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Sunday, June 3, 2018

राग भैरव : SWARGOSHTHI – 372 : RAG BHAIRAV







स्वरगोष्ठी – 372 में आज

राग से रोगोपचार – 1 : सुबह का राग भैरव

उच्च रक्तचाप, सिरदर्द, चक्कर, ज्वर आदि रोगों के निदान में राग भैरव के स्वर उपयोगी





उस्ताद सइदुद्दीन डागर
पं. श्रीकुमार मिश्र
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से आरम्भ हो रही हमारी नई श्रृंखला “राग से रोगोपचार” की पहली कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, इस श्रृंखला के लेखक, संगीतज्ञ और इसराज व मयूर वीणा के यशस्वी वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र के साथ आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मानव का शरीर प्रकृत की अनुपम देन है। बाहरी वातावरण के प्रतिकूल प्रभाव से मानव के तन और मन में प्रायः कुछ विकृतियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। इन विकृतियों को दूर करने के लिए हम विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों की शरण में जाते हैं। पूरे विश्व में रोगोपचार की अनेक पद्धतियाँ प्रचलित है। भारत में हजारों वर्षों से योग से रोगोपचार की परम्परा जारी है। प्राणायाम का तो पूरा आधार ही श्वसन क्रिया पर केन्द्रित होता है। संगीत में स्वरोच्चार भी श्वसन क्रिया पर केन्द्रित होता है। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। इन्हीं स्वरों के संयोजन से राग की उत्पत्ति होती है। स्वर-योग या श्रव्य माध्यम से गायन या वादन के सुरीले, भावप्रधान और प्रभावकारी नाद अर्थात संगीत हमारे मस्तिष्क के संवेदनशील भागों में प्रवेश करता है। मस्तिष्क में नाद के प्रभाव का विश्लेषण होता है। ग्राह्य और उपयोगी नाद को मस्तिष्क सुरक्षित कर लेता है जहाँ नाद की परमाणु ऊर्जा के प्रभाव से सशक्त और उत्तम कोटि के हारमोन्स का सृजन होता है। यह हारमोन्स शरीर की समस्त कोशिकाओं में व्याप्त हो जाता है। इसकी ऊर्जा से अनेक मानसिक और मनोदैहिक समस्याओं का उपचार सम्भव हो सकता है। इसके साथ ही चिकित्सक के सुझावानुसार औषधियों का सेवन भी आवश्यक हो सकता है। मन की शान्ति, सकारात्मक तथा मृदु संवेदना और भक्ति में एकाग्रता के लिए राग भैरवी के कोमल स्वर प्रभावकारी सिद्ध होते हैं। इसी प्रकार विविध रागों के गातन-वादन के माध्यम से प्रातःकाल से रात्रिकालीन परिवेश में प्रभावकारी होता है। अलग-अलग स्वर-भावों और गीत के साहित्य के रसों के अनुसार उत्पन्न सशक्त भाव-प्रवाह के द्वारा डिप्रेशन, तनाव, चिन्ता, विकृति आदि मानसिक समस्याओं का उपचार सम्भव है। इस श्रृंखला में हम विभिन्न रागो के स्वरो से उत्पन्न प्रभावों का क्रमशः विवेचन करेंगे। श्रृंखला के पहले अंक में आज हम राग भैरव के स्वरो से विभिन्न रोगों के उपचार पर चर्चा करेंगे और आपको राग भैरव में निबद्ध एक ध्रुपद सुनवाएँगे जिसे उस्ताद सइदुद्दीन डागर ने प्रस्तुत किया है। इसके साथ ही “स्वरगोष्ठी” की परम्परा के अनुसार लता मंगेशकर के स्वर में राग भैरव पर आधारित फिल्म – “जागते रहो” का एक गीत भी प्रस्तुत करेंगे।



राग भैरव भारतीय संगीत का एक प्राचीन राग है। इस राग के गायन, वादन अथवा श्रवण से कई शारीरिक और मानसिक रोगों से मुक्ति मिल सकती है। राग भैरव के आरोह के स्वर हैं; सा, रे(कोमल), ग, म, प, (कोमल), नि, सां तथा अवरोह के स्वर हैं; सां, नि, (कोमल), प, म, ग, रे(कोमल), सा। इसके मुख्य स्वर हैं; ग, म, (कोमल), प, म, प, ग, म, रे(कोमल), सा, ग, म, (कोमल) स्वरावलियों के द्वारा प्रिय के निधन से हुए मानसिक आघात एवं प्रबल शोक-भाव के कारण उत्पन्न आवेगयुक्त प्रबल पुकार का भाव महसूस होता है। उक्त भाव में आंशिक स्थिरता का अनुभव पंचम स्वर पर आने से होता है। ग, म, रे(कोमल), सा, स्वरों के माध्यम से उक्त शोक-भाव में आंशिक शान्ति का अनुभव होता है। ग, म, (कोमल), नि, - सां, रें, सां, - नि, (कोमल), प, के द्वारा शोक-भाव में तीव्रता तथा अवरोहात्मक प्रक्रिया में शान्तिपूर्ण स्थिरता का भाव महसूस होता है। इस राग के स्वरों को स्वरयोग विधि से गायन अथवा इस राग के गायन या वादन का श्रवण करने से मानसिक आघात, विषाद के साथ-साथ उक्त मानसिक समस्याओं के कारण उत्पन्न उच्च रक्तचाप, सिरदर्द, चक्कर, ज्वर, स्वांस फूलना आदि विकारों से मुक्ति मिल सकती है। लीजिए, अब आप राग भैरव में निबद्ध भारतीय संगीत की एक प्राचीन शैली, ध्रुपद अथवा ध्रुवपद की एक रचना सुनिए। इसे सुप्रसिद्ध गायक उस्ताद सइदुद्दीन डागर ने स्वर दिया है।

राग भैरव : ध्रुपद : “आदि मध्य अन्त शिव आली...” : उस्ताद सइदुद्दीन डागर


आज का प्रातःकालीन राग भैरव इसी नाम से प्रचलित भैरव थाट का आश्रय राग है। इस राग का गायन अथवा वादन प्रातःकालीन सन्धिप्रकाश काल में किया जाता है। राग भैरव सम्पूर्ण जाति का राग है किन्तु इसमें ऋषभ और धैवत स्वर कोमल प्रयोग होता है। इसका वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर ऋषभ होता है। ऋषभ और धैवत स्वर पर आन्दोलन किया जाता है। यह गम्भीर प्रकृति का राग है, जिसमें ध्रुपद, विलम्बित व द्रुत खयाल और तराना गाया-बजाया जाता है। इस राग में ठुमरी नाही गायी जाती। राग भैरव पर आधारित फिल्मी गीतों में से एक अत्यन्त मनमोहक गीत आज हमने चुना है। 1956 में विख्यात फ़िल्मकार राज कपूर ने महत्वाकांक्षी फिल्म ‘जागते रहो’ का निर्माण किया था। इस फिल्म के संगीतकार सलिल चौधरी का चुनाव स्वयं राज कपूर ने ही किया था, जबकि उस समय तक शंकर-जयकिशन उनकी फिल्मों के स्थायी संगीतकार बन चुके थे। फिल्म ‘जागते रहो’ बाँग्ला फिल्म ‘एक दिन रात्रे’ का हिन्दी संस्करण था और बाँग्ला संस्करण के संगीतकार सलिल चौधरी को ही हिन्दी संस्करण के संगीत निर्देशन का दायित्व दिया गया था। सलिल चौधरी ने इस फिल्म के गीतों में पर्याप्त विविधता रखी। इस फिल्म में उन्होने एक गीत ‘जागो मोहन प्यारे, जागो...’ की संगीत रचना भैरव राग के स्वरों पर आधारित की थी। राग भैरव की एक पारम्परिक रचना की स्थायी की पंक्तियाँ बरकरार रखते हुए शैलेन्द्र ने गीत के अन्तरे को लिखा। यह गीत जब लता मंगेशकर के स्वरों में ढला, तब यह गीत हिन्दी फिल्म संगीत का मीलस्तम्भ बन गया। आइए, आज हम राग ‘भैरव’ पर आधारित, फिल्म ‘जागते रहो’ का यह गीत सुनते हैं। आप इस गीत का रसास्वादन करें और हमें श्रृंखला की पहली कड़ी को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग भैरव : ‘जागो मोहन प्यारे...’ : लता मंगेशकर और साथी : फिल्म - जागते रहो




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 372वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको आठवें दशक की एक फिल्म से रागबद्ध गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 380वें अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के तीसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का स्पर्श है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस गायिका के स्वर है।?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 9 जून, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 374वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 370वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1985 में प्रदर्शित फिल्म ‘सुर संगम” के एक रागबद्ध गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न के उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – मालकौंस, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल - तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; गायक – पण्डित राजन मिश्र

“स्वरगोष्ठी” की इस पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, मुम्बई, महाराष्ट्र से शुभा खाण्डेकर, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर आज से आरम्भ हमारी महत्त्वाकांक्षी श्रृंखला “राग से रोगोपचार” की पहली कड़ी में आपने कुछ शारीरिक और मनोशारीरिक रोगों के उपचार में सहयोगी राग भैरव का परिचय प्राप्त किया और इस राग में पिरोया एक ध्रुपद रचना का उस्ताद सइदुद्दीन डागर के स्वर में रसास्वादन किया। इसके साथ ही इसी राग पर आधारित फिल्म “जागते रहो” का एक फिल्मी गीत कोकिलकण्ठी लता मंगेशकर के स्वर में सुना। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


शोध व आलेख : पं. श्रीकुमार मिश्र   
सम्पादन व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग भैरव : SWARGOSHTHI – 372 : RAG BHAIRAV : 3 जून, 2018

Saturday, October 15, 2016

"जाने कहाँ गए वो दिन...", कौन कौन से थे इस गीत के वो तीन अन्तरे जो जारी नहीं हुए?



