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Monday, October 8, 2012

अमित और स्वानंद ने रचा कुछ अलग "इंग्लिश विन्गलिश" के लिए


प्लेबैक वाणी - संगीत समीक्षा : इंग्लिश विन्गलिश 

१५ वर्षों के लंबे अंतराल के बाद खूबसूरती की जिन्दा मिसाल और अभिनय के आकाश का माहताब, श्रीदेवी एक बार फिर लौट रहीं है फ़िल्मी परदे पर एक ऐसे किरदार को लेकर जो अपनी अंग्रेजी को बेहतर करने के लिए संघर्षरत है. फिल्म है इंग्लिश विन्गलिश. आईये चर्चा करें फिल्म के संगीत की. अल्बम के संगीतकार हैं आज के दौर के पंचम अमित त्रिवेदी और गीतकार हैं स्वानंद किरकिरे.

पहला गीत जो फिल्म का शीर्षक गीत भी है पूरी तरह इंग्लिश विन्गलिश अंदाज़ में ही लिखा गया है. गीत के शुरूआती नोट्स को सुनते ही आप को अंदाजा लग जाता है अमित त्रिवेदी ट्रेडमार्क का. कोरस और वोइलन के माध्यम से किसी कोल्लेज का माहौल रचा गया है. स्वानंद ने गीत में बेहद सुंदरता से हिंदी और अंग्रेजी के शब्दों के साथ खेला है. गीत की सबसे बड़ी खासियत है शिल्पा राव की आवाज़,जिसमें किरदार की सहमी सहमी खुशी और कुछ नया जानने का आश्चर्य बहुत खूब झलकता है. पुरुष गायक के लिए अमित स्वयं की जगह किसी और गायक की आवाज़ का इस्तेमाल करते तो शायद और बेहतर हो पाता.    

अगले गीत में अमित की आवाज़ लाजवाब आई है. धक् धुक एक ऐसे अवस्था का बयां है जिसमें किरदार किसी अपने से दूर जाने के भय से ग्रस्त है. बंगाल के मिटटी की खुश्बू से सने इस गीत की धुन बहुत ही मधुर है. स्वानंद ने शब्दों से पूरे चित्र को बखूबी तराशा है....क्यों न हमें टोके...क्यों न हमें रोके... जैसी पक्तियों को अमित ने बेहद दिल से गाया भी है.

श्रीदेवी की आवाज़ में कुछ संवादों से अगला गीत खुलता है जो मैनहैंटन शहर को समर्पित है. क्लिटंन और बियांका गोमस की आवाजों में ये गीत दिलचस्प है पर कोई लंबी छाप नहीं छोड़ता, हालाँकि बांसुरी का प्रयोग खूबसूरत है.

अगला गीत है गुस्ताख दिल, कम से कम वाध्यों से सुन्दर संयोजन है अमित का और यही उनकी सबसे बड़ी खूबी भी है. शिल्पा की गहरी और दिल में उतरती आवाज़ गीत को एक अलग मुकाम दे देती है. दिल की गुस्ताखियों को शब्दों में उभरा है स्वानंद ने, हालाँकि इस विषय पर हजारों गीत बन चुके हैं पर स्वनादं ने कुछ अलग तरीके से बात को रखने की कोशिश जरूर की है.    

महाराष्ट्र के विवाहों में गाये जाने वाले लोक गीतों की झलक है अंतिम गीत नवराई माझी में. मस्ती भरे इस गीत में सुनिधि की आवाज़ है और उनका साथ दिया है खुद गीतकार स्वानंद ने और माताजी नीलाम्बरी किरकिरे ने. स्वानंद और उनकी माताजी की आवाज़ गीत में एक सुखद रस घोल देती है....

इंग्लिश विन्गलिश का संगीत ठहराव भरा और मेलोडियस है, रेडियो प्लेबैक इसे दे रहा है ४.१ की रेटिंग....अपनी राय आप बताएँ...


संगीत समीक्षा - इंग्लिश विन्गलिश by f100000740246953
एक सवाल  क्या आपको कोई ऐसा पुराना गीत याद आता है जिसमें गायक एक ऐसे किरदार के लिए गा रहा हो जो किसी नयी भाषा को सीखना की कोशिश कर रहा हो....सोचिये और बताईये हमें टिप्पणियों के माध्यम से.

Monday, October 1, 2012

प्लेबैक इंडिया वाणी (१८) ओह माई गॉड, और आपकी बात

संगीत समीक्षा  ओह माई गॉड




प्रेरणा बॉलीवुड का सबसे लोकप्रिय शब्द है...कोई अंग्रेजी फिल्मों से प्रेरित होता है, कोई दक्षिण की फिल्मों की नक़ल घोल कर करोड़ों कमा लेता है. कभी कभार कोई निर्माता अभिनेता साहित्य या थियटर से भी प्रेरित हो जाता है. ऐसे ही एक मंचित नाटक का फ़िल्मी रूपांतरण है “ओह माई गोड”. फिल्म में संगीत है हिमेश रेशमिया का, जो सिर्फ “हिट” गीत देने में विश्वास रखते हैं, चाहे प्रेरणा कहीं से भी ली जाए. आईये देखें “ओह माई गोड” के संगीत के लिए उनकी प्रेरणा कहाँ से आई है. 

बरसों पहले कल्याण जी आनंद जी  का रचा “गोविदा आला रे” गीत पूरे महाराष्ट्र में जन्माष्टमी के दौरान आयोजित होने वाले दही हांडी प्रतियोगिताओं के लिए एक सिग्नेचर धुन बन चुका था, हिमेश ने इसी धुन को बेहद सफाई से इस्तेमाल किया है “गो गो गोविंदा” गीत के लिए. इस साल जन्माष्टमी से कुछ दिन पहले ये गीत एक सिंगल की तरह श्रोताओं के बीच उतरा गया, और इसके लाजवाब नृत्य संयोजन ने इसे रातों रात एक हिट गीत में बदल दिया. इस साल लगभग सभी दही हांडी समारोहों में ये गीत जम कर बजा, और इस तरह फिल्म के प्रदर्शन से दो महीने पहले ही फिल्म को एक जबरदस्त हिट गीत मिला गया. इसमें निर्माता की समझ बूझ तो है ही, पर हिमेश के जबरदस्त संगीत संयोजन की भी तारीफ करनी पड़ेगी. पूरे गीत में उत्सव की धूम और उस माहौल को बखूबी उभरा है. मिका सिंह हमेशा की ही तरह जोशीले हैं यहाँ तो श्रेया भी अपनी उर्जात्मक आवाज़ में कुछ कम नहीं रही. ये गीत इस अल्बम का ही नहीं बल्कि शायद फिल्म की सफलता में भी कारगर सिद्ध होगा ऐसे पूरी उम्मीद है.

 अगला गीत “डोंट वरी (हे राम)” में पंचम के क्लास्सिक “दम मारो दम” की सिग्नेचर गिटार की धुन उठा ली गयी है. हो सकता है कि संगीतकार को अपनी धुन पर बहुत अधिक आत्मविश्वास न रहा हो, इसलिए ऐसा किया गया. गीत की धुन और शब्द सरंचना दोनों ही कमजोर हैं और हिमेश की आवाज़ गीत में बिल्कुल नहीं जमी है. “गो गो गोविंदा” की ऊर्जा के सामने एक बेहद कमतर गीत.

