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Sunday, January 15, 2017

प्रातःकाल के राग : SWARGOSHTHI – 301 : MORNING RAGAS




स्वरगोष्ठी – 301 में आज

राग और गाने-बजाने का समय – 1 : दिन के प्रथम प्रहर के राग

‘जग उजियारा छाए, मन का अँधेरा जाए...’



 "रेडियो प्लेबैक इण्डिया" के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से हम एक नई श्रृंखला- ‘राग और गाने-बजाने का समय’ आरम्भ कर रहे हैं। श्रृंखला की पहली कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। है। उत्तर भारतीय रागदारी संगीत की अनेक विशेषताओं में से एक विशेषता यह भी है कि संगीत के प्रचलित राग परम्परागत रूप से ऋतु प्रधान हैं या प्रहर प्रधान। अर्थात, संगीत के प्रायः सभी राग या तो अवसर विशेष या फिर समय विशेष पर ही प्रस्तुत किये जाने की परम्परा है। बसन्त ऋतु में राग बसन्त और बहार तथा वर्षा ऋतु में मल्हार अंग के रागों के गाने-बजाने की परम्परा है। इसी प्रकार अधिकतर रागों को गाने-बजाने की एक निर्धारित समयावधि होती है। उस विशेष समय पर ही राग को सुनने पर आनन्द प्राप्त होता है। भारतीय कालगणना के सिद्धान्तों का प्रतिपादन करने वाले प्राचीन मनीषियों ने दिन और रात के चौबीस घण्टों को आठ प्रहर में बाँटा है। सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक के चार प्रहर, दिन के और सूर्यास्त से लेकर अगले सूर्योदय से पहले के चार प्रहर, रात्रि के प्रहर कहलाते हैं। उत्तर भारतीय संगीत के साधक कई शताब्दियों से विविध प्रहर में अलग-अलग रागों का परम्परागत रूप से प्रयोग करते रहे हैं। रागों का यह समय-सिद्धान्त हमारे परम्परागत संस्कारों से उपजा है। विभिन्न रागों का वर्गीकरण अलग-अलग प्रहर के अनुसार करते हुए आज भी संगीतज्ञ व्यवहार करते हैं। राग भैरव का गायन-वादन प्रातःकाल और मालकौंस मध्यरात्रि में ही किया जाता है। कुछ राग ऋतु-प्रधान माने जाते हैं और विभिन्न ऋतुओं में ही उनका गायन-वादन किया जाता है। इस श्रृंखला में हम विभिन्न प्रहरों में बाँटे गए रागों की चर्चा करेंगे। श्रृंखला की पहली कड़ी में आज हम आपसे दिन के प्रथम प्रहर के रागों पर चर्चा करेंगे और इस प्रहर के प्रमुख राग बिलावल की एक बन्दिश सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित भीमसेन जोशी के स्वर में प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही राग भैरव पर आधारित, फिल्म ‘जागते रहो’ का एक गीत लता मंगेशकर की आवाज़ में भी सुनवा रहे हैं।




पण्डित भीमसेन जोशी
भारतीय कालगणना सिद्धान्तों के अनुसार नये दिन का आरम्भ सूर्योदय के साथ होता है। सूर्योदय से लेकर तीन घण्टे तक प्रथम प्रहर माना जाता है। भारत में सूर्योदय का समय ऋतु और स्थान के अनुसार चार से सात बजे के बीच बदलता रहता है। संगीत के प्रथम प्रहर का निर्धारण समान्यतः प्रातःकाल 6 से 9 बजे के बीच किया गया है। रागों का समय निर्धारण कुछ प्रमुख सिद्धान्तों के आधार पर किया गया है। इन सिद्धान्तों की चर्चा हम अगली कड़ी से करेंगे। सामान्यतः प्रातःकाल के रागों में शुद्ध मध्यम वाले राग और ऋषभ और धैवत कोमल स्वर वाले राग होते हैं। प्रथम प्रहर के कुछ मुख्य राग हैं- बिलावल, अल्हैया बिलावल, अरज, भैरव, अहीर भैरव, आनन्द भैरव, आभेरी, आभोगी, गुणकली, जोगिया, देशकार, रामकली, विभास, वैरागी और भैरवी आदि। आज हम पहले राग बिलावल का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। बिलावल राग, बिलावल थाट का आश्रय राग है। यह सभी शुद्ध स्वरों वाला सम्पूर्ण जाति का राग है। अर्थात इसके आरोह और अवरोह सात-सात स्वर प्रयोग किए जाते हैं। राग बिलावल का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गान्धार होता है। अब हम आपके लिए इस राग की एक बन्दिश प्रस्तुत कर रहे हैं। तीनताल में निबद्ध इस रचना के बोल है- “कोई तारा नज़र नहीं आवे...”। यह बन्दिश हम सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पण्डित भीमसेन जोशी की आवाज़ में प्रस्तुत कर रहे हैं। यह बन्दिश तीनताल में निबद्ध है।

