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Thursday, October 20, 2011

माँ ही गंगा...जात्रागान शैली का ये गीत नीरज की कलम से

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 770/2011/210

पूर्वी और पुर्वोत्तर भारत के लोक-धुनों और शैलियों पर आधारित 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की लघु शृंखला 'पुरवाई' की अन्तिम कड़ी में आप सभी का मैं सुजॉय चटर्जी, साथी सजीव सारथी के साथ फिर एक बार स्वागत करता हूँ। दोस्तों, सिनेमा के आने से पहले मनोरंजन का एक मुख्य ज़रिया हुआ करता था नाट्य, जो अलग अलग प्रांतों में अलग अलग रूप में पेश होता था। नाट्य, जिसे ड्रामा या थिएटर आदि भी कहते हैं, की परम्परा कई शताब्दियों से चली आ रही है इस देश में, और इसमें अभिनय, काव्य और साहित्य के साथ साथ संगीत भी एक अहम भूमिका निभाती आई है। प्राचीन भारत नें संस्कृत नाटकों का स्वर्ण-युग देखा। उसके बाद ड्रामा का निरंतर विकास होता गया। जिस तरह से अलग अलग भाषाओं का जन्म हुआ और हर भाषा का अपने पड़ोसी प्रदेश के भाषा के साथ समानताएँ होती हैं, ठीक उसी प्रकार अलग अलग ड्रामा और नाट्य शैलियाँ भी विकसित हुईं एक दूसरे से थोड़ी समानताएँ और थोड़ी विविधताएँ लिए हुए। पूर्वोत्तर के आसाम राज्य में “ओजापाली” का चलन हुआ, तो बंगाल में "जात्रा-पाला" का, पंजाब में "स्वांग" तो कश्मीर में "जश्न"। केरल के कथाकली नृत्य शैली से प्राचीन लोक-कथायों को साकार करने की परम्परा भी बहुत पुरानी है। बंगाल में प्रचलित 'जात्रा' का शाब्दिक अर्थ है यात्रा। मूलत: जात्रा में पौराणिक और ऐतिहासिक घटनाओं को स्टेज पर नाट्य के माध्यम से प्रदर्शित किया जाता है। संवाद और गीत-संगीत के माध्यम से जात्रा की अवधि लगभग ४ घंटे की होती है। क्योंकि प्राचीन काल में महिलाओं का नाटक और संगीत में आने नहीं दिया जाता था, इसलिए जात्रा पुरुष कलाकारों द्वारा निभाई जाती है और नारी चरित्र भी पुरुष ही निभाते हैं। १९-वीं सदी से महिलाएँ भी जात्रा के किरदार निभाने लगीं।

जात्रा में काफ़ी नाटकीयता होती है और कलाकार अपने संवाद और गीत ऊंची आवाज़ में बोलते/ गाते हैं। अलग अलग भावों को व्यक्त करने के लिए जात्रा के कलाकार ज़ोर से ज़ोर से हँसते, रोते, गाते, लड़ते हैं। सिनेमा के आने के बाद थिएटर का चलन थोड़ा कम हो गया है ज़रूर, पर ख़ास तौर से ग्रामीण इलाकों में जात्रा का आज भी ख़ूब चलन है। थिएटर कंपनियाँ आज भी गाँवों और छोटे शहरों में डेरा डालती है। जात्रा का मौसम सितम्बर से शुरु होता है; दुर्गा पूजा से जात्रा की शुरुआत होती है और अगले साल मानसून से पहले जाकर समाप्त होती है। यानि कि सितम्बर से लेकर अगले साल मई तक जात्रा आयोजित होते हैं। जात्रा की शुरुआत १६-वीं शताब्दी से मानी जाती है जब श्री चैतन्य महाप्रभु का भक्तिवाद चल रहा था। उस समय भगवान श्री कृष्ण के भक्तगण कीर्तन शैली के संवाद और गीतों के माध्यम से श्रीकृष्ण-नाम गाया करते थे। यहीं से जात्रा की शुरुआत होती है। आधुनिक काल में भारत के स्वतन्त्रता संग्राम में जात्रा नें जनजागरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन जात्राओं को 'स्वदेशी जात्रा' कहा जाता था। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान इप्टा नें भी कई जात्रा स्टेज किए। जात्रा में गाये जाने वाले गीतों को 'जात्रागान' कहते हैं। आज के अंक में हम जो गीत सुनवाने जा रहे हैं वह भी जात्रागान शैली की है। लता मंगेशकर, कमल बारोट, नीलिमा चटर्जी और साथियों की आवाज़ों में यह गीत है फ़िल्म 'मंझली दीदी' का गीतकार नीरज का लिखा हुआ। गीत में लवकुश की गाथा को दर्शाया जा रहा है। यह शरतचन्द्र की प्रसिद्ध उपन्यास पर आधारित मीना कुमारी - धर्मेन्द्र अभिनीत १९६७ की फ़िल्म है जिसमें संगीत था हेमन्त कुमार का। आइए सुना जाये बंगाल के ग्रामीण स्पर्श लिए जात्रा-संगीत पर आधारित यह गीत और इस शृंखला को समाप्त करने की दीजिए मुझे अनुमति, शृंखला के बारे में अपने विचार टिप्पणी में ज़रूर व्यक्त कीजिएगा, नमस्कार!



चलिए अब खेलते हैं एक "गेस गेम" यानी सिर्फ एक हिंट मिलेगा, आपने अंदाजा लगाना है उसी एक हिंट से अगले गीत का. जाहिर है एक हिंट वाले कई गीत हो सकते हैं, तो यहाँ आपका ज्ञान और भाग्य दोनों की आजमाईश है, और हाँ एक आई डी से आप जितने चाहें "गेस" मार सकते हैं - आज का हिंट है -
जगजीत के स्वरों से महकी इस अमर गज़ल के एक शे'र में शब्द आता है -"जहर"

पिछले अंक में
एक बार फिर से बधाई अमित जी
खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Wednesday, October 19, 2011

श्याम रंग रंगा रे...येसुदास के पावन स्वरों से महका एक गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 769/2011/209