“मेरे निशाँ” कैलाश खेर की आवाज़ में है. यहाँ इश्वर धरती पर आकर यहाँ के लोगों में अपने निशाँ ढूंढ रहा है, जो नदारद है. थीम बहुत अच्छा है मगर एक बार फिर गीत कुछ असर नहीं छोड़ता. धुन में न कोई नयापन है न गायकी में कुछ अलग बात. गीत जरुरत से ज्यादा लंबा भी है और किसी अनूठी बात के अभाव में उबाऊ भी लगता है सुनते हुए...मेरे निशाँ गीत में एक शाब्दिक गलती भी है, "जज़्बात" स्वयं में बहुवचन है, ऐसे में "जज्बातों" शब्द का प्रयोग गलत है. 

“तू ही तू” गीत के कई संस्करण है अल्बम में और वो भी अलग अलग आवाजों में. वास्तव में ये एक भजन ही है जो शायद मोहमद इरफ़ान की आवाज़ में सबसे अच्छा लगा है. तेज रिदम के साथ “हरे रामा हरे कृष्णा” सुनना अच्छा लगता है...धुन मधुर है, और शब्बीर के शब्द भी ठीक ठाक हैं.

अल्बम में एक सुन्दर बांसुरी का वाध्य टुकड़ा भी है, जो बहुत मधुर है. जबकि अल्बम का अंतिम गीत “हरी बोल” भी प्रभावी गीत नहीं है. कुल मिलाकर हिमेश ने उत्सवी रगों से सजाने की कोशिश की है इस अलबम को लेकिन “गो गो गोविंदा’ को छोड़कर कोई भी अन्य गीत उनकी प्रतिभा और लोकप्रियता की कसौटी को छू नहीं पाता, रेडियो प्लेबैक इस अल्बम को दे रहा है २.३ की रेटिंग.    

और अंत में आपकी बात- अमित तिवारी के साथ

Monday, September 17, 2012

प्लेबैक इंडिया वाणी (१६) बर्फी, और आपकी बात

संगीत समीक्षा - बर्फी





साल २०११ में एक बहुत ही खूबसूरत फिल्म प्रदर्शित हुई थी-”स्टेनले का डब्बा”. जिसका संगीत बेहद सरल और सुरीला था, “बर्फी” के संगीत को सुनकर उसी बेपेच सरलता और निष्कलंकता का अहसास होता है. आज के धूम धूम दौर में इतने लचीले और सुकूँ से भरे गीत कितने कम सुनने को मिलते हैं. आश्चर्य उस पर ये कि फिल्म में संगीत है प्रीतम का. बॉलीवुड के संगीतकार के पास जिस किस्म की विवधता होनी चाहिए यक़ीनन वो प्रीतम के सुरों में है, और वो किसी भी फिल्म के अनुरूप अपने संगीत को ढाल कर पेश कर सकते हैं. “बर्फी” में प्रीतम के साथ गीतकारों की पूरी फ़ौज है. आईये अनुभव करें इस फिल्म के संगीत को रेडियो प्लेबैक की नज़र से...


आला बर्फी कई मायनों में एक मील का पत्थर है. गीत के शुरुआती और अंतिम नोटों पर सीटी का लाजावाब प्रयोग है. हल्का फुल्का हास्य है शब्दों में और उस पर मोहित की बेमिसाल गायिकी किशोर कुमार वाली बेफिक्र मस्ती की झलक संजोय बहती मिलती है. संगीत संयोजन सरल और बहुत प्रभावी है, पहाड़ों की महक है गीत में कहीं तो पुराने अंग्रेजी गीतों का राजसी अंदाज़ भी कहीं कहीं सुनने को मिलता है. एक बहतरीन गीत जिसपर प्रीतम आज कल और हमेशा नाज़ कर सकते हैं. गीत का एक अन्य संस्करण खुद इस गीत के गीतकार स्वानंद किरकिरे की आवाज़ में भी है...”गुड गुड गुड”...और “फुस फुस फुस” जैसे शब्द आभूषणों के लिए स्वानंद वाकई बधाई के पात्र हैं.


एक नए गायक की आमद है अगला गीत “मैं क्या करूँ”. निखिल जोर्ज की आवाज़ वाकई एक अच्छी खोज है. एक आवारगी है उनके उच्चारण में और स्वरों में एक अजीब सा नयापन भी. आशीष पंडित का लिखा ये गीत एक मेलोडी से भरा रोमांटिक गीत है.

नीलश मिश्रा के शब्दों को अंजाम तक पहुँचाया है अगले गीत में आसाम के पोप स्टार पोपऑन और सुनिधि चौहान ने....गीत को सुनते हुए आप अपने बचपन और जवानी के उन फुर्सत के पलों में पहुँच जायेगें यक़ीनन, जहाँ जिंदगी की मासूमियत पर समझ की बोझिल परतें मौजूद नहीं थी. एक बार फिर प्रीतम ने न सिर्फ धुन में ताजगी भरी है, बल्कि आसान और सरल संयोजन से गीत के मूड को बखूबी उत्कर्ष तक पहुँचाया है...पोपऑन की आवाज़ क्या खूब लगी है इस गीत में. “नज़र के कंकडों से खामोशियाँ की खिड़कियों को तोड़ेंगे...” अच्छे शब्द है नीलेश के भी.

“फिर ले आया दिल” गीत भी दो संस्करण में है. रेखा भरद्वाज और अरिजीत सिंह की मुक्तलिफ़ आवाजों में है ये. जितनी खूबसूरत धुन है प्रीतम की उतना ही लाजवाब गायन है दोनों का. गज़ल रुपी ये खूबसूरत गीत बार बार सुने जाने लायक है. एक बार सुनकर देखिये, लंबे समय तक ये गीत आपके साथ बना रहेगा.

“इत्ती सी हँसी” गीत श्रेया और निखिल की युगल आवाजों में है. एक ख्वाब सा है ये गीत कुछ कुछ लव स्टोरी के “देखो मैंने देखा है” की याद दिलाता है. धुन सरल होने के कारण ये जल्दी ही श्रोताओं की जुबाँ पे चढ जायेगा.

गायकी में गायक द्वारा सरगोशियों का इस्तेमाल करना बहुत कम देखा सुना गया है, रफ़ी साहब ने बहुत पहले किया था एक खूबसूरत गीत में ऐसा कमाल, वो गीत कौन सा था ये आप पहचानें इस गीत को सुनकर. अरिजीत सिंह की मखमली सी आवाज़ में ये सांवली सी रात महक कर और भी सुरमई हुई जा रही है, इस खूबसूरत गीत में.  

“बर्फी” का संगीत एक ताज़ा हवा के झोंके जैसा है और इस अल्बम से जुड़े सभी कलाकार निश्चित ही बधाई के हकदार हैं. प्लेबैक इंडिया दे रहा है इस जानदार अल्बम को ४.९ की रेटिंग .




और अंत में आपकी बात- अमित तिवारी के साथ

Wednesday, September 12, 2012

प्लेबैक इंडिया वाणी (१५) राज -३, और आपकी बात

संगीत समीक्षा - राज -३





दोस्तों आजकल सफल फ़िल्में एक ब्रैड की तरफ काम कर रहीं हैं. २००२ में विक्रम भट्ट की फिल्म राज़ अप्रत्याक्षित रूप से सफल रही थी, तभी से रूहानी ताकतों की कहानियाँ दुहराने के लिए भट्ट कैम्प ने इस फिल्म के नाम को एक ब्रैंड का तरफ इस्तेमाल किया,  राज़ २ के बाद तृतीय संस्करण भी दर्शकों के सामने आने को है.
राज़ के पहले दो संस्करणों की सफलता का एक बड़ा श्रेय नदीम श्रवण और राजू सिंह के मधुर संगीत का भी था, वहीँ राज़ ३ में भट्ट कैम्प में पहली बार शामिल हो रहे हैं जीत गांगुली, जी हाँ ये वही जीत गांगुली हैं जिनकी जोड़ी थी कभी आज के सफलतम संगीतकार प्रीतम के साथ.
हिंदी फिल्मों में प्रीतम की जो अहमियत है वही अहमियत जीत बंगला फिल्मों में रखते हैं, और निश्चित ही बेहद प्रतिभाशाली संगीतकारों में से एक हैं. आईये देखें कैसा है उनका संगीत राज़ ३ में.