एक गीत सौ कहानियाँ - 95
'जाने कहाँ गए वो दिन ...' 




रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 95-वीं कड़ी में आज जानिए 1970 की फ़िल्म ’मेरा नाम जोकर’ के मशहूर गीत "जाने कहाँ गए वो दिन..." के बारे में जिसे मुकेश ने गाया था। बोल हसरत जयपुरी के और संगीत शंकर-जयकिशन का।

मुकेश, दत्ताराम, हसरत
फ़िल्म ’मेरा नाम जोकर’ के तमाम गीतों में से जो दिल सबसे ज़्यादा दिल को छू लेता है, वह गीत है "जाने कहाँ गए वो दिन, कहते थे तेरी राह में नज़रों को हम बिछायेंगे..."। इस गीत में हमें भले दो अन्तरे सुनाई पड़ते हैं, पर असल में इस गीत के लिए तीन नहीं चार नहीं पूरे के पूरे पाँच अन्तरे लिखे गए थे। जो हमें सुनाई देते हैं, वो दो अन्तरे ये रहे...

मेरे क़दम जहाँ पड़े सजदे किए थे यार ने,
मुझको रुला रुला दिया जाती हुई बहार ने।

अपनी नज़र में आजकल दिन भी अन्धेरी रात है,
साया ही अपने साथ था, साया ही अपने साथ है।


लेकिन जब इस गीत को रेकॉर्ड किया गया तब दो नहीं पूरे पाँच अन्तरों के साथ रेकॉर्ड किया गया था। बाद में, फ़िल्म की लम्बाई बहुत ज़्यादा हो रही थी, इसलिए तीन अन्तरे हटा दिए गए। गीत लिखा था हसरत जयपुरी ने और उन्होंने सिचुएशन के हिसाब केवल दो ही अन्तरे लिखे क्योंकि फ़िल्म में इस गाने के बाद सर्कस के कलाकार स्टेज पर एन्ट्री करते हैं और दूसरा गाना "जीना यहाँ मरना यहाँ" शुरु हो जाता है। म्युज़िक सिटिंग् में हसरत साहब ने जब यह गाना सुनाया तो वहाँ मुकेश जी भी मौजूद थे। मुकेश जी बोले, गीत तो बहुत अच्छा है मगर बहुत छोटा लग रहा है। इसे थोड़ा लम्बा होना चाहिए। उस वक़्त सभी को लगा कि मुकेश जी ठीक कह रहे हैं। सब ने कहा हसरत साहब से कि कुछ और अन्तरे लिख दीजिए। ये तीन अन्तरे लिखे गए... 

इस दिल के आशियाने में उनके ख़याल रह गए,
तोड़ के वो दिल चल दिए हम फिर अकेले रह गए।

मेरे निगाह-ए-शोख़ में आँसुओं के मेले रह गए,
आँसू भी मेरे कह रहे साथी तेरे किधर गए।

हमने तो अपना जानकर उनको गले लगाया था,
पत्थर को हमने पूज कर अपना ख़ुदा बनाया था।


ये तीन अन्तरे लिखे और रेकॉर्ड किए गए, पर फ़िल्म में नहीं लिए गए। मगर मुकेश जी जब भी भारत में या विदेश में शो करते थे, तो इन एक्स्ट्रा तीन अन्तरों के साथ ही पूरा गाना गाया करते थे। उन्हीं के कहने पर हसरत साहब ने ये अन्तरे लिखे थे, इसलिए उन्होंने कभी भी इन अन्तरों को अपने आप से अलग नहीं किया। भले ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड पर ये अन्तरे नहीं आए, पर हसरत साहब की मेहनत को मुकेश ने कभी नहीं भुलाया। मुकेश जी के जाने के बाद नितिन मुकेश ने भी यह गाना पाँच अन्तरों के साथ ही पर्फ़ॉर्म करना शुरु किया। 1983 में जब हसरत जयपुरी साहब विविध भारती पर जयमाला प्रस्तुत करने के लिए तशरीफ़ लाए थे, तब इस गीत को बजाने से पहले उन्होंने ये कहा था - "हाँ फ़ौजी भाइयों, फिर होशियार, अबके दिल थाम लीजिए, फिर वही एक शेर पहले अर्ज़ करूंगा। अर्ज़ किया है, आइना क्यों ना दूँ कि तमाशा कहें जिसे, ऐसा कहाँ से लाऊँ कि तुझसा कहें जिसे। "तुझसा कहें जिसे" मैंने क्यों कहा, आप ख़ुद सुन लीजिए!"

राज कपूर, हसरत, शंकर-जयकिशन, शैलेन्द्र - जाने कहाँ गए वो दिन
60 के दशक के अन्त तक आते-आते राज कपूर की टीम जैसे टूटने लग गई थी। शैलेन्द्र और शंकर जयकिशन चल बसे। ऐसे में ’मेरा नाम जोकर’ में यह गीत जैसे पुकार पुकार कर इस टीम के दिल की बात बयाँ कर रही हो। तभी तो जब शंकर जी विविध भारती पर जयमाला प्रस्तुत करने आए थे, तब उन्होंने न केवल इस गीत को बजाया, बल्कि भूमिका भी बड़े मार्मिक रूप में दी। आप भी पढ़िए - "आज जब आपको अपनी पसन्द के गाने सुनाने का मौक़ा मिला है तो एक अजीब कश्मकश में फँस गया हूँ। पिछले 25-30 सालों में इस शंकर-जयकोशन ने आपकी सेवा में इतनी सारी धुनें तैयार की हैं कि उनमें से कुछ गीतों को चुनने बैठा हूँ तो उलझ कर रह गया हूँ। किसे भूल जाऊँ, किसे याद रखूँ! सामने रेकॉर्ड्स का ढेर लगा है, हर गाने के साथ मीठी यादों के सपने सजे हैं। आँखों के सामने मानो बीती हुए दिन यूं उभर रहे हैं जैसे कोई फ़िल्म चल रही हो! पहला दृश्य उभरता है जब मैं, जयकिशन, शैलेन्द्र, हसरत, मुकेश और राज कपूर आर.के. स्टुडिओज़ में बैठे हुए हैं और हो रही है गीतों की बरसात। ’बरसात’ के बाद ’आवारा’, ’आह’, ’बूट पालिश’, ’संगम’, ’कल आज और कल’, ’जिस देश में गंगा बहती है’ और ’मेरा नाम जोकर’। और तभी जैसे फ़िल्म टूट जाती है, रोशनी हुई तो देखा कि शैलेन्द्र नहीं है, जयकिशन भी बहुत दूर जा चुका है, और जो रह गए हैं वो भी बेगाने से लगते हैं। हर एक आह पर सोचने पे मजबूर हो जाता हूँ कि "जाने कहाँ गए वो दिन"! जाने वाले कभी नहीं आते, आती हैं तो बस उनकी यादें। जयकिशन मेरा केवल पार्टनर ही नहीं बल्कि वो मेरा भाई, मेरा हमदम था। एक दूसरे के बिना हम अधूरे थे। इसलिए आज भी मैंने जय को अपने से अलग नहीं किया। आज भी डिवान पर दो हारमोनियम रखे हुए हैं। जब पुराने साथी बेगाने से लगते हैं, तब ऐसा लगता है कि जैसे जय कह रहा हो कि शंकर भाई, हिम्मत हारने से काम नहीं चलेगा, तुम हँसते रहो और आगे बढ़ते रहो!"



अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 



आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




Sunday, July 3, 2016

राग केदार : SWARGOSHTHI – 277 : RAG KEDAR और विदुषी वीणा सहस्त्रबुद्धे को श्रद्धांजलि




स्वरगोष्ठी – 277 में आज

मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन – 10 : जब राज कपूर की आवाज़ बने तलत साहब

‘मैं पागल मेरा मनवा पागल, पागल मेरी प्रीत रे...’