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार! लघु शृंखला 'पुरवाई' की नवी कड़ी में आज हम लेकर आये हैं बंगाल के कीर्तन और श्यामा संगीत पर आधारित एक गीत। हर राज्य का अपना भक्ति-संगीत का स्वरूप होता है। जैसे कि असम के भक्ति-संगीत पर आधारित एक गीत इसी शृंखला में हमने सुनवाया था, वैसे ही बंगाल में भी कई तरह के भक्ति गीतों की लोकप्रियता है जिनमें कीर्तन शैली और श्यामा संगीत का काफ़ी नाम है। श्यामा संगीत की बात करें तो ये भक्ति रचनाएँ माँ काली को समर्पित रचनाएँ होती हैं ('श्यामा' शब्द काली माता के लिए प्रयोग होता है), और इन्हें शक्तिगीति भी कहते हैं। और क्योंकि बंगाल में माँ काली को लोग बहुत मानते हैं, इसलिए श्यामा-संगीत भी ख़ूब लोकप्रिय है। श्यामा संगीत इसलिए भी लोकप्रिय है क्योंकि इसमें माँ और उसके बच्चे के रिश्ते की बातें होती हैं। साधारण पूजा-पाठ के नियमों से परे होता है श्यामा संगीत। १२-वीं और १३-वीं शताब्दी में जब शक्तिवाद बंगाल में पनपने लगी, तब कई कवि और लेखक प्रेरीत हुए माँ काली पर गीत और कविताएँ लिखने के लिए। १५८९ में मुकुन्दरामा, जिन्हें 'कविकंकन' भी कहा जाता है, नें अपनी मशहूर कविता लिखी 'चंडी'। १८-वीं शताब्दी के मध्य भाग में कवि रामाप्रसाद सेन नें इसे नया जीवन देते हुए इसे बंगला गीतों की एक श्रेणी ही बना डाली। रामाप्रसाद के बाद कई संगीतकार जैसे कमलाकान्त भट्टाचार्य (१७७२-१८२१), रसिकचन्द्र राय (१८२०-१८९३), रामचन्द्र दत्त (१८६१-१८९९) और नीलकान्त मुखोपाध्याय नें श्यामा-संगीत की परम्परा को समृद्ध किया और आगे बढ़ाया। आधुनिक समय में रबीन्द्रनाथ ठाकुर और काज़ी नज़रूल इस्लाम नें श्यामा-संगीत की कविताएँ लिखीं।

श्यामा-संगीत को दो भागों में बांटा जा सकता है - भक्तिमूलक गीत और उमासंगीत/ आगमनी या विजय गीत। भक्तिमूलक गीत भक्ति और आध्यात्मिक भावों से प्रेरीत होता है, जबकि विजय गीतों में दैनन्दिन पारिवारिक और सामाजिक गतिविधियों का उल्लेख होता है। श्यामा-संगीत के बारे में एडवार्ड थॉमप्सन नें जो बातें १९२३ में कहे थे, वो आज भी सार्थक हैं। उन्होंने कहा था -

But the Śākta poems are a different matter. These have gone to the heart of a people as few poets' work has done. Such songs as the exquisite 'This day will surely pass, Mother, this day will pass,' I have heard from coolies on the road or workers in the paddy fields; I have heard it by broad rivers at sunset, when the parrots were flying to roost and the village folk thronging from marketing to the ferry. Once I asked the top class in a mofussil high school to write out a song of Rabindranath Tagore's; two boys out of forty succeeded, a result which I consider showed the very real diffusion of his songs. But, when I asked for a song of Rāmprasād's, every boy except two responded. Truly, a poet who is known both by work and name to boys between fourteen and eighteen, is a national poet. Tagore's songs are heard in Calcutta streets, and have been widely spread by the student community and the Brahmo Samaj; but in the villages of Bengal they are unknown, while Rāmprasād's are heard everywhere. 'The peasants and the paṇḍits enjoy his songs equally. They draw solace from them in the hour of despair and even at the moment of death. The dying man brought to the banks of the Ganges asks his companions to sing Rāmprasādī songs.

दोस्तों, कीर्तन और श्यामा-संगीत पर आधारित जिस फ़िल्मी गीत को हमने आज चुना है, उसके संगीतकार हैं बप्पी लाहिड़ी। येसुदास और साथियों का गाया यह है फ़िल्म 'अपने पराये' का गीत "श्याम रंग रंगा रे, हर पल मेरा रे, मेरा मतवाला है मन, मधुबन तेरा रे"। भले ही इस गीत में भगवान कृष्ण की बातें हो रही हैं, पर संगीत के लिए बप्पी लाहिड़ी नें श्यामा-संगीत शैली को अपनाया है। साथ ही बंगाल का कीर्तन रूप भी साकार हो उठता है इस गीत में। गीतकार योगेश का लिखा यह गीत सुन कर मन बड़ा शान्त हो जाता है। बप्पी लाहिड़ी पे यह इलज़ाम है कि उन्होंने फ़िल्म-संगीत को अनर्थक साज़ और शोर शराबे से प्रदूषित किया है। इस बात में सच्चाई है, पर अगर हम उन पर यह आरोप लगा रहे हैं तो कम से कम 'अपने पराये' के प्रस्तुत गीत के लिए उन्हें बधाई भी तो देनी चाहिए! चलिए सुना जाये यह भक्ति रचना।



चलिए आज से खेलते हैं एक "गेस गेम" यानी सिर्फ एक हिंट मिलेगा, आपने अंदाजा लगाना है उसी एक हिंट से अगले गीत का. जाहिर है एक हिंट वाले कई गीत हो सकते हैं, तो यहाँ आपका ज्ञान और भाग्य दोनों की आजमाईश है, और हाँ एक आई डी से आप जितने चाहें "गेस" मार सकते हैं - आज का हिंट है -
नीरज के लिखे गीत में "गंगा" का वंदन है

पिछले अंक में
बप्पी दा ने ऐतबार में "किसी नज़र को तेरा" और शराबी में "मंजिलें अपनी जगह है" जैसे यादगार और सुरीले गीतों को रचा था.
खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Tuesday, October 18, 2011

