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Wednesday, November 27, 2013

लफ़्ज़ों की गुज़ारिश को परवान देता एक गीतकार


राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित गीतकार प्रसून जोशी एक सफल स्क्रीन लेखक और मशहूर कॉपीराईटर भी हैं. दिल से कवि, प्रसून ने अपनी कलम के जादू से इंडस्ट्री में आज अपना एक खास मुकाम बना लिया है. प्रसून पर सुनील चिपडे की विशेष प्रस्तुति आज सुनें सिर्फ और सिर्फ रेडियो प्लेबैक इंडिया पर 


  

Monday, October 19, 2009

जो तुझे जगाये, नींदें तेरी उडाये, ख्वाब है सच्चा वही....सच्चे ख़्वाबों को पहचानिये...प्रसून की सलाह मानिये

ताजा सुर ताल TST (31)

दोस्तों, ताजा सुर ताल यानी TST पर आपके लिए है एक ख़ास मौका और एक नयी चुनौती भी. TST के हर एपिसोड में आपके लिए होंगें तीन नए गीत. और हर गीत के बाद हम आपको देंगें एक ट्रिविया यानी हर एपिसोड में होंगें ३ ट्रिविया, हर ट्रिविया के सही जवाब देने वाले हर पहले श्रोता की मिलेंगें २ अंक. ये प्रतियोगिता दिसम्बर माह के दूसरे सप्ताह तक चलेगी, यानी 5 अक्टूबर के एपिसोडों से लगभग अगले 20 एपिसोडों तक, जिसके समापन पर जिस श्रोता के होंगें सबसे अधिक अंक, वो चुनेगा आवाज़ की वार्षिक गीतमाला के 60 गीतों में से पहली 10 पायदानों पर बजने वाले गीत. इसके अलावा आवाज़ पर उस विजेता का एक ख़ास इंटरव्यू भी होगा जिसमें उनके संगीत और उनकी पसंद आदि पर विस्तार से चर्चा होगी. तो दोस्तों कमर कस लीजिये खेलने के लिए ये नया खेल- "कौन बनेगा TST ट्रिविया का सिकंदर"

TST ट्रिविया प्रतियोगिता में अब तक-

पिछले एपिसोड में सीमा जी ने बढ़त बनाये रखी है, ३ में से २ सही जवाब और कुल अंक उनके हुए १६. तनहा जी दूसरे स्थान पर हैं ६ अंकों के साथ. तनहा जी ने भी एक सवाल का सही जवाब दिया. दिशा जी जरा देरी से आई और भी कुछ प्रतिभागी सामने आये तो और मज़ा आये. चलिए अब बढ़ते हैं आज के अंक की तरह...शुभकामनाएँ.

सुजॉय - सजीव, 'ताज़ा सुर ताल' में आज किस फ़िल्म के गीत से हम शुरुआत करने जा रहे हैं?

सजीव - राजकुमार संतोषी की नई कॊमेडी फ़िल्म आ रही है 'अजब प्रेम की ग़ज़ब कहानी', आज हम इसी फ़िल्म का एक जोशीला ट्रैक सुनेंगे सब से पहले।

सुजॉय - सजीव, आप ने कहा कॊमेडी फ़िल्म, इससे मुझे याद आया राजकुमार संतोषी ने इससे पहले एक फ़िल्म बनाई थी 'अंदाज़ अपना अपना', जो अपनी कॊमेडी की वजह से बहुत ज़्यादा लोकप्रिय हुई थी। आमिर ख़ान और सलमान ख़ान की जोड़ी ने उस फ़िल्म में लोगों को ख़ूब हँसाया था।

सजीव - हाँ, और १९९४ के इस फ़िल्म में परेश रावल, महमूद, देवेन वर्मा, जगदीप, हरीश पटेल, टिकू तल्सानिया जैसे नामचीन हास्य कलाकारों ने भी ख़ूब गुदगुदाया था।

सुजॉय - और अब 'अजब प्रेम की ग़ज़ब कहानी' में नज़र आयेंगे रनबीर कपूर और कटरीना कैफ़। इस फ़िल्म में रणबीर का नाम 'प्रेम' है। आप जानते ही होंगे कि शुरु शुरु में हर फ़िल्म में सलमान ख़ान का नाम 'प्रेम' हुआ करता था, और 'अंदाज़ अपना अपना' में भी उनका नाम 'प्रेम भोपाली' था। तो इस तरह से राजकुमार संतोषी के अलावा 'अजब प्रेम की...' और 'अंदाज़ अपना अपना' में यह एक और कॉमन चीज़ है।

सजीव - जहाँ तक गीत संगीत का सवाल है, 'अंदाज़ अपना अपना' में तुषार भाटिया और विजु शाह का संगीत था, और वो संगीत कुछ कुछ पुराने ज़माने के ओ. पी. नय्यर के संगीत से मिलता जुलता था। जैसे कि "एलो एलो, एलो जी सनम हम आ गये आज फिर दिल लेने" तो बिल्कुल नय्यर साहब का कम्पोजीशन लगता है। आशा और एस. पी. बालसुब्रह्मण्यम का गाया "ये रात और ये दूरी" भी काफ़ी हिट हुआ था। और अब 'अजब प्रेम की...' का संगीत उससे बिल्कुल अलग है। और क्यों ना हो, इन दो फ़िल्मों के बीच १५ साल का फ़ासला भी तो है।

सुजॉय - जी बिल्कुल! प्रीतम आज के दौर के संगीतकार हैं। और जैसा कि हमने पहले भी कहा है कि प्रीतम एक ऐसे संगीतकार रहे हैं जिनका संगीत बहुत ज़्यादा लोकप्रिय हो जाता है आज की पीढ़ी में, फिर चाहे भले फ़िल्म चले या ना चले। प्रीतम को समालोचकों के वार भी सहने पड़ते हैं लेकिन वह कहते हैं ना कि जो हिट है वही फ़िट है, इसलिए हर वार का मुक़ाबला करते हुए प्रीतम निरंतर हिट पे हिट दिए जा रहे हैं। फ़िल्म के गीतकार हैं इरशाद कामिल और आशिष पंडित ने।

सजीव - ठीक कहा तुमने सुजॉय। बप्पी लाहिरी के साथ भी यही हुआ था जब वो नए नए आए थे डिस्को लेकर। लेकिन आज देखिए, उनके वही पुराने गानें जिनकी उस ज़माने में काफ़ी समालोचना हुई थी, जब वे आज बजते हैं तो लोग उसकी तारीफ़ कर रहे हैं। ख़ैर, आज 'अजब प्रेम की...' का जो गीत हम बजा रहे हैं वह है के.के, सुनिधि चौहान और हार्ड कौर का गाया हुआ एक थिरकता नग़मा।

सुजॉय - यह गीत इस फ़िल्म के ऐल्बम का पहला गाना है, जिसके बोल हैं "मैं तेरा धड़कन तेरी ये दिन तेरा रातें तेरी अब बचा क्या"। बहुत ही उर्जा है इस गीत में। के.के इस तरह के जोशीले गानों को बहुत ही अच्छी तरह से निभाते हैं। सुनिधि की आवाज़ में भी वो दम है कि के.के की आवाज़ से टक्कर ले सके। और हार्ड कौर अपने रैप के साथ बीच बीच में आती रहती हैं। हिप-हॊप के साथ साथ एक टिपिकल बॊलीवुड पॊप नंबर की मिसाल है यह गीत। डी. जे सुकेतू ने इसी गीत का एक ज़बरदस्त रीमिक्स वर्ज़न भी बनाया है।

सजीव - यानी कि कुल मिलाकर कहने का मतलब यह है कि यह गीत जवाँ दिलों पर राज करने का पूरा माद्दा रखता है। तो चलिए सुनते हैं यह गीत।

अब बचा क्या (अजब प्रेम की गजब कहानी)
आवाज़ रेटिंग - ***1/2



TST ट्रिविया # 13-इस फिल्म "अजब प्रेम की गजब कहानी" में एक प्रमुख किरदार निभा रहे ऐक्टर ने उदिता गोस्वामी के साथ एक रीमिक्स गीत के विडियो में काम कर शुरुआत की थी, उस एक्टर का नाम और उस रीमिक्स गीत का नाम भी बताएं?