राग बिलावल : “कोई तारा नज़र नहीं आवे...” : पण्डित भीमसेन जोशी



लता मंगेशकर और सलिल चौधरी
आज का दूसारा प्रातःकालीन राग भैरव थाट का आश्रय राग भैरव है। इस राग का गायन अथवा वादन सन्धिप्रकाश काल में भी किया जाता है। राग भैरव भी सम्पूर्ण जाति का राग है किन्तु इसमें ऋषभ और धैवत स्वर कोमल प्रयोग होता है। इसका वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर ऋषभ होता है। राग ‘भैरव’ पर आधारित फिल्मी गीतों में से एक अत्यन्त मनमोहक गीत आज हमने चुना है। 1956 में विख्यात फ़िल्मकार राज कपूर ने महत्वाकांक्षी फिल्म ‘जागते रहो’ का निर्माण किया था। इस फिल्म के संगीतकार सलिल चौधरी का चुनाव स्वयं राज कपूर ने ही किया था, जबकि उस समय तक शंकर-जयकिशन उनकी फिल्मों के स्थायी संगीतकार बन चुके थे। फिल्म ‘जागते रहो’ बाँग्ला फिल्म ‘एक दिन रात्रे’ का हिन्दी संस्करण था और बाँग्ला संस्करण के संगीतकार सलिल चौधरी को ही हिन्दी संस्करण के संगीत निर्देशन का दायित्व दिया गया था। सलिल चौधरी ने इस फिल्म के गीतों में पर्याप्त विविधता रखी। इस फिल्म में उन्होने एक गीत ‘जागो मोहन प्यारे, जागो...’ की संगीत रचना ‘भैरव’ राग के स्वरों पर आधारित की थी। शैलेन्द्र के लिखे गीत जब लता मंगेशकर के स्वरों में ढले, तब यह गीत हिन्दी फिल्म संगीत का मीलस्तम्भ बन गया। आइए, आज हम राग ‘भैरव’ पर आधारित, फिल्म ‘जागते रहो’ का यह गीत सुनते हैं। आप इस गीत का रसास्वादन करें और हमें श्रृंखला की पहली कड़ी को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग भैरव : ‘जागो मोहन प्यारे...’ : लता मंगेशकर और साथी : फिल्म - जागते रहो



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ की संगीत पहेली क्रमांक 301 में आज हम आपको राग आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 310वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के पहले सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। 




1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह किस राग पर आधारित है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – मुख्य गायक-स्वर को पहचानिए और हमे उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 21 जनवरी, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 303सरे अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता



‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 299 में हमने आपसे संगीत पहेली का कोई भी प्रश्न नहीं पूछा था। अतः इस अंक की पहेली का कोई भी विजेता नहीं है। अगले अंक से पहेली का उत्तर और विजेताओं के नाम पूर्ववत प्रकाशित करेंगे।

अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर आज से आरम्भ नई लघु श्रृंखला “राग और गाने-बजाने का समय” का यह पहला अंक था। अगले अंक में हम दिन के दूसरे प्रहर के रागों पर आधारित चर्चा करेंगे। इस श्रृंखला के लिए यदि आप किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



Sunday, August 16, 2015

प्रातःकाल के राग : SWARGOSHTHI – 232 : MORNING RAGA




स्वरगोष्ठी – 232 में आज


रागों का समय प्रबन्धन – 1 : दिन के प्रथम प्रहर के राग

‘जग उजियारा छाए, मन का अँधेरा जाए...’



