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Saturday, January 28, 2017

चित्रकथा - 4: आशा के बाद ओ. पी. नय्यर की पार्श्वगायिकाएँ


अंक - 4

आशा के बाद ओ. पी. नय्यर की पार्श्वगायिकाएँ


हम कैसे बतायें तक़दीर ने हमको ऐसा मारा..



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं है। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। हमारी दिलचस्पी का आलम ऐसा है कि हम केवल फ़िल्में देख कर या गाने सुनने तक ही अपने आप को सीमित नहीं रखते, बल्कि फ़िल्म संबंधित हर तरह की जानकारियाँ बटोरने का प्रयत्न करते रहते हैं। इसी दिशा में आपके हमसफ़र बन कर हम आते हैं हर शनिवार ’चित्रकथा’ लेकर। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ के तीसरे अंक में आपका हार्दिक स्वागत है।  

ओ. पी. नय्यर एक ऐसे संगीतकार थे जो शुरु से लेकर अन्त तक अपने उसूलों पर चले, और किसी के भी लिए उन्होंने अपना सर नीचे नहीं झुकाया, फिर चाहे उनकी हाथ से फ़िल्म चली जाए या गायक-गायिकाएँ मुंह मोड़ ले। करीयर के शुरुआती दिनों में ही एक ग़लतफ़हमी की वजह से लता मंगेशकर के साथ जो अन-बन हुई थी, उसके चलते नय्यर साहब ने कभी लता जी के साथ सुलह नहीं किया। और अपने करीयर के अन्तिम चरण में अपनी चहेती गायिका आशा भोसले से भी उन्होंने सारे संबंध तोड़ दिए। आइए आज हम नज़र डाले उन पार्श्वगायिकाओं पर जिनकी आवाज़ का ओ. पी. नय्यर ने अपने गीतों में इस्तमाल किया आशा भोसले से संबंध समाप्त होने के बाद।



संगीतकार ओ. पी. नय्यर की शख़्सियत के बारे में हम सभी जानते हैं। जब दूसरे सभी संगीतकार लता
मंगेशकर से अपने गीत गवाने के लिए व्याकुल थे, तब उन्होंने यह ऐलान कर दिया कि वो लता से कभी नहीं गवाएँगे। राजकुमारी, शम्शाद बेगम और गीता दत्त से अपनी शुरुआती फ़िल्मों के गीत गवाने के बाद नय्यर साहब को मिली आशा भोसले। आशा जी और नय्यर साहब की जोड़ी कमाल की जोड़ी बनी। एक से एक सुपर-डुपर हिट गीत बनते चले गए। लेकिन यह जोड़ी भी टिक नहीं सकी। 70 के दशक के आते आते संगीतकारों की नई पीढ़ी ने फ़िल्म-संगीत जगत में तहल्का मचाना शुरु कर दिया था। कल्याणजी-आनन्दजी, लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल और राहुल देव बर्मन सर्वोच्च शिखर पर पहुँच चुके थे। ऐसे में शंकर जयकिशन, ओ. पी. नय्यर, रवि, चित्रगुप्त आदि संगीतकारों का करीअर ढलान पर आ गया। उधर ओ. पी. नय्यर और आशा भोसले के बीच भी अन-बन शुरु हुई। और कहा जाता है कि जब एक दिन नय्यर साहब ने आशा जी की बेटी वर्षा पर हाथ उठाने की हिमाकत की, उस दिन आशा ने ओ. पी. नय्यर के साथ किसी भी तरह के संबंध में पूर्ण-विराम लगा दिया। उन दिनों ’प्राण जाए पर वचन ना जाए’ फ़िल्म रिलीज़ होने ही वाली थी और इसका "चैन से हमको कभी आपने जीने ना दिया" गीत बेहद लोकप्रिय होने लगा था। ऐसे में आशा जी ने निर्माता-निर्देशक से कह कर इस गीत को फ़िल्म से हटवा दिया। और जब इसी फ़िल्म के लिए नय्यर साहब को इस वर्ष का फ़िल्मफ़ेअर पुरस्कार मिला, तब घर लौटते वक़्त गाड़ी का शीशा उतार कर यह पुरस्कार उन्होंने बाहर फेंक दिया। नय्यर और आशा का रिश्ता हमेशा-हमेशा के लिए ख़त्म हो गया।