सुजॉय - रवानी भरा, जवानी भरा यह गीत हमने सुना। अब कौन सा गीत हम सुनेंगे सजीव?

सजीव - अब एक बहुत ही अलग तरह का गीत सुनवाएँगे हम फ़िल्म 'लंदन ड्रीम्स‍' से। इस फ़िल्म से "जश्न है जीत का", "खानाबदोश" और "मन को अति भावे स‍इयाँ" हम इस शृंखला में सुनवा चुके हैं। क्योंकि इस फ़िल्म के सभी गानें बहुत ही मेलडियस हैं और नए नए प्रयोग और फ़्युज़न सुनने को मिलते हैं, तो क्यों ना इस फ़िल्म की संगीत यात्रा को जारी रखें 'ताज़ा सुर ताल' में।

सुजॉय- बिल्कुल जारी रखेंगे। तो बताइए आज इस फ़िल्म का कौन सा गीत आप सुनवाएँगे और क्या ख़ास बात है इस गीत में।

सजीव - गीत है "जो तुझे जगाए, नींदे तेरी उड़ाए, ख़्वाब है सच्चा वही, नींदों में जो आए, जिसे तू भूल जाए, ख़्वाब वो सच्चा नहीं"।

सुजॉय - बहुत सही बात कही है गीतकार प्रसून जोशी ने। मुझे याद आ रहा है भूतपूर्व राष्ट्रपति डॊ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम का कहा हुआ एक विचार कि "Dream is not something that you see while sleeping; dream is something that does not allow you to sleep". है ना वही भाव इस गीत का?

सजीव - वाह! बहुत ख़ूब! श्रोताओं को यह बता दें कि इस गीत को दो बहुत ही प्रतिभा सम्पन्न कलाकारों ने गाया है, एक हैं राहत फ़तेह अली ख़ान और दूसरे शंकर महादेवन। ये दोनों ही शास्त्रीय संगीत में पारंगत हैं और यह गीत का आधार शास्त्रीय होते हुए भी इसमें एक आज के संगीत का अंग है, जिसे हम सॉफ्ट रॉक भी कह सकते हैं।

सुजॉय - शंकर अहसान लॊय का हस्ताक्षर साफ़ सुनई देता है इस गीत में। तो सुनते हैं इस बेहद बेहतरीन, बेहद शानदार गीत को।

ख्वाब (लन्दन ड्रीम्स)
आवाज़ रेटिंग - ****1/2



TST ट्रिविया # 14- फिल्म लन्दन ड्रीम्स का वो कौन सा गीत है जो लन्दन के एक मशहूर सगीत हॉल (जहाँ परफोर्म करना हर संगीत प्रेमी का सपना होता है) में फिल्माया गया है?

सुजॉय - वाह! बहुत ही कर्णप्रिय गीत था। और अब आज का तीसरा और आ़ख़िरी नग़मा कौन सा है?

सजीव - सुजॉय, यह जो आज का तीसरा गीत है न, इस गीत के तीन अलग अलग वर्ज़न हैं और तीनों अलग अलग गायकं के गाए हुए हैं। यह है फ़िल्म 'तुम मिले' का शीर्षक गीत "तुम मिले तो जादू छा गया"।

सुजॉय - अच्छा? किन किन गायकों ने गाए हैं इस गीत को?

सजीव - नीरज श्रीधर, जावेद अली, और शफ़क़त अमानत अली ने गाए हैं अलग अलग अंदाज़ों में। नीरज और प्रीतम की जोड़ी ने कई हिट गानें हमें दिए हैं जैसे कि "हरे राम हरे राम", "आहुं आहुं", "चोर बाज़ारी" वगेरह। लेकिन 'तुम मिले' का यह गीत उन सभी गीतों से बिल्कुल अलग हट के है। बहुत ही नर्मोनाज़ुक अंदाज़ का गीत है।

सुजॉय - और बाक़ी के जो दो वर्ज़न हैं उनकी क्या ख़ूबी है?

सजीव - हालाँकि नीरज वाला गीत ही फिल्म का प्रमुख वर्ज़न है, लेकिन जावेद अली और शफ़क़त अमानत अली वाले संस्करण भी कमाल के हैं। जावेद अली के वर्ज़न का टाइटल रखा गया है 'लव रिप्राइज़ वर्ज़न' और अमानत साहब के वर्ज़न का टाइटल है 'रॉक वर्ज़न'। याद है ना इनकी आवाज़ में फ़िल्म 'कभी अलविदा ना कहना' का "मितवा" गीत?

सुजॉय - क्यों नहीं! बिल्कुल याद है। पाक़िस्तान के इस गायक की आवाज़ का असर एक लम्बे समय तक ज़हन में रहता है जिस तरह से 'मितवा' गीत को लोगों ने बहुत बहुत सुना, 'तुम मिले' का यह गीत भी जैसे जैसे हम सुनते जाते हैं, हमारे ज़हन में बसते चले जाते हैं। और इसकी धुन जैसे दिमाग़ पर हावी सी होती जाती है। चलिए सुनते हैं इस गीत को, इसे लिखा है सईद क़ादरी ने, जो भट्ट कैम्प के अब स्थायी गीतकार बन चुके हैं और संगीतकार का नाम तो हम बता ही चुके हैं, प्रीतम। फ़िल्म की तमाम अन्य जानकारियाँ हम फिर किसी दिन देंगे जब हम इस फ़िल्म का कोई दूसरा गाना सुनेंगे। आइए सुनते हैं।

तुम मिले (शीर्षक)
आवाज़ रेटिंग -***



TST ट्रिविया # 15- हाल ही में फिल्म "तुम मिले" का निर्माण कर रही कम्पनी विशेष फिल्म्स के लिए महेश भट्ट ने एक बयान में कहा है कि "फलां" गीतकार को कोई भी उस राशि का १० प्रतिशत नहीं देगा, जिस राशि पर जावेद अख्तर काम करते हैं...यहाँ महेश किस गीतकार के लिए ये कह रहे हैं ?

आवाज़ की टीम ने इन गीतों को दी है अपनी रेटिंग. अब आप बताएं आपको ये गीत कैसे लगे? यदि आप समीक्षक होते तो प्रस्तुत गीतों को 5 में से कितने अंक देते. कृपया ज़रूर बताएं आपकी वोटिंग हमारे सालाना संगीत चार्ट के निर्माण में बेहद मददगार साबित होगी.

शुभकामनाएँ....



अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं. क्या आप को भी आजकल कोई ऐसा गीत भा रहा है, जो आपको लगता है इस आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए तो हमें लिखे.

