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Sunday, November 29, 2015

रुद्रवीणा और उस्ताद असद अली खाँ : SWARGOSHTHI – 246 : RUDRAVEENA & USTAD ASAD ALI KHAN



स्वरगोष्ठी – 246 में आज

संगीत के शिखर पर – 7 : उस्ताद असद अली खाँ

वैदिक तंत्रवाद्य रुद्रवीणा के साधक उस्ताद असद अली खाँ




रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी सुरीली श्रृंखला – ‘संगीत के शिखर पर’ की सातवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-रसिकों का एक बार पुनः हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय संगीत की विभिन्न विधाओं में शिखर पर विराजमान व्यक्तित्व और उनके कृतित्व पर चर्चा कर रहे हैं। संगीत गायन और वादन की विविध लोकप्रिय शैलियों में किसी एक शीर्षस्थ कलासाधक का चुनाव कर हम उनके व्यक्तित्व का उल्लेख और उनकी कृतियों के कुछ उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। आज श्रृंखला की सातवीं कड़ी में हम आज हम वैदिककालीन तंत्रवाद्य रुद्रवीणा अनन्य साधक उस्ताद असद अली खाँ की संगीत साधना के व्यक्तित्व और कृतित्व की संक्षिप्त चर्चा कर रहे हैं। आज हम आपको उस्ताद असद अली खाँ द्वारा रुद्रवीणा पर बजाया ध्रुपद अंग में राग आसावरी और आभोगी की रचनाएँ सुनवाएँगे।


वैदिककालीन वाद्य रूद्रवीणा को परम्परागत रूप से आधुनिक संगीत जगत में प्रतिष्ठित कराने वाले अप्रतिम कलासाधक उस्ताद असद अली खाँ जयपुर बीनकार की बारहवीं पीढ़ी के कलासाधक थे। यह घराना जयपुर के सेनिया घराने का ही एक हिस्सा है। असद अली खाँ का जन्म 1937 में अलवर रियासत (राजस्थान) में हुआ था। परन्तु उनके संगीत की शिक्षा-दीक्षा रामपुर में हुई। उनके पिता उस्ताद सादिक अली खाँ रामपुर दरबार में रूद्रवीणा के प्रतिष्ठित वादक थे। उनके प्रपितामह उस्ताद रज़ब अली खाँ जयपुर घराने के दरबारी वीणावादक थे तथा रूद्रवीणा के साथ-साथ सितार और दिलरुबावादन में भी दक्ष थे। असद अली खाँ के पितामह उस्ताद मुशर्रफ अली खाँ को भी जयपुर के दरबारी वीणावादक के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त थी।

आज हम जिसे संगीत का जयपुर घराना के नाम से पहचानते हैं, उसकी स्थापना में असद अली खाँ के प्रपितामह (परदादा) उस्ताद राजब अली खाँ का योदान रहा है। उस्ताद रजब अली खाँ जयपुर दरबार के केवल संगीतज्ञ ही नहीं; बल्कि महाराजा मानसिंह के गुरु भी थे। महाराजा ने उन्हें जागीर के साथ ही एक विशाल हवेली दे रखी थी तथा उन्हें किसी भी समय बेरोक-टोक महाराजा के महल में आने-जाने की स्वतन्त्रता थी। असद अली खाँ के दादा जी उस्ताद मुशर्रफ अली खाँ ने भी जयपुर दरबार में वही प्रतिष्ठा प्राप्त की। वीणावादकों का यह घराना ध्रुवपद संगीत के खण्डहार वाणी में वादन करता रहा है; जिसका पालन उस्ताद असद अली खाँ ने भी किया और अपने शिष्यों को भी इसी वाणी की शिक्षा दी। ध्रुवपद संगीत में चार वाणियों का वर्गीकरण तानसेन के समय में ही हो चुका था। ‘संगीत रत्नाकर’ ग्रन्थ में यह वर्गीकरण शुद्धगीत, भिन्नगीत, गौड़ीगीत और बेसरागीत नामों से हुआ है; जिसे आज गौड़हार वाणी, डागर वाणी, खण्डहार वाणी और नौहार वाणी के नाम से जाना जाता है। उस्ताद असद अली खाँ और उनके पूर्वजों का वादन खण्डहार वाणी का था। इसके अलावा खाँ साहब दूसरी वाणियों की विशेषताओं को प्रदर्शित करने से नहीं हिचकते थे। ध्रुवपद अंग में वीणावादन का चलन कम होने के बावजूद उन्होंने परम्परागत वादन शैली से कभी समझौता नहीं किया। आइए, उनकी वादन शैली की सार्थक अनुभूति करते हैं। इस प्रस्तुति में उस्ताद असद अली खाँ ने ध्रुवपद अंग में राग आसावरी के स्वरों में लयबद्ध किन्तु तालरहित झाला और फिर चौताल में एक बन्दिश का वादन किया है। नाथद्वारा परम्परा के पखावज वादक पण्डित डालचन्द्र शर्मा ने पखावज पर संगति की है।