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से हम एक नई श्रृंखला- ‘रागों का समय प्रबन्धन’ आरम्भ कर रहे हैं। श्रृंखला की पहली कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। है। उत्तर भारतीय रागदारी संगीत की अनेक विशेषताओं में से एक विशेषता यह भी है कि संगीत के प्रचलित राग परम्परागत रूप से ऋतु प्रधान हैं या प्रहर प्रधान। अर्थात संगीत के प्रायः सभी राग या तो अवसर विशेष या फिर समय विशेष पर ही प्रस्तुत किये जाने की परम्परा है। बसन्त ऋतु में राग बसन्त और बहार तथा वर्षा ऋतु में मल्हार अंग के रागों के गाने-बजाने की परम्परा है। इसी प्रकार अधिकतर रागों को गाने-बजाने की एक निर्धारित समयावधि होती है। उस विशेष समय पर ही राग को सुनने पर आनन्द प्राप्त होता है। भारतीय कालगणना के सिद्धान्तों का प्रतिपादन करने वाले प्राचीन मनीषियों ने दिन और रात के चौबीस घण्टों को आठ प्रहर में बाँटा है। सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक के चार प्रहर, दिन के और सूर्यास्त से लेकर अगले सूर्योदय से पहले के चार प्रहर, रात्रि के प्रहर कहलाते हैं। उत्तर भारतीय संगीत के साधक कई शताब्दियों से विविध प्रहर में अलग-अलग रागों का परम्परागत रूप से प्रयोग करते रहे हैं। रागों का यह समय-सिद्धान्त हमारे परम्परागत संस्कारों से उपजा है। विभिन्न रागों का वर्गीकरण अलग-अलग प्रहर के अनुसार करते हुए आज भी संगीतज्ञ व्यवहार करते हैं। राग भैरव का गायन-वादन प्रातःकाल और मालकौंस मध्यरात्रि में ही किया जाता है। कुछ राग ऋतु-प्रधान माने जाते हैं और विभिन्न ऋतुओं में ही उनका गायन-वादन किया जाता है। इस श्रृंखला में हम विभिन्न प्रहरों में बाँटे गए रागों की चर्चा करेंगे। श्रृंखला की पहली कड़ी में आज हम आपसे दिन के प्रथम प्रहर के रागों पर चर्चा करेंगे और इस प्रहर के प्रमुख राग बिलावल की एक बन्दिश सुप्रसिद्ध गायक पण्डित अजय चक्रवर्ती और उनकी सुपुत्री कौशिकी चक्रवर्ती के स्वरों में प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही राग भैरव पर आधारित, फिल्म ‘जागते रहो’ का एक गीत लता मंगेशकर की आवाज़ में सुनवा रहे हैं।



भारतीय कालगणना सिद्धान्तों के अनुसार नये दिन का आरम्भ सूर्योदय के साथ होता है। सूर्योदय से लेकर तीन घण्टे तक प्रथम प्रहर माना जाता है। भारत में सूर्योदय का समय ऋतु और स्थान के अनुसार चार से सात बजे के बीच बदलता रहता है। संगीत के प्रथम प्रहर का निर्धारण समान्यतः प्रातःकाल 6 से 9 बजे के बीच किया गया है। रागों का समय निर्धारण कुछ प्रमुख सिद्धान्तों के आधार पर किया गया है। इन सिद्धान्तों की चर्चा हम अगली कड़ी से करेंगे। सामान्यतः प्रातःकाल के रागों में शुद्ध मध्यम वाले राग और ऋषभ और धैवत कोमल स्वर वाले राग होते हैं। प्रथम प्रहर के कुछ मुख्य राग हैं- बिलावल, अल्हैया बिलावल, अरज, भैरव, अहीर भैरव, आनन्द भैरव, आभेरी, आभोगी, गुणकली, जोगिया, देशकार, रामकली, विभास, वैरागी और भैरवी आदि। आज हम पहले राग बिलावल का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।