Monday, October 5, 2009

आ ज़माने आ, आजमाले आ...गायक मोहन की आवाज़ में है सपनों को सच करने का हौंसला

ताजा सुर ताल TST (27)

दोस्तों, आज से ताजा सुर ताल यानी TST पर आपके लिए है एक ख़ास मौका और एक नयी चुनौती भी. आज से TST के हर एपिसोड में आपके लिए होंगें १ की जगह तीन नए गीत. और हर गीत के बाद हम आपको देंगें एक ट्रिविया यानी हर एपिसोड में होंगें ३ ट्रिविया, हर ट्रिविया के सही जवाब देने वाले हर पहले श्रोता की मिलेंगें २ अंक. ये प्रतियोगिता दिसम्बर माह के दूसरे सप्ताह तक चलेगी, यानी आज से अगले २० एपिसोडस तक, जिसके समापन पर जिस श्रोता के होंगें सबसे अधिक अंक, वो चुनेगा आवाज़ की वार्षिक गीतमाला के ६० गीतों में से पहली १० पायदानों पर बजने वाले गीत. इसके अलावा आवाज़ पर उस विजेता का एक ख़ास इंटरव्यू भी होगा जिसमें उनके संगीत और उनकी पसंद आदि पर विस्तार से चर्चा होगी. तो दोस्तों कमर कस लीजिये खेलने के लिए ये नया खेल- "कौन बनेगा TST ट्रिविया का सिकंदर"

तो चलिए आज के इस नए एपिसोड की शुरुआत करें, दोस्तों सुजॉय अभी भी छुट्टियों से नहीं लौटे हैं, तो उनकी अनुपस्तिथि में मैं सजीव सारथी एक बार फिर आपका स्वागत करता हूँ. इस वर्ष लगभग ४ महीनों तक सिनेमा घरों के मालिकों और फिल्म निर्माताओं के बीच ठनी रही और ढेरों फिल्मों का प्रदर्शन टल गया. यही वजह है कि आजकल एक के बाद एक फिल्में आती जा रही हैं और रोज ही किसी नयी फिल्म का संगीत भी बाज़ार में आ रहा है. "लन्दन ड्रीम्स" एक ऐसी फिल्म है जिसका सिनेमाप्रेमियों को बेसब्री से इंतज़ार होगा. इसकी एक वजह इस फिल्म का संगीत भी है, शंकर एहसान और लॉय की तिकडी ने बहुत दिनों बाद ऐसा जलवा बिखेरा है. ढेरों नए गायकों को भी इस फिल्म में उन्होंने मौका दिया है. अभिजित घोषाल से तो हम आपको मिलवा ही चुके हैं इस कार्यक्रम में. आज सुनिए एक और नए गायक मोहन और साथियों का गाया एक और जबरदस्त गीत -"खानाबदोश". इस गीत में एक बहुत ख़ास रेट्रो फील है. शुरुआत में चुटकी और कोरस का ऐसा सुन्दर इस्तेमाल बहुत दिनों बाद किसी गीत में सुनने को मिला है, मोहन की आवाज़ में जबरदस्त संभावनाएं हैं, बहुत कोशिशों के बावजूद भी मैं उनके बारे में अधिक जानकारी नहीं ढूंढ पाया. 'आ ज़माने आ..." से गीत कुछ ऐसे उठता है जिसके बाद आप उसके सम्मोहन में ऐसे बंध जाते हैं कि स्वाभाविक रूप से ही आप गीत को दुबारा सुनना चाहेंगे. मेरी नज़र में तो ये इस साल के श्रेष्ठतम गीतों में से एक है, संगीत संयोजन भी एक दम नापा तुला, और प्रसून के बोल भी कुछ कम नहीं...इससे बेहतर कि मैं कुछ और कहूं आप खुद ही सुनकर देखिये, हो सकता है पहली झलक में आपको इतना न भाए पर धीरे धीरे इसका नशा आप भी भी चढ़ जायेगा ये तय है

खानाबदोश (लन्दन ड्रीम्स)
आवाज़ रेटिंग - ****१/२.



TST ट्रिविया # ०१ - शंकर महादेवन ने शिवमणि और लुईस बैंकस के साथ मिलकर एक संगीत टीम बनायीं थी, क्या आप जानते हैं उस ग्रुप का नाम ?

चलिए आगे बढ़ते हैं. अगला गीत है एक ऑफ बीट फिल्म का. मशहूर साहित्यकार उदय प्रकाश की कहानी पर आधारित "मोहनदास" को शहरों के मल्टीप्लेक्स में काफी सराहना मिली है. संगीतकार हैं विवेक प्रियदर्शन और गीतकार हैं यश मालविय. सीमित प्रचार के बावजूद फिल्म को अच्छे सिनेमा के कद्रदानों ने पसंद किया है, जो कि ख़ुशी की बात है, फिल्म में सभी गीत पार्श्व में हैं....और ये गीत बहुत ही मधुर है, मेलोडी लौटी है विवेक के इस गीत में, शब्द भी अच्छे हैं सुनिए, और आनंद लीजिये -

नदी में ये चंदा (मोहनदास)
आवाज़ रेटिंग - ****



TST ट्रिविया # ०२ - फिल्म मोहनदास के निर्देशक मजहर कामरान ने एक मशहूर निर्देशक की फिल्म के लिए बतौर सिनेमेटोग्राफर भी काम किया है, क्या आप जानते हैं कौन है वो निर्देशक ?

आज का अंतिम गीत हिन्दुस्तान की सबसे महँगी फिल्म का थीम है, अमूमन थीम संगीत में शब्द नहीं होते पर यहाँ बोल भी है और मज़े की बात ये है कि इस थीम के बोल फिल्म के अन्य गीतों के मुकाबले अधिक अच्छे भी हैं. संगीत है ऑस्कर विजेता ऐ आर रहमान का. रहमान साहब की सबसे बड़ी खासियत ये है कि उनका संगीत अपने आप में बहुत होता है एक पूरी कहानी के लिए, उनके वाध्य बोलते हुए से प्रतीत होते हैं, थीम संगीत की अगर बात की जाए तो इसकी परंपरा भी रहमान साहब ने ही डाली थी, फिल्म बॉम्बे का थीम संगीत आज भी रोंगटे खड़े कर देता है, सत्या में विशाल भारद्वाज का थीम संगीत फिल्म के गीतों से भी अधिक लोकप्रिय हुआ था. "ब्लू" का ये थीम संगीत भी जबरदस्त ऊर्जा से भरपूर है. संगीत प्रेमियों के लिए ट्रीट है ये. गायकों कि एक बड़ी फौज है इस थीम में. नेहा कक्कड़ की आवाज़ आपने सुनी होगी इंडियन आइडल में में, दिल्ली की इस गायिका की बड़ी बहन सोनू कक्कड़ भी बेहद मशहूर गायिका हैं दिल्ली की. दोनों बहनों की आवाजें हैं इस गीत में.साथ में हैं रकीब आलम, जसप्रीत, ब्लाज़ और दिलशाद भी. इस मस्त संगीत का आनंद लें -

ब्लू थीम (ब्लू)
आवाज़ रेटिंग -****



TST ट्रिविया # ०३ - ब्लू के इस थीम ट्रैक में बोल किसने लिखे हैं, क्या आप जानते हैं ?

आवाज़ की टीम ने इन गीतों को दी है अपनी रेटिंग. अब आप बताएं आपको ये गीत कैसे लगे? यदि आप समीक्षक होते तो प्रस्तुत गीतों को 5 में से कितने अंक देते. कृपया ज़रूर बताएं आपकी वोटिंग हमारे सालाना संगीत चार्ट के निर्माण में बेहद मददगार साबित होगी.

शुभकामनाएँ....



अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं. क्या आप को भी आजकल कोई ऐसा गीत भा रहा है, जो आपको लगता है इस आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए तो हमें लिखे.

Monday, September 28, 2009

जश्न है जीत का...सा रे गा मा चुनौती से नाबाद लौटे प्रोमिसिंग गायक अभिजीत घोषाल अपने "ड्रीम्स" लेकर अब पहुँच गए हैं "लन्दन"

ताजा सुर ताल (25)

ताजा सुर ताल में आज सुनिए उभरते हुए गायक अभिजीत घोषाल का "लन्दन ड्रीम्स"

सुजॉय- सजीव, क्या आपने एक बात पर ग़ौर किया है?

सजीव- कौन सी बात?

