Showing posts with label parasmani. Show all posts
Showing posts with label parasmani. Show all posts

Wednesday, May 6, 2009

चोरी चोरी जो तुमसे मिली तो लोग क्या कहेंगे....लक्ष्मी-प्यारे की मधुर धुन पर वाह वाह कहेंगे

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 72

'लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल' एक ऐसा नाम है जिनकी शोहरत वक़्त के ग्रामोफोन पर बरसों से घूम रही है। इस जोड़ी की पारस प्रतिभा ने जिस गीत को भी हाथ लगा दिया वह सोना बन गया। ऐसी पारस प्रतिभा के धनी लक्ष्मी-प्यारे की जोड़ी की पहली मशहूर फ़िल्म थी 'पारसमणि'। तो क्या आप जानना नहीं चाहेंगे कि यह जो जोड़ी थी गीतों को सोना बनानेवाली, यह जोड़ी कैसे बनी, वह कौन सा दिन था जब इन दोनो ने एक दूसरे के साथ में गठबंधन किया और कैसे बना 'पारसमणि' का सदाबहार संगीत? अगर हाँ तो ज़रा पढ़िए तो सही कि विविध भारती के 'उजाले उनकी यादों के' कार्यक्रम में प्यारेलालजी ने क्या कहा था - "देखिए, जब हम दोस्त थे, साथ में काम करते थे, बजाते थे, तब अपनी दोस्ती शुरु हुई, लेकिन 1957 के अंदर यह हमारी बात हुई कि भई हम बैठ के साथ काम करेंगे। यह अपना शिवाजी पार्क में शिवसेना भवन है, उसके पास एक होटल था जिसमें 'कटलेट्‍स' बहुत अच्छे मिलते थे, हम वहाँ बैठ के खाते थे। उस समय वहाँ सी. रामचन्द्रजी का हॉल हुआ करता था; हम वहाँ जाते थे। तो वहाँ लंच करके हम निकल गए। तो जब यह बात निकली तो मैने कहा कि "मैं निकल जाऊँगा दो-तीन महीनों में", तो वो बोले कि "क्यूँ ना हम साथ में मिलकर काम करें", और बाहर भी क्या करते, इसलिए हमने "हाँ" कर दी और हमने शुरू किया 'काम्पोज़' करना। जब 'पारसमणि' पिक्चर के कास्ट छपवाये, तो उसमें संगीतकार का नाम लिखा गया था 'प्यारेलाल - लक्ष्मीकांत'। यह लिखा था बाबा मिस्त्री ने। लक्ष्मीजी ने कुछ नहीं कहा, मैनें बोला कि "नहीं, मैं उनकी बहुत इज़्ज़त करता हूँ, और वो तीन साल बड़े भी हैं, इसलिए इसे आप 'लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल' कर दीजिए।" तो इस तरह से बनी 'लक्ष्मी-प्यारे' की जोड़ी। अब ज़रा प्यारेलालजी से यह भी सुन लीजिए कि 'पारसमणि' कैसे इनके हाथ लगी - "तो हम जहाँ काम करते थे, कल्याणजी-आनंदजी के यहाँ, वहाँ हमें मिले बाबा मिस्त्री। उन्होने देखा कि ये लड़के होशियार हैं, तो उन्होने हमको चान्स दिया 'पारसमणि' में। कल्याणजी-आनंदजी को जो पहला ब्रेक दिया था इन्होने ही दिया था फ़िल्म सम्राट चन्द्रगुप्त में, और हमको उन्होंने दिया 'पारसमणि' में। लक्ष्मीजी ने तो अपने बंगले का नाम भी 'पारसमणि' रखा था।"