धितंग धितंग बोले, मन तेरे लिए डोले....सलिल दा की ताल पर

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 768/2011/208

'ओल्ड इज़ गोल्ड' में इन दिनो जारी लघु शृंखला 'पुरवाई' की आठवीं कड़ी में आप सभी का बहुत बहुत स्वागत है। आज हम आपके लिए लेकर आये हैं बंगाल की एक लोकगाथा, या रूपकथा (fairy-tale) भी कह सकते हैं। इस कहानी का शीर्षक है 'सात भाई चम्पा और एक बहन पारुल'। चम्पा और पारुल बंगाल में पाये जाने वाले पेड़ हैं। बहुत समय पहले सुन्दरपुर में एक राजा अपनी सात रानियों के साथ रहता था। वह राजा बहुत ही नेक और साहसी था और इमानदारी को हर चीज़ से उपर रखता था। इसलिए प्रजा भी उन्हें बहुत प्यार करती थी। पर उनके पहली छह रानियाँ बहुत ही स्वार्थी और क्रूर थीं और छोटी रानी से जलती थीं क्योंकि वह राजा की प्यारी थी। राजा के मन में बस एक दुख था कि उनका कोई सन्तान नहीं था। किसी भी रानी से उन्हें सन्तान प्राप्ति नहीं हुई। जैसे जैसे दिन गुज़रते गए, राजा एक सन्तान की आस में बेचैन होते गए। जब एक दिन उन्हें पता चला कि छोटी रानी गर्भवती है, तो उनकी ख़ुशी का ठिकाना न रहा। राजा नें एक दिन छोटी रानी को सोने का एक घण्टा के साथ सोने की एक चेन बांध कर दिया और कहा कि जैसे ही बच्चे का जन्म हो तो इस घण्टे को बजाना, और मैं तुरन्त तुम्हारे पास आ जाउंगा। यह कह कर राजा अपने कक्ष में चला गया। उधर बच्चे के जन्म के समय बाकी छह रानियाँ वहाँ मौजूद थीं। उनसे छोटी रानी का सुख देखा नहीं गया। छोटी रानी नें सात लड़के और एक लड़की को जन्म दिया। छोटी रानी तो बेहोश थी, बाकी रानियों ने मिल कर नवजातों को बगीचे में ले जा कर दफ़ना दिया। वापस आकर उन दुष्ट रानियों नें छोटी रानी के बगल में सात चूहे और एक केंकड़ा रख दिया। बड़ी रानी नें फिर घण्टा बजाया और राजा दौड़ कर वहाँ आया। चूहों और केंकड़े को देख कर रजा गुस्से से तिलमिला उठा, छोटी रानी को जादूगरनी और चुड़ैल कहते हुए अपने महल से जिकाल दिया। इस दुखभरी कहानी का और कोई न सही पर प्रकृति चश्मदीद गवाह थी। प्रकृति को यह अन्याय सहन नहीं हुई। इसके विरोध में प्रकृति नें उस राज्य में पेड़ों पर फूल खिलाने बन्द कर दिए, नदियाँ सूख गईं। राज्य में सूखा पड़ गया, राजा को समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे। फिर एक दिन सुबह राज-पुरोहित भागा भागा राजा के पास आया और कहा - "महाराज, आश्चर्य की बात है कि जहाँ पूरे राज्य में कहीं कोई फूल नहीं खिला है, केवल आपके बगीचे में सात चम्पा और एक पारुल फूल खिले हुए हैं। पर जैसे ही मैं फूल तोड़ने लगा तो ऊंचाई पर चढ़ गए और कहा कि केवल राजा उन्हें तोड़ सकता है।" राजा भागते भागते बगीचे में गए, और जैसे ही उन फूलों को देखा तो उन्हें ऐसा लगा कि जैसे वो उन्हीं की सन्तानें हैं। राजा को देख कर पारुल नें अपने साथ भाई चम्पा फूलों को भी जगाया। उन फूलों नें राजा को आदेश दिया कि उनकी छोटी रानी को बुलाया जाए, केवल वो ही उन्हें छू सकती हैं। छोटी रानी को ढूंढ़ कर लाया गया और एक एक कर सारे फूल उनकी कदमों में गिर गए; पारुल एक सुन्दर राजकुमारी में परिवर्तित हो गई और साथ चम्पा भाई रूपान्तरित हो गए सात सुन्दर राजकुमारों में। फिर राजा अपनी छोटी रानी और आठ बच्चों के साथ सुखी-सुखी जीवन बिताने लगे।

दोस्तों, आप शायद यह सोच रहे होंगे कि हमने आपको चम्पा और पारुल की यह कहानी क्यों सुनाई? वह इसलिए कि आज हम जिस गीत की धुन पर आधारित गीत सुनवाने जा रहे हैं उस मूल गीत में भी इन्हीं चम्पा भाइयों और पारुल का ज़िक्र है। बल्कि दो गीत हैं, पहला गीत है "धितांग धितांग बोले, ए मादोले तान तोले, कार आनोन्दे उच्छोले आकाश भोरे जोछोनाय..... आय रे आय, लगन बोये जाय, मेघ गुर गुर कोरे चाँदेर शिमानाय, पारुल बोन डाके चम्पा छुटे आए..."। और दूसरा गीत है "सात भाई चम्पा जागो रे जागो रे...." (पारुल अपने सात चम्पा भाइयों को जगाते हुए यह गीत गा रही है)। इस धितांग धितांग बोले गीत की धुन पर आधारित गीत सलिल चौधरी नें ज़िया सरहदी निर्देशित 'महबूब प्रोडक्शन्स' की फ़िल्म 'आवाज़' के एक गीत में किया था, जिसके बोल थे "धितंग धितंग बोले, मन तेरे लिए डोले"। प्रेम धवन के लिखे और लता मंगेशकर और साथियों के गाये इस गीत में जहाँ बंगाल के संगीत की छाया है, वहीं इसके संगीत संयोजन में सलिल दा नें कई प्रान्तों के संगीत का प्रयोग किया है। लावणी की ताल से शुरु कर गोवा के लोक-संगीत की रिदम की तरफ़ कितनी सुन्दरता से ले गए हैं। पंकज राज अपनी किताब 'धुनों की यात्रा' में इस गीत के बारे में लिखते हैं कि "कैरेबियन बीट २-४ इस गीत में दादरा ताल ६-८ मात्रा बन कर अचम्भित कर देती है। ढोलक की तेज़ गति से लावणी का आभास देकर झटके से कोमल सुरों के साथ एकॉर्डियन और हारमोनियम की तरंग और फिर कोरस के साथ "आए रे आए प्यार के दिन आए" के साथ लहराते सुरों में इस गीत को बांधना सलिल की रचनात्मकता का अनुपम उदाहरण है।" तो दोस्तों, आइए इस गीत का आनन्द लिया जाए।



चलिए आज से खेलते हैं एक "गेस गेम" यानी सिर्फ एक हिंट मिलेगा, आपने अंदाजा लगाना है उसी एक हिंट से अगले गीत का. जाहिर है एक हिंट वाले कई गीत हो सकते हैं, तो यहाँ आपका ज्ञान और भाग्य दोनों की आजमाईश है, और हाँ एक आई डी से आप जितने चाहें "गेस" मार सकते हैं - आज का हिंट है -
येसुदास की आवाज़ में ये गीत है जिसके मुखड़े में "मधुबन" शब्द आता है, पर ये पहला नहीं है

पिछले अंक में
अमित जी बहुत से हिंट दे देंगें तो आप पक्के हो जायेंगें कि फलां गीत है, जरा सा संशय रहने दीजिए, वैसे कल आपके बहुत सी कोशिशों में से एक सही निशाने पर टिका है बधाई
खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी


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Monday, October 17, 2011

साजन की हो गयी गोरी...सुन्दर बाउल संगीत पर आधारित देवदास की अमर गाथा से ये गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 767/2011/207

