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Sunday, September 23, 2012

संगीत वाद्य परिचय श्रृंखला : पं. श्रीकुमार मिश्र से बातचीत (२)



स्वरगोष्ठी ८९ में आज  

परदे वाले गजवाद्यों की मोहक अनुगूँज
 

‘स्वरगोष्ठी’ के एक नए अंक के साथ, मैं कृष्णमोहन मिश्र फिर एक बार आज की महफिल में उपस्थित हूँ और आपका हार्दिक स्वागत करता हूँ। गत सप्ताह हमारे बीच जाने-माने इसराज और मयूरवीणा-वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र उपस्थित थे, जिन्होने गज-तंत्र वाद्य सारंगी के विषय में हमारे साथ विस्तृत चर्चा की थी। हमारे अनुरोध पर श्रीकुमार जी आज भी हमारे साथ हैं। आज हम उनसे कुछ ऐसे गज-तंत्र वाद्यों का परिचय प्राप्त करेंगे, जिनमें परदे होते हैं।


कृष्णमोहन : श्रीकुमार जी, ‘स्वरगोष्ठी’ के सुरीले मंच पर एक बार पुनः आपका हार्दिक स्वागत है। गत सप्ताह हमने आपसे सारंगी वाद्य के बारे में चर्चा की थी। आज इस श्रृंखला में एक और कड़ी जोड़ते हुए सारंगी के ही एक परिवर्तित रूप के बारे में जानना चाहते हैं। वर्तमान में इसराज, दिलरुबा, तार शहनाई और स्वयं आप द्वारा पुनर्जीवित वाद्य मयूरवीणा ऐसे वाद्य हैं, जो गज से बजाए जाते हैं, किन्तु इनमें सितार की भाँति परदे लगे होते हैं। इन परदे वाले गज-वाद्यों की विकास-यात्रा के बारे में बताएँ।

श्रीकुमार मिश्र : ‘स्वरगोष्ठी’ के संगीत-प्रेमियों को मेरा अभिवादन। संगीत-रत्नाकर, संगीतसार व संगीतराज आदि प्राचीन ग्रन्थों में निःशंकवीणा तथा पिनाकीवीणा का उल्लेख मिलता है। वर्तमान सारंगी इनका ही परिवर्तित और विकसित रूप हैं। परन्तु परदे वाले गज-वाद्यों का आविष्कार इन वाद्यों के बहुत बाद में हुआ। इस सम्बन्ध में प्रोफेसर रामकृष्ण ने ऋषि मतंग को किन्नरीवीणा का आविष्कारक कहा है। मतंग से पूर्व वीणा में परदे नहीं होते थे। उन्होने ही सर्वप्रथम वीणा पर सारिकाओं (परदों) की योजना की थी। डॉ. लालमणि मिश्र के मतानुसार आधुनिक युग के सभी तंत्रीवाद्य, जिन पर परदे हैं, किन्नरीवीणा के ही विकसित रूप हैं।

कृष्णमोहन : वर्तमान में प्रचलित परदे वाले वाद्यों का इतिहास कितना प्राचीन है?

श्रीकुमार मिश्र : यहाँ मैं पुनः डॉ. लालमणि मिश्र की पुस्तक का सन्दर्भ देना चाहूँगा। उनके मतानुसार लगभग दो सौ वर्ष पूर्व, दो प्रमुख कारणों से परदे वाले गज-वाद्यों का प्रचलन आरम्भ हुआ। पहला कारण तो यह था कि सारंगी की उपयोगिता आरम्भ से ही संगति वाद्य के रूप में ही रही। स्वतंत्र वादन के लिए सारंगी में परदे की आवश्यकता हुई। दूसरा कारण बताते हुए डॉ. लालमणि लिखते हैं कि लगभग दो शताब्दी पूर्व सारंगी पर पेशेवर संगीतज्ञों का एकाधिकार था। वे शिष्यों को सारंगी वादन की बारीकियाँ सिखाने से कतराते थे। ऐसे में सारंगी में सितार या सुरबहार की भाँति परदे लगा कर एक नए वाद्य की परिकल्पना की गई। परदायुक्त जो गज-वाद्य पहले प्रचलित हुआ, उसे इसराज नाम दिया गया। आरम्भ में यह वाद्य काफी बड़े आकार का था और इसकी कुण्डी मयूर की आकृति की थी, इसलिए इसे मयूरवीणा, ताऊस या मयूर इसराज नाम से पुकारा जाने लगा। बाद में इसकी कुण्डी और डाँड़ को छोटा कर दिया गया। आकृति में यह परिवर्तन बंगाल में हुआ और यह इसराज नाम से लोकप्रिय हुआ। छोटी कुण्डी वाले इसराज के प्रचलित हो जाने के बाद मयूर की आकृति वाले वाद्य विस्मृत से हो गए।

