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Sunday, January 23, 2011

सुर संगम में आज - पंडित बृज नारायण का सरोद वादन - राग श्री

सुर संगम - 04

राग श्री, एक प्राचीन उत्तर भारतीय राग है पूर्वी ठाट का। इसे भगवान शिव से जोड़ा जाता है। यह राग सिख धर्म में गाया जाता है गुरु ग्रंथ साहिब के तहत। गुरु ग्रंथ साहिब में कुल ३१ राग हैं और उसमें राग श्री सब से पहले आता है। गुरु ग्रंथ साहिब के १४ से लेकर ९४ पृष्ठों में जो कम्पोज़िशन है, वो इसी राग में है।


सुप्रभात! सुर-संगम स्तंभ के सभी पाठकों व श्रोताओं का स्वागत है आज के इस अंक में। आज इसमें हम चर्चा करेंगे सुप्रसिद्ध सरोद वादक पंडित बृज नारायण की, जिनका बजाया हुआ राग श्री आपको सुनवाएँगे। साथ ही एक ऐसी फ़िल्मी रचना भी सुनवाएँगे जिसमें पंडित जी ने सरोद बजाया है और उस गीत में सरोद का बड़ा ही प्रॊमिनेण्ट प्रयोग हुआ है। बृज नारायण सुप्रसिद्ध सारंगी वादक पंडित राम नारायण के बड़े बेटे हैं। उनका जन्म २५ अप्रैल १९५२ को राजस्थान के उदयपुर में हुआ था। वैसे तो पिता के ज़रिये वो सारंगी भी बजा लेते थे, लेकिन धीरे धीरे उनकी रुचि सरोद में हो गई। बहुत ही कम उम्र से सीखने की वजह से उन्होंने इस विधा में महारथ हासिल की और एक नामचीन सरोद वादक के रूप में जाने गये। बृज नारायण कुछ समय तक अपने चाचा चतुर लाल, जो एक प्रसिद्ध तबला नवाज़ थे, से संगीत सीखा, और फिर सरोद नवाज़ उस्ताद अली अकबर ख़ान साहब से भी उन्हें दिल्ली में सीखने का मौका मिला। लेकिन १९६५ में चतुर लाल के निधन हो जाने की वजह से वो अपने पिता के पास वापस चले गये और उनसे सीखने लगे। इसके दो साल बाद, यानी १९६७ में ही बृज नारायण ने राष्ट्रपति द्वारा पदत्त स्वर्णपदक अपने नाम कर लिया आकाशवाणी के सर्वश्रेषठ वादक प्रतियोगिता के ज़रिये। ६० के दशक के ही आख़िर में वो एक फ़िल्म के विषय भी बने, १९६९ में अपने पिता के साथ अफ़ग़ानिस्तान में एक सांस्कृतिक सम्मेलन में हिस्सा लेने गये, और भारत संगीत सभा के स्कॊलर भी बनें। १९७२ में नारायण बम्बई विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री प्राप्त की। इसी साल म्युनिक ऒलीम्पिक्स में उन्होंने अपना वादन प्रस्तुत किया। ७० और ८० के दशकों में उन्होंने अफ़्रीका, यूरोप और अमेरिका के बहुत सारे टूर किए और उनके कई ऐल्बम्स भी रेकॊर्ड हुए। तबला नवाज़ उस्ताद ज़ाकिर हुसैन के साथ भी उनका एक ऐल्बम बना है।

