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Sunday, December 23, 2018

राग सिन्दूरा : SWARGOSHTHI – 399 : RAG SINDURA






स्वरगोष्ठी – 399 में आज

पूर्वांग और उत्तरांग राग – 14 : राग सिन्दूरा

मुकेश से फिल्म का एक गीत और पण्डित श्रीकृष्ण नारायण रातंजनकर से राग सिन्दूरा सुनिए




डॉ.श्रीकृष्ण नारायण रातंजनकर
मुकेश
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “पूर्वांग और उत्तरांग राग” की चौदहवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। रागों को पूर्वांग और उत्तरांग में विभाजित करने के लिए सप्तक के सात स्वरों के साथ तार सप्तक के षडज स्वर को मिला कर आठ स्वरों के संयोजन को दो भागों में बाँट दिया जाता है। प्रथम भाग षडज से मध्यम तक पूर्वांग और दूसरे भाग पंचम से तार षडज तक उत्तरांग कहा जाता है। इसी प्रकार जो राग दिन के पहले भाग (पूर्वार्द्ध) अर्थात दिन के 12 बजे से रात्रि के 12 बजे के बीच में गाया-बजाया जाता हो उन्हें पूर्व राग और जो राग दिन के दूसरे भाग (उत्तरार्द्ध) अर्थात रात्रि 12 बजे से दिन के 12 बजे के बीच गाया-बजाया जाता हो उन्हें उत्तर राग कहा जाता है। भारतीय संगीत का यह नियम है कि जिन रागों में वादी स्वर सप्तक के पूर्वांग में हो तो उन्हें दिन के पूर्वार्द्ध में और जिन रागों को वादी स्वर सप्तक उत्तरांग में हो उन्हे दिन के उत्तरार्द्ध में गाया-बजाया जाना चाहिए। राग का वादी स्वर यदि सप्तक के प्रथम भाग में है संवादी स्वर निश्चित रूप से सप्तक के दूसरे भाग में होगा। इसी प्रकार यदि वादी स्वर सप्तक के दूसरे भाग में हो तो संवादी स्वर सप्तक के पूर्व में होगा। वादी और संवादी स्वरों में सदैव तीन अथवा चार स्वरों का अन्तर होता है। इसलिए यदि वादी स्वर ऋषभ है तो संवादी स्वर पंचम या धैवत होगा। इसी प्रकार यदि वादी स्वर धैवत हो तो संवादी स्वर गान्धार अथवा ऋषभ होगा। भीमपलासी, बसन्त और भैरवी जैसे कुछ राग इस नियम के अपवाद होते हैं। इस कठनाई को दूर करने के लिए सप्तक के पूर्वांग और उत्तरांग का क्षेत्र बढ़ा दिया जाता है। पूर्वांग का क्षेत्र षडज से पंचम तक और उत्तरांग का क्षेत्र मध्यम से तार सप्तक के षडज तक माना जाता है। इस प्रकार वादी-संवादी में से यदि एक स्वर पूर्वांग में हो तो दूसरा स्वर उत्तरांग में हो जाता है। इस श्रृंखला में हम आपसे कुछ पूर्वांग और उत्तरांग प्रधान रागों पर चर्चा करेंगे। इस श्रृंखला के लिए चुने गए अधिकतर रागों में वादी स्वर षडज अथवा ऋषभ होता है और संवादी स्वर पंचम अथवा मध्यम होता है। श्रृंखला की चौदहवीं कड़ी में आज हमने राग सिन्दूरा चुना है। श्रृंखला की इस कड़ी में आज 1960 में निर्मित और अप्रदर्शित फिल्म “भूल न जाना” से मुकेश के स्वर में राग सिन्दूरा का स्पर्श करता एक गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके साथ ही राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए सुविख्यात संगीतज्ञ और लखनऊ स्थित भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय (तब – मैरिस म्यूजिक कालेज) के यशस्वी प्रधानाचार्य पण्डित (डॉ.) श्रीकृष्ण नारायण रातंजनकर के स्वर में राग सिन्दूरा की एक दुर्लभ रिकार्डिंग भी हम प्रस्तुत कर रहे हैं।



राग सिन्दूरा को काफी थाट का जन्य राग माना जाता है। इसके आरोह में गान्धार और निषाद स्वर वर्जित किया जाता है और अवरोह में सभी सात स्वर प्रयोग किया जाता है। इसलिए इस राग की जाति औड़व-सम्पूर्ण होती है। राग में प्रयोग किया जाने वाला गान्धार और निषाद स्वर कोमल होता है। वादी स्वर षडज और संवादी स्वर पंचम है। रात्रि के दूसरे प्रहर में इस राग का गायन-वादन सर्वाधिक उपयुक्त माना जाता है, किन्तु इसे किसी भी समय गाया-बजाया जा सकता है। कुछ विद्वान इस राग को सैन्धवी कहते हैं। राजस्थान में इसे सिन्धोड़ा भी कहा जाता है। यह उत्तरांग प्रधान राग है। इस राग के स्वर-समूह श्रृंगार रस, विशेष रूप से श्रृंगार रस के विरह पक्ष की सार्थक अनुभूति कराते है। राग के शास्त्रीय पक्ष को समझने के लिए अब हम आपके लिए सुविख्यात संगीतज्ञ और लखनऊ स्थित भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय (तब – मैरिस म्यूजिक कालेज) के तत्कालीन यशस्वी प्रधानाचार्य पण्डित (डॉ.) श्रीकृष्ण नारायण रातंजनकर के स्वर में राग सिन्दूरा की एक दुर्लभ रिकार्डिंग हम प्रस्तुत कर रहे हैं। इस रिकार्डिंग में उन्होने नोम-तोम का आलाप और फिर तीनताल की एक रचना प्रस्तुत की है।