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों हमारी श्रृंखला – ‘मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन’ जारी है। श्रृंखला की दसवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र अपने साथी सुजॉय चटर्जी के साथ आप सभी संगीत-प्रेमियों का एक बार फिर हार्दिक स्वागत करता हूँ। यह श्रृंखला आप तक पहुँचाने के लिए हमने फिल्म संगीत के सुपरिचित इतिहासकार और ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी का सहयोग लिया है। हमारी यह श्रृंखला फिल्म जगत के चर्चित संगीतकार मदन मोहन के राग आधारित गीतों पर केन्द्रित है। श्रृंखला के प्रत्येक अंक में हम मदन मोहन के स्वरबद्ध किसी राग आधारित गीत की चर्चा और फिर उस राग की उदाहरण सहित जानकारी दे रहे हैं। गत 25 जून को हमने मदन मोहन का 93वाँ जन्मदिन मनाया। श्रृंखला की दसवीं कड़ी में आज हम आपको राग केदार के स्वरों में पिरोये गए 1952 में प्रदर्शित फिल्म ‘आशियाना’ से एक सुमधुर गीत का रसास्वादन कराएँगे। इस राग आधारित गीत को स्वर दिया है, तलत महमूद ने। संगीतकार मदन मोहन द्वारा राग केदार स्वरों पर आधारित इस गीत के साथ ही राग का यथार्थ स्वरूप उपस्थित करने के लिए हम सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी शुभा मुद्गल के स्वरों में राग केदार में निबद्ध तीनताल की एक सुमधुर बन्दिश भी प्रस्तुत कर रहे हैं।


मदन मोहन और तलत महमूद
"हालाँकि संगीत के सिद्धान्तों का ज्ञान और बुनियादी नियमों के बारे में जानना बहुत ज़रूरी है, पर यह ज़रूरी नहीं कि जिस किसी ने भी ये बातें सीख ली वो संगीत में मास्टर बन गया। संगीत को परम्परागत तरीके से किसी गुरु के चरणों में बैठ कर सीखा जाए यह ज़रूरी नहीं। मेरा ख़याल है कि संगीत कानों से भी सीखा जा सकता है अगर किसी में सीखने की मन से आकांक्षा हो तो। संगीत एक ऐसी कला है जिसे अनिच्छुक छात्रों के अन्दर ज़बरदस्ती प्रवेश नहीं कराया जा सकता किसी पाठ्यक्रम के माध्यम से। जो संगीत के लिए पागल है, वही इसमें महारथ हासिल कर सकता है। संगीत के दिग्गजों के साथ काम करने की वजह से मुझे संगीत शिक्षा को करीब से ग्रहण करने और इसे समझने का मौक़ा मिला। बहुत आसानी पर स्पष्ट तरीके से संगीत ने मुझे चारों ओर से जकड़ लिया। मुझे नहीं मालूम कब और कैसे मेरी कानों में संगीत की लहरियाँ प्रतिध्वनित होने लगी जो मैं रोज़ सुना करता था। और इसी तरीक़े से मैंने वास्तव में संगीत सीखा।" मदन मोहन के इन शब्दों का सार हम सब की समझ में आ गया होगा। आइए अब आते हैं आज के गीत पर। आज हमने चुना है तलत महमूद की आवाज़ में राग केदार पर आधारित और ताल कहरवा में निबद्ध फ़िल्म ’आशियाना’ का मशहूर गीत "मैं पागल मेरा मनवा पागल..."। मदन मोहन तलत साहब के ग़ज़ल गायकी से वाक़िफ़ थे और लखनऊ के अपने शुरुआती दिनों से ही एक दूसरे को जानते-पहचानते थे। मदन मोहन के फ़िल्म-संगीत सफ़र के शुरुआती सालों में तलत महमूद ने उनके लिए कई गीत गाए। यह सच है कि जब बाद के वर्षों में रफ़ी साहब की इण्डस्ट्री में बहुत ज़्यादा डिमाण्ड हो गई थी तब तलत साहब को उनकी तुलना में कम गाने मिलने लगे थे, तब फ़िल्म ’जहाँआरा’ के निर्देशक ने फ़िल्म के सभी गीत रफ़ी साहब की आवाज़ में रेकॉर्ड करने का सुझाव मदन मोहन को दिया। पर मदन मोहन इस बात पर अन्त तक अड़े रहे कि तलत इस फ़िल्म में कम से कम तीन गीत ज़रूर गाएँगे और बाक़ी गीत रफ़ी गाएँगे। इस बात पर उन्होंने स्वेच्छा से फ़िल्म छोड़ने का प्रस्ताव तक दे दिया निर्माता को। तब जाकर निर्माता ओम प्रकाश जी ने मदन जी को आश्वस्त किया, और मदन जी ने तलत साहब से "फिर वही शाम...", "तेरी आँख के आँसू..." और "मैं तेरी नज़र का सुरूर हूँ..." गवाया जो तलत साहब के करीअर में भी मील के पत्थर सिद्ध हुए।

तलत महमूद
अब बातें ’आशियाना’ की। 1951 में फ़िल्म ’आँखें’ के संगीत की सफलता ने उसी साल मदन मोहन को जे. बी. एच. वाडिया की एक फ़िल्म दिला दी। फ़िल्म थी ’मदहोश’। इस फ़िल्म ने उनके सामने एक नई चुनौती खड़ी कर दी। मदन जी के ही शब्दों में - "जब मैं ’मदहोश’ पर काम कर रहा था, एक दिन वाडिया साहब हाज़िर हुए एक सिचुएशन के साथ जिसके लिए वो एक प्रभावशाली गीत चाहते थे जो एक धोखा देने वाले प्रेमी के जज़्बात बयाँ करे। राजा मेंहदी अली ख़ाँ फ़िल्म ’मदहोश’ के गीत लिख रहे थे। इस सिचुएशन को सुनते ही उन्होंने कहा कि इस तरह के भाव पर उन्होंने कुछ समय पहले एक गीत लिखा है, अगर सबको ठीक लगे तो यह गीत लिया जा सकता है। उन्होंने अपनी नोटबूक निकाली और गीत पढ़ने लगे। पाँच मिनट में मैंने गीत की धुन तैयार कर दी और वाडिया साहब को सुनाया। वो बहुत ख़ुश हुए और गीत भी बड़ा पॉपुलर हुआ। वह गीत था "मेरी याद में तुम ना आँसू बहाना..."। यह मदन मोहन और तलत महमूद की जोड़ी का पहला सुपरहिट गीत था। इसके बाद "आँसू" शब्द वाले कई तलत-मदन गीत बने। ‘मदहोश’ बनने के अगले ही साल 1952 में बनी फिल्म ’आशियाना’ जिसमें राज कपूर और नरगिस की जोड़ी थी। इस फ़िल्म के संगीत ने मदन मोहन को अव्वल दर्जे के संगीतकारों की श्रेणी में ला खड़ा किया। मदन मोहन के अनुसार यह उनकी सर्वश्रेष्ठ फ़िल्मों में से एक है और ख़ास तौर से तलत महमूद का गाया "मैं पागल मेरा मनवा पागल..." उनके दिल के बहुत क़रीब है जिसे कम्पोज़ करने में उन्हें पूरा एक महीना लग गया था। संगीत की समझ रखने वाले राज कपूर भी ’आशियाना’ के गीत-संगीत से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने कहा, "अगर मेरी फ़िल्मों में सिर्फ़ इस तरह का संगीत हो तो मैं अपनी फ़िल्मों को अनन्तकाल तक थिएटरों में चला सकता हूँ।" भले इस फ़िल्म के संगीत की बहुत तारीफ हुई, पर फ़िल्म बुरी तरह से पिट गई। बहुत वर्षों के बाद जब मदन मोहन की कुछ फ़िल्में दोबारा प्रद्रशित हुईं और अब की बार हिट हुईं, तब उन्हें शीर्ष के संगीतकार का दर्जा लोगों ने दिया। लीजिए, अब आप यही गीत सुनिए।


