार चाँद लगा देता.

ये गीत कभी भी किसी भी मोड़ पर फिल्म से निकाल दिए जाते है जिसकी बहुत सारी वजह हो सकती हैं कभी फिल्म की लम्बाई तो कभी प्रोडूसर को पसंद न आना वगैरह वगैरह. वहीँ दूसरी तरफ कभी कभी ऐसा भी होता है दोस्तों की किसी गीत को संगीतकार अपने प्राइवेट बना लेते हैं और वो फिल्म में आ जाता है यहाँ तक के फिल्म की कहानी उस गीत के अनुरूप मोड़ दी जाती है, फिल्म इतिहास में ऐसे बहुत से गीत हैं जिन्होंने फिल्म की कहानी को एक नया मोड़ दे दिया. खैर इस बारे में कभी तफसील से चर्चा करूंगा एक पूरा अंक इसी विषय पर लेकर.

आप सोच रहे होंगे की ये बातें कब ख़त्म हों और गीत सुनने को मिले तो मैं ज्यादा देर नहीं करूँगा आपको गीत सुनवाने में. ये गीत जो मैं यहाँ लेकर आया हूँ फिल्म मुग़ल ऐ आज़म से है, इस फिल्म के बारे में हर जगह इतनी जानकारी है के मैं कुछ भी कहूँगा तो वो ऐसा लगेगा जैसे मैं बात को दोहरा रहा हूँ. लेकिन फिर भी यहाँ एक बात कहना चाहूँगा जो कुछ कम लोगों को ही पता है की बड़े गुलाम अली साब के इस फिल्म में दो रागों में अपनी आवाज़ दी थी, उस ज़माने में प्लेबैक सिंगिंग आ चुकी थी लेकिन बड़े गुलाम अली साब ने ये दोनों राग ऑनलाइन शूटिंग की दौरान ही गाये थे, बाद में इनकी रेकॉर्डिंग स्टूडियो में हुयी थी. उस ज़माने में बड़े गुलाम अली साब ने इन दो रागों के लिए ६० हज़ार रूपए लिए थे जो उस ज़माने में बहुत ज्यादा थे मगर के. आसिफ तो १ लाख सोचकर गए थे.

चलिए अब गीत की तरफ आते है इस गीत में आवाज़े हैं शमशाद बेगम, लता मंगेशकर और मुबारक बेगम की.
ये गीत फिल्म की कहानी के हिसाब से कहाँ पर फिल्माया जाना था इस का हम तो अंदाजा ही लगा सकते है. मेरे हिसाब से तो इस गीत का फिल्मांकन मधुबाला उर्फ़ अनारकली को दिलीप कुमार उर्फ़ शहजादा सलीम के लिए तैयार करते वक़्त होना चाहिए था. जहाँ अनारकली बनी मधुबाला शहजादा सलीम बने दिलीप कुमार को गुलाब के फूल में बेहोशी के दवा सुंघा देती हैं.

पेश है गीत-

Husn Kii Baarat Chali - Unreleased Song From Mughal-e-Azam



प्रस्तुति- मुवीन



"रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत" एक शृंखला है कुछ बेहद दुर्लभ गीतों के संकलन की. कुछ ऐसे गीत जो अमूमन कहीं सुनने को नहीं मिलते, या फिर ऐसे गीत जिन्हें पर्याप्त प्रचार नहीं मिल पाया और अच्छे होने के बावजूद एक बड़े श्रोता वर्ग तक वो नहीं पहुँच पाया. ये गीत नए भी हो सकते हैं और पुराने भी. आवाज़ के बहुत से ऐसे नियमित श्रोता हैं जो न सिर्फ संगीत प्रेमी हैं बल्कि उनके पास अपने पसंदीदा संगीत का एक विशाल खजाना भी उपलब्ध है. इस स्तम्भ के माध्यम से हम उनका परिचय आप सब से करवाते रहेंगें. और सुनवाते रहेंगें उनके संकलन के वो अनूठे गीत. यदि आपके पास भी हैं कुछ ऐसे अनमोल गीत और उन्हें आप अपने जैसे अन्य संगीत प्रेमियों के साथ बाँटना चाहते हैं, तो हमें लिखिए. यदि कोई ख़ास गीत ऐसा है जिसे आप ढूंढ रहे हैं तो उनकी फरमाईश भी यहाँ रख सकते हैं. हो सकता है किसी रसिक के पास वो गीत हो जिसे आप खोज रहे हों.

Sunday, August 1, 2010

रविवार सुबह की कॉफी और रफ़ी साहब के अंतिम सफर की दास्ताँ....दिल का सूना साज़

३१ जुलाई को सभी रफ़ी के चाहने वाले काले दिवस के रूप मानते आये हैं और मनाते रहेंगे क्यूंकि इस दिन ३१ जुलाई १९८० को रफ़ी साब हम सब को छोड़ कर चले गए थे लेकिन इस पूरे दिन का वाकया बहुत कम लोग जानते हैं आज उस दिन क्या क्या हुआ था आपको उसी दिन कि सुबह के साथ ले चलता हूँ.

३१ जुलाई १९८० को रफ़ी साब जल्दी उठ गए और तक़रीबन सुबह ९:०० बजे उन्होंने नाश्ता लिया. उस दिन श्यामल मित्रा के संगीत निर्देशन तले वे कुछ बंगाली गीत रिकॉर्ड करने वाले थे इसलिए नाश्ते के बाद उसी के रियाज़ में लग गए. कुछ देर के बाद श्यामल मित्रा उनके घर आये और उन्हें रियाज़ करवाया. जैसे ही मित्रा गए रफ़ी साब को अपने सीने में दर्द महसूस हुआ. ज़हीर बारी जो उनके सचिव थे उनको दवाई दी वहीँ दूसरी तरफ ये बताता चलूँ के इससे पहले भी रफ़ी साब को दो दिल के दौरे पड़ चुके थे लेकिन रफ़ी साब ने उनको कभी गंभीरता से नहीं लिया. मगर हाँ नियमित रूप से वो एक टीका शुगर के लिए ज़रूर लेते थे और अपने अधिक वज़न से खासे परेशान थे. सुबह ११:०० बजे डॉक्टर की सलाह से उनको अस्पताल ले जाया गया जहाँ एक तरफ रफ़ी साब ने अपनी मर्ज़ी से माहेम नेशनल अस्पताल जाना मंज़ूर किया वहीँ से बदकिस्मती ने उनका दामन थाम लिया क्योंकि उस अस्पताल में कदम से चलने की बजाय सीडी थीं जो एक दिल के मरीज़ के लिए घातक सिद्ध होती हैं और रफ़ी साब को सीढियों से ही जाना पड़ा. शाम ४:०० बजे के आसपास उनको बॉम्बे अस्पताल में दाखिल किया गया लेकिन संगीत की दुनिया की बदकिस्मती यहाँ भी साथ रही और यहाँ भी रफ़ी साब को सीढियों का सहारा ही मिला. अस्पताल में इस मशीन का इंतज़ाम रात ९:०० बजे तक हो पाया लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी. रात ९:०० बजे के आसपास डॉक्टर के. ऍम. मोदी और डॉक्टर दागा ने उनका मुआयना किया और डॉक्टर के. ऍम. मोदी ने बताया के अब रफ़ी साब के बचने की उम्मीद बहुत कम है.

