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Monday, January 10, 2011

तुम मेरी जिंदगी में तूफ़ान बन कर आये.....कहीं लता जी का इशारा चितलकर पर तो नहीं था ?

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 567/2010/267

'ओल्ड इज़ गोल्ड' में आप सभी का एक बार फिर बहुत बहुत स्वागत है। सी. रामचन्द्र के स्वरबद्ध और गाये गीतों की शृंखला 'कितना हसीं है मौसम' इन दिनों आप सुन और पढ़ रहे हैं। कल हमने आपसे वादा किया था कि आज की कड़ी में हम आपको सी. रामचन्द्र और लता मंगेशकर के बीच के अनबन के बारे में बताएँगे। दोस्तों, राजु भारतन लिखित लता जी की जीवनी को पढ़ने पर पता चला कि इस किताब के लिखने के दौरान भारतन साहब सी. रामचन्द्र से मिले थे और सी. रामचन्द्र ने कहा था, "she wanted to marry me, but i was already married.... all i wanted was some fun, but that was not to be.." इसी किताब में "ऐ मेरे वतन के लोगों" के किस्से के बारे में भी लिखा गया है कि शुरु शुरु में यह एक डुएट गीत के रूप में लिखा गया था जिसे लता और आशा, दोनों को मिलकर गाना था। लेकिन जिस दिन मंगेशकर बहनों को दिल्ली जाना था उस फ़ंक्शन के लिए, आशा जी ने सी. रामचन्द्र को फ़ोन कर यह कह दिया कि दीदी अकेली जा रही हैं और वो इससे ज़्यादा और कुछ नहीं कहना चाहतीं। इसी गीत को प्रस्तुत करते हुए दिलीप कुमार ने गायिका और गीतकार के नामों की तो घोषणा कर दी लेकिन संगीतकार का नाम बताना भूल गए। इस बात से सी. रामचन्द्र आगबबूला होकर जब बैकस्टेज पर दिलीप साहब को टोका तो दिलीप साहब ने बस इतना ही कहा कि "अन्ना, मुझे नहीं मालूम था कि आपने इस गीत की धुन बनाई है"। राजु भारतन के किताब के अलावा सी. रामचन्द्र की मराठी में लिखी आत्मकथा 'माझ्या जीवांची सरगम' में उन्होंने बड़ी कुशलता के साथ उस "गायिका" का नाम हटा दिया है लेकिन उस आत्मकथा को पढ़ने वाला हर इंसान समझ सकता है कि इशारा किसकी तरफ़ है। उस आत्मकथा में जिस "सीता" का उन्होंने उल्लेख किया है, वो लता जी के सिवा और कोई नहीं है, यह बात भी हर कोई समझ सकता है। यह तो थी एक तरफ़ की कहानी। उधर लता जी के चाहनेवालों का यह मानना है कि सी. रामचन्द्र ने ही लता को एक बार प्रेम निवेदन किया था जिसे लता ने ठुकरा दिया था। इस अशालीन प्रस्ताव से गुस्से में आकर लता जी ने उनके साथ वही सलूक करना ठीक समझा जो उन्होंने नय्यर साहब और अपनी बहन आशा के साथ किया था। लता जी कभी शादी नहीं करना चाहती थी और ख़ास उस समय तो बिल्कुल नहीं जब उनके कंधों पर उनके पूरे परिवार की ज़िम्मेदारी थी। दोस्तों, ये सब बातें जो अभी मैंने कहे, वो सब सुनी और पढ़ी हुई बातें हैं। असलियत क्या है यह किसी को भी नहीं मालूम। और हमें भी क्या लेना देना इन महान कलाकारों के व्यक्तिगत जीवन से। हमें तो इसी बात से ख़ुश रहना चाहिए कि क्या क्या नायाब गीत इन दोनों ने हमें दिए हैं।

दोस्तों, आज के अंक के लिए हमने जिस लता-चितलकर डुएट को चुना है, वह है फ़िल्म 'शगुफ़ा' का। १९५३ में एच. एस. रवैल ने दो ऐसी फ़िल्में निर्देशित की जिनमें संगीत सी. रामचन्द्र का था। इनमें से एक थी 'लहरें' जिसमें किशोर कुमार और श्यामा मुख्य कलाकार थे, और दूसरी फ़िल्म थी 'शगुफ़ा'। यह अभिनेता प्रेम नाथ की ही फ़िल्म थी उन्ही के बैनर पी. एन. फ़िल्म्स तले। प्रेम नाथ और बीना रॊय अभिनीत इस फ़िल्म में राजेन्द्र कृष्ण और सी. रामचन्द्र का फिर एक बार साथ हुआ और फिर एक बार जन्म लिए एक से एक सुमधुर गीत। इस फ़िल्म के अधिकतर गीत लता जी के गाये हुए थे जैसे कि "छीन सके तो छीन ले ख़ुशियाँ मेरे नसीब की, लायेगी रंग एक दिन आह किसी ग़रीब की", लोक शैली में रची "छोटा सा देखो मेरा नादान बालमा", हल्के फुल्के अंदाज़ में बना "ये कैसी ख़ुशी है ये कैसा नशा है, मुझे क्या हुआ है", जुदाई के दर्द में डूबी "घिर घिर आयी कारी बदरिया", और मिलन के रंग में रंगी "ये हवा ये समा चांदनी है जवाँ"। गीता दत्त और साथियों नें गाया "मेरी बहकी बहकी चाल" जिसका भी एक अलग ही मज़ा है। गीता दत्त ने सुंदर के साथ मिलकर एक हास्य क़व्वाली "कैसे खेल मोहब्बत में खेलें सितमगर तेरे लिए" ने एक बार फिर राजेन्द्र कृष्ण को हास्य गीतों के बादशाह के रूप में प्रमाणित किया। और इस फ़िल्म का जो ख़ास गीत रहा वह था लता और चितलकर का गाया आज का प्रस्तुत युगल गीत "तुम मेरी ज़िंदगी में तूफ़ान बनके आये"। ऐसा लगता है जैसे इस गीत के बोल भी लता और चितलकर के तरफ़ ही इशारा कर रहे हों। तो लीजिए पेश-ए-ख़िदमत है फ़िल्म 'शगुफ़ा' का यह गीत।



क्या आप जानते हैं...
कि सी. रामचद्र ने 'Academy of Indian Music' नामक संस्था भी चलाई, जहाँ प्रमिला दातार और कविता कृष्णमूर्ति उनकी शिष्याएँ रहीं।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 08/शृंखला 07
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र -चितलकर और साथियों का गाया एक जोश भरा गीत है ये.

सवाल १ - गीतकार बताएं - १ अंक
सवाल २ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक
सवाल ३ - फिल्म के निर्देशक कौन थे - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
बहुत खुशी हो रही है देखकर कि नए प्रतिभागियों कमान संभाल रखी है....अमित जी दीपा जी और हिन्दुस्तानी जी को बहुत बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Tuesday, November 2, 2010

झुकती है दुनिया झुकाने वाला चाहिए....मगर लता जी से भी तो चूक हो गयी यहाँ

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 518/2010/218

'गीत गड़बड़ी वाले' - 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की इस अनोखी शृंखला की आठवीं कड़ी में आप सभी का एक बार फिर स्वागत है। जैसा कि कल हमने आपको बताया था, आज भी हम एक ऐसा गीत सुनेंगे जिसमें गायक ने उर्दू उच्चारण में गड़बड़ी की है। कल आशा जी की बारी थी, आज कठघड़े में हैं उनकी बड़ी बहन लता जी। एक फ़िल्म आयी थी साल १९५१ में - 'सगाई'। इसमें एक बड़ा ही चंचल गीत था "झुकती है दुनिया झुकाने वाला चाहिए"। उस ज़माने में सी. रामचन्द्र के इस अंदाज़ के गानें ख़ूब चले थे। हास्य रस पर आधारित इस गीत को गाया था लता मंगेशकर, मोहम्मद रफ़ी, चितलकर और साथियों ने। गीत के एक अंतरे की पंक्तियाँ हैं "श्रीमती हो या बेगम, एक जान और सौ सौ ग़म, औरत को कमज़ोर ना समझो मर्दों से किस बात पे कम"। इस पंक्ति में लता जी ने "बेगम" शब्द में "ग" को उर्दू गाफ की जगह ग़ैन का उपयोग कर "बेगम" को "बेग़म" गाया है। कुछ इसी तरह की ग़लती लता जी ने बरसों बरस बाद १९९५ की सुपर डुपर हिट फ़िल्म 'दिल तो पागल है' के एक गीत में भी किया है। लेकिन उसमें उन्होंने "ख़" को "ख" गाया है। "चाँद ने कुछ कहा, रात ने कुछ सुना, तू भी सुन बेख़बर प्यार कर"।