राग केदार : “मैं पागल मेरा मनवा पागल...” : तलत महमूद : फिल्म – आशियाना


शुभा मुद्गल
भक्तिरस की अभिव्यक्ति के लिए केदार एक समर्थ राग है। कर्नाटक संगीत पद्यति में राग हमीर कल्याणी, राग केदार के समतुल्य है। औड़व-षाड़व जाति, अर्थात आरोह में पाँच और अवरोह में छह स्वरों का प्रयोग होने वाला यह राग कल्याण थाट के अन्तर्गत माना जाता है। प्राचीन ग्रन्थकार राग केदार को बिलावल थाट के अन्तर्गत मानते थे, आजकल अधिकतर गुणिजन इसे कल्याण थाट के अन्तर्गत मानते हैं। इस राग में दोनों मध्यम का प्रयोग होता है। शुद्ध मध्यम का प्रयोग आरोह और अवरोह दोनों में तथा तीव्र मध्यम का प्रयोग केवल अवरोह में किया जाता है। आरोह में ऋषभ और गान्धार स्वर और अवरोह में गान्धार स्वर वर्जित होता है। कभी-कभी अवरोह में गान्धार स्वर का अनुलगन कण का प्रयोग कर लिया जाता है। राग केदार में तीव्र मध्यम आरोह में पंचम के साथ और शुद्ध मध्यम आरोह और अवरोह दोनों में प्रयोग किया जाता है। कभी-कभी अवरोह में धैवत से मध्यम को जाते समय मींड़ के साथ दोनों मध्यम एक साथ प्रयोग किया जाता है। यह प्रयोग रंजकता से परिपूर्ण होता है। राग हमीर के समान राग केदार में कभी-कभी अवरोह में मधुरता बढ़ाने के लिए कोमल निषाद विवादी स्वर के रूप में प्रयोग किया जाता है। राग का चलन वक्र होता है, किन्तु तानों में वक्रता का नियम शिथिल हो जाता है। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। इस दृष्टि से यह उत्तरांग प्रधान राग होगा, क्योंकि मध्यम स्वर उत्तरांग का और षडज स्वर पूर्वांग का स्वर होता है। मध्यम स्वर का समावेश सप्तक के पूर्वांग में नहीं हो सकता। राग का एक नियम यह भी है कि वादी-संवादी दोनों स्वर सप्तक के एक अंग में नहीं हो सकते। इस दृष्टि से यह राग उत्तरांग प्रधान तथा दिन के उत्तर अंग में अर्थात रात्रि 12 बजे से दिन के 12 बजे के बीच गाया-बजाया जाना चाहिए। परन्तु राग केदार प्रचलन में इसके ठीक विपरीत रात्रि के पहले प्रहर में ही गाया-बजाया जाता है। राग केदार उपरोक्त नियम का अपवाद है। इस राग का गायन-वादन रात्रि के पहले प्रहर में किया जाता है। राग केदार का स्पष्ट अनुभव करने के लिए अब हम आपको इस राग के स्वरों से अभिसिंचित एक सुमधुर बन्दिश सुनवा रहे हैं। यह खयाल रचना विख्यात गायिका विदुषी शुभा मुद्गल ने प्रस्तुत किया है। शुभा जी से आप तीनताल में निबद्ध राग केदार की यह रचना सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग केदार : “काहे सुन्दरवा बोलो नाहिं...” : विदुषी शुभा मुद्गल




संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 277वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक बार पुनः मदन मोहन के राग आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 280वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के तीसरे सत्र (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश को सुन कर आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गीत की गायिका की आवाज़ को पहचान रहे हैं? हमें उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 9 जुलाई, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 279वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 275 की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1970 में प्रदर्शित फिल्म ‘दस्तक’ से राग आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – चारुकेशी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – कहरवा और सितारखानी तीसरे प्रश्न का उत्तर है- पार्श्वगायिका – लता मंगेशकर

इस बार की संगीत पहेली में पाँच प्रतिभागियों ने तीनों प्रश्नों का सही उत्तर देकर विजेता बनने का गौरव प्राप्त किया है। ये विजेता हैं - वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। सभी पाँच विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

हार्दिक श्रद्धांजलि : विदुषी वीणा सहस्त्रबुद्धे


खयाल, टप्पा और भजन की सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी वीणा सहस्त्रबुद्धे का गत 29 जून को निधन हो गया। उनके निधन से ग्वालियर धराने की गायकी का एक सितारा अस्त हो गया। उनकी गायकी में ग्वालियर घराने के साथ-साथ जयपुर और किराना घराने की गायकी की झलक भी मिलती थी। उनका जन्म 14 सितम्बर 1948 को संगीतज्ञों के परिवार में हुआ था। उनके पिता पण्डित शंकर श्रीपाद बोड़स ग्वालियर घराने के विख्यात संगीतज्ञ और पण्डित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर के शिष्य थे। वीणा जी की संगीत-शिक्षा पहले अपने पिता से और बाद में अपने अग्रज पण्डित काशीनाथ बोड़स से प्राप्त हुई। आगे चल कर उन्हें वरिष्ठ संगीतज्ञों, पण्डित बलवन्तराव भट्ट, पण्डित वसन्त ठकार और पण्डित गजाननराव जोशी का मार्गदर्शन भी प्राप्त हुआ। वर्ष 1968 में वीणा जी ने कानपुर विश्वविद्यालय से संगीत, संस्कृत और अँग्रेजी विषय से स्नातक, 1969 में अखिल भारतीय गन्धर्व मण्डल से संगीत में स्नातकोत्तर परीक्षा उत्तीर्ण की। आगे चल कर 1979 में उन्होने कानपुर विश्वविद्यालय से संस्कृत में स्नातकोत्तर और 1988 में अखिल भारतीय गन्धर्व मण्डल से डॉक्ट्रेट की उपाधि अर्जित की। 1968 में उनका विवाह श्री हरि सहस्त्रबुद्धे से हुआ। वर्ष 1972 में वीणा जी को आकाशवाणी का राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुआ। 1993 में उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से अलंकृत किया गया। 2013 का केन्द्रीय संगीत नाटक अकादमी का पुरस्कार जब भारत के राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने उन्हें प्रदान किया, उसी वर्ष वह एक असाध्य रोग से ग्रसित हो गई थीं। उन्हे पुरस्कार समारोह में व्हील चेयर पर ले जाया गया था। इसी रोग से ग्रसित होकर गत 29 जून को उनका निधन हो गया। निधन से लगभग दस दिन पूर्व ‘स्वरगोष्ठी’ के 275वें अंक का प्रकाशन 19 जून को किया गया था, जिसमें वीणा जी के स्वर में राग छायानट में निबद्ध खयाल प्रस्तुत किया गया था। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ परिवार विदुषी वीणा सहस्त्रबुद्धे की स्मृतियों को नमन करता है और उन्हे अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है।
अगले रविवार को श्रृंखला की एक एक नई कड़ी के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।  

शोध एवं आलेख : सुजॉय चटर्जी 
 प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



Saturday, June 4, 2016

"हर दिल जो प्यार करेगा, वो गाना गाएगा...", क्यों राज कपूर ने किया था महेन्द्र कपूर से गीत गवाने का वादा?


एक गीत सौ कहानियाँ - 83
 

'हर दिल जो प्यार करेगा, वो गाना गाएगा...' 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना
रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'।इसकी 83-वीं कड़ी में आज जानिए 1964 की मशहूर फ़िल्म ’संगम’ के गीत "हर दिल जो प्यार करेगा वो गाना गाएगा..." के बारे में जिसे लता मंगेशकर, मुकेश और महेन्द्र कपूर ने गाया था। बोल शैलेन्द्र के और संगीत शंकर जयकिशन का। 


बात 60 के दशक के शुरुआत की होगी, एक स्टेज शो के लिए राज कपूर ताशकन्द गए और अपने साथ महेन्द्र कपूर जी को भी ले गए। ताशकन्द उस समय USSR का हिस्सा हुआ करता था। और रूस में राज कपूर बहुत लोकप्रिय थे। राज कपूर का शो ज़बरदस्त हिट शो, इस शो में राज कपूर ने भी कुछ गाने गाए, उन गानों पर महेन्द्र कपूर ने हारमोनियम बजा कर राज कपूर का साथ दिया। इस शो के लिए महेन्द्र कपूर ने ख़ास तौर से हिन्दी गानों का रूसी भाषा में अनुवाद करके तैयार कर रखा था। जब उनके गाने की बारी आई तब उन्होंने फ़िल्म ’हमराज़’ का गीत "नीले गगन के तले..." को रूसी भाषा में जो गाया तो लोग झूम उठे। और महेन्द्र कपूर का नाम लेकर "once more, once more" का शोर मचाने लगे। जनता का यह रेस्पॉन्स देख कर राज कपूर ने महेन्द्र कपूर से कहा कि "देखा, एक कपूर ही दूसरे कपूर को मात दे सकता है!" शायद इसलिए कहा होगा कि राज कपूर की परफ़ॉरमैन्स के बाद महेन्द्र कपूर को रूसी जनता से उनके गीत का जो रेसपॉन्स मिला वो राज कपूर उम्मीद नहीं कर रहे थे। ज़ाहिर है कि राज कपूर के रेसपॉन्स से महेन्द्र कपूर को रेसपॉन्स ज़्यादा मिला। राज कपूर महेन्द्र कपूर से बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने महेन्द्र से कहा कि मैं चाह कर भी मेरे गाने तुमसे नहीं गवा सकता क्योंकि तुम तो जानते ही हो कि मेरी आवाज़ मुकेश है, मेरे सारे गाने मुकेश ही गाते हैं। महेन्द्र जी बोले, "मुकेश जी मेरे बहुत अच्छे मित्र हैं, इसलिए मैं चाहता भी नहीं कि उनके गाने मैं गाऊँ"। इस पर राज साहब बोले कि लेकिन मैं एक वादा करता हूँ कि मेरी अगली फ़िल्म में जो दूसरा हीरो होगा, उसके लिए तुम ही गाना गाओगे। महेन्द्र कपूर ने मज़ाक में राज कपूर से कहा कि "राज जी, आप बहुत बड़े आदमी हैं, भारत लौट कर आपको यह वादा कहाँ याद रहेगा?" उस वक़्त राज कपूर सिगरेट पी रहे थे, सिगरेट की एक कश लेकर मुंह से निकाली सिगरेट और जलती हुई सिगरेट से अपने हाथ पे एक निशान दाग़ दिया और बोले, "तुम फ़िकर मत करो, यह जला निशान मुझे अपना वादा भूलने नहीं देगा।"