राग सिन्दूरा : “विघ्नविनाशन चतुर्भुज एकदन्त लम्बोदर...” : डॉ. श्रीकृष्ण नारायण रातंजनकर




इसराज और मयूर वीणा के सुविख्यात वादक, विद्वान संगीतज्ञ और संगीत से रोगोपचार विषय पर शोधकर्त्ता पण्डित श्रीकुमार मिश्र के अनुसार राग सिन्दूरा की जाति औड़व-सम्पूर्ण होती है। इस राग के न्यास का स्वर पंचम होता है और उपन्यास का स्वर षडज होता है। यह राग होली के दिनों में किसी भी समय गाया-बजाया जा सकता है। यद्यपि परम्परा यह है कि अन्य दिनों में राग सिन्दूरा रात्रि के दूसरे प्रहर में गाया-बजाया जाता है। कुछ विद्वानों का मत है कि राग सिन्दूरा का गायन-वादन किसी भी समय किया जा सकता है। इस राग में ऋषभ, मध्यम, पंचम और धैवत स्वर मुख्य रूप से प्रयुक्त होते हैं। यदि राग काफी के आरोह में से कोमल गान्धार और कोमल निषाद स्वर निकाल दिया जाए तो राग सिन्दूरा का स्वरूप दृष्टिगत होगा। इस राग की प्रकृति चंचल और श्रृंगारिक होती है। अब हम आपको इस राग पर आधारित एक फिल्मी गीत सुनवाते हैं। इस गीत का चुनाव करने में “फिल्मी गीतों पर रागों का प्रभाव” विषयक सुप्रसिद्ध शोधकर्त्ता के.एल. पाण्डेय ने हमारा सहयोग किया है। यह गीत फिल्म “भूल न जाना” का है, जिसका निर्माण वर्ष 1960 में हुआ था, किन्तु फिल्म किन्हीं कारणों से प्रदर्शित नहीं हो सकी थी। प्रदर्शित न होने के बावजूद फिल्म के गीतों के रिकार्ड जारी हुए थे और लोकप्रिय भी हुए थे। इन्हीं गीतों में से एक गीत पार्श्वगायक मुकेश के स्वर में है, जिसके बोल हैं –“गम-ए-दिल किस से कहूँ...”। इसके गीतकार हरिराम आचार्य और संगीतकार दान सिंह हैं। लीजिए अब आप राग सिन्दूरा (काफी थाट) पर आधारित यह गीत सुनिए और हमें आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग सिन्दूरा : “गम-ए-दिल किस से कहूँ...” : मुकेश : फिल्म – भूल न जाना




संगीत पहेली

“स्वरगोष्ठी” के 399वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1961 में प्रदर्शित एक फिल्म से रागबद्ध गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। वर्ष 2018 की इस अन्तिम पहेली तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के पाँचवें सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का आधार है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में मुख्य स्वर किस पार्श्वगायिका के हैं?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 29 दिसम्बर, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 401वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 397वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1966 में प्रदर्शित फिल्म “साज और आवाज़” से राग की छाया लिये एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न के उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – मारवा, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – तीनताल तथा कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – लता मंगेशकर और साथी

“स्वरगोष्ठी” की इस पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नों के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; फरीदाबाद, हरियाणा की इन्दिरा वार्ष्णेय, कल्याण, महाराष्ट्र से शुभा खाण्डेकर, मेरिलैण्ड, अमेरिका से विजया राजकोटिया, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, फीनिक्स, अमेरिका से मुकेश लाडिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “पूर्वांग और उत्तरांग राग” की चौदहवीं कड़ी में आपने राग सिन्दूरा का परिचय प्राप्त किया। इस राग में आपने सुविख्यात शिक्षक और संगीतज्ञ गायक डॉ. श्रीकृष्ण नारायण रातंजनकर के स्वर में नोम-तोम का आलाप और एक बन्दिश का रसास्वादन किया। साथ ही आपने इस राग पर आधारित संगीतकार दान सिंह द्वारा संगीतबद्ध अप्रदर्शित फिल्म “भूल न जाना” से एक गीत मुकेश के स्वर में सुना। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें  swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग सिन्दूरा : SWARGOSHTHI – 399 : RAG SINDURA : 23 दिसम्बर, 2018