सुजॉय - यही कि आजकल जो भी फ़िल्में बन रही हैं, उनमें से ज़्यादातर के शीर्षक अंग्रेज़ी हैं। जैसे कि 'ब्लू', 'ऑल दि बेस्ट', 'वेक अप सिद', 'व्हट्स योर राशी?', 'वांटेड', 'थ्री', वगैरह वगैरह ।

सजीव- बात तो सही है तुम्हारी। तो क्या आज हम किसी ऐसी ही फ़िल्म का गीत सुनवाने जा रहे हैं जिसका शीर्षक अंग्रेज़ी में है?

सुजॉय - बिल्कुल ठीक समझे आप। आज हम चर्चा करेंगे 'लंदन ड्रीम्स‍' की और इस फ़िल्म का एक गीत भी बजाएँगे। इस फ़िल्म के निर्माता हैं आशिन शाह, निर्देशक हैं विपुल शाह, संगीत शंकर अहसान लोय का, गीतकार प्रसून जोशी, और इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार हैं सलमान ख़ान, अजय देवगन, आसिन थोट्टुम्कल, रणविजय सिंह, बृंदा पारेस्ख, ओम पुरी, ख़ालिद आज़्मी और आदित्य रोय कपूर।

सजीव- यानी कि मल्टि-स्टारर फ़िल्म है यह। और ये जो रणविजय है, ये वही है ना MTV Roadies वाले?

सुजॉय- हाँ बिल्कुल वही है।

सजीव- पिछले साल 'रॉक ऑन' ने मास और क्लास दोनों से तारीफ़ें लूटी थी, और फ़रहान अख़्तर की भी काफ़ी सराहना हुई। तो इसी के मद्देनज़र विपुल शाह ने तय किया कि वो भी इसी फोर्मुले को अपनाएँगे।

सुजॉय - कौन सा फार्मूला सजीव?

सजीव- यही बैंड्स+ म्युज़िक + ड्रामा, और क्या!

सुजॉय - अच्छा! और इसीलिए 'रॉक ऑन' वाले संगीतकार तिकड़ी को ही लिया गया है।

सजीव- हो सकता है, लेकिन मैने तो सुना है कि क्योंकि इस फ़िल्म का एक अहम पक्ष संगीत का रहेगा, इसीलिए निर्माता चाहते थे कि ए. आर. रहमान इसका म्युज़िक करें, लेकिन बात बन नहीं पायी।

सुजॉय - अच्छा, खैर शंकर एहसान लॉय भी निराश करने वालों में से नहीं हैं, मैंने भी इस अल्बम के सभी गीत सुनें हैं और मेरे ख्याल से ये इस साल की बेहतरीन अल्बम्स में से एक है, जिसमें में लगभग सभी गीत एक से बढ़कर एक हैं, पर ताज्जुब इस बात का है कि फिल्म के कुल ८ गीतों में से किसी में भी फीमेल स्वर नहीं है....सोचता हूँ कि आखिर आसीन कर क्या रही है फिल्म में :), हाँ एक बात और, बहुत से नए गायकों ने इन गीतों को अपनी आवाज़ दी है, धुरंधर शंकर, रूप कुमार राठोड और राहत फतह अली खान आदि के साथ साथ...

सजीव - हाँ और उन्हीं नए गायकों में से एक आज तुम्हारे और मेरे साथ इस कांफ्रेंस में जुड़ने भी वाले हैं ...जानते हो कौन हैं वो ?

सुजॉय - कहीं ये अभिजीत घोषाल तो नहीं... मैं जानता हूँ कि आपको उनका गाया "जश्न है जीत का..." इन दिनों बहुत भा रहा है... । वाकई ...यह एक 'पावर पैक्ड नंबर' है। इस गीत में आप इलेक्ट्रॊनिक और रॊक के साथ साथ अरबी संगीत की भी झलक पाएँगे। सजीव ये अभिजीत घोषाल वही हैं जो ज़ी टीवी के सा रे गा मा चैलेंज में लगातार १२ बार विजेयता बने थे। मेरे ख्याल से ये रिकॉर्ड अभी तक कोई तोड़ नहीं पाया है

सजीव - बिलकुल सुजॉय.....लीजिये आ गए हैं अभिजित....स्वागत है आपका...

अभिजित -शुक्रिया सुजॉय और सजीव आपका....मैं हिंद युग्म का हिस्सा तो पहले ही बन चुका हूँ....आप के इस कार्यक्रम की बदौलत आज मेरे इस ताजा गीत पर भी कुछ चर्चा हो जायेगी...

सजीव- अभिजीत सबसे पहले तो इस बड़ी फिल्म में इतने महत्वपूर्ण गीत के लिए बधाई....सा रे गा मा से लन्दन ड्रीम तक पहुँचने में काफी लम्बा समय लगा आपको...इस दौरान हुए संघर्ष के बारे में कुछ बताएं...

अभिजित- सजीव मैं आज आपको कुछ ऐसा बताता हूँ जो कभी मैंने किसी को नहीं बताया...जिन दिनों मैं सा रे गा मा के चैलेन्ज राउंड में लगातार ११ बार जीतने के बाद स्वेच्छा से अपना नाम वापस ले चुका था, कई लोगों ने सोचा कि शायद चैनल वालों ने इन पर दबाब डाला होगा, पर ऐसा नहीं था. जब मैं अपनी ८ वीं चुनौती पार कर चुका था तब मेरी माँ की तबियत अचानक खराब हो गयी.....पर मुझे घरवालों ने यह बात मालूम नहीं होने दी, बाद में जब मुझे अपने दोस्त के माध्यम से उनकी नाज़ुक हालत की खबर मिली, तब मुझे तुंरत इलाहाबाद के लिए कूच करना पड़ा...आप शायद जानते होंगें कि मैं मूल रूप से इलाहाबाद का रहने वाला हूँ, बाद में हम लोग माँ के इलाज के लिए मुंबई आ गए.....आप यकीन नहीं करेंगें, मैं सुबह बिना किसी को बताये माँ को अस्पताल पहुंचा कर वहां उनके लिए पर्याप्त इंतजाम कर स्टूडियो पहुँचता था गाने के लिए, पर कभी किसी से मैंने इन सब का जिक्र नहीं किया....आप शायद यकीन नहीं करेंगें, सा रे गा मा के वो ११ एपिसोड जिसमें मैं जीता था उनमें से मैंने मात्र २ एपिसोडस का प्रसारण ही टी वी पर देख पाया, वो भी घर पर नहीं....एक एपिसोड तो मैंने लखनऊ के एक छोटे से ढाबे में रात का खाना खाते वक़्त देखा....वहां बैठे हुए लोग मेरी शक्ल देख कर कहने लगे - "अरे भाई साहब ये तो आपकी तरह लगता है", मैंने भी जवाब में बस इतना ही कहा -"हाँ मुझे भी कुछ ऐसा ही लग रहा है...", उस छोटे से ढाबे में बैठकर आप इससे ज्यादा क्या कह सकते थे...

सुजॉय - और अब माँ...?

अभिजीत - अभी इसी साल मार्च में मैंने उन्हें सदा के लिए खो दिया. उस हादसे के बाद लगभग ५ साल वो जीवित रही...मैं कभी भी ५ दिन से अधिक घर से दूर नहीं रहा...यही वजह है कि मैंने कभी USA का टूर नहीं किया, क्योंकि वहां जाने के लिए मुझे कम से कम १० दिन तक दूर रहना पड़ता...आप समझ सकते हैं ..ये सब मेरे लिए कितना मुश्किल था ...घर का एक कमरा अस्पताल सरीखा था ...माँ को निरंतर देखबाल की आवश्यकता थी...

सजीव - बिलकुल अभिजीत हम लोग समझ सकते हैं, आप अपने दुःख में हमें भी शरीक मानें...ये शायद आपकी माँ का आशीर्वाद ही है जो आज आप इस बड़ी फिल्म का हिस्सा हैं..