'सगाई' वर्मा फ़िल्म्स की प्रस्तुति थी जिसे निर्देशित किया था एच. एस. रवैल ने। प्रेम नाथ, रेहाना, याकूब, गोप, विजयलक्ष्मी अभिनीत इस फ़िल्म के गानें लिखे थे राजेन्द्र कृष्ण ने। आज के प्रस्तुत गीत के अलावा इस फ़िल्म में एक और हास्य गीत था लता जी की एकल आवाज़ में, जिसके बोल थे "डैडी जी मेरी मम्मी को सताना नहीं अच्छा"। इसके अलावा लता और तलत के गाये "मोहब्बत में ऐसे ज़माने भी आए, कभी रो दिए हम कभी मुस्कुराये" के क्या कहने! और लता की गाई "दिल की कहानी कहना तो चाहे हाये री क़िस्मत कह ना सके" भी ख़ूब मशहूर हुई थी उस ज़माने में। इसी साल लता - सी. रामचन्द्र - राजेन्द्र कृष्ण की टीम ने फ़िल्म 'ख़ज़ाना' में एक गाना दिया था, "ऐ चाँद प्यार मेरा मुझसे कह रहा है, युं बेवफ़ा ना होना दुनिया तो बेवफ़ा है", जो लेखन, संगीत और गायकी के लिहाज़ से बेहद उत्कृष्ट गीत है, लेकिन अफ़सोस कि आज ऐसे गीतों को भुला दिया जा चुका है। 'सगाई' में रफ़ी, चितलकर और शम्शाद बेगम का गाया हुआ भी एक दुर्लभ गीत है "एक दिन लाहौर की ठंडी सड़क... तबीयत साफ़ हो गई साफ़", यह गीत भी निस्संदेह हास्य व्यंग का गीत है। तो आइए इसी हास्य व्यंग के मूड को बरकरार रखते हुए सुनते हैं लता-रफ़ी-चितलकर की त्रिवेणी संगम से उत्पन्न फ़िल्म 'सगाई' का यह समूह गीत।



क्या आप जानते हैं...
कि सी. रामचन्द्र को १९३९ की तमिल फ़िल्म 'जयकोडी' में संगीत देने का मौका मिला था। पर फ़िल्म की नायिका से वो इश्क़ कर बैठे। और क्योंकि फ़िल्म के निर्माता भी उसी नायिका पर आशिक़ थे, इसलिए बात बिगड़ गई और सी. रामचन्द्र के हाथ से फ़िल्म निकल गई।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली ०९ /शृंखला ०२
बहुत आसान है इस प्रिल्यूड को सुनिए -


अतिरिक्त सूत्र - इस युगल गीत में पुरुष आवाज़ है किशोर दा की.

सवाल १ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक
सवाल २ - गीतकार बताएं - २ अंक
सवाल ३ - संगीतकार बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अमित जी आपने पूरे प्रश्न का जवाब सही नहीं दिया, इसलिए हमें अंक शरद जी को देने पड़ेंगें. प्रतिभा जी और किशोर जी अरसे बाद लौटे कल, स्वागत और मनु जी ने आकर तो नुक्ते पर पूरी नुक्ताचीनी ही कर दी. अवध जी सुनना पड़ेगा फिर आपके वाला गीत भी

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Monday, October 11, 2010

जो उनकी तमन्ना है बर्बाद हो जा....राजेन्द्र कृष्ण और एल पी के साथ मिले रफ़ी साहब और बना एक बेमिसाल गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 502/2010/202

'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कल से हमने शुरु की है संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के धुनों से सजी लघु शृंखला 'एक प्यार का नग़मा है'। कल हमने गीतकार आनंद बख्शी की रचना सुनी थी लता मंगेशकर की आवाज़ में। और बख्शी साहब और लता जी, दोनों ने ही लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के साथ अपना सब से ज़्यादा काम किया है। आज हम जिस गीत को लेकर उपस्थित हुए हैं, उसे लिखा है राजेन्द्र कृष्ण साहब ने। रफ़ी साहब की आवाज़ में फ़िल्म 'इंतक़ाम' का यह गीत है "जो उनकी तमन्ना है बरबाद हो जा, तो ऐ दिल मोहब्बत की क़िस्मत बना दे, तड़प और तड़प कर अभी जान दे दे, युं मरते हैं मर जानेवाले, दिखा दे जो उनकी तमन्ना है बरबाद हो जा"। इसमें कोई शक़ नहीं कि लक्ष्मी-प्यारे के इस गीत को रफ़ी साहब ने जिस अंदाज़ में गाया है, उससे गीत का भाव बहुत ख़ूबसूरत तरीक़े से उभरकर सामने आया है, लेकिन इस गीत को समझना थोड़ा मुश्किल सा लगता है। गीत के शब्दों को सुनते हुए दिमाग़ पर काफ़ी ज़ोर लगाना पड़ता है इसमें छुपे भावों को समझने के लिए। लेकिन इससे इस गीत की लोकप्रियता पर ज़रा सी भी आँच नहीं आई है और आज भी बहुत से लोगों का यह फ़ेवरीट रफ़ी नंबर है। यहाँ तक कि सुरों की मल्लिका लता मंगेशकर का भी। जी हाँ, अभी हाल ही में रफ़ी साहब की पुण्य तिथि पर जब किसी ने लता जी को ट्विटर पर उनके फ़ेवरीट रफ़ी नंबर के बारे में जानना चाहा, तो उन्होंने इसी गीत का ज़िक्र किया था। ख़ैर, हम बात कर रहे थे इस गीत के बोलों का मतलब ना समझ पाने की। तो साहब, अगर बोलों को समझे बग़ैर भी गीत लोकप्रिय हो जाता है तो इसका श्रेय गीतकार को ही जाना चाहिए। राजेन्द्र कृष्ण एक अण्डर-रेटेड गीतकार रहे हैं। आज भी जब किसी भी कार्यक्रम में गुज़रे ज़माने के गीतकारों के नाम लिए जाते हैं, तब इनका नाम मुश्किल से कोई लेता है, जब कि इन्होंने न जाने कितने सुपर डुपर हिट गीत ५० से ७० के दशकों में लिखे हैं।

"जो उनकी तमन्ना है बरबाद हो जा" फ़िल्म के नायक संजय ख़ान पर फ़िल्माया गया गीत है, जो एक 'बार' में शराब के नशे में गा रहे होते हैं। १९६९ में प्रदर्शित 'इंतक़ाम' फ़िल्म का निर्माण शक्तिमान एण्टरप्राइज़ेस के बैनर तले हुई थी और इसका निर्देशन किया था आर. के. नय्यर ने। फ़िल्म के नायक का नाम तो हम बता ही चुके हैं, दूसरे मुख्य किरदारों में थे साधना, अशोक कुमार, और हेलेन। इस फ़िल्म के सभी गानें मक़बूल हुए थे, मसलन "हम तुम्हारे लिए तुम हमारे लिए", "आ जानेजाँ", "गीत तेरे साज़ का तेरी ही आवाज़ हूँ", "कैसे रहूँ चुप के मैंने पी ही क्या है होश अभी तक है बाक़ी" आदि। और आइए अब रुख़ किया जाए प्यारेलाल जी के उसी इंटरव्यू की तरफ़ जिसका एक अंश हमने कल पेश किया था। आज जिस अंश को हम पेश कर रहे हैं उसमें है रफ़ी साहब का ज़िक्र।

कमल शर्मा: रफ़ी साहब से म्युज़िक के अलावा, कभी जैसे किसी गाने की रेकॊर्डिंग् होनेवाली है, कभी जैसे थोड़ी सी फ़ुरसत मिली, बात वात होती थी कि नहीं?

प्यारेलाल: उनको ख़ुश करना हो तो हम दोनों क्या करते थे, कभी कभी आए तो चुप बैठे हैं, तो हमें उनको ख़ुश करना हो तो क्या है कि रफ़ी साहब चाय लेके आते थे, तो उनके लिए चाय जो बनती थी वह किसी को नही देते थे, वो ख़ुद पीते थे। वो थर्मस में आती थी, दो थर्मस। लेकिन वो कैसी चाय बनती थी मैं बताऊँ आपको, दूध को, दो सेर दूध के एक सेर बनाते थे जिसमें बदाम और पिस्ता डालते थे, और उसके बाद में चाय की पत्ती, कोई ख़ास पत्ती थी, वो उनकी बीवी बनाती थीं, और वो चाय लेकर आते थे। और अगर आप थोड़ी देर भी रखेंगे तो मलाई इतनी जम जाती थी। तो हम लोग क्या करते थे कि अगर ख़ुश करना है रफ़ी साहब को तो ख़ुश करने के लिए हम उनको बोलते थे 'थोड़ी चाय मिल जाएगी?' तो ऐसा करते थे कि जैसे कोई छोटा बच्चा है, तो अगर मस्ती कर रहा है कुछ, अरे भाई उसको चॊकलेट दे ना चॊकलेट, तो बोलने का एक स्टाइल होता है ना, तो उनका ज़हीर था उनका साला, 'अरे ज़हीर, चाय देना इनको चाय'। मतलब ये बच्चे लोग हैं ना चाय पिलाओ। बोलने का एक ढंग होता था और चाय पीने के बाद बोलना होता था 'वाह मज़ा आ गया', बस!