गीत : तू कहीं आस पास है दोस्त


और आखिर वो घडी आ ही गयी जो न आती तो अच्छा होता काश के वक़्त थम जाता उस वक़्त को निकालकर आगे निकल जाता :

देखकर ये कामयाबी एक दिन मुस्कुरा उठी अज़ल
सारे राग फीके पड़ गए हो गया फनकार शल
चश्मे फलक से गिर पड़ा फिर एक सितारा टूटकर
सब कलेजा थामकर रोने लगे फूट फूटकर
लो बुझ गयी समां महफ़िल में अँधेरा हो गया
जिंदगी का तार टूटा और और तराना सो गया

गीत : कोई चल दिया अकेले


मजरूह सुल्तानपुरी ने तकरीबन शाम ८:०० बजे नौशाद अली को टेलीफ़ोन करके बताया कि रफ़ी साब कि तबियत बहुत ख़राब है. नौशाद अली ने इस बात ज्यादा गौर नहीं दिया क्योंकि सुबह ही तो उन्होंने रफ़ी साब से टेलीफ़ोन पर बात की थी. लेकिन रात ११:०० बजे एक पत्रकार ने नौशाद अली को टेलीफ़ोन करके बताया के रफ़ी साब चले गए. नौशाद अली को फिर भी यकीन नहीं आया और उन्होंने रफ़ी साब के घर पर टेलीफ़ोन किया जिसपर इस खबर की पुष्टि उनकी बेटी ने की. नौशाद अली जब अपनी पत्नी के साथ रफ़ी साब के घर गए तो उनका बड़ा बेटा शहीद रफ़ी बेतहाशा रो रहा है.

नौशाद अली ने दिलीप कुमार के घर टेलीफ़ोन किया जो उनकी पत्नी सायरा बानो ने उठाया लेकिन दिलीप कुमार की तबियत का ख़याल करते हुए उन्होंने इस बारे में अगली सुबह बताया.

गीत : जाने कहाँ गए तुम


तकरीबन १०:१० बजे उनके इस दुनिया से कूच करने के वक़्त उनकी बीवी, बेटी और दामाद बिस्तर के पास थे.

अस्पताल के नियमानुसार उनके शरीर को उस रात उनको परिवार वालों को नहीं सौंपा गया तथा पूरी रात उनका शरीर अस्पताल के बर्फ गोदाम में रहा.

अगले दिन १ अगस्त १९८० सुबह ९:३० बजे रफ़ी साब का शरीर उनको परिवार को मिल सका उस वक़्त साहेब बिजनोर, जोहनी विस्की और ज़हीर बारी भी मौजूद थे. दोपहर १२:३० बजे तक किसी ट्रक का इंतज़ाम न होने की वजह से कन्धों पर ही उनको बांद्रा जामा मस्जिद तक लाया गया वहां पर जनाज़े की नमाज़ के बाद उनको ट्रक द्वारा शंताक्रूज़ के कब्रिस्तान तक लाया गया. शाम ६:१५ बजे कब्रिस्तान पहुंचकर ६:३० बजे तक वहीँ दफना दिया गया.

गीत : दिल का सूना साज़


प्रस्तुति- मुवीन



"रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत" एक शृंखला है कुछ बेहद दुर्लभ गीतों के संकलन की. कुछ ऐसे गीत जो अमूमन कहीं सुनने को नहीं मिलते, या फिर ऐसे गीत जिन्हें पर्याप्त प्रचार नहीं मिल पाया और अच्छे होने के बावजूद एक बड़े श्रोता वर्ग तक वो नहीं पहुँच पाया. ये गीत नए भी हो सकते हैं और पुराने भी. आवाज़ के बहुत से ऐसे नियमित श्रोता हैं जो न सिर्फ संगीत प्रेमी हैं बल्कि उनके पास अपने पसंदीदा संगीत का एक विशाल खजाना भी उपलब्ध है. इस स्तम्भ के माध्यम से हम उनका परिचय आप सब से करवाते रहेंगें. और सुनवाते रहेंगें उनके संकलन के वो अनूठे गीत. यदि आपके पास भी हैं कुछ ऐसे अनमोल गीत और उन्हें आप अपने जैसे अन्य संगीत प्रेमियों के साथ बाँटना चाहते हैं, तो हमें लिखिए. यदि कोई ख़ास गीत ऐसा है जिसे आप ढूंढ रहे हैं तो उनकी फरमाईश भी यहाँ रख सकते हैं. हो सकता है किसी रसिक के पास वो गीत हो जिसे आप खोज रहे हों.

Friday, July 30, 2010

मिलिए आवाज़ के नए वाहक जो लायेंगें फिर से आपके लिए रविवार सुबह की कॉफी में कुछ दुर्लभ गीत

दोस्तों यूँ तो आज शुक्रवार है, यानी किसी ताज़े अपलोड का दिन, पर नए संगीत के इस सफर को जरा विराम देकर आज हम आपको मिलवाने जा रहे हैं आवाज़ के एक नए वाहक से. दोस्तों आपको याद होगा हर रविवार हम आपके लिए लेकर आते थे शृंखला "रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत". जो हमारे नए श्रोता हैं वो पुरानी कड़ियों का आनंद यहाँ ले सकते हैं. कुछ दिनों तक इसे सजीव सारथी सँभालते रहे फिर काम बढ़ा तो तलाश हुई किसी ऐसे प्रतिनिधि की जो इस काम को संभाले. क्योंकि इस काम पे लगभग आपको पूरे हफ्ते का समय देना पड़ता था, दुर्लभ गीतों की खोज, फिर आलेख जिसमें विविधता आवश्यक थी. दीपाली दिशा आगे आई और कुछ कदम इस कार्यक्रम को और आगे बढ़ा दिया, उनके बाद किसी उचित प्रतिनिधि के अभाव में हमें ये श्रृखला स्थगित करनी पड़ी. पर कुछ दिनों पहले आवाज़ से जुड़े एक नए श्रोता मुवीन जुड़े और उनसे जब आवाज़ के संपादक सजीव ने इस शृंखला का जिक्र किया तो उन्होंने स्वयं इस कार्यक्रम को फिर से अपने श्रोताओं के लिए शुरू करने की इच्छा जतलाई. तो दोस्तों हम बेहद खुशी के साथ आपको बताना चाहेंगें कि इस रविवार से मुवीन आपके लिए फिर से लेकर आयेंगें रविवार सुबह की कॉफी से संग कुछ बेहद बेहद दुर्लभ और नायाब गीत. जिन्हें आप हमेशा हमेशा सजेह कर रखना चाहेंगें. लेकिन पहले आपका परिचय मुवीन से करवा दें.



नाम : मुवीन
जन्म स्थान : गाँव दुलखरा, जिला बुलंदशहर, उत्तर प्रदेश
जन्मतिथि : ०६ मार्च, १९८१
शिक्षा : स्नातक
कार्य क्षेत्र : दिल्ली में प्राइवेट कम्पनी में नौकरी



तीसरी कक्षा पास की ही थी कि पिताजी गर्मियों कि छुट्टियों में दिल्ली घुमाने सपरिवार लेकर आये. आए दिल्ली घूमने के लिए और यहीं के होकर रह गए, ये बात १९८८ की है. बचपन से ही गीत सुनने और गुनगुनाने का शौक था. गाँव के स्कूल में कोई कार्यक्रम ऐसा नहीं होता था जिसमें मैंने न गाया हो ये सिलसिला दसवीं कक्षा तक चलता रहा. उसके बाद कुछ पढाई के दबाव के कारण सिलसिला टूट गया और आज तक नहीं जुड़ पाया.