अभिजीत - हाँ बिलकुल, माँ को हमेशा ये लगता था कि मैं उनकी वजह से पीछे रह गया हूँ, हालाँकि ऐसा नहीं था, क्योंकि लगतार मैं काम कर रहा था. लुईस बैंक के साथ ढेरों प्रोजेक्ट का मैं हिस्सा रहा हूँ, उस्ताद विलायत राम जी, शिव जी, जैसे गुरुओं का हमेशा ही आशीर्वाद मिला मुझे, और अब तो मुझे लगता है जैसे माँ ने स्वर्ग में जाकर मेरी तकदीर के बचे कुचे दोष भी दूर हटा दिए हैं, तभी तो पहले किसान में "झूमो रे" मिला और अब ये लन्दन ड्रीम्स, ख़ुशी हुई जानकार कि आप सब को ये गीत पसंद आया है, मैं आपको बता दूं भारत में ही नहीं विदेशों से भी अल्बम को काफी अच्छे रीव्यूस मिल रहे हैं...

सुजॉय- आपने बंगला सा रे गा मा प् होस्ट भी किया....सोनू निगम, शान जैसे बड़े गायकों ने भी होस्टिंग के काम को बेहद मुश्किल करार दिया....आपका अनुभव कैसा रहा....

अभिजीत- मेरा तो बहुत बढ़िया रहा सुजॉय... ये एक ऐसा काम था जिसे मैंने बहुत एन्जॉय किया, उसकी वजह एक ये भी है कि मैं बच्चों से बहुत जल्दी खुद को जोड़ लेता हूँ, और बच्चे भी मुझसे बहुत जल्दी घुल मिल जाते हैं, यहाँ तक कि जब मेरी पहली एल्बम जो की बांगला में थी, उसमें मैंने उस कार्यक्रम के दो सबसे प्रोमिसिंग बच्चों से ओरिजनल गाने गवाए थे...आज भी वो सब मुझसे जुड़े हुए हैं और अपनी हर बात मुझसे शेयर करते हैं...

सजीव - अभिजीत, आप इलाहाबाद से हैं और अभी हाल ही में इस शहर पर एक गाना भी बना है....इलाहाबाद में बीते अपने शुरूआती दिनों पर कुछ हमारे श्रोताओं को बताईये...

अभिजीत - सजीव स रे गा मा में आने से पहले मैं एक बैंकर था, acedamically भी मेरा background बहुत स्टोंग रहा, मेरा दायरा हमेशा से ही ज़रा बुद्दी संपन्न लोगों का रहा, आप देखिये मेरे यदि १०० दोस्त होंगे तो उनमें से कम से कम ९० जन आई ऐ अस अधिकारी होंगे....मैं भी उन्हीं में से एक होता....अब ये मेरी खुशकिस्मती है कि मैं आज वो काम कर पा रहा हूँ जिसमें मेरी खुद की रूचि है, अभी ३ साल पहले ही मैंने नौकरी छोड़ी है, मैं हालाँकि बहुत जिम्मेदारी से काम को अंजाम देने वाला अधिकारी रहा, जब तक भी नौकरी की पर आप जानते हैं रचनात्मक लोग बहुत दिनों तक ९ से ५ के ढाँचे में बंध कर नहीं रह सकते...

सुजॉय - शंकर एहसान लॉय तक कैसे पहुंचना हुआ ?

अभिजीत - शंकर से लुईस के माध्यम से ही मिलना हुआ था, लुईस शंकर और शिव मणि का एक ग्रुप हुआ करता था आपको याद होगा "सिल्क" नाम का...शंकर जब पहली बार मिले तो खुद ही बोले..."अरे अभिजित आप तो वही....अरे क्या गाते हो भाई....". वो बहुत बड़े कलाकार हैं. आप जानते हैं कि इंडस्ट्री में निर्माताओं को विश्वास दिलाना बहुत मुश्किल होता है. पर विपुल जी को जब शंकर ने मेरा गीत सुनाया तो भाग्यवश उन्हें भी पसंद आ गया...

सजीव - इस फिल्म में दो बड़े स्टार हैं आपका गीत इस पर फिल्माया गया है....

अभिजीत - सच कहूँ तो मुझे भी अभी तक पक्का नहीं पता, पर शायद ये गीत अजय देवगन पर होना चाहिए....फिल्म की कहानी के हिसाब से....

सुजॉय - जब गीत रिकॉर्ड हो रहा था, तब कैसा मौहौल था स्टूडियो में उस बारे में कुछ बताईये....शंकर ने क्या टिपण्णी की जब गीत ख़तम हुआ.....क्या गीतकार प्रसून भी वहां मौजूद थे..

अभिजीत- नहीं प्रसून तो मौजूद नहीं थे....पर उनका लिखा हुआ मैंने पढ़ा...और बस करीब २० मिनट में गाना रिकॉर्ड हो गया...शंकर भाई ने रिकॉर्डिंग के बाद कहा कि अभिजीत तुमने बहुत ही अच्छा गाया.....मैंने भी उनसे कहा....कि गीत ये पंक्तियाँ देखिये.....

छाले कई, तलवों में चुभे
भाले कई, जलती हुई कहीं थी जमींन,
ताले कई, दर्द संभाले कई,
हौंसलों में नहीं थी कमी,
हम अभी अड़ गए, आँधियों से लड़ गए,
मैंने धकेल के अँधेरे, छीन के ले ली रोशिनी,
मेरे हिस्से के थे सवेरे, मेरे हिस्से की जिन्दगी....

बिलकुल मुझे अपने जीवन की कहानी लगी...गाते हुए भी, और मेरे ही क्या आपकी भी...मेरा मतलब जो जो हम जैसे संघर्षशील कलाकार हैं उन सब का है ये गीत....

सजीव - बिलकुल सही है अभिजीत...अच्छा...इस फिल्म में आपके अलावा भी कुछ नए गायकों ने अपनी आवाज़ मिलायी है, जैसे "खानाबदोश" मोहन की आवाज़ में बहुत खूब जमा है, पंजाबी गायक फिरोज़ खान का भी एक गीत. खुद शंकर ने गाया है गीत "ख्वाब" जिसकी कुछ पंक्तियाँ भी आपको बहुत पसंद है ....

अभिजीत - हाँ ये पंक्तियाँ इस फिल्म का भी सार है और कुछ कुछ मेरी अपनी सोच भी इनसे मिलती है. आप भी देखिये -

मंजिलों पे त्यौहार है,
लेकिन वो हार है, क्या ख़ुशी अपनों के बिन,
है अधूरी हर जीत भी सरगम संगीत भी
अधूरा है अपनों के बिन,
ख्वाबों के बादल छाने दो लेकिन,
रिश्तों की धूप बचा के बरसना,
कहती है हवाएं, चूम ले गगन को,
पंखों को खोल दो छोड़ दो गरजना.....


सुजॉय -वाह क्या बात है अभिजीत...और कौन कौन सी फिल्में हैं आने वाली जिसमें हमें आपकी आवाज़ सुनने को मिलेगी

अभिजित - प्रोजेक्ट तो बहुत से हैं पर जब तक मुक्कमल न हो जाएँ उनके बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता....हाँ पर मैं आपको बता दूं की बहुत जल्दी यानी कि दिसम्बर जनवरी के आस पास मैं और आप एक बड़े प्रोजेक्ट पर यहाँ बैठे बात कर रहे होंगें.

सजीव - अभिजीत उन दिनों जब आप सा रे गा मा में परफोर्म करते थे तब हम भी उन श्रोताओं में से थे जो आपकी जीत के लिए SMS किया करते थे....आप आपको इस बड़ी फिल्म के लिए गाते हुए देखकर बहुत अधिक ख़ुशी हो रही है....आने वाला वक़्त हिंदी सिनेमा के शीर्ष गायकों की श्रेणी में आपका भी नाम जोड़े....स्वीकार करें मेरी सुजॉय और तमाम हिंद युग्म टीम की तरफ से ढेरों शुभकामनाएँ...