दोस्तों, हमने रफ़ी साहब के ख़ास चाय के बारे में जाना, लेकिन आज के गीत का जो आधार है, वह चाय नहीं बल्कि शराब है। रफ़ी साहब कभी शराब को हाथ नहीं लगाते थे, लेकिन जब भी किसी नशे में चूर किरदार के लिए कोई गीत गाते थे तो ऐसा लगता था कि जैसे वो ख़ुद भी शराब पीकर गा रहे हैं। यही तो बात है रफ़ी साहब जैसे महान गायक की। किसी भी मूड के गीत में कैसा रंग भरना है बहुत अच्छी तरह जानते और समझते थे रफ़ी साहब। तभी तो लक्ष्मी-प्यारे ने जब भी कोई ऐसा गीत बनाया जो उन्हें लगा कि सिर्फ़ रफ़ी साहब ही गा सकते हैं, उन्होंने कभी किसी दूसरे गायक से नहीं गवाया, कई बार तो निर्माता निर्देशक से भी बहस करने से नहीं चूके, और अगर रफ़ी साहब विदेश यात्रा पर रहते तो उनके आने का इंतज़ार करते थे कई दिनों तक, लेकिन किसी और से गवाना उन्हें मंज़ूर नहीं होता था। एल.पी की कई ऐसी फ़िल्में हैं जिनमें और बाक़ी गीत दूसरे गायकों ने गाये, लेकिन कोई ख़ास गीत सिर्फ़ और सिर्फ़ रफ़ी साहब से ही गवाया गया। पेश-ए-खिदमत है "जो उनकी तमन्ना है बरबाद हो जा"।



क्या आप जानते हैं...
कि फ़िल्म 'इंतक़ाम' का लता का गाया "कैसे रहूँ चुप कि मैंने पी ही क्या है" इतना लोकप्रिय हुआ था कि अमीन सायानी द्वारा प्रस्तुत बिनाका गीतमाला का चोटी का गीत बना था। यही नहीं, लगातार चार वर्षों तक लक्ष्मी-प्यारे के गीत बिनाका गीतमाला के चोटी के पायदान पर विराजे जो अपने आप में एक रेकॊर्ड रहा है।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली ०२ /शृंखला ०१
ये धुन उस गीत के प्रीलियूड की है, सुनिए -


अतिरिक्त सूत्र -पहले राम और सीता के किरदारों पर लिखा गया था यह युगल गीत, लेकिन वह फ़िल्म नहीं बनी। बाद में एक अन्य फ़िल्म में इसे शामिल किया गया।

सवाल १ - गीतकार बताएं - २ अंक
सवाल २ - लता हैं गायिका, गायक बताएं - १ अंक
सवाल ३ - इस धार्मिक फिल्म के नायक बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
दोस्तों, जब भी कोई नया बदलाव होता है, तो कुछ अजीब अवश्य लगता है, पर बदलाव तो नियम है, और केवल बदलाव ही शाश्वत है, हम समझते हैं कि आप में से बहुत से लोग अपने कम्पूटर पर सुन नहीं पाते हैं और अधिकतर हिंदी ब्लॉगर पढकर ही संतुष्ट हो जाते हैं, पर आवाज़ जैसा मंच तो सुनने सुनाने का ही है, तो यही समझिए कि पहेली की रूप रेखा में ये बदलाव सुनने की प्रथा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से भी है, तो इंदु जी जल्दी से अपने स्पीकर को ठीक करवा लें, आप पढ़ने के साथ साथ श्रवण और दृश्य माध्यमों से भी जुड़ें, यही हमारे इस मंच की सफलता मानी जायेगी....खैर, हमें जवाब मिले हैं, सही जवाब....तो पहेली के ढांचा ठीक ही प्रतीत हो रहा है, अनाम जी ने लिखा है कि ऐसी कॉम्पटीशन से कोई फायदा नहीं जिसमे हर कोई PARTICIPATE ना कर सके. पर पार्टिसिपेट सभी कर सकते हैं, हाँ अगर आपकी समस्या इंदु जी जैसी कुछ है तो इसका समाधान तो फिलहाल आपको ही निकालना पड़ेगा...आपने दूसरी बात लिखी कि
और अगर कोई हर पहेली में अगर ४ अंक वाला आंसर भी दे तो १००वे एपिसोड तक ४०० ही अंक हुए, तो हम माफ़ी चाहेंगें कि ये लिखने में हुई भूल थी, जिससे आप शंकित हो गए, दरअसल पहेली अब ५०१ वें से १००० वें एपिसोड तक खुली है और इसमें जितनी मर्जी बार चाहें आप ५०० का आंकड़ा छू सकते हैं. भूल सुधार ली गयी है. और कोई श्रोता यदि इस विषय में अपनी राय देना चाहें तो जरूर दें. अब बात परिणाम की - शरद जी खाता खोला २ अंकों के साथ. श्याम कान्त जी और पी सिंह जी आप दोनों को भी १-१ अंकों की बधाई. मनु जी आप तनिक लेट हो गए जवाब देते देते, वैसे अंदाजा एकदम सही था. शंकर लाल जी (अल्ताफ रज़ा ?), बिट्टो जी, अमित जी और अंशुमान जी, better luck next time :)

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Sunday, July 25, 2010

ये रास्ते हैं प्यार के.....जहाँ कभी कभी "प्रेरणा" भी काम आती है

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 446/2010/146

'ओल्ड इज़ गोल्ड' स्तंभ के सभी संगीत रसिकों का एक बार फिर से स्वागत है इस सुरीली महफ़िल में जो रोशन है फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर के सुनहरे सदाबहार नग़मों से। इन दिनों 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर जारी है लघु शृंखला 'गीत अपना धुन पराई', जिसके अंतर्गत हम कुछ ऐसे हिट गीत सुनवा रहे हैं जिनकी धुन किसी ना किसी विदेशी धुन से प्रेरित है। ये दस गीत दस अलग अलग संगीतकारों के संगीतबद्ध किए हुए हैं। पिछले हफ़्ते इस शृंखला के पहले हिस्से में आपने जिन पाँच संगीतकारों को सुना, वो थे स्नेहल भाटकर, अनिल बिस्वास, मुकुल रॊय, राहुल देव बर्मन और सलिल चौधरी। अब आइए अब इस शृंखला को इस मुक़ाम से आगे बढ़ाते हैं। आज की कड़ी के लिए हमने चुना है संगीतकार रवि को। रवि ने भी कई गीतों में विदेशी धुनों का सहारा लिया था जिनमें से एक महत्वपूर्ण गीत है गीता दत्त का गाया फ़िल्म 'दिल्ली का ठग' का "ओ बाबू ओ लाला, मौसम देखो चला"। यह गीत आधारित है मूल गीत "रम ऐण्ड कोकाकोला" की धुन पर। वैसे आज की कड़ी के लिए हमने रवि साहब के जिस गीत को चुना है वह है फ़िल्म 'ये रास्ते हैं प्यार के' का शीर्षक गीत आशा भोसले की आवाज़ में। और यह गीत प्रेरित है लोकप्रिय गीत "दि ब्रीज़ ऐण्ड आइ" से। इससे पहले कि इस मशहूर विदेशी गीत की थोड़ी जानकारी आपको दें, फ़िल्म 'ये रास्ते हैं प्यार के' के बारे में यह बताना चाहेंगे कि यह फ़िल्म १९६३ की फ़िल्म थी जिसका निर्माण किया था सुनिल दत्त साहब ने और निर्देशन था आर. के. नय्यर का। फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे अशोक कुमार, सुनिल दत्त, लीला नायडु, मोतीलाल, रहमान, राजेन्द्र नाथ और शशिकला। फ़िल्म के गानें लिखे राजेन्द्र कृष्ण ने।

"दि ब्रीज़ ऐण्ड आइ" एक बेहद लोकप्रिय गीत रहा है जो एक स्पैनिश गीत "ऐण्डालुसिआ" पर आधारित है। मूल गीत को लिखा था अर्नेस्टो लेक्योना ने और जिसके स्पैनिश में बोल थे "एमिलियो दि तोरे"। इसके अंग्रेज़ी वर्ज़न के बोल लिखे अल स्टिलमैन ने। इस गीत के भी समय समय पर कई वर्ज़न निकले हैं, जिनमें सब से लोकप्रिय जो दो वर्ज़न हैं, उनमें एक है १९४० में आई जिम्मी डॊरसे का गाया, और दूसरा है १९५५ में कैटरीना वैलेन्टे की आवाज़ में। वैलेन्टे के इस गीत को उस साल अमेरीका में १३-वाँ स्थान और इंगलैण्ड में ५-वाँ स्थान मिला था। जिम्मी डॊरसे वाले वर्ज़न में बॊब एबर्ली का वोकल भी शामिल था, और इस गीत को जारी किया था डेक्का रेकॊर्ड्स ने। इसे बिलबोर्ड मैगज़ीन चार्ट्स में पहली बार एंट्री मिली थी २० जुलाई १९४० के दिन। यानी कि आज से ठीक ६० बरस और ५ दिन पहले। लोकप्रियता की पायदान दर पायदान चढ़ते हुए कुल ९ हफ़्तों तक इस हिट परेड शो की शान बना रहा और दूसरे नंबर तक पहुँच सका था। उधर पॊलीडोर के लिए कैटरीना वैलेन्टे वाला वर्ज़न जारी किया डेर्क्का रेकॊर्ड्स ने ही इंगलैण्ड में, और इसे बिलबोर्ड मैगज़ीन चार्ट्स में प्रथम एंट्री मिली थी ३० मार्च १९५५ को, और यह १४ हफ़्तों तक इस काउण डाउन में रही, और यह १३-वीं पायदान तक ही चढ़ सका था। यह तो था "दि ब्रीज़ ऐण्ड आइ" के बारे में कुछ जानकारी, तो लीजिए सुनिए रवि के संगीत में फ़िल्म 'ये रास्ते हैं प्यार के' का शीर्षक गीत आशा भोसले की आवाज़ में।