इस घटना के समय नय्यर और आशा एक और फ़िल्म में साथ में काम कर रहे थे। फ़िल्म थी ’टैक्सी
Krishna Kalle
ड्राइवर’। 1973 में प्रदर्शित इस फ़िल्म में तब तक आशा भोसले की आवाज़ में कई गीत रेकॉर्ड हो चुके थे, बस एक गीत रेकॉर्ड होना बाक़ी था। आशा जी से संबंध समाप्त होने के बाद यह आख़िरी गीत नय्यर साहब ने कृष्णा कल्ले से गवाने का निर्णय लिया। गीत के बोल थे "प्यार करते हो यार, करके डरते हो यार"। गीत क्लब-कैबरे जौनर का गीत है। यूं तो कृष्णा कल्ले ने इस गीत को बहुत अच्छा गाया है, पर आशा-नय्यर का वह जादू नहीं चल पाया। कुछ-कुछ इसी तरह के भाव पर आधारित आशा-नय्यर का एक मास्टरपीस गीत रहा है फ़िल्म ’मेरे सनम’ का "ये है रेशमी ज़ुल्फ़ों का अन्धेरा ना घबराइए"। वह असर नय्यर साहब ’टैक्सी ड्राइवर’ के इस गीत में पैदा नहीं कर सके। गायिका कृष्णा कल्ले ने 60 और 70 के दशकों में बहुत से फ़िल्मी गीत गाए, पर उनमें से अधिकतर कम बजट की फ़िल्मों के गीत होने की वजह से ज़्यादा चल नहीं पाए। रफ़ी साहब के साथ उनका गाया 1967 की फ़िल्म ’राज़’ का गीत "सोचता हूँ के तुम्हें मैंने कहीं देखा है" काफ़ी लोकप्रिय हुआ था। मराठी और कन्नड़ फ़िल्मों में भी उन्होंने कई गीत गाए हैं।


’टैक्सी ड्राइवर’ के बाद ओ. पी. नय्यर के संगीत से सजी अगली फ़िल्म आई ’ख़ून का बदला ख़ून’। 1978
Vani Jayram
की इस फ़िल्म में नय्यर साहब ने एक नहीं बल्कि तीन-तीन गायिकाओं को मौक़ा दिया अपने गीतों को गाने का। ये थीं वाणी जयराम, उत्तरा केलकर और पुष्पा पगधरे। वाणी जयराम का करीअर हिन्दी फ़िल्मों में 1971 में शुरु हुआ जब वसन्त देसाई के संगीत में फ़िल्म ’गुड्डी’ में दो गीत गा कर वो रातों रात मशहूर हो गईं। फिर नौशाद साहब ने उन्हें अपनी 1972 की फ़िल्म ’पाक़ीज़ा’ में "मोरा साजन" और 1977 की फ़िल्म ’आइना’ में आशा भोसले के साथ एक युगल गीत में गवाया। और 1978 में ओ. पी. नय्यर ने उन्हें ’ख़ून का बदला ख़ून’ की मुख्य गायिका के रूप में प्रस्तुत किया और उनसे एक या दो नहीं बल्कि फ़िल्म के सभी आठ गीत गवाए। रफ़ी साहब के साथ गाया "एजी होगा क्या आगे जनाब देखना, अभी तो सवाल है जवाब देखना" क़व्वाली शैली का गीत है जिसमें नय्यर साहब का हस्ताक्षर ऑरकेस्ट्रेशन इन्टरल्युड में साफ़ सुनाई देता है, पर गीत को 70 के दशक के स्टाइल में ढालने की कोशिश की गई है। वाणी जयराम के गाए चार और गीत हैं इस फ़िल्म में; "बड़ा दुख द‍इबे पवन पुरवैया" और "प्यार भरा कजरा अखियों में डालके" मुजरा शैली के गीत हैं। "तुमको दीवाना मेरी जान बनाने के लिए, एक बस एक मोहब्बत की नज़र काफ़ी है" एक क्लब नंबर है। "ज़ुल्फ़ लहराई तो सावन का महीना आ गया" में नय्यर साहब की वही 60 के दशक के गीतों की छाया नज़र आई, पर कुल मिला कर इस फ़िल्म में वाणी जयराम की आवाज़ वह कमाल नहीं दिखा सकी जो ’गुड्डी’ में दिखाई थी। गीतों में वह दम नहीं था कि उस दौर के सुपरहिट फ़िल्मों के सुपरहिट गीतों से टक्कर ले पाते।