बिलावल राग, बिलावल थाट का आश्रय राग है। यह सभी शुद्ध स्वरों वाला सम्पूर्ण जाति का राग है। अर्थात इसके आरोह और अवरोह सात-सात स्वर प्रयोग किए जाते हैं। राग बिलावल का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गान्धार होता है। अब हम आपके लिए इस राग की एक बन्दिश प्रस्तुत कर रहे हैं। तीनताल में निबद्ध इस रचना के बोल है- ‘रब सों नेहा लगाओ रे मनवा...’। यह बन्दिश प्रस्तुत कर रहे हैं, पटियाला (कसूर) घराने की गायकी में सिद्ध पण्डित अजय चक्रवर्ती। इस प्रस्तुति में उनका साथ दे रही हैं, अजय जी की ही सुपुत्री कौशिकी चक्रवर्ती।


राग बिलावल : रब सों नेहा लगाओ रे मनवा...’ : अजय चक्रवर्ती और कौशिकी चक्रवर्ती





आज का दूसारा प्रातःकालीन भैरव थाट का आश्रय राग भैरव है। इस राग का गायन-वादन सन्धिप्रकाश काल में भी किया जाता है। राग भैरव भी सम्पूर्ण जाति का राग है किन्तु इसमें ऋषभ और धैवत स्वर कोमल प्रयोग होता है। इसका वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर ऋषभ होता है। राग ‘भैरव’ पर आधारित फिल्मी गीतों में से एक अत्यन्त मनमोहक गीत आज हमने चुना है। 1956 में विख्यात फ़िल्मकार राज कपूर ने महत्वाकांक्षी फिल्म ‘जागते रहो’ का निर्माण किया था। इस फिल्म के संगीतकार सलिल चौधरी का चुनाव स्वयं राज कपूर ने ही किया था, जबकि उस समय तक शंकर-जयकिशन उनकी फिल्मों के स्थायी संगीतकार बन चुके थे। फिल्म ‘जागते रहो’ बांग्ला फिल्म ‘एक दिन रात्रे’ का हिन्दी संस्करण था और बांग्ला संस्करण के संगीतकार सलिल चौधरी को ही हिन्दी संस्करण के संगीत निर्देशन का दायित्व दिया गया था। सलिल चौधरी ने इस फिल्म के गीतों में पर्याप्त विविधता रखी। इस फिल्म में उन्होने एक गीत ‘जागो मोहन प्यारे, जागो...’ की संगीत रचना ‘भैरव’ राग के स्वरों पर आधारित की थी। शैलेन्द्र के लिखे गीत जब लता मंगेशकर के स्वरों में ढले, तब यह गीत हिन्दी फिल्म संगीत का मीलस्तम्भ बन गया। आइए, आज हम राग ‘भैरव’ पर आधारित, फिल्म ‘जागते रहो’ का यह गीत सुनते हैं। आप इस गीत का रसास्वादन करें और हमें श्रृंखला की पहली कड़ी को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग भैरव : ‘जागो मोहन प्यारे...’ : लता मंगेशकर : फिल्म - जागते रहो : संगीत - सलिल चौधरी





संगीत पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ के 232वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको राग आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 240वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की चौथी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – संगीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

2 – संगीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – गायिका के स्वर को पहचानिए और हमे उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 22 अगस्त, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 234वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।



पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 230 की संगीत पहेली में हमने आपको उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ की शहनाई पर प्रस्तुत कजरी का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- वाद्य शहनाई, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल दादरा और कहरवा तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ। इस बार की पहेली में पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर से क्षिति तिवारी, वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने सही उत्तर दिये हैं। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। तीसरी श्रृंखला के विजेताओं के प्राप्तांक हम अगले अंक में प्रकाशित करेंगे।


अपनी बात 


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर लघु श्रृंखला ‘रागों का समय प्रबन्धन’ का यह पहला अंक था। अगले अंक में हम दिन के दूसरे प्रहर के रागों पर आधारित चर्चा करेंगे। इस श्रृंखला के लिए यदि आप किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 



Wednesday, January 15, 2014

रागमाला गीत – 1 : प्लेबैक इण्डिया ब्रोडकास्ट



 


प्लेबैक इण्डिया ब्रोडकास्ट



रागो के रंग, रागमाला गीत के संग – 1


राग बहार, बागेश्री, यमन कल्याण, केदार, भैरव और मेघ मल्हार के रंग बिखेरता रागमाला गीत

‘मधुर मधुर संगीत सुनाओ...’