इस घटना के बाद जब राज कपूर और महेन्द्र कपूर हिन्दुस्तान लौट कर आए तो राज कपूर ने अपने वादे के अनुसार अगली ही फ़िल्म ’संगम’ में दूसरे नायक राजेन्द्र कुमार के लिए महेन्द्र कपूर की आवाज़ में गाना रेकॉर्ड किया और ताशकन्द में किए अपने वादे को निभाया। गाना था "हर दिल जो प्यार करेगा, वो गाना गाएगा, दीवाना सैंकड़ों में पहचाना जाएगा..."। इस गीत के साथ महेन्द्र कपूर की कुछ यादें मुकेश की भी जुड़ी हुई हैं। विविध भारती के ’उजाले उनकी यादों में’ कार्यक्रम में इस बारे में महेन्द्र जी ने कहा था, "मुझे जब "नीले गगन के तले..." के लिए फ़िल्मफ़ेअर अवार्ड मिला, तो किसी भी दूसरे सिंगर ने मुझे फ़ोन करके बधाई नहीं दी। एक रात मेरा नौकर आकर मुझसे कहा कि बाहर मुकेश जी आए हैं, आप से मिलना चाहते हैं। मैं तो हैरान रह गया कि मुकेश जी आए हैं मेरे घर। मैं भागता हुआ बाहर गया तो बोले, आओ यार, मेरी पत्नी से कहा कि भौजी, लड्डू शड्डू बाँटों। फिर मुझसे कहा कि ऐसे ही काम करते रहो, बहुत अच्छा होगा तुम्हारा। उन्हें कोई कॉम्प्लेक्स नहीं था कि कौन छोटा है कौन बड़ा है। एक बार मेरे बेटे के स्कूल के प्रिन्सिपल ने मुझसे अनुरोध किया कि आप मुकेश जी से अनुरोध करें कि हमारे स्कूल के फ़ंक्शन में आएँ। मैंने कहा कि ठीक है मैं उनसे कहूँगा। उस समय हम ’संगम’ के गीत की रेकॉर्डिंग् पर मिल रहे थे। मैंने उनसे कहा कि ऐसा है, मेरे बेटे के स्कूल फ़ंक्शन में आप गाएँगे? उन्होंने कहा कि हाँ, गा दूँगा। तो मैंने उनसे पूछा कि आप पैसे कितने लेंगे? उन्होंने कहा कि वो 3000 लेते हैं। मुकेश जी ने यह भी कहा कि वो वहाँ पर ज़्यादा देर नहीं ठहरेंगे, गाना गा कर आ जाएँगे। तो मैंने स्कूल के प्रिन्सिपल से कह दिया कि मुकेश जी गाएँगे और गाना हो जाने के बाद उन्हें 3000 रुपये उसी वक़्त दे दिया जाए। तो मुकेश जी वहाँ गए, सात-आठ गाने गाए, लेकिन पैसे लिए बिना ही वापस चले गए। अगले दिन जब वो मुझसे मिले तो कहा कि कल बड़ा मज़ा आया स्कूल में बच्चों के साथ। मैंने पूछा कि मुकेश जी, आपने पैसे तो ले लिए थे ना? वो बोले, कैसे पैसे? मैंने कहा कि आप ने जो कहा था कि 3000 रुपये? बोले, मैंने कहा था कि मैं 3000 लेता हूँ, पर यह नहीं कहा था कि मैं 3000 लूँगा। महेन्द्र, एक बात बताओ, अगर कल नितिन उसके महेन्द्र अंकल से कहेगा कि चाचाजी, आप मेरे स्कूल में गाना गाओ तो क्या आप उसके लिए पैसे लोगे?" लीजिए अब अप फिल्म 'संगम' का वही गीत सुनिए। 




अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 



आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




Saturday, October 17, 2015

"एक राधा एक मीरा..." - इसी गीत के दम पर लिखी गई थी ’राम तेरी गंगा मैली’ की कहानी


एक गीत सौ कहानियाँ - 68
 

'एक राधा एक मीरा...' 




रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 68-वीं कड़ी में आज श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं आशा फ़िल्म जगत के सुप्रसिद्ध गीतकार, संगीतकार व गायक रवीन्द्र जैन को जिनका 9 अक्टुबर 2015 को निधन हो गया। गीत है लता मंगेशकर का गाया फ़िल्म ’राम तेरी गंगा मैली’ का, "एक राधा एक मीरा, दोनो ने श्याम को चाहा..."। रवीन्द्र जैन के जितने सुन्दर बोल हैं इस गीत में, उतना ही सुरीला है उनका इस गीत का संगीत।



"तू जो मेरे सुर में सुर मिला ले, संग गा ले, तो ज़िन्दगी हो जाए सफल", कुछ ऐसा कहा था रवीन्द्र जैन ने फ़िल्म ’चितचोर’ के एक गीत में। ज़िन्दगी, जिसने रवीन्द्र जैन के साथ एक बहुत ही अफ़सोस-जनक मज़ाक किया उनसे उनकी आँखों की रोशनी छीन कर, उसी ज़िन्दगी को जैन साहब ने एक चुनौती की तरह लिया और अपनी ज़िन्दगी को सफल बना कर दिखाया। ज़िन्दगी ने तो उनसे एक बहुत बड़ी चीज़ छीन ली, पर उन्होंने इस दुनिया को अपने अमर गीत-संगीत के माध्यम से बहुत कुछ दिया। रवीन्द्र जैन जैसे महान कलाकार और साधक शारीरिक रूप से भले इस संसार को छोड़ कर चले जाएँ, पर उनकी कला, उनका काम हमेशा अमर रहता है, आने वाली पीढ़ियों को मार्ग दिखाता है। रवीन्द्र जैन के लिखे गीतों की विशेषता यह रही कि उनमें कभी किसी तरह का सस्तापन या चल्ताउ क़िस्म के बोल नज़र नहीं आए। चाहे फ़िल्म चले ना चले, चाहे गीत चले ना चले, उन्होंने कभी अपने गीतों के स्तर और अर्थपूर्णता के साथ समझौता नहीं किया। यूं तो मीराबाई के अपने लिखे भजनों की कमी नहीं है, और ना ही राधा-कृष्ण के उपर बनने वाले गीतों की संख्या कुछ कम है, पर हमारे प्यारे दादु ने ऐसे दो गीत लिख कर हमें दिए जिनमें मीराबाई और राधा के कृष्ण-प्रेम में जो अन्तर है उन्हें उजागर किया बड़े ही सुन्दर शब्दों में। ये दोनों गीत इतने लोकप्रिय हुए कि चाहे कितनी ही बार क्यों न इन्हें सुन ले, इनकी ताज़गी वहीं की वहीं बरकरार है। इनमें पहला गीत है फ़िल्म ’गीत गाता चल’ का "श्याम तेरी बंसी पुकारे राधा नाम, लोग करे मीरा को यूंही बदनाम", और दूसरा गीत है "एक राधा एक मीरा, दोनों ने श्याम को चाहा, अन्तर क्या दोनों की प्रीत में बोलो, एक प्रेम दीवानी, एक दरस दीवानी..."।