’ख़ून का बदला ख़ून’ में वाणी जयराम के साथ दो और गायिकाओं की आवाज़ें भी गूंजी। इनमें से एक थीं
Uttara Kelkar
उत्तरा केलकर। इन्होंने हिन्दी फ़िल्मों में बहुत ज़्यादा तो नहीं गाईं, पर मराठी संगीत जगत में इनका नाम हुआ। कहना आवश्यक है कि हिन्दी फ़िल्म जगत में उत्तरा केलकर को पहला अवसर ओ. पी. नय्यर ने ही दिया था ’ख़ून का बदला ख़ून’ में। इस फ़िल्म के तीन गीतों में इनकी आवाज़ सुनाई दी - "घर अपना बंगाल और बम्बई...", "हम यतीमों के जैसा भी संसार..." और "प्यार भरा कजरा अखियों में..."। लेकिन ये तीनों गीत उनकी एकल आवाज़ में नहीं थे, बल्कि वाणी जयराम इनमें मुख्य गायिका थीं, और साथ में थीं पुष्पा पगधरे। इन गीतों ने उत्तरा केलकर को कोई प्रसिद्धी तो नहीं दिलाई, पर हिन्दी फ़िल्म जगत में उनका खाता खुल गया। उन्हें हिन्दी में दूसरा मौका मिला सात साल बाद, 1985 की फ़िल्म ’टारज़न’ में जिसमें बप्पी लाहिड़ी ने उनसे गवाए "मेरे पास आओगे" और "तमाशा बनके आए हैं" जैसे हिट गीत। 1987 में ’डान्स डान्स’ का "आ गया आ गया हलवा आ गया" गीत भी सुपरहिट रहा। ’माँ कसम’, ’अधिकार’, ’सूर्या’, ’पुलिस और मुजरिम’, और ’इनसानियत के देवता’ जैसी फ़िल्मों में उनके गाए गीत नाकामयाब रहे। ओ. पी. नय्यर ने भी फिर कभी उत्तरा केलकर से अपने गीत नहीं गवाए।