फिल्म : संगीत सम्राट तानसेन 
संगीतकार : एस.एन. त्रिपाठी 
गायक : पूर्णिमा सेठ, पंढारीनाथ कोल्हापुरे और मन्ना डे

आलेख : कृष्णमोहन मिश्र 
स्वर एवं प्रस्तुति : संज्ञा टण्डन







Sunday, March 10, 2013

रागमाला के रंग एस एन त्रिपाठी के सुरों के संग



स्वरगोष्ठी – 111 में आज

रागमाला – 1

‘मधुर मधुर संगीत सुनाओ...’ : संगीतकार एस.एन. त्रिपाठी जन्मशती पूर्णता पर विशेष



‘स्वरगोष्ठी’ की एक नई श्रृंखला- ‘रागमाला’ के नए अंक के साथ आज एक बार फिर मैं कृष्णमोहन मिश्र संगीत-प्रेमियों की इस गोष्ठी में उपस्थित हूँ। इस लघु श्रृंखला के लिए हमें अनेक संगीत-प्रेमियों के, विशेष रूप से संगीत की शिक्षा प्राप्त कर रहे विद्यार्थियों की कई फरमाइशें प्राप्त हुई हैं। कुछ संगीत-प्रेमियों ने तो रागमाला के कुछ अपनी पसन्द के गीत भी भेजे हैं। उन सभी संगीत-प्रेमियों के प्रति आभार प्रदर्शित करते हुए हम यह आश्वासन देते हैं कि इस श्रृंखला में हम इन्हें उनके नाम के साथ प्रकाशित/प्रसारित करेंगे। श्रृंखला का आज के पहले अंक का रागमाला गीत लखनऊ के चार संगीत के विद्यार्थियों- गुंजा सिंह, आरती खत्री, यश शुक्ला और सैयद आमिर अली ने उपलब्ध कराया है और रागमाला श्रृंखला में शामिल करने का अनुरोध किया है। इनके अनुरोध पर आज के अंक में हम प्रस्तुत कर रहे हैं, 1962 में प्रदर्शित फिल्म ‘संगीत सम्राट तानसेन’ का बेहद चर्चित रागमाला गीत।


फिल्म संगीत में मेलोडी से परिपूर्ण और राग आधारित गीतों की दृष्टि से पाँचवें दशक के उत्तरार्द्ध से लेकर सातवें दशक के पूर्वार्द्ध की अवधि महत्त्वपूर्ण है। इस अवधि में हजारों मधुर और कालजयी गीतों की रचना हुई। इसी अवधि में एक सफल संगीतकार के रूप में श्रीनाथ त्रिपाठी (एस.एन. त्रिपाठी) का नाम तेजी से उभरा। ऐतिहासिक और और पौराणिक फिल्मों के सर्वाधिक सफल संगीतकार एस.एन. त्रिपाठी ने फिल्मों में संगीतकार के अलावा अभिनेता, निर्माता और निर्देशक के रूप में भी अपना योगदान किया था। 14 मार्च, 1913 को कला और संस्कृति की राजधानी काशी नगरी (वाराणसी) में जन्मे श्री त्रिपाठी का जन्मशती वर्ष आज से तीन दिन बाद ही पूर्ण हो रहा है। इस महान संगीतकार को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से स्वरांजलि अर्पित करने के उद्देश्य से ही हमने आज की ‘स्वरगोष्ठी’ में उन्हीं का स्वरबद्ध किया गीत चुना है। एस.एन. त्रिपाठी के फिल्म जगत में प्रवेश के प्रसंग का उल्लेख फिल्म संगीत के इतिहासकार सुजॉय चटर्जी ने अपनी पुस्तक ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ में करते हुए लिखते हैं- “जीवन नैया’ में श्रीनाथ त्रिपाठी (जो बाद में एस.एन. त्रिपाठी के नाम से मशहूर संगीतकार हुए) को पहला मौका मिला गायक के रूप में। उन्होंने इस फ़िल्म में अभिनय भी किया और “ए री दैया लचक लचक चलत मोहन आवे, मन भावे...” गीत गाया। त्रिपाठी ने इलाहाबाद से बी.एससी की डिग्री पूरी करने के बाद मॉरिस म्यूजिक कॉलेज, लखनऊ (वर्तमान, भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय) से भारतीय शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ली। लखनऊ की ही मैना देवी से उन्होंने उपशास्त्रीय संगीत और लोक-संगीत की तालीम भी ली थी। मॉरिस कॉलेज से ‘संगीत विशारद’ और प्रयाग संगीत समीति से ‘संगीत प्रवीण’ की उपाधि प्राप्त करने के बाद त्रिपाठी बॉम्बे टॉकीज़ में वायलिन वादक के रूप में सरस्वती देवी के ऑरकेस्ट्रा में भर्ती हो गए और 1938 तक यहाँ रहे। इसके बाद उन्होंने अपनी स्वतंत्र संगीतकार की पारी शुरु की”। स्वतंत्र संगीत-निर्देशक के रूप में उनकी पहली फिल्म ‘चन्दन’ (1939) थी। लघु श्रृंखला ‘रागमाला’ के आज पहले अंक के लिए हमने एस.एन. त्रिपाठी के संगीत-निर्देशन में 1962 में बनी संगीत प्रधान फिल्म ‘संगीत सम्राट तानसेन’ का एक गीत चुना है।

