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Monday, January 8, 2018

फिल्मी चक्र समीर गोस्वामी के साथ || एपिसोड 22 || राजेश खन्ना

Filmy Chakra

With Sameer Goswami 
Episode 22
Rajesh Khanna


फ़िल्मी चक्र कार्यक्रम में आप सुनते हैं मशहूर फिल्म और संगीत से जुडी शख्सियतों के जीवन और फ़िल्मी सफ़र से जुडी दिलचस्प कहानियां समीर गोस्वामी के साथ, लीजिये आज इस कार्यक्रम के 22 वें एपिसोड में सुनिए कहानी सुपर स्टार राजेश खन्ना की...प्ले पर क्लिक करें और सुनें....




फिल्मी चक्र में सुनिए इन महान कलाकारों के सफ़र की कहानियां भी -


Tuesday, August 21, 2012

एक सुरीला दौर जो बीतकर भी नहीं बीता -राजेश खन्ना


सुनिए काका को श्रद्धान्जली देने को तैयार किया गया हमारा खास पॉडकास्ट  


मूल स्क्रिप्ट 

यह पोडकास्ट समर्पित है हिन्दी फिल्मों के निर्विवादित पहले सुपरस्टार को। इनकी मक़बूलियत के किस्से परिकथाओं और जनश्रुतियों की तरह दुनिया में मशहूर हैं। हमें उम्मीद और पक्का यकीन है कि हमें इनका नाम बताने की ज़रूरत न होगी। चलिए तो नाम पर पर्दा रहते हुए हीं इनके बारे में दो-चार बातें कर ली जाएँ। इन महानुभाव का जन्म २९ दिसंबर १९४२ को ब्रिटिश इंडिया के बुरेवाला में हुआ था। जब जन्म हुआ तो नाम भी रखना था तो नाम रखा गया जतिन अरोड़ा। लेकिन ज्यादा दिनों तक न जतिन रहा और न हीं अरोड़ा। १९४८ में जब इनके माता-पिता इन्हें अपने रिश्तेदारों चुन्नी लाल खन्ना और लीलावती खन्ना को सौंपकर पंजाब के अमृतसर चले गए तो ये अरोड़ा से खन्ना हो लिए। इनके नए माता-पिता बंबई के गिरगांव के नजदीक ठाकुरगांव में रहते थे। यही इनका भी लालन-पालन और बढना-पढना हुआ। इन्होंने स्कूल से लेकर कॉलेज तक की पढाई की अपने बचपन के दोस्त रवि कपूर के साथ जो आगे चलकर जितेंद्र कहलाए। ज्यों-ज्यों इनकी उम्र बढती गई, इन्हें अपने सही हुनर की पहचान और परख की ज़रूरत महसूस हुई और ये एक जुनून के साथ अदाकारी की ओर हो लिए। उस वक़्त थियेटर का रूतबा था तो इन्होंने भी कई सारे नाटक किए, रंगमंच की शोभा बढाई। रंगमंच ने इनकी अदाकारी में इतने रंग भर दिए और इन्हें इतना मुखर कर दिया कि जब फिल्मों में इन्हें पहला मौका मिलना था तो इन्होंने रूखे-सूखे संवाद को अपने थियेटर के अंदाज़ से ऐसा रंगीन कर दिया कि सारे चयनकर्ता हक्के-बक्के रह गए।

 बात करते हैं जतिन खन्ना के रंगमंच के दिनों की। फिल्मों में आने से पहले इन्होंने अपने आप को रंगमंच पर खूब मांजा। इन्होंने कई नाटक मंचित किए। वार्डन रोड के भूलाभाई देसाई मेमोरियल इंस्टीयूट में ये नाटकों के रिहर्सल करते थे। उन्हीं दिनों गीताबाली ने वहां अपना दफ्तर खोला था। वह पंजाबी फिल्म 'रानो' की योजना बना रही थीं। गीता बाली ने इन्हें अपनी फिल्म में एक भूमिका दी और यह भविष्यवाणी भी कर दी कि तुम एक दिन बड़े स्टार बनोगे। इन्हें यकीन नहीं हुआ। ये ज्योतिषी से मिले। ज्योतिषी ने बताया कि अभिनेता के तौर पर इनका कोई भविष्य नहीं है। हां, अगर ये लोखंड (लोहा) का कारोबार करें तो सफल हो सकते हैं। ज्योतिषी की भविष्यवाणी गलत साबित हुई और अभिनेता जतिन खन्ना का लोहा सभी ने माना।

 समय बीतता गया और देखते-देखते १९६५ आ गया। तब जतिन खन्ना महज २३ साल के थे। उस वक़्त "युनाइटेड प्रोड्युसर्स" जिसमें शीर्ष के १२ फिल्म निर्माता शामिल थे, ने एक ‘ऑल इंडिया टैलेंट हंट आयोजित किया था। निर्णायकों में चेतन आनंद, जी पी शिप्पी , नासिर हुसैन जैसे मंझे हुए निर्माता-निर्देशक थे। इस टैलेंट हंट में दस हज़ार से भी ज्यादा प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। जतिन खन्ना ने सबको पछाड़ते हुए जीत हासिल की। कहते हैं कि हारने वालों में विनोद मेहरा भी थे.. खैर वह कहानी फिर कभी। हाँ तो इस जीत के साथ यह निश्चित हो गया था कि जतिन खन्ना एक के बाद एक १२ निर्देशकों की फिल्मों में नज़र आएँगे। उस वक़्त यह जुमला बहुत मशहूर हुआ था कि जहाँ दूसरे नवोदित कलाकार फटे कपड़े और टूटी चप्पल में संघर्ष कर रहे थे, वहीं जतिन खन्ना का स्ट्रगल इनकी "इम्पाला" गाड़ी में होता था। हाँ तो जब फिल्मों का दौर शुरू होना था, तब इनके शुभचिंतकों को महसूस हुआ कि जतिन नाम "खास फिल्मी" नहीं लगता, यह किसी व्यावसायिक घराने से जुड़े इंसान का नाम लगता है, इसलिए इन्हें सलाह दिया गया कि जतिन की जगह ये "फिल्मों के किसी आम किरदार" का नाम रखे लें और तब "जतिन" "राजेश" में तब्दील हो गया। इन शुभचिंतकों में या तो इनके अपने चाचा के०के० तलवार थे या फिल्म निर्माता जी०पी०सिप्पी।