वाणी जयराम और उत्तरा केलकर के अलावा ’ख़ून का बदला ख़ून’ में नय्यर साहब ने पुष्पा पगधरे को
Pushpa Pagdhare
भी गाने का मौक़ा दिया था। "घर अपना बंगाल और बम्बई" और "प्यार भरा कजरा अखियों में डाल के" में इन्होंने अपनी आवाज़ मिलाई थी। वैसे यह पुष्पा पगधरे की पहली फ़िल्म नहीं थी। इससे एक साल पहले 1977 में संगीतकार एस. एन. त्रिपाठी ने धार्मिक फ़िल्म ’जय गणेश’ में इन्हें गाने का अवसर दिया था। आशा भोसले, मन्ना डे और महेन्द्र कपूर जैसे सीनियर गायकों के साथ इनकी भी आवाज़ इस ऐल्बम में सुनाई दी थी। 1978 में ही एक और फ़िल्म में पुष्पा की आवाज़ सुनाई दी, यह फ़िल्म थी ’चोर का भाई चोर’। डी. एस. रेउबेन के संगीत में इस फ़िल्म के गाने नहीं चले। इस तीनों फ़िल्मों के पिट जाने की वजह से पुष्पा पगधरे की आवाज़ लोगों तक नहीं पहुँच सकी और पुष्पा गुमनामी में ही रह गईं। ओ. पी. नय्यर ने एक बार फिर उन्हें मौका दिया अपनी अगली ही फ़िल्म ’बिन माँ के बच्चे’ में जो प्रदर्शित हुई थी 1979 में। इस फ़िल्म के कुल छह गीतों में तीन रफ़ी साहब के एकल, दो पुष्पा पगधरे के एकल और एक रफ़ी-पुष्पा डुएट थे। रफ़ी साहब के साथ गाया गीत एक होली गीत था जिसके बोल थे "होली आई रे आई रे होली आई रे, दिल झूम रहे मस्ती में लिए लाखों रंग बहार के"। बदलते दौर में भी अपनी शैली को बरकरार रखने की कोशिश में नाकाम रहे नय्यर साहब और यह होली गीत कोई कमाल नहीं दिखा सकी। पुष्पा पगधरे की एकल गीतों में पहला गीत था "अपनी भी एक दिन ऐसी मोटर कार होगी" और दूसरा गीत था "जो रात को जल्दी सोये और सुबह को जल्दी जागे"। इन गीतों में नय्यर साहब का स्टाइल बरकरार था और एस. एच. बिहारी के लिखे सुन्दर बोलों के होने के बावजूद ये गाने नहीं चले। एक तो दौर बदल चुका था, 80 के दशक में 60 के दशक का स्टाइल भला कैसे हिट होता! और शायद आशा भोसले की आवाज़ होती तो बात कुछ और होती, क्या पता! 1986 की फ़िल्म ’अंकुष’ में "इतनी शक्ति हमें देना दाता" गा कर पुष्पा पगधरे को पहली बार हिन्दी फ़िल्म जगत में ख्याति हासिल हुई। इस फ़िल्म के संगीतकार थे कुलदीप सिंह। ओ. पी. नय्यर ने अपने जीवन की अन्तिम फ़िल्म, 1995 की ’मुक़द्दर की बात’ में एक बार फिर से पुष्पा पगधरे को गवाया था।


1979 में ओ. पी. नय्यर के संगीत निर्देशन में एक और फ़िल्म आई ’हीरा मोती’। इस फ़िल्म में भी रफ़ी
Dilraj Kaur
साहब पुरुष गायक थे, साथ में मन्ना डे भी। पर गायिका के रूप में इस बार उन्होंने चुना दिलराज कौर की आवाज़। शत्रुघन सिन्हा और रीना रॉय पर फ़िल्माया रफ़ी-दिलराज डुएट "होंठ हैं तेरे दो लाल हीरे" पंजाबी शैली का नृत्य गीत है जिसमें दिलराज कौर आशा भोसले के अंदाज़ में गाने की कोशिश करती हैं और कुछ हद तक सफल भी हुई हैं। फ़िल्म अगर चलती तो शायद यह गीत भी चल पड़ता, पर अफ़सोस की बात कि फ़िल्म के ना चलने से इस गीत पर किसी का ध्यान नहीं गया। इस फ़िल्म में एक ख़ूबसूरत क़व्वाली भी थी रफ़ी साहब, मन्ना दा और दिलराज कौर की आवाज़ों में - "ज़िन्दगी लेकर हथेली पर दीवाने आ गए, तीर खाने के लिए बन कर निशाने आ गए"। इस गीत में भी दिलराज कौर का वही आशा वाली अंदाज़ साफ़ महसूस की जा सकती है। शत्रुघन सिन्हा, डैनी और बिन्दू पर फ़िल्माई हुई यह क़व्वाली उस ज़माने में काफ़ी हिट हुई थी। इस फ़िल्म में दिलराज कौर की आवाज़ में तीन एकल गीत भी थे। "तुम ख़ुद को देखते हो सदा अपनी नज़र से" सुन कर नय्यर साहब के कितने ही पुराने गीत याद आ जाते हैं। इस गीत की धुन से मिलती जुलती धुनों का उन्होंने कई बार अपने गीतों में प्रयोग किया है। "यही वह जगह है" गीत से भी इस गीत की ख़ास समानता है। "सौ साल जियो तुम जान मेरी तुम्हें मेरी उमरिया लग जाए" एक हल्का फुल्का जनमदिन गीत है जिसमें हिट होने के सभी गुण थे, बस बदक़िस्मती यही थी कि फ़िल्म पिट गई। अन्तिम गीत "मैं तुझको मौत दे दूँ या आज़ाद कर दूँ, तुझे नई ज़िन्दगी दे दूँ या बरबाद कर दूँ" भी एक सुन्दर रचना है जिसमें मध्य एशियाई संगीत की छाया मिलती है, और गीत के बोलों में ’मेरा गाँव मेरा देश’ के प्रसिद्ध गीत "मार दिया जाए के छोड़ दिया जाए" से समानता मिलती है।