जिस दिन रवीन्द्र जैन के बेटे का जन्म हुआ था, उसी दिन उन्हें राज कपूर से यह ख़ुशख़बरी मिली थी कि जैन साहब को 'राम तेरी गंगा मैली' के लिए गीतकार-संगीतकार चुन लिया गया है। आगे रवीन्द्र जैन साहब की ज़ुबानी पढ़िए - "राज साहब को एक दिन ऐसे ही मैंने कह दिया था कि राज साहब, एक दिन में दो अच्छी ख़बरें मिलना तो मुश्किल है, तो 'राम तेरी गंगा मैली' मिल गई, सबसे बड़ी ख़बर है, उनके मन में यह बात कैसे बैठ गई थी, उन्होंने मुझे बुलाया और शिरडी ले गए, शिरडी ले जाके कृष्णा भाभी को उन्होंने फ़ोन किया था, तब मुझे पता चला कि मेरे लिए वो बेटा माँगने आए थे। राज साहब को जो पसंद आ गया न, या उनके मेण्टल लेवेल पे जो फ़िट बैठ गया न, उनको लगता था कि मेरा काम होनेवाला है। उसका बड़ा पर्सोनल केयर करते थे और हर तरह से ख़ुश रखते थे और 'he knew how to take out the work', और कैसे डील करना है अपने कम्पोज़र से, अपने नए आर्टिस्ट्स से, किस तरह 'best of their capability' काम कराना है, वो बहुत अच्छी तरह जानते थे। एक बार, हमारे कॉमन फ़्रेण्ड थे टी. पी. झुनझुनवाला साहब, वो इन्कम टैक्स कमिशनर थे, मुंबई में भी थे, लेकिन बेसिकली दिल्ली में रहते थे। तो वहाँ उनकी बिटिया की शादी थी। तो जैसे शादियों में संगीत की महफ़िल होती है, मैं भी गया था, मैं, हेमलता, दिव्या (रवीन्द्र जैन की पत्नी), टी.पी. भाईसाहब, हम सब लोग वहाँ पे थे। टी.पी. साहब ने ज़िक्र किया कि दादु, राज साहब को गाना सुनाओ। यह गीत मैंने 'जीवन' फ़िल्म के लिए लिखा था, 'राजश्री' वालों के लिए। दो ऐसे गीत हैं जो दूसरी फ़िल्म में आ गए, उसमें से एक है 'अखियों के झरोखों से' का टाइटल सॉंग, सिप्पी साहब के लिए लिखा था जो 'घर' फ़िल्म बना रहे थे, लेकिन वो कुछ ऐसी बात हो गई कि उनके डिरेक्टर को पसन्द नहीं आया, उनको गाना ठंडा लगा। तो मैंने राज बाबू को सुना दिया तो उन्होंने यह टाइटल रख लिया। फिर सिप्पी साहब ने वही गाना माँगा मुझसे, मैंने कहा कि अब तो मैंने गाना दे दिया किसी को। बाद में ज़रा वो नाख़ुश भी हो गए थे। तो यह गाना 'जीवन' फ़िल्म के लिए, प्रशान्त नन्दा जी डिरेक्ट करने वाले थे, उसके लिए "एक राधा एक मीरा" लिखा था मैंने। तो राज साहब वहाँ बैठे थे। तो यह गाना जब सुनाया तो राज साहब ने दिव्या से पूछा कि यह गीत किसी को दिया तो नहीं? मैंने कहा कि नहीं, दिया तो नहीं! राज साहब तीन दिन थे और तीनो दिन वो मुझसे यह गाना सुनते रहे। और टी.पी. भाईसाहब से सवा रुपय लिया और मुझे देकर कहा कि आज से यह गाना मेरा हो गया, मुझे दे दो। अब राज साहब को यह कौन पूछे कि इसका क्या करेंगे, न कोई कहानी है, न कोई बात। तो वहीं उन्होंने यह गीत तय कर लिया, फिर मुझे बम्बई बुलाया, कुछ गानें सुने, 'and he gave me a token of Rs 5000' कि तुम आज से RK के म्युज़िक डिरेक्टर हो गए।"

इस तरह से "एक राधा एक मीरा" वह गीत था जिसकी बदौलत राज कपूर ने रवीन्द्र जैन को RK Camp में एन्ट्री दी, और यही नहीं इसी गीत को ही आधार बनाकर 'राम तेरी गंगा मैली' की कहानी भी लिखी गई। कितनी मज़ेदार व आश्चर्य कर देने वाली बात है कि राज कपूर को एक गीत इतना अच्छा लगा कि गीत के भाव को लेकर पूरी की पूरी फ़िल्म बना डाली! और इस गीत के तो वाकई क्या कहने। राधा और मीरा के श्रीकृष्ण प्रेम में अन्तर को शायद इससे सुन्दर अभिव्यक्ति नहीं मिल सकती। रवीन्द्र जैन ने जिस काव्यात्मक तरीके से इस अन्तर को व्यक्त किया है, इस गीत के लिए दादु को शत शत नमन।


एक राधा एक मीरा,
दोनों ने श्याम को चाहा,
अन्तर क्या दोनों की चाह में बोलो,
एक प्रेम दीवानी, एक दरस दीवानी।

राधा ने मधुबन में ढूंढा,
मीरा ने मन में पाया,
राधा जिसे खो बैठी वो गोविन्द
मीरा हाथ बिकाया,
एक मुरली एक पायल
एक पगली एक घायल
अन्तर क्या दोनों की प्रीत में बोलो,
एक सूरत लुभानी, एक मूरत लुभानी।

मीरा के प्रभु गिरिधर नागर,
राधा के मनमोहन,
राधा नित शृंगार करे,
और मीरा बन गई जोगन,
एक रानी एक दासी
दोनों हरि प्रेम की प्यासी,
अन्तर क्या दोनों की तृप्ति में बोलो,
एक जीत न मानी, एक हार न मानी।

तो आइए सुनते हैं राग किरवानी पर आधारित यह गीत :- 


फिल्म 'राम तेरी गंगा मैली' : "एक राधा एक मीरा...' : लता मंगेशकर : रवीन्द्र जैन 



अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




Saturday, May 17, 2014

"मैं हूँ ख़ुशरंग हिना" - फ़िल्म इतिहास में कोई रंग नहीं राज कपूर की फ़िल्मों के बिना


एक गीत सौ कहानियाँ - 31
 

मैं हूँ ख़ुशरंग हिना...




'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारी ज़िन्दगियों से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कम सुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह साप्ताहिक स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 31वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म 'हिना' के लोकप्रिय शीर्षक गीत "मैं हूँ ख़ुशरंग हिना" के बारे में।


राज कपूर न केवल एक फ़िल्मकार थे, संगीत की समझ भी उनमें उतनी ही थी। और यही कारण था कि उनकी समस्त फ़िल्मों का संगीत सफल रहा है, सदाबहार रहा है। हिट फ़िल्मों की तो बात ही छोड़ देते हैं, उनकी असफल फ़िल्मों के गीत भी सदाबहार रहे हैं। हर गीत के लिए वो उतनी ही मेहनत करते थे जितनी मेहनत फ़िल्म के अन्य पक्षों के लिए। एक-एक गीत में वो ख़ुद लगे रहते थे गीतकार-संगीतकार के साथ। गीतकार और संगीतकार से हर गीत में फेर- बदल करवाते थे। आसानी से किसी गीत को स्वीकृति देना राज कपूर की आदत नहीं थी। इसके चलते उनके गीतकारों और संगीतकारों को कड़ी मेहनत करनी पड़ती। गीतकार नक्श ल्यायलपुरी ने एक साक्षात्कार में कहा था कि वो जब फ़िल्म 'हिना' के लिए "चिट्ठिये दर्द फ़िराक़ वालिये" गीत लिख कर लाये, तो उसे पढ़ कर राज कपूर ने यह कहा कि यह पहला गाना है जिसे मैं बिना किसी फेर-बदल करवाये अप्रूव कर रहा हूँ। नक्श ल्यायलपुरी के लिए यह गर्व की बात थी। फ़िल्म 'हिना' की बात चली है तो बता दें कि 1985 में 'राम तेरी गंगा मैली' की अपार सफलता के बाद राज कपूर का अगला बड़ा प्रोजेक्ट था 'हिना'। यह फ़िल्म रिलीज़ तो हुई 1991 में, पर इसका निर्माण काफ़ी पहले से ही शुरू हो चुका था। बल्कि 'राम तेरी गंगा मैली' फ़िल्म के गीतों के रेकॉर्डिंग के समय से ही राज कपूर और रवीन्द्र जैन के बीच फ़िल्म 'हिना' के गीतों की चर्चा शुरू हो चुकी थी। 1988 में राज कपूर के निधन के बाद उनके बेटे रणधीर कपूर ने फ़िल्म की कमान सम्भाली और इसे पूरी सफलता के साथ अंजाम दिया और इसे एक यादगार फ़िल्म के रूप में स्थापित किया। राज कपूर अपनी फ़िल्मों को पर्फ़ेक्ट बनाने के लिए किस हद तक जा सकते थे, फ़िल्म 'हिना' से जुड़ी दो बातों से पता चलता है। पहली बात तो यह कि फ़िल्म की कहानी कुछ ऐसी थी कि नायक नदी में बह कर भारत से पाक़िस्तान जा पहुँचते हैं और वहीं एक पाक़िस्तानी लड़की के सम्पर्क में आते हैं। इस नायिका की भूमिका के लिए राज कपूर ने किसी भारतीय अभिनेत्री को न चुन कर एक लम्बी खोज के बाद पाक़िस्तानी नायिका ज़ेबा को चुना। इतना ही नहीं, पाक़िस्तानी किरदारों के संवाद लेखन के लिए पाक़िस्तान की जानी-मानी लेखिका हसीना मोइन को राज़ी करवाया। बहुत कम फ़िल्मकार इतनी दूर की सोचते हैं। 