तो देखा दोस्तों कि किस तरह से हँसता हुआ नूरानी चेहरा लेकर लक्ष्मी-प्यारे फ़िल्म संगीत संसार में आये और उसके बाद बिल्कुल छा गये! आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में फ़िल्म 'पारसमणि' का एक बहुत ही प्यारा सा युगल गीत पेश है लता और मुकेश की आवाज़ों में। गीतकार फ़ारूक़ क़ैसर के बोल हैं और 1963 में प्रदर्शित इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार महिपाल और गीतांजलि पर फ़िल्माया हुआ यह गीत है "चोरी-चोरी जो तुमसे मिली तो लोग क्या कहेंगे"। पिछले कई दशकों में 'चोरी-चोरी' से शुरू होनेवाले आपने बहुत सारे गाने सुने होंगे और ज़्यादातर यह देखा गया है कि ये गाने कामयाब भी रहे हैं। 'चोरी-चोरी' से शुरू होनेवाले गाने 50 के दशक के शुरू से प्रचलित होने लगे थे। 1951 की फ़िल्म 'ढोलक' में सुलोचना कदम की आवाज़ में "चोरी चोरी आग सी दिल में लगाके चल दिये" बहुत ही मशहूर गीत है। 1952 में तलत महमूद और गीता राय का गाया फ़िल्म 'काफ़िला' का गीत "चोरी-चोरी दिल में समाया सजन" और इसी साल फ़िल्म 'जाल' में लता मंगेशकर और साथियों का गाया "चोरी-चोरी मेरी गली आना है बुरा" भी अपने ज़माने के मशहूर गीत रहे हैं। दो और सदाबहार गीत जो शुरू तो 'चोरी-चोरी' से नहीं होते लेकिन मुखड़े में ज़रूर ये शब्द आते हैं, वो हैं फ़िल्म 'चोरी-चोरी' का शीर्षक गीत "जहाँ मैं जाती हूँ वहीं चले आते हो, चोरी चोरी मेरे दिल में समाते हो", और दूसरा गीत है "बाप रे बाप' फ़िल्म का "पिया पिया पिया मेरा जिया पुकारे.... चोरी चोरी चोरी काहे हमें पुकारे, तुम तो बसी हो गोरी दिल में हमारे"। 1957 की फ़िल्म 'एक गाँव की कहानी' में लता और तलत का गाया और शैलेंद्र का लिखा एक गीत था "ओ हाये कोई देख लेगा, देखो सुनो पिया घबराये मोरा जिया रे, ओ कोई क्या देख लेगा, प्रीत की यह डोरी दुनिया से नहीं चोरी रे"। कुछ इसी तरह का भाव 'पारसमणि' के प्रस्तुत युगल-गीत में भी व्यक्त किया गया है। तो बातें तो बहुत सी हो गयी दोस्तों, अब गीत आप सुनिये लता और मुकेश की आवाज़ों में।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. नय्यर साहब का एक और मचलता दोगाना.
२. मजरूह के बोल है इस रूठने मनाने के गीत में.
३. मुखड़े में शब्द आता है - "हाथ".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी एकदम सही जवाब.... शन्नो जी यही तो ख़ास बात थी इन गीतों, हम सभी का अनुभव आप जैसा ही है। भरत जी आपके दोनों जवाब गलत हैं। हाँ आप संगीतकार ठीक पहचाना है।

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


Wednesday, December 10, 2008

वो जब याद आए बहुत याद आए...

जब सोनू निगम ने जलाए गीतों के दीप एल पी के लिए

हिन्दी फ़िल्म संगीत के सबसे सफलतम संगीत जोड़ी के लक्ष्मीकांत और प्यारेलाल का एक साधारण स्तर से उठ कर इतने बड़े मुकाम तक पहुँचने की दास्तान भी कम दिलचस्प नही है. दोनों लगभग १०-१२ साल के रहे होंगे जब मंगेशकर परिवार द्वारा बच्चों के लिए चलाये जाने वाले संगीत संस्थान, सुरील कला केन्द्र में वो पहली बार एक दूसरे के करीब आए (हालांकि वो एक स्टूडियो में पहले भी मिल चुके थे). दरअसल लक्ष्मीकांत को एक कंसर्ट में मँडोलिन बजाते देख प्रभावित हुई लता दी ने ही उन्हें इस संस्था में दाखिल करवाया था. वहीँ प्यारेलाल ने अपने गुरु पंडित राम प्रसाद शर्मा से trumpet और गोवा के अन्थोनी गोंसाल्विस (जी हाँ ये वही हैं जिनके लिए उन्होंने फ़िल्म अमर अकबर एंथोनी का वो यादगार गीत समर्पित किया था) से वोयालिन बजाना सीखा वो भी मात्र ८ साल की उम्र में. वोयालिन के लिए उनका जनून इस हद तक था कि वो दिन में ८ से १२ घंटे इसका रियाज़ करते थे. दोनों बहुत जल्दी दोस्त बन गए दोनों का जनून संगीत था और दोनों के पारिवारिक और वित्तीय हालात भी लगभग एक जैसे थे. लता जी ने उन्हें नौशाद साहब, एस डी बर्मन, और सी रामचंद्र जैसे संगीतकारों के लिए बजाने का काम दिलवा दिया. दोनों घंटों साथ स्टूडियो में समय बिताते, एक दूसरे के लिए काम की तलाश करते, और यदि मौका लगे तो एक साथ बजाते. उनके मित्रों में अब जुबिन मेहता, शिव कुमार शर्मा और हरी प्रसाद चौरसिया भी थे. प्यारेलाल ने जुबिन के साथ विदेश पलायन करने का मन बना लिया. पर दोस्ती ने उन्हें भारत में ही रोक लिया. उन्होंने लक्ष्मीकांत के साथ जोड़ी बनाई और किस्मत ने उन्हें संगीतकार जोड़ी कल्यानजी आनंद जी का सहायक बना दिया.