Sunday, November 11, 2018

राग आभोगी : SWARGOSHTHI – 393 : RAG AABHOGI






स्वरगोष्ठी – 393 में आज

पूर्वांग और उत्तरांग राग – 8 : राग आभोगी

आशा भोसले से फिल्म का एक गीत और विदुषी अश्विनी भिड़े से राग आभोगी सुनिए




अश्विनी भिड़े  देशपाण्डे
आशा भोसले
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “पूर्वांग और उत्तरांग राग” की आठवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। रागों को पूर्वांग और उत्तरांग में विभाजित करने के लिए सप्तक के सात स्वरों के साथ तार सप्तक के षडज स्वर को मिला कर आठ स्वरों के संयोजन को दो भागों में बाँट दिया जाता है। प्रथम भाग षडज से मध्यम तक पूर्वांग और दूसरे भाग पंचम से तार षडज तक उत्तरांग कहा जाता है। इसी प्रकार जो राग दिन के पहले भाग (पूर्वार्द्ध) अर्थात दिन के 12 बजे से रात्रि के 12 बजे के बीच में गाया-बजाया जाता हो उन्हें पूर्व राग और जो राग दिन के दूसरे भाग (उत्तरार्द्ध) अर्थात रात्रि 12 बजे से दिन के 12 बजे के बीच गाया-बजाया जाता हो उन्हें उत्तर राग कहा जाता है। भारतीय संगीत का यह नियम है कि जिन रागों में वादी स्वर सप्तक के पूर्वांग में हो तो उन्हें दिन के पूर्वार्द्ध में और जिन रागों को वादी स्वर सप्तक उत्तरांग में हो उन्हे दिन के उत्तरार्द्ध में गाया-बजाया जाना चाहिए। राग का वादी स्वर यदि सप्तक के प्रथम भाग में है संवादी स्वर निश्चित रूप से सप्तक के दूसरे भाग में होगा। इसी प्रकार यदि वादी स्वर सप्तक के दूसरे भाग में हो तो संवादी स्वर सप्तक के पूर्व में होगा। वादी और संवादी स्वरों में सदैव तीन अथवा चार स्वरों का अन्तर होता है। इसलिए यदि वादी स्वर ऋषभ है तो संवादी स्वर पंचम या धैवत होगा। इसी प्रकार यदि वादी स्वर धैवत हो तो संवादी स्वर गान्धार अथवा ऋषभ होगा। भीमपलासी, बसन्त और भैरवी जैसे कुछ राग इस नियम के अपवाद होते हैं। इस कठनाई को दूर करने के लिए सप्तक के पूर्वांग और उत्तरांग का क्षेत्र बढ़ा दिया जाता है। पूर्वांग का क्षेत्र षडज से पंचम तक और उत्तरांग का क्षेत्र मध्यम से तार सप्तक के षडज तक माना जाता है। इस प्रकार वादी-संवादी में से यदि एक स्वर पूर्वांग में हो तो दूसरा स्वर उत्तरांग में हो जाता है। इस श्रृंखला में हम आपसे कुछ पूर्वांग और उत्तरांग प्रधान रागों पर चर्चा करेंगे। इस श्रृंखला के लिए चुने गए अधिकतर रागों में वादी स्वर षडज अथवा ऋषभ होता है और संवादी स्वर पंचम अथवा मध्यम होता है। श्रृंखला की आठवीं कड़ी में आज हमने राग आभोगी अथवा आभोगी कान्हड़ा चुना है। श्रृंखला की इस कड़ी में आज हम सुविख्यात पार्श्वगायिका आशा भोसले के स्वर में 1975 में प्रदर्शित फिल्म “कागज़ की नाव” से राग आभोगी कान्हड़ा पर आधारित एक गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके साथ ही राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए सुप्रसिद्ध संगीत-विदुषी अश्विनी भिड़े देशपाण्डे के स्वर में राग आभोगी कान्हड़ा की एक बन्दिश भी हम प्रस्तुत कर रहे हैं।



राग आभोगी अथवा आभोगी कान्हड़ा को काफी थाट जन्य माना जाता है। इसमें गान्धार स्वर कोमल और शेष स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। इस राग में पंचम और निषाद स्वर वर्जित होने से राग की जाति औडव-औडव होती है। वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज है। इस राग का गायन-वादन रात्रि के दूसरे प्रहर अधिक खिलता है। यह कर्नाटक संगीत पद्धति का एक मधुर राग है, जिसका प्रचार उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में अधिक हुआ है। कान्हड़ा का प्रकार होने के कारण अवरोह में गान्धार स्वर का वक्र प्रयोग किया जाता है, जैसे; (कोमल), म, रे, सा। यह स्वर-समूह बार-बार प्रयोग किया जाता है और कोमल गान्धार स्वर आन्दोलित होता है। हरिश्चन्द्र श्रीवास्तव की पुस्तक “राग परिचय” के अनुसार राग आभोगी और आभोगी कान्हड़ा में बहुत थोड़ा अन्तर होता है। राग आभोगी को आभोगी कान्हड़ा बनाने के लिए (कोमल), म, रे, सा, स्वर-समूह का प्रयोग किया जाता है, अन्यथा सम्पूर्ण राग के चलन में कोई परिवर्तन नहीं आता। कुछ विद्वान इस भेद को नहीं मानते, उनका कहना है कि यह भेद करना ‘बाल की खाल निकालना’ है। आभोगी और आभोगी कान्हड़ा दोनों में रे, (कोमल), म, (कोमल), रे, सा स्वर-समूह प्रयोग होता है। केवल आभोगी कान्हड़ा में कान्हड़ा अंग लाने के लिए (कोमल), म, रे, सा स्वरों का प्रयोग किया जाता है, किन्तु आभोगी में नहीं किया जाता। कुछ विद्वानों का मत है कि आभोगी राग में आन्दोलित कोमल गान्धार स्वर से ही कान्हड़ा अंग स्पष्ट हो जाता है, चाहे वक्र कोमल गान्धार स्वर अवरोह में लें अथवा न लें। इस राग का चलन तीनों सप्तकों में होता है। यह खयाल शैली का राग है, इसमें ठुमरी नहीं गायी जाती। इस राग का आलाप अत्यन्त कर्णप्रिय लगता है। राग आभोगी कान्हड़ा के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए अब हम प्रस्तुत कर रहे हैं, इस राग में एक मोहक द्रुत खयाल, जिसे स्वर दे रही हैं, सुविख्यात गायिका अश्विनी भिड़े देशपाण्डे।