मगर सुनने का शौक अब भी बरक़रार रहा. गीतों का संग्रह करने का विचार पहली बार १९९६ में आया और लगभग ५०० से ज्यादा ऑडियो केसेट संग्रह कर जमां कर लीं. कुछ खरीदी तो कुछ में अपनी पसंद के गीत खाली केसेट में रिकॉर्ड करवाए. अभी संग्रह करने की प्यास लगी ही थी कि प्रोधिगिकी ने ऐसी करवट बदली के ऑडियो केसेट की जगह CD ने ले ली. खैर उन गीतों को CD में उतारा. आज जब कंप्यूटर का ज़माना है तो ऑडियो केसेट या CD दोनों को पीछे छोड़ दिया.

आज मेरे संग्रह की शुरुआत १९०५ में गाये हुए रागों से होती है जो अब्दुल करीम (११ नवम्बर, १८७२-१९३७) के हैं. इसके अलावा अमीर खान, अनजानीबाई, आज़मबाई, अजमत खान, बड़े गुलाम अली खान, बड़ी मोती बाई, फैय्याज खान, गौहर जाँ आदि का संग्रह है. भारतीय संगीत को सुनना और इसकी जानकारी को उन संगीत प्रेमियों तक पहुचाना अच्छा लगता है जिन तक ये संगीत किसी न किसी वजह से नहीं पहुच सका.

मैं किसी विशेष गायक या गायिका, संगीतकार, गीतकार इत्यादि की सीमा में बंधकर नहीं रहा सभी के गीतों को सामान आदर के साथ सुनता हूँ. लेकिन फिर भी मोहम्मद रफ़ी साब की आवाज़, नौशाद अली, शंकर जयकिशन का संगीत और मजरूह सुल्तानपुरी, शैलेन्द्र की शायरी कुछ ज्यादा ही मुझपर असर करती है.

संपर्क : -
anwarsaifi@gmail.com
+91 9971748099

Sunday, November 1, 2009

रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत (१९) फिल्म गीतकार शृंखला भाग १

जब फ़िल्मी गीतकारों की बात चलती है तो कुछ गिनती के नाम ही जेहन में आते हैं, पर दोस्तों ऐसे अनेकों गीतकार हैं, जिनके नाम समय के गर्द में कहीं खो से गए हैं, जिनके लिखे गीत तो हम आज भी शौक से सुनते हैं पर उनके नाम से अपरिचित हैं, और इसके विपरीत ऐसा भी है कि कुछ बेहद मशहूर गीतकारों के लिखे बेहद अनमोल से गीत भी उनके अन्य लोकप्रिय गीतों की लोकप्रियता में कहीं गुमसुम से खड़े मिलते हैं, फ़िल्मी दुनिया के गीतकारों पर "रविवार सुबह की कॉफी" में हम आज से एक संक्षिप्त चर्चा शुरू कर रहे हैं, इस शृंखला की परिकल्पना भी खुद हमारे नियमित श्रोता पराग सांकला जी ने की है, तो चलिए पराग जी के संग मिलने चलें सुनहरे दौर के कुछ मशहूर/गुमनाम गीतकारों से और सुनें उनके लिखे कुछ बेहद सुरीले/ सुमधुर गीत. हम आपको याद दिला दें कि पराग जी मरहूम गायिका गीत दत्त जी को समर्पित जालस्थल का संचालन करते हैं.


१) शैलेन्द्र

महान गीतकार शैलेन्द्र जी का असली नाम था "शंकर दास केसरीलाल शैलेन्द्र". उनका जन्म हुआ था सन् १९२३ में रावलपिन्डी (अब पाकिस्तान में). भारतीय रेलवे में वास मुंबई में सन् १९४७ में काम कर रहे थे. उनकी कविता "जलता है पंजाब " लोकप्रिय हुई और उसी दौरान उनकी मुलाक़ात राज कपूर से हुई. उसीके साथ उनका फ़िल्मी सफ़र शुरू हुआ फिल्म बरसात से ! शंकर जयकिशन की जोड़ी के साथ साथ शैलेंद्र ने सचिन देव बर्मन, सलिल चौधरी और कई संगीतकारों के साथ काम किया. उनके राज कपूर के लिए लिखे गए कई गीत लोकप्रिय है, मगर आज हम उनके एक दुर्लभ गीत के बारे में बात करेंगे. लीजिये उन्ही का लिखा हुआ यह अमर गीत जिसे गाया हैं मखमली आवाज़ के जादूगर तलत महमूद ने फिल्म पतिता (१९५३) के लिए. संगीत शंकर जयकिशन का है और गीत फिल्माया गया हैं देव आनंद पर. सुप्रसिद्ध अंगरेजी कवि पी बी शेल्ली ने लिखा था "Our sweetest songs are those that tell of saddest thoughts".शैलेन्द्र ने इसी बात को लेकर यह अजरामर गीत लिखा और जैसे कि पी बी शेल्ली के विचारों को एक नए आसमानी बुलंदी पर लेकर चले गए. गीतकार शैलेन्द्र पर विस्तार से भी पढें यहाँ.



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२) इन्दीवर

बप्पी लाहिरी के साथ इन्दीवर के गाने सुननेवालों को शायद यह नहीं पता होगा की इन्दीवर (श्यामलाल राय) ने अपना पहला लोकप्रिय गीत (बड़े अरमानों से रखा हैं बलम तेरी कसम) लिखा था सन् १९५१ में फिल्म मल्हार के लिए. कहा जाता है की सन् १९४६ से १९५० तक उन्होंने काफी संघर्ष किया, मगर उसके बारे में कोई ख़ास जानकारी उपलब्ध नहीं है. रोशन के साथ इन्दीवर को जोड़ी बन गयी, मगर दूसरे लोकप्रिय संगीतकारों के साथ उन्हें गीत लिखने के मौके (खासकर पचास के दशक में) ज्यादा नहीं मिले. बाद में कल्यानजी - आनंद जी के साथ इन्दीवर की जोड़ी बन गयी. समय के साथ इन्दीवर ने समझौता कर लिया और फिर...

खैर, आज हम महान गायक मुकेश, संगीतकार रोशन और गीतकार इन्दीवर का एक सुमधुर गीत लेकर आये है जिसे परदे पर अभिनीत किया गया था संजीव कुमार (और साथ में मुकरी और ज़हीदा पर). फिल्म है अनोखी रात जो सन् १९६८ में आयी थी. यह फिल्म रोशन की आखरी फिल्म थी और इस फिल्म के प्रर्दशित होने से पहले ही उनका देहांत हुआ था.

इतना दार्शनिक और गहराई से भरपूर गीत शायद ही सुनने मिलता है.