अल्बम का पहला ही गीत आपकी रूह को छू जाता है, जावेद अली की आवाज़ जैसे इसी तरह के सोफ्ट रोमांटिक गीतों के लिए ही बनी है. पर हम आपको बताते चलें कि ये गीत जीत गांगुली ने नहीं बल्कि अतिथि संगीतकार रशीद खान ने स्वरबद्ध किया है. बहुत अधिक नयेपन के अभाव में भी ये सरल और सुहाना सा गीत आपको अच्छा लगेगा, गीत खतम होते होते वोईलन का सुन्दर इस्तेमाल गीत की खूबसूरती को और अधिक बढ़ा देता है.

पैशन से भरे रोमांटिक गीत भट्ट कैम्प की खासियत रहे हैं, इस तरह के गीत आप जहाँ भी जिस मूड में सुन सकते हैं और एन्जॉय कर सकते हैं. गीत गाँगुली का रचा “जिंदगी से” इसी तरह का लाउंज गीत है. शफकत अमानत अली की दमदार आवाज़ में है ये गीत, जिसे बहुत खूब शब्द दिए हैं संजय मासूम ने. “होंठों से मैं तुझको सुनूं, आँखों से तू कुछ सुना, तू अक्स है मैं आईना, फिर क्या है सोचना, एक दूसरे में खोके, एक दूसरे को है पाना”...गीत गांगुली ने रशीद अली के रचे टोन को बरकरार रखा है बखूबी, बखुदा...

भट्ट कैम्प की अल्बम हो और के के की आवाज़ न हो ये जरा मुश्किल है. अगला गीत है “रफ्ता रफ्ता” जो के के की रोकिंग आवाज़ में है, नयेपन के अभाव में भी ये गीत प्रभावित करता है, के के की आवाज़ और सुन्दर ताल संयोजन गीत को सुनने लायक बना देते है. चुटकी की आवाज़ और बांसुरी का प्रयोग बेहद नया लगता है. शब्दों में और थोड़ी सी रचनात्मकता संभव थी.

राज़ के द्रितीय संस्करण का सबसे सफल गीत था, राजू सिंह का स्वरबद्ध “सोनिये” जो सोनू निगम की आवाज़ में था, हो सकता है वही जादू फिर से जगाने का प्रयास किया गया हो, अगले गीत “ओ माई लव” में, पर यहाँ वो बात नहीं बन पायी है.

श्रेया घोषाल की तूफानी आवाज़ में है अंतिम दो गीत. “क्या राज़ है” में उनके साथ हैं जुबिन तो अंतिम गीत “ख्यालों में” उनका सोलो है.  दोनों ही गीत सामान्य हैं और कुछ नया नहीं पेश करते. राज़ ३ का संगीत भट्ट कैम्प के अन्य अलबमों की तरह ही मेलोडियस है. मगर अभाव है नयेपन का. रेडियो प्लेबैक इस अल्बम को दे रहा है २.९ की रेटिंग ५ में से.




और अंत में आपकी बात- अमित तिवारी के साथ

Monday, September 3, 2012

प्लेबैक इंडिया वाणी (१४) जलपरी - द डेजर्ट मरमेड, और आपकी बात

संगीत समीक्षा - जलपरी - द डेजर्ट मरमेड




इस सप्ताह प्रदर्शित होने वाली फिल्मों में एक बाल फिल्म है 'जलपरी: The Desert Mermaid".हिंदी फिल्मों में ऐसा कम ही होता है जब बच्चों के लिए बनी किसी फिल्म को बच्चों के साथ साथ व्यस्क दर्शकों का प्यार भी मिले. इसकी एक वजह ये भी है कि बच्चों के लिए बनी फिल्मों को ज़रूरत से ज़्यादा नाटकीय रूप से प्रस्तुत किया जाता है.पिछले कुछ समय से इसमें परिवर्तन आया है और बच्चों की फिल्मों के स्वरुप को बदला है. इसी कड़ी में एक और कड़ी जोड़ती है 'जलपरी'.

जलपरी का निर्देशन करा है 'आई एम कलाम' के निर्देशक नीला माधब पांडा ने.फिल्म कन्या भ्रूण हत्या पर आधारित है जो आज भी भारत के कई राज्यों में की जाती है.फिल्म की कहानी लिखी है दीपक वेंकटेशन ने. इसका संगीत दिया है आशीष चौहान त और MIDIval Punditz के नाम से मशहूर दिल्ली बेस्ड  Indian fusion group ने. इस  fusion group के कलाकार हैं गोरव राणा और तपन राज. इस फिल्म का कांस फिल्म समारोह में प्रदर्शन हो चुका है.


इस फिल्म का पहला गाना है 'बरगद'. इसे गया है गुलाल फिल्म से चर्चा में आये पियूष मिश्रा ने. इस एल्बम का ये सबसे बढ़िया गाना है. इसे बात आप जितनी बार सुनेंगे हर बार कहीं खो जायेंगे. इस गाने को लिखा भी पियूष मिश्रा ने ही है और संगीतबद्ध भी करा है. ये गाना मंत्रमुग्ध कर देता है. इस गाने को सुनकर आपको गुलाल फिल्म का 'ये दुनिया अगर मिल भी जाए' याद आ सकता है.


इस एल्बम का दूसरा गाना हाथ में थारी साजे चूड़ा गाया है  रिंकू ने. इस गाने में मंजीरे और घड़े का खूब इस्तेमाल हुआ है. यह गाना राजस्थानी लोक संगीत पर आधारित है. ठेठ गवनई अंदाज में इस गाने को गाया गया  है.

इस एल्बम में कुल मिलाकर तीन गाने हैं. तीसरा गाना नीली नीली खिली सी दुनिया गाने को बोल दिए हैं शुभा मुद्गल ने. इस गाने के बोल लिखे हैं प्रोतीक मजूमदार ने और संगीत दिया है MIDIval Punditz ने.

इस एल्बम में संगीत और बोल दोनों मिलाकर बेहतरीन हैं. इस एल्बम को रेडिओ प्लेबैक इंडिया देता है ४.८ की रेटिंग ५ में से.




और अंत में आपकी बात- अमित तिवारी के साथ

Monday, August 27, 2012

प्लेबैक इंडिया वाणी (१३) एक था टाइगर, और आपकी बात

संगीत समीक्षा - एक था टाइगर



जहाँ यश राज फिल्म्स का बैनर हो और सलमान खान हो टाईगर की तरह दहाड़ते हुए परदे पर तो फिल्म से उम्मीदें आसमां छुवेंगीं ही. 
सटीक ही था कि फिल्म ने प्रदर्शन के लिए १५ अगस्त यानी स्वतंत्रता दिवस का दिन चुना. बहरहाल आज हम चर्चा करेंगें फिल्म के संगीत की, जिसे रचा है सोहेल सेन ने और अतिथि संगीतकार की भूमिका में हैं साजिद वाजिद. 
साजिद वाजिद के बारे में बात करें तो कह सकते हैं कि एक दौर था जब इस संगीतकार जोड़ी पर केवल सलमान खान को ही अटूट विश्वास था, मगर आज साजिद वाजिद एक के बाद एक हिट संगीत रचकर प्रीतम और रहमान को कड़ी टक्कर देने की स्तिथि में है, मगर आज भी जब वो अपने सल्लू भाई की फिल्म के लिए संगीत रचते हैं तो अपना सबकुछ झोंक देते हैं. 
वो सलमान ही थे जिन्होंने हिमेश को संगीत जगत में उतरा था, बाद में कुछ मतभेदों के चलते ये जोड़ी टूट सी गयी थी, जिसका फायदा साजिद वाजिद को मिला. हालाँकि सल्लू मियाँ ने हिमेश को वापसी का मौका दिया “बॉडीगार्ड” में जहाँ एक बार फिर हिमेश खरे उतरे थे....


अल्बम में साजिद वाजिद अतिथि संगीतकार के रूप में हैं, पर आश्चर्य कि उन्हीं के गीत को सबसे अधिक लोकप्रियता प्राप्त हो रही है. अरेबिक धुन और नृत्य शैलियों की तर्ज पर है “माशाल्लाह”...जिसमें आवाज़ है खुद वाजिद और सुरीली श्रेया की. थिरका देने वाली धुन, कटरीना का बैले नृत्य और सलमान खान की उपस्तिथि सुनिश्चित करती है कि ये गीत साल के सबसे सफलतम गीतों में अवश्य ही शुमार होगा. पारंपरिक वाध्यों जैसे दरबुका, तार ड्रूम, एकतारा और तम्बूरे का सुन्दर इस्तेमाल है पार्श्व में जो इस गीत को एक अलग मुकाम देता है. साजिद वाजिद की गेस्ट भूमिका अल्बम में चार चाँद लगाने के लिए काफी है.


इसके बाद के गीतों का जिम्मा फिल्म के प्रमुख संगीतकार सोहेल सेन उठाते हैं. एक बात गौर करने लायक है. पुराने गीतों में कभी गीतों के नाम नहीं सोचे जाते थे, अमूमन ऑडियो सी डी या कैसट्स में गीत की पहली पंक्ति को ही लिखा जाता था, पर नयी सदी में इस बात का खास ध्यान रखा जाता है कि हर गीत का एक नाम हो, जिससे उस गीत की पहचान बने. इन्हीं नामों के लिए गीतकार एक कैच लाईन, शब्द या शब्द युग्म सोचते हैं, इस अल्बम में भी इस बात का विशेष ध्यान रखा गया है, माशाल्लाह के बाद अगले गीत का नाम है –“लापता”. सालसा अंदाज़ का ये गीत के के और पलक की आवाजों में है. कोरस जबरदस्त है और रिदम गिटार थिरका देने वाला है.


बंजारा गीत से सोहेल अपनी विविधता का दिलचस्प परिचय देते हैं. यहाँ भी पार्श्व वाध्य एक अलग ही मौहौल रच देते हैं. सुखविंदर की जबरदस्त आवाज़ और नीलेश के असरदार शब्द गीत को कामियाब बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते.


कौसर मुनीर के सुन्दर शब्दों से महका है अगला गीत “सय्यारा”, सभी नृत्य प्रधान गीतों से अलग इस गीत की मेलोडी श्रोताओं को खूब भा सकती है. मोहित चौहान की जादू भरी आवाज़ और तरन्नुम मल्लिक के अच्छे साथ ने गीत को बेहद खास बना दिया है.


कुल मिलकर “एक था टाईगर” के गीतों दुनिया भर के संगीत का असर है, देखा जाए तो श्रोताओं को एक ही अल्बम अलग अलग किस्म के संगीत का जायका मिल जाता है. प्लेबैक इंडिया की टीम दे रही है अल्बम को ३.९ की रेटिंग.



और अंत में आपकी बात- अमित तिवारी के साथ

Tuesday, August 21, 2012

प्लेबैक इंडिया वाणी (१२) जोकर

संगीत समीक्षा - जोकर




अक्षय कुमार और सोनाक्षी सिन्हा के अभिनय से सजी है फिल्म ‘जोकर’, जो आने वाले दिनों में प्रदर्शित होने वाली है.

इस फिल्म का संगीत दिया है जी.वी.प्रकाश कुमार और गौरव दागावंकर ने. जी.वी.प्रकाश कुमार ए.आर.रहमान के भांजे हैं जिनकी बतौर संगीत निर्देशक यह पहली फिल्म है.सभी श्रोताओं को उनसे मधुरता की उम्मीद रहेगी. देखिये आपकी और हमारी अपेक्षाओं पर वः कितने खरे उतर पाते हैं. इस फिल्म के ६ गानों में से ५ का संगीत निर्देशन जी.वी.प्रकाश कुमार का है और एक गाना आया है गौरव के हिस्से में.

अल्बम की शुरुआत होती है काफिराना गाने से. इस गाने का संगीत गौरव का है और आवाजें हैं सुनिधी चौहान और आदर्श शिंदे की.गाने के बोलों में हिन्दी , अंग्रेजी और मराठी का इस्तेमाल हुआ है. यह गाना पूरी मस्ती में सराबोर गाना है जिसमे ढोल का जमकर इस्तेमाल हुआ है. इस गाने को सुनकर महाराष्ट्र में गणपति महोत्सव के समय होने वाले डांस की याद आ जाती है.

अगला गाना है जुगनू. इस गाने को गाया है उदित नारायण ने. गाना साधारण है पर उदित ने अपनी आवाज के द्वारा इसमें मिठास लाने की कोशिश करी है. गाना एक बार सुनने लायक है. उससे ज्यादा इसे पचाने की तो मेरी हिम्मत नही हुई.


सिंग राजा गाने में लोक संगीत का इलेक्ट्रोनिक साउंड के साथ अच्छा इस्तेमाल किया गया है. दलेर मेहंदी और सोनू कक्कड़ की आवाज इस गाने में जोश भर देती है. नच ले शब्द को कई भाषाओं में बोला गया है. गाने के बोल कोइ खास नहीं है पर गाने का संगीत निःसंदेह बहुत अच्छा है. इस गाने को सुनने के बाद आपको शब्द शायद याद न रहें पर इसका संगीत याद रहेगा.

अगला गाना इस अल्बम में ये जोकर है जो काफी कुछ पहले गाने काफिराना के द्वारा छेड़ी धुन को कंटीन्यू करता है. सोनू निगम की आवाज जानदार है मगर काफिराना गाने को टक्कर देने में काफी पीछे है.

इस अल्बम में दो इंस्ट्रुमेंटल हैं. पहला Tears of Joker है. जो बहुत ही मधुर है. इसको आप आँखे बंद करके सुनिए और इसमें डूब जाइए. थोड़ा सा मन में उदासी ला देता है ये. मुझे अल्बम का यह सबसे अच्छा ट्रेक लगा.

दूसरा इंस्ट्रुमेंटल है अल्बम के अंत में Alien arrival. इसमें कुछ अच्छी बीट्स इस्तेमाल हुई हैं. इसको सुनकर आपको  ७० के दशक के कुछ गानों की याद आ सकती है.


कुल मिलाकर पूरी अल्बम में संगीत अच्छा है केवल कमी है lyrics की. रेडिओ प्लेबैक इंडिया इसे ३.६ के रेटिंग देता है.

Sunday, August 12, 2012

प्लेबैक इंडिया वाणी (११) गैंग्स ऑफ वासेपुर-२, डार्क रूम और आपकी बात

संगीत समीक्षा - गेंगस ऑफ़ वासेपुर - २




दोस्तों जब हमने गैंग्स ऑफ वासेपुर के पहले भाग के संगीत की समीक्षा की थी और उसे ४.३ की रेटिंग दी थी, तो कुछ श्रोताओं ने पूछा था कि क्या वाकई ये अल्बम इस बड़ी रेटिंग की हकदार है? तो दोस्तों हम आपको बता दें कि हमारा मापदंड मुख्य रूप से इस तथ्य में रहता है कि संगीत में कितनी रचनात्मकता है और कितना नयापन है. क्योंकि इस कड़ी प्रतियोगिता के समय में अगर कोई कुछ नया करने की हिम्मत करता है तो उसे सराहना मिलनी चाहिए.

तो इसी बात पर जिक्र करें गैंग्स ऑफ वासेपुर के द्रितीय भाग के संगीत की. संगीत यहाँ भी स्नेहा कंवलकर का है और गीत लिखे हैं वरुण ग्रोवर ने. एक बार फिर इस टीम ने कुछ ऐसा रचा है जो बेहद नया और ओरिजिनल है, लेकिन याद रखें अगर आप भी हमारी तरह नयेपन की तलाश में हैं तभी आपको ये अल्बम रास आ सकती है.

१२ साल की दुर्गा, चलती रेल में गाकर अपनी रोज़ी कमाती थी, मगर स्नेहा ने उसकी कला को समझा और इस अल्बम के लिए उसे मायिक के पीछे ले आई. दुर्गा का गाया ‘छी छी लेदर” सुनने लायक है, दुर्गा की ठेठ और बिना तराशी आवाज़ का खिलंदड़पन गीत का सबसे बड़ा आकर्षण है.

स्नेहा की अपनी आवाज़ में कोयला बाजारी के काले बाज़ार के भेद खोलता है गीत "काला रे”, पार्श्व वाध्य बेहद सीमित हैं, शब्द और गायन पर जोर अधिक है, “सैयां करते जी कोल बाजारी” स्नेहा की ठहरी हुई आवाज़ में एक रहस्य का काला संसार रच जाते हैं सुनने वाले के जेहन में.

इलेक्ट्रिक पिया और तार बिजली से पतले हमारे पिया, दरअसल एक ही गीत के दो संस्करण है, निश्चित ही रसिका रानी की आवाज़ के इलेक्टिक पिया से कई गुना बेहतर है पद्म श्री गायिका शारदा सिन्हा की आवाज़ में “तार बिजली” गीत. लोक वाद्यों का प्रयोग और गुदगुदाते शब्दों के चलते“तार बिजली” अल्बम का सबसे बेहतर गीत सुनाई पड़ता है. इस गीत को सुनते हुए आपके चेहरे पर एक रसीली मुस्कान अवश्य ही बिखर जायेगी.“सूख के हो गए हैं छुआरे पिया....”, शारदा सिन्हा को एक प्रमुख धारा की अल्बम में सुनना बेहद सुखद लगता है.

बच्चों की आवाज़ में “बहुत खूब” एक रैप है. एक दम स्वाभाविक साउंड है....चट्टानों से क्रीडा करती....एक ऐसा गीत है जिसे जिसे आप सुन सुनकर नहीं थकेंगें. वाह स्नेहा इस ओरीजिनिलाटी पर कौन न कुर्बान जाए भला.

पियूष मिश्रा एक बार फिर यहाँ दिखे हैं व्यंगात्मक अंदाज़ में, मगर इस बार लोरी की जगह कव्वाली का सहारा लिया गया है तीखे तीखे व्यंगों के बाण कसने के लिए, पियूष के साथ हैं भूपेश सिंह. गीत का नाम है “आबरू”...

कह के लूँगा का एक नया संस्करण है "के के एल" में, "मूरा" एक अलग अंदाज़ का गीत है, मार खराबे के बीच एक मेलोडी मगर शब्दों का अलग तडका अल्बम के मूड को बदलने नहीं देता. परपेंडीकुलर और तुनिया फिल्म के किरदारों को समर्थित करते गीत हैं. कुल मिलाकर वासेपुर के इस संस्करण के गीत भी निराश नहीं करते. रेडियो प्लेबैक दे रहा है ४ की रेटिंग ५ में से.

     

पुस्तक चर्चा - ...डार्क रूम  


द डार्क रूम उपन्यास की रचना तमिलनाडु में जन्मे अंग्रेजी लेखक आर.के. नारायण ने करी. १९०६ में जन्मे नारायण का पूरा नाम रसीपुरम कृष्णास्वामी अय्यर नारायणस्वामी था. साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित आर.के. नारायण ने अपने जीवन में १५ उपन्यास, कहानियों के पांच खंड, अनेक यात्रा वृतांत लिखे, और महाभारत एवम रामायण के अंग्रेजी अनुवाद किये हैं और अंग्रेजी भाषा में लिखने वाले भारतीय लेखकों में सबसे अधिक लोकप्रिय रहे हैं.

उनकी अन्य रचनाओं की तरह यह भी मालगुड़ी कस्बे की कहानी है. दाम्पत्य जीवन के उतार चढाव पर आधारित आर.के. नारायण का यह उपन्यास पाठकों के दिलों को छु जाता है. शादी का रिश्ता निभाने के लिए पति और पत्नी दोनों को क्या क्या समझोते करने पड़ते हैं यही है इस रोमांचक पुस्तक का केंद्रबिंदु. है. 

उपन्यास की मुख्य पात्र है ‘सावित्री’, जिसकी शादी हुई है रमानी से. रमानी इंगलेडिया इन्सुरेन्स कम्पनी में मैनेजर है. उनके तीन बच्चे कमला, सुमति और बाबू है. सावित्री उस समय की एक टिपिकल गृहिणी है जिसके लिए पति का कहा ही सब कुछ है. उनके घर में एक डार्क रूम है जिसमे सावित्री पति से नाराजगी होने पर चली जाती है. सावित्री के पति का उसकी फर्म में एक नव नियुक्त महिला कर्मचारी के साथ प्रेम सम्बन्ध हो जाता है. सावित्री इसकी वजह से घर छोड़कर आत्महत्या करने चल पड़ती है और असफल रहती है. उसके बाद वह अपने बल पर जिन्दगी जीने का निर्णय लेती है और एक मंदिर में परिचारिका की नौकरी कर लेती है. अंततः सावित्री अपने बच्चों के बिना नहीं रह पाती और सीने पर बोझ लिए वापस लौट आती है.

इस अंग्रेजी उपन्यास का हिन्दी में अनुवाद करा है ‘महेंद्र कुलश्रेष्ठ’ ने और प्रकाशक हैं ‘राजपाल एंड सन्स’.
 
 

और अंत में आपकी बात- अमित तिवारी के साथ


Monday, August 6, 2012

प्लेबैक इंडिया वाणी (10) जिस्म और '...और प्राण'

संगीत समीक्षा - जिस्म



विशेष फिल्म्स या कहें भट्ट कैम्प की फिल्मों के संगीत से हमेशा ही मेलोडी की अपेक्षा रहती है. ये वाकई हिम्मत की बात है कि जहाँ दूसरे निर्माता निर्देशक चालू और आइटम गीतों से अपनी अल्बम्स को भरना चाहते हैं वहीँ भट्ट कैम्प ने कभी भी आइटम गीतों का सहारा नहीं लिया.


एक अल्बम के लिए एक से अधिक संगीतकारों को नियुक्त करने की परंपरा को भी भट्ट कैम्प ने हमेशा बढ़ावा दिया है, आज हम भट्ट कैम्प की नयी फिल्मजिस्म २ के संगीत की चर्चा करेंगें, इसमें भी ६ गीतों के लिए ४ संगीतकार जोड़े गए हैं. भारतीय मूल की विदेशी पोर्न स्टार सन्नी लियोनि को लेकर जब से इस फिल्म की घोषणा हुई है तब से फिल्म की हर बात सुर्ख़ियों में रही है. आईये नज़र दौडाएँ फिल्म के गीतों पर.


पियानो और रिदम गिटार के सुन्दर प्रयोग से निखार पाता है के के की आवाज़ में महकता गीत अभी अभी. के के की सुरीली और डूबी हुई आवाज़ में सरल सी धुन और मुखरित होकर खिल जाती है और इस रोमांटिक गीत में श्रोता डूब सा जाता है. शब्द भी अच्छे हैं, गीत का एक युगल संस्करण भी है जिसमें के के का साथ दिया है श्रेया घोषाल ने.
दिल्ली की गायिका सोनू कक्कड को आश्चर्य है कि कम ही मौके मिले हैं मगर जब भी उन्हें कोई अच्छा मौका मिला उन्होंने अपनी काबिलियत को खुल कर बिखरने दिया है अपनी आवाज़ के जरिये. अल्बम के दूसरे गीत ये कसूर में सोनू की ही आवाज़ है. मिथुन के स्वरबद्ध इस गीत को खुद उन्होंने ही लिखा है. धुन में हालाँकि कुछ नयापन नहीं है मगर फिर भी मेलोडी दिल को छू जाती है, गीत के लिए सोनू का चयन इसकी सबसे बड़ी सफलता कही जायेगी.
नब्बे के दशक मे जूनून के नाम से मशहूर हुए पाकिस्तानी बैंड को भट्ट कैम्प ने पहले भी अपनी फिल्मों में जगह दी है. जिस्म २ में भी जूनून बैंड के अली अजमत की दमदार आवाज़ में मौला गीत दर्द और अकेलेपन की पीड़ा को बखूबी उभारता है. अली की आवाज़ इस रोक जोनर के गीत को खासा नयापन भी देता है. शब्दों में भी गहराई है.
वोइलिन का खूबसूरत प्रयोग है ये जिस्म है गीत में जिसके बारे में कहा गया है कि ये एक तुर्किश गीत से प्रभावित है. अज़मत की आवाज़ यहाँ एक बार फिर जादू सा असर करती है. ये एक ऐसा गीत है जिसे आप बार बार सुनना चाहेगें. गीतकार ने गीत के असर को कायम रखने में अहम भूमिका निभायी है.
इसके अलावा अल्बम में पाकिस्तान के एक और बैंड रुश्क का रचा एक गीत भी है जिसे नाजिया जुबेरी हसन ने गाया है, ये कुछ हैवी मेटल सरीखा गीत है जहाँ शब्दों को सुनने के लिए आपके कानों को अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ सकती है. भारतीय सन्दर्भों में अभी इस तरह के गीतों की कामियाबी के आसार कम ही हैं. अल्बम में एक अंग्रेजी गीत भी है उनूषा का गाया हे वल्ला जो एक बार फिर भट्ट कैम्प की परंपरा अनुसार अल्बम में विविधता भरता है. कुल मिलाकर मेलोडियस है जिस्म २ का संगीत. रेडियो प्लेबैक इसे दे रहा है ३.३ की रेटिंग.   

 
पुस्तक चर्चा - ...और प्राण  
अभिनय के दौरान अभिनेता को ऐसी भावनाओं और भाव-भंगिमाओं को, जो वस्तुत: उसकी अपनी नहीं हैं, इस तरह व्यक्त करना होता है कि वे जीवंत हो उठें. प्राण की जीवनी ..एंड प्राण लिखी है बन्नी रुबेन ने।  हार्पर कोलिंस से यह किताब पहले आ चुकी है. हिंद पॉकेट बुक्स ने इसका हिंदी अनुवाद प्रकाशित किया  है ..और प्राण. अनुवाद किया है अजीत बच्छावत ने. भूमिका लिखी है अमिताभ बच्चन ने.
प्राण को The Villain of the Millennium” कहा जाता है. उन्होंने फिल्मी करियर में क्रूरतम पात्रों की भूमिकाएं निभाई और इतना जीवंत बना दिया कि लोग उन्हें उसी पात्र के रूप में देखने लगे. प्राण ने अभिनय नहीं करा बल्कि पात्रों को जिया हैं. पात्र के चरित्र से लेकर चाल-ढाल, बातचीत का अंदाज, रुचियां व जीवनशैली इतनी सहज और जीवंत कर देते थे कि दर्शकों को लगता ही नहीं कि वे फिल्म देख रहे हैं.  किताब में एक प्रसंग है कि एक बार प्राण साहब का बेटा उन्हें लेने सेट पर गया. पापा को न पाकर उसने आवाज लगाई-पापा आप कहां हैं? तभी वहां खडे एक आदमी ने कहा-बेटा मैं यहां हूं. प्राण को बदले रूप में उनका बेटा भी न पहचान सका. प्राण पहले अपनी भूमिका पढते थे, फिर अभिनय का अंदाज और बोलने का लहजा तय करने के लिए घंटों सोचते. इनकी जीवनी से जाहिर होता है कि प्राण अंतर्मुखी स्वभाव के हैं.
शुरुआत में प्राण की छवि खलनायक की बनी. राज कपूर ने पहली बार फिल्म आह में प्राण को सकारात्मक भूमिका दी. बॉक्स ऑफिस पर फिल्म बुरी तरह पिट गई तो निर्देशक डर गए और उन्हें नकारात्मक भूमिका में typecast  करने लगे. इसे गलत साबित किया मनोज कुमार ने. उपकार में उन्होंने प्राण पर गीत फिल्माने का प्रस्ताव किया तो कल्याणजी-आनंदजी ने विरोध करा. सोचा कि अगर प्राण पर गाना फिल्माया गया तो गाने का बुरा हश्र होना निश्चित है.  किशोर कुमार ने तो गीत ही गाने से मना कर दिया. मन्ना डे ने चेलेंज स्व्वेकर करा और गाना कसमे वादे प्यार वफा गाया और गाना सुपर हिट रहा.
प्राण निजी जीवन में समय  के पाबंद, उदार, परोपकारी, सहकर्मियों के साथ मौज-मस्ती करने वाले, शेरो-शायरी के शौकीन, फक्कड स्वभाव वाले इंसान रहे हैं.
जब राज कपूर संगम फिल्म के बाद आर्थिक संकट से जूझ रहे थे, तब प्राण ने एक रुपये के सांकेतिक पारिश्रमिक पर फिल्म साइन की थी।
इस किताब का नाम और प्राण रखने के पीछे तर्क यह है कि फिल्म में सारे कलाकारों के नाम के बाद अंत में प्राण का नाम आता था और प्राण’. 
 
  और अंत में आपकी बात- अमित तिवारी के साथ



Monday, July 30, 2012

प्लेबैक इंडिया वाणी (9) क्या सुपर कूल हैं हम और आपकी बात

संगीत समीक्षा - क्या सुपर कूल हैं हम



छोटे परदे की बेहद सफल निर्मात्री एकता कपूर ने जब फ़िल्मी दुनिया में कदम रखा तो वहाँ भी सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित किये, बहुत ही अलग अलग अंदाज़ की फ़िल्में वो दर्शकों के लिए लेकर आयीं हैं, जिनमें हास्य, सस्पेंस, ड्रामा सभी तरह के जोनर शामिल हैं. 

अपने भाई तुषार कपूर को लेकर उन्होंने क्या कूल हैं हम बनायीं थी जिसने दर्शकों को भरपूर हँसाया, इसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए वो लायीं है अब क्या सुपर कूल हैं हम जिसमें तुषार कपूर के साथ है रितेश देशमुख. फिल्म हंसी का पिटारा है या नहीं ये तो दर्शकों को फिल्म देखने के बाद ही पता लग पायेगा, पर आईये हम जान लेते हैं कि फिल्म का संगीत कैसा है.

उभरते हुए संगीतकार जोड़ी सचिन जिगर के टेक्नो रिदम से लहराके उठता है दिल गार्डन गार्डन गीत. मयूर पूरी के बे सर पैर सरीखे शब्द गीत को एक अलग ही तडका देते हैं. जहाँ रिदम गीत की जान है वहीँ विशाल ददलानी की उर्जात्मक आवाज़ जोश से भरपूर है. गीत को सुनते हुए न सिर्फ आपके कदम थिरकेंगें बल्कि शब्दों की उटपटांग हरकतें आपके चेहरे पर एक मुस्कान भी ले आएगी...अगर आपने गीत का फिल्मांकन देखा होगा तो गौर किया होगा, सेट से लेकर पहनावे तक हर चीज को एक रेट्रो लुक से सराबोर किया हुआ है जो बेहद लुभावना लगता है, यक़ीनन ये गीत आप आने वाले समय में बहुत बहुत बार सुनने वाले हैं

इस तरह की फिल्म जिसमें कोमेडी का होना पागलपन की हद तक सुनिश्चित हो वहाँ कोई मेलोडिअस गीत की उम्मीद शायद ही कोई करेगा. पर इस अलबम में श्रोताओं के लिए एक बेहद ही मीठा सरप्रयिस है. गीत शर्ट का बट्टन दो अलग अलग संस्करणों में है, जहाँ सोनू की सुरीली आवाज़ में ये एक आउट एंड आउट रोमांटिक गीत बनकर उभरता है वहीँ कैलाश खेर और साथियों वाला संस्करण सूफी रोमंसिसिम को हलके फुल्के अंदाज़ में समेटता है. दोनों गीतों के बोल और धुन एक होने के बावजूद भी संगीत संयोजन और आवाजों के मुक्तलिफ़ अंदाजों के चलते दो अलग अलग गीत से सुनाई पड़ते हैं, और दोनों ही आपके दिल को छू जाते हैं, काफी समय से एक अच्छे ब्रेक की तलाश में चल रहे गीतकार कुमार के लिए इससे बेहतर प्लेटफोर्म नहीं हो सकता था और उन्होंने चालू शायरी के पुट में यक़ीनन अच्छी खासी गरिमा भरी है, दोस्तों यकीन मानिये इस तरफ के गीत लिखने में एक गीतकार को खासी मेहनत करनी पड़ती है. आधुनिक नारी के श्रृंगार प्रसाधनों को एक तार में पिरोता ये गीत बेहद ही खूबसूरत है. और साल के बेहतरीन गीतों में एक है. संगीतकार मीत ब्रोस अनजान और गीतकार कुमार को खासी बधाई. कहने की जरुरत नहीं कि सोनू की ठहराव से भरी गायिकी और कैलाश का लोक अंदाज़ गीत का बोनस है.

कई साल पहले आई फिल्म शूल के लिए शंकर एहसान लॉय ने एक आइटम गीत रचा यु पी बिहार लूटने जो शिल्प शेट्टी पर फिल्माया गया था, उसी धमाकेदार गीत को मीत ब्रोस ने एक बार फिर एक नए अंदाज़ में उभारा है और इसे किसी अभिनेत्री पर नहीं बल्कि फिल्म के दो नायकों पर फिल्माया गया है. जहाँ सुखविंदर और दलेर प्राजी की दमदार आवाज़ के साथ महरास्त्रियन लावनी का फ्लेवर जमाया खुद रितेश देशमुख ने अपनी आवाज़ के जरिये. ये मस्त मस्त गीत खुल कर नाचने के लिए है बस.

अल्बम का अंतिम गीत वोल्यूम हाई करले बहुत मजेदार नहीं बन पाया है, और अल्बम के अन्य गीतों के मुकाबले कम इन्नोवेटिव भी है...पर फिर भी दिल गार्डन शर्ट का बट्टन और केपेचिनो गीत काफी है इस अल्बम को ४.१ की रेटिंग देने के लिए. एक बार शर्ट का बट्टन के लिए बधाई जो शायद इस फिल्म का सबसे बड़ा आकर्षण होने वाला है.   

 
और अंत में आपकी बात- अमित तिवारी के साथ

Monday, July 23, 2012

प्लेबैक इंडिया वाणी (8) फ्रॉम सिडनी विद लव, तमस और आपकी बात

संगीत समीक्षा - फ्रॉम सिडनी विद लव



आने वाले दिनों में एक नयी फिल्म आने वाली है फ्रॉम सिडनी विद लव. बहुत सारे नवोदित कलाकार इसमें दिखाई देंगे. 

इस फिल्म की स्टारकास्ट से लेकर निर्देशक तक अपनी पहली पारी की शुरुआत  करने जा रहे हैं. इस फिल्म का संगीत दिया है मेरे ब्रदर की दुल्हन से चर्चित हुए सोहेल सेन और  थोर पेट्रिज और नबीन लस्कर ने. 

इस एल्बम का पहला गाना फीलिंग लव इन सिडनी, इलेक्ट्रॉनिक साउंड के साथ हिप होप फीलिंग देता है.गाने का संगीत मधुर है. कानों को सुनने में अच्छा लगता है. पार्टियों में आने वाले दिनों में बहुत बजेगा ये.

अगला गाना हो जायेगा , मोहित चौहान और मोनल ठाकुर की आवाज में है. आपको इस गाने में ज्यादा धूम धडाका नही मिलेगा जो आजकल के गानों में रहता है.

अगला गाना भांगडा स्टाइल का गाना है. खटका खटका गाने को मीका सिंह ने अपने आवाज से मस्ती में झूमने वाला बना दिया है. इस गाने में इस्तेमाल हुई ढोल की बीट्स और इलेक्ट्रॉनिक साउंड आपको नाचने के लिए मजबूर कर देंगी.

बंगाली शब्दों के साथ  पलक  नैनो ने गाने की शुरुआत करती हैं. मोहम्मद सलामत ने उनके साथ बखूबी निभाया है. गाना बहुत मधुर है. इस एल्बम का मुझे ये सबसे मधुर गाना लगा है. एक परफेक्ट गाना है जिसे सुनकर आप अपने साथी के साथ मानसून क स्वागत कर सकते हैं.

अगला गाना आइटम ये हाय फाय नीरज श्रीधर  की आवाज में है. गाना ठीक ठाक है. ये गाना भी एक डांस सोंग है.

अंत में गाना है प्यारी प्यारी. ब्रुकलीन शांती ने इसमें केलिप्सो का टेस्ट दिया है, जो एफ्रो केरेबियन स्टाइल का संगीत है जिसकी उत्पत्ति हुई त्रिनिडाड और टोबैगो में.


कुल मिलाकर इस फिल्म का संगीत सुनने लायक है. रेडियो प्लेबैक इंडिया इसे देता है ३.५ के रेटिंग.   

 
तमस   
'सुनते हैं सुअर मारना बड़ा कठिन काम है. हमारे बस का नहीं होगा हुजूर. खाल-बाल उतारने का काम तो कर दें. मारने का काम तो पिगरी वाले ही करते हैं.' पिगरी वालों से करवाना हो तो तुमसे क्यों कहते?'यह काम तुम्ही करोगे.'' और मुराद अली ने पाँच रुपए का चरमराता नोट निकाल कर जेब में से निकाल कर नत्थू के जुड़े हाथों के पीछे उसकपी जेब में ढूँस दिया था.'
'प्रकाशो की आँखें क्षण भर के लिए अल्लाह रक्खा के चेहरे पर ठिठकी रहीं, फिर उसने धीरे से मिठाई का टुकड़ा उठाया. टुकड़े को हाथ में ले लेने पर भी वह उससे उठ नहीं रहा था. प्रकाशो का चेहरा पीला पड़ गया था और हाथ काँपने लगा था मानो उसे सहसा बोध हुआ कि वह क्या कर रही है और उसका माँ-बाप को पता चले तो वे क्या कहेंगे. पर उसी वक्त आग्रह और उन्माद से भरी अल्लाह रक्खा की आँखों ने उसकी ओर देखा और प्रकाशो का हाथ अल्लाहरखा के मुँह तक जा पहुँचा.'
ये अंश हैं १९७५ में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित उपन्यास तमस से. तमस भीष्म साहनी का सबसे प्रसिद्ध उपन्यास है. वे इस उपन्यास से साहित्य जगत में बहुत लोकप्रिय हुए थे. १९८६ में गोविंद निहलानी ने दूरदर्शन धारावाहिक तथा एक फ़िल्म भी बनाई थी.
इस उपन्यास में आजादी के ठीक पहले भारत में हुए साम्प्रदायिकता के नग्न नर्तन का अंतरंग चित्रण है. 'तमस' केवल पाँच दिनों की कहानी है. वहशत में डूबे हुए पाँच दिनों की कहानी को भीष्म साहनी ने इतनी कुशलता से बुना है कि सांप्रदायिकता का हर पहलू तार-तार उद्घाटित हो जाता है और हर पाठक एक साँस में सारा उपन्यास पढ़ने के लिए बाध्य हो जाता है. उपन्यास में जो प्रसंग संदर्भ और निष्कर्ष उभरते हैं, उससे यह पांच दिवस की कथा न होकर बीसवीं सदी के हिंदुस्तान के अब तक के लगभग सौ वर्षो की कथा हो जाती है. आजादी के ठीक पहले सांप्रदायिकता की बैसाखियाँ लगाकर पाशविकता का जो नंगा नाच इस देश में नाचा गया था, उसका अंतरग चित्रण भीष्म साहनी ने इस उपन्यास में किया है.
भारत में साम्प्रदायिकता की समस्या एक युग पुरानी है और इसके दानवी पंजों से अभी तक इस देश की मुक्ति नहीं हुई है. आजादी से पहले विदेशी शासकों ने यहाँ की जमीन पर अपने पाँव मजबूत करने के लिए इस समस्या को हथकंडा बनाया था और आजादी के बाद हमारे देश के कुछ राजनीतिक दल इसका घृणित उपयोग कर रहे हैं. और इस सारी प्रक्रिया में जो तबाही हुई है उसका शिकार बनते रहे हैं वे निर्दोष और गरीब लोग जो न हिन्दू हैं, न मुसलमान बल्कि सिर्फ इन्सान हैं, और हैं भारतीय नागरिक. भीष्म साहनी ने आजादी से पहले हुए साम्प्रदायिक दंगों को आधार बनाकर इस समस्या का सूक्ष्म विश्लेषण किया है और उन मनोवृत्तियों को उघाड़कर सामने रखा है जो अपनी विकृतियों का परिणाम जनसाधारण को भोगने के लिए विवश करती हैं
राजकमल प्रकाशन ने इस उपन्यास को प्रकाशित करा है. आपकी अपनी लायब्रेरी के लिए यह एक एतिहासिक संग्रह है.  
 
  और अंत में आपकी बात- अमित तिवारी के साथ

Saturday, July 14, 2012

प्लेबैक इंडिया वाणी (7) बोल बच्चन, विचार नियम और स्वीकार का जादू और आपकी बात

संगीत समीक्षा - बोल बच्चन



जिस फिल्म से रोहित शेट्टी का नाम जुड जाता है तो दर्शकों को समझ में आ जाता है कि एक बहुत ही मनोरंजक फिल्म उन्हें देखने को मिलने वाली है. 

उनकी फिल्मों का संगीत भी उसी मनोरजन का ही एक हिस्सा होता है, जाहिर है अल्बम से बहुत कर्णप्रिय या लंबे समय तक याद रखने लायक संगीत की अपेक्षा नहीं रखी जा सकती, फिर भी जहाँ नाम हो हिमेश रेशमिया का और अग्निपथ में शानदार संगीत रचने वाले अजय-अतुल का, तो उम्मीदों का जागना भी स्वाभाविक ही है. इस मामले में बोल बच्चन निराश भी नहीं करता. 

अल्बम में कुल चार गीत है जिन्हें ४ मुक्तलिफ़ गीतकारों ने अंजाम दिया है. पहले गीत में ही एक बार फिर मनमोहन देसाई सरीखे अंदाज़ की पुनरावर्ती दिख जाती है, जब बिग बी यानी बच्चन साहब अपने चिर परिचित अमर अकबर एंथोनी स्टाइल में विज्ञान के फंडे समझाते हुए गीत शुरू करते हैं. गीतकार फरहाद साजिद ने शब्दों में अच्छा हास्य भरा है, पर फिर भी माई नेम इज एंथोनी गोंसाल्विस की बात कुछ और ही थी, ऐसे हमें लगता है. हिमेश आपको फिर एक बार पुराने दौर में ले जाते हैं, इस बार थोडा और पीछे, जहाँ सी रामचंद्र अपने सहज भोलेपन से दिल जीत लिया करते थे. चलाओ न नैनों के बाण सुनने में दिलकश लगता है. शब्द है शब्बीर अहमद के. अजय अतुल की एंट्री होती है धमाकेदार नच ले नच ले से, पंजाबी रिदम और डांडीये की ताल से समां बंध जाता है, सुखविंदर और श्रेया की आवाजों में गजब की ऊर्जा है और स्वानंद किरकिरे के शब्द भी बढ़िया है. कुल मिलकर अजय अतुल का ये गीत हिमेश के पहले दो गीतों पर भारी पड़ता है. अंतिम गीत एक रोमांटिक नंबर है मोहित चौहान की रूहानी आवाज़ में. पर गीत जब से देखी है कुछ खास प्रभावी नहीं बन पाया है. 

संक्षेप में बोल बच्चन का संगीत फिल्म के अनुरूप सिचुएशनल है. रेडियो प्लेबैक इसे २.८ के रेटिंग दे रहा हैं ५ में से.   

 
पुस्तक चर्चा - विचार नियम और स्वीकार का जादू   

सेल्फ हेल्प यानी, खुद के विकास के लिए पुस्तकें लगातार लिखी जा रहीं है, अधिकतर इनमें अंग्रेजी से हिंदी में रूपांतरित पुस्तकें होती है, जो बेस्ट सेलर कहलाती है. पर मूल रूप से हिंदी में लिखी दो पुस्तकें इन दिनों खासी चर्चा में है, जिसकी लगभग ७०००० से अधिक प्रतियाँ बिक चुकी हैं अब तक. रचनाकार सरश्री तेजपर्खी की लिखी ये दो पुस्तकें हैं, विचार नियम और स्वीकार का जादू जिसके साथ दो सी डी का एक सेट भी मुफ्त है, और इस पूरे सेट की कीमत है मात्र १५० रूपए. तेजज्ञान ग्लोबल फौन्डेशन से प्रकाशित इस सेट में जीवन के सत्यों को स्वीकार कर खुशी पाने और अपने विचारों कर नियंत्रण रख जीवन को सफल बनाने के मन्त्र सहज भाषा में उपलब्ध है. भाषा और कंटेंट के लिहाज से इसे इस श्रेणी की एक महान कृति तो नहीं कहा जा सकता, पर मूल रूप से हिंदी में प्रकाशित सेल्फ हेल्प पुस्तकों में इसे अग्रणी माना जा सकता है. ऐसे पुस्तकें जीवन के किसी मुश्किल दौर में आपके बहुत काम आ सकती है. कीमत के लिहाज से भी इसे अपने संग्रह में रखना कोई नुक्सान वाला सौदा नहीं है.  
 
 

और अंत में आपकी बात- अमित तिवारी के साथ

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