कृष्णमोहन : पाठकों को हम यह बता देना चाहते हैं कि मयूर की आकृति वाले विस्मृत वाद्य मयूरवीणा का पुनरोद्धार लगभग एक दशक पूर्व श्रीकुमार जी ने ही लखनऊ के वाद्य-निर्माता बादशाह भाई उर्फ बारिक अली के सहयोग से किया था। आइए, यहाँ थोड़ा विराम देकर श्रीकुमार जी का मयूरवीणा-वादन सुनते हैं। राग है मारूबिहाग और तबला संगति की है, भरत मिश्र ने।

मयूरवीणा वादन : राग मारूबिहाग : पं. श्रीकुमार मिश्र


कृष्णमोहन : परदायुक्त गजवाद्यों की विशेषताओं के बारे में भी कुछ बताएँ।

श्रीकुमार मिश्र : इस वर्ग के वाद्यों के निर्माण से स्वतंत्र अथवा एकल वादन के क्षेत्र में गजवाद्यों की सम्भावनाएँ काफी विस्तृत हो गईं। पहले बंगाल में और फिर पंजाब में इसराज बेहद लोकप्रिय हुआ। इस लोकप्रियता का कारण है, इसमें लगे परदे और धातु के तार। परदे और धातु के तारों से उँगलियों के स्पर्श और क्रियाकलापों से उत्पन्न होने वाली कलात्मक लड़ियाँ, कण, गमक, सूत आदि में एक अलग प्रकार की खनक कायम हुई। सुनने में ऐसा लगता है मानो सितार और सारंगी का युगल वादन हो रहा है। इसराज का ही एक लघु रूप दिलरुबा है, जिसका प्रचलन पंजाब में खूब हुआ। दिलरुबा का चलन बढ़ जाने के कारण लगभग एक शताब्दी पूर्व पंजाब में मयूर इसराज या मयूरवीणा की लोकप्रियता समाप्त हो गई थी।

कृष्णमोहन : यहाँ पर एक और विराम लेकर, संगीत-प्रेमियों को हम दिलरुबा-वादन सुनवाते है। उस्ताद रणवीर सिंह प्रस्तुत कर रहे हैं, दिलरुबा पर राग तिलंग का वादन।

दिलरुबा वादन : राग तिलंग : उस्ताद रणवीर सिंह


कृष्णमोहन : इसराज वाद्य की विशेषताओं के बारे में हमारे पाठकों-श्रोताओं को परिचित कराइए।

श्रीकुमार मिश्र : आघात से बजने वाले और गज से बजने वाले, दोनों प्रकार के वाद्यों के गुण एक वाद्य में आ जाने के कारण इसराज, गतकारी का कौशल प्रदर्शित करने के लिए एक आदर्श वाद्य बन गया। बंगाल में यह अत्यन्त प्रतिष्ठित हुआ। पिछले ५०-६० वर्षों में सितार, सरोद, संतूर, वायलिन आदि वाद्यों की लोकप्रियता बढ़ने के कारण इसराज की लोकप्रियता में कमी अवश्य आई है।

कृष्णमोहन : हमारे पास बंगाल के ही चर्चित इसराज वादक पं. बुद्धदेव दास की एक रिकार्डिंग है, जिसे हम अपने पाठकों-श्रोताओं के लिए प्रस्तुत कर रहे है। श्री दास ने इसराज पर राग सिन्धु भैरवी का वादन किया है।