इन चन्द फ़िल्मों में संगीत देने के बाद ओ. पी. नय्यर को यह बात समझ आ गई कि लता मंगेशकर या
S Janaki
आशा भोसले को लिए बग़ैर उन्हें किसी बड़ी फ़िल्म में संगीत देने का अवसर मिलना असंभव है। लता के साथ काम करने का सवाल ही नहीं था और आशा से वो किनारा कर चुके थे, अत: इस इंडस्ट्री से संयास लेना ही उन्होंने उचित समझा। नय्यर साहब अपने मर्ज़ी के मालिक थे, वो किसी के शर्तों पर काम नहीं करते थे, अपने उसूलों के लिए वो अपने परिवार से भी अलग हो गए। 80 के दशक के अन्त तक उन्हें आर्थिक परेशानियों ने भी घेर लिया और ना चाहते हुए भी उन्हें एक बार फिर से इस फ़िल्म जगत में क़दम रखना पड़ा। साल था 1992 और फ़िल्म थी ’मंगनी’। बी. आर. इशारा निर्देशित यह फ़िल्म एक कम बजट की फ़िल्म थी। पार्श्वगायिका के रूप में लिया गया दक्षिण की मशहूर गायिका एस. जानकी को, गायक बने एस. पी. बालसुब्रह्मण्यम। और गीतकार थे क़मर जलालाबादी जिनके साथ नय्यर साहब ने पुराने ज़माने में बहुत काम किया है। लेकिन बात बन नहीं पायी। एस. जानकी की गाई "मैं तो मर के भी तेरी रहूंगी" एक बेहद कर्णप्रिय रचना है जिसे नय्यर साहब ने शास्त्रीय संगीत पर आधारित किया है। एस. जानकी की आवाज़ और अन्दाज़ में आशा जी की झलक मिलती है। इस गीत के इन्टरल्युड में भी उन्होंने कुछ ऐसी आलाप ली हैं जो बिल्कुल आशा-नय्यर के गीतों की याद दिला जाती हैं। नय्यर साहब ने एक साक्षात्कार में यह कहा है कि अगर एस. जानकी विदेश में जाकर नहीं बस जातीं तो उनसे बेहतर गाने वाली पूरे हिन्दुस्तान में नहीं थीं। उन्होंने यहाँ तक कहा कि अगर वो मुंबई में गातीं तो वो शीर्ष की गायिका होतीं। इस फ़िल्म का एक अन्य गीत है "हम कैसे बतायें तक़दीर ने हमको ऐसा मारा" जो नय्यर साहब के जाने-पहचाने तालों पर आधारित है। नय्यर साहब के गीतों की ख़ासियत यह है कि हर गीत में वो अपना हस्ताक्षर छोड़ जाते थे और यह गीत भी एक ऐसा ही गीत है जिसे सुन कर कोई भी बता सकता है कि यह नय्यर साहब का कम्पोज़िशन है।