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३) असद भोपाली

असद भोपाली (असद खान) ऐसे गीतकार हैं जिन्हें लगभग ४० सालके संघर्ष के बाद बहुत बड़ी सफलता मिली. उनका लिखा हुआ एक साधारण सा गीत "कबूतर जा जा जा " जैसे के देश के हर युवक युवती के लिए प्रेमगीत बन गया. यह गीत था फिल्म मैंने प्यार किया (१९८९) का जिसे संगीतबद्ध किया था राम- लक्ष्मण ने.

असद भोपाली की पहली फिल्मों में से एक थी बहुत बड़े बजट की फिल्म अफसाना (१९५१) जिसमे थे अशोक कुमार, वीणा, जीवन, प्राण, कुलदीप कौर आदि. संगीत था उस ज़माने के लोकप्रिय हुस्नलाल भगतराम का. इसके गीत (और फिल्म भी) लोकप्रिय रहे मगर असद चोटी के संगीतकारोंके गुट में शामिल ना हो सके. सालों साल तक वो एन दत्ता, हंसराज बहल, रवि, सोनिक ओमी, उषा खन्ना, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल आदि संगीतकारों के साथ करते रहे मगर वह कामयाबी हासिल न कर सके जो उन्हें फिल्म मैंने प्यार किया से मिली.

लीजिये फिल्म अफसाना (१९५१) का लता मंगेशकर का गाया हुआ यह गीत सुनिए जिसे असद भोपाली ने दिल की गहराईयों से लिखा है



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४) कमर जलालाबादी

अमृतसर के पास एक छोटा सा गाँव हैं जिसका नाम है जलालाबाद , जहां पर जन्म हुआ था ओमप्रकाश (कमर जलालाबादी) का. महान फिल्मकार दल्सुखलाल पंचोली ने उन्हें पहला मौका दिया था फिल्म ज़मीनदार (१९४२) के लिए. उन्होंने चालीस और पचास के दशक में सदाबहार और सुरीले गीत लिखे. उन्होंने सचिन देव बर्मन के साथ उनकी पहली फिल्म एट डेज़ (१९४६) में भी काम किया. उस ज़माने के लगभग हर संगीतकार के साथ (नौशाद और शंकर जयकिशन के अलावा) उन्होंने गीत लिखे.

उनका लिखा हुआ "खुश हैं ज़माना आज पहली तारीख हैं"(फिल्म पहली तारीख १९५४) का गीत आज भी बिनाका गीतमाला पर महीने की पहली तारीख को बजता है. रिदम किंग ओ पी नय्यर के साथ भी उन्होंने "मेरा नाम चीन चीन चू" जैसे लोकप्रिय गीत लिखे.

लीजिये उनका लिखा हुआ रेलवे की तान पर थिरकता हुआ गीत "राही मतवाले" सुनिए. इसे गाया है तलत महमूद और सुरैय्या ने फिल्म वारिस (१९५४) के लिए. मज़े की बात है कि गीत फिल्माया भी गया था इन्ही दो कलाकारों पर.



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५) किदार शर्मा

महान फिल्म निर्माता, निर्देशक और गीतकार किदार शर्मा की जीवनी "The one and lonely Kidar Sharma" हाल ही में प्रर्दशित हुई थी. जिस गीतकार ने सैंकडो सुरीले गीत लिखे उन्हें आज ज़माना भूल चूका है. कुंदन लाल सहगल की फिल्म "देवदास " के अजरामर गीत इन्ही के कलम से लिखे गए है. "बालम आये बसों मोरे मन में" और "दुःख के अब दीन बीतत नाही". उनके लिखे हुए लोकप्रिय गीत है इन फिल्मों मे : नील कमल (१९४७), बावरे नैन (१९५०), सुहाग रात (१९४८). फिल्म जोगन (१९५०) का निर्देशन भी किदार शर्मा का है.

आज की तारीख में किदार शर्मा को कोई अगर याद करता हैं तो इस बात के लिए की उन्होंने हिंदी फिल्म जगत को राज कपूर, मधुबाला, गीता बाली जैसे सितारे दिए. मुबारक बेग़म का गाया "कभी तनहाईयों में यूं हामारी याद आयेगी" भी इन्ही किदार शर्मा का लिखा हुआ है. इसे स्वरबद्ध किया स्नेहल भाटकर (बी वासुदेव) ने और फिल्माया गया हैं तनुजा पर. मुबारक बेग़म के अनुसार यह गीत अन्य लोकप्रिय गायिका गानेवाली थी मगर किसी कारणवश वह ना आ सकी और मुबारक बेग़म को इस गीत को गाने का मौका मिला. उन्होंने इस गीत के भावों को अपनी मीठी आवाज़ में पिरोकर इसे एक यादगार गीत बना दिया.



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प्रस्तुति -पराग सांकला


"रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत" एक शृंखला है कुछ बेहद दुर्लभ गीतों के संकलन की. कुछ ऐसे गीत जो अमूमन कहीं सुनने को नहीं मिलते, या फिर ऐसे गीत जिन्हें पर्याप्त प्रचार नहीं मिल पाया और अच्छे होने के बावजूद एक बड़े श्रोता वर्ग तक वो नहीं पहुँच पाया. ये गीत नए भी हो सकते हैं और पुराने भी. आवाज़ के बहुत से ऐसे नियमित श्रोता हैं जो न सिर्फ संगीत प्रेमी हैं बल्कि उनके पास अपने पसंदीदा संगीत का एक विशाल खजाना भी उपलब्ध है. इस स्तम्भ के माध्यम से हम उनका परिचय आप सब से करवाते रहेंगें. और सुनवाते रहेंगें उनके संकलन के वो अनूठे गीत. यदि आपके पास भी हैं कुछ ऐसे अनमोल गीत और उन्हें आप अपने जैसे अन्य संगीत प्रेमियों के साथ बाँटना चाहते हैं, तो हमें लिखिए. यदि कोई ख़ास गीत ऐसा है जिसे आप ढूंढ रहे हैं तो उनकी फरमाईश भी यहाँ रख सकते हैं. हो सकता है किसी रसिक के पास वो गीत हो जिसे आप खोज रहे हों.

Sunday, July 12, 2009

रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत (९)