 जतिन राजेश कैसे हुए ये तो हम जान गए लेकिन राजेश काका कैसे हुए, चलिए यह भी जान लिया जाए। ज्यादातर लोगों को यह गलतफहमी रहती है कि राजेश खन्ना को "काका" यानि कि "चाचा" के नाम से संबोधित किया जाता है। लेकिन ऐसा नहीं है। पंजाबी में काका का मतलब होता है छोटा नन्हा-सा बच्चा। जब ये फिल्मों में आए तब इनकी उम्र बहुत हीं कम थी। इसलिए इनके सहकलाकारों और इनके निर्माता-निर्देशकों ने इन्हें प्यार से काका कहना शुरू कर दिया। फिर आगे क्या हुआ, यह तो इतिहास है। आप यकीन नहीं करेंगे लेकिन "काका" की पत्नी यानि कि डिंपल कपाड़िया भी इन्हें काका हीं कहा करती थीं, वैसे हीं जैसे दिलीप कुमार को शायरा बानो आज भी "साहब" हीं कहती हैं।

 राजेश खन्ना की सबसे पहली फिल्म आई "आखिरी खत"। इस फिल्म के निर्देशक थे चेतन आनंद। यह फिल्म १९६७ के ४०वें आस्कर अवार्ड में सर्वश्रेष्ठ विदेशी फिल्म के श्रेणी में भेजी गई थी। आखिरी खत के बाद रविन्द्र दवे की "राज़" आई। समयक्रम के हिसाब से तो "राज़" बाद में आई थी, लेकिन "द हिन्दु" को दिए एक साक्षात्कार में राजेश खन्ना ने कहा था कि "भले हीं आखिरी खत मेरी पहली फिल्म थी, लेकिन पहला ब्रेक मुझे रविन्द्र दवे ने दिया था अपनी फिल्म राज़ में। इस फिल्म में मेरे साथ बबीता थीं, जो उस समय बहुत हीं मशहूर थीं। चूँकि मैं पहली बार कैमरे के सामने थे, इसलिए मेरे अंदर का कलाकार खुल कर बाहर आने में वक़्त ले रहा था। मैंने अपनी संवाद अदायगी तो दो-चार टेक में सही कर ली, लेकिन मेरा बडी लैंग्वेज और मेरा मूवमेंट अभी भी गलत हीं जा रहा था। तब रविन्द्र दवे ने मुझे सीन सही से समझाया और मेरे चलने के तरीके को परफेक्ट कर दिया।" "राज़" के बाद नासिर हुसैन की बहारों के सपने आई। बदकिस्मती से ये तीनों फिल्में बॉक्स ऑफिस पे फ्लॉप हो गई। तीन लगातार फिल्मों के फ्लॉप होने के बाद निश्चित था कि निर्माता इनसे कन्नी काटने लगेंगे और वही हुआ, वही होता रहा.. जब तक अराधना नहीं आई थी।

 आराधना १९४६ की हॉलीवुड की फिल्म "टू इच हिज़ ओन" की रीमेक थी। कहते हैं कि अराधना जब आठ रील तक फिल्मा ली गई थी, तब तक इसके निर्देशक शक्ति सामंता काका की नाकामयाबी से इतने परेशान हो चले थे कि उन्होंने काका को फिल्म से निकाल देने तक का ख्याल कर लिया था। ऐसा इसलिए क्योंकि सारे वितरकों ने इस फिल्म से खुद को दूर करने की घोषणा कर दी थी। लेकिन फिर न जाने क्या हुआ, शक्ति सामंता को अपने मुख्य अभिनेता पर यकीन हो आया और उन्होंने इस फिल्म में न एक सिर्फ़ एक बल्कि दो-दो काका हमें दिए। कहते हैं कि जिस दिन फिल्म रीलिज हुई उस दिन दोपहर बारह बजे तक सिनेमा हॉल्स लगभग खाली थे, लेकिन शाम तक माउथ पब्लिसिटी इतनी फैली कि हॉल्स के बाहर हाउसफुल के बोर्ड लगाने पड़े। फिर तो राजेश खन्ना और शर्मिला टैगोर का एक फिल्म का सफर पूरी १२ फिल्मों तक चलता रहा। इस फिल्म से जुड़ी कुछ मज़ेदार कहानियाँ हैं। एक तो ये कि "रूप तेरा मस्ताना" हिन्दी फिल्मों का ऐसा पहला गाना है जो एक हीं टेक में फिल्माया गया था। इस फिल्म का एक और गाना "मेरे सपनों की रानी" सबको ज़रूर याद होगा। इस गाने की खासियत यह है कि काका की जीप और शर्मिला टैगोर की ट्वाय ट्रेन भले हीं एक साथ चलती दिखती हैं लेकिन दोनों का फिल्मांकन अलग-अलग जगहों पर हुआ था। शर्मिला उस वक़्त सत्यजीत रे की फिल्म कर रही थीं, इसलिए वो दार्जिलिंग न जा सकी और उनके दृश्य बंबे में हीं फिल्माए गए। काका अपनी धुन के पक्के थे इसलिए वे सुजीत कुमार को साथ लेकर निकल लिए दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे की सैर करने।