राग आसावरी : रुद्रवीणा पर झाला और चौताल में बन्दिश : उस्ताद असद अली खाँ





उस्ताद असद अली खाँ ने अपने पिता उस्ताद सादिक अली खाँ से रामपुर दरबार में लगभग 15 वर्षों तक रूद्रवीणा के वादन की शिक्षा ग्रहण की, और फिर प्रतिदिन कई घण्टों तक निरन्तर रियाज करके उन्होंने इस वैदिककालीन वाद्य को सिद्ध कर लिया। उन्होंने ध्रुवपद अंग में रूद्रवीणा की ‘खान दरबारी’ शैली विकसित की और उस शैली को यही नाम दिया। खाँ साहब 17 वर्षों तक दिल्ली विश्वविद्यालय में संगीत के प्रोफ़ेसर रहे। वे आजन्म अविवाहित रहे। अपने भतीजे अली जाकी हैदर को उन्होंने दत्तक पुत्र बना लिया था और उन्हें रूद्रवीणा वादन में प्रशिक्षित किया था। अली जाकी के अलावा अन्य कई शिष्यों को भी उन्होंने संगीत शिक्षा दी है; जो इस परम्परा को आगे बढ़ा रहे हैं। भारतीय शास्त्रीय संगीत का प्रचार-प्रसार करने में संलग्न संस्था ‘स्पीक मैके’ के साथ जुड़ कर खाँ साहब ने स्कूल-कालेज के विद्यार्थियों के बीच रुद्रवीणा से नई पीढ़ी को परिचित कराने का अभियान चलाया था, जो खूब सफल रहा। नई पीढी को रूद्रवीणा की वादन शैली से परिचित कराने के साथ-साथ उस्ताद असद अली खाँ उन्हें यह बताना नहीं भूलते थे कि यह तंत्रवाद्य विश्व का सबसे प्राचीन वाद्य है और ध्वनि के वैज्ञानिक सिद्धान्तों पर आज भी खरा उतरता है। वे भगवान शिव को रूद्रवीणा का निर्माता मानते थे। उस्ताद असद अली खाँ को अनेक सम्मान और पुरस्कार से नवाज़ा गया था; जिनमें 1977 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 2008 में पद्मभूषण सम्मान, तानसेन सम्मान आदि प्रमुख हैं। 14 जून, 2011 को उनके निधन से भारतीय संगीत जगत में रिक्तता तो आई है; किन्तु यह विश्वास भी है कि उनके शिष्यगण रुद्रवीणा वादन की वैदिककालीन परम्परा को आगे बढ़ाएँगे। इस आलेख को विराम देने से पहले लीजिए सुनिए, उस्ताद असद अली खाँ का रूद्रवीणा पर बजाया राग आभोगी में एक ध्रुवपद बन्दिश। पखावज संगति वरिष्ठ पखावजी पण्डित गोपाल दास ने की है। आप यह रचना सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग आभोगी : ध्रुपद बन्दिश : उस्ताद असद अली खाँ






संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 246वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक तंत्रवाद्य पर वाद्य संगीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 250वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पाँचवीं श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – संगीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह किस राग की झलक प्रस्तुत करता है?