अभिजीत - शुक्रिया सजीव और सुजॉय....मेरी तरफ से भी हिंद युग्म परिवार के सभी सदस्यों को ढेर सारा प्यार

सुजॉय - तो दोस्तों सुनिए लन्दन ड्रीम्स से अभिजीत घोषाल का गाया ये शानदार गीत, "जश्न है जीत का", याद रखिये ये सिर्फ एक डेमो उद्देश्य से मात्र ३२ kbps की क्वालिटी पर आपके लिए बजाय जा रहा है, उच्च क्वालिटी में सुनने के लिए ओरिजनल एल्बम ही खरीदें.



आवाज़ की टीम ने दिए इस गीत को 4 की रेटिंग 5 में से. अब आप बताएं आपको ये गीत कैसा लगा? यदि आप समीक्षक होते तो प्रस्तुत गीत को 5 में से कितने अंक देते. कृपया ज़रूर बताएं आपकी वोटिंग हमारे सालाना संगीत चार्ट के निर्माण में बेहद मददगार साबित होगी.



अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं. क्या आप को भी आजकल कोई ऐसा गीत भा रहा है, जो आपको लगता है इस आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए तो हमें लिखे.

Monday, June 15, 2009

धूप के सिक्के है प्रसून का ताज़ा गीत

ताजा सुर ताल (4)

गीत - धूप के सिक्के
फिल्म - सिकंदर
गीतकार - प्रसून जोशी
संगीतकार - शंकर एहसान लॉय
गायन - शंकर महादेवन, आयिशा


"ठंडा मतलब कोला कोला" जुमला देकर प्रसून ने इस शीतल पेय को घर घर में स्थापित कर दिया, मूल रूप से खुद को हिंदी कवि कहने वाले प्रसून जोशी ने बेशक धनार्जन के लिए विज्ञापन इंडस्ट्री में पैठ जमाई पर उनके हुनर को असली मंजिल मिली हिंदी फिल्मों में गीत लिखकर. राज कुमार संतोषी की फिल्म "लज्जा" से उन्होंने गीतकारी की शुरुआत की. यश चोपडा की "हम तुम" में उनके लिखे गीत "सांसों को सांसों में घुलने दो ज़रा" को इतनी ख्याति मिली कि जानकार इसे हिंदी फिल्मों के श्रेष्ठतम युगल गीतों में शुमार करने लगे. इसी फिल्म में उनका लिखा "लड़कियां न जाने क्यों लड़कों सी नहीं होती" आदमी और औरत की मूलभूत प्रवर्तियों जो उनके बीच आकर्षण का भी कारण बनती है और मतभेद का भी, को बेहद खूबसूरत और दिलचस्प अंदाज़ में उजागर करता है. "रंग दे बसंती" को नयी सदी की एक मील का पत्थर फिल्म कही जा सकती है, यहाँ प्रसून को साथ मिला संगीत सरताज ए आर रहमान का. प्रसून ने न सिर्फ इस फिल्म के यादगार गीत लिखे बल्कि इस फिल्म में संवाद भी उन्ही के थे. इस फिल्म के "खलबली" गीत का जिक्र करते हुए प्रसून ने एक बार कहा था- "मैं और रहमान रात भर इस गीत पर काम करते रहे, सुबह मैं उनके रिकॉर्डिंग स्टूडियो से वापस लौट रहा था तो रहमान का फ़ोन आया. उन्होंने कहा कि वो जो हिस्सा है गीत का 'जिद्दी जिद्दी जिद्दी' वाला उसमें कुछ और तरह के शब्द चाहते हैं. पहले इस धुन पर मैंने कुछ और लिखा था पर जब उन्होंने जिद्द की यहाँ कुछ और लिखो तो मैंने फ़ोन पर ही उनसे कहा कि आप बहुत जिद्दी हैं और गाकर सुनाया जिद्दी जिद्दी रहमान...बस इसी तरह ये जिद्दी शब्द इस गीत में आया."

प्रसून और रहमान की जोड़ी ने "दिल्ली ६" और "गजिनी" में भी जम कर रंग जमाया. "फ़ना" में जतिन ललित के लिए "चाँद सिफारिश" और "तारे ज़मीन पर" में शंकर एहसान लॉय के लिए "माँ" जैसे गीत उनकी कलम से निकले कालजयी गीतों में शामिल हैं. २००७ और २००८ में उन्होंने लगातार फिल्म फेयर जीता. १६ सितम्बर १९७१ उत्तराखंड में जन्में प्रसून की लिखी कविताओं की किताब "मैं और वो" जब प्रकाशित हुई तब वह मात्र १७ वर्ष के थे. फ़िल्मी गीतों में भी उनका शब्दकोष सीमित नहीं है. नए शब्दों के साथ नए तजुर्बे करना उनकी खासियत है. "मसकली" की उड़ान हो या ज़मीन पर उतरे "तारों" का दर्द हो, स्त्री स्वतंत्रता की तान छेड़ते "मन के मंजीरे" हो फिर सिल्क रूट का "डूबा डूबा" प्यार का खुमार हो, प्रसून की छाप उनके लिखे हर गीत में झलकती है. शंकर एहसान लॉय की तिकडी के साथ उन्होंने फिर से काम किया है फिल्म "सिकंदर" में जिसका गीत आज हम यहाँ आपके लिए लेकर हाज़िर हुए हैं.

सुधीर मिश्रा की सिने रास और बिग पिक्चर के बैनर पर बनी यह फिल्म एक सस्पेंस थ्रिल्लर है, जो एक १४ साल के बच्चे के इर्द गिर्द घूमती है. "किंग ऑफ़ बॉलीवुड" और "चलो अमेरिका" जैसी फिल्मों के निर्देशक पियूष झा ने संभाली है निर्देशन की कमान तो परजान दस्तूर (याद कीजिये कुछ कुछ होता है का वो नन्हा सरदार) हैं सिकंदर की भूमिका में, साथ में हैं संजय सूरी और आर माधवन. फिल्म ब्लैक की नन्ही लड़की आयेशा कपूर ने भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. दो संगीतकार हैं शंकर एहसान लॉय और सन्देश संदलिया. प्रसून के आलावा नीलेश मिश्रा और कुमार ने भी गीत लिखे हैं फिल्म के लिए. फिल्म का अधिकतर हिस्सा कश्मीर की वादियों में शूट हुआ है, और तमाम हिंसा के बीच भी फिल्म शांति का सन्देश देती है. फिल्म जल्दी ही आपके नजदीकी सिनेमा घरों में होगी, पर आज आप सुनिए इस फिल्म से ये ताज़ा तरीन गीत, प्रसून जोशी का लिखा, धुन है शंकर एहसान लॉय की, और गाया है खुद शंकर ने और साथ दिया है आयिशा ने. पर गीत को सुनने से पहले देखिये प्रसून के हुनर की ये बानगी.

धूप के सिक्के उठाकर गुनगुनाने दो उसे,
बैंगनी कंचे हथेली पर सजाने दो उसे,
भोली भाली भोली भाली रहने दो
जिन्दगी को जिन्दगी को बहने दो....

बारूद जब बच्चा था वो तितली पकड़ता था,
वो अम्बिया भी चुराता था पतंगों पर झगड़ता था,
अगर तुम उसका मांझा लूटते वो कुछ नहीं कहता,
थोडा नाराज़ तो होता मगर फिर भी वो खुश रहता,
मगर धोखे से तुमने उसका बचपन भी तो लूटा है,
ज़रा देखो तो उसकी आँखों में वो कबसे रूठा है,
जुगनुओं की रोशनी में दिल लगाने दो उसे...