 काका की एक और जो बहुत मक़बूल फिल्म थी वह थी "हाथी मेरे साथी"। इस फिल्म के निर्माता थे तेवार फिल्म्स के चिनप्पा तेवार, जो कि अपनी फिल्मों में जानवरों के इस्तेमाल के लिए मशहूर थे। यह पहली फिल्म थी जिसमें सलीम-जावेद ने पटकथा लिखी थी। और इसका सारा श्रेय काका को जाता है। बकौल जावेद साहब: "एक दिन राजेश खन्ना सलीम साहब के पास आएँ और उन्होने कहा कि मिस्टर तेवार ने उन्हें बहुत बड़ा साइनिंग अमाउंट दिया है, जिससे वे अपने बंगले आशिर्वाद की किश्तें चुका पाएँगे। लेकिन दिक्कत यह है कि फिल्म की स्क्रिप्ट बेहतरीन क्या, अच्छी होने से भी कोसों दूर है। इसलिए वे चाहते थे कि हम दोनों सलीम और जावेद मिलकर इस पर काम करॆं और उन्होंने इस बात का पूरा ध्यान रखा कि हमें पैसों के साथ-साथ क्रेडिट भी पूरी मिले।" इस फिल्म से जुड़ा एक मज़ेदार वाक्या है। यह तो जगजाहिर था कि काका जब कामयाब हो लिए तो उन्होंने घड़ी पर ध्यान रखना लगभग छोड़ हीं दिया था। अगर फिल्म की शिफ्ट सुबह ६ बजे की हो तो ये सेट पर ३ बजे दिन में पहुँचते थे। अच्छे अदाकार थे इसलिए इन्हें ज्यादा टेक लेने की ज़रुरत नहीं पड़ती थी, लेकिन निर्माता-निर्देशक को नुकसान तो सहना हीं पड़ता था। तो हुआ यूँ कि जब भी काका हाथी मेरे साथी के सेट पर पहुँचते थे तो देखते थे कि चिनप्पा तेवार एक स्पॉट ब्यॉय की पिटाई कर रहे हैं। यह हर रोज़ होता था। थक-हारकर एक दिन जब काका ने उस लड़के से पिटाई की वजह पूछी तो मालूम चला कि निर्माता होते थे गुस्सा काका से लेकिन चूँकि काका को कुछ कह नहीं सकते इसलिए उन्हें दिखाकर अपना गुस्सा निकालते थे। तब से काका ने यह कोशिश करनी शुरू कर दी वे सेट पर लेट न पहुँचें। 

काका को गीत-संगीत का बहुत शौक था और वे ध्यान रखते थे कि इनकी फिल्मों के गानें कहीं से कमजोर न रहें। इनके गानों मे पंचम और किशोर अमूमन नियमित और निश्चित थे। कई बार तो इन्होंने जिद्द ठान ली थी कि किशोर नहीं गाएँगे तो गाना हीं नहीं होगा। एक ऐसे हीं वाक्ये का ज़िक्र किशोर दा ने एक इंटरव्यु में किया था। उस दौरान काका की पंचम दा से कुछ अनबन हो गई थी। इसलिए उन्होंने "दुश्मन" फिल्म के निर्माता से कहकर पंचम दा की जगह "लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल" को साईन करवा लिया था। तो जब उस फिल्म के एक गाने "वादा तेरा वादा" को गाने कि बारी आई तो किशोर दा को महसूस हुआ कि इसे अगर रफ़ी साहब गाएँगे तो ज्यादा जमेगा। उन्होंने यह बात एल-पी को बताई लेकिन काका के सामने किसकी चलनी थी। काका ने सीधा-सीधा कह दिया कि या तो किशोर या तो कोई नहीं। हार मानकर किशोर दा को हामी भरनी पड़ी। आराधना के दौरान काका ने शक्ति सामंता को इतना कह दिया था कि किशोर उनकी आत्मा हैं और वे किशोर के शरीर। काका किशोर दा और पंचम दा के साथ-साथ आनंद बक्शी के भी काफी नजदीक थे। कहते हैं कि जब १९९२ में ससदीय उपचुनाव चल रहे थे तब ये बक्षी साहब से कविताएँ लिखवाकर उन्हें मंच पर पढा करते थे। १९८५ में इन्होने जब अपनी फिल्म "अलग-अलग" बनाई थी, तब इन्होंने वादे के अनुसार पंचम दा और बक्षी साहब को एक-एक कार उपहार में दिए थे। तो ऐसा था इनका गीत-संगीत से प्यार।

 काका ने दो साल में चौदह गोल्डन-जुब्ली फिल्में दी थीं। इन्होंने बहुत कम हीं मल्टी-स्टारर फिल्में की थीं। उन मल्टी-स्टारर में दो जो खासे लोकप्रिय हुए वे थे आनंद और नमकहराम। दोनों फिल्मों में काका के साथ थे तब के उभरते स्टार अमिताभ बच्चन। दोनों हीं फिल्में ऋषिकेष मुखर्जी यानि कि राज कपूर के बाबू मोशाय की थीं। आनंद के बारे में क्या कहा जाए। बच्चे-बच्चे की जुबान पर "बाबू मोशाय" और "ज़िंदगी एक रंगमंच है और हम सब कठपुतलियाँ" आज भी वैसे हीं चस्पां है जैसे ३५ साल पहले था। कहते हैं कि भले हीं काका दूसरे निर्देशकों के सामने नखरे दिखाते हॊं लेकिन ऋषि दा के सामने उनकी एक न चलती थी। फिर भी अगर बीबीसी के संवाददाता जैक पिज़्ज़े की "बम्बे सुपरस्टार" नाम की डाक्यूमेंट्री देखें तो मालूम पड़ जाएगा कि नमकहराम की शूटिंग के दौरान काका के नखरे चरम पर थे। अमिताभ घंटों से इंतेज़ार कर रहे हैं, काका आते हैं, अपने संवाद देखते हैं, पढते हैं, निर्देशक को कुछ सुनाते हैं और निकल जाते हैं। वैसे भी अमिताभ और काका के बीच का यह फासला पुराने सूरज के डूबने के डर और नए के निकलने की तैयारी का था। तब के एक पत्रकार अली पीटर जॉन ने अपने संस्मरण में एक जगह लिखा भी था कि अमिताभ बच्चन के आगमन पर राजेश खन्ना की टिप्पणी थी कि ऐसे अटन-बटन आते-जाते रहते हैं। "बावर्ची" की शूटिंग के दौरान जया भादुड़ी और काका में इसी विषय पर बहस भी हो गई थी और जया भादुड़ी ने एक तरह से भविष्यवाणी कर दी थी कि "देखना एक दिन ये जो आदमी मेरे साथ खड़ा है वह कितना बड़ा स्टार होगा और वो जो अपने आप को खुदा समझता है वो कहीं का नहीं रहेगा।" काका की सबसे बड़ी खामी यही थी कि उन्होंने सफलता को सर पे चढा लिया। काश ऐसा न होता!!