शीर्षक के अनुरूप यह फिल्म संगीत सम्राट की उपाधि से अलंकृत तानसेन के जीवन पर आधारित इस फिल्म में एस.एन. त्रिपाठी ने रागों के विविध स्वरूप से प्रसंगों को सुसज्जित किया था। फिल्म का एक प्रसंग ऐसा है जिसमे तानसेन को उनके गुरु स्वामी हरिदास के आश्रम में संगीत का अभ्यास करते दिखाया गया है। एक के बाद एक कुल छह रागों के मेल से बने लगभग आठ मिनट के इस रागमाला गीत के माध्यम से तानसेन की बाल्यावस्था से लेकर युवावस्था तक के विकास को दिखाया गया है। प्रसंगों के क्रमशः उल्लेख में सरलता के लिए पूरे गीत को तीन भागों में बाँट कर हम प्रस्तुत कर रहे हैं। सबसे पहले हम आपके लिए रागमाला गीत का पहला दो अन्तरा प्रस्तुत कर रहे हैं। गीत का आरम्भ राग बहार के स्वरों में गूँथे गीत- ‘टूट गई मेरे मन की वीणा...’ से होता है। इन पंक्तियों के दौरान बालक तन्ना (तानसेन) को संगीत का अभ्यास करते दिखाया गया है। राग बहार की पंक्तियाँ समाप्त होते ही राग बागेश्वरी अथवा बागेश्री का आलाप आरम्भ हो जाता है। गीत का अगला भाग- ‘मधुर मधुर संगीत सुनाओ...’ है, जिसके लिए संगीतकार ने राग बागेश्री के स्वरों का उपयोग किया है। गीत का यह हिस्सा आरम्भ होते ही बालक तन्ना किशोर हो जाता है। लीजिए, रागमाला गीत के इन आरम्भिक दो हिस्सों का आनन्द लीजिए।


राग बहार और बागेश्वरी : ‘टूट गई मेरे मन की वीणा...’ और ‘मधुर मधुर संगीत सुनाओ...’ : पूर्णिमा सेठ और पंढारीनाथ कोल्हापुरे