राग आभोगी कान्हड़ा : “रस बरसत तोरे घर...” : अश्विनी भिड़े देशपाण्डे


राग आभोगी का न्यास स्वर मध्यम और उपन्यास स्वर धैवत होता है। इस राग के गायन-वादन का सर्वाधिक उपयुक्त समय रात्रि में 11 से 12 बजे के बीच होता है। इस राग के बारे में सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ और मयूरवीणा के वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र बताते हैं कि संगीत-मार्तण्ड पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर के मतानुसार अवरोह में जब सां, ध, म, (कोमल), रे ,सा स्वरों का प्रयोग किया जाएगा तो यह राग आभोगी होगा। जब इसमें म, (कोमल), रे सा के स्थान पर (कोमल), म, रे, सा स्वरो का प्रयोग करेंगे यह आभोगी कान्हड़ा बन जाता है। ये कान्हड़ा अंग के राग हैं। इस राग की प्रकृति शान्त व आत्मनिवेदन की होती है। आभोगी के श्रवण से भक्तिभाव की अभिव्यक्ति होगी तथा आभोगी कान्हड़ा के श्रवण से मन शान्त हो जाएगा। दोनों ही राग डिप्रेशन और चिन्ताविकृत को दूर का रास्ता दिखा कर गहन निद्रा का सुख प्रदान कर सकते हैं। कुछ विद्वान राग आभोगी और आभोगी कान्हड़ा में वादी-संवादी स्वरों का अन्तर भी मानते हैं। वे राग आभोगी में षडज और मध्यम स्वरों तथा राग आभोगी कान्हड़ा में मध्यम और षडज स्वरों को क्रमशः वादी-संवादी मानते हैं। इस परिवर्तन से राग आभोगी पूर्वांग प्रधान और राग आभोगी कान्हड़ा उत्तरांग प्रधान राग होना चाहिए, परन्तु यह भेद उचित नहीं मालूम होता। शास्त्र सदैव क्रियात्मक संगीत का अनुसरण करता है। जो बातें क्रियात्मक संगीत में होती है, वही शास्त्र में शामिल की जाती है। क्रियात्मक संगीत में (कोमल), म, रे, सा के अतिरिक्त कोई भेद दिखाई नहीं पड़ता। इसलिए वादी-संवादी के फलस्वरूप पूर्वांग-उत्तरांग का भेद न्याय-संगत नहीं है। अब हम आपको राग आभोगी कान्हड़ा पर आधारित एक फिल्मी गीत सुनवा रहे हैं। इस गीत को हमने 1975 में प्रदर्शित फिल्म “कागज़ की नाव” से चुना है। गीत में स्वर आशा भोसले का और संगीत सपन जगमोहन का है।

राग आभोगी कान्हड़ा : “ना जइयो रे सौतन घर...” : आशा भोसले : फिल्म – कागज़ की नाव




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 393वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1977 में प्रदर्शित एक फिल्म से रागबद्ध गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। इस वर्ष की अन्तिम पहेली तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के पाँचवें सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की झलक है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस गायिका के स्वर हैं?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 17 नवम्बर, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 395वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 391वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1955 में प्रदर्शित फिल्म “सीमा” के एक रागबद्ध गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न के उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – जयजयवन्ती, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – एकताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – लता मंगेशकर

“स्वरगोष्ठी” की इस पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, कल्याण, महाराष्ट्र से शुभा खाण्डेकर, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, फीनिक्स, अमेरिका से मुकेश लाडिया, मेरिलैण्ड, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “पूर्वांग और उत्तरांग राग” की आठवीं कड़ी में आपने राग आभोगी अथवा आभोगी कान्हड़ा का परिचय प्राप्त किया। इस राग में आपने विदुषी अश्विनी भिड़े देशपाण्डे से द्रुत खयाल की एक रचना का रसास्वादन किया। साथ ही आपने इस राग पर आधारित संगीतकार सपन जगमोहन द्वारा संगीतबद्ध फिल्म “कागज़ की नाव” का एक गीत आशा भोसले से सुना। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इडि
राग आभोगी : SWARGOSHTHI – 393 : RAG AABHOGI : 11 नवम्बर, 2018