 काका बड़े हीं मूडियल थे। अपनी ज़िंदगी के दो सबसे बड़े निर्णय उन्होंने इसी ताव मॆं लिए थे। डिम्पल कपाड़िया से शादी के पहले उनकी अंजु महेंद्रु नाम की गर्लफ्रेंड हुआ करती थी और वे दोनों साथ रहते थे। किसी कारण से काका और अंजु महेंद्रु की माँ के बीच अनबन हो गई और अंजु घर छोड़कर चली गईं। अपने आप को सही साबित करने के लिए काका ने आनन-फानन में अपने से १५ साल छोटी डिंपल से शादी कर ली,जिनकी बॉबी अभी-अभी सुपरहिट हुई थी। काका की लाखों चाहने वालियों में डिंपल भी एक थीं और उन्होंने भी काका के घर के बाहर इनकी एक झलक का घंटों इंतेज़ार किया था, इसलिए डिंपल शादी के लिए झट तैयार हो गईं। ये अलग बात है कि काका ने उन्हें सुपरस्टार का खिताब देने वालीं देवयानी चौबल को झूठी कहानी बताई थी कि इन्होंने डिंपल को समुद्र में डूबने से बचाया था और उसी दौरान डिंपल की सुंदरता पर मोहित हो गए। ऐसा हीं ताव काका ने तब दिखाया था जब वे जुबली कुमार राजेंद्र कुमार से उनका डिंपल नाम का घर खरीद रहे थे। काका के पास उतने पैसे नहीं तो उन्होंने यश चोपड़ा से कहा था कि वे इनसे चाहे जिस फिल्म में काम करवा लें लेकिन तत्काल घर खरीदने का पैसा दे दें। घर खरीद लेने पर वे घर का नाम डिंपल हीं रहने देना चाहते थे। लेकिन चूँकि राजेंद्र कुमार की बेटी का नाम डिंपल था तो उन्होंने काका के इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। काका ताव में तो जीत गए लेकिन इन्हें खून का घूंट पीकर अपने मकान का नाम "डिंपल" से "आशीर्वाद" करना पड़ा।

 १९७८-७९ के बाद काका को अपनी रोमांटिक हीरो की छवि छोड़कर दुसरे किरदार निभाने पड़े। इनमें से बहुत सारी फिल्में तो प्लॉप रहीं लेकिन आलोचकों ने इनके अभिनय को काफी सराहा। ऐसी हीं एक फिल्म थी "भारती राजा" की "रेड रोज़"। यह फिल्म भारती राजा की हीं १९७८ की तमिल फिल्म "सिगप्पु रोजक्कल" की रीमेक थी,जिसमें कमल हसन मुख्य अभिनेता थे। रेड रोज़ में काका का किरदार एक "साईकोपैथ" का था। माना जाता है कि काका का अभिनय कमल हसन से भी बेहतर था। ऐसी हीं लीक से हटकर एक फिल्म थी "खुदाई", जिसमें काका ने कमाल किया था। राजनीति में आने से पहले काका की अंतिम फिल्म डेविड धवन की स्वर्ग थी। आगे चलकर इन्होंने ऋषि कपूर की "आ अब लौट चलें" की,जिसमें ये उतने कामयाब न हो सके। काका की आखिरी फिल्म हाल में हीं सूर्खियों में रही मरहूम लैला खान के साथ "वफ़ा" थी। संयोग या यूँ कहें कि कुयोग देखिए कि वफ़ा के दोनों मुख्य कलाकार एक महिने के अंदर दिवंगत हो लिए। लैला खान को उसके पूरे परिवार के साथ किसी की गोलियों ने मौत के घाट उतार दिया तो काका को उनकी शराब की आदतों और लंबी बीमारी ने । काका आखिरी बार हैवल्स फैन के ऐड में पर्दे पर नज़र आए थे..... मेरे फैन्स मुझसे कोई नहीं छीन सकता। १८ जुलाई २०१२ को ऊपर वाले ने काका को हीं हम सबसे छीन लिया। "टाईम हो गया है, पैक अप" कहते हुए वे ज़िंदगी से मौत की और चल पड़े।

Monday, August 3, 2009

ये रेशमी जुल्फें ये शरबती ऑंखें...काका बाबू डूबे तारीफों में तो काम आई रफी साहब की आवाज़

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 160

मोहम्मद रफ़ी साहब के गीतों से सजी इस ख़ासम ख़ास शृंखला 'दस चेहरे एक आवाज़ - मोहम्मद रफ़ी' के अंतिम कड़ी मे हम आज आ पहुँचे हैं। दस चेहरों में से अब तक जिन नौ चेहरों पर फ़िल्माये रफ़ी साहब के गानें आप ने सुने हैं वो हैं शम्मी कपूर, दिलीप कुमार, सुनिल दत्त, राजेन्द्र कुमार, राजकुमार, शशी कपूर, धर्मेन्द्र, मनोज कुमार एवं देव आनंद। आज इस आख़िरी कड़ी के लिए हम ने चुना है हिंदी फ़िल्मों के पहले सुपर-स्टार राजेश खन्ना पर फ़िल्माये एक गीत को। देव आनंद की तरह राजेश खन्ना के ज़्यादातर गानें किशोर कुमार की आवाज़ में हैं, लेकिन फिर वही बात कि समय समय पर जब जब संगीतकारों को यह लगा कि कोई गीत रफ़ी साहब की गायकी में ढलकर ज़्यादा बेहतर सुनाई देगा, तब तब उन्होने रफ़ी साहब से ये गानें गवाये हैं और ज़रूरी बात यह कि ये गानें मशहूर भी ख़ूब हुए हैं। फ़िल्म 'दो रास्ते' में किशोर कुमार, मुकेश और मोहम्मद रफ़ी, सुनेहरे दौर के इन तीनों महा-गायकों ने गानें गाये हैं। इन तीनों गायकों के इस फ़िल्म के लिए गाये एकल गीतों की बात करें तो मुकेश की आवाज़ में फ़िल्म का शीर्षक गीत था "दो रंग दुनिया के और दो रास्ते", किशोर दा ने गाया था "ख़िज़ाँ के फूल पे आती कभी बहार नहीं", तथा रफ़ी साहब की आवाज़ में था "ये रेशमी ज़ुल्फ़ें ये शरबती आँखें"। इन तीनों गीतों का उत्कृष्टता के मापदंड पर क्रम निर्धारित करना संभव नहीं क्योंकि अपने अपने अंदाज़ में इन तीनों ने इन गीतों के साथ पूरा पूरा न्याय किया है। लेकिन सही मायने में तारीफ़ संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की करनी चाहिए जिन्होने इन तीन गीतों के लिये अलग अलग गायकों को चुना। राजेश खन्ना और रफ़ी साहब की जोड़ी को सलाम करते हुए आज सुनिए आनंद बख्शी का लिखा हुआ "ये रेशमी ज़ुल्फ़ें ये शरबती आँखें"।

