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Sunday, March 7, 2010

छम छम नाचत आई बहार....एक ऐसा मधुर गीत जिसे सुनकर कोई भी झूम उठे

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 366/2010/66

"एक बार फिर बसंत जवान हो गया,
जग सारा वृंदावन धाम हो गया,
आम बौराई रहा, सरसों भी फूल रहा,
खेत खलिहान शृंगार हो गया,
पिया के हाथ दुल्हन शृंगार कर रही,
आज धूप धरती से प्यार कर रही,
बल, सुंदरता के आगे बेकार हो गया,
सृष्टि पे यौवन का वार हो गया,
रात भी बसंती, प्रभात भी बसंती,
बसंती पिया का दीदार हो गया,
सोचा था फिर कभी प्यार ना करूँगा, पर
'अंजाना' बसंत पे निसार हो गया,
एक बार फिर बसंत जवान हो गया।"

अंजाना प्रेम ने अपनी इस कविता में बसंत की सुंदरता को शृंगार रस के साथ मिलाकर का बड़ा ही ख़ूबसूरत नज़ारा प्रस्तुत किया है। दोस्तों, इन दिनों आप 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर सुन रहे हैं इस रंगीले मौसम को और भी ज़्यादा रंगीन बनानेवाले कुछ रंगीले गीत इस 'गीत रंगीले' शृंखला के अंतर्गत। आज प्रस्तुत है राग बहार पर आधारित लता मंगेशकर की आवाज़ में फ़िल्म 'छाया' का गीत "छम छम नाचत आई बहार"। राजेन्द्र कृष्ण के लिखे इस गीत की तर्ज़ बनाई है सलिल चौधरी ने। १९६१ की यह फ़िल्म ऋषिकेश मुखर्जी की फ़िल्म थी जिसमें मुख्य कलाकार थे सुनिल दत्त और आशा पारेख।

दोस्तों, उपर अभी हमने एक कविता से आपका परिचय करवाया, और तभी मुझे यह ख़याल आया कि आज का यह गीत भी किसी कविता से कम नहीं। इस गीत में बहार की इतनी सुंदरता के साथ वर्णन किया गया है, और हर दृष्टि से यह गीत इतना पर्फ़ेक्ट है कि इस गीत के बारे में कुछ भी कहने की आवश्यक्ता नहीं है। इसलिए हमने सोचा कि इस गीत के बोल ही यहाँ पर प्रस्तुत कर दिए जाएँ। गीत तो आप सुनेंगे ही, लेकिन इन बोलों का आप कविता के रूप में भी आनंद ले सकते हैं।

"छम छम नाचत आई बहार,
पात पात ने ली अंगड़ाई,
झूम रही है डार डार,
छम छम नाचत आई बहार।

महक रही फुलवारी,
निखरी क्यारी क्यारी,
फूल फूल पर जोबन आया,
कली कली ने किया सिंगार,
छम छम नाचत आई बहार।

मन मतवारा डोले,
जाने क्या क्या बोले,
नई नवेली आशा जागी,
झूमत मनवा बार बार,
छम छम नाचत आई बहार।



क्या आप जानते हैं...
कि सलिल चौधरी ने कई टीवी धारावाहिकों के लिए शीर्षक गीत/संगीत तय्यार किया था, जिनमें चर्चित हैं 'दर्पण', 'कुरुक्षेत्र', 'चरित्रहीन' और 'अलग'।

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. मुखड़े की पहली पंक्ति में शब्द है -"आज".गीत बताएं-३ अंक.
2. लता के साथ किस पुरुष गायक ने इस गीत में आवाज़ मिलायी है-२ अंक.
3. वी शांताराम निर्देशित इस फिल्म का नाम बताएं -२ अंक.
4. शुद्ध हिंदी में रचे इस गीत के गीतकार कौन हैं -२ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
शाबाश अवध जी, अब आप इंदु जी से मात्र १ अंक पीछे हैं, शरद जी एकदम सही जवाब, इंदु जी, चलिए आपकी चीटिंग माफ, और आपकी खुशमिजाजी को एक बार फिर सलाम. पदम सिंह जी ने भी खाता खोला है नए संस्करण में बधाई...
खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Tuesday, January 12, 2010

मेरे पिया गए रंगून, किया है वहां से टेलीफून...मोबाइल क्रांति के इस युग से काफी पीछे चलते हैं इस गीत के जरिये