गीत के अगले भाग में राग यमन कल्याण का स्पर्श है। दरअसल रागमाला गीत का यह भाग एक प्राचीन ध्रुवपद रचना है। यह मान्यता है कि इस ध्रुवपद की रचना स्वामी हरिदास ने की थी। इस रचना में संगीत के प्राचीन सिद्धान्तों का उल्लेख किया गया है। फिल्म में गीत के इस भाग के आरम्भ में किशोर आयु के तानसेन को अपने गुरु स्वामी हरिदास के सम्मुख अभ्यास करते दिखाया गया है। इस ध्रुवपद के अन्तरे में ही किशोर तानसेन युवा (भारतभूषण) रूप में परिवर्तित होते हैं। वयस्क तानसेन की भूमिका अभिनेता भारतभूषण निभाई है, जिनके लिए पार्श्वगायन किया, सुप्रसिद्ध गायक मन्ना डे ने। गीत का अगला अर्थात चौथा भाग पारम्परिक गुरुवन्दना है, जो राग केदार के स्वरों पर आधारित है। फिल्म ‘संगीत सम्राट तानसेन’ के इस रागमाला गीत के तीसरे और चौथे भाग को अब हम आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं।



राग यमन कल्याण और केदार : ‘सप्तसुरन तीन ग्राम...’ और गुरुवन्दना : मन्ना डे और साथी


रागमाला गीत के अगले तीन अन्तरों में राग भैरव और मेघ मल्हार के स्वरों का प्रयोग किया गया है। इस प्रसंग में स्वामी हरिदास, तानसेन को विभिन्न रागों के लक्षण बताने का आदेश देते हैं। तानसेन पहले राग भैरव और फिर मेघ मल्हार की प्रकृति का वर्णन करते हैं। तानसेन की इन प्रस्तुतियों से स्वामी हरिदास सन्तुष्ट हो जाते हैं राधाकृष्ण की प्रतिमा को नमन करने का आदेश देते हैं। गुरु और गोविन्द दोनों को एक साथ सम्मुख देख कर कुछ क्षणों तक तानसेन थोड़ा विचलित होते हैं, किन्तु गुरु के महत्त्व को सर्वोपरि रखते हुए अत्यन्त प्रचलित दोहा- ‘गुरु गोविन्द दोनों खड़े...’ का गायन करते हुए स्वामी हरिदास के चरणों में नतमस्तक हो जाते हैं। यह दोहा भी राग मेघ मल्हार के स्वरों में पिरोया गया है। आइए इस रागमाला गीत अन्तिम भाग भी सुनते हैं। इस रागमाला गीत में पारम्परिक रचनाओं के अलावा अन्य सभी गीतों की रचना गीतकार शैलेन्द्र ने की थी।



राग भैरव और मेघ मल्हार : लक्षण गीत और दोहा ‘गुरु गोविन्द दोनों खड़े...’ : मन्ना डे 

 


आज की पहेली 

‘स्वरगोष्ठी’ की 111वीं संगीत पहेली में हम आपको एक रागमाला फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 120वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह अंश किस राग पर आधारित है?

2 – प्रस्तुत संगीत के अंश के उत्तरार्द्ध में गायन के साथ एक वाद्य की जुगलबन्दी भी की गई है। आपको उस वाद्य का नाम बताना है।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 113वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 

‘स्वरगोष्ठी’ के 109वें अंक में हमने आपको फिल्म ‘चाचा ज़िन्दाबाद’ से मन्ना डे और लता मंगेशकर के गाये एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग ललित और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल तीनताल। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर की क्षिति तिवारी, बैंगलुरु के पंकज मुकेश और लखनऊ के प्रकाश गोविन्द ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक शुभकामनाएँ।


झरोखा अगले अंक का 


मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ पर आज से आरम्भ यह श्रृंखला हमने अपने कई नियमित पाठकों के अनुरोध पर प्रस्तुत किया है। आज के अंक में प्रस्तुत किया गया रागमाला गीत का आडियो हमें लखनऊ के संगीत-विद्यार्थियों- गुंजा सिंह, आरती खत्री, यश शुक्ला और सैयद आमिर अली ने भेजा था। आगामी अंक में भी हम आपको एक फिल्मी रागमाला गीत सुनवाएँगे और उसमें सम्मिलित रागों पर आपसे चर्चा करेंगे। आप भी हमारे आगामी अंकों के लिए भारतीय शास्त्रीय संगीत से जुड़े नये विषयों, रागों और अपनी प्रिय रचनाओं की फरमाइश कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों को पूरा सम्मान देंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9-30 ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-प्रेमियों की हमें प्रतीक्षा रहेगी।


कृष्णमोहन मिश्र


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