सन् २००५ में विविध भारती ने रफ़ी साहब की पुण्यतिथि पर कई विशेष कार्यक्रमों का आयोजन किया था। और इसी के तहत संगीतकार प्यारेलाल जी को आमंत्रित किया गया था रफ़ी साहब को श्रद्धांजली अर्पित करते हुए फ़ौजी भाइयों की सेवा में 'विशेष जयमाला' कार्यक्रम प्रस्तुत करने के लिए। इस कार्यक्रम में प्यारेलाल जी ने रफ़ी साहब के गाये उनके कुछ पसंदीदा गानें तो सुनवाये ही थे, उनके साथ साथ रफ़ी साहब से जुड़ी कुछ बातें भी कही थी। और सब से ख़ास बात यह कि फ़िल्म 'दो रास्ते' का प्रस्तुत गीत भी उनकी पसंद के गीतों में शामिल था। प्यारेलाल जी ने कहा था - "आज आप से रफ़ी साहब के बारे में बातें करते हुए मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है। रफ़ी साहब का नेचर ऐसा था कि उन्होने सब को हेल्प किया, चाहे कोई भी जात का हो, या म्युज़िशियन हो, या कोई भी हो, सब को समान समझते थे। इससे मुझे याद आ रहा है फ़िल्म 'दोस्ती' का वह गाना "मेरा तो जो भी क़दम है वो तेरी राहों में है, के तू कहीं भी रहे तू मेरी निगाहों में है"। एक बात और बताऊँ आपको? जब राजेश खन्ना इंडस्ट्री में आये, तो उनके लिए कई आवाज़ों की बात चल रही थी। 'दो रास्ते' में गाना था "ये रेश्मी ज़ुल्फ़ें", हम ने कहा कि 'चाहे कुछ भी हो जाये, यह गाना रफ़ी साहब ही गायेंगे, इसे और कोई नहीं गा सकता।' सुनिए उन्होने क्या गाया है, नये लड़के इसे क्या गायेंगे! क्या शोख़पन है!" जी हाँ जी हाँ, ज़रूर सुनिए यह गीत, लेकिन उससे पहले मैं नीचे उन ११ गीतों की सूची पेश कर रहा हूँ जिन्हे उस कार्यक्रम में प्यारेलाल जी ने बजाया था रफ़ी साहब को श्रद्धांजली अर्पित करते हुए।

१. मेरा तो जो भी क़दम है वो तेरी राहों में है (दोस्ती)
२. पत्थर के सनम तुझे हमने (पत्थर के सनम)
३. मस्त बहारों का मैं आशिक़ (फ़र्ज़)
४. बड़ी मस्तानी है मेरी महबूबा (जीने की राह)
५. वो हैं ज़रा ख़फ़ा ख़फ़ा (शागिर्द)
६. ये रेशमी ज़ुल्फ़ें (दो रास्ते)
७. ये जो चिलमन है (महबूब की मेहंदी)
८. हुई शाम उनका ख़याल आ गया (मेरे हमदम मेरे दोस्त)
९. वो जब याद आये बहुत याद आये (पारसमणि)
१०. न तू ज़मीं के लिये (दास्तान)
११. दिल का सूना साज़ तराना ढ़ूंढेगा (एक नारी दो रूप)

चलते चलते हम भी रफ़ी साहब के लिए यही कहेंगे कि

"दिल का सूना साज़ तराना ढ़ूंढेगा,
तीर निगाहें यार निशाना ढ़ूंढेगा,
तुझ को तेरे बाद ज़माना ढ़ूंढेगा"

'दस चेहरे एक आवाज़ - मोहम्मद रफ़ी', रफ़ी साहब को समर्पित इस लघु शृंखला को समाप्त करते हुए हिंद-युग्म की तरफ़ से रफ़ी साहब की सुर साधना को हमारा स्मृति सुमन!



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. कल से आवाज़ पर सुनिए जिंदगी के अलग अलग रंग और उनमें डूबी किशोर दा की आवाज़ से सजे गीत.
2. कल के गीत का थीम है - हँसना -हँसाना.
3. ये एक पुराने गीत की पैरोडी है, यानी कि नक़ल कर किशोर दा आपको हंसाएंगे. मूल गीत को सीनियर बर्मन दा ने गाया है.

कौन सा है आपकी पसंद का गीत -
अगले रविवार सुबह की कॉफी के लिए लिख भेजिए (कम से कम ५० शब्दों में ) अपनी पसंद को कोई देशभक्ति गीत और उस ख़ास गीत से जुडी अपनी कोई याद का ब्यौरा. हम आपकी पसंद के गीत आपके संस्मरण के साथ प्रस्तुत करने की कोशिश करेंगें.


पिछली पहेली का परिणाम -

दिशा जी, बधाई आपको, ८ अंकों पर आ गए आप. मंजू जी आप बस थोडा सा पीछे रह गयी....थोड़ी और कोशिश कीजिये...वाह दिलीप जी आपने तो आँखों पे लिखे गीतों की पूरी फेहरिस्त ही दे दी...शरद जी और स्वप्न जी...कॉफी/टॉफी की बहस जारी रहे...:)

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Saturday, July 4, 2009

कहीं दूर जब जब दिन ढल जाए....ऐसे मधुर गीत होठों पे आये....