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 312/2010/12

'स्वरांजली' की दूसरी कड़ी में आप सभी का स्वागत है। दोस्तों, 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की इस लघु शृंखला में इन दिनों हम याद कर रहे हैं फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर के उन कलाकारों को जिनका इस जनवरी के महीने में जन्मदिन या स्मृति दिवस होता है। गत ५ जनवरी को संगीतकार सी. रामचन्द्र जी की पुण्यतिथि थी। आज हमारी 'स्वरांजली' उन्ही के नाम! जैसा कि हमने पहली भी कई बार उल्लेख किया है कि सी. रामचन्द्र उन पाँच संगीतकारों में शुमार पाते हैं जिन्हे फ़िल्म संगीत के क्रांतिकारी संगीतकार होने का दर्जा दिया गया है। ४० के दशक में जब फ़िल्म संगीत मुख्यता शास्त्रीय संगीत, लोक संगीत और सुगम संगीत पर ही आधारित हुआ करती थी, ऐसे में सी. रामचन्द्र जी ने पाश्चात्य संगीत को कुछ इस क़दर हिंदी फ़िल्मी गीतों में इस्तेमाल किया कि वह एक ट्रेंडसेटर बन कर रह गया। यह ज़रूर है कि इससे पहले भी पाश्चात्य साज़ों का इस्तेमाल होता आया है, लेकिन गीतों को पूरा का पूरा एक वेस्टर्ण लुक सी. रामचन्द्र जी ने ही पहली बार दिया था। और देखिए, जहाँ एक तरफ़ उनके "शोला जो भड़के", "संडे के संडे", "ईना मीना डीका", "मिस्टर जॊन बाबा ख़ान" जैसे गीत हैं, वहीं दूसरी तरफ़ कोमल से कोमल शास्त्रीय अंदाज़ वाले गानें भी बेशुमार हैं जैसे कि "धीरे से आजा री अखियन में", "जाग दर्द-ए-इश्क़ जाग", "जा री जा री ओ कारी बदरिया", "तू छूपी है कहाँ मैं तरसता यहाँ" वगेरह। कहने का अर्थ यह कि उन्होने अपने आप को वर्सेटाइल बनाए रखा और किसी एक स्टाइल के साथ ही चिपके नहीं रहे। आज उन्हे श्रद्धांजली स्वरूप हमने जिस गीत को चुना है उसे सुनते ही आपके चेहरे पर मुस्कुराहट खिल जाएगी। यह है सन् १९४९ की फ़िल्म 'पतंगा' का 'ऒल टाइम फ़ेवरिट' "मेरे पिया गए रंगून, किया है वहाँ से टेलीफ़ून"।

१९४९ में एच. एस. रवैल पहली बार फ़िल्म निर्देशन के क्षेत्र में उतरे 'वर्मा फ़िल्म्स' के बैनर तले बनी इसी फ़िल्म, यानी कि 'पतंगा' के साथ। फ़िल्म 'शहनाई' की सफलता के बाद सी. रामचन्द्र और गीतकार राजेन्द्र कृष्ण की जोड़ी जम चुकी थी। इस फ़िल्म में भी इसी जोड़ी ने गीत-संगीत का पक्ष संभाला। 'पतंगा' के मुख्य कलाकार थे श्याम और निगार सुल्ताना। याकूब और गोप, जिन्हे भारत का लौरल और हार्डी कहा जाता था, इस फ़िल्म में शानदार कॊमेडी की। 'शहनाई' की तरह इस 'रोमांटिक कॊमेडी' फ़िल्म को भी सी. रामचन्द्र ने ख़ूब अंजाम दिया। ख़ास कर आज का प्रस्तुत गीत तो जैसे एक कल्ट सॊंग् बन कर रह गया। टेलीफ़ोन पर बने गीतों का ज़िक्र इस गीत के बिना अधुरी समझी जाएगी। बल्कि युं कहें कि टेलीफ़ोन पर बनने वाला यह सब से लोकप्रिय गीत रहा है आज तक। शम्शाद बेग़म और स्वयं चितलकर का गाया हुआ यह गीत एक नया कॊन्सेप्ट था फ़िल्म संगीत के लिए (सी.रामचन्द्र को हम पहले ही क्रांतिकारी करार दे चुके हैं)। भले इस गीत को सुन कर ऐसा लगता है कि नायक और नायिका एक दूसरे से टेलीफ़ोन पर बात करे हैं, लेकिन असल में यह गीत एक स्टेज शो का हिस्सा है। उन दिनों बर्मा में काफ़ी भारतीय जाया करते थे, शायद इसीलिए रंगून शहर का इस्तेमाल हुआ है। (द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नेताजी सुभाषचन्द्र बोस का रंगून से गहरा नाता था)। आज के दौर में शायद ही रंगून का ज़िक्र किसी फ़िल्म में आता होगा। फ़िल्म 'पतंगा' के दूसरे हल्के फुल्के हास्यप्रद गीतों में शामिल है शमशाद बेग़म का गाया "गोरे गोरे मुखड़े पे गेसू जो छा गए", "दुनिया को प्यारे फूल और सितारे, मुझको बलम का नाम", शमशाद और रफ़ी का गाया डुएट "बोलो जी दिल लोगे तो क्या क्या दोगे" और "पहले तो हो गई नमस्ते नमस्ते", शमशाद और चितलकर का गाया एक और गीत "ओ दिलवालों दिल का लगाना अच्छा है पर कभी कभी"। दोस्तों, यह वह साल था जिस साल लता मंगेशकर 'महल' और 'बरसात' जैसी फ़िल्मों में गीत गा कर चारों तरफ़ हलचल मचा दी थी। इस फ़िल्म में उन्होने भी कुछ गीत गाए। एक गाना था शमशाद बेग़म के साथ "प्यार के जहान की निराली सरकार है", और तीन दर्द भरे एकल गीत भी गाए, जिनमें जो सब से ज़्यादा हिट हुआ था वह था "दिल से भुला दो तुम हमें, हम ना तुम्हे भुलाएँगे"। दोस्तों, आज सी. रामचन्द्र जी को श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए हम भी यही कहते हैं कि आप ने जो संगीत हमारे लिए रख छोड़ा है, उसे हमने अभी तक कलेजे से लगाए रखा है, और आनेवाली तमाम पीढ़ियाँ भी इन्हे सहज कर रखेंगी ज़रूर! चलिए माहौल को अब थोड़ा सा हल्का करते हैं, और देहरादून से रंगून के बीच की इस बातचीत का मज़ा लेते हैं।



चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम रोज आपको देंगें ४ पंक्तियाँ और हर पंक्ति में कोई एक शब्द होगा जो होगा आपका सूत्र. यानी कुल चार शब्द आपको मिलेंगें जो अगले गीत के किसी एक अंतरे में इस्तेमाल हुए होंगें, जो शब्द बोल्ड दिख रहे हैं वो आपके सूत्र हैं बाकी शब्द बची हुई पंक्तियों में से चुनकर आपने पहेली सुलझानी है, और बूझना है वो अगला गीत. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

अंगडाई लेकर जागी सुबह,
फिर किलकारियां गूंजी आँगन में,
उसकी पायल की झंकार सुन,
नींद से जागा है मेरा संसार....

अतिरिक्त सूत्र - इस संगीतकार की पुण्यतिथि ६ जनवरी है

पिछली पहेली का परिणाम-
शरद जी लौटे हैं २ अंकों के लिए बधाई, अनुराग जी बिलकुल सही कहा आपने...इंदु जी आशा है अब तबियत बेहतर होगी आपकी

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Thursday, July 23, 2009

ये हवा ये रात ये चांदनी...सज्जाद हुसैन का संगीतबद्ध एक नायाब गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 150

'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल दिन-ब-दिन, कड़ी दर कड़ी आगे बढ़ती चली जा रही है दोस्तों। यह आप सब का प्यार और पुराने फ़िल्म संगीत में आप की दिलचस्पी ही है कि इस शृंखला की रोचकता में ज़रा सी भी कमी नहीं आयी है। आज इस शृंखला ने पूरे किए पूरे १५० दिन! आप सब का प्यार युंही बना रहे, तो हम आगे भी आप के पसंदीदा गीतों के इस महफ़िल को युंही रोशन करते रहेंगे। दरअसल यह महफ़िल रोशन है गुज़रे ज़माने के उन लाजवाब कलाकारों की अपार मेहनत और लगन की वजह से जिन्होने फ़िल्म संगीत के धरोहर को समृद्ध किया, उसमें बेशुमार मोतियाँ जड़ें। आज यह धरोहर एक विशाल अनमोल ख़ज़ाने का रूप ले चुकी है, और इसी ख़ज़ाने से चुन चुन कर हम मोतियाँ निकाल कर ला रहे हैं हर रोज़ आप के लिए। आज इस शृंखला की १५० वीं कड़ी के लिए हमने जो गीत चुना है वो फ़िल्म संगीत का एक सदाबहार नग़मा है। इसके संगीतकार ने अपने पूरे जीवन में केवल १४ फ़िल्मों में संगीत दिया है, लेकिन इन १४ फ़िल्मों में उन्होने कुछ ऐसा काम कर दिखाया है कि आज ५० साल बाद भी वो ज़िंदा हैं अपने रचे उन तमाम कालजयी संगीत की वजह से। हम बात कर रहे हैं संगीतकार सज्जाद हुसैन की, और आज आप को सुनवा रहे हैं उन्ही के संगीत निर्देशन में तलत महमूद का गाया १९५२ की फ़िल्म 'संगदिल' का गाना "ये हवा ये रात ये चांदनी, तेरी इक अदा पे निसार है, मुझे क्यों न हो तेरी आरज़ू तेरी जुस्तजू में बहार है"। फ़िल्म 'संगदिल' के इस गीत को सज्जाद साहब के सब से ज़्यादा लोकप्रिय गीतों में से माना जाता है। आज कोई फ़िल्म 'संगदिल' की बात करे, या फिर सज्जाद साहब की बात करें, एक ही बात है।