Sunday, August 12, 2018

राग मियाँ मल्हार : SWARGOSHTHI – 380 : RAG MIYAN MALHAR






स्वरगोष्ठी – 380 में आज

राग से रोगोपचार – 9 : वर्षा ऋतु का राग मियाँ मल्हार

जीवन से निराश व्यक्ति के लिए संजीवनी है यह राग




पण्डित कुमार गन्धर्व
वाणी जयराम
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “राग से रोगोपचार” की नौवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, इस श्रृंखला के लेखक, संगीतज्ञ और इसराज तथा मयूरवीणा के सुविख्यात वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र के साथ आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मानव का शरीर प्रकृति की अनुपम देन है। बाहरी वातावरण के प्रतिकूल प्रभाव से मानव के तन और मन में प्रायः कुछ विकृतियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। इन विकृतियों को दूर करने के लिए हम विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों की शरण में जाते हैं। पूरे विश्व में रोगोपचार की अनेक पद्धतियाँ प्रचलित है। भारत में हजारों वर्षों से योग से रोगोपचार की परम्परा जारी है। प्राणायाम का तो पूरा आधार ही श्वसन क्रिया पर केन्द्रित होता है। संगीत में स्वरोच्चार भी श्वसन क्रिया पर केन्द्रित होते हैं। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। इन्हीं स्वरों के संयोजन से राग की उत्पत्ति होती है। स्वर-योग या श्रव्य माध्यम से गायन या वादन के सुरीले, भावप्रधान और प्रभावकारी नाद अर्थात संगीत हमारे मस्तिष्क के संवेदनशील भागों में प्रवेश करता है। मस्तिष्क में नाद के प्रभाव का विश्लेषण होता है। ग्राह्य और उपयोगी नाद को मस्तिष्क सुरक्षित कर लेता है जहाँ नाद की परमाणु ऊर्जा के प्रभाव से सशक्त और उत्तम कोटि के हारमोन्स का सृजन होता है। यह हारमोन्स शरीर की समस्त कोशिकाओं में व्याप्त हो जाता है। इसकी ऊर्जा से अनेक मानसिक और मनोदैहिक समस्याओं का उपचार सम्भव हो सकता है। इसके साथ ही चिकित्सक के सुझावानुसार औषधियों का सेवन भी आवश्यक हो सकता है। मन की शान्ति, सकारात्मक तथा मृदु संवेदना और भक्ति में एकाग्रता के लिए राग भैरवी के कोमल स्वर प्रभावकारी सिद्ध होते हैं। इसी प्रकार विविध रागों के गातन-वादन के माध्यम से प्रातःकाल से रात्रिकालीन परिवेश में प्रभावकारी होता है। अलग-अलग स्वर-भावों और गीत के साहित्य के रसों के अनुसार उत्पन्न सशक्त भाव-प्रवाह के द्वारा डिप्रेशन, तनाव, चिन्ताविकृति आदि मानसिक समस्याओं का उपचार सम्भव है। इस श्रृंखला में हम विभिन्न रागो के स्वरो से उत्पन्न प्रभावों का क्रमशः विवेचन कर रहे हैं। श्रृंखला की नौवीं कड़ी में आज हम राग मियाँ मल्हार के स्वरो से विभिन्न रोगों के उपचार पर चर्चा करेंगे और आपको पण्डित कुमार गन्धर्व का राग मियाँ मल्हार में गायन प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही “स्वरगोष्ठी” की परम्परा के अनुसार 1971 में प्रदर्शित फिल्म “गुड्डी” से इसी राग में पिरोया एक मधुर गीत वाणी जयराम के स्वर में प्रस्तुत करेंगे।



राग मियाँ मल्हार के आरोह के स्वर हैं; सा, म, रे s प, ग॒, s म, रे, सा, म, रे, प, नि॒ s ध, नि, सां और अवरोह के स्वर हैं; सां, ग॒, नि॒, म, प, ग॒, s म, रे, सा। राग दरबारी कान्हड़ा की तरह ग॒, म, रे, सा, स्वर इसमें प्रयुक्त होता है, परन्तु दोनों रागों के ग॒, म, रे, सा, में काफी अन्तर होता है। दरबारी कान्हड़ा एक श्रुत्यांतर का कोमल गान्धार लगता है, जबकि मियाँ मल्हार में दो श्रुत्यांतर से भी कुछ चढ़ा हुआ कोमल गान्धार प्रयुक्त होता है। दोनों रागों के गान्धार में अलग-अलग भाव है। दरबारी कान्हड़ा का कोमल गान्धार दार्शनिक, आध्यात्मिक वेदना को गाम्भीर्य प्रदान करता है। परन्तु मियाँ मल्हार का कोमल गान्धार वर्षा के तीव्र झोंको, वातावरण द्वारा उत्पन्न आनन्द की अनुभूति कराते हुए तीव्र कसक के भाव की अभिव्यक्ति कराता है। म, प, नि॒, s ध, स्वर करुण रस की अनुभूति कराते है। नि s सां, स्वर की क्रिया के द्वारा भावनात्मक पुकार का सन्देश प्रसारित होता है। वर्षा ऋतु में आनन्द और वियोग की कसक के मिश्रित भाव को यह राग अभिव्यक्त करता है। चिन्ताविकृति, वेदना, विरह की स्थितियों में यह राग मानसिक शान्ति, आनन्द और मनोबल प्रदान करने में सक्षम सिद्ध हो सकता है। राग मियाँ मल्हार के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए अब हम आपको सुविख्यात गायक पण्डित कुमार गन्धर्व के स्वर में इस राग की एक परम्परागत बन्दिश सुनवा रहे हैं। यू-ट्यूब के सौजन्य से प्रस्तुत इस दुर्लभ वीडियो का अब आप रसास्वादन करें।