और अब थोड़ी बातें आज के राग की। जैसा कि हमने बताया आज हम पंडित बृज नारायण से सुनेंगे राग श्री, यह राग एक प्राचीन उत्तर भारतीय राग है पूर्वी ठाट का। इसे भगवान शिव से जोड़ा जाता है। यह राग सिख धर्म में गाया जाता है गुरु ग्रंथ साहिब के तहत। गुरु ग्रंथ साहिब में कुल ३१ राग हैं और उसमें राग श्री सब से पहले आता है। गुरु ग्रंथ साहिब के १४ से लेकर ९४ पृष्ठों में जो कम्पोज़िशन है, वो इसी राग में है। राग श्री को मुख्यत: धार्मिक अनुष्ठानों के लिए इस्तेमाल में लाया जाता है और संगीत के प्राचीन लेखों में इस राग का उल्लेख हमें मिलता है। श्री एक दुर्लभ राग है और रोज़ मर्रा की ज़िंदगी में इस राग का ज़िक्र सुनने को नहीं मिलता। लेकिन उत्तरी भारत के शास्त्रीय संगीत का यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण राग है। पारम्परिक तौर पर इस राग को सूर्यास्त के समय गाया जाना चाहिए। राग श्री का मूड तेजस्वी अंदाज़ और प्रार्थना का मिश्रण है। गुरु नानक, गुरु अमर दास, गुरु राम दास और गुरु अर्जन ने इसी राग को आधार बनाकर कई शबद कम्पोज़ किये हैं। लगभग १४२ शबद इस राग पर गाये जाते हैं। यह अफ़सोस की ही बात है कि हमारे फ़िल्मी संगीतकारों ने इस राग पर गानें कम्पोज़ नहीं किए। तो लीजिए प्रस्तुत है सरोद पर पंडित बृज नारायण का बजाया राग श्री।

सरोद वादन - राग श्री - पंडित बृज नारायण


पंडित बृज नारायण ने १९७८ की फ़िल्म 'मैं तुलसी तेरे आंगन की' में सरोद बजाया था और १९८८ की फ़िल्म 'दि बेंगॊली नाइट' में संगीत भी दिया था जिसका निर्माण किया था निकोलास क्लोट्ज़ ने और जिसमें मुख्य भूमिका ह्यु ग्राण्ट ने निभाया था। फ़िल्म 'मैं तुलसी तेरे आंगन की' का जो शीर्षक गीत है लता जी की आवाज़ में, उसकी शुरुआत ही बृज नारायण के बजाये सरोद से होती है और इंटरल्युड्स में भी सरोद के ख़ूबसूरत पीसेस सुनने को मिलते हैं। आज जब हम बृज जी पर सुर संगम का यह अंक प्रस्तुत कर रहे हैं, ऐसे में इस गीत को सुनवाये बग़ैर अगर हम यह अंक समाप्त कर देंगे तो शायद यह अधूरा ही रह जायेगा। इस गीत को सुनवाने से पहले आपको बता दें कि इस फ़िल्म में संगीत है लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल का और गीतकार हैं आनंद बक्शी। जब यह फ़िल्म बन रही थी तो इसका शीर्षक 'मैं तुलसी तेरे आंगन की' फ़ाइनल हो चुका था, और संगीतकार जोड़ी एल.पी एक बहुत प्यारे धुन पर इस शीर्षक को बिठा भी चुके थे। लेकिन "मैं तुलसी तेरे आंगन की', इस शीर्षक के लिए दूसरी पंक्ति नहीं मिल रही थी। इस समस्या के निदान के लिए फ़िल्म के निर्देशक राज खोसला और एल.पी पहुँच गये आनंद बक्शी साहब के पास और उन्हें अपनी समस्या बतायी। पहली पंक्ति सुनते ही बक्शी साहब ने झट से दूसरी पंक्ति कह दी "कोई नहीं मैं तेरे साजन की"; और खोसला तथा एल.पी, चमत्कृत हो गये। तो आइए इस ख़ूबसूरत गीत को सुनते हैं, जिसमें सरोद के साथ साथ आपको शहनाई और सितार के भी सुरीली तानें सुनने को मिलेंगी। फ़िल्म में यह गीत अलग अलग भागों में आता है। तो आइए सुनते हैं राग पहाड़ी पर आधारित इस गीत को।

गीत - मैं तुलसी तेरे आंगन की


तो ये था आज का सुर-संगम जिसमें हमने आपको सरोद नवाज़ पंडित बृज नारायण का बजाया राग श्री सुनवाया, और साथ ही फ़िल्म 'मैं तुलसी तेरे आंगन की' का शीर्षक गीत भी सुनवाया जिसमें पंडित जी ने सरोद बजाया था। अगले सप्ताह फिर किसी नामचीन शास्त्रीय कलाकार के साथ हम उपस्थित होंगे, अब आज्ञा दीजिए, और शाम को ठीक ६:३० बजे वापस आइएगा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल में। नमस्कार!

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

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