क्या आप जानते हैं...
कि संगीतकार हेमंत कुमार के सहायक के रूप में काम करते हुए फ़िल्म 'जागृति' के मशहूर गीत "हम लाए हैं तूफ़ान से कश्ती निकाल के" की धुन दरसल रवि ने बनाई थी। लेकिन फ़िल्म क्रेडिट्स में हेमन्त दा का ही नाम छपवाया गया।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. You won't admit you love me, And so how am I ever to know? You always tell me, Perhaps, perhaps, perhaps....ये है मूल अंग्रेजी गीत, संगीतकार बताएं देसी संस्करण का - २ अंक.
२. गीतकार बताएं - ३ अंक.
३. कौन है इस गीत की गायिका - २ अंक.
४. गुरुदत्त की ये फिल्म थी, किस पर फिल्माया गया था ये नशीला गीत - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी कैसे न माने आपको महागुरु, फिर एक बार सही है जवाब आपका, इंदु जी और अवध जी भी स्पोट ऑन हाँ, किश जी, मुझे लगता है अब आप एकदम सही समझ पाए हैं पहेली को, पहल जवाब गलत हुआ तो क्या हुआ, संभले तो सही, सही जवाब देकर बधाई, आपका खाता खुल चुका है.

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Thursday, June 24, 2010

पल पल दिल के पास तुम रहती हो....कुछ ऐसे ही पास रहते है कल्याणजी आनंदजी के स्वरबद्ध गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 425/2010/125

ल्याणजी-आनंदजी के संगीत सफ़र के विशाल सुर-भण्डार से १० मोतियाँ चुन कर उन पर केन्द्रित लघु शृंखला 'दिल लूटने वाले जादूगर' को इन दिनों हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर चला रहे हैं। पिछले चार दिनों से हमने ६० के दशक के गानें सुनें, आइए आज हम आगे बढ़ निकलते हैं ७० के दशक में। ७० का दशक एक ऐसा दशक साबित हुआ कि जिसमें ५० और ६० के दूसरे अग्रणी संगीतकार कुछ पीछे लुढ़कते चले गए, और जिन तीन संगीतकारों के गीतों ने लोगों के दिलों पर व्यापक रूप से कब्ज़ा जमा लिया, वो संगीतकार थे राहुल देव बर्मन, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और कल्याणजी-आनंदजी। इन तीनों संगीतकारों ने इस दशक में असंख्य हिट गीत दिए और अपार शोहरत हासिल की। आज हमने जिस गीत को चुना है, वह है फ़िल्म 'ब्लैकमेल' का अतिपरिचित "पल पल दिल के पास तुम रहती हो"। किशोर कुमार और कल्याणजी-आनंदजी के कम्बिनेशन के गानों का ज़िक्र हो और इस गाने की बात ना छिड़े यह असंभव है। १९७३ की फ़िल्म 'ब्लैकमेल' का यह गीत फ़िल्माया गया था, जी नहीं, धर्मेन्द्र पर नहीं, बल्कि राखी पर। राखी को अपने प्रेमी धर्मेन्द्र के प्रेम पत्रों को पढ़ते हुए दिखाया जाता है और पार्श्व में यह गीत चल रहा होता है। भले ही गीत में "ख़त" या "चिट्ठी" का ज़िक्र नहीं है, लेकिन यह है तो सही एक 'लव लेटर सॊंग्'। इस गीत को लिखा था राजेन्द्र कृष्ण साहब ने।

आइए फिर एक बार आज रुख़ करते हैं विविध भारती पर आनंदजी से की गई बातचीत की ओर, शृंखला 'उजाले उनकी यादों के' में, जिसमें इस गीत की चर्चा आनंदजी भाई ने कुछ इस क़दर की थी। "ये कम्पोज़िशन के दो तीन स्टाइल होते हैं। जैसे मैं कहूँगा अपनी स्टाइल में, मैं यानी आनंदजी, मुझे घूमने का बहुत शौक है, कल्याणजी भाई कमरे में बैठने का शौक रखते थे। तो बोलते थे कि भीड़ भड़क्के में कहाँ जाना है? तो मुझे गाना बनाने का शौक है तो गाड़ी लेके निकल पड़ता हूँ, ट्रेन में बैठ जाता हूँ, कुछ नहीं तो टेप रिकार्डर लेके बाथरूम में घुस जाता हूँ, बाथ टब में लेट गया, शावर चालू कर दिया, टेप में अपना गाना बजा दिया, ट्रेन में बैठा तो गाना बजा दिया, बाजे पे हाथ रखने के लिए मैं तैयार नहीं हूँ। मैं ऐसे ही काम करूँगा पहले। क्योंकि बाजे पे आपने हाथ रखा तो एक जगह आपने सुर पकड़ लिया, आप उस सुर में बंध गए, फिर धीरे धीरे आपको लगेगा कि अभी राग में बजाऊँ, कौन से राग में बजाऊँ। तो पहले शुरु में एक्स्प्रेशन दो आप, उसको क्या भाव से आप बोल सकते हैं। उसके बाद धीरे धीरे डेवेलप करने के बाद आपके बाजे पे हाथ रखो, कि भई बाजे पे अब, कौन से सिंगर्स गाने वाले हैं, उसके स्केल पे गाना कैसे बनेगा, क्या बनेगा, उसके बाद उसकी रीदम, उसकी ताल क्या है गाने की, वह मूड को समझते हुए आप विज़ुअलाइज़ कर सकते हैं कि पिक्चराइज़ कैसे होगा गाने का। "पल पल दिल के पास", यह गोल्डी जी के वहाँ आके ऐसे ही गप मारते थे हम लोग। तो युं करते करते, वहाँ बैठे बैठे एक दिन मेरे को बोलते हैं कि एक गाना अपने को करना है ऐसा कि जिसमे मैं कुछ अलग अलग अलग अलग कुछ दिखाना चाहता हूँ, and the guy, he is an educated guy, so piano पे बैठके भी गाएगा, कुछ ये करेगा, लेकिन he is again an Indian guy, तो फ़ीलिंग् भी लानी है। तो हमने बोला कि क्या चाहिए क्या। बोले कि छोटे छोटे टुकड़े होंगे, पिक्चराइज़ करना चाहता हूँ, 'cut one two one two' ऐसे।" और दोस्तों, इस ज़रूरत को पूरा करने में राजेन्द्र कृष्ण साहब ने भी बहुत छोटे छोटे शब्दों का इस्तेमाल इस गीत में किया है "पल", "पल", "दिल", "के", "पास".....।" तो आइए अब इस गीत को सुना जाए। और यहीं पर इस शृंखला का पहला हिस्सा ख़त्म होता है। सोमवार की शाम हम फिर से हाज़िर होंगे इसी शृंखला को आगे बढ़ाने के लिए। तब तक के लिए बने रहिए 'आवाज़' के साथ, नमस्कार!



क्या आप जानते हैं...
कि स्वतंत्र संगीतकार बनने से पहले कल्याणजी भाई ने लगभग ४०० फ़िल्मों में बतौर संगीत सहायक व वादक काम किया।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. राजेश खन्ना की इस फिल्म की नायिका कौन है -३ अंक.
२. इस युगल गीत के गीतकार कौन है- २ अंक.
३. फिल्म का नाम बताएं - २ अंक.
४. एक अंतरा शुरू होता है इस शब्द से - "रोज", गीत बताएं - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
ठीक है अवध जी, आप शरद जी के शिष्य ही सही, पर इस प्रतियोगिता के तीसरे सप्ताह के अंत तक आज भी आप ही आगे हैं, पर इस बार शरद जी ने ये फासला बेहद कम कर दिया है. फिर भी ३ अंकों से आगे होने के कारण इस सप्ताहांत भी आप ही विजेता रहे.