1992 में ही ओ. पी. नय्यर के संगीत से सजी एक और फ़िल्म आई जिसके गीतों ने ख़ूब लोकप्रियता
Kavita
हासिल की। यह फ़िल्म थी ’निश्चय’। भप्पी सोनी निर्मित इस फ़िल्म में सलमान ख़ान और करिश्मा कपूर के होने की वजह से फ़िल्म लोगों तक पहुँची, और ओ. पी. नय्यर ने भी यह सिद्ध किया कि 90 के दशक में भी उनके संगीत का जादू बरक़रार है। इस फ़िल्म में सलमान की आवाज़ बने अमित कुमार और करिश्मा की आवाज़ बनी कविता कृष्णमूर्ती। इस फ़िल्म में कविता की एकल आवाज़ में "छुट्टी कर दी मेरी" के अलावा अमित-कविता के चार युगल गीत थे - "किसी हसीन यार की तलाश है", "सुन मेरे सजना सुन रे", "नई सुराही ताज़ा पानी पी ले तू जानी" और "देखो देखो तुम हो गया मैं गुम"। ये सभी के सभी गीत बेहद कामयाब रहे और ऐसा लगा जैसे फ़िल्म-संगीत का सुनहरा दौर वापस आ गया है। जब यही बात किसी ने एक साक्षात्कार में नय्यर से कही तो ’निश्चय’ के गीतों की लोकप्रियता से साफ़ इनकार करते हुए नय्यर साहब ने कहा,
"देखिए, इन दो पिक्चरों ने यह बता दिया कि नय्यर साहब, आप जो बनाते हो वो आज चलेगा नहीं, और जो आज बन रहा है वो मैं बना नहीं सकता। तो ग्रेस किस चीज़ में है? विस्डम ऐण्ड ग्रेस? कि आप विथड्रॉ कर लीजिए! बहुत कैसेट बिका था, बहुत बहुत बिका म्युज़िक, पिक्चर रिलीज़ होते ही दोनों ठप्प। तो म्युज़िक भी गया साथ में, पिक्चरों का जनाज़ा निकला और म्युज़िक का भी। उस वक़्त मुझे पैसों की सख़्त ज़रूरत थी, तो मुझे वो तस्वीरें लेनी पड़ी। बेगर्स कान्ट बी चूज़र्स; ज़रूरतमन्द आदमी तो यह नहीं देखेगा कि सब्जेक्ट क्या क्या है, जब ज़रूरतमन्द नहीं था, तब भी नहीं पूछता था मैं कि सबजेक्ट क्या है, कहानी क्या है, कुछ नहीं। मेरा एक ही सब्जेक्ट और एक ही कहानी थी कि रुपया कितना है!"