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 131

ल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में आप ने १९६१ में बनी फ़िल्म 'प्यासे पंछी' का गीत सुना था। आइये आज एक लम्बी छलांग लगा कर १० साल आगे को निकल आते हैं। यानी कि सन् १९७१ में। दोस्तों, यही वह साल था जिसमें बनी थी ऋषिकेश मुखर्जी की कालजयी फ़िल्म 'आनंद'। इस फ़िल्म ने लोगों के दिलों पर कुछ इस क़दर छाप छोड़ी है कि आज लगभग ४ दशक बाद भी जब यह फ़िल्म टी.वी. पर आती है तो लोग उसे बड़े प्यार और भावुकता से देखते हैं। 'आनंद' कहानी है आनंद सहगल (राजेश खन्ना) की, जो एक कैंसर का मरीज़ हैं, और यह जानते हुए भी कि वह यहाँ पर चंद रोज़ का ही मेहमान है, न केवल अपनी बची हुई ज़िंदगी को पूरे जोश और आनंद से जीता है बल्कि दूसरों को भी उतना ही आनंद प्रदान करता है। ठीक विपरीत स्वभाव के हैं भास्कर बैनर्जी (अमिताभ बच्चन), जो उनके डौक्टर हैं, जो देश की दुरवस्था को देख कर हमेशा नाराज़ रहते हैं। आनंद से रोज़ रोज़ की मुलाक़ातें और नोंक-झोंक डा. भास्कर को ज़िंदगी के दुख तक़लीफ़ों के पीछे छुपी हुई ख़ुशियों के रंगों से अवगत कराती है। अपनी चारों तरफ़ ढेर सारी ख़ुशियाँ बिखेर कर, अपने आस पास के कई ज़िंदगियों को आबाद कर, आनंद इस दुनिया को छोड़ जाता है, जो डा. भास्कर को उस पर एक क़िताब लिखने की प्रेरणा देता है। 'आनंद' की मूल कहानी को लिखा था ख़ुद ऋषिकेश मुखर्जी ने, और फ़िल्म के लिये विस्तृत लेखन का काम किया था बिमल दत्त, डी. एन. मुखर्जी, बीरेन त्रिपाठी और गुलज़ार ने। फ़िल्म का निर्माण एन. सी. सिप्पी और ऋषि दा ने मिलकर किया था। फ़िल्म के संगीतकार थे सलिल दा, यानी कि सलिल चौधरी। फ़िल्म की कहानी कुछ ऐसी थी कि इसमें ज़्यादा गीतों की गुंजाइश नहीं थी। ज़बरदस्ती अगर गानें डाले जाते तो वह फ़िल्म के हित में नहीं होते। इसलिए ऋषि दा ने फ़िल्म में केवल चार गानें रखे, और उल्लेखनीय बात यह है कि इन चारों गीतों ने अपार लोकप्रियता हासिल की। ये चारों गानें ऐसे हैं कि इन्हे लोकप्रियता या गुणवत्ता की दृष्टि से क्रम नहीं दिया जा सकता। तो जनाब, आज के लिए हमें इस फ़िल्म का एक गीत चुनना था, तो हम ने चुना, उम्मीद है आप भी शायद इसी गीत को सुनना चाह रहे होंगे।

"कहीं दूर जब दिन ढल जाये, चाँद सी दुल्हन बदन चुराये चुपके से आये"। मुकेश की आवाज़ में यह गीत लिखा था गीतकार योगेश ने। शुद्ध हिंदी में गीत लिखने में माहिर गीतकारों की बात करें तो जो परम्परा कवि प्रदीप, पं. नरेन्द्र शर्मा, जी. एस. नेपाली और भरत व्यास जैसे गीतकारों ने शुरु की थी, आगे चलकर योगेश ने भी वही राह अपनाई। वैसे 'आनंद' फ़िल्म के जो दो गीत उन्होने लिखे (दूसरा गीत था "ना जिया लागे ना"), उनमें शुद्ध हिंदी का क्यों प्रयोग हुआ, वह बात योगेश जी ने विविध भारती के एक पुराने कार्यक्रम में कहा था, उन्ही के शब्दों में पढ़िये - "सलिल दा के जो काम्पोसिशन्स होते थे, उनमें उर्दू के शब्दों की गुंजाइश नहीं होती थी। उनकी धुनें ऐसी होती थीं कि उर्दू के शब्द उसमें फ़िट नहीं हो सकते। पहले वहाँ शैलेन्द्र जी लिखते थे, जो सीधे सरल शब्दों में गहरी बात कह जाते थे। एक और बात, मैं तो सलिल दा से यह कह चुका हूँ कि अगर वे संगीत के बजाये लेखन की तरफ़ ध्यान देते तो रबींद्रनाथ ठाकुर के बाद उन्ही की कवितायें जगह जगह गूँजते।" दोस्तों, प्रस्तुत गीत भी किसी ख़ूबसूरत कविता से कम नहीं है। इसके बारे में और ज़्यादा कुछ कहने से बेहतर यही है कि इसे तुरंत सुना जाये!



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा पहला "गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. गिनी चुनी महिला संगीतकारों में से एक उषा खन्ना का स्वरबद्ध है ये गीत.
2. बहुत खूबसूरत लिखा है इसे जावेद अनवर ने.
3. एक अंतरे की पहली चार पंक्तियों में ये दो शब्द हैं - "तस्कीन" और "जिन्दगी".

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी 34 अंकों के लिए एक बार फिर बधाई. एकदम सही जवाब. स्वप्न जी बस जरा सा पीछे रह गयी. आज महिला संगीतकार की बात है आज देखते हैं कौन बाज़ी मारता है. मुकाबला बहुत दिलचस्प हो चुका है. दिशा जी, पराग जी, संगीता जी, और मनु जी आप सब को भी बधाईयाँ.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Friday, April 24, 2009

सफल "हुई" तेरी अराधना...शक्ति सामंत पर विशेष (भाग 3)

दोस्तों, शक्ति सामंत के फ़िल्मी सफ़र को तय करते हुए पिछली कड़ी में हम पहुँच गए थे सन् १९६५ में जिस साल आयी थी उनकी बेहद कामयाब फ़िल्म 'कश्मीर की कली'। आज हम उनके सुरीले सफ़र की यह दास्तान शुरु कर रहे हैं सन् १९६६ की फ़िल्म 'सावन की घटा' के एक गीत से। इस फ़िल्म का निर्माण और निर्देशन, दोनो ही शक्तिदा ने किया था और इस फ़िल्म में भी नय्यर साहब का ही संगीत था।

गीत: आज कोई प्यार से दिल की बातें कह गया (सावन की घटा)