इसराज वादन : राग सिंधु भैरवी : पं. बुद्धदेव दास


कृष्णमोहन : इसी के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के आज के अंक को यहीं विराम देते हैं और पं. श्रीकुमार मिश्र जी के प्रति हृदय से आभार व्यक्त करते हैं।

श्रीकुमार मिश्र : यह मेरा सौभाग्य है कि ‘स्वरगोष्ठी’ के संगीत-प्रेमियों के बीच आने का मुझे अवसर मिला। मैं आप सब पाठकों-श्रोताओं को धन्यवाद देता हूँ।

आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ की आज की संगीत-पहेली में हम आपको कण्ठ-संगीत प्रस्तुति का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछेंगे। ९०वें अंक तक सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाले प्रतिभागी श्रृंखला के विजेता होंगे।



१ - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह रचना किस राग में निबद्ध है?

२ – यह भारतीय संगीत की कौन सी शैली है?
आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के ९१वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के ८७वें अंक में हमने आपको सुप्रसिद्ध सारंगी वादक पं. रामनारायण की बजायी एक ठुमरी का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग पीलू और दूसरे का सही उत्तर है- सारंगी वाद्य। दोनों प्रश्नों के सही उत्तर जबलपुर की क्षिति तिवारी और मीरजापुर (उ.प्र.) के डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने दिया है। दोनों विजेताओं को रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर से हार्दिक बधाई।

झरोखा अगले अंक का
  
मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ के आगामी अंक से हम एक नई लघु श्रृंखला आरम्भ कर रहे हैं, जिसके अन्तर्गत बीते युग के कुछ भूले-बिसरे स्वरों को आप सुनेंगे। यही नहीं इन मूर्धन्य कलासाधकों की पारम्परिक रचनाओं को बाद में भारतीय फिल्मों में भी शामिल किया गया। आपके लिए हम इन रचनाओं के दोनों रूप प्रस्तुत करेंगे। अगले रविवार को प्रातः ९-३० पर आयोजित अपनी इस गोष्ठी में आप अवश्य पधारिए। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।

कृष्णमोहन मिश्र

Sunday, September 16, 2012

संगीत वाद्य परिचय श्रृंखला : पं. श्रीकुमार मिश्र से बातचीत


स्वरगोष्ठी – ८८ में आज
संगीत के सौ रंग बिखेरती सारंगी

‘स्वरगोष्ठी’ के एक नए अंक के साथ, मैं कृष्णमोहन मिश्र एक बार पुनः आपकी गोष्ठी में उपस्थित हूँ और आप सब संगीत-प्रेमियों का स्वागत करता हूँ। मित्रों, यह ‘स्वरगोष्ठी’ स्तम्भ का सौभाग्य रहा है कि इसे आरम्भ से ही संगीत-साधकों, संगीत-शिक्षकों और संगीत-प्रेमियों का मार्गदर्शन प्राप्त होता रहा। हमारे एक ऐसे ही मार्गदर्शक हैं जाने-माने इसराज और मयूर वीणा वादक और शिक्षक पं. श्रीकुमार मिश्र। पिछले दिनों उनकी कक्षा में मैं आकस्मिक रूप से जब पहुँचा तो आश्चर्यचकित रह गया। लगभग अप्रचलित इन गज-वाद्यों को सीखने के लिए कुल ९ विद्यार्थी उस कक्षा में उपस्थित थे, जिनमें ५ बालिकाएँ थीं। श्रीकुमार जी इन बच्चों को एक सरल सी तान का अभ्यास करा रहे थे। मैंने संगीत के उन विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों की सराहना की और श्रीकुमार जी से गज-तंत्र वाद्यों के बारे में ‘स्वरगोष्ठी’ के लिए कुछ बातचीत करने का अनुरोध किया, जिसे उन्होने सहर्ष स्वीकार कर लिया। आज के अंक में हम इस बातचीत के सम्पादित अंश आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं।

कृष्णमोहन : श्रीकुमार जी, ‘स्वरगोष्ठी’ के समस्त पाठकों-श्रोताओं की ओर से आपका हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। आज हम आपसे गज से बजने वाले वाद्यों के विषय में कुछ बातचीत करना चाहते हैं।