संघर्ष के इन दिनों में एस डी बर्मन के सुपुत्र आर डी बर्मन से उनकी दोस्ती हुई. वो भी अपने लिए एक बड़े ब्रेक का इंतज़ार कर रहे थे. आर डी को जब पहली फ़िल्म मिली "छोटे नवाब" तो उन्होंने संगीत संयोजन का काम सौंपा एल पी को. इससे पहले एल पी ने एस डी फ़िल्म "जिद्दी" का भी संगीत संयोजन किया था. कहते हैं एस डी ने परखने के लिए इस फ़िल्म के एक गीत का अंतरा एल पी और आर डी को अलग अलग दिया बनाने के लिए और अंत में उन्होंने वही मुखडा फ़िल्म में रखा जो एल पी ने बनाया था. इस बीच एक बी ग्रेड फ़िल्म मिली जो प्रर्दशित नही हो पायी. ५०० धुनों का खजाना था एल पी के पास जब उन्हें उनकी पहली प्रर्दशित नॉन स्टारर फ़िल्म "पारसमणि" मिली. आर डी ने उन्हें हिदायत दी कि इस फ़िल्म को न करें, ये उनके कैरिअर को बुरी शुरआत दे सकता है, पर एल पी हाथ आए इस सुनहरे मौके को नही छोड़ना चाहते थे. आज भी इस फ़िल्म को सिर्फ़ और सिर्फ़ उसके सुपर हिट संगीत के लिए याद किया जाता है. लता और कमल बारोट का गाया "हँसता हुआ नूरानी चेहरा", रफी साहब का गाया "सलामत रहो" और "वो जब याद आए" जैसे गीतों ने धूम मचा दी. अगली बड़ी फ़िल्म थी राजश्री की "दोस्ती". इंडस्ट्री के सभी बड़े संगीतकारों ने इस नए बिल्कुल अनजान कलाकारों को लेकर बनाई जाने वाली फ़िल्म को ठुकरा दिया तो फ़िल्म एल पी की झोली में गिरी. गीतकार थे मजरूह सुल्तानपुरी. फ़िल्म का एक एक गीत एक शाहकार बना. फ़िल्म ने ८ फ़िल्म फेयर और सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का रास्ट्रीय पुरस्कार जीता. कौन भूल सकता है - "जाने वालों जरा", "चाहूँगा मैं तुझे" और "राही मनवा" जैसे अमर गीत.

प्रसाद प्रोडक्शन की फ़िल्म "मिलन" के लिए जब मुकेश की आवाज़ में "मैं तो दीवाना" रिकॉर्ड हुआ निर्देशक कुछ ख़ास प्रभावित नही लगे. पर जब अगला गाना "सवान का महीना" रिकॉर्ड हुआ तो जैसे स्टूडियो में बहार आ गयी. इस गीत के गीतकार आनंद बख्शी बताते हैं कि जब वो एक रेल यात्रा के दौरान किसी स्टेशन पर उतरे और वहां उन्होंने एक बेहद गरीब और साधारण से रिक्शा चालक को ये गीत गुनगुनाते हुए सुना तो उन्हें समझ आ गया कि उनका काम सार्थक हुआ है. लक्ष्मी प्यारे अब घर घर में पहचाने जाने लगे थे. यहीं से उन्हें मिला गीतकार आनंद बख्शी साहब का साथ. जो लगभग 250फिल्मों का रहा. हिन्दी फ़िल्म संगीत में गीतकार संगीतकार की ये सबसे सफल जोड़ी है अब तक.

व्यवसायिक रूप से आमने सामने होकर भी आर डी और उनकी दोस्ती में खलल नही पड़ा. फ़िल्म "दोस्ती" में जहाँ आर डी ने उनके लिए "माउथ ओरगन" बजाया तो लक्ष्मीकांत ने आर डी की फ़िल्म "तेरी कसम" के गीत "दिल की बात" में बतौर संगीतकार अतिथि रोल किया.पर बाद में जब फ़िल्म "देशप्रेमी" के लिए आर डी से गाने की गुजारिश की एल पी ने तो आर डी ने कुछ मजबूरियों के चलते मना कर दिया, ये गीत तब लक्ष्मीकांत के ख़ुद गाया अपनी आवाज़ में. पर तमाम व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा के चलते भी दोनों महान संगीतकारों के रिश्ते अन्तिम समय तक भी दोस्ताना रहे.२५-०५-१९९८ को जोडीदार लक्ष्मीकांत को खोने के बाद प्यारेलाल ने थोड़ा बहुत काम ज़रूर किया पर फ़िर बहुत अधिक सक्रिय नही रह पाये. प्यारेलाल जी ने एक ख़ास इंटरव्यू में बहुत सी नई बातों का खुलासा किया. ये इंटरव्यू हम आपके लिए लेकर आयेंगें इस शृंखला की अन्तिम कड़ी में. फिलहाल देखिये इस विडियो में,आज के सबसे सफल गायक सोनू निगम द्वारा संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत प्यारेलाल को दिया गया ये संगीत भरा तोहफा.


The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