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Sunday, September 20, 2009

चंदनिया नदिया बीच नहाए, वो शीतल जल में आग लगाए...लोक रंग में रंग ये गीत कलमबद्ध किया राजेंद्र कृष्ण ने

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 208

'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल को आज हम रंग रहे हैं लोक संगीत के रंग से। यह एक ऐसा गीत है जिसे शायद बहुत दिनों से आप ने नहीं सुना होगा, और आप में से बहुत लोग इसे भूल भी गए होंगे। लेकिन कहीं न कहीं हमारी दिल की वादियों में ये भूले बिसरे गानें गूंजते ही रहते हैं और कभी कभार झट से ज़हन में आ जाते हैं, ठीक वैसे ही जैसे इस गीत की याद हमें आज अचानक आयी है। दोस्तों, हेमन्त कुमार की एकल आवाज़ में फ़िल्म 'अंजान' का यह गीत है "चंदनिया नदिया बीच नहाए, वो शीतल जल में आग लगाए, के चंदा देख देख मुस्काए, हो रामा हो"। दोस्तों, यह फ़िल्म १९५६ में आयी थी। इससे पहले कि हम इस फ़िल्म की और बातें करें, मुझे थोड़ा सा संशय है इस 'अंजान' शीर्षक पर बनी फ़िल्मों को लेकर। इस गीत के बारे में खोज बीन करते हुए मुझे एक और फ़िल्म 'अंजान' का पता चला जो उपलब्ध जानकारी के अनुसार १९५२ में प्रदर्शित हुई थी 'सनराइज़ पिक्चर्स' के बैनर तले, जिसके मुख्य कलाकार थे प्रेमनाथ और वैजयनंतीमाला, संगीतकार थे मदन मोहन तथा गीतकार थे क़मर जलालाबादी। अब संशय की बात यह है कि जहाँ तक मुझे मालूम है सेन्सर बोर्ड के नियमानुसार एक शीर्षक पर दो फ़िल्में १० साल के अंतर पर ही बन सकती है। यानी कि अगर १९५२ में 'अंजान' नाम की फ़िल्म बनी है तो १९६२ से पहले इस शीर्षक पर फ़िल्म नहीं बन सकती। तो फिर ४ साल के ही अंतर में, १९५६ में, दूसरी 'अंजान' जैसे बन गई! हो सकता है कि मैं कहीं ग़लत हूँ। तो यह मैं आप पाठकों पर छोड़ता हूँ कि आप भी तफ़तीश कीजिए और 'अंजान' की इस गुत्थी को सुलझाने में हमारी मदद कीजिए। और अब बात करते हैं १९५६ में बनी फ़िल्म 'अंजान' की। इस साल हेमन्त कुमार के संगीत निर्देशन में कुल ८ फ़िल्में आयीं - अंजान, ताज, दुर्गेश नंदिनी, बंधन, अरब का सौदागर, एक ही रास्ता, हमारा वतन, और इंस्पेक्टर। इन ८ फ़िल्मों में से ५ फ़िल्मों में प्रदीप कुमार नायक थे। प्रदीप कुमार और हेमन्त दा के साथ की बात हम पहले भी आप को बता चुके हैं। तो साहब, फ़िल्म 'अंजान' एम. सादिक़ की फ़िल्म थी जिसमें प्रदीप कुमार और वैजयंतीमाला मुख्य भूमिकायों में थे। राजेन्द्र कृष्ण के लिखे और ख़ुद हेमन्त दा के स्वरबद्ध किए और गाए हुए इस गीत में कुछ तो ख़ास बात होगी जिसकी वजह से आज ५३ साल बाद हम इस गीत को याद कर रहे हैं।

गीतकार राजेन्द्र कृष्ण ने ५० के दशक में जिन तीन संगीतकारों के लिए सब से ज़्यादा गानें लिखे थे, उनमें से एक हैं सी. रामचन्द्र, दूसरे हैं मदन मोहन, और तीसरे हैं, जी हाँ, हेमन्त कुमार। आइए दोस्तों आज राजेन्द्र कृष्ण जी की कुछ बातें की जाए। अपने कलम से दिलकश नग़मों को जनम देनेवाले राजेन्द्र कृष्ण का जन्म ६ जून १९१९ को शिमला में हुआ था। बहुत कम उम्र में ही वे मोहित हुए कविताओं से। सन् १९४० तक गुज़ारे के लिए वे शिमला के म्युनिसिपल औफ़िस में नौकरी करते रहे। लेकिन कुछ ही सालों में उन्होने यह नौकरी छोड़ दी और मुंबई का रुख़ किया। एक फ़िल्म लेखक और गीतकार बनने की चाह लेकर उन्होने शुरु किया अपना संघर्ष का दौर। और यह दौर ख़तम हुआ सन् १९४७ में जब उन्होने फ़िल्म 'ज़ंजीर' में अपना पहला फ़िल्मी गीत लिखा। उसी साल उन्होने लिखी फ़िल्म 'जनता' की स्क्रीप्ट। उन्हे पहली कामयाबी मिली १९४८ की फ़िल्म 'आज की रात' से। और सन् १९४९ में संगीतकार श्यामसुंदर के संगीत निर्देशन में फ़िल्म 'लाहोर' में उनके लिखे गीतों ने उनके सामने जैसे सफलता का द्वार खोल दिया। तो दोस्तों, पेश है आज का गीत, जिस टीम में शामिल हैं राजेन्द्र कृष्ण, हेमन्त कुमार और प्रदीप कुमार, सुनिए...



(चन्दनिया नदिया बीच नहाये, ओ शीतल जल में आग लगाये
के चन्दा देख देख मुस्काये, हो रामा, हो रामा हो)-२

(पूछ रही है लहर लहर से, कौन है ये मतवाली)-२
तन की गोरी चंचल छोरी, गेंदे की एक डाली
ओ...ओ...ओ...ओ...
रूप की चढ़ती, धूप सुनहेरा रंग आज बरसाये
हो रामा, हो रामा हो

चन्दनिया नदिया बीच नहाये, ओ शीतल जल में आग लगाये
के चन्दा देख देख मुस्काये, हो रामा हो रामा हो

(परबत परबत घूम के आयी, ये अलबेली धारा)-२
क्या जाने किस आसमान से टूटा है ये तारा
ओ.... ओ.... ओ....
शोला बनके, फूल कंवल का, जल में बहता जाये
हो रामा, हो रामा हो

चन्दनिया नदिया बीच नहाये, ओ शीतल जल में आग लगाये
के चन्दा देख देख मुस्काये, हो रामा, हो रामा हो


और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. इस गीत की अमर गायिका की जयंती है कल.
२. संगीतकार हैं श्याम सुंदर.
३. मुखड़े में शब्द है -"सहारा"

पिछली पहेली का परिणाम -
पराग जी आप एक बार फिर शीर्ष पर हैं अब...३० अंकों के लिए बधाई...

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Tuesday, July 14, 2009

वो भूली दास्ताँ लो फिर याद आ गयी....और फिर याद आई संगीतकार मदन मोहन की

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 141

दन मोहन के संगीत की सुरीली धाराओं के साथ बहते बहते आज हम आ पहुँचे हैं 'मदन मोहन विशेष' की अंतिम कड़ी पर। आज है १४ जुलाई, आज ही के दिन सन् १९७५ में मदन साहब इस दुनिया को हमेशा के लिए छोड़ गये थे। विविध भारती के वरिष्ठ उद्‍घोषक कमल शर्मा के शब्दों में - "मदन मोहन के धुनों की मोहिनी में कभी प्रेम का समर्पण है तो कभी मादकता से भरी हैं, कभी विरह की वेदना है और कभी स्वर लहरी से भर देती हैं दिल को, जिसका मध्यम मध्यम नशा है। मदन मोहन के शास्त्रीय संगीत पर आधारित गीतों में साज़ों की अनर्थक ऐसी भीड़ भी नहीं है जिससे गाने की आत्मा ही खो जाये। उनके धुनों की स्वरधारा पर्वत से उतरती है और सुर सरिता में विलीन हो जाती है। धाराओं में धारा समाने लगते हैं, और ऐसी ही एक धारा में नहाकर आत्मा तृप्त हो जाती हैं। व्यक्तिगत अनुभव के स्तर पर हर श्रोता को कोई संगीतकार, गीतकार या गायक दूसरों से ज़्यादा पसंद आते हैं जिनकी कोई मौलिकता उन्हे प्रभावित कर जाती हैं। मदन मोहन के संगीत में भी मौलिकता है। फ़िल्म संगीत एक कला होने के साथ साथ एक व्यावसाय भी है जिसमें कई बार कलाकारों को समझौता करना पड़ता है। मदन मोहन जैसे संगीतकार को भी कहीं कहीं समझौता करना पड़ा है, लेकिन कल्पनाशील संगीतकार वो है जो कोई ना कोई रास्ता निकाल लेता है और हर बार अपना छाप छोड़ जाता है। मदन मोहन उनमें से एक हैं।" आज इस विशेष प्रस्तुति के अंतिम अध्याय में हमें याद आ रही है वो भूली दास्ताँ जिसे दशकों पहले लता मंगेशकर ने बयाँ किया था राजेन्द्र कृष्ण के शब्दों में, १९६१ की फ़िल्म 'संजोग' के प्रस्तुत गीत में। दर्द का ऐसा असरदार फ़ल्सफ़ा हर रोज़ बयाँ नहीं होता। और यही वजह है कि यह गीत मदन मोहन के 'मास्टर-पीस' गीतों में गिना जाता है।

प्रमोद चक्रवर्ती निर्देशित 'संजोग' के मुख्य कलाकार थे प्रदीप कुमार और अनीता गुहा। दोस्तों, आप को याद होगा कि 'मदन मोहन विशेष' का पहला गीत "बैरन नींद न आये" (चाचा ज़िंदाबाद) भी अभिनेत्री अनीता गुहा पर ही फ़िल्माया गया था। सही में यह संजोग की ही बात है कि इस शृंखला का अंतिम गीत फिर एक बार अनीता गुहा पर फ़िल्माया हुआ है। इस फ़िल्म के सभी गीत बेहद सुरीले भी हैं और लोकप्रिय भी, लेकिन प्रस्तुत गीत में कुछ ऐसी बात है कि जो इसे दूसरे गीतों के मुकाबिल दो क़दम आगे को रखती है। यह मदन मोहन और लता जी के हौंटिंग मेलडीज़ का एक बेमिसाल नग़मा है जो दिल को उदास भी कर देता है और साथ ही इसका सुरीलापन मन को एक अजीब शांति भी प्रदान करता है। और्केस्ट्रेशन की तो क्या बात है, शुरुवाती संगीत अद्‍भुत है, पहले इंटर्ल्युड में सैक्सोफ़ोन पुर-असर है, कुल मिलाकर पूरा का पूरा गीत एक मास्टरपीस है। "बड़े रंगीन ज़माने थे, तराने ही तराने थे, मगर अब पूछता है दिल वो दिन थे या फ़साने थे, फ़कत एक याद है बाक़ी, बस एक फ़रियाद है बाक़ी, वो ख़ुशियाँ लुट गयीं लेकिन दिल-ए-बरबाद है बाक़ी"। सच दोस्तों, कहाँ गये वो सुरीले दिन, फ़िल्म संगीत का वह सुनहरा युग! आज मदन मोहन हमारे बीच नहीं हैं, जुलाई का यह भीगा महीना बड़ी शिद्दत से उनकी याद हमें दिलाता है, पर आँखें नम करने का हक़ हमें नहीं है क्यूंकि उन्ही का एक गीत हम से यह कहता है कि "मेरे लिए न अश्क़ बहा मैं नहीं तो क्या, है तेरे साथ मेरी वफ़ा मैं नहीं तो क्या"। हिंद युग्म की तरफ़ से मदन मोहन की संगीत साधना को प्रणाम!