श्रीकुमार मिश्र : मेरा अहोभाग्य, जो ‘स्वरगोष्ठी’ के गुणी पाठकों से संवाद का अवसर मुझे प्राप्त हुआ। मुझे अपने गुरुओं से जो प्राप्त हुआ और स्वाध्याय से जो कुछ भी अर्जित किया, उसे आपके साथ बाँटने में अत्यधिक प्रसन्नता होगी।

कृष्णमोहन : श्रीकुमार जी, आज आपसे हम संगीत के ऐसे तंत्रवाद्यों पर चर्चा करना चाहते हैं जिन्हें गज (Bow) से बजाया जाता है।

श्रीकुमार मिश्र : वर्तमान भारतीय संगीत में गज से बजने वाले जितने भी तंत्रवाद्य प्रचलित हैं, उनमें सबसे प्राचीन वाद्य सारंगी है। अन्य तंत्रवाद्यों की भाँति गज-तंत्र वाद्यों में भी वैदिक काल से लेकर वर्तमान तक अनेक परिवर्तन-संशोधन होते रहे। वैदिक काल के तंत्रवाद्यों के नाम ‘हिरण्यकेशी सूत्र’ में मिलता है। इस सूत्र के आधार पर ताल्लुक वीणा, काण्ड वीणा, चिच्छोरा, आलापु वीणा, कपिशीर्ष वीणा आदि के स्वरूप की कल्पना की जा सकती है। इसी प्रकार रामायणकाल के तंत्रवाद्यों के बारे में बाल्मीकि कृत ‘रामायण’ के एक प्रसंग में रावण के संगीत कक्ष में विपंची, मत्त कोकिला, वीणा, आदि वाद्यों का उल्लेख किया गया है। एक धारणा तो यह भी है कि रावणहत्था नामक तंत्रवाद्य वर्तमान सारंगी का प्राचीन रूप था, किन्तु इस धारणा की पुष्टि मैं अब तक किसी ग्रन्थ से नहीं कर पाया हूँ। हाँ, प्रोफेसर लालमणि मिश्र ने अपनी पुस्तक में यह उल्लेख अवश्य किया है कि सारंगी का ही एक प्राचीन रूप श्रीलंका में लोकवाद्य के रूप में प्रचलित था। कालान्तर में यही वाद्य राजस्थान पहुँचा और यहाँ इसका नामकरण ‘रावणहत्था’ हुआ। राजस्थान के लोक संगीत में आज भी सारंगी के अनेक प्रकार मिलते हैं। इन्हीं में एक प्रकार है ‘सिन्धी सारंगी’, जिसे लंगा जाति के लोक कलाकार आज बहुतायत में प्रयोग करते हैं। इसमें मुख्य चार तारों में दो लोहे के और दो ताँत के होते हैं। इसके अलावा सात झारा के और १७ तरब के तार होते हैं।

कृष्णमोहन : श्रीकुमार जी, हमारे पास सिन्धी सारंगी की एक रिकार्डिंग है, जिसे हबीब खाँ लंगा ने बजाया है। सारंगी के अन्य लोकरूपों की चर्चा को हम जारी रखेंगे, परन्तु पहले सिन्धी सारंगी का वादन सुनते हैं।

सिन्धी सारंगी : वादक – हबीब खाँ लंगा



कृष्णमोहन : श्रीकुमार जी, लोक संगीत में प्रचलित सारंगी के कुछ अन्य प्रकारों के बारे में भी हमारे पाठकों को बताएँ।