"आज कोई प्यार से दिल की बातें कह गया, मैं तो आगे बढ़ गयी पीछे ज़माना रह गया"। एस. एच. बिहारी के लिखे इस गीत के बोल जैसे शक्तिदा को ही समर्पित थे। 'हावड़ा ब्रिज', 'चायना टाउन', और 'कश्मीर की कली' जैसी 'हिट' फ़िल्मों के बाद इसमें कोई शक़ नहीं रहा कि शक्तिदा फ़िल्म जगत में बहुत ऊपर पहुँच चुके थे। उनका नाम भी बड़े बड़े फ़िल्म निर्माता और निर्देशकों की सूची में शामिल हो गया। और साल दर साल उनकी प्रतिभा और सफलता साथ साथ परवान चढ़ती चली गयी। 'सावन की घटा' के अगले ही साल, यानी कि १९६७ में एक और मशहूर फ़िल्म आयी 'ऐन ईवनिंग इन पैरिस' जिसके गीत संगीत ने तो हंगामा मचा दिया। शम्मी कपूर, शंकर जयकिशन और मोहम्मद रफ़ी की तिकड़ी पहले से ही लोकप्रियता के चरम शिखर पर पहुँच चुकी थी। इस फ़िल्म ने उनकी मुकुट पर एक और चमकता हीरा जड़ दिया। शक्तिदा किसी विदेशी शहर को आधार बनाकर एक फ़िल्म बनाना चाहते थे। उनके अनुसार उस ज़माने में पैरिस को लेकर लोगों में बहुत ज़्यादा दिलचस्पी थी और यूरोप के सबसे ख़ास शहर के रूप में भारतीय इसे मानते थे। इसलिए इस फ़िल्म के लिए पैरिस को ही चुना गया। उन्होने यह भी कहा था कि इस फ़िल्म की कहानी में कोई ख़ास बात नहीं थी, फ़िल्म चली अपने किस्मत के बलबूते। फ़िल्म के गीतों के लिए पैरिस से ही नर्तकियों को लिया गया था। एक फ़्रेंच निर्माता ने जब यह फ़िल्म देखी तो उन्होने शक्तिदा से अनुरोध किया कि वो उन्हे इस फ़िल्म के कुछ दृश्य उनकी अपनी फ़िल्म में इस्तेमाल करने की अनुमती दे दें। 'ऐन ईवनिंग इन पैरिस' के शूटिंग से जुड़ा एक मज़ेदार क़िस्सा शक्तिदा ने फ़ौजी भाइयों के लिए प्रसारित विविध भारती के जयमाला कार्यक्रम में बताया था। हुआ यूँ कि वो लोग पैरिस में फ़िल्म की शूटिंग कर रहे थे। उन दिनो 'जंगली' और 'संगम' के गानें पूरी दुनिया में धूम मचा रहे थे। एक दिन शक्तिदा, जयकिशन और शम्मी कपूर एक 'रेस्तोराँ' में बैठे हुए थे कि अचानक कुछ लोगों ने उन्हे घेर लिया और तब तक नहीं छोड़ा जब तक कि जयकिशन और शम्मी कपूर ने उनको "आइ आइ या करूँ मैं क्या सुकू सुकू" गाना नहीं सुनाया। 'ऐन ईवनिंग इन पैरिस' के जिस गाने को वो उन दिनों फ़िल्मा रहे थे वह गाना था यह...

गीत: आसमान से आया फ़रिश्ता (ऐन ईवनिंग इन पैरिस)


साल १९६९। उस समय राजेश खन्ना राजेश खन्ना नहीं बने थे। उन्होने कुछ दो तीन फ़िल्मों में काम किया था, लेकिन वो फ़िल्में बहुत ज़्यादा मशहूर नहीं हो पायी थी। जब 'आराधना' की कहानी शक्तिदा के दिमाग़ में आयी, तो उन्हे लगा कि इस कहानी पर एक सफ़ल फ़िल्म तभी बनायी जा सकती है अगर नायक की भूमिका में कोई नया अभिनेता हो। उन्होने राजेश खन्ना का अभिनय देख रखा था और उन्हे उनका अभिनय काफ़ी पसंद भी आया था। जब उन्होने राजेश खन्ना से 'आराधना' में काम करने की बात की तो पहले पहले तो वो ज़्यादा ख़ुश नहीं हुए क्योंकि उनका किरदार 'इंटर्वल' से पहले ही मर जाता है और उनका डबल रोल काफ़ी देर बाद शुरु होता है। उन्हे लगा कि यह नायिका प्रधान फ़िल्म है जो उन्हे कामयाबी नहीं दिला सकती। लेकिन शक्तिदा ने उन्हे हर तरीके से समझाया, यहाँ तक कहा कि अगर फ़िल्म नाकामयाब भी होती है तो भी उन्हे उनके पूरे पैसे मिल जाएंगे। आख़िरकार राजेश खन्ना राज़ी हो गए और फ़िल्म का निर्माण शुरु हो गया। शक्तिदा ने बहुत ही कम बजट में यह फ़िल्म बना डाली और जब फ़िल्म प्रदर्शित हुई तो वो लखपति बन गए। 'आराधना' मुंबई के 'बांद्रा टाकीज़' में रिलीज़ हुई थी। मद्रास के एक सिनेमाघर में यह फ़िल्म लगातार दो साल तक चली। इस फ़िल्म ने राजेश खन्ना के रूप में फ़िल्म जगत को दिया उसका पहला 'सुपर स्टार'। शर्मिला टैगोर के स्टाइल को भी उस युग की युवतियों ने गले लगाया। और इसी फ़िल्म से शुरुआत हुई राजेश खन्ना, आनंद बख्शी, सचिन देव बर्मन और किशोर कुमार के टीम की।

गीत: मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू (आराधना)


'आराधना' की बातें इतनी ज़्यादा हैं दोस्तों कि केवल एक गीत सुनवाकर हम आगे नहीं बढ़ सकते, भले ही एक और अंक हमें बढ़ाने पड़ जाए। तो हुआ यूँ कि शुरुआत में यह तय हुआ था कि रफ़ी साहब बनेंगे राजेश खन्ना की आवाज़। लेकिन उन दिनो रफ़ी साहब एक लम्बी विदेश यात्रा पर गए हुए थे। इसलिए शक्तिदा ने किशोर कुमार का नाम सुझाया। उन दिनो किशोर देव आनंद के लिए गाया करते थे, इसलिए सचिनदा पूरी तरह से शंका-मुक्त नहीं थे कि किशोर गाने के लिए राज़ी हो जाएंगे। शक्तिदा ने किशोर को फ़ोन किया, जो उन दिनों उनके दोस्त बन चुके थे बड़े भाई अशोक कुमार के ज़रिए। किशोर ने जब गाने से इनकार कर दिया तो शक्तिदा ने कहा, "नखरे क्यूँ कर रहा है, हो सकता है कि यह तुम्हारे लिए कुछ अच्छा हो जाए"। आख़िर में किशोर राज़ी हो गए। शुरु शुरु में सचिनदा बतौर गीतकार शैलेन्द्र को लेना चाह रहे थे, लेकिन यहाँ भी शक्तिदा ने सुझाव दिया कि क्यूँ ना सचिनदा की जोड़ी उभरते गीतकार आनंद बख्शी के साथ बनाई जाए। और यहाँ भी उनका सुझाव रंग लाया। जब तक रफ़ी साहब अपनी विदेश यात्रा से लौटते, इस फ़िल्म के करीब करीब सभी गाने रिकार्ड हो चुके थे सिवाय दो गीतों के, जिन्हे फिर रफ़ी साहब ने गाया। इनमें से एक गीत का संगीत राहुल देव बर्मन ने तैयार किया था क्युंकि सचिनदा की तबीयत उन दिनों कुछ ठीक नहीं चल रही थी। तो क्यूँ ना यहाँ पर वही गीत सुन लिया जाए!