पिछले वर्ष हमने मदन मोहन साहब को याद किया था संजय पटेल जी के इस अनूठे आलेख के माध्यम से. आज फिर एक बार जरूर पढें और सुनें ये भी.
नैना बरसे रिमझिम रिमझिम.....इस गीत से जुडा है एक मार्मिक संस्मरण


और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा पहला "गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. माउथ ओरगन की धुन इस गीत की खासियत है.
2. राहुल देव बर्मन ने बजायी थी वह धुन इस गीत में.
3. मस्ती से भरे इस गीत के एक अंतरे में "काज़ी" का जिक्र है.

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी, मात्र ४ अंक पीछे हैं अब आप अपनी मंजिल से, बहुत बहुत बधाई....पता नहीं हमारी स्वप्न मंजूषा जी कहाँ गायब हैं, पराग जी भी यही सवाल कर रहे हैं. जी पराग जी आपने सही कहा ये गीत रेडियो पर बहुत सुना गया है पर हमें तो यही लगता है कि यह गीत उस श्रेणी का है जिसे जितनी भी बार सुना जाए मन नहीं भरता.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Saturday, May 16, 2009

मेरा दिल ये पुकारे आजा.....तड़पती नागिन की पुकार लता के स्वर में...

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 82

ल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में आप ने सुना हेमन्त कुमार के संगीत और आवाज़ से सजी फ़िल्म 'बीस साल बाद' का एक गीत। आज भी 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में हेमन्तदा छाये रहेंगे क्यूंकि आज भी हम उन्ही का स्वरबद्ध गीत सुनवाने जा रहे हैं आपको। लेकिन यह बात ज़रूर है कि आज का गीत उनकी आवाज़ में नहीं बल्कि सुर कोकीला लता मंगेशकर की आवाज़ में है। जहाँ हेमन्तदा का मधुर संगीत और लताजी की मधुर आवाज़ एक साथ घुलमिल जाये तो इस संगम से कैसा मीठा रस उत्पन्न होगा इसका शायद आप ख़ुद ही अंदाज़ा लगा सकते हैं। आज हम आपको सुनवाने के लिए लाये हैं १९५४ की फ़िल्म 'नागिन' का एक गीत। यूँ तो फ़िल्म 'नागिन' का नाम आते ही लताजी का गाया "मन डोले मेरा तन डोले" गीत याद आता है और साथ ही याद आती है रवि और कल्याणजी द्वारा बजाये गये हारमोनियम और क्लेवियोलिन पर बीन की ध्वनि। लेकिन इसी फ़िल्म में लताजी ने बहुत सारे एक से एक मधुर एकल गीत गाये हैं जिनकी चर्चा इस गीत से थोडी कम होती है। तो इसलिए हमने सोचा कि क्यों ना इन्ही में से एक गीत आज चुना जाए। अब देखना यह है कि क्या हमारी पसंद आपकी भी पसंद है या नहीं। ज़रूर बताइएगा!

'नागिन' के निर्देशक थे आइ. एस. जोहर और फ़िल्म में मुख्य भूमिकाएँ निभाई प्रदीप कुमार और वैजयन्तिमाला ने। लताजी ने इस फ़िल्म में जितने भी गाने गाये उन सबकी खासियत यह थी कि गाने बड़े सीधे सरल शब्दों में लिखे हुए थे जिन्हे लिखा था गीतकार राजेन्द्र कृष्ण ने, और उनका हेमन्तदा ने शास्त्रीय रागों का सहारा लेकर हल्के फुल्के धुनों में पिरोकर ऐसे प्रस्तुत किया कि सुननेवालों के कानों से होते हुए सीधे दिल में उतर गए। इस फ़िल्म के मधुर संगीत के लिए हेमन्त कुमार को उस साल के सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का फ़िल्म-फ़ेयर पुरस्कार भी मिला था। उन दिनो संगीतकार रवि उनके सहायक हुआ करते थे। हेमन्तदा पुरस्कार लेकर मंच से नीचे आये और रवि के पास आकर उन्हे वह ट्राफ़ी सौंप दी। कहने की ज़रूरत नहीं कि रवि का 'नागिन' के संगीत में बहुत बड़ा हाथ था। आज हम आपको सुनवा रहे हैं "मेरा दिल ये पुकारे आजा"। इस गीत में भी अपको बीन की आवाज़ सुनाई देगी जिसे रवि और कल्याणजी ने बजाया था। और आपको यह भी बता दें कि यह गीत राग किरवाणी पर आधारित है। तो सुनिए यह गीत और खो जाइए इसकी मधुरता में।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. निर्देशक रमेश सहगल की इस फिल्म में थे राज कपूर और माला सिन्हा.
२. साहिर के सशक्त बोलों पर खय्याम का संगीत.
३. मुखड़े में शब्द है -"आजकल".

कुछ याद आया...?
पिछली पहेली का परिणाम -
पहली बार नीलम जी ने बाजी मारी है। बधाइयाँ..... हालाँकि शरद तैलंग ने इनसे पहले ही उत्तर बता दिया था, लेकिन वे गलती से अपना उत्तर शक्ति सामंत वाली पोस्ट पर दे गये थे...... रचना जी और मनु जी को भी बधाई। पवन जी, आपका स्वागत है..... ज़रूर सुनवायेंगे.... रोज़ सुनते रहिए.... आपको यह गाना मिलेगा।

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


Wednesday, April 1, 2009

एक चतुर नार करके शृंगार - ऐसी मस्ती क्या कहने...

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 39

ज तो 'ओल्ड इस गोल्ड' की महफ़िल में होने जा रहा है एक ज़बरदस्त हंगामा, क्योंकि आज हमने जो गीत चुना है उसमें होनेवाला है एक ज़बरदस्त मुक़ाबला. यह गीत ना केवल हंगामाखेज है बल्कि अपनी तरह का एकमात्र गीत है. इस गीत के बनने के बाद आज 40 साल गुज़र चुके हैं, लेकिन इस गीत को टक्कर दे सके, ऐसा कोई गीत अब तक ना बन पाया है और लगता नहीं भविष्य में भी कभी बन पाएगा. ज़्यादा भूमिका ना बढाते हुए आपको बता दें कि यह वही गीत है फिल्म "पड़ोसन" का जिसे आप कई कई बार सुन चुके होंगे, लेकिन जितनी बार भी आप सुने यह नया सा ही लगता है और दिल थाम कर गाना पूरा सुने बगैर रहा नहीं जाता. जी हाँ, आज का गीत है "एक चतुर नार करके शृंगार". 1968 में फिल्म पड़ोसन बनी थी जिसमें किशोर कुमार, सुनील दत्त, सायरा बानो और महमूद ने अभिनय किया था. अभिनय क्या किया था, इन कलाकारों ने तो जैसे कोई हास्य आंदोलन यानी कि 'लाफ रोइट्स' ही छेड दिया था. 'सिचुयेशन' यह थी कि सुनील दत्त अपनी पडोसन सायरा बानो पर मार मिटे थे लेकिन सायरा बानो उन्हे भाव भी नहीं दे रही थी. तो जब संगीत मास्टर के रूप में महमूद सायरा बानो को गाना सिखाने आते हैं तो सुनील दत्त अपने दोस्तों के साथ मिलकर उन्हे परेशान करते हैं. और इन दोस्तों में शामिल थे कोई और नहीं बल्कि हमारे किशोर-दा. ऐसे असाधारण 'सिचुयेशन' पर एक कामयाब गीत लिखना और उससे लोगों के दिलों तक पहुँचाना कोई आसान काम नहीं था. लेकिन पड़ोसन की पूरी 'टीम' ने जो कमाल इस गाने में कर दिखाया है उसका शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता. इसका सिर्फ़ और सिर्फ़ सुनकर ही आनंद उठाया जा सकता है.