और अब आते हैं दूसरे क़िस्से पर जो एक बार फिर साबित करेगा राज कपूर के अपने फ़िल्म-निर्माण के प्रति समर्पण को। इस क़िस्से के बारे में फ़िल्म के संगीतकार (व कुछ गीतों के गीतकार) रवीन्द्र जैन के अपने शब्दों में- 'हिना' के साथ भी बड़ा मज़ेदार क़िस्सा हुआ। वो किस्सा बयाँ करने से पहले मैं सागर साहब (रामानन्द सागर) को प्रणाम करता हूँ, कल तक हमारे साथ थे; 'रामायण' जो हमारा महाकाव्य, जिसको उन्होंने घर-घर पहुँचाया, अपने नाम के अनुरूप, राम का आनन्द और उसका सागर, आनन्द का सागर बहाने वाले, घर-घर पहुँचाने वाले रामानन्द सागर, उनका यह सीरियल कर रहा था मैं, 'रामायण'। तो उनका एक गाना रेकॉर्ड करके उसी दिन फिर मैंने वह गाना राज साहब को सुनाया। वह गाना था, सिचुएशन बहुत अजीब थी, कैकेयी और भरत के बीच में था, भरत ने कभी माँ बुलाया नहीं उनको, तो उनकी आपस में बातचीत हो रही थी कहीं, और एक फ़कीर को हमने गाना दिया, बैकग्राउण्ड से गा रहा था, "ओ मैया तैने का ठानी मन में, राम-सिया भेज देरी बन में"। मैंने यह गा कर राज साहब को सुनाया और कहा कि यह गाना आज मैंने रेकॉर्ड किया है। तो उन्होंने कहा कि देख देख देख, तूने यह गाना सुनाया न, मेरे रोंगटे खड़े हो गये, देख देख देख। यह सुन कर मुझे बड़ा अच्छा लगा, लेकिन अगले ही पल वो अपनी पत्नी की तरफ़ देख कर बोले कि अब ये 'हिना' नहीं कर सकता। मैंने सोचा कि मर गये, यह क्या हो गया! मैं सोच में पड़ गया कि क्या करें! फिर उस दिन तो मैं चला आया वहाँ से। मेरा बड़ा मन था कि यह इतना बड़ा प्रोजेक्ट मेरे हाथ से चला जायेगा! तो करीब-करीब सात दिन बाद मुझे इनका फोन आया, जो राज साहब के यहाँ प्रोडक्शन देखते थे, उन्होंने कहा कि राज साहब ने कहा है कि उनके साथ श्रीनगर चलना है। तो मैं, मेरी पत्नी दिव्या, राज जी और कृष्णा भाभी, हम लोग कश्मीर गये। कुछ नहीं साहब, कोई ज़िक्र नहीं फ़िल्म का, न गीत-संगीत का, बस चलो आज यहाँ, कल वहाँ, शिकारे में घूमो, यहाँ खाना खाओ, चलो ये करो वो करो, यही सब करते रहे पूरे 25 दिनों तक। और इधर मुंबई में मेरा सारा काम पेन्डिंग पड़ा हुआ है। तो 25 दिनों बाद मुम्बई लौटने पर मुझे पता चला कि यह सब ताम-झाम राज जी ने इसलिए किया ताकि मेरे दिमाग़ से 'रामायण' निकाल दे और 'हिना' डाल दे। ताकि मैं खुले दिमाग से 'हिना' के बारे में सोच सकूँ। इसके लिए इन्होंने इतनी कोशिश की, मुझे कश्मीर ले गये, लोगों से मिलवाया, कास्ट के जो लोग थे, बंजारे, उनको बुलाया, तो ये सब प्रयत्न  'हिना' के लिए था। आप ही बताइये उनके अलावा कौन सा फ़िल्मकार इस हद तक जा सकता है अपनी फ़िल्म के संगीत के लिए जो सर्वोत्तम है, वह सुनिश्चित करने के लिए!

2 जून 1988 को राज कपूर चल बसे। तब तक इस फ़िल्म के केवल तीन ही गीत रेकॉर्ड हुए थे - "चिट्ठिये दर्द फ़िराक वालिये", "देर न हो जाये कहीं" और एक तीसरा गाना था जिसे बाद में फ़िल्म से हटा दिया गया था। रवीन्द्र जैन से ही पता चला कि उस समय राज कपूर एक और फ़िल्म बनाने की सोच रहे थे 'घुंघट के पट खोल'। अपने अन्तिम दिनों में राज कपूर दिल्ली गये दादा साहब फालके पुरस्कार स्वीकार करने, पर वापस नहीं लौटे। उन्हें पुर्वाभास हो गया था। तभी दिल्ली जाते हुए अपनी पत्नी से कह गये कि 'I am going as a passenger but would return as a cargo!' उनके अन्तिम समय में रवीन्द्र जैन भी उनसे मिलने गये और उनसे वादा किया कि 'हिना' बन कर रहेगा। संगीतकार के साथ राज कपूर के काम करने के तरीके के बारे में रवीन्द्र जैन ने बताया, "राज साहब अपने कलाकारों को ख़ुश रखने के लिए किसी भी हद तक जा सकते थे। उत्तम खाना-पीना, उत्तम होटल, वो कभी खर्चे की परवाह नहीं करते। हमेशा सम्मान से बात करते। उनका दिमाग़ बिल्कुल साफ़ रहता और वो जानते कि उन्हें क्या चाहिये। वो गीत के सिचुएशन को डिटेल में समझाते। वो कहते कि अगर तुम्हे और अधिक साज़िन्दे चाहिये तो ले लो, अगर ज़रूरत पड़ी तो फ़ेमस स्टुडियो की दीवारें भी तोड़ दी जाएगी, जगह बनाने के लिए, पर केवल उतने ही साज़िन्दे रखना जितनों की ज़रूरत है, न एक ज़्यादा, न एक कम।" फ़िल्म 'हिना' के शीर्षक गीत के लिए जब बातचीत चल रही थी, राज साहब समझाने लगे कि नायिका हिना का इन्ट्रोडक्शन सीन है जिसमें वो अपने बारे में ख़ुद बता रही है, इस सितुएशन पर गीत चाहिए। रवीन्द्र जैन लिख लाये "मैं हूँ ख़ुशरंग हिना, ज़िन्दगानी में कोई रंग नहीं मेरे बिना"; यह सुन कर राज साहब बहुत ख़ुश हुए और कहा कि बिल्कुल ऐसे ही मुखड़े की उन्हें उम्मीद थी।

'हिना' फ़िल्म का यह शीर्षक गीत लता मंगेशकर की आवाज़ में है। रवीन्द्र जैन ने यह स्वीकार किया है कि लता जी के साथ उनका सम्बन्ध हमेशा तनावपूर्ण रहा है। उनके अनुसार लताजी शायद यह समझती थी कि वो नये गायिकाओं (हेमलता व आरती मुखर्जी) को बढ़ावा दे रहे हैं। पर सच्चाई यह थी कि रवीन्द्र जैन के फ़िल्मों के निर्माता छोटे बजट के निर्माता थे जो या तो लता जी को अफ़ोर्ड नहीं कर पाते या लता जी के डेट्स के लिए लम्बे समय तक इन्तज़ार नहीं कर सकते थे। पर लता जी आख़िर तक रवीन्द्र जैन को ग़लत ही समझती रहीं, ऐसी धारणा है रवीन्द्र जैन साहब की। राज कपूर की फ़िल्म न होती तो शायद 'राम तेरी गंगा मैली' और 'हिना' के संगीतकार कोई और होते या फिर इन गीतों में आवाज़ किसी और गायिका की होती। वैसे लता जी की शान में रवीन्द्र जैन कहते हैं - "हमने पिछली सदी में देखा, और इस सदी में भी देख रहे हैं कि लता जी का कोई जोड़ नहीं है। ईश्वर प्रदत्त जो आवाज़ उन्होंने पायी है, वह आवाज़ फिर दोबारा किसी और को नहीं मिल सकती।" ख़ैर, "मैं हूँ ख़ुशरंग हिना" गीत का एक सैड वर्ज़न भी है जो फ़िल्म के अन्तिम सीन से पहले फ़िल्म में आता है। बोलों पर अगर ग़ौर करें तो अहसास होता है कि सैड वर्ज़न मुख्य गीत से बेहतर लिखा गया है। बहुत ही अर्थपूर्ण शब्दों में रवीन्द्र जैन ने इसे पिरोया है जिसमें लता के साथ मोहम्मद अज़ीज़ की भी आवाज़ शामिल है --

"किसलिए मासूम रूहों को तड़पने की सज़ा,
अपने बन्दों की ख़ुशी से क्यों जला करता है तू
मुनसिफ़ें तक़दीर मिल जायेगा तो पूछेंगे हम
किस बिना पे ज़िन्दगी का फ़ैसला करता है तू।"

इससे भी बेहतर अन्तिम अन्तरे के बोल हैं जिन्हें सुनते हुए आँखें नम हुए बिना नहीं रह पाते।

"हो वो औरत कि हिना, फ़र्क़ क़िस्मत में नहीं,
रंग लाने के लिए दोनों पीसती ही रही,
मिट के ख़ुश होने का दोनों का है इक ढंग हिना,
मैं हूँ ख़ुशरंग हिना, प्यारी ख़ुशरंग हिना।"

इन पंक्तियों के बाद कुछ और कहना अनावश्यक है। इस गीत ही की तरह राज कपूर के लिए भी हम यही कह सकते हैं फ़िल्मी इतिहास में भी कोई रंग नहीं उनकी फ़िल्मों के बिना। और साथ ही सलाम रवीन्द्र जैन साहब को भी! और अब आप इस गीत के दोनों संस्करण सुनिए। पहले में लता मंगेशकर की और दूसरे में लता जी के साथ मोहम्मद अजीज की आवाज शामिल है।

फिल्म - हिना : 'मैं हूँ खुशरंग हिना, प्यारी खुशरंग हिना...' : लता मंगेशकर और मोहम्मद अज़ीज़ : गीत-संगीत - रवीन्द्र जैन






अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तम्भ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर।


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

Sunday, June 23, 2013

चर्चा राग कल्याण अथवा यमन की

  
स्वरगोष्ठी – 125 में आज

भूले-बिसरे संगीतकार की कालजयी कृति – 5

‘आँसू भरी है ये जीवन की राहें...’ राग यमन के सच्चे स्वरों का गीत 

‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘भूले-बिसरे संगीतकार की कालजयी कृति’ की यह पाँचवीं कड़ी है और इस कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-रसिकों का एक बार पुनः हार्दिक स्वागत करता हूँ। आज हमारी चर्चा का विषय होगा, राग यमन पर आधारित एक सदाबहार गीत- ‘आँसू भरी है ये जीवन की राहें...’। 1958 में प्रदर्शित फिल्म ‘परिवरिश’ के इस कालजयी गीत के संगीतकार दत्ताराम वाडेकर थे, जिनके बारे में वर्तमान पीढ़ी शायद परिचित हो। इसके साथ ही आज के अंक में हम राग यमन पर चर्चा करेंगे और आपको सुप्रसिद्ध सारंगी वादक उस्ताद सुल्तान खाँ का बजाया, राग यमन का भावपूर्ण आलाप भी सुनवाएँगे। 


दत्ताराम
संगीतकार दत्ताराम की पहचान एक स्वतंत्र संगीतकार के रूप में कम, परन्तु सुप्रसिद्ध संगीतकार शंकर-जयकिशन के सहायक के रूप में अधिक हुई। इसके अलावा लोक-तालवाद्य ढप बजाने में वे सिद्धहस्त थे। फिल्म ‘जिस देश में गंगा बहती है’ के गीत ‘मेरा नाम राजू घराना अनाम...’ में उनका बजाया ढप सर्वाधिक लोकप्रिय हुआ था। ढप के अलावा अन्य ताल-वाद्यों, तबला, ढोलक आदि के वादन में भी वे अत्यन्त कुशल थे। फिल्म ‘बेगुनाह’ के गीत ‘गोरी गोरी मैं पारियों की छोरी...’ और फिल्म ‘अब दिल्ली दूर नहीं’ के बाल गीत ‘चूँ चूँ करती आई चिड़िया...’ में उनका ढोलक वादन श्रोताओं को मचलने पर विवश करता है। दत्ताराम की संगीत-शिक्षा तबला वादन के क्षेत्र में ही हुई थी। पाँचवें दशक में वो मुम्बई आए और शंकर-जयकिशन के सहायक बन गए। उनकी पहली फिल्म ‘नगीना’ थी। स्वतंत्र संगीतकार के रूप में दत्ताराम ने 1957 में प्रदर्शित राज कपूर की फिल्म ‘अब दिल्ली दूर नहीं’ में अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से अपने मधुर सम्बन्धों के कारण राज कपूर ने फिल्म ‘अब दिल्ली दूर नहीं’ का निर्माण किया था। फिल्म के संगीत के लिए राज कपूर ने शंकर-जयकिशन के इस प्रतिभावान सहायक को चुना। यह फिल्म तो नहीं चली, किन्तु इसके गीत खूब लोकप्रिय हुए। ऊपर जिस बाल गीत की चर्चा हुई है, वह तो आज भी बच्चों का सर्वप्रिय गीत बना हुआ है।

मुकेश
दत्ताराम को संगीत निर्देशन का दूसरा अवसर 1958 में प्रदर्शित फिल्म ‘परिवरिश’ में मिला। राज कपूर इस फिल्म के नायक थे। फिल्म के निर्माता-निर्देशक ने राज कपूर के आग्रह पर ही दत्ताराम को इस फिल्म के संगीत निर्देशक का दायित्व सौंपा था। इस फिल्म में दत्ताराम ने मुकेश, मन्ना डे और लता मंगेशकर की आवाज़ों में कई मधुर गीत रचे, किन्तु जो लोकप्रियता मुकेश के गाये गीत- ‘आँसू भरी है ये जीवन की राहें...’ को मिली वह अपने आप में कीर्तिमान है। मुकेश को दर्द भरे गीतों का महान गायक माना जाता है। आज भी यह गीत दर्द भरे गीतों की सूची में सिरमौर है। इस गीत पर राग यमन की छाया है। फिल्म संगीत के इतिहासकार पंकज राग ने अपनी पुस्तक ‘धुनों की यात्रा’ में इस गीत की रिकार्डिंग से जुड़े एक रोचक तथ्य का उल्लेख किया है। हुआ यह कि जिस दिन इस गीत को रिकार्ड करना था, उस दिन साजिन्दों की हड़ताल थी। उस समय स्टुडियो में सारंगी वादक ज़हूर अहमद, गायक मुकेश और दत्ताराम स्वयं तबला के साथ उपस्थित थे। इन्हीं साधनों के साथ गीत की अनौपचारिक रिकार्डिंग की गई। यूँतो इसे गीत का पूर्वाभ्यास माना गया किन्तु इस रिकार्डिंग को राज कपूर समेत अन्य लोगों ने जब सुना तो सभी अभिभूत हो गए। आज भी यह गीत मुकेश के गाये गीतों में शीर्ष स्थान पर है। लीजिए, पहले आप इस बहुचर्चित गीत को सुनिए।


राग यमन : फिल्म परिवरिश : ‘आँसू भरी है ये जीवन की राहें...’ : संगीत – दत्ताराम




फिल्म ‘परिवरिश’ के इस गीत राग यमन का स्पष्ट आधार है। राग यमन गोधूलि बेला अर्थात रात्रि के प्रथम प्रहर के आरम्भ के समय का राग है। तीव्र मध्यम के साथ सभी शुद्ध स्वरों वाले सम्पूर्ण जाति का यह राग कल्याण थाट का आश्रय राग माना जाता है। प्राचीन ग्रन्थों में राग का नाम कल्याण ही बताया गया है। 


उस्ताद सुल्तान खाँ
विद्वानों के अनुसार प्राचीन काल में भारत से यह राग पर्शिया पहुँचा, जहाँ इसे यमन नाम मिला। मुगलकाल से इसका यमन अथवा इमन नाम प्रचलित हुआ। दक्षिण भारतीय पद्यति में यह राग कल्याणी नाम से जाना जाता है। राग यमन अथवा कल्याण के आरोह में षडज और पंचम का प्रयोग बहुत प्रबल नहीं होता। निषाद स्वर प्रबल होने और ऋषभ स्वर शुद्ध होने से पुकार का भाव और करुण रस की सहज अभिव्यक्ति होती है। जैसा कि उल्लेख किया गया कि इस राग में तीव्र मध्यम के साथ शेष सभी शुद्ध स्वरों का प्रयोग किया जाता है। परन्तु यदि तीव्र मध्यम के स्थान पर शुद्ध मध्यम का प्रयोग किया जाए तो यह राग बिलावल हो जाता है। अवरोह में यदि दोनों मध्यम का प्रयोग कर दिया जाए तो यह यमन कल्याण राग हो जाता है। यदि राग यमन के शुद्ध निषाद के स्थान पर कोमल निषाद का प्रयोग कर दिया जाए तो राग वाचस्पति की अनुभूति कराता है। राग यमन की स्वर-रचना के कारण ही फिल्म ‘परिवरिश’ के गीत- ‘आँसू भरी है ये जीवन की राहें...’ में करुण रस की गहरी अनुभूति होती है। राग यमन की अधिक स्पष्ट अनुभूति कराने का लिए अब हम आपको सारंगी पर इस राग का आलाप सुनवाते हैं। वादक हैं सुविख्यात सारंगी वादक उस्ताद सुल्तान खाँ। आप फिल्मी गीत के स्वरों को इस सार्थक आलाप में खोजने का प्रयास कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग यमन : सारंगी पर आलाप : उस्ताद सुल्तान खाँ 




आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ की 125वीं संगीत पहेली में हम आपको छठें दशक की एक फिल्म के राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 130वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

2 – संगीत के इस अंश में प्रयुक्त ताल का नाम बताइए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 127वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 123वें अंक में हमने आपको 1953 में प्रदर्शित फिल्म 'लड़की' के राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग भैरवी और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल तीनताल। दोनों प्रश्नो के उत्तर हमारे नियमित प्रतिभागी, लखनऊ के प्रकाश गोविन्द, जबलपुर की क्षिति तिवारी और जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


झरोखा अगले अंक का


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘भूले-बिसरे संगीतकार की कालजयी कृति’ के अगले अंक में हम आपको एक और भूले-बिसरे संगीतकार का परिचय देते हुए उनका संगीतबद्ध एक मोहक गीत लेकर उपस्थित होंगे। आप भी हमारी आगामी कड़ियों के लिए भारतीय शास्त्रीय, लोक अथवा फिल्म संगीत से जुड़े नये विषयों, रागों और अपनी प्रिय रचनाओं की फरमाइश कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करते हैं। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9-30 ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की हमें प्रतीक्षा रहेगी। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

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