राग मियाँ मल्हार : “बोले रे पपीहरा...” : पण्डित कुमार गन्धर्व


राग मियाँ मल्हार का सम्बन्ध काफी थाट से माना जाता है। इसके आरोह में सभी सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं तथा अवरोह में धैवत स्वर वर्जित होता है। इसीलिए इस राग की जाति सम्पूर्ण-षाड़व होती है। इसमें गान्धार स्वर कोमल तथा दोनों निषाद प्रयोग किये जाते हैं। गायन-वादन का उपयुक्त समय मध्यरात्रि माना जाता है, किन्तु वर्षा ऋतु में इसे किसी भी समय गाया-बजाया जा सकता है। राग का वादी स्वर षडज संवादी स्वर पंचम होता है। कुछ गुणीजन वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज मानते हैं। “राग परिचय” के लेखक हरिश्चन्द्र श्रीवास्तव के अनुसार मध्यम और षडज के स्थान पर षडज-पंचम को वादी-संवादी मानना अधिक उपयुक्त और न्यायसंगत प्रतीत होता है। क्योंकि इस राग में मध्यम स्वर पर कभी न्यास नहीं किया जाता, जबकि वादी स्वर पर न्यास किया जाना आवश्यक होता है। कहा जाता है कि संगीत सम्राट तानसेन ने मल्हार नामक एक नए राग की रचना की थी जिसे बाद में मियाँ की मल्हार अथवा मियाँ मल्हार कहा जाने लगा। पुराने ग्रन्थों में इसका उल्लेख नहीं मिलता। अब हम आपको राग मियाँ मल्हार के स्वरों में पिरोया एक मधुर फिल्मी गीत सुनवाते हैं। यह गीत हमने 1971 में प्रदर्शित फिल्म “गुड्डी” से लिया है। इसके संगीतकार हैं, वसन्त देसाई और गीत को स्वर दिया है, वाणी जयराम ने। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग मियाँ मल्हार : “बोले रे पपीहरा...” : वाणी जयराम : फिल्म – गुड्डी




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 380वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1952 में प्रदर्शित एक फिल्म से रागबद्ध गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। इस अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के तीसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का स्पर्श है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायक के स्वर है।?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 18 अगस्त, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 382वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 378वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1961 में प्रदर्शित फिल्म “छोटे नवाब” के एक रागबद्ध गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न के उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – मालगुंजी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल - रूपकताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – लता मंगेशकर

“स्वरगोष्ठी” की इस पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, कल्याण, महाराष्ट्र से शुभा खाण्डेकर, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, मैरिलैण्ड, अमेरिका से विजया राजकोटिया, फिनिक्स, अमेरिका से मुकेश लढ़िया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी महत्त्वाकांक्षी श्रृंखला “राग से रोगोपचार” की नौवीं कड़ी में आपने कुछ शारीरिक और मनोशारीरिक रोगों के उपचार में सहयोगी राग मियाँ मल्हार का परिचय प्राप्त किया। आपने पण्डित कुमार गन्धर्व द्वारा प्रस्तुत राग मियाँ मल्हार की एक बन्दिश का रसास्वादन किया। साथ ही आपने वाणी जयराम के स्वर में इस राग पर आधारित एक फिल्मी गीत फिल्म “गुड्डी” से सुना। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


शोध व आलेख : पं. श्रीकुमार मिश्र   
सम्पादन व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   
रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