कहा जाता है कि भले ही राजेंदर कृष्ण ने यह गीत लिखा है और आर डी बर्मन ने संगीतबद्ध किया है, लेकिन इस गीत में किशोर कुमार ने भी कई चीज़ें अपनी ओर से डाली थी और इस गाने का जो अलग अंदाज़ नज़र आता है वो उन्ही की बदौलत है. इस गीत में मन्ना डे को महमूद के लिए 'प्लेबॅक' करना था. क्योंकि महमूद फिल्म में एक शास्त्रिया गायक के चरित्र में थे और उन दिनों मन्ना डे उनके लिए पार्श्वगायन किया करते थे, इसलिए जब महमूद और उस पर शास्त्रिया संगीत की बात आई तो मन्ना डे के अलावा किसी और के बारे में सोचा तक नहीं गया. लेकिन मन्ना डे को एक बात खटक रही थी की उस गीत में जो मुक़ाबला होता है उसमें महमूद हार जाते हैं. उन्हे यह बात ज़रा पसंद नहीं आई की एक अच्छा शास्त्रिया गायक होने के बावजूद उन्हे एक ऐसे गायक किशोर से हारना होगा जिसे शास्त्रिया संगीत नहीं आती. लेकिन वो आखिर मान गये और हमें मिला हास्य गीतों का यह सरताज गाना. एक बात और आपको यहाँ बता दें कि किशोर कुमार का जो चरित्र इस फिल्म में था वो प्रेरित था शास्त्रीय गायक धनंजय बेनर्जी से जो कि उन्ही के रिश्तेदार थे. लेकिन ऐसा भी पढ्ने सुनने में आता है कि किशोर ने अपनी आँखों की मुद्राएँ खेमचंद प्रकाश से नकल की, जो एक अच्छे नर्तक भी थे. और चलने का अंदाज़ उन्होने नकल किया बर्मन दादा, यानी कि एस डी बर्मन का. दोस्तों, आप शायद बेक़रार हो रहे होंगे इस गीत को सुनने के लिए, तो मैं और ज़्यादा आपका वक़्त ना लेते हुए पेश करता हूँ आज का 'ओल्ड इस गोल्ड', सुनिए...



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. ये वो ग़ज़ल है जिस पर नौशाद साहब मर मिटे थे.
२. लता - मदन मोहन की बेमिसाल टीम.
३. कुछ और कहने की जरुरत है क्या ? :)

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
एक बार फिर पारुल ने सबको मात दी, पारुल के साथ साथ नीरज जी, मनु जी को भी सही गीत पहचानने की बधाई.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.




Monday, March 30, 2009

आंसू समझ के क्यों मुझे आँख से तुमने गिरा दिया...

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 37

कुछ गीत ऐसे होते हैं कि जिनके लिए संगीतकार के दिमाग़ में बस एक ही गायक होता है. जैसे कि वो गीत उसी गायक के लिए बनाया गया हो. या फिर हम ऐसे भी कह सकते हैं कि हर गायक की अपनी एक खूबी होती है, कुछ विशेष तरह के गीत उनकी आवाज़ में खूब खिलते हैं. ऐसे ही एक गायक थे तलत महमूद जिनकी मखमली आवाज़ में दर्द भरी, ठहराव वाली गज़लें ऐसे पुरस्सर होते थे कि जिनका कोई सानी नहीं. आज 'ओल्ड इस गोल्ड' में तलत साहब की मखमली आवाज़ का जादू छा रहा है दोस्तों. सलिल चौधरी की धुन पर राजेंदर कृष्ण के बोल, फिल्म "छाया" से. 1961 में बनी हृषिकेश मुखर्जी की इस फिल्म में सुनील दत्त और आशा पारेख ने मुख्य भूमिकाएँ निभायी. यूँ तो इस फिल्म में एक से एक 'हिट' गीत मौजूद हैं जैसे कि "मुझसे तू इतना ना प्यार बढा", और "आँखों में मस्ती शराब की". लेकिन तलत साहब का गाया जो गीत हम आज शामिल कर रहे हैं वो थोडा सा कमचर्चित है.

"आँसू समझ के क्यूँ मुझे आँख से तुमने गिरा दिया, मोती किसी के प्यार का मिट्टी में क्यूँ मिला दिया" तलत महमूद के गाए फिल्मी गज़लों में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है. सलिल चौधुरी के गीतों में पाश्चात्य संगीत का बहुत ही सुंदर इस्तेमाल हुया करता था.पाश्चात्य 'हार्मोनी' के वो दीवाने थे. जिस तरह से मदन मोहन फिल्मी ग़ज़लों के बादशाह माने जाते हैं, सलिल-दा द्वारा स्वरबद्ध इस ग़ज़ल को सुनकर आपको यह अंदाज़ा हो जाएगा कि सलिल-दा भी कुछ कम नहीं थे इस मामले में. किसी ग़ज़ल में 'वेस्टर्न हार्मोनी' का ऐसा सुंदर प्रयोग शायद ही किसी और ने किया हो! और राजेंदर कृष्ण साहब के भी क्या कहने! "मेरी खता माफ़ मैं भूले से आ गया यहाँ, वरना मुझे भी है खबर मेरा नहीं है यह जहाँ". इस गीत की एक और ख़ास बात यह है कि फिल्म में इस गीत के तीन अंतरे हैं, लेकिन 'ग्रामोफोन रेकॉर्ड' पर इस गीत के केवल दो ही अँतरे हैं. इस तरह से 'रेकॉर्ड' पर 3 मिनिट 14 सेकेंड्स का यह गीत फिल्म में 4 मिनिट 52 सेकेंड्स अवधि का है. दोस्तों, हम तो आपको 'रेकॉर्ड' वाला 'वर्ज़न' ही सुनवा सकते हैं, लेकिन फिल्म में शामिल वो तीसरा अंतरा जो 'रेकॉर्ड' पर नहीं है, वो कुछ इस तरह से है - "नग्मा हूँ कब मगर मुझे अपने पे कोई नाज़ था, गाया गया हूँ जिस पे मैं टूटा हुआ वो साज़ था, जिस ने सुना वो हंस दिया हंस के मुझे रुला दिया, आँसू समझ के..."



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. प्रेमी को पुकारती लता की आवाज़.
२. सोनिक ओमी का संगीत.
३. मुखड़े में शब्द है -"नैना".

कुछ याद आया...?



खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.




Tuesday, March 17, 2009

एक मंजिल राही दो, फिर प्यार न कैसे हो....

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 25

दोस्तों,'ओल्ड इस गोल्ड' की एक और कडी के साथ हम हाज़िर हैं. हमें बेहद खुशी है कि आप इस शृंखला को पसंद कर रहे हैं. और यकीन मानिए, आपके लिए इन गीतों को खोजने में और इन गीतों से जुडी जानकारियाँ इकट्टा करने में भी हमें उतना ही आनंद आ रहा है. इस शृंखला के स्वरूप के बारे में अगर आप कोई भी सुझाव देना चाहते हैं, या किसी तरह का कोई बदलाव चाहते हैं तो हमें बे-झिझक बताईएगा. अगर आप किसी ख़ास गीत को इस शृंखला में सुनना चाहते हैं तो भी हमें बता सकते हैं. और अगर फिल्म संगीत के सुनहरे दौर के किसी गीत से जुडी कोई दिलचस्प बात आप जानते हैं तो भी हमें ज़रूर बताएँ, हमें बेहद खुशी होगी आपकी दी हुई जानकारी को यहाँ पर शामिल करते हुए. तो आइए अब ज़िक्र छेडा जाए आज के गीत का. आज का गीत लता मंगेशकर और मुकेश की आवाज़ों में एक बेहद खूबसूरत युगल गीत है जिसमें यह बताया जारहा है कि अगर मंज़िल एक है, तो फिर ऐसे मंज़िल को तय करनेवाले दो राही के दिलों में प्यार कैसे ना पनपे. अब इसके आगे शायद मुझे और कुछ बताने की ज़रूरत नहीं, आप ने गीत का अंदाज़ा ज़रूर लगा लिया होगा!

जी हाँ, 1961 में बनी फिल्म "संजोग" के इस गीत को लिखा था राजेंदर कृष्ण ने और संगीत में पिरोया था मदन मोहन साहब ने. प्रमोद चक्रवर्ती निर्देशित इस फिल्म में प्रदीप कुमार और अनीता गुहा ने मुख्य भूमिकाएँ निभाई. यह गीत मदन मोहन के स्वरबद्ध दूसरे गीतों से बहुत अलग हट्के है. आम तौर पर उनके गीतों में साज़ों का बहुत ज़्यादा इस्तेमाल नहीं होता था. लेकिन इस गीत में उन्होने अच्छे ख़ासे 'ऑर्केस्ट्रेशन' का प्रयोग किया. कई साज़ प्रयोग में लाए गये. शायद खुश-मिज़ाज और खुश-रंग इस गीत की यही ज़रूरत थी. पहले और तीसरे 'इंटरल्यूड' में 'सॅक्सफोन' का खूबसूरत प्रयोग हुया है, तो दूसरे 'इंटरल्यूड' में 'वोइलिन' और 'अकॉर्डियन' इस्तेमाल में लाया गया है. कुल मिलाकर इस गीत का संगीत संयोजन बेहद सुरीला और चमकदार है जिसे सुनकर दिल खुश हो जाता है. तो अब आप भी खुश हो जाइए और सुनिए यह गीत.