बहुत जल्दी दुपट्टे ओढ़ना सिखा रहे हैं हम,
क्यों जिंदगी को रात से मिलवा रहे हैं हम,
वो पल्लू से चिपक कर माँ के चलती थी तो अच्छी थी,
अकेला छोड़कर उसकी क्या कहना चाह रहे हैं हम,
एक गहरी नींद से हमको जगाने दो उसे....

भोली भाली...


और अब सुनिए ये ताज़ा संगीत -

Wednesday, January 21, 2009

सुनिए और बूझिये कि आखिर कौन है दिल्ली ६ की ये मसकली

सप्ताह की संगीत सुर्खियाँ (9) स्लमडॉग विशेषांक

स्लम डॉग ने रचा इतिहास
इस सप्ताह की ही नही इस माह की सबसे बड़ी संगीत ख़बर है ऐ आर रहमान का गोल्डन ग्लोब जीतना. आज का ये एपिसोड हम इसी बड़ी ख़बर को समर्पित कर रहे हैं. जिस फ़िल्म के लिए ऐ आर को ये सम्मान मिला है उसका नाम है स्लम डॉग मिलेनिअर. मुंबई के एक झोंपड़ बस्ती में रहने वाले एक साधारण से लड़के की असाधारण सी कहानी है ये फ़िल्म, जो की आधारित है विकास स्वरुप के बहुचर्चित उपन्यास "कोश्चन एंड आंसर्स" पर. फ़िल्म का अधिकतर हिस्सा मुंबई के जुहू और वर्सोवा की झुग्गी बस्तियों में शूट हुआ है. और कुछ कलाकार भी यहीं से लिए गए हैं. नवम्बर २००८ में अमेरिका में प्रर्दशित होने के बाद फ़िल्म अब तक ६४ सम्मान हासिल कर चुकी है जिसमें चार गोल्डन ग्लोब भी शामिल हैं. फ़िल्म दुनिया भर में धूम मचा रही है,और मुंबई के माध्यम से बदलते हिंदुस्तान को और अधिक जानने समझने की विदेशियों की ललक भी अपने चरम पर दिख रही है. पर कुछ लोग हिंदुस्तान को इस तरह "थर्ड वर्ल्ड" बनाकर दुनिया के सामने प्रस्तुत करने को सही भी नही मानते. अमिताभ बच्चन ने अपने ब्लॉग में लिखा है कि फ़िल्म इसलिए पसंद की जा रही है क्योंकि विकसित देश भारत का यही रूप देखना चाहते हैं. पर लेखक विकास स्वरुप ऐसा नही मानते. उनका कहना है कि फ़िल्म में स्लम में रहने वालों को दुखी या निराश नही दिखाया गया बल्कि उन्हें ख़ुद को बेहतर बनाने और अपने सपनों को सच करने की कोशिश करते हुए दिखाया गया है, यही उभरते हुए भारत की सच्चाई है. फ़िल्म में एक दृश्य है जहाँ नायक का बड़ा भाई उसे वो इलाका दिखाता हुए कहता है जहाँ कभी उनकी झुग्गी बस्ती हुआ करती थी और जहाँ अब गगनचुम्भी इमारतें खड़ी है,कि -"भाई आज इंडिया दुनिया के मध्य में है और मैं (यानी कि एक आम भारतीय) उस मध्य के मध्य में..." यकीनन ये संवाद अपने आप में बहुत कुछ कह जाता है. बहरहाल हम समझते हैं कि ये वक्त बहस का नही जश्न का है. जब "जय हो" और "रिंगा रिंगा" जैसे गीत अंतर्राष्ट्रीय चार्ट्स पर धूम मचा रहे हों, तो शिकायत किसे हो. अमूमन देखने में आता है कि गोल्डन ग्लोब जीतने वाली फिल्में ऑस्कर में भी अच्छा करती हैं, तो यदि अब हम आपके लिए रहमान के ऑस्कर जीतने की ख़बर भी लेकर आयें तो आश्चर्य मत कीजियेगा



जिक्र उनका जो गुमनाम ही रहे

बात करते हैं इस फ़िल्म से जुड़े कुछ अनजाने हीरोस की. रहमान ने अपने इस सम्मान को जिस शख्स को समर्पित किया है वो हैं उनके साउंड इंजिनीअर श्रीधर. ४ बार राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित श्रीधर, रहमान के साथ काम कर रहे थे उनकी पहली फ़िल्म "रोजा" से, जब स्लम डॉग बन कर तैयार हुई श्रीधर ने रहमान का धन्येवाद किया कि उन्होंने उनका नाम एक अंतर्राष्ट्रीय एल्बम में दर्ज किया, दिसम्बर २००८ में श्रीधर मात्र ४८ वर्ष की आयु में दुनिया को अलविदा कह गए और उस अद्भुत लम्हें को देखने से वंचित रह गए जब रहमान ने गोल्डन ग्लोब जीता. पर रहमान ने अपने इस साथी के नाम इस सम्मान को कर इस अनजाने हीरो को अपनी श्रद्धाजन्ली दी. इसी तरह के एक और गुमनाम हीरो है मुंबई के राज. जब निर्देशक डैनी बोयल से पूछा गया कि यदि उन्हें २ करोड़ रूपया मिल जायें तो वो क्या करेंगे, तो उनका जवाब था कि वो अपने पहले सह निर्देशक (फ़िल्म के)जो कि राज हैं को दे देंगें, दरअसल राज पिछले कई सालों से मुंबई के गरीब और अनाथ बच्चों के लिए सड़कों पर ही चलते फिरते स्कूल चलाते हैं और उनकी निस्वार्थ सेवा भाव ने ही डैनी को इस फ़िल्म के लिए प्रेरित किया, चूँकि उनका इन बच्चों के संग उठाना बैठना रहता है फ़िल्म के बेहतर बनाने में उनकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही है. राज जैसे लोग आज के इस नए हिंदुस्तान की ताक़त है. जिनका जज्बा आज दुनिया देख रही है.


तन्वी शाह की खुशी का कोई ठिकाना नही

स्लम डॉग के लिए "जय हो" गीत गाने वाली चेन्नई की तन्वी शाह आजकल हवाओं से बात कर रही है. मात्र एक गाने ने उन्हें अन्तराष्ट्रीय स्टार बना दिया है. उनके फ़ोन की घंटी निरंतर बज रही है, और इस युवा गायिका के कदम जमीं पर नही पड़ रहे हैं...क्यों न हो. आखिर जय हो ने वो कर दिखाया है जिसका सपना हर संगीतकर्मी देखता है. तन्वी ने कभी अपनी आवाज़ कराउके रिकॉर्डिंग कर अपने एक दोस्त को दी थी, जिसकी सी डी किसी तरह रहमान तक पहुँच गई. और वो इस तरह "होने दो दिल को फ़ना..."(फ़िल्म-फ़ना) की गायिका बन गई. स्लम डॉग से पहले उन्होंने अपनी आवाज़ का जादू "जाने तू...", "गुरु" और "शिवाजी" जैसी फिल्मों के लिए भी ऐ आर के साथ गा चुकी है....पर कुछ भी कहें "जय हो" को बात ही अलग है.