'पुरवाई' शृंखला में इन दिनों आप आनन्द ले रहे हैं पूर्वी और उत्तरपूर्वी भारत के लोक संगीत पर आधारित हिन्दी फ़िल्मी गीतों का अपने दोस्त सुजॉय चटर्जी और साथी सजीव सारथी के साथ। आज हम जिस लोक-शैली की चर्चा करने जा रहे हैं उसे बंगाल में बाउल के नाम से जाना जाता है। बाउल एक धार्मिक गोष्ठी भी है और संगीत की एक शैली भी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि बाउल में वैष्णव हिन्दू भी आते हैं और सूफ़ी मुसलमान भी। इस तरह से यह साम्प्रदायिक सदभाव का भी प्रतीक है। हालाँकि बाउल बंगाल की जनसंख्य का एक बहुत छोटा सा अंश है, पर बंगाल की संस्कृति में बाउल का महत्वपूर्ण योगदान है। सन् २००५ में बाउल शैली को UNESCO के 'Masterpieces of the Oral and Intangible Heritage of Humanity' की फ़ेहरिस्त में शामिल किया गया है। बाउल की शुरुआत कहाँ से और कब से हुई इसका सटीक पता नहीं चल पाया है, पर 'बाउल' शब्द बंगाली साहित्य में १५-वीं शताब्दी से ही पाया जाता है। बाउल संगीत एक प्रकार का लोक गीत है जिसमें हिन्दू भक्ति धारा और सूफ़ी संगीत, दोनों का प्रभाव है। बाउल गीतों में प्रयोग होने वाला मुख्य साज़ है इकतारा। इकतारे के बिना बाउल गीत सम्भव नहीं। इसके अलावा दोतारा, डुग्गी, ढोल, खोल, खरताल और मंजिरा और बांसुरी का भी प्रयोग होता है बाउल गीतों में।

बाउल लोक-गीतों की अपनी अलग पहचान होती है, इसे हम शब्दों में तो नहीं समझा सकते लेकिन यू-ट्युब में आप बंगला बाउल गीतों को सुन कर इस शैली का एक अन्दाज़ा लगा सकते हैं। हिन्दी फ़िल्मों में भी बाउल संगीत शैली का इस्तेमाल हुआ है जब जब बंगाल की पृष्ठभूमि पर फ़िल्में बनी हैं। बिमल राय की १९५५ की फ़िल्म 'देवदास' के लिए उन्होंने सलिल चौधरी की जगह सचिन देब बर्मन को बतौर संगीतकार चुना। इस फ़िल्म में दो गीत ऐसे थे जो बाउल संगीत शैली के थे। दोनों ही गीत मन्ना डे और गीता दत्त की आवाज़ों में था, इनमें से एक गीत "आन मिलो आन मिलो श्याम सांवरे" तो हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर सुनवा ही चुके हैं, दूसरा गीत है "साजन की हो गई गोरी"। क्यों न आज इसी गीत को सुना जाए! दिलीप कुमार, वैजयन्तीमाला और सुचित्रा सेन अभिनीत इस फ़िल्म की तमाम जानकारियाँ तो हम "आन मिलो श्याम सांवरे" गीत की कड़ी में ही दे दिया था; आज के प्रस्तुत गीत का फ़िल्मांकन कुछ इस तरह से किया गया है कि पारो (सुचित्रा सेन) आंगन में गुमसुम बैठी है, और एक बाउल जोड़ी उसकी तरफ़ इशारा करते हुए गाते हैं "साजन की हो गई गोरी, अब घर का आंगन बिदेस लागे रे"। साहिर लुधियानवी नें कितने सुन्दर शब्दों का प्रयोग किया है इस गीत में और बंगाल का वह बाउल परिवेश को कितनी सुन्दरता से उभारा गया है इस गीत में। २००२ के 'देवदास' में इस तरह का तो कोई गीत नहीं था, पर जसपिन्दर नरूला और श्रेया घोषाल के गाये "मोरे पिया" गीत के भाव से इस गीत का भाव थोड़ा बहुत मिलता जुलता है। तो आइए आनन्द लिया जाये "साजन की हो गई गोरी" का।



चलिए आज से खेलते हैं एक "गेस गेम" यानी सिर्फ एक हिंट मिलेगा, आपने अंदाजा लगाना है उसी एक हिंट से अगले गीत का. जाहिर है एक हिंट वाले कई गीत हो सकते हैं, तो यहाँ आपका ज्ञान और भाग्य दोनों की आजमाईश है, और हाँ एक आई डी से आप जितने चाहें "गेस" मार सकते हैं - आज का हिंट है -
प्रेम धवन की कलम से निकले इस गीत के मुखड़े में शब्द है -"दीवाने"

पिछले अंक में
वाह अमित जी वाह, वैसे इस शब्द से शुरू होने वाले साहिर के और गीतों को खोजिये अच्छी रिसर्च हो जायेगी
खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी


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Sunday, October 16, 2011

सुन री पवन, पवन पुरवैया.. भटयाली संगीत की लहरों में बहाते बर्मन दा

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 766/2011/206

मस्कार! 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के सभी श्रोता-पाठकों का इस नए सप्ताह में हार्दिक स्वागत है। इन दिनों जारी है लघु शृंखला 'पुरवाई' जिसके अन्तर्गत आप आनन्द ले रहे हैं पूर्व और पुर्वोत्तर भारत के लोक और पारम्परिक धुनों पर आधारित हिन्दी फ़िल्मी रचनाओं की। आज हम आपको लिए चलते हैं पूर्वी बंगाल, यानि कि वो जगह जिसका ज़्यादातर अंश आज बंगलादेश में पड़ता है। आपको बता दें कि पूर्वी बंगाल और पश्चिम बंगाल की संस्कृति, रहन-सहन, खान-पान और गीत-संगीत में बहुत अन्तर है। असम और त्रिपुरा में भी पूर्वी बंगालियों का एक बड़ा समूह वास करता है। आज के इस कड़ी में हम पूर्वी बंगाल के बहुत प्रचलित लोक-गीत शैली पर आधारित गीत सुनवाने जा रहे हैं जिसे भटियाली लोक-गीत कहा जाता है। भटियाली मांझी गीत है जिसे नाविक भाटे के बहाव में गाते हैं। जी हाँ, ज्वार-भाटा वाला भाटा। क्योंकि भाटे में चप्पु चलाने की ज़रूरत नहीं पड़ती, इसलिए मांझी लोग गुनगुनाने लग पड़ते हैं। और इस "भाटा-संगीत" को ही भटियाली कहते हैं। मूलत: इस शैली का जन्म मीमेनसिंह ज़िले में हुआ था जहाँ मांझी ब्रह्मपुत्र नदी में नाव चलाते हुए गाते थे। धीरे धीरे यह संगीत फैला और समूचे बंगाल (पूर्वी और पश्चिम) में गाया जाने लगा। भटियाली गीतों का विषय मूलत: नाव चलाने, मछलियाँ पकड़ने और नदियों से सम्बन्धित हुआ करते हैं। बंगलादेश के कुल १४ किस्म के लोक गीतों में भटियाली प्रकृति-तत्व का प्रतिनिधित्व करता है। अन्य तत्वों में शामिल है देह-तत्व (शरीर के विषय में) और मुर्शिद-तत्व (गुरु के विषय में)।

भटियाली गीत-संगीत से जुड़े प्रसिद्ध संगीतकार और गीतकारों में कुछ उल्लेखनीय नाम हैं मिराज़ अली, उकिल मुन्शी, राशीदुद्दीन, जलाल ख़ान, जंग बहादुर, शाह अब्दुल करीम और उमेद अली। १९३० से १९५० का समय भटियाली संगीत का स्वर्णयुग था और ये तमाम फ़नकार उसी दौर के थे। गायक अब्बासुद्दीन नें इस गायन शैली को लोकप्रिय बनाया, और सबसे लोकप्रिय गीत उनका रहा "आमाय भाशाइली रे, आमय डुबाइली रे" (मुझे बहा ले गया, मुझे डुबो ले गया)। आज के दौर के दो प्रमुख भटियाली गायक हैं मलय गांगुली और बारी सिद्दिक़ी। अब आते हैं फ़िल्मी गीतों पर। क्योंकि सचिन देव बर्मन का जन्म और बचपन त्रिपुरा में प्रकृति के बहुत करीब से बीता, इसलिए वहाँ का हर तरह का लोक-संगीत उनके ख़ून में रच-बस गया था। अन्य तमाम लोक-शैलियों के साथ साथ भटियाली संगीत का भी उन्होंने कई कई बार प्रयोग किया। "मेरे साजन है उस पार" और "सुन मेरे बन्धु रे" इस श्रेणी के दो सबसे ज़्यादा उल्लेखनीय गीत हैं। उनकी आवाज़ में एक मशहूर भटियाली गीत था "के जाश रे, भाटी गांग बाइया...." (कौन जा रहा है उधर, नाव खेते हुए...)। यह बड़ा ही मार्मिक गीत है जिसे सुन कर हर लड़की की आँखों में आंसू आ जाते हैं। गीत का भाव कुछ ऐसा है कि ससुराल में घर-संसार सम्भालते हुए लड़की बहुत सालों से माइके नहीं जा पा रही हैं। ऐसे में वो दूर नदी में जा रही नाव के नाविकों को पुकार कर कह रही है कि अरे ओ कौन जा रहे हो, ज़रा मेरे घर में जा कर मेरे भाई से कहना कि वो आकर मुझे कुछ दिनों के लिए यहाँ से ले माइके ले जाए। कितने दिन हो गए माइके गए हुए। फिर गीत के अन्तरों में लड़की अपने बचपन के दिनों को याद करती है, माता-पिता और भाई-बहनों, सखी-सहेलियों को याद करती हैं। इस गीत को आप इस लिंक पर सुन सकते हैं। कहीं मैंने पढ़ा है कि इस गीत के बोल बर्मन दादा की पत्नी मीरा देब बर्मन नें लिखी हैं, पर इसकी पुष्टि नहीं हो पायी है।

और अब इसी धुन पर आधारित सुनिए बर्मन दादा का ही स्वरबद्ध किया फ़िल्म 'अनुराग' का गीत "सुन री पवन, पवन पुरवइया, मैं हूँ अकेली अलबेली तू सहेली मेरी बन जा साथिया"। इस गीत का भाव भी इसके बंगला संस्करण की ही तरह अकेलेपन से ताल्लुख़ रखता है, पर यहाँ लड़की ससुराल में अकेला नहीं महसूस कर रही है, बल्कि वो नेत्रहीन है और किसी जीवन-साथी की आस में बैठी है। लता मंगेशकर की अद्वितीय आवाज़ में आनन्द बख्शी की रचना प्रस्तुत है 'पुरवाई' शृंखला की छठी कड़ी में, भटियाली सुरों के साथ।



चलिए आज से खेलते हैं एक "गेस गेम" यानी सिर्फ एक हिंट मिलेगा, आपने अंदाजा लगाना है उसी एक हिंट से अगले गीत का. जाहिर है एक हिंट वाले कई गीत हो सकते हैं, तो यहाँ आपका ज्ञान और भाग्य दोनों की आजमाईश है, और हाँ एक आई डी से आप जितने चाहें "गेस" मार सकते हैं - आज का हिंट है -
साहिर का लिखा ये गीत "साजन" शब्द से शुरू होता है

पिछले अंक में
आपने बहुत अच्छे अच्छे गीत सुझाए शरद जी जिसमें 'अलबेली" शब्द आया है, बाकी श्रोता भी इस तरह बताएं तो हमारे पास एक शब्द प्रयुक्त गीतों की खासी सूची बन जायेगी
खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Thursday, October 13, 2011

संग मेरे निकले थे साजन....आज लीजिए नेपाली लोक धुन से प्रेरित ये गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 765/2011/205

मस्कार! 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में पूर्वी और उत्तर-पूर्वी भारत के लोक धुनों पर आधारित हिन्दी फ़िल्मी रचनाओं की चल रही शृंखला 'पुरवाई' में आप सभी का हार्दिक स्वागत है। असम, सिक्किम और उत्तर बंगाल में एक बड़ा समुदाय नेपालियों का भी है। मूलत: नेपाल से ताल्लुख़ रखने वाले ये लोग बहुत समय पहले इन अंचलों में आ बसे थे और अब ये भारत के ही नागरिक हैं और भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग भी। नेपाली लोक-गीत इतने मधुर होते हैं कि तनाव भरी ज़िन्दगी जी रहे लोग अगर इन्हें सुनें तो जैसे मन-मस्तिष्क ताज़गी से भर जाता है। पहाड़ों की मन्द-मन्द शीतल बयार जैसे इन गीतों के साथ-साथ चलने लग जाती है। जितने भी भारत के पहाड़ी अंचल हैं, उनमें जो लोक-संगीत की परम्परा है, उनमें नेपाली लोक-संगीत एक बेहद महत्वपूर्ण स्थान रखती है। और शायद इसी वजह से हमारी हिन्दी फ़िल्मों में भी कई बार नेपाली लोक धुनों का गीतों में इस्तमाल किया गया है। सलिल चौधरी एक ऐसे संगीतकार हुए जिन्होंने असम और पहाड़ी संगीत का ख़ूब इस्तमाल किया जिनमें नेपाली लोक धुनें भी शामिल थीं। इसका सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण फ़िल्म 'मधुमति' के गीत हैं। सचिन देव बर्मन और उनके पुत्र राहुल देव बर्मन का भी इस तरह रुझान रहा है। कहा जाता है कि दादा बर्मन नें 'ज्वेल थीफ़' फ़िल्म के गीत "होठों पे ऐसी बात मैं दबा के चली आई" की रेकॉर्डिंग् करने से इन्कार कर दिया था क्योंकि इस गीत के ऑरकेस्ट्रेशन में नेपाली वाद्यों की ज़रूरत थी जिन्हें ख़ास नेपाल से मंगवाया गया था। और क्योंकि वो सामान नहीं आ पहुँचा था, दादा नें अन्य वाद्यों का इस्तमाल करना गवारा नहीं किया। दादा के बेटे पंचम नें भी कई बार नेपाली धुनों का सहारा लिया। शम्मी कपूर पर फ़िल्माये 'तीसरी मंज़िल' का गीत "दीवाना मुझसा नहीं इस अम्बर के नीचे", फ़िल्म 'जोशीले' का गीत "दिल में जो बातें हैं आओ चलो हम कह दें" और फ़िल्म 'फिर वही रात' का गीत "संग मेरे निकले थे साजन" असल में नेपाली लोक-धुनों पर ही अधारित हैं।

'पुरवाई' के लिए हमनें नेपाली लोक धुन पर आधारित जिस फ़िल्मी रचना को चुना है, वह है फ़िल्म 'फिर वही रात' का गीत "संग मेरे निकले थे साजन, हार बैठे, थोड़ी ही दूर चल के"। लता मंगेशकर, किशोर कुमार और साथियों का गाया यह गीत फ़िल्माया गया है राजेश खन्ना, किम और सहेलियों पर। यह गीत जिस नेपाली मूल लोक गीत पर आधारित है वह एक डोहोरी गीत है, जिसके बोल हैं "आगे आगे टोपई को गोला, पाछी पाछी मशीन गन भररा"। यूं तो इस गीत के कई संस्करण बने हैं, पर सबसे पुराना और लोकप्रिय जो वर्ज़न है, वह १९६५ में डैनी डेन्ज़ोंगपा और आशा भोसले का गाया हुआ एक स्टेज शो गीत है, और इस शो का आयोजन काठमाण्डु, नेपाल में किया गया था। इस नेपाली गीत को सुनने के लिए आप यहाँ क्लिक करें:

मज़े की बात ही कहिए या फिर संयोग, 'फिर वही रात' में भी डैनी नें अभिनय किया था। "संग मेरे निकले थे साजन" गीत के बारे में यही कहना चाहेंगे कि पंचम नें भले नेपाली धुन का इस्तमाल किया, पर केवल मुखड़े में। अंतरा उनका अपना कम्पोज़िशन था। गीत के शुरु में कोरस का प्रयोग बहुत लुभावना है, और अन्त में बांसुरी की तान तो जैसे हमें यकायक किसी दूर पर्वत पर उड़ा ले जाता है। फ़िल्म के न चलने से यह गीत उतना लोकप्रिय नहीं हुआ, पर बचपन में रेडियो पर मैंने इस गीत को इतना सुना है कि मेरे पसन्दीदा गीतों में से एक रहा है यह गीत। तो आइए सुनते हैं मजरूह सुल्तानपुरी का लिखा यह गीत। खासी, बिहु, असमीया कीर्तन और चाय बागान के बाद आज 'पुरवाई' में बारी नेपाली लोक धुन की। सुनिए और अपने दोस्तों यारों को भी सुनने पे मजबूर कीजिए।



चलिए आज से खेलते हैं एक "गेस गेम" यानी सिर्फ एक हिंट मिलेगा, आपने अंदाजा लगाना है उसी एक हिंट से अगले गीत का. जाहिर है एक हिंट वाले कई गीत हो सकते हैं, तो यहाँ आपका ज्ञान और भाग्य दोनों की आजमाईश है, और हाँ एक आई डी से आप जितने चाहें "गेस" मार सकते हैं - आज का हिंट है -
मुखड़े में शब्द है "अलबेली"

पिछले अंक में
इंदु जी गीत कैसा लगा ये बतयिये
खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी


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Wednesday, October 12, 2011

जाने क्या है जी डरता है...असम के चाय के बागानों से आती एक हौन्टिंग पुकार

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 764/2011/204

सम के लोक-संगीत की बात चल रही हो और चाय बागानों के संगीत की चर्चा न हो, यह सम्भव नहीं। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार, और स्वागत है शृंखला 'पुरवाई' में जिसमें इन दिनों आप पूर्व और उत्तर-पूर्व भारत के लोक धुनों पर आधारित हिन्दी फ़िल्मी गीत सुन रहे हैं। चाय बागानों की अपनी अलग संस्कृति होती है, अपना अलग रहन-सहन, गीत-संगीत होता है। दरअसल इन चाय बागानों में काम करने वाले मज़दूर असम, बंगाल, बिहार और नेपाल के रहने वाले हैं और इन सब की भाषाओं के मिश्रण से एक नई भाषा का विकास हुआ जिसे चाय बागान की भाषा कहा जाता है। यह न तो असमीया है, न ही बंगला, न नेपाली है और न ही हिन्दी। इन चारों भाषाओं की खिचड़ी लगती है सुनने में, पर इसका स्वाद जो है वह खिचड़ी जैसा ही स्वादिष्ट है। यहाँ का संगीत भी बेहद मधुर और कर्णप्रिय होता है। असम के चाय बागानों में झुमुर नृत्य का चलन है। यह नृत्य लड़कों और लड़कियों द्वारा एक साथ किया जाता है, और कभी-कभी केवल लड़कियाँ करती हैं झुमुर नृत्य। इस नृत्य में पाँव के स्टेप्स का बहुत महत्व होता है, एक क़दम ग़लत पड़ा और नृत्य बिगड़ जाए। ऐसा इसलिए क्योंकि नृत्य करने वाले एक दूसरे की कमर को कस के पकड़े हुए होते हैं। और इस नृत्य के दौरान बजने वाला गीत-संगीत नृत्य को और भी ज़्यादा सुनद्र बना देते हैं। एक अजीब सुकून देने वाला यह संगीत है। आज के बड़े शहरों की तनाव से भरी ज़िन्दगी जीने वालों के लिए यह सुझाव देना चाहेंगे कि एक बार असम या उत्तर बंगाल के चाय बागानों की सैर कर आइए, यकीन दिलाते हैं कि आप एक नई ताज़गी और स्फूर्ति से भर उठेंगे। शायद वैसी ही ताज़गी जो यहाँ के चाय पत्तियों से बनी चाय की चुस्की लेते हुए आप महसूस करते हैं।

आज के अंक के लिए असम के चाय बागान के संगीत पर आधारित हमनें जिस गीत को चुना है, उसे भी कल की तरह भूपेन हज़ारिका नें ही स्वरबद्ध किया है। फ़िल्म 'एक पल' का यह गीत है "जाने क्या है जी डरता है, रो देने को जी करता है, अपने आप से डर लगता है, डर लगता है, क्या होगा"। लता मंगेशकर की आवाज़ है और गुलज़ार के बोल। यह १९८६ की कल्पना लाजमी निर्देशित फ़िल्म थी जो असम की पृष्ठभूमि पर बनी फ़िल्म थी। फ़िल्म के सभी गीतों में असमीया संगीत साफ़ सुनाई देता है, फिर चाहे आज का यह गीत हो या "मैं तो संग जाऊँ बनवास", विदाई गीत "ज़रा धीरे ज़रा धीमे" हो या फिर "फूले दाना दाना"। आज जो गीत आपको सुनवा रहे हैं, इसका असमीया गीत हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड शनिवार विशेष' के उषा मंगेशकर पर केन्द्रित अंक में सुनवा चुके हैं। याद है न "राधाचुड़ार फूल गूंजी राधापुरोर राधिका" गीत? यह एक झुमुर नृत्य शैली का लोक गीत है जिस पर आधारित यह असमीया गीत है। पर हिन्दी वर्ज़न में भूपेन हज़ारिका नें बीट्स कम कर के इसमें एक हौन्टिंग् टच ले आये हैं। गीत सुन कर वाक़ई ऐसा लगता है कि कोई डरा हुआ है। तो आइए आज असम के चाय बगानों की सैर की जाये लता मंगेशकर, भूपेन हज़ारिका और गुलज़ार के साथ फ़िल्म 'एक पल' के इस गीत के माध्यम से।



चलिए आज से खेलते हैं एक "गेस गेम" यानी सिर्फ एक हिंट मिलेगा, आपने अंदाजा लगाना है उसी एक हिंट से अगले गीत का. जाहिर है एक हिंट वाले कई गीत हो सकते हैं, तो यहाँ आपका ज्ञान और भाग्य दोनों की आजमाईश है, और हाँ एक आई डी से आप जितने चाहें "गेस" मार सकते हैं - आज का हिंट है -
काका बाबु और किम पर फिल्मांकित इस गीत का आरंभ होता है इस शब्द से -"संग"

पिछले अंक में
लगता है की अब सभी श्रोता हमारे इशारों में बात करते हैं :) सुजॉय की पुरवाई का असर है
खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी


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Tuesday, October 11, 2011

जब से तूने बंसी बजाई रे....भूपेन हजारिका का स्वरबद्ध एक मधुर गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 763/2011/203

पूर्वी और पुर्वोत्तर राज्यों के लोक धुनों पर आधारित हिन्दी फ़िल्मी गीतों की लघु शृंखला 'पुरवाई' की तीसरी कड़ी में आप सभी का स्वागत है। जैसा कि पहली कड़ी में हमने कहा था कि हमारे देश के हर राज्य के अन्दर भी कई अलग अलग प्रकार के लोक गीत पाये जाते हैं; इसमे असम राज्य कोई व्यतिक्रम नहीं है। कल की कड़ी में हमने बिहु का आनद लिया था, आज प्रस्तुत है असम की भक्ति गीतों की शैली में कम्पोज़ किया एक गीत। असम के नामघरों में जिस तरह का धार्मिक संगीत गाया जाता है, यह गीत उसी शैली का है। संगीतकार भूपेन हज़ारिका नें पहली बार इसका प्रयोग अपनी असमीया फ़िल्म 'मणिराम दीवान' के "हे माई जोख़ुआ" गीत में किया था, बाद में ७० के दशक में जब उन्हे हिन्दी फ़िल्म 'आरोप' में संगीत देने का सुयोग मिला, और एक भक्ति रचना उन्हें फ़िल्म के लिए कम्पोज़ करना था, तो इसी धुन का उन्होंने दुबारा इस्तमाल किया और गायिका लक्ष्मी शंकर से यह गीत गवाया जिसके बोल थे "जब से तूने बंसी बजाई रे, बैरन निन्दिया चुराई, मेरे ओ कन्हाई, नटखट कान्हा ओ हरजाई रे काहे पकड़ी कलाई, मेरे ओ कन्हाई"। १९७४ की इस फ़िल्म में गीत लिखीं माया गोविन्द नें।

आइए आज इस कड़ी में आपको असम के नामघरों के बारे में बताते हैं। नाम का अर्थ है प्रार्थना। नामघर उस जगह को कहते हैं जहाँ लोग जमा हो कर आध्यात्मिक कार्य करते हैं जैसे कि प्रार्थना (अलग अलग प्रकार के 'नाम') और भावना (आधात्मिक नाट्य जिसमें पारम्परिक वेशभूषा और नृत्यों का प्रयोग होता है)। नामघर की परम्परा मूलत: असम के वैष्णवी हिन्दू धर्म के लोगों में पायी जाती है। वैष्णवी लोग भगवान कृष्ण के भक्त होते हैं जो नामघरों में नियमीत रूप से जाकर प्रार्थना करते हैं। वहाँ वे पवित्र ग्रंथों का पाठ करते हैं जिनमें कीर्तन, भागवत, नाम-घोसा आदि शामिल हैं, और पाठ के समय लोग "रीदमिक क्लैपिंग्" करते हैं और कई बार पारम्परिक वाद्यों का इस्तमाल किया जाता है। हालाँकि यह धार्मिक कार्यों तक ही सीमित होते हैं, नामघरों का उपयोग कम्युनिटी हॉल के रूप में किया जाता है शैक्षिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक और उन्नयनमूलक कार्यों के लिए। नामघर को असम के 'neo-vaishnavite movement' का योगदान समझा जाता है। असम के प्रसिद्ध वैष्णव सन्त श्रीमन्त शंकरदेव (१४४९ - १५६९) नें नामघर की परिकल्पना की थी। किसी भी नामघर के एक अन्त में एक सिंहासन होता है, और दूसरे अन्त में होता है नामघर का मुख्य द्वार। इस सिंहासन में पवित्र ग्रंथ रखा होता है पूजा के लिए, और इस सिंहासन को सहारा स्वरूप चार हाथी, २४ सिंह और ७ बाघों की मूर्तियों का प्रयोग होता है। नामघर के अन्दर पौराणिक चरित्रों जैसे कि गरूड़, हनुमान, नागर, अनन्त आदि की मूर्तियाँ भी होती हैं। तो दोस्तों, चलिए असम की इस धार्मिक संगीत की शैली में सुनते हैं फ़िल्म 'आरोप' का गीत लक्ष्मी शंकर की आवाज़ में। बड़ा ही दिल को छू लेने वाला संगीत है इस गीत का।



चलिए आज से खेलते हैं एक "गेस गेम" यानी सिर्फ एक हिंट मिलेगा, आपने अंदाजा लगाना है उसी एक हिंट से अगले गीत का. जाहिर है एक हिंट वाले कई गीत हो सकते हैं, तो यहाँ आपका ज्ञान और भाग्य दोनों की आजमाईश है, और हाँ एक आई डी से आप जितने चाहें "गेस" मार सकते हैं - आज का हिंट है -
गुलज़ार का लिखा ये गीत "जाने" शब्द से शुरू होता है

पिछले अंक में
मज़ा आया इंदु जी
खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Monday, October 10, 2011

फूले बन बगिया, खिली कली कली....बिहु रंग रंगा ये सुरीला गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 762/2011/202

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार, और बहुत बहुत स्वागत है आप सभी का इस सुरीली महफ़िल में। कल से हमने शुरु की है पूर्वी और पुर्वोत्तर भारत के लोक गीतों पर आधारित हिन्दी फ़िल्मी गीतों से सजी लघु शृंखला 'पुरवाई'। कल पहली कड़ी में आपनें सुनी अनिल बिस्वास के संगीत में मेघालय के खासी जनजाति के एक लोक धुन पर आधारित मीना कपूर की गाई फ़िल्म 'राही' की एक लोरी। आज जो गीत हम लेकर आये हैं उसके संगीतकार भी अनिल बिस्वास ही हैं और गायिका भी मीना कपूर ही हैं। पर साथ में मन्ना डे की आवाज़ भी शामिल है। पर यह गीत किसी खासी लोक धुन पर नहीं बल्कि असम की सबसे ज़्यादा लोकप्रिय लोक-गीत 'बिहु' पर आधारित है। बिहु में गीत, संगीत और नृत्य, तीनों की समान रूप से प्रधानता होती है। इनमें से कोई भी एक अगर कमज़ोर पड़ जाए, तो बात नहीं बनती। बिहु असम का सबसे महत्वपूर्ण त्योहार भी है और बिहु गीत व बिहु नृत्य इस त्योहार का प्रतीक स्वरूप है। 'बिहु' शब्द 'दिमसा कछारी' जनजाति के भाषा से आया है। ये लोग मुख्यत: कृषि प्रधान होते हैं और ये ब्राई शिबराई यानि बाबा शिबराई की पूजा करते हैं। मौसम के पहली फसल को ये लोग ब्राई शिबराई को समर्पित करते हैं और उनसे शान्ति और ख़ुशहाली की दुआ माँगते हैं। इस तरह से "बि" का अर्थ है "माँगना" और "शु" का अर्थ है "शान्ति और ख़ुशहाली"। यहीं से आया है "बिशु", और क्योंकि असमीया में "श" का उच्चारण "ह" भी होता है, इस तरह से "बिशु" बन गया है "बिहु"। यूं तो बिहु साल में कई बार आता है अलग अलग रूप लेकर, लेकिन गीत-संगीत वाले बिहु की बात करें तो यह अप्रैल के महीने में बैसाखी के समय आता है जिसे 'रंगाली बिहु' या "बहाग (बैसाख) बिहु" कहा जाता है। 'रंगाली बिहु' का त्योहार उपजाऊ धरती का प्रतीक है, जिसमें बिहु नृत्य के माध्यम से स्त्री-पुरुष उत्तेजक अंग भंगिमाओं से अपनी उर्वरक होने का आहवान करते हैं। बिहु गीत-संगीत में जिन वाद्यों का प्रयोग होता है, उनमें मुख्य रूप से शामिल हैं ढोल, ताल, पेपा, टोका, बांसुरी, ख़ुतुली और गोगोना। ये सभी असम के पारम्परिक वाद्य हैं।

मीना कपूर, मन्ना डे और साथियों के गाए अनिल बिस्वास के संगीत पर हमने जिस गीत को चुना है वह है १९६२ की फ़िल्म 'सौतेला भाई' का। इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे गुरु दत्त, प्रनोती घोष और बेला बोस। किसी भी बिहु गीत में रीदम के साथ मुख्य गीत शुरु होने से पहले बिना ताल के दो तीन लाइनें होती हैं, यानि जैसे कि मुखड़े के पहले का शेर। इसी तरह से प्रस्तुत गीत में भी मुख्य गीत शुरु होने से पहले के बोल हैं "फूले बन बगिया, खिली कली कली, आई ॠतु अलबेली, संग की सहेलियाँ गईं पिया घर, रह गई दैया मैं अकेली"। फिर इसके बाद बिहु रीदम के साथ मुखड़ा शुरु होता है "काह्हा करूँ, आह्हा जिया, मोह्ह गई, देखो जिया रे"। शैलेन्द्र का लिखा यह गीत है और मूल बिहु गीत के बोल हैं "पाह गिसा साह कोरी नेह लागी....."। बिहु के रीदम पर हिन्दी के बोलों को बिठाना, इसमें जो शब्दों की कटिंग् है, वह आसान काम नहीं था, इस बारे में जानिये अनिल बिस्वास से ही। "बहुत मुश्किल हुई थी। मेरे जैसे शैलेन्द्र जो थे न, वो भी चैलेन्ज उनको कर दो तो वो भी सर खपा देते थे। उन्होंने मुझसे कहा कि 'दादा, मैं अब हिन्दी शब्द को इसके जैसे कैसे तोड़ूं जो आसामी लोग तोड़ गए?' मैंने कहा कि यह गाना मुझे चाहिए, अब तुम्हारे सिवा कौन लिखेगा मुझे पता नहीं। फिर कहने लगे कि हम ज़रा समुन्दर किनारे होकर आते हैं। गए और लिख के ले आए "काह करूँ आह जिया मोह गई रेमैंने बोला यह तो वैसा नहीं लग रहा है। तो बोले कि इसको आप ऐसे गाओ "काह्ह करूँ आह्ह जिया मोह्ह गई देखो जिया रे"। मैं क्या बताऊँ, 'हैट्स ऑफ़ टू दैट मैन"! तो लीजिए दोस्तों, बिहु पर आधारित फ़िल्म 'सौतेला भाई' का यह गीत सुनिए मीना कपूर, मन्ना डे और साथियों की आवाज़ों में।



चलिए आज से खेलते हैं एक "गेस गेम" यानी सिर्फ एक हिंट मिलेगा, आपने अंदाजा लगाना है उसी एक हिंट से अगले गीत का. जाहिर है एक हिंट वाले कई गीत हो सकते हैं, तो यहाँ आपका ज्ञान और भाग्य दोनों की आजमाईश है, और हाँ एक आई डी से आप जितने चाहें "गेस" मार सकते हैं - आज का हिंट है -
मुखड़े में शब्द है "बंसी" और "हरजाई"

पिछले अंक में
वाह अमित भाई
खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

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