राग मियाँ मल्हार : SWARGOSHTHI – 380 : RAG MIYAN MALHAR : 12 अगस्त, 2018


Sunday, July 29, 2018

राग रागेश्वरी : SWARGOSHTHI – 378 : RAG RAGESHWARI









स्वरगोष्ठी – 378 में आज

राग से रोगोपचार – 7 : रात्रि के दूसरे प्रहर का राग रागेश्वरी

सकारात्मक ठहराव लाने और अनिद्रा के उपचार में सहायक है राग रागेश्वरी




परवीन सुल्ताना
लता मंगेशकर
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “राग से रोगोपचार” की सातवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, इस श्रृंखला के लेखक, संगीतज्ञ और इसराज तथा मयूरवीणा के सुविख्यात वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र के साथ आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मानव का शरीर प्रकृति की अनुपम देन है। बाहरी वातावरण के प्रतिकूल प्रभाव से मानव के तन और मन में प्रायः कुछ विकृतियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। इन विकृतियों को दूर करने के लिए हम विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों की शरण में जाते हैं। पूरे विश्व में रोगोपचार की अनेक पद्धतियाँ प्रचलित है। भारत में हजारों वर्षों से योग से रोगोपचार की परम्परा जारी है। प्राणायाम का तो पूरा आधार ही श्वसन क्रिया पर केन्द्रित होता है। संगीत में स्वरोच्चार भी श्वसन क्रिया पर केन्द्रित होते हैं। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। इन्हीं स्वरों के संयोजन से राग की उत्पत्ति होती है। स्वर-योग या श्रव्य माध्यम से गायन या वादन के सुरीले, भावप्रधान और प्रभावकारी नाद अर्थात संगीत हमारे मस्तिष्क के संवेदनशील भागों में प्रवेश करता है। मस्तिष्क में नाद के प्रभाव का विश्लेषण होता है। ग्राह्य और उपयोगी नाद को मस्तिष्क सुरक्षित कर लेता है जहाँ नाद की परमाणु ऊर्जा के प्रभाव से सशक्त और उत्तम कोटि के हारमोन्स का सृजन होता है। यह हारमोन्स शरीर की समस्त कोशिकाओं में व्याप्त हो जाता है। इसकी ऊर्जा से अनेक मानसिक और मनोदैहिक समस्याओं का उपचार सम्भव हो सकता है। इसके साथ ही चिकित्सक के सुझावानुसार औषधियों का सेवन भी आवश्यक हो सकता है। मन की शान्ति, सकारात्मक तथा मृदु संवेदना और भक्ति में एकाग्रता के लिए राग भैरवी के कोमल स्वर प्रभावकारी सिद्ध होते हैं। इसी प्रकार विविध रागों के गातन-वादन के माध्यम से प्रातःकाल से रात्रिकालीन परिवेश में प्रभावकारी होता है। अलग-अलग स्वर-भावों और गीत के साहित्य के रसों के अनुसार उत्पन्न सशक्त भाव-प्रवाह के द्वारा डिप्रेशन, तनाव, चिन्ताविकृति आदि मानसिक समस्याओं का उपचार सम्भव है। इस श्रृंखला में हम विभिन्न रागो के स्वरो से उत्पन्न प्रभावों का क्रमशः विवेचन कर रहे हैं। श्रृंखला के सातवें अंक में आज हम राग रागेश्वरी के स्वरो से विभिन्न रोगों के उपचार पर चर्चा करेंगे और आपको सुविख्यात गायिका विदुषी परवीन सुल्ताना के स्वर में राग रागेश्वरी में निबद्ध एक आकर्षक खयाल सुनवाएँगे। इसके साथ ही “स्वरगोष्ठी” की परम्परा के अनुसार 1953 में प्रदर्शित फिल्म “अनारकली” से इसी राग में पिरोया एक मधुर गीत लता मंगेशकर के स्वर में प्रस्तुत करेंगे।



संगीत-मार्तण्ड पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर की पद्धति के अनुसार राग रागेश्वरी के आरोह में सा, ग, म, ध, नि, सां और अवरोह में सां, नि॒, ध, म, ग, म, रे सा स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर कोमल निषाद होता है। इसका सटीक समय रात्रि 10 बजे से 11 बजे तक है। ग, म, रे, सा स्वरों द्वारा भावनात्मक व सकारात्मक ठहराव महसूस हो सकता है। इस प्रकार यह उपचार मरीज पर्याप्त शान्ति प्रदान कर सकता है। पीड़ित व्यक्ति को निद्रा का आनन्द प्रदान कराने के लिए रात्रि 11 से 12.30 बजे के मध्य राग मालकौंस का श्रवण लाभदायक हो सकता है। राग रागेश्वरी से भी निद्रा आ सकती है। इस राग में मध्यम स्वर का गाम्भीर्य एकाग्रता व निद्रा की स्थितियाँ ला सकता है। मनोभौतिक व्याधियों; धड़कन, उच्चरक्तचाप, उदर विकार आदि समस्याओं का निदान भी इस राग के स्वरात्मक व कलाकार के भावानुसार अभिव्यक्त सजीव सांगीतिक प्रभावों के द्वारा सम्भव हो सकता है।