गीत: बाग़ों में बहार है (आराधना)


'आराधना' में किशोर कुमार का गाया "रूप तेरा मस्ताना, प्यार मेरा दीवाना" उस ज़माने के लिहाज़ से काफ़ी 'बोल्ड' गीत था। सचिनदा ने इस गीत के लिए पहले जो धुन बनाई थी, उसमें किशोर कुमार को कुछ कमी सी लग रही थी, यानी कि जिस नशीले अंदाज़ की ज़रूरत थी वह नहीं आ पा रही थी। तब किशोरदा ने ही इसकी धुन को थोड़ा सा 'मॊर्डन' बना दिया जो बर्मन दादा को भी पसंद आया। अब बारी थी इस गाने के फ़िल्मांकन की। शक्तिदा साधारणतः अपने फ़िल्मों के रिकार्ड किए हुए गाने रात के वक़्त सुना करते थे और उनके फ़िल्मांकन के बारे में योजनाएँ बनाया करते थे। इस गीत के लिए उनके दिमाग़ में एक ख्याल आया कि क्यूँ ना इस गीत को एक ही 'शौट' में फ़िल्माया जाए! उन्होने एक काग़ज़ का पन्ना लिया और उस पर तीन अक्षर लिखे - ए, बी, सी। 'ए' नायक के लिए, 'बी' नायिका के लिए, और 'सी' कैमरे के लिए। और इस तरह से वो अपने मन ही मन में गाने का पूरा फ़िल्मांकन क़ैद कर लिया। उन्होने एक गोलाकार 'ट्राली' का इंतज़ाम किया और फ़िल्मालय स्टुडियो में इस गीत को फ़िल्मा लिया गया। शुरु शुरु में कई लोगों ने उनके इस एक शौट वाले विचार का विरोध किया था। किसी ने यहाँ तक कहा भी था कि "इसका दिमाग़ ख़राब हो गया है जो इतना अच्छा गाना एक ही शौट में ले रहा है"। उस समय सभी के सवालों का शक्तिदा ने एक ही जवाब दिया था कि "जब रात को गाना सुन रहा था तो समझ ही नहीं आया कि कहाँ 'कट' करूँ"। और इस तरह से यह गीत हिंदी फ़िल्म जगत का पहला गाना बन गया जिसे केवल एक ही शौट में फ़िल्माया गया था। तो चलिए हम भी इस गीत की मादकता और नशीलेपन का आनंद उठाते हैं।

गीत: रूप तेरा मस्ताना प्यार मेरा दीवाना (आराधना)


'आराधना' की कामयाबी सिर्फ़ शक्ति सामंत की कामयाबी नहीं थी, बल्कि राजेश खन्ना, शर्मिला टैगोर, आनंद बख्शी, किशोर कुमार जैसे तमाम कलाकारों के लिए यह फ़िल्म यादगार साबित हुई। इस फ़िल्म की कामयाबी के झंडे को लहराते हुए शक्तिदा ने प्रवेश किया ७० के दशक में। १९७० में उनके निर्देशन में फ़िल्म आयी 'पगला कहीं का'। निर्माता थे अजीत चक्रवर्ती। शम्मी कपूर और आशा पारेख अभिनीत इस फ़िल्म में शंकर जयकिशन ने एक बार फिर से 'ऐन ईवनिंग इन पैरिस' की तरह अपने सुरीले संगीत के जलवे बिखेरे हसरत जयपुरी के लिखे और लता मंगेशकर, आशा भोसले, मोहम्मद रफ़ी और मन्ना डे के गाए गीतों के ज़रिए। इस फ़िल्म का एक गीत ऐसा था जो हमें कभी उसे भुलाने नहीं देता। आप समझ गए होंगे कि हमारा इशारा किस तरफ़ है, जी हाँ, लताजी और रफ़ी साहब का गाया 'डबल वर्ज़न' गीत "तुम मुझे युँ भुला ना पायोगे"।

गीत: तुम मुझे युं भुला ना पायोगे (पगला कहीं का)


"तुम मुझे युँ भुला ना पायोगे, जब कभी भी सुनोगे गीत मेरे संग संग तुम भी गुनगुनायोगे"। इसमें कोई शक़ नहीं कि शक्तिदा के फ़िल्मों के गीतों को आज भी लोग बड़े प्यार से गुनगुनाते हैं, याद करते हैं। रोज़ मर्रा की ज़िन्दगी में यही गानें तो हैं जो हमारे सुख दुख के साथी हैं। ना कभी हम इन गीतों को भुला सकते हैं और ना ही इन गानों और इनके फ़िल्मों से जुड़े कलाकारों को। और शायद यही वजह है कि आज हम 'आवाज़' के इस मंच पर शक्ति सामंत को याद कर रहे हैं, उन्हे श्रद्धांजली अर्पित कर रहे हैं। पहले हमने सोचा था कि इस श्रद्धांजली को हम चार भागों में पोस्ट करेंगे, लेकिन शक्तिदा के फ़िल्मों की सूची इतनी लम्बी है और इन फ़िल्मों के गाने इतने प्यारे हैं कि हम बड़ी मुशकिल में पड़ गए कि किस फ़िल्म को छोड़ें, और किस फ़िल्म का ज़िक्र करें। इसलिए हमने तय किया है कि हम इस श्रद्धांजली को तब तक जारी रखेंगे जब तक शक्तिदा के सभी फ़िल्मों का ज़िक्र हम इत्मीनान से कर नहीं लेते। चौथे भाग के साथ हम बहुत जल्द वापस आयेंगे, तब तक पढ़ते रहिए और सुनते रहिए 'आवाज़'।

प्रस्तुति: सुजॉय चटर्जी

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