Ranjana Joglekar
’निश्चय’ के बाद 1994 में एक और फ़िल्म आई ’ज़िद’ जिसमें नय्यर साहब का संगीत एक बार फिर हिट हुआ, पर फ़िल्म के बुरी तरह पिट जाने से फ़िल्म के साथ-साथ फ़िल्म के गीतों का भी जनाज़ा निकल गया। इस फ़िल्म में नय्यर साहब ने कविता कृष्णमूर्ति के अलावा दो और गायिकायों से गीत गवाए। ये गायिकाएँ थीं रंजना जोगलेकर और माधुरी जोगलेकर। मोहम्मद अज़ीज़ और रंजना जोगलेकर की युगल आवाज़ों में "तुझे प्यार कर लूँ यह जी चाहता है" को बेहद सुन्दर तरीके से स्वरबद्ध किया है जिसमें तबले का आकर्षक प्रयोग किया गया है। कविता कृष्णमूर्ति की आवाज़ में "कोरी गगरिया मीठा पानी" में कोई नई या ख़ास बात नहीं लगी। उपर से हाल ही में फ़िल्म ’निश्चय’ में "नई सुराही ताज़ा पानी" लोग सुन चुके थे। कविता, रंजना और माधुरी जोगलेकर, इन तीनों ने एक साथ आवाज़ें मिलाई "ख़ून-ए-जिगर से हो लिख देंगे हम तो पहला पहला
Madhuri Joglekar
सलाम सँवरिया के नाम"। इस गीत में तीनों गायिकाएँ पूरा गीत साथ में गाती हैं, इसलिए तीनों आवाज़ों का कॉनट्रस्ट बाहर नहीं आया। अगर तीनों गायिकाएँ बारी-बारी गातीं तो शायद कुछ और बात बनती। कुल मिला कर ’ज़िद’ के गाने सुन्दर और कर्णप्रिय होने के बावजूद फ़िल्म के ना चलने से इनकी तरफ़ लोगों ने ज़्यादा ध्यान नहीं दिया। 
और 1995 में ओ. पी. नय्यर के संगीत में ढल कर अन्तिम फ़िल्म लौन्च हुई ’मुक़द्दर की बात’ पर यह फ़िल्म प्रदर्शित नहीं हो सकी। इस फ़िल्म के गाने महेन्द्र कपूर और पुष्पा पगधरे ने गाए। "सोने में सुगन्ध मिलाई गई, तब तेरी काया बनाई गई" एक बेहद सुन्दर युगल गीत है, जो बोल, संगीत और गायन की दृष्टि से उत्तर रचना है। एक और युगल गीत है "क्या यह मुमकिन है हम दोनों मिला करें हर बार, बार बार दुनिया में किसी को कब मिलता है प्यार"। इन गीतों को सुन कर यह बात मन में उठती है कि क्या नय्यर साहब ने ही महेन्द्र कपूर को सबसे ज़्यादा अच्छे गाने दिए हैं! इसी फ़िल्म की एक अन्य सुन्दर रचना है "कैसे ये तारों भरी रात खिली सजना" जो पुष्पा पगधरे की एकल आवाज़ में शास्त्रीय राग में ढल कर बेहद सुन्दर बन पड़ी है। पुष्पा जी की आवाज़ में एक और एकल गीत है "पिया तेरा प्यार मैं तो माँग में सजाऊंगी, जग सारा देखेगा मैं तेरी बन जाऊँगी" जिसमें पंजाबी रंग है और साथ ही इन्टरल्युड में सितार पर शास्त्रीय रंग भी है।

ओ. पी. नय्यर 81 वर्ष की आयु में 28 जनवरी 2007 को इस फ़ानी दुनिया से चले गए। अपने उसूलों के पक्के नय्यर साहब ने कभी अपना सर नहीं झुकाया, फिर चाहे उनके गीत लता और आशा न गाए, उन्होंने कभी किसी के साथ कोई समझौता नहीं किया या किसी के दबाव में नहीं आए। आशा भोसले से अलग होने के बाद उनके गाने कृष्णा कल्ले, वाणी जयराम, पुष्पा पगधरे, उत्तरा केलकर, दिलराज कौर, एस. जानकी, कविता कृष्णामूर्ति, रंजना जोगलेकर और माधुरी जोगलेकर जैसी गायिकाओं ने गाए। गाने सभी उत्कृष्ट बने लेकिन फ़िल्मों के ना चलने से ये गाने भी ठंडे बस्ते में चले गए। 

आपकी बात

’चित्रकथा’ के पिछले अंक में गणतन्त्र दिवस विशेषांक में महेन्द्र कपूर के गाए देशभक्ति फ़िल्मी गीतों पर लेख आप सब ने पसन्द किया, हमें बहