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Wednesday, September 4, 2013

हरफनमौला कलाकार हैं हमारे पियूष मिश्रा

वो थियटर के एक बड़ी शख्सियत हैं, फिल्मों में उनके लिए ख़ास किरदार लिखे जाते हैं, कभी वो खुद भी कहानियों को परदे पर साकार करने वाले सेतु बन जाते हैं, तो कभी गायक, गीतकार और संगीतकार की भूमिका अख्तियार कर लेते हैं, आईये हमारे पोडकास्टर सुनील के साथ पड़ताल करें हरफनमौला कलाकार पियूष मिश्रा के रचनात्मक सफ़र की.  


Monday, March 8, 2010

एम एम क्रीम लौटे हैं एक बार फिर अपने अलग अंदाज़ के संगीत के साथ "लाहौर" में

ताज़ा सुर ताल १०/२०१०

सजीव - सभी को वेरी गुड मॊरनिंग् और 'ताज़ा सुर ताल' के एक और अंक में हम सभी का स्वागत करते हैं। सुजॊय, पिछले दो हफ़्तों में हमने ग़ैर फ़िल्म संगीत का रुख़ किया था, आज हम वापस आ रहे हैं एक आनेवाली फ़िल्म के गीतों और उनसे जुड़ी कुछ बातों को लेकर।

सुजॊय - सजीव, इससे पहले कि आप आज की फ़िल्म का नाम बताएँ, जैसे कि इस साल के दो महीने गुज़र चुके हैं, तो 'माइ नेम इज़ ख़ान' के अलावा किसी भी फ़िल्म ने बॊक्स ऒफ़िस पर कोई जादू नहीं चला पायी है। आलम ऐसा है कि जनवरी के महीने में रिलीज़ होने बाद 'चांस पे डांस' सिनेमाघरों से उतरकर इतनी जल्दी ही टीवी के पर्दे पर आ रही है। देखना है कि 'अतिथि तुम कब जाओगे' और 'रोड मूवी' क्या कमाल दिखाती है इस हफ़्ते! वैसे इन फ़िल्मों के संगीत में ज़्यादा कुछ नया नहीं है, शायद इसीलिए 'टी. एस. टी' में इन्हे जगह न मिली हो!

सजीव - बिल्कुल! तो चलो अब बात करें आज की फ़िल्म 'लाहौर' की। यह एक ऐसी फ़िल्म है जो हमारे यहाँ तो अगले हफ़्ते रिलीज़ होगी, लेकिन पिछले साल इस फ़िल्म को इटली के 'सालेण्टो इंटरनैशनल फ़िल्म फ़ेस्टिवल' में कई पुरस्कार मिले। संजय पूरन सिंह चौहान की यह फ़िल्म है, और जैसा कि नाम से ही लोग अंदाज़ा लगा लेंगे कि इस फ़िल्म का भारत - पाक़िस्तान के रिश्ते से ज़रूर कोई रिश्ता होगा। यह सच है कि यह फ़िल्म भारत पाकिस्तान के बीच भाइचारा को बढ़ाने की तरफ़ एक प्रयास है, लेकिन इसे व्यक्त किया गया है किक्-बॊक्सिंग् खेल के माध्यम से जो इन दो देशों के बीच खेली जाती है।

सुजॊय - यह वाक़ई हैरानी में डाल देनेवाली बात है कि क्रिकेट और हॊकी जैसे लोकप्रिय खेलों के रहते हुए किक्-बॊक्सिंग् को क्यों चुना गया है!

सजीव - तभी तो यह फ़िल्म अलग है। और एक और वजह से यह फ़िल्म अलग है, और वह यह कि इसमें संगीत दिया है एम. एम. क्रीम और पीयूष मिश्रा ने।

सुजॊय - एम. एम. क्रीम ने बहुत कम काम हिंदी में किया है, लेकिन जितनी भी फ़िल्मों में उन्होने काम किया है, उन सभी के गानें बेहद सुरीले और कामयाब रहे हैं। अब देखना है कि इस फ़िल्म के गीतों को जनता कैसे ग्रहण करती है। एम. एम. क्रीम और 'लाहौर' की बातों को आगे बढ़ाने से पहले आइए सुनते हैं इस फ़िल्म का पहला गीत "अब ये काफ़िला"।

गीत - अब ये काफ़िला...ab ye kaafila (lahaur)


सजीव - इस गीत में आवाज़ें थीं के.के, कार्तिक और ख़ुद एम. एम. क्रीम की। गीत को शुरु करते हैं क्रीम साहब "ज़मीन छोड़ भर आसमाँ बाहों में, परवाज़ कर नई दिशाओं में" बोलों के साथ। फिर उसके बाद मुखड़ा शुरु करते हैं कार्तिक "अब ये काफ़िला फ़लक पे जाएगा, सफ़र मंज़िल का ये जो तय जाएगा, सुनहरे हर्फ़ में वो लिखा जाएगा". और उसके बाद के.के और कार्तिक अंग्रेज़ी शब्द "listen carefully move your feet" बात में और ज़्यादा दम डाल देती है। कुल मिलाकर यह एक दार्शनिक गीत है, जिसमें ज़िंदगी के सफ़र को बिना रुके लगातार चलते रहने की सलाह दी गई है।

सुजॊय - वैसे तो इस तरह के उपदेशात्मक गानें बहुत सारे बनें हैं, लेकिन इस गीत का अंदाज़-ए-बयाँ, इसका संगीत संयोजन और ऐटिट्युड बिल्कुल नया है, और मेरा ख़याल है कि आज की पीढ़ी यह गीत हाथों हाथ ग्रहण करेंगे। गीतकार का इस गीत में उतना ही योगदान है जितना क्रीम साहब का है।

सजीव - अच्छा, हम इस गीत से पहले बात कर रहे थे कि इस फ़िल्म में किक्-बॊक्सिंग् का सहारा क्यों लिया गया है। इस फ़िल्म में सौरभ शुक्ला ने अभिनय किया है, जो कि ख़ुद एक बड़े निर्देशक भी हैं। तो उन्होने कहा है कि "चौहान किसी भी खेल को चुन सकता था। लेकिन क्योंकि उनका व्यक्तिगत झुकाव किक्-बॊक्सिंग् की तरफ़ है और उन्हे इस खेल की बारिकियों का पता है, शायद इसी वजह से उन्होने इस खेल को चुना अपनी फ़िल्म के लिए। वो कोई ऐसा खेल नहीं चुनना चाहते थे जिसमें उनकी जानकारी १००% नहीं हो। अगर वो वैसा करते तो शायद फ़िल्म के साथ न्याय नहीं कर पाते।"

सुजॊय - यह बहुत अच्छी बात आप ने बताई, एक अच्छे फ़नकार और एक प्रोफ़ेशनल फ़िल्मकार की यही निशानी होती है कि वो जो कुछ भी करे पूरे परफ़ेक्शन के साथ करे। देखते हैं कि उनकी इस मेहनत और लगन का जनता क्या मोल चुकाती है!

सजीव - ख़ैर, वह तो बाद की बात है, चलो अब सुनते हैं दूसरा गीत दलेर मेहंदी की आवाज़ में। यह भी पहले गीत की तरह सफ़र और मुसाफ़िर के ज़रिए ज़िंदगी के फ़लसफ़े का बयाँ करती है।

गीत - मुसाफ़िर है मुसाफ़िर...musafir (lahaur)


सुजॊय - इस गीत की खासियत मुझे यही लगी कि यह आमतौर पर दलेर मेहंदी का जौनर नहीं है। जिस तरह से उनके गाए गीतों से मस्ती, ख़ुशी और एक थिरकन छलकती है, यह गीत उसके बिल्कुल विपरीत है। केवल एक बार सुन कर शायद यह गीत आप के दिल पर छाप ना छोड़े, लेकिन गीत के बोलों को ध्यान से सुनने पर इसकी अहमियत का पता चलता है।

सजीव - और अब बारी है 'लाहौर' की टीम से आपका परिचय करवाने की। निर्माता विवेक खटकर की यह फ़िल्म है। कहानी व निर्देशन संजय पूरन सिंह चौहान की है। गीतकार और संगीतकार के अलावा पीयूष मिश्रा का इस फ़ि्ल्म के लेखन में भी योगदान है। फ़िल्म के मुख्य कलाकर हैं आनाहद, नफ़ीसा अली, सब्यसाची चक्रवर्ती, केली दोरजी, निर्मल पाण्डेय, मुकेश ऋषी, जीवा, प्रमोद मुथु, श्रद्धा निगम, फ़ारुख़ शेख़, सौरभ शुक्ला, सुशांत सिंह और आशीष विद्यार्थी। एम. एम. क्रीम और पीयूष मिश्रा के संगीतकार होने की बात तो हम कर ही चुके हैं, पार्श्व संगीत वेइन शार्प का है।

सुजॊय - अच्छा, अब हम अगला गीत सुनेंगे, जो कि एक थिरकता हुआ नग़मा है शंकर महादेवन और शिल्पा रव की आवाज़ों में, "रंग दे रंग दे"। सजीव, यह गीत ऐसा एक गीत है कि जिसकी कल्पना हम दलेर मेहंदी की आवाज़ में कर सकते हैं। लेकिन एम. एम. क्रीम का निर्णय देखिए कि उन्होने पहला वाला ग़मज़दा गीत दलेर साहब से गवाया और इस गीत में उनकी आवाज़ नहीं ली।

सजीव - यही तो महान संगीतकार का लक्षण है कि प्रचलित लीग से हट के कुछ कर दिखाया जाए। लेकिन इस "रंग दे" गीत में नया कुछ सुनने में नहीं मिला।

सुजॊय - हाँ, और ऒर्केस्ट्रेशन में ही नहीं, गीत के बोलों और गायकी में भी 'रंग दे बसंती' के उस शीर्षक गीत की ही झलक मिलती है। इस गीत को लिखा है जुनैद वसी ने। मेरे ख़याल से तो यह एक बहुत ही ऐवरेज गीत है।

सजीव - चलो, गीत सुनवाते हैं अपने श्रोताओं को और उन्ही पर भी छोड़ते हैं इस गीत की रेटिंग्!

गीत - रंग दे रंग दे...rang de (lahaur)


सुजॊय - अब अगला गीत जो हम सुनेंगे उसे एम. एम. क्रीम ने अपनी एकल आवाज़ दी है। तो क्यों ना यहाँ पर क्रीम साहब की थोड़ी चर्चा की जाए!

सजीव - ज़रूर! मैं तो उनकी बात यहीं से शुरु करूँगा कि जब १९९४-९५ में महेश भट्ट की फ़िल्म 'क्रिमिनल' से उनका पदार्पण हुआ तो युं लगा कि मानो संगीत की दुनिया में एक ताज़ा हवा का झोंका आ गया हो। "तुम मिले दिल खिले" गीत की अपार सफलता के बाद फ़िल्म 'ज़ख़्म' के गीत "गली में आज चांद निकला" ने भी कमाल किया।

सुजॊय - "गली में आज चांद निकला" तो मेरे कॊलर ट्युन में एक लम्बे समय तक बजता रहा है, मेरा बहुत ही पसंदीदा गीतों में से एक है। अच्छा, एम. एम. क्रीम साहब का पूरा नाम शायद बहुत लोगों को मालूम ना हो, उनका असली और पूरा नाम है मरगथा मणि किरवानी। उनका जन्म आंध्र प्रदेश में हुआ था। वे कर्नाटक और चेन्नई में भी रह चुके हैं। उनके पिता शिव दत्त दक्षिण के जाने माने लेखक, चित्रकार और फ़िल्मकार रह चुके हैं। क्रीम साहब को बचपन से ही संगीत का शौक था। उन्होने कर्नाटकी और भारतीय शास्त्रीय संगीत में बाक़ायदा तालीम प्राप्त की।

सजीव - वैसे मूलत: वो एक वायलिन वादक हैं जिसका प्रमाण हमें मिलता है उनके संगीतबद्ध किए तमाम गीतों में। फ़िल्म 'सुर' में कम से कम दो ऐसे गीत हैं जो इस बात का प्रमाण है। ये गानें हैं "आ भी जा ऐ सुबह आ भी जा" और "कभी शम ढले तो मेरे दिल में आ जाना"। उन्होने दक्षिण के फ़िल्मी गीतों में कई सालों तक वायलिन वादक के रूप में काम किया और वे जाने माने संगीतकार चक्रवर्ती के सहायक भी रह चुके हैं।

सुजॊय - १९९० में रामोजी रा की फ़िल्म 'मारासो मरुथा' में क्रीम साहब ने पहली बार एक स्वतंत्र संगीतकार के रूप में काम किया। तब से लेकर आज तक उन्होने हिंदी और दक्षिण की सभी भाषाओं के गीतों को स्वरबद्ध किया है। फ़िल्म 'अन्ना मैया' के लिए उन्हे राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। दक्षिण के सफल संगीतकार होने के बावजूद उन्हे हिंदी से बेहद लगाव है। उनके पसंदीदा संगीतकार हैं राहुल देव बर्मन, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, मदन मोहन और शंकर जयकिशन। उनकी वेस्टर्ण क्लासिकल म्युज़िक में गहरी दिलचस्पी रही है जो उनके गीतों में साज झलकता है।

सजीव - एम. एम. क्रीम की पहली हिंदी थी राम गोपाल वर्मा की 'द्रोही', जिसमें उन्होने दो गानें कॊम्पोज़ किए, बाक़ि गानें राहुल देव बर्मन के थे। उनकी पहली स्वतंत्र हिंदी फ़िल्म थी 'क्रिमिनल'। हालाँकि उन्होने बहुत कम हिंदी फ़िल्मों में संगीत दिया है, पर उनका हर एक गीत हिट साबित हुआ। 'क्रिमिनल' और 'ज़ख़्म' के अलावा 'सुर', 'इस रात की सुबह नहीं', 'जिस्म', 'साया', 'रोग', 'पहेली' जैसी फ़िल्मों में उनका उत्कृष्ट संगीत हमें सुनने को मिला। तो चलिए अब उन्ही के संगीत और उन्ही की आवाज़ में सुनते हैं फ़िल्म 'लाहौर' का चौथा गीत "साँवरे"।

सुजॊय - इस गीत में दर्द है और एम. एम. क्रीम ने क्या ख़ूब दर्दीले अंदाज़ में इसे गाया है और इसमें जान डाल दी है। कम से कम साज़ों का इस्तेमाल हुआ है जिससे कि शब्दों की गहराई और भी बढ़ गई है। आइए सुना जाए।

गीत - साँवरे...saanvare (lahaur)


सजीव - इससे पहले कि हम आज का अंतिम गीत सुनें, आपको 'लाहौर' फ़िल्म की भूमिका बताना चाहेंगे। 'नैशनल इंडीयन किक्‍-बॊक्सिंग्' के लिए खिलाड़ियों की चुनाव प्रक्रिया चल रही है। एक मंत्री हैं जो चाहते हैं कि उनके फ़ेवरीट प्लेयर को चुना जाए, जब कि कोच चाहते हैं कि सब से योग्य खिलाड़ी को यह मौका मिले। दूसरी तरफ़, दो प्रतिभागी ऐसे हैं जिनमें से एक तो अपने बलबूते और योग्यता के आधार पर आगे बढ़ना चाहता है, जब कि दूसरे का अपने कनेक्शन्स् पर पूरा भरोसा है। ऐसे में अचानक क्वालालमपुर में भारत और पाक़िस्तान के बीच एक प्रतियोगिता की घोषणा हो जाती है। एक तरफ़ से धीरेन्द्र सिंह, जिन्हे मैन ऒफ़ स्टील कहा जाता है और जिन्हे इस खेल में अपने आप पर पूरा विश्वास है। उधर पाक़िस्तान की तरफ़ से हैं नूर मोहम्मद, जिन्हे इस तरह से तैयार किया गया है कि उन्हे लगता है कि विजय हर क़ीमत पर मिलनी चाहिए। लेकिन ज़िंदगी ने इन दोनों के लिए कुछ और ही सोच रखा है। एक के फ़ाउल प्ले की वजह से दूसरे की मृत्यु हो जाती है जब कि पूरी दुनिया चुपचाप इसका नज़ारा देखती है। क़िस्मत फिर एक बार इन दो देशों के दो खिलाड़ियों को आमने सामने लाती है। इनमें से एक खिलाड़ी वही है जिसकी वजह से पिछली बार दूसरे की मौत हुई थी। और दूसरा खिलाड़ी अपने देश की खोयी हुई इज़्ज़त को वापस हासिल करने के लिए जी जान लगाने को तैयार है। इस तरह से शुरु होती है प्रतिस्पर्धा की कहानी। और यही है 'लाहौर' फ़िल्म की मूल कहानी।

सुजॊय - और अब आज के अंतिम गीत की बारी। राहत फ़तेह अली ख़ान और शिल्पा राव की आवाज़ में "ओ रे बंदे"। सूफ़ी अंदाज़ की यह क़व्वाली है और इसके संगीतकार हैं पीयूष मिश्रा, जिन्होने इस फ़िल्म में केवल इसी गीत को कॊम्पोज़ किया है।

सजीव - पीयूष जो वैसे तो गीतकार के रूप में ही जाने जाते हैं, लेकिन हाल के कुछ सालों में वो संगीत भी दे रहे हैं, जैसे कि फ़िल्म 'गुलाल' में दिया था। रवीन्द्र जैन और प्रेम धवन की तरह पीयूष मिश्रा भी धीरे धीरे गीतकार और संगीतकार, दोनों ही विधाओं में महारथ हासिल कर लेंगे, ऐसा उनके गीतों को सुन कर लगता है।

सुजॊय - और इस बार इस गीत में राहत फ़तेह अली ख़ान ने ऊँचे नोट्स नहीं लगाए हैं, बल्कि बहुत ही कोमल अंदाज़ में इसे गाया है। इस गीत के बारे में ज़्यादा कुछ ना कह कर आइए सीधे इसे सुन लिया जाए।

गीत - ओ रे बंदे...o re bande (lahaur)


"लाहौर" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ***१/२
अब ये काफिला और मुसाफिर अल्बम के बेहतरीन गीत है, अन्य गीतों में वो प्रभाव नहीं है. एम् एम् क्रीम बहुत दिनों बाद लौटे हैं, पर हम सब जानते हैं कि वो किस स्तर के संगीतकार हैं, जाहिर है उनसे उम्मीदें भी अधिक रहती हैं, बहरहाल यदि फिल्म सफल रहती है तो संगीत भी सराहा जायेगा अन्यथा एक्स फेक्टर के अभाव में गिने चुने संगीत प्रेमियों तक ही सीमित रह जायेगा लाहौर का ये संगीत.

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # २८- मुल्क राज आनंद और संजय पूरन सिंह चौहान को आप किस समानता से जोड़ सकते हैं?

TST ट्रिविया # २९ पीयूष मिश्रा को सूरज बरजात्या की एक मशहूर फ़िल्म में बतौर नायक कास्ट करने के बारे में सोचा गया था। बाद में यह फ़िल्म सलमान ख़ान के पास चली गई और एक ब्लॊकबस्टर साबित हुई। बताइए वह फ़िल्म कौन सी थी?

TST ट्रिविया # ३० एम. एम. क्रीम की बहन भी एक संगातकारा हैं, उनका नाम बताइए।


TST ट्रिविया में अब तक -
निर्मला कपिला जी तो अक्सर महफ़िल में आती रहती हैं, विवेक रस्तोगी और एम् वर्मा जी पहली बार पधारे, उनका स्वागत. सीमा जी हर बार की तरफ जवाबों के साथ तत्पर मिली, बधाई

Monday, August 17, 2009

शहर अमरुद का है ये, शहर है इलाहाबाद.....पियूष मिश्रा ने एक बार फिर साबित किया अपना हुनर

ताजा सुर ताल (15)

ताजा सुर ताल का नया अंक लेकर उपस्थित हूँ मैं सुजॉय और मेरे साथ है सजीव.

सजीव - नमस्कार दोस्तों..सुजॉय लगता है आज कुछ ख़ास लेकर आये हैं आप हमारे श्रोताओं के लिए.

सुजॉय - हाँ ख़ास इस लिहाज से कि आज हम मुख्य गीत के साथ-साथ श्रोताओं को दो अन्य गीत भी सुनवायेंगें उसी फिल्म से जिसका का मूल गीत है.

सजीव - कई बार ऐसा होता है कि किसी अच्छे विषय पर खराब फिल्म बन जाती है और उस फिल्म का सन्देश अधिकतम लोगों नहीं पहुँच पाता....इसी तरह की फिल्मों की सूची में एक नाम और जुडा है हाल ही में...फिल्म "चल चलें" का.

सुजॉय - दरअसल आज के समय में बच्चे भी अभिभावकों के लिए स्टेटस का प्रतीक बन कर रह गए हैं. वो अपने सपने अपनी इच्छाएँ उन पर लादने की कोशिश करते हैं जिसके चलते बच्चों में कुंठा पैदा होती है और कुछ बच्चे तो जिन्दगी से मुँह मोड़ने तक की भी सोच लेते हैं. यही है विषय इस फिल्म का भी...

सजीव - फिल्म बेशक बहुत प्रभावी न बन पायी हो, पर एक बात अच्छी है कि निर्माता निर्देशक ने फिल्म के संगीत-पक्ष को पियूष मिश्र जैसे गीतकार और इल्लाया राजा जैसे संगीतकार को सौंपा. फिल्म को लोग भूल भी जाएँ पर फिल्म का थीम संगीत के सहारे अधिक दिनों तक जिन्दा रहेगा इसमें कोई शक नहीं....हालाँकि पियूष भाई ने कोई कसर नहीं छोडी है पर इल्लाया राजा ने अपने संगीत से निराश ही किया है....

सुजॉय- हाँ सजीव, मुझे भी संगीत में उनके इस बार कोई नयापन नहीं मिला....श्रोताओं ये वही संगीतकार हैं जिन्होंने मेरा एक सबसे पसंदीदा गीत बनाया है. आज एक लम्बे अरसे के बाद संगीतकार इलय्या राजा का ख़याल आते ही मुझे 'सदमा' फ़िल्म का वह गीत याद आ रहा है "ऐ ज़िंदगी गले लगा ले"। आज भी इस गीत को सुनता हूँ तो एक नयी उर्जा तन मन में जैसे आ जाती है ज़िंदगी को और अच्छे तरीके से जीने के लिए। जहाँ तक मेरे स्मरण शक्ति का सवाल है, मुझे याद है 'सदमा', 'हे राम', 'लज्जा', 'अंजली', 'अप्पु राजा', 'महादेव', 'चीनी कम', जैसी फ़िल्मों में उनका संगीत था।

सजीव - 2 जून 1953 को तमिल नाडु के पन्नईपूरम (मदुरई के पास) में इलय्याराजा का जन्म हुआ था पिता रामास्वामी और माता चिन्नथयी के घर संसार में। उनका असली नाम था ज्ञानदेसीकन, और उन्हे बचपन में प्यार से घर में रसय्या कह कर सब बुलाते थे। बाद में उन्होने अपने नाम में 'राजा' का प्रयोग शुरु किया जो उनके गुरु धनराज मास्टर ने रखा था। इन्हीं के पास उन्होंने अलग-अलग साज़ों की शिक्षा पायी थी। और आख़िरकार उनका नाम इलय्याराजा तमिल फ़िल्मों के निर्देशक पंजु अरुणाचलम ने रखा। पिता के मौत के बाद उनकी माताजी ने बच्चों को पाल-पोस कर बड़ा किया। 1968 में फ़िल्मों के प्रति उनका लगाव उन्हें मद्रास खींच ले आया सगीत में कुछ कर दिखाने का ख़्वाब लिए हुए। इन्हीं दिनों वो प्रयोगधर्मी संगीत की रचना किया करते थे और 'पवलर ब्रदर्स' के नाम से एक और्केस्ट्रा को भी संगठित किया। इस टोली को लेकर उन्होंने कई जगहों पर शोज़ किए जैसे कि स्टेज पर, चर्च में, इत्यादि। फिर वो संस्पर्श में आये संगीतकार वेंकटेश के, जिनके वो सहायक बने।

सुजॉय - बिना किसी विधिवत शिक्षा के इलय्याराजा ने जो मुकाम हासिल किया है, वो सही मायने में एक जिनीयस हैं। उन्हे ट्रिनिटी कालेज औफ़ लंदन ने क्लासिकल गीटार में स्वर्णपदक से सम्मानित किया था। इलय्याराजा ने अपने भाई की याद में 'पवलर प्रोडक्शन्स' के बैनर तले कुछ फ़िल्मों का भी निर्माण किया था। उनके इस भाई का उस समय निधन हो गया था जब उनका परिवार चरम गरीबी से गुज़र रही थी। इलय्याराजा का तमिल फ़िल्म जगत मे पदार्पण हुआ था सन् 1976 में जब उन्हे मौका मिला था फ़िल्म 'अन्नाकिलि' में संगीत देने का। फ़िल्म कामयाब रही और संगीत भी ख़ासा पसंद किया गया क्योंकि उसमें एक नयापन जो था। मुख्य संगीत और पार्श्वसंगीत मिलाकर उन्होंने कुल 750 फ़िल्मों में काम किया है। उन्हें 1998 का लता मंगेशकर पुरस्कार दिया गया था। 'चल चलें' उनके संगीत से सजी लेटेस्ट फ़िल्म है। पीयूष मिश्रा ने इस फ़िल्म में गानें लिखे हैं। गीतों में आवाज़ें हैं शान, कविता कृष्णामूर्ती, हरिहरण, साधना सरगम, सुनिधि चौहान, आदित्य नारायण और कृष्णा की।

सजीव - अच्छा सुजॉय, ये बताओ दिल्ली और मुंबई के अलावा किसी और शहर पर बना कोई गीत तुम्हें याद आया है.

सुजॉय - हूँ ....एक गीत है फिल्म चौदहवीं का चाँद में "ये लखनऊ की सरजमीं...", "झुमका गिरा रे बरेली के बाज़ार में" गीत है और एक गीत है जिसमें बीकानेर शहर का जिक्र है फिल्म राजा और रंक में "मेरा नाम है चमेली...". याद आया आपको ?

सजीव - हाँ बिलकुल पर यदि बड़े शहरों को छोड़ दिया जाए तो ऐसे गीत लगभग न के बराबर हैं जो छोटे शहरों पर आधारित हो. मतलब जिसमें उस शहर से जुडी तमाम बातों का जिक्र हो ...

सुजॉय - हाँ तभी तो हमें आज इस गीत को चुना है जिसमें खूब तारीफ है "संगम" के शहर इलाहाबाद की."शहर है ख़ूब क्या है ये, शहर अमरूद का है ये, शहर है इलाहाबाद"। गंगा, जमुना, सरस्वती के संगम का ज़िक्र, हरिवंशराय और अमिताभ बच्चन के ज़िक्र, और तमाम ख़ूबियों की बात कही गयी है इलाहाबाद के बारे में। गीत पेपी नंबर है, जिसे शान, श्रेया घोषाल और कृष्णा ने मस्ती भरे अंदाज़ में गाया है।

सजीव - पियूष मिश्रा ने बहुत सुंदर लिखे हैं बोल. संगीत साधारण है....जिस कारण लोग जल्दी ही इस गीत को भूल जायेंगें. पर इलाहाबाद शहर के चाहने वाले तो इस गीत को सर आँखों पे बिठायेंगे ही. कुल मिलाकार गीत मधुर है. आपकी राय सुजॉय ?

सुजॉय - मुझे ऐसा लगा है कि आज फ़िल्म संगीत जिस दौर से गुज़र रही है, जिस तरह के गीत बन रहे हैं, उसमें इस फ़िल्म के गीत थोड़े से अलग सुनाई देते हैं। मिठास भी है और आज की पीढ़ी को आकर्षित करने का सामान भी है। लेकिन अगर आप मेरी व्यक्तिगत राय लेंगे तो अब भी इलय्याराजा के स्वरबद्ध किए 'सदमा' के गीतों को ही नंबर एक पर रखूँगा।

सजीव - बिलकुल....तभी तो आवाज़ की टीम ने दिए इस गीत को 3 अंक 5 में से, अब हमारे सुधि श्रोता बताएं कि उनकी राय क्या है. गीत के बोल इस प्रकार हैं -

शहर हाय खूब क्या है ये,
शहर अमरूद का है,
शहर है इलाहाबाद...
हाँ यही रहे थे,
हरिबंश हमारे,
क्या खूब निराला, वाह अश्क दुलारे,
कभी तो गंगा को चूम ले,
कभी तो जमुना को चूम ले,
सरस्वती आके झूम ले, अरे वाह
वाह वाह वाह...

ये तो अमिताभ का,
चटपटी चाट का,
साथ में कलम दवात और किताब का,
चुटकुले है यहाँ,
फिर भी गंभीर है,
है मज़ा यही तो यहाँ ये संग साथ का...
वो है एल्फ्रेड पार्क, जो है इतना पाक,
कि लड़ते लड़ते यहीं मरे आज़ाद...
ये तो इलाहाबाद है,
इसकी क्या ही बात है,
ये तमाम शहरों का ताज मेरी जान...

संगम की नाद से देता कोई तान है,
वो देखो सामने आनंद भवन में शाम है,
पंडित नेहरु हो कि यहाँ लाल बहादुर शास्त्री,
हिंदुस्तान के तख्त के जन्मे हैं राजा यहीं,
रस के जनों का ठौर है ये,
महादेवी का मान है ये,
नेतराम का चौराहा,
आज भी इसकी शान है ये,
अलबेला ये फुर्तीला मगर रुक-रुक के चलता है,
महंगा है न खर्चीला,
तनिक थोडा अलग सा शहर है ये....




सजीव - सुजॉय जैसा कि हमें वादा किया था कि आज हम इस फिल्म के दो गीत श्रोताओं को और सुन्वायेंगें. उसका कारण ये है कि इस फिल्म का मूल थीम है जिसका हमने ऊपर जिक्र किया है को बहुत अच्छे तरीके से उभारता है. पियूष मिश्रा के उत्कृष्ट बोलों के लिए इन गीतों को सुनना ही चाहिए. तो श्रोताओं सुनिए ये दो गीत भी -

बतला दे कोई तो हमें बतला दे



चल चलें (शीर्षक)



आवाज़ की टीम ने दिए इस गीत को 3 की रेटिंग 5 में से. अब आप बताएं आपको ये गीत कैसा लगा? यदि आप समीक्षक होते तो प्रस्तुत गीत को 5 में से कितने अंक देते. कृपया ज़रूर बताएं आपकी वोटिंग हमारे सालाना संगीत चार्ट के निर्माण में बेहद मददगार साबित होगी.

क्या आप जानते हैं ?
आप नए संगीत को कितना समझते हैं चलिए इसे ज़रा यूं परखते हैं. कैलाश खेर ने मधुर भंडारकर की किस फिल्म में गायन और अभिनय किया है....और वो गीत कौन सा है ? बताईये और हाँ जवाब के साथ साथ प्रस्तुत गीत को अपनी रेटिंग भी अवश्य दीजियेगा.

पिछले सवाल का जवाब तो अब तक आपको मिल ही चुका होगा...पर अफ़सोस हमारे श्रोता कोई इसे नहीं बूझ पाए, चलिए इस बार के लिए शुभकामनाएँ.


अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं. क्या आप को भी आजकल कोई ऐसा गीत भा रहा है, जो आपको लगता है इस आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए तो हमें लिखे.

Friday, March 20, 2009

अलहदा है पियूष का अंदाज़, तो अलहदा क्यों न हो "गुलाल" का संगीत


वाकई पियूष भाई एक हरफनमौला हैं, क्या नहीं करते वो. एक समय था जब हमारी शामें दिल्ली के मंडी हाउस में बीता करती थी. और जिस भी दिन पियूष भाई का शो होता जिस भी ऑडिटोरियम में वहां हमारा होना भी लाजमी होता. मुझे उनके वो नाटक अधिक पसंद थे जिसे वो अकेले सँभालते थे, यानी अभिनय से लेकर उस नाटक के सभी कला पक्ष. सोचिये एक अकेले अभिनेता द्वारा करीब २ घंटे तक मंच संभालना और दर्शकों को मंत्रमुग्ध करके रखना कितना मुश्किल होता होगा, पर पियूष भाई के लिए ये सब बाएं हाथ का काम होता था. उनके संवाद गहरे असर करते थे, बीच बीच में गीत भी होते थे अक्सर लोक धुनों पर, जिसे वो खुद गाते थे. तो जहाँ तक उनके अभिनेता, निर्देशक, पठकथा संवाद लेखक, और गीतकार होने की बात है, यहाँ तक तो हम पियूष भाई की प्रतिभा से बखूबी परिचित थे, पर हालिया प्रर्दशित अनुराग कश्यप की "गुलाल" में उनका नाम बतौर संगीतकार देखा तो चौंकना स्वाभाविक ही था. गाने सुने तो उनकी इस नयी विधा के कायल हुए बिना नहीं रह सका. तभी तो कहा - हरफनमौला. लीजिये इस फिल्म का ये गीत आप भी सुनें -



उनका बचपन ग्वालियर में बीता, दिल्ली के एन एस डी से उत्तीर्ण होने के बाद ६ साल तक वो एक्ट वन से जुड़े रहे उसके बाद अस्मिता थियटर ग्रुप के सदस्य बन गए. यहाँ रंजित कपूर और अरविन्द गौड़ जैसे निर्देशकों के साथ उन्होंने काम किया. श्रीराम सेंटर के लिए उन्होंने पहला नाटक निर्देशित किया. मणि रत्नम की "दिल से" में पहली बार वो बड़े परदे पर नज़र आये. हालाँकि छोटे परदे के लिए वो "राजधानी" धारावाहिक में एक सशक्त भूमिका निभा चुके थे. राज कुमार संतोषी की "लीजेंड ऑफ़ भगत सिंह" के संवाद लिखने के बाद पियूष भाई मुंबई शिफ्ट हो गए. २००३ में आई विशाल भारद्वाज की "मकबूल" में उनका किरदार यादगार रहा. "मात्त्रृभूमि", "१९७१", और "झूम बराबर झूम" में भी बतौर एक्टर उन्होंने अपनी छाप छोडी. "१९७१" के लिए उन्होंने स्क्रीन प्ले और "यहाँ" के लिए स्क्रीनप्ले और संवाद भी लिखे.

इस बीच पियूष भाई ने अपनी पहचान बनायीं, एक गीतकार के तौर पर भी. 'दिल पे मत ले यार" और "ब्लैक फ्राईडे" जैसी लीक से हटकर बनी फिल्मों के लिए उन्होंने उपयुक्त गीत लिखे तो "टशन" जैसी व्यवसायिक फिल्म के लिए चालू गीत भी खूब लिखे. माधुरी दीक्षित की वापसी वाली फिल्म "आजा नचले" के शीर्षक गीत को लिखकर बेबात के विवाद में भी फंस गए, पर मुंबई में अब उनके इस बहुआयामी प्रतिभा पर हर निर्माता निर्देशक की नज़र हो चुकी थी. अनुराग ने गुलाल में पियूष को अपनी कला का भरपूर जौहर दिखने का मौका दिया. और परिणाम - एक बहतरीन एल्बम जो कई मायनों में आम एल्बमों से से बहुत अलग है. पर यही "अलग" पन ही तो पियूष मिश्रा की खासियत है. सुनिए एक और गीत इसी फिल्म से -



"गुलाल" चुनाव का सामना करने जा रही आज की पीढी के लिए सही समय पर प्रर्दशित फिल्म है. मूल रूप से फिल्म गीतकार शायर "साहिर लुधियानवीं" को समर्पित है या यूँ कहें उनके मशहूर "ये दुनिया अगर मिल भी जाए..." गीत को समर्पित है. ये कहानी अनुराग ने तब बुनी थी जब उनके संघर्ष के दिन थे, उनकी फिल्म सेंसर में अटकी थी और कैरियर अधर में. निश्चित रूप से ये उनकी बेहतरीन फिल्मों में से एक है. देखिये किस खूबी से पियूष भाई ने इस गीत को समर्पित किया है फिल्म "प्यासा" के उस यादगार गीत के नाम -



बहुत कम फिल्मों में गीत संगीत इतना मुखर होकर आया है जैसा कि गुलाल में, वैसे जिस किसी ने भी पियूष भाई को उनके "नाटकों" में सुना है उनके लिए ये पियूष भाई के विशाल संग्रह का एक छोटा सा हिस्सा भर है, पर यकीनन जब बातें एक फिल्म के माध्यम से कही जाएँ तो उसका असर जबरदस्त होना ही है. यदि आप चालू संगीत से कुछ अलग सुनना पसंद करते हैं, और शुद्ध कविता से बहते गीत जो भीतर तक आपके भेद जाये, और ऐसी आवाजें जिसमें जोश की बहुतायत हो तो एल्बम "गुलाल" अवश्य सुनिए. हम आपको बताते चले कि इन गीतों को खुद पियूष भाई के साथ स्वानंद किरकिरे और राहुल राम ने आवाजें दी हैं. अनुराग कश्यप को भी सलाम है जिन्होंने पियूष की प्रतिभा को खुल कर बिखरने की आजादी दी. यदि ऐसे प्रयोग सफल हुए तो हम यकीनन भारतीय सिनेमा को एक नए आयाम पर विचरता पायेंगें. पियूष भाई की प्रतिभा को नमन करते हुए सुनिए इस फिल्म से मेरा सबसे पसंदीदा गीत. इसके शब्दों पर गौर कीजियेगा -




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