2 – संगीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप संगीत वाद्य को पहचान रहे हैं? यदि हाँ, तो हमें उस वाद्य का नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 5 दिसम्बर, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 248वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 244 की संगीत पहेली में हमने आपको सुविख्यात गायक उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ की आवाज़ में प्रस्तुत दादरा का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। इस पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग भैरवी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल दादरा और तीसरे प्रश्न का उत्तर है- गायक उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ। सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं- पहली बार ‘स्वरगोष्ठी’ की पहेली में भाग लेने वाले प्रतिभागी, चेरीहिल (एन.जे.) से प्रफुल्ल पटेल। प्रफुल्ल जी, संगीत प्रेमियों की इस महफिल में हार्दिक स्वागत है। हमारे अन्य नियमित प्रतिभागी हैं, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी, और पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर लघु श्रृंखला ‘संगीत के शिखर पर’ का यह सातवाँ अंक था। इस अंक में हमने प्राचीन तंत्रवाद्य रुद्रवीणा वादक उस्ताद असद अली खाँ के व्यक्तित्व और उनके वादन पर संक्षिप्त प्रकाश डालने का प्रयत्न किया है। अगले अंक में हम भारतीय संगीत की किसी अन्य विधा के किसी शिखर व्यक्तित्व के कृतित्व पर आधारित कार्यक्रम प्रस्तुत करेंगे। इस श्रृंखला के लिए यदि आप किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  





Wednesday, February 19, 2014

फिल्म 'सौ साल बाद' का रागमाला गीत







प्लेबैक इण्डिया ब्रोडकास्ट




रागो के रंग, रागमाला गीत के संग – 6




राग भटियार, आभोगी, मेघ मल्हार और बसन्त बहार में पिरोया गया रागमाला गीत


‘एक ऋतु आए एक ऋतु जाए...’



फिल्म : सौ साल बाद (1966)
गायक : लता मंगेशकर और मन्ना डे
गीतकार : आनन्द बक्शी
संगीतकार : लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल
आलेख : कृष्णमोहन मिश्र

स्वर एवं प्रस्तुति : संज्ञा टण्डन





 
आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी? अपनी प्रतिक्रिया और सुझाव से हमें radioplaybackindia@live.com पर अवश्य अवगत कराएँ। 

Sunday, May 12, 2013

चार रागों का मेल हैं इस रागमाला गीत में


स्वरगोष्ठी – 120 में आज

रागों के रंग रागमाला गीत के संग – 6

‘एक ऋतु आए एक ऋतु जाए...’



संगीत-प्रेमियों की साप्ताहिक महफिल ‘स्वरगोष्ठी’ के एक नये अंक का साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र पुनः उपस्थित हूँ। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी है लघु श्रृंखला ‘रागों के रंग रागमाला गीत के संग’। आज हम आपके लिए जो रागमाला गीत प्रस्तुत कर रहे हैं, उसे हमने 1966 में प्रदर्शित फिल्म ‘सौ साल बाद’ से लिया है। इस गीत में चार रागों- भटियार, आभोगी कान्हड़ा, मेघ मल्हार और बसन्त बहार का प्रयोग हुआ है। गीत के चार अन्तरे हैं और इन अन्तरों में क्रमशः स्वतंत्र रूप से इन्हीं रागों का प्रयोग किया गया है। इसके गीतकार आनन्द बक्शी और संगीतकार लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल हैं।


स श्रृंखला के पिछले अंकों में आपने कुछ ऐसे रागमाला गीतों का आनन्द लिया था, जिनमें रागों का प्रयोग प्रहर के क्रम से था या ऋतुओं के क्रम से हुआ था। परन्तु आज के रागमाला गीत में रागों का क्रम प्रहर अथवा ऋतु के क्रम में नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है कि फिल्म ‘सौ साल बाद’ के इस रागमाला गीत में रागों का प्रयोग फिल्म के अलग-अलग प्रसंगों के अनुसार किया गया है। इस रागमाला गीत का संगीत-निर्देशन लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल ने किया था। यह फिल्म इस संगीतकार जोड़ी के प्रारम्भिक वर्षों की फिल्मों में से एक थी। 1963 में प्रदर्शित फिल्म ‘पारसमणि’ से संगीतकार के रूप में धमाकेदार शुरुआत करने वाले लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल सातवें, आठवें और नौवें दशक में शिखर पर थे। फिल्म ‘पारसमणि’ यद्यपि एक फेण्टेसी फिल्म थी, इसके बावजूद इसका हर गीत बेहद लोकप्रिय हुआ। दरअसल इस संगीतकार जोड़ी में कर्णप्रियता के साथ-साथ संगीत की वह दुर्लभ पकड़ थी, जो गीतों को न केवल गुणबत्ता की दृष्टि से बल्कि श्रोताओं की पसन्द को ध्यान में रख कर व्यावसायिक दृष्टि से भी लोकप्रिय और सफल बनाती है। इस संगीतकार जोड़ी को शुरुआती दौर में छोटे बैनर की धार्मिक और स्टंट फिल्में ही मिली। परन्तु इन फिल्मों में भी मधुर और लोकप्रिय संगीत देकर उस समय फिल्म संगीत पर अपना प्रभुत्व कायम कर लेने वाले संगीतकार शंकर-जयकिशन तक को चुनौती दे दी थी।

लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल अपने संगीत में लोक और रागदारी संगीत का कर्णप्रिय रूपान्तरण करने में दक्ष थे। 1966 में प्रदर्शित फिल्म ‘सौ साल बाद’ के कई गीतों में रागों का मोहक आधार था। यद्यपि व्यावसायिक दृष्टि से यह फिल्म बहुत अधिक सफल नहीं थी, परन्तु इसके गीत गुणबत्ता की दृष्टि से बेहद सफल हुए थे। इन्हीं गीतों में से एक रागमाला गीत भी था। इस गीत के चार अन्तरे, हैं जिसे मन्ना डे और लता मंगेशकर ने स्वर दिया है। गीत के आरम्भिक बोल हैं- ‘एक ऋतु आए एक ऋतु जाए...’। गीत के इस भाग में राग भटियार की छाया है। राग भटियार के गायन-वादन का समय दिन का पहला प्रहर अर्थात प्रातःकाल माना गया है। अगला अन्तरा- ‘जिया नाहीं लागे का करूँ...’, जिसे राग आभोगी का आधार दिया गया है। यह अन्तरा लता मंगेशकर की एकल आवाज़ में है। चूँकि यह रात्रि के दूसरे प्रहर का राग माना जाता है, इसलिए गीत के पहले दो रागों में प्रहर का क्रम भी नहीं है। गीत में प्रयुक्त अगले दो राग ऋतु प्रधान हैं और उनमें भी कोई सामंजस्य नहीं है। गीत के अगले अन्तरे के बोल हैं- ‘घिर आई कारी कारी बदरिया...’, जिसमें संगीतकार जोड़ी ने राग मेघ मल्हार के स्वरों का प्रयोग किया है। गीत का यह अंश मन्ना डे और लता मंगेशकर के युगल स्वरों में है। गीत का चौथा राग भी ऋतु प्रधान राग बसन्त बहार है। इस अन्तरे के बोल हैं- ‘खिल गईं कलियाँ नैना ढूँढे साजन की गलियाँ...’, जिसे दोनों गायक कलाकारों ने युगल स्वरों में प्रस्तुत किया है। इस रागमाला गीत में रागों का कोई सार्थक क्रम न होने के बावजूद पूरा गीत बेहद आकर्षक है। आप यह गीत सुनिए और आज के अंक को यहीं विराम देने के लिए हमे अनुमति दीजिए।


रागमाला गीत : फिल्म सौ साल बाद : ‘एक ऋतु आए एक ऋतु जाए...’ : लता मंगेशकर और मन्ना डे



आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 120वें अंक की पहेली में आज हम आपको पाँचवें दशक के आरम्भिक वर्षों में बनी एक फिल्म के राग आधारित एक गीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। इस अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

2 – यह गीत किस ताल में निबद्ध किया गया है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 122वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से या swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 118वें अंक में हमने आपको 1981 में प्रदर्शित फिल्म ‘चश्मेबद्दूर’ से लिये गए रागमाला गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग मालकौंस और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- द्रुत तीनताल। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर एकमात्र प्रतिभागी जबलपुर से क्षिति तिवारी ने ही दिया है। लखनऊ के प्रकाश गोविन्द का एक उत्तर ही सही हुआ, अतः उन्हें इस बार एक अंक मिलेगा। दोनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।

झरोखा अगले अंक का

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर आज हमने लघु श्रृंखला ‘रागों के रंग रागमाला गीत के संग’ की छठी कड़ी प्रस्तुत की। इस श्रृंखला को अब हम यहीं विराम देते हैं। अगले अंक से हम एक नई श्रृंखला प्रस्तुत करेंगे। इसका शीर्षक है- ‘एक कालजयी गीत जिसने संगीतकार को अमर बना दिया’। अगले अंक में हम इस नई श्रृंखला के पहले अंक के साथ आपके बीच होंगे। रविवार को प्रातः 9-30 ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की हमें प्रतीक्षा रहेगी। 

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

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