दिलीप कुमार और मधुबाला अभिनीत फ़िल्म 'संगदिल' एक अद्‍भुत प्रेम कहानी थी, जिसका निर्माण और निर्देशन आर. सी. तलवार ने किया था। आज के इस प्रस्तुत गीत को याद करते हुए सज्जाद साहब के दोस्त और हास्य अभिनेता जगदीप ने अमीन सायानी को दिये एक साक्षात्कार में कहा था - "सज्जाद साहब का यह मानना था कि ये अंग्रेज़ी साज़ जो है ना, बहुत ज़्यादा ज़रूरी नहीं है, उनको अपने साज़ों पर बड़ा ऐतबार था, हिंदुस्तानी साज़ों पर, मैंडोलीन को उन्होने वीणा बना दिया था। तो उन्होने 'संगदिल' फ़िल्म में, कहा, "बेटा मैने क्या किया, दो सारंगियाँ ली और दो 'माइक्स' रखे, और दोनों को उनके सामने बजा दिया, ऐसी धमक पैदा हुई जो हज़ारों वायलीन में भी नहीं पैदा हो सकती"।" दोस्तों, यह गीत तलत साहब का भी पसंदीदा नग़मा है। इस गीत को गाये बग़ैर वो अपना कोई भी शो ख़तम नहीं कर सकते थे। सज्जाद साहब के बारे में यह बात मशहूर थी कि वो किसी गीत की रिकॉर्डिंग में तब तक री-टेक करते रहते थे जब तक कि हर एक साज़िंदा या गायक पूरे 'पर्फ़ेक्शन' से साथ बजा या गा न लें। 'संगदिल' फ़िल्म के प्रस्तुत गीत के लिए कुल १७ री-टेक हुए थे। इस गीत के साथ सज्जाद साहब की बातें कुछ इस क़दर जुड़ी हुई हैं कि हम अक्सर इसके गीतकार को याद करना भूल जाते हैं। गीतकार राजेन्द्र कृष्ण ने इस गीत को लिखा था और क्या ख़ूब लिखा था साहब! इसमें कोई दोराय नहीं होनी चाहिये कि सज्जाद और तलत साहब के साथ साथ राजेन्द्र जी का भी इस गीत की कामयाबी में पूरा पूरा हक़ बनता है। तो सुनिये यह गीत और एक बार फिर से 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की १५०-वीं कड़ी के मौके पर इस शृंखला से जुड़े सभी श्रोताओं और पाठकों को हमारी तरफ़ से हार्दिक धन्यवाद!



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा दूसरा (पहले गेस्ट होस्ट हमें मिल चुके हैं शरद तैलंग जी के रूप में)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. ओल्ड इस गोल्ड के १५१ वें एपिसोड से शुरू हो रही है रफी साहब पर विशेष शृंखला जो आधारित होगी अलग अलग अदाकारों के लिए किये उनके पार्श्वगायन पर.
2. इस कड़ी में हमारे पहले अदाकार होंगे - "शम्मी कपूर".
3. इस गीत के पहले चार शब्दों से प्रेरित होकर एक नयी फिल्म का नाम रखा गया था, जिसमें आमिर और माधुरी दिक्षित ने काम किया था.

इससे पहले कि हम कल के परिणाम बताएं एक ज़रूरी सूचना देना चाहेंगे, इस पहेली के जवाब वाला गीत कल के स्थान पर परसों यानी २५ तारिख को पेश होगा. कल के लिए हमें कुछ विशेष योजना बनायीं है, सुजोय जी हमें १५० शामों से लगातार गीत सुनवा रहे हैं, तो खुश होकर हमारे कुछ श्रोताओं ने सोचा कि १५० एपिसोड पूरे होने की ख़ुशी में कल सुजोय जी को कुछ ख़ास सुनाया जाए. अब ये कौन से श्रोता हैं और वो क्या सुनाएगें ये तो हम कल ही बतायेंगें. सुजोय जी को दी जा रही इस "सरप्राईस" पार्टी में आप सब भी सादर आमंत्रित हैं.

पिछली पहेली का परिणाम -
स्वप्न जी ४० का आंकडा छू लिया है आपने, निर्विरोध एकदम, बधाई...दिलीप जी, शरद जी, मनु जी, पराग जी, राज जी, दिशा जी, सुमित जी और अन्य सभी श्रोताओं से अनुरोध है कि आप सब कल की ख़ास महफिल में जरूर आयें.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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