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. रफी साहब का एक बेहद यादगार नग्मा.
२. मजरूह के बोल और एस डी बर्मन साहब का बेमिसाल संगीत.
३. पहला अंतरा इस शब्द से शुरू होता है -"देखा".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
अभिषेक जी, एकदम सही जवाब. नीरज जी, धन्येवाद सहित बधाई, पी एन जी एकदम आसान हुई तो पहेली का मज़ा क्या :) प्रेमेन्द्र जी, स्वागत आपका.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.




Monday, March 16, 2009

चुप चुप खड़े हो ज़रूर कोई बात है...पहली मुलाकात है जी...पहली मुलाकात है...

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 24

दोस्तों, आज पहली बार 'ओल्ड इस गोल्ड' में हम एक ऐसे संगीतकार जोडी को याद कर रहे हैं जिनकी जोडी फिल्म संगीत की दुनिया की पहली संगीतकार जोडी रही है. और यह जोडी है हुस्नलाल और भगतराम की. साल 1949 हुस्नलाल भगतराम के संगीत सफ़र का एक महत्वपूर्ण साल रहा. इस साल उनके संगीत से सजी कुल 10 फिल्में आईं - अमर कहानी, बड़ी बहन, बालम, बाँसुरिया, हमारी मंज़िल, जल तरंग, जन्नत, नाच, राखी, और सावन भादों. इनमें से फेमस पिक्चर्स के 'बॅनर' तले बनी फिल्म बड़ी बहन ने जैसे पुर देश भर में हंगामा मचा दिया. इस फिल्म के गीत इतने ज़्यादा प्रसिद्ध हुए कि हर गली गली में गूंजने लगे, इनके चर्चे होने लगे. डी डी कश्यप द्वारा निर्देशित इस फिल्म में सुरैय्या और गीता बाली ने दो बहनों की भूमिका अदा की, और नायक बने रहमान. चाँद (1944), नरगिस (1946), मिर्ज़ा साहिबां (1947), और प्यार की जीत (1948) जैसी कामियाब फिल्मों के बाद गीतकार क़मर जलालाबादी और हुस्नलाल भगतराम की जोडी बड़ी बहन में एक साथ आए और एक बार फिर चारों तरफ छा गये. हुस्नलाल भगतराम का संगीत संयोजन इस फिल्म में कमाल का था. छाली और ठेकों का ऐसा निपूर्ण प्रयोग हुआ कि गाने जैसे लोगों की ज़ुबान पर ही थिरकने लगे.

सुरैय्या उस दौर की सबसे कामयाब और सबसे महंगी अदाकारा थी. इस फिल्म में उनका गाया "वो पास रहे या दूर रहे नज़रों में समाए रहते हैं" उनके सबसे लोकप्रिय गीतों में माना जाता है. लेकिन उस समय लता मंगेशकर एक उभरती हुई गायिका थी, जिन्होंने इस फिल्म में गीता बाली का पार्श्वगायन किया. "चले जाना नहीं नैना मिलाके" लताजी की आवाज़ में इस फिल्म का एक मशहूर गीत था जो गीता बाली पर फिल्माया गया था. लेकिन इसी फिल्म में लता मंगेशकर, प्रेमलता और साथियों की आवाज़ों में एक ऐसा गीत भी था जो ना तो गीता बाली पर फिल्माया गया और ना ही सुरैय्या पर. फिल्म की 'सिचुयेशन' ऐसी थी कि सुरैय्या रहमान से रूठी हुई थी. तभी गानेवाली लड़कियों की एक टोली वहाँ से गुज़रती है और यह गीत गाती हैं. पहले पहले प्यार की पहली पहली मुलाक़ात का यह अंदाज़-ए-बयान लोगों को खूब खूब पसंद आया और यह गीत बेहद मक़बूल हुया. लेकिन यह गीत क़मर जलालाबादी ने नहीं, बल्कि राजेंदर कृष्ण ने लिखा था. ऐसा कहा जाता है कि फिल्म के निर्माता इस गीत से इतने खुश हुए कि उन्होने राजेंदर कृष्ण साहब को एक ऑस्टिन गाडी भेंट में दे दी. तो आप भी इस गीत का आज आनंद उठाइये 'ओल्ड इस गोल्ड' में.



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. लता मुकेश के स्वर.
२. राजेंद्र कृष्ण के बोल और मदन मोहन का संगीत.
३. स्थायी में पंक्ति है -"इसको भी कुछ मिला है...".

कुछ याद आया...?

पिछली पहली का परिणाम -
वाह वाह दिलीप जी, नीरज जी, और मनु जी ने एक बार फिर सही गीत पकडा है, बहुत बहुत बधाई. अनिल सेठ जी भी पहेली में रुचि लेने लगे हैं और बिलकुल ठीक जवाब दिया है।

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.




Tuesday, March 3, 2009

ऐ दिल मुझे बता दे...तू किस पे आ गया है...

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 12

ज 'ओल्ड इस गोल्ड' में हम सलाम कर रहे हैं फिल्म जगत के दो महान सुर साधकों को. एक हैं गायिका गीता दत्त और दूसरे संगीतकार मदन मोहन. यूँ तो मदन मोहन के साथ लता मंगेशकर का ही नाम सबसे पहले जेहन में आता है, लेकिन गीता दत्त ने भी कुछ बडे ही खूबसूरत नगमें गाये हैं मदन मोहन के लिए. इनमें से एक है फिल्म "भाई भाई" का, "ऐ दिल मुझे बता दे तू किसपे आ गया है, वो कौन है जो आकर ख्वाबों पे छा गया है". दोस्तों, अगर आप ने कल का 'ओल्ड इस गोल्ड' सुना होगा तो आपको पता होगा कि हमने उसमें आशा भोसले का गाया "आँखों में जो उतरी है दिल में" गाना सुनवाया था. वो गाना ज़िंदगी में किसी के आ जाने की खुशी को उजागर करता है. वैसे ही "भाई भाई" फिल्म का यह गाना भी कुछ उसी अंदाज़ का है. किसी का अचानक दिल में आ जाना, ख्वाबों पर भी उसी का राज होना, पहले पहले प्यार की वो मीठी मीठी अनुभूतियाँ, यही तो है इस गीत में.

"भाई भाई" 1956 की फिल्म थी जिसका निर्माण दक्षिण के नामचीं 'बॅनर' ऐ वी एम् ने किया था. अशोक कुमार, किशोर कुमार, निम्मी, श्यामा और निरूपा रॉय अभिनीत इस फिल्म का निर्देशन किया था एम् वी रमण ने. राजेंदर किशन और मदन मोहन के जोडी, और साथ में गीता दत्त की नशीली आवाज़. गीता-जी के बारे में ऐसा कहा जाता था की वो गले से नहीं बल्कि दिल से गाती थी, तभी तो उनका हर एक गीत सुननेवाले के दिल पर असर किये बिना नहीं रहता. इस गीत का 'ऑर्केस्ट्रेशन' भी कमाल का है. उन दिनो शीक चॉक्लेट एक मशहूर 'ट्रंपिट प्लेयर' हुया करते थे जो अमेरिका के लूयिस आर्मस्ट्रॉंग से काफ़ी प्रभावित थे. शीक चॉक्लेट ने कुछ फिल्मों में संगीत भी दिया था, लेकिन उनकी असली पहचान बतौर साज़िन्दे ही बनी और अपने आखिरी दम तक, यानी साल 1967 तक, वो हिन्दी फिल्मों में साज़ बजाते रहे. उन्होने 'जॅज़', 'ब्लूस' और 'गोन कथोलिक' पारंपरिक संगीत का 'फ्यूज़न' करके फिल्मी गीतों में इस्तेमाल किया. और ख़ासकर इस गाने में उन्होने एक 'पोर्चुगीज़ फडो' "कोयाम्ब्रा" से एक 'फ्रेज़' का इस्तेमाल किया था. जिन पाठकों को 'फडो' के बारे में जानकारी नहीं है उन्हे हम यह बता दें की 'फडो' एक प्रकार के पोर्चुगीज़ लोक संगीत का नाम है जिसमें दर्द भरे सुर और बोल होते हैं. 'कोवैंबा फडो', 'फडो' का एक प्रकार है जिसकी शुरुआत पोर्चुगल के कोयाम्ब्रा नामक शहर में हुई थी. तो इसी जानकारी के साथ अब सुनिए "भाई भाई" फिल्म का यह मचलता हुया नग्मा.



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. शैलेन्द्र -सलिल दा की जोड़ी, मशहूर लोक संगीत पर आधारित धुन जिस पर आगे भी बहुत गीत बने.
२. आवाजें हेमंत कुमार और गीता दत्त की. अभिनय था भारत भूषण और चाँद उस्मानी का.
३. मुखड़े में शब्द हैं - "जियरा".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का जवाब -
क्या बात है नीलम जी ने भी आखिर शतक लगा ही दिया, मनु जी और उज्जवल जी भी परीक्षा में खरे उतरे. पी एन सुब्रमनियन जी आपका स्वागत है. आपका भी जवाब एकदम सही है...बधाई. मनु जी माफ़ कीजियेगा आपको जन्मदिन की शुभकामनायें देना हम सब भूल गए. आवाज़ की पूरी टीम की तरफ से हमारे तेंदुलकर को देर से ही सही पर ढेरों बधाईयाँ.

प्रस्तुति - सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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