जून २५, २००९ को संगीत दुनिया का एक आफताबी सितारा हमेशा के लिए रुखसत हो गया. माइकल जोसफ जैक्सन जिन्हें लोग प्यार से "जैको" भी कहते थे, आधुनिक संगीत के एक महत्वपूर्ण प्रेरणा स्तम्भ थे, जिन्हें "किंग ऑफ़ पॉप" की उपाधि से भी नवाजा गया. एक संगीतमय परिवार में जन्में जैक्सन ने १९६८ में अपने पूरे परिवार के सम्मिलित प्रयासों से बने एल्बम "जैक्सन ५" से अपना सफ़र शुरू किया. १९८२ में आई उनकी एल्बम "थ्रिलर" विश्व भर में सबसे अधिक बिकने वाली एल्बम का रिकॉर्ड रखती है. "बेड", "डेंजरस" और "हिस्ट्री" जैसी अल्बम्स और उनके हिट गीतों पर उनके अद्भुत और अनूठे नृत्य संयोजन, उच्चतम श्रेणी के संगीत विडियो, संगीत के माध्यम से सामाजिक सरोकारों की तरफ दुनिया का ध्यान खीचना, अपने लाइव कार्यक्रमों के माध्यम से अनूठे प्रयोग कर दर्शकों का अधिकतम मनोरंजन करना आदि जैको की कुछ ऐसी उपलब्धियां हैं, जिन्हें छू पाना अब शायद किसी और के बस की बात न हो. जैको का प्रभाव पूरे विश्व संगीत पर पड़ा तो जाहिर है एशियाई देशों में भी उनका असर देखा गया. उनके नृत्य की नक़ल ढेरों कलाकारों ने की, हिंदी फिल्मों में तो नृत्य संयोजन का नक्शा ही बदल गया. सरोज खान और प्रभु देवा जैसे नृत्य निर्देशकों ने अपने फन पर उनके असर के होने की बात कबूली है. पॉप संगीत की ऐसी आंधी चली कि ढेरों नए कलाकारों ने हिंदी पॉप के इस नए जेनर में कदम रखा और कमियाबी भी पायी. अलीशा चुनोय, सुनीता राव, आदि तो चले ही, सरहद पार पाकिस्तान से आई आवाजों ने भी अपना जादू खूब चलाया भारतीय श्रोताओं पर. नाजिया हसन का जिक्र हमें पिछले एक एपिसोड में किया था. आज बात करते हैं है एक और ऐसी ही आवाज़ जो सरहद पार से आई एक "हवा" के झोंके की तरह और सालों तक दोनों मुल्कों के संगीत प्रेमियों पर अपना जादू चला कर फिर किसी खला में में ऐसे खो गयी कि फिर किसी को उनकी कोई खबर न मिल सकी.

"हवा हवा ऐ हवा, खुशबू लुटा दे..." गीत कुछ यूं आया कि उसकी भीनी खुशबू में सब जैसे बह चले. हसन जहाँगीर घर घर में पहचाने जाने लगे. बच्चे बूढे और जवान सब उनके संगीत के दीवाने से होने लगे. पाकिस्तान विभाजन के बाद बंगलादेश से पाकिस्तान आ बसे हसन जहाँगीर ने पाकिस्तान की विश्व विजेता टीम के कप्तान इमरान खान के लिए गीत लिखा "इमरान खान सुपरमैन है" और चर्चा में आये. उनकी एल्बम "हवा हवा" की कई लाखों में प्रतियाँ बिकी. चलिए इस रविवार हम सब भी MJ को श्रद्धाजंली देते हैं हसन जहाँगीर के इसी सुपर डुपर हिट एल्बम को सुनकर क्योंकि ८० के दशक में इस और ऐसी अन्य अल्बम्स की आपार लोकप्रियता का काफी श्रेय विश्व संगीत पर माइकल का प्रभाव भी था. दक्षिण एशिया के इस पहले पॉप सनसनी रहे हसन जहाँगीर ने हवा हवा के बाद भी कुछ अल्बम्स की पर हवा हवा की कामियाबी को फिर दोहरा न सके. हिंदी फिल्मों के लिए भी हसन ने कुछ गीत गाये जिसमें से अनु मालिक के लिया गाया "अपुन का तो दिल है आवारा" लोकप्रिय हुआ था, पर इसके बाद अचानक हसन कहीं पार्श्व में खो गए. धीरे धीरे लोग भी भूलने लगे. हालाँकि हसन ने कभी भी अपने इस मशहूर गीत के अधिकार किसी को नहीं बेचे पर इस गीत के बहुत से फूहड़ संस्करण कई रूपों में बाज़ार में आता रहा, पर उस दौर के संगीत प्रेमी मेरा दावा है आज तक उस जूनून के असर को नहीं भूल पाए होंगें जो उन दिनों हसन की गायिकी ने हर किसी के दिल में पैदा कर दिया था.

बरसों तक हसन क्यों खामोश रहे, ये तो हम नहीं जानते पर आज एक बार फिर वो चर्चा में हैं, अभिनेत्री से निर्देशक बनी रेवती ने अब पहली बार उनके उसी हिट गीत को अधिकारिक रूप से अपनी नयी फिल्म "आप के लिए हम" में इस्तेमाल करने की योजना बनायीं है. इसके लिए उन्होंने बाकायदा हसन की इजाज़त ली है और ये भी संभव हो सकता है कि खुद हसन जहाँगीर इस गीत पर अभिनय भी करते हुए दिखें. इसी फिल्म से रवीना टंडन अपनी वापसी कर रही है. बहरहाल हवा हवा गीत के इस नए संस्करण का तो हम इंतज़ार करेंगे, पर फिलहाल इस रविवार सुबह की कॉफी के साथ आनंद लीजिये उस लाजवाब अल्बम के बाकी गीतों का. यकीन मानिये जैसे जैसे आप इन गीतों को सुनते जायेंगें, आपके भी मन में यादों के झरोखे खुलते जायेंगें, आज भी हसन की आवाज़ में वही ताजगी और उनके संगीत में वही सादापन नज़र आता है. यदि आप उस दौर के नहीं हैं तब तो अवश्य ही सुनियेगा, क्योंकि हमें पूरा विश्वास है कि आज भी इन गीतों को सुनकर आपको भी हसन जहाँगीर की उस नशीली आवाज़ से प्यार हो जायेगा. तो पेश है अल्बम "हवा हवा" के ये जोरदार गीत -

आजा न दिल है दीवाना ...


दिल जो तुझपे आया है...


जिंदगी है प्यार....


मेघा जैसे रोये साथी.....(मेरा सबसे पसंदीदा गीत)


ले भी ले दिल तू मेरा ओ जानेमन....


शावा ये नखरा गोरी का...


न जाओ ज़रा मेहंदी लगाओ....


ये फैशन के नए रंग है....


जी जी ओ पारा डिस्को...


किस नाम से पुकारूं...




"रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत" एक शृंखला है कुछ बेहद दुर्लभ गीतों के संकलन की. कुछ ऐसे गीत जो अमूमन कहीं सुनने को नहीं मिलते, या फिर ऐसे गीत जिन्हें पर्याप्त प्रचार नहीं मिल पाया और अच्छे होने के बावजूद एक बड़े श्रोता वर्ग तक वो नहीं पहुँच पाया. ये गीत नए भी हो सकते हैं और पुराने भी. आवाज़ के बहुत से ऐसे नियमित श्रोता हैं जो न सिर्फ संगीत प्रेमी हैं बल्कि उनके पास अपने पसंदीदा संगीत का एक विशाल खजाना भी उपलब्ध है. इस स्तम्भ के माध्यम से हम उनका परिचय आप सब से करवाते रहेंगें. और सुनवाते रहेंगें उनके संकलन के वो अनूठे गीत. यदि आपके पास भी हैं कुछ ऐसे अनमोल गीत और उन्हें आप अपने जैसे अन्य संगीत प्रेमियों के साथ बाँटना चाहते हैं, तो हमें लिखिए. यदि कोई ख़ास गीत ऐसा है जिसे आप ढूंढ रहे हैं तो उनकी फरमाईश भी यहाँ रख सकते हैं. हो सकता है किसी रसिक के पास वो गीत हो जिसे आप खोज रहे हों.