अब हम आपको राग रागेश्वरी में निबद्ध एक मनमोहक रचना सुनवाते हैं। इसे विख्यात गायिका विदुषी परवीन सुल्ताना ने प्रस्तुत किया है। खयाल, ठुमरी और भजन गायन में सिद्ध विदुषी परवीन सुल्ताना का जन्म 14 जुलाई, 1950 असम के नौगाँव जिलान्तर्गत डाकापट्टी नामक स्थान पर एक संगीत-प्रेमी परिवार में हुआ था। संगीत की प्रारम्भिक शिक्षा उन्हें अपने पिता इकरामुल मजीद और दादा मोहम्मद नजीब खाँ से प्राप्त हुई। बाद में 1973 से कोलकाता के सुप्रसिद्ध गुरु पण्डित चिन्मय लाहिड़ी से उन्हें संगीत का विधिवत मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। पटियाला घराने के गायक उस्ताद दिलशाद खाँ से भी उन्हें संगीत की बारीकियाँ सीखने का अवसर मिला। आगे चल इन्हीं दिलशाद खाँ से उनका विवाह भी हुआ। परवीन सुल्ताना ने पहली मंच-प्रस्तुति 1962 में मात्र 12 वर्ष की आयु में दी थी। 1965 से ही उनके ग्रामोफोन रेकार्ड बनने लगे थे। उन्होने कई फिल्मों में पार्श्वगायन भी किया है। फिल्म दो बूँद पानी, पाकीजा, कुदरत और गदर के गाये गीत अत्यन्त लोकप्रिय हुए थे। 1976 में मात्र 25 वर्ष की आयु में उन्हें ‘पद्मश्री’ सम्मान से नवाजा गया। 1981 में फिल्म ‘कुदरत’ में गाये गीत के लिए परवीन जी को श्रेष्ठ पार्श्वगायिका का फिल्मफेयर पुरस्कार प्राप्त हुआ। 1986 में उन्हें तानसेन सम्मान और 1999 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिला। इस वर्ष (2014) उन्हें ‘पद्मभूषण’सम्मान से अलंकृत किया गया। परवीन जी के गायन में उनकी तानें तीनों सप्तकों में फर्राटेदार चलती हैं। आइए इनकी आवाज़ में सुनते हैं राग रागेश्वरी में निबद्ध एक मोहक खयाल रचना।

राग रागेश्वरी : “देत बधाई साईं को...” : विदुषी परवीन सुलताना


राग रागेश्वरी खमाज थाट का राग माना जाता है। इसमें निषाद स्वर कोमल प्रयोग किया जाता है। राग में पंचम स्वर बिल्कुल वर्जित होता है और आरोह में ऋषभ वर्जित होता है। इसीलिए इस राग की जाति औड़व-षाड़व होती है। राग का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है। राग रागेश्वरी के गायन-वादन का उपयुक्त समय रात्रि का दूसरा प्रहर माना जाता है। राग रागेश्वरी का एक दूसरा प्रकार भी होता है, जिसके आरोह में शुद्ध निषाद और अवरोह में कोमल निषाद स्वर का प्रयोग किया जाता है, किन्तु मन्द्र सप्तक में सदैव कोमल निषाद स्वर का प्रयोग किया जाता है। कोमल निषाद स्वर की रागेश्वरी अधिक प्रचलित है। इस राग में धैवत और गान्धार की संगति अत्यन्त मनोरंजक होती है। अवरोह में कभी-कभी गान्धार स्वर का वक्र प्रयोग कर लिया जाता है। राग बागेश्री और मालगुंजी इस राग के समप्रकृति राग हैं। राग रागेश्वरी पर आधारित एक फिल्मी गीत अब आप सुनिए। लता मंगेशकर के स्वर में प्रस्तुत इस गीत को हमने 1953 में प्रदर्शित फिल्म “अनारकली” से लिया है। फिल्म के संगीतकार सी. रामचन्द्र हैं। आप यह गीत सुनिए और हमे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दें।

राग रागेश्वरी : “मोहब्बत ऐसी धड़कन है...” : लता मंगेशकर : फिल्म – अनारकली



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 378वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1961 में प्रदर्शित एक फिल्म से रागबद्ध गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 380वें अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के तीसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की छाया है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायिका के स्वर है।?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 4 अगस्त, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 380वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 376वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1962 में प्रदर्शित फिल्म “प्राइवेट सेक्रेटरी” के एक रागबद्ध गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न के उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – बागेश्री, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल एकताल और दादरा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – मन्ना डे

“स्वरगोष्ठी” की इस पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; लखीमपुर खीरी, उत्तर प्रदेश से सत्येन्द्र दुबे, कल्याण, महाराष्ट्र से शुभा खाण्डेकर, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी महत्त्वाकांक्षी श्रृंखला “राग से रोगोपचार” की सातवीं कड़ी में आपने कुछ शारीरिक और मनोशारीरिक रोगों के उपचार में सहयोगी राग रागेश्वरी का परिचय प्राप्त किया। साथ ही आपने इस राग में निबद्ध एक खयाल विदुषी परवीन सुल्ताना के स्वर में सुना। इस राग पर आधारित एक गीत फिल्म “अनारकली” से लता मंगेशकर के स्वर में भी सुना।

पेंसिलवेनिया, अमेरिका से हमारी एक नियमित पाठक विजया राजकोटिया ने लिखा है; "Maru Bihag gane ke saath meri chinta bhag gai. I am writing not as a joke, but it is true." 

हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।



शोध व आलेख : पं. श्रीकुमार मिश्र   
सम्पादन व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग रागेश्वरी : SWARGOSHTHI – 378 : RAG RAGESHWARI : 29 जुलाई, 2018

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