मिलिए दिल्ली ६ की इस मसकली से

देसी पुरस्कारों में भी रहमान की ही धूम है हाल ही में संपन्न स्क्रीन अवार्ड में रहमान को जोधा अकबर के लिए सर्वश्रेष्ठ संगीतकार चुना गया. वहीँ फ़िल्म "बचना ऐ हसीनों" के गीत "खुदा जाने..." के लिए इस गीत के गायक (के के), गायिका (शिल्पा राव) और गीतकार अन्विता दास गुप्तन को भी पुरस्कृत किया गया है. इस सप्ताह से हम आपको साप्ताहिक सुर्खियों के साथ साथ एक चुना हुआ सप्ताह का गीत भी सुनवायेंगे. इस सप्ताह का गीत है आजकल सब की जुबां पर चढा हुआ फ़िल्म दिल्ली ६ का - "मसकली....". क्या आप जानते हैं कि कौन है ये "मसकली", मसकली नाम है दिल्ली ६ के एक कबूतर का, जिसके लिए ये पूरा गीत रचा गया है...फ़िल्म के प्रोमोस देख कर लगता है कि राकेश ने "रंग दे बसंती" के बाद एक और शानदार प्रस्तुति दी है...पर फिलहाल तो आप आनंद लें मोहित चौहान (डूबा डूबा फेम) के गाये और प्रसून जोशी के अनोखे मगर खूबसूरत शब्दों से सजे इस लाजवाब गीत का -




Monday, December 1, 2008

"मैं उस दिन गाऊंगा जिस दिन आप धारा प्रवाह हिन्दी बोल कर दिखायेंगे..."- प्रसून जोशी

सप्ताह की संगीत सुर्खियाँ (५)

साहित्य और संगीत एक एल्बम में

हिंद युग्म का पहला एल्बम "पहला सुर" कई मायनों में अनोखा था. इसमें पहली बार साहित्य और संगीत को एक धागे में पिरोकर प्रस्तुत किया गया था. बेशक ये बहुत बड़े पैमाने पर नही था पर सोच अपने समय से आगे की थी. इस बात की पुष्टि करता है टाईम्स म्यूजिक का नया एल्बम "द म्यूजिक ऑफ़ सुपरस्टार इंडिया". जो कि शोभा डे की लिखी पुस्तक "सुपरस्टार इंडिया" से प्रेरित है.संगीत का मोर्चा संभाला है मिति अधिकारी और नील अधिकारी ने जो मिलकर बनते हैं MANA. बंगाल के बाउल और राजस्थान के लंगास के मन लुभावने संगीत के बीचों बीच आप सुन सकते हैं शोभा की आवाज़ में पुस्तक के अंश भी. इन पारंपरिक गीतों को MANA ने बहुत आधुनिक अंदाज़ में प्रस्तुत किया है, यहाँ लाउंज भी है, रेग्गे भी, ट्रांस भी और क्लब भी, जो शायद हर पीढी को संगीत का आनंद भरपूर दे पायेगी. दुर्लभ संगीत अल्बम्स के संकलन के शौकीन संगीत प्रेमी इसे अवश्य खरीदें.


"सॉरी भाई" ये मेरा गाना है...

संगीत की चोरी का मामला एक बार फ़िर प्रकाश में हैं, आपको याद होगा किस प्रकार संगीतकार राम सम्पंथ ने निर्देशक राकेश रोशन को अदालत का दरवाज़ा दिखलाया था जब संगीतकार राजेश रोशन ने राम सम्पथ की धुन चुरा कर फ़िल्म "क्रेजी ४" में इस्तेमाल किया था. पॉप और सूफी गायक रब्बी ने आरोप लगाया है फ़िल्म 'सॉरी भाई' के एक गाने की धुन उनकी रचना की हुबहू नक़ल है. फ़िल्म के संगीतकार हैं गौरव दयाल. अदालत ने फ़िल्म के प्रदर्शन पर से तो रोक हटा ली है पर निर्माता वाशु भगनानी से जरूरी कदम उठाने का निर्देश दिया है. वाशु का कहना है कि उन्हें इस बाबत जानकारी नही थी. उन्हें गौरव ने धुन अपनी कह कर सुनवाई थी, पर वो रब्बी को जरूरी मुहवाजा देने को तैयार हैं, यदि उनकी बात सही पायी गई तो. आए दिन आने वाली चोरी की इन खबरों से संगीत जगत स्तब्ध है.


प्रसून एक गायक भी

गीतकार प्रसून के लिखे गीतों से हम सब वाकिफ हैं, पर बहुत कम लोग जानते है कि वो उन्होंने उस्ताद हफीज अहमद खान से शास्त्रीय संगीत की दीक्षा भी ले रखी है.उनके उस्ताद उन्हें ठुमरी गायक बनाना चाहते थे. उन दिनों को याद कर प्रसून बताते हैं कि उनके पास रियाज़ का समय नही होता था, तो बाईक पर घर लौटते समय गाते हुए आते थे और उनका हेलमेट उनके लिए "अकॉस्टिक" का काम करता था. प्रसून संगीत को अपना उपार्जन नही बना पाये. उनके पिता उन्हें प्रशासन अधिकारी बनाना चाहते थे पर ये उनका मिजाज़ नही था, तो MBA करने के बाद आखिरकार विज्ञापन की दुनिया में आकर उनकी रचनात्मकता को जमीन मिली. बचपन से उन्हें हिन्दी और उर्दू भाषा साहित्य में रूचि थी. उनके शहर रामपुर के एक पुस्तकालय में उर्दू शायरों का जबरदस्त संकलन मौजूद था. मात्र १७ साल की उम्र में उनका पहला काव्य संकलन आया. कविता अभी भी उनका पहला प्रेम है. प्रसून मानते हैं कि यदि संगीत के किसी एक घटक की बात की जाए जो आमो ख़ास सब तक पहुँचता हो और जहाँ हमने विश्व स्तर की निरंतरता बनाये रखी हो तो वो गीतकारी का घटक है. ५० के दशक से आज तक फ़िल्म जगत के गीतकारों ने गजब का काम किया है. "हम तुम", "फ़ना" और "तारे जमीन पर" जैसी फिल्मों के गीत लिख कर फ़िल्म फेयर पाने वाले प्रसून तारे ज़मीन पर के अपने सभी गीतों को अपनी बेटी ऐश्निया को समर्पित करते हैं, और बताते हैं कि किस तरह एक ८० साल के बूढे आदमी ने उनके लिखे "माँ" गीत की तारीफ करते हुए उनसे कहा था कि वो अपनी माँ को बचपन में ही खो चुके थे, गाने के बोल सुनकर उन्हें उनका बचपन याद आ गया. ऐ आर रहमान के साथ गजिनी में काम कर रहे प्रसून से जब रहमान गीत को आवाज़ देने की "गुजारिश" की तो प्रसून ने बड़ी आत्मीयता से कहा कि जिस दिन आप धाराप्रवाह हिन्दी बोलने लगेंगे उस दिन मैं आपके लिए अवश्य गाऊंगा.देखते हैं वो दिन कब आता है.


मैं ऐक्टर तो नही....मगर...

लीजिये एक और गायक /संगीतकार का काम अब एक्टिंग की दुनिया से जुड़ने वाला है. विश्वास कीजिये हमारे बप्पी दा यानी कि मशहूर संगीतकार और गायक बप्पी लहरी अब फिल्मों में अभिनय करते नज़र आयेंगे. "इट्स रोक्किंग दर्द ऐ डिस्को" नाम से बन रही इस फ़िल्म में बप्पी दा प्रमुख किरदार निभा रहे हैं साथ ही गायन और संगीत भी उन्हीं का है. इसके अलावा वो सलमान और करीना की आने वाली फ़िल्म "मैं और मिसेस खन्ना" में भी एक प्रमुख रोल में नज़र आयेंगे. चौकिये मत अभी ये सूची और लम्बी होने वाली है. इंडियन आइडल अभिजीत सावंत नज़र आयेंगें आने वाली फ़िल्म "लूटेरे" में, तो आनंद राज आनंद और सुखविंदर के भी बारे में भी ख़बर आई है कि वो भी जल्द ही फिल्मों अपना अभिनय कौशल दिखलायेंगे. लगता है हमारे संगीत सितारों को "हिमेशिया सरूर" हो गया है

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