Sunday, April 19, 2009

रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत (3)

रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीतों की सौगात लेकर हम फिर से हाज़िर हैं. आज आपके लिए कुछ ख़ास लेकर आये हैं हम सबके प्रिय पंकज सुबीर जी. हमें उम्मीद ही नहीं यकीन है कि पंकज जी का ये नायाब नजराना आप सब को खूब पसंद आएगा.

असमिया संगीतकार और गायक श्री भूपेन हजारिका का गीत "ओ गंगा बहती हो क्‍यों" जब आया तो संगीत प्रेमियों के मानस में पैठता चला गया । हालंकि भूपेन दा काफी पहले से हिंदी फिल्‍मों में संगीत देते आ रहे हैं किन्‍तु उनको हिंदी संगीत प्रेमियों ने इस गाने के बाद हाथों हाथ लिया । यद्यपि 1974 में आई फिल्‍म "आरोप" जिसके निर्देशक श्री आत्‍माराम थे तथा जिसमें विनोद खन्‍ना और सायरा बानो मुख्‍य भूमिकाओं में थे उस फिल्‍म का एक गीत जो लता जी तथा किशोर दा ने गाया था वो काफी लोकप्रिय हुआ था । गीत था- "नैनों में दर्पण है दर्पण में कोई देखूं जिसे सुबहो शाम" । इस फिल्‍म के संगीतकार भी भूपेन दा ही थे । भूपेन दा और गुलजार साहब ने मिलकर जब "रुदाली" का गीत संगीत रचा तो धूम ही मच गई । रुदाली में इस जादुई जोड़ी के साथ त्रिवेणी के रूप में आकर मिली लता जी की आवाज । और फिर श्रोताओं को मिले दिल हूम हूम करे, समय ओ धीरे चलो जैसे कई सारे अमर गीत । रुदाली का संगीत बहुत पापुलर संगीत है और वो उस दौर का संगीत है जब "माया मेमसाब", "लेकिन", "रुदाली" जैसी फिल्‍मों में हट कर संगीत आ रहा था । किन्‍तु आज हम बात करेंगें एक ऐसी फिल्‍म की जिसमें यही टीम थी और संगीत भी ऐसा ही अद्भुत था लेकिन किसी कारण से न तो फिल्‍म को कोई महत्‍व मिला और संगीत भी उसी प्रकार से आकर चुपचाप ही चला गया । यहां तक कि रुदाली फिल्‍म की निर्देशिका कल्‍पना लाजमी ही इस फिल्‍म "एक पल" की भी निर्देशिका थीं । किन्‍तु जहां रुदाली आई थी 1993 में तो एक पल आई थी 1985 में । अर्थात लगभग आठ साल पहले ।

तो आइये बात करते हैं एक पल की और सुनते हैं उसके वे अद्भुत गीत ।
1985 में आई एक पल में शबाना आजमी, नसीरुद्दीन शाह और फारुख शेख जैसे कलाकार थे । जाहिर सी बात है कि ये एक आफ बीट फिल्‍म थी । 1985 में मार धाड़ की फिल्‍मों का दौर चल रहा था और शायद इसीलिये ये फिल्‍म और इसके गीत कुछ अनसुने से होकर गुज़र गये थे । संगीत भूपेन दा का था और गीत लिखे थे कैफी आजमी साहब और गुलजार साहब ने मिलकर ।

यदि अपनी बात कहूं तो मुझे लता जी का गाया तथा गुलजार सा‍हब का लिखा गीत 'जाने क्‍या है जी डरता है, रो देने को जी करता है, अपने आप से डर लगता है ' सबसे पसंद है । जाने किस मानसिकता में लिखा गया है ये गीत । शब्‍द ऐसे कि लगता है मानो किसी ने हमारे ही भावों को अभिव्‍यक्ति दे दी है । उस पर लता जी ने जिस हांटिंग स्‍वर में गाया है, ऐसा लगता है कि बार बार सुनते रहो इस गीत को ।

जाने क्‍या है जी डरता है


एक और गीत है जो लता जी, भूपेन दा तथा गुलजार साहब की ही त्रिवेणी ने रचा है । शब्‍द देखें 'चुपके चुपके हम पलकों में कितनी सदियों से रहते हैं, आ डूब के देखें नीले से सागर में कैसे बहते हैं, आ जाना डूब के देखेंगें' ये गीत भी एक ऐसा गीत है जिसे रात की ख़ामोशी में सुन लो तो नशा ही छा जाये ।' जो सोचा है वो झूठ नहीं महसूस किया वो पाप नहीं, हम रूह की आग में जलते हैं ये जिस्‍म का झूठा ताप नहीं' जैस्‍ो शब्‍दों का जादू देर तक सर पर चढ़ा रहता है ।

चुपके चुपके


कैफी आजमी साहब का लिखा हुआ एक गीत है जो कि दो स्‍वरों में है भूपेंद्र तथा आशा भौंसले जी ने अलग अलग इस गीत को अपनी तरह से गाया है । 'आने वाली है बहार सूने चमन में, कोई फूल खिलेगा प्‍यारा सा कोमल तन में' ये गीत दोनों ही बार आनंद देता है । आशा जी की खनकदार आवाज़ जो गीतों में प्राण फूंक देती है उसने इस गीत को अमर कर दिया है । भूपेंद्र ने गीत का सेड वर्शन गाया है । जाहिर सी बात है उसमें संगीत भी वैसा ही है ।

आने वाली है बहार


आने वाली है बहार (आशा)


एक और गीत जो मुझे हांट करता है वो लता जी और भूपेन दा के स्‍वरों में है तथा गुलजार साहब ने लिखा है । गीत के बोल हैं 'मैं तो संग जाऊं बनवास, स्‍वामी न करना निरास, पग पग संग जाऊं, जाऊं बनवास हे' गीत के बोल ही बता रहे हैं कि राम के बनवास गमन पर गीत है । जिसमें लता जी बनवास ग वन गमन की जिद कर रहे हैं और भूपेन दा रोकने के लिये अपनी बात कर रहे हैं । 'जंगल बन में घूमे हाथी भालू शेर और हिरना, नारी हो तुम डर जाओगी न जाओ बनवास हे '' । अनोखा सा गीत है ये ।

मैं तो संग


गुलजार साहब के एक और गीत को झूम कर गाया है नितिन मुकेश, भूपेन दा और भूपेंद्र ने । 'फूले दाना दाना फूले डालियां भंवराता आया बैसाख' इस गीत में असम के बीहू की ध्‍वनियां भूपेन दा ने उपयोग की हैं ।'बाजरे की बाली सी छोरिया, गेहूं जैसी गोरिया, रात को लागे चांदनी, ऐसी ला दे जोरुआ' । मुझे नहीं मालूम असम में बैसाख कैसा आता है किन्‍तु इस गीत में तो अद्भुत मस्‍ती है बैसाख की । और अंत में जब गीत तेज होता है तो वो पंक्तियां 'पूर्णिमा अगनी जल गई रजनी, जल्‍दी करा दे रे मंगनी, हो मैया करा दे रे' गीत देर तक मस्‍ती देता रहता है । बीच बीच में भूपेन दा का स्‍वर किसी जादू की तरह आता है ।