श्रीकुमार मिश्र : संरचना के अनुसार लोक संगीत में अनेक प्रकार की सारंगी का प्रयोग किया जाता है। राजस्थान की लंगा जाति के लोक कलाकार सिन्धी सारंगी के अलावा एक और प्रकार की सारंगी का प्रयोग करते हैं, जिसे गुजराती सारंगी कहा जाता है। इसमें चार मुख्य और आठ सहायक तार होते हैं। इसे रोहिदा नामक लकड़ी से बनाया जाता है। इसी प्रकार उत्तर भारत में भिक्षाटन कर जीवन-यापन करने वाले जोगियों द्वारा प्रयोग की जाने वाली सारंगी ‘जोगिया सारंगी’ कहलाती है। यह तून की लकड़ी द्वारा निर्मित छोटी सारंगी होती है, जिसके तुम्बे पर खाल मढ़ी होती है। इसमें ताँत के तीन तार होते हैं। इसी प्रकार निहालदे के जोगियों द्वारा प्रयुक्त की जाने वाली सारंगी ‘धानी सारंगी’ कहलाती है। इसका तुम्बा सपाट होता है और इसमें मुख्य चार तारों में दो लोहे के और दो ताँत के तार होते हैं। इस प्रकार की सारंगी में आठ सहायक तार भी होते हैं। लोक सारंगी का ही एक विकसित रूप है, जिसे ‘अलाबु सारंगी’ नाम से पुकारा जाता है। जैसलमेर के मांगनियार जाति के लोक कलाकार इस सारंगी का प्रयोग करते हैं। सारंगी का ही एक प्रचलित लोक स्वरूप है जिसे ‘नेपाली सारंगी’ कहा जाता है। इसकी खोखली कुंडी या तुम्बे का निचला आधा हिस्सा चमड़े से मढ़ा होता है और आधा हिस्सा खुला होता है।

कृष्णमोहन : सारंगी के लोक और शास्त्रीय स्वरूप की चर्चा को हम जारी रखेंगे, परन्तु यहाँ थोड़ा विराम लेकर अपने पाठकों-श्रोताओं को नेपाली सारंगी का एक उदाहरण सुनवाते है।

नेपाली सारंगी : वादक – जंगबहादुर गन्धर्व



कृष्णमोहन : श्रीकुमार जी, सारंगी का वर्तमान शास्त्रीय स्वरूप भी तो परम्परागत रूप से ही विकसित हुआ है। हम चाहेंगे कि हमारे पाठको-श्रोताओं को इस वाद्य की कुछ असाधारण विशेषताओं और वादन शैली के बारे में बताएँ।

श्रीकुमार मिश्र : सारंगी एक ऐसा वाद्य है, जो मानव-कण्ठ की अनुकृति करने में सक्षम है। अपने इस गुण के कारण सारंगी रागदारी संगीत के गायक कलाकारों की संगति के लिए सर्वप्रिय वाद्य बना रहा। गायक कलाकारों की आवश्यकतानुसार समय-समय पर सारंगी की बनावट में परिवर्तन होते रहे। मध्यकाल में चार मुख्य तारों की बड़ी सारंगी का प्रयोग किया जाता था। इसे चारगा की सारंगी कहा जाता था। इस सारंगी के पहले तार को ज़ील, दूसरे को डेवढ़, तीसरे को खरज और चौथे तार को लरज़ कहते हैं। प्राचीन काल के गायकों में मन्द्र और अतिमन्द्र गायन का चलन था। ऐसे में सारंगी के चौथे तार की उपयोगिता थी। परन्तु धीरे-धीरे मन्द्र और अतिमन्द्र स्वरों में गायन का चलन कम होता गया और आधुनिक सारंगी से चौथा तार हट गया। अधिकतर आधुनिक सारंगी में अब तीन मुख्य तारों का ही प्रयोग होता है।

कृष्णमोहन : शास्त्रीय वाद्य के रूप में सारंगी वाद्य का अधिकतर प्रयोग संगति वाद्य के रूप में हुआ है, किन्तु विगत कुछ दशक से सारंगी के स्वतंत्र वादन का चलन भी बढ़ा है। इस प्रश्न का उत्तर भी आपसे अपेक्षित है, किन्तु उससे पहले हम अपने संगीत-प्रेमी श्रोताओ को स्वतंत्र सारंगी वादन का एक उदाहरण सुनवाते हैं। युवा सारंगी वादक कमाल साबरी प्रस्तुत कर रहे हैं, राग रामकली। तबला संगति की है उस्ताद शफ़ात अहमद खाँ।