फूले दानादाना


गुलज़ार साहब का एक और गीत है जो दो बार है एक बार सेड है और एक हैप्‍पी है । सेड में केवल भूपेंद्र ने गाया है और हैप्‍पी वर्शन में भूपेन दा, भूपेंद्र, उषा मंगेशकर तथा हेमंती शुक्‍ला ने इसे गाया है । विवाह गीत है ये 'जरा धीरे जरा धीमे ले के जइहो डोरी, बड़ी नाज़ुक मेरी जाई मेरी बहना भोली' । गीत में भी लोक संगीत की ध्‍वनियां हैं और भरपूर हैं ।

जरा धीरे


तो ये है संगीत फिल्‍म 'एक पल' का जिसे निर्देशित किया था कल्‍पना लाजमी ने । फिल्‍म भले ही यूंही आकर यूंही चली गई हो किन्‍तु इसका संगीत अमर है । ये लोक का संगीत है ।

प्रस्तुति - पंकज सुबीर

पिछले अंक में विकास शुक्ल जी ने हमसे लता जी के गाये एक गीत की फरमाईश की थी, हमने एक बार फिर अजय जी का दरवाज़ा खटखटाया और उन्होंने ढूंढ निकला वह दुर्लभ गीत जिसे विकास जी ढूंढ रहे थे. आप भी सुनिए फिल्म "गजरे" से ये गीत "बरस बरस बदरी बिखर गयी...", संगीत है अनिल बिस्वास का -





"रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत" एक शृंखला है कुछ बेहद दुर्लभ गीतों के संकलन की. कुछ ऐसे गीत जो अमूमन कहीं सुनने को नहीं मिलते, या फिर ऐसे गीत जिन्हें पर्याप्त प्रचार नहीं मिल पाया और अच्छे होने के बावजूद एक बड़े श्रोता वर्ग तक वो नहीं पहुँच पाया. ये गीत नए भी हो सकते हैं और पुराने भी. आवाज़ के बहुत से ऐसे नियमित श्रोता हैं जो न सिर्फ संगीत प्रेमी हैं बल्कि उनके पास अपने पसंदीदा संगीत का एक विशाल खजाना भी उपलब्ध है. इस स्तम्भ के माध्यम से हम उनका परिचय आप सब से करवाते रहेंगें. और सुनवाते रहेंगें उनके संकलन के वो अनूठे गीत. यदि आपके पास भी हैं कुछ ऐसे अनमोल गीत और उन्हें आप अपने जैसे अन्य संगीत प्रेमियों के साथ बाँटना चाहते हैं, तो हमें लिखिए. यदि कोई ख़ास गीत ऐसा है जिसे आप ढूंढ रहे हैं तो उनकी फरमाईश भी यहाँ रख सकते हैं. हो सकता है किसी रसिक के पास वो गीत हो जिसे आप खोज रहे हों.

Sunday, April 12, 2009

रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत (2)

रविवार सुबह की कॉफी के साथ कुछ और दुर्लभ गीत लेकर हम हाज़िर हैं. आज हम जिस फिल्म के गीत आपके लिए लेकर आये हैं वो कोई ज्यादा पुरानी नहीं है. अमृता प्रीतम के उपन्यास पर आधारित चन्द्र प्रकाश द्विवेदी निर्देशित २००३ में आयी एक बेहतरीन फिल्म है -"पिंजर". उर्मिला मातोंडकर और मनोज वाजपई ने अपने अभिनय से सजाया था फिल्म में पुरो और राशिद के किरदारों को. फिल्म का एक और बड़ा आकर्षण था उत्तम सिंह का संगीत. वैसे तो इस फिल्म के गीत बेहद मशहूर हुए विशेषकर "शाबा नि शाबा" और "मार उड़ारी". अमृता प्रीतम द्वारा उपन्यास में दर्ज गीत "चरखा चलाती माँ" और जगजीत सिंह का गाया "हाथ छूटे भी तो" भी काफी सराहा गया. यूँ तो आज हम आपको प्रीती उत्तम का गाया "चरखा चलाती माँ" और वाड्ली बंधुओं का "दर्द मारियाँ" भी सुन्वायेगें. पर विशेष रूप से दो गीत जो हम आपको सुनवा रहे हैं वो बहुत कम सुने गए हैं पर इतने बेहतरीन हैं कि उन्हें इस कड़ी में आपको सुनवाना लाजमी ही है. एक "वतन वें" और दूसरा है अमृता प्रीतम का लिखा "वारिस शाह नु..." अभी कुछ दिन पहले आवाज़ के नियमित श्रोता प्रदीप बाली जी ने हमें इस गीत की याद दिलवाई और कहा कि इसे कहीं से भी ढूंढ कर आवाज़ पर सुनवाया जाए. इस गीत को ऑंखें मूँद कर सुनियेगा हमारा दावा है कि गीत खत्म होते होते आपकी आँखों से भी एक मोती टूट कर ज़रूर गिरेगा. कुछ ऐसा दर्द है इस गीत में.

खैर इससे पहले कि हम इन गीतों को सुनें. कुछ बातें इन गीतों के संगीतकार उत्तम सिंह के बारे में हो जाए. दरअसल अधिकतर लोग उत्तम सिंह को जानने लगे थे यश चोपडा की "दिल तो पागल है" के सुपर हिट संगीत के बाद से. पर जिन लोगों ने दीवानों की तरह १९८० के दौर में जगजीत सिंह को सुना हो वो अच्छी तरह जानते हैं कि जगजीत की लगभग सभी अल्बम्स में संगीत संयोजन उत्तम सिंह का ही रहा है. पर हम आपको बता दें कि उत्तम सिंह का संगीत सफ़र १९६० में शुरू हुआ था. संगीत से जुड़े परिवार से आये उत्तम सिंह को १९६३ में मोहम्मद साफी (इनकी चर्चा फिर कभी करेंगे) द्वारा निर्मित एक लघु फिल्म में वोइलिन बजाने का मौका मिला. उसके बाद उत्तम ने सभी प्रमुख संगीतकारों के लिए वोइलिन बजाया. उन्होंने एक अन्य संगीतकार जगदीश के साथ मिलकर उत्तम जगदीश के नाम से जोड़ी बनायीं. इस जोड़ी को पहला ब्रेक दिया मनोज कुमार ने फिल्म "पेंटर बाबू" में उत्तम जगदीश का संगीत बेहद लोकप्रिय हुआ फिल्म "वारिस" में. लता का गाया "मेरे प्यार की उम्र हो इतनी सनम" आज भी याद किया जाता है. १९९२ में जगदीश की आकस्मिक मृत्यु के बाद उत्तम ने स्वतंत्र रूप से "दिल तो पागल है" से कमियाबी पायी. "ग़दर-एक प्रेम कथा" में तमाम हिंसा के बावजूद उनके मधुर संगीत को अवाम ने सर आँखों पे बिठाया. उदित नारायण की आवाज़ में "उड़ जा काले कावां" ने मेलोडी गीतों को वापस स्थापित कर दिया. संगीत संयोजक के रूप में भी फिल्म "मैंने प्यार किया" और "हम आपके हैं कौन" में भी उनका काम सराहा गया. पर "पिंजर" में तो उनका संगीत अपने चरम पर था. एक से बढ़कर एक गीत हैं इस फिल्म में. उनकी बेटी हैं प्रीती उत्तम जिन्होंने इस फिल्म के "चरखा चलाती माँ" और अन्य गीतों को अपनी आवाज़ दी. इन गीतों को गाकर प्रीती ने हमेशा हमेशा के लिए खुद को संगीत प्रेमियों के दिलो-जेहन में कैद कर लिया है. तो चलिए और अब और इंतज़ार नहीं कराते आपको. वैसे तो आपको रुलाने का इरादा नहीं है पर किसी शायर ने कहा है न -

घर की तामीर चाहे जैसी हो.
इसमें रोने की कुछ जगह रखना...

सुनिए, प्रीती की मर्मस्पर्शी आवाज़ में - "चरखा चलाती माँ"


दरदां मारियाँ माहिया


वतना वे..


और सुनिए ये गीत "वारिस शाह नु..."


पिछले अंक में कुछ श्रोताओं ने हमसे गुजारिश की थी कि वो लता का गाया पहला गीत सुनना चाहते हैं. तो लीजिये आपकी फरमाईश पर फिल्म "आपकी सेवा में" से लता मंगेशकर का गाया पहला फ़िल्मी गीत प्रस्तुत है (सौजन्य- अजय देशपांडे, नागपुर)

पा लागूं कर गोरी से...




"रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत" एक शृंखला है कुछ बेहद दुर्लभ गीतों के संकलन की. कुछ ऐसे गीत जो अमूमन कहीं सुनने को नहीं मिलते, या फिर ऐसे गीत जिन्हें पर्याप्त प्रचार नहीं मिल पाया और अच्छे होने के बावजूद एक बड़े श्रोता वर्ग तक वो नहीं पहुँच पाया. ये गीत नए भी हो सकते हैं और पुराने भी. आवाज़ के बहुत से ऐसे नियमित श्रोता हैं जो न सिर्फ संगीत प्रेमी हैं बल्कि उनके पास अपने पसंदीदा संगीत का एक विशाल खजाना भी उपलब्ध है. इस स्तम्भ के माध्यम से हम उनका परिचय आप सब से करवाते रहेंगें. और सुनवाते रहेंगें उनके संकलन के वो अनूठे गीत. यदि आपके पास भी हैं कुछ ऐसे अनमोल गीत और उन्हें आप अपने जैसे अन्य संगीत प्रेमियों के साथ बाँटना चाहते हैं, तो हमें लिखिए. यदि कोई ख़ास गीत ऐसा है जिसे आप ढूंढ रहे हैं तो उनकी फरमाईश भी यहाँ रख सकते हैं. हो सकता है किसी रसिक के पास वो गीत हो जिसे आप खोज रहे हों.



Wednesday, November 26, 2008

षड़ज ने पायो ये वरदान - एक दुर्लभ गीत


येसू दा का जिक्र जारी है, सलिल दा के लिए वो "आनंद महल" के गीत गा रहे थे, उन्हीं दिनों रविन्द्र जैन साहब भी अभिनेता अमोल पालेकर के लिए एक नए स्वर की तलाश में थे. जब उन्होंने येसू दा की आवाज़ सुनी तो लगा कि यही एक भारतीय आम आदमी की सच्ची आवाज़ है, दादा(रविन्द्र जैन) ने बासु चटर्जी जो कि फ़िल्म "चितचोर" के निर्देशक थे, को जब ये आवाज़ सुनाई तो दोनों इस बात पर सहमत हुए कि यही वो दिव्य आवाज़ है जिसकी उन्हें अपनी फ़िल्म के लिए तलाश थी. उसके बाद जो हुआ वो इतिहास बना. चितचोर के अविस्मरणीय गीतों को गाकर येसू दा ने राष्टीय पुरस्कार जीता और उसके बाद दादा और येसू दा की जुगलबंदी ने खूब जम कर काम किया.

वो सही मायनों में संगीत का सुनहरा दौर था. जब पूरे पूरे ओर्केस्ट्रा के साथ हर गीत के लिए जम कर रिहर्सल हुआ करती थी, जहाँ फ़िल्म के निर्देशक भी मौजूद होते थे और गायक अपने हर गीत में जैसे अपना सब कुछ दे देता था. येसू दा और रविन्द्र दादा के बहाने हम एक ऐसे ही गीत के बनने की कहानी आज आपको सुना रहे हैं. येसू दा की माने तो ये उनका हिन्दी में गाया हुआ सबसे बहतरीन गीत है. पर दुखद ये है कि न तो ये फ़िल्म कभी बनी न ही इसके गीत कभी चर्चा में आए.

राजश्री वाले एक फ़िल्म बनाना चाहते थे संगीत सम्राट तानसेन के जीवन पर आधारित, चूँकि पुरानी तानसेन काफी समय पहले बनी थी राजश्री ७०-८० के दशक के दर्शकों के लिए तानसेन को फ़िर से जिन्दा करना चाहते थे और उनके पास "तुरुप का इक्का" संगीतकार रविन्द्र जैन भी थे, तो काम असंभव नही दिखता था. बहरहाल काम शुरू हुआ. रविन्द्र जी ने गीत बनाया "षड़ज ने पायो ये वरदान" और सबसे पहले रफी साहब से स्वर देने का आग्रह किया. रफी साहब उन दिनों अपने चरम पर थे, तो हो सकता है बात समय के अभाव की रही हो पर उन्होंने दादा से बस यही कहा "रवि जी,मोहमद रफी इस जीवन काल में तो कम से कम ये गीत नही गा पायेगा...". दादा आज भी मानते हैं कि ये उनका बड़प्पन था जो उन्होंने ऐसा कहा. हेमंत दा से भी बात की गई पर काम कुछ ऐसा मुश्किल था कि हेमंत दा भी पीछे हट गए, यह कहकर कि इस गीत को गाने के बारे में सोचकर ही मैं तनावग्रस्त हो जाता हूँ. तब जाकर दादा ने येसू दा से इसे गाने के लिए कहा. दोनों महान कलकारों ने पूरे दो दिन यानी कुल ४८ घंटें बिना रुके, बिना भोजन खाए और बिना पानी का एक घूँट पिये काम करते हुए गीत की रिकॉर्डिंग पूरी की. ५९ वीं बार के "टेक" में जाकर गीत "ओके" हुआ. सुनने में असंभव सी लगती है बात, पर सच्चे कलाकारों का समर्पण कुछ ऐसा ही होता है.

फ़िल्म क्यों नही बनी और इसके गीत क्यों बाज़ार में नही आए इन कारणों के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नही है, पर येसू दा अपने हर कंसर्ट में इस गीत का जिक्र अवश्य करते हैं, १९८६ में दुबई में हुए एक कार्यक्रम में उन्होंने इसे गाया भी जिस की रिकॉर्डिंग आज हम आपके लिए लेकर आए हैं....हमारे सुधि श्रोताओं के नाम येसू दा और रविन्द्र जैन "दादा" का का ये नायाब शाहकार -




दादा इन दिनों वेद् और उपनिषद के अनमोल बोलों को धुन में पिरोने का काम कर रहे हैं. और वो इस कोशिश में येसू दा को नए रूप में आज के पीढी के सामने रखेंगें. संगीत के कद्रदानों के लिए इससे बेहतर तोहफा भला क्या होगा. सोमवार को हम लौटेंगे और बात करेंगे रविन्द्र जैन साहब के बारे में, विस्तार से. बने रहिये आवाज़ पर.

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