राग रामकली : स्वतंत्र सारंगी वादन : वादक – उस्ताद कमाल साबरी



श्रीकुमार मिश्र : आपने बिलकुल ठीक कहा, सारंगी के तंत्रों से उत्पन्न नाद, मानव के कण्ठ-नाद से मेल खाने के कारण इस वाद्य का प्रयोग संगति वाद्य के रूप में अधिक हुआ है। परन्तु पिछले ५०-६० वर्षों में कुछ सृजनशील सारंगी वादकों ने इसे स्वतंत्र स्वर वाद्य के रूप में भी बजाया है। जिन कलाकारों ने स्वतंत्र वादन के रूप में सारंगी को अपनाया, उन्हें अपनी स्वयं की वादन शैली भी रचनी पड़ी। इसका मुख्य कारण था कि इसे संगति वाद्य ही माना जाता था। इन कलाकारों ने अपनी स्वयं की गढ़ी गई वादन शैली के अनुकूल सारंगी वाद्य में थोड़े फेर-बदल भी किये। स्वतंत्र सारंगी वादन के क्षेत्र में पं. रामनारायण, उस्ताद साबरी खाँ और उनके सुपुत्र कमाल खाँ, वाराणसी के पं. गोपाल मिश्र, पं. हनुमानप्रसाद मिश्र, पं. बैजनाथ मिश्र, उस्ताद सुलेमान खाँ, उस्ताद सुल्तान खाँ, उस्ताद ज़हीर खाँ आदि कई ऐसे सारंगी वादक हैं जिन्होने संगति के साथ-साथ स्वतंत्र वादन के क्षेत्र में भी भरपूर ख्याति आर्जित की है।

कृष्णमोहन : श्रीकुमार जी, आपने पण्डित रामनारायन जी का नाम लिया और अब हम अपने पाठकों-श्रोताओं को उन्हीं की बजाई सारंगी सुनवाने जा रहे हैं। नीचे दिये गए प्लेयर को क्लिक कीजिए और सुनिए, पण्डित रामनारायन की बजाई राग पीलू की ठुमरी-

ठुमरी राग पीलू : स्वतंत्र सारंगी वादन : वादक – पण्डित रामनारायण



कृष्णमोहन : श्रीकुमार जी, इस ठुमरी के साथ ही हम सारंगी के बारे में जानकारी देने के लिए ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से आपका आभार व्यक्त करते हैं और अनुरोध करते हैं कि ‘स्वरगोष्ठी’ के अगले अंक में भी आप हमारे बीच आएँगे और गज-तंत्र श्रेणी के कुछ और वाद्यों की चर्चा करेंगे।

श्रीकुमार मिश्र : ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ और ‘स्वरगोष्ठी’ के सभी संचालकों को धन्यवाद कि आपने संगीत प्रेमियों के इस मंच से मुझे जुडने का अवसर दिया। सभी पाठको-श्रोताओं को मेरा अभिवादन।
आज की पहेली

आज की ‘संगीत-पहेली’ में हम आपको एक गज-तंत्र-वाद्य पर प्रस्तुत एक राग-रचना का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ९०वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।



१_ संगीत की यह रचना किस राग में निबद्ध है?

२_ ताल की पहचान कीजिए और हमे ताल का नाम भी बताइए।


आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के ९०वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। हमसे सीधे सम्पर्क के लिए swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर अपना सन्देश भेज सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के ८६वें अंक की पहेली में हमने आपको विदुषी डॉ. प्रभा अत्रे के स्वर में एक द्रुत खयाल की रचना सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर राग ‘कलावती’ और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर ताल ‘एकताल’ है। दोनों प्रश्नों के सही उत्तर लखनऊ के प्रकाश गोविन्द, जबलपुर की क्षिति तिवारी और मीरजापुर, उत्तर प्रदेश के डॉ. पी.के. त्रिपाठी। तीनों प्रतिभागियों को रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर से हार्दिक बधाई।

झरोखा अगले अंक का

मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ के अगले अंक में हमने एक बार पुनः पण्डित श्रीकुमार मिश्र को आमंत्रित किया है। इस अंक में हम उनसे गज-तंत्र श्रेणी के कुछ ऐसे वाद्यों के विषय में चर्चा करेंगे जिनमें परदे होते हैं। अगले रविवार को प्रातः ९-३० पर आयोजित आपकी अपनी इस गोष्ठी में आप हमारे सहभागी बनिए। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।

कृष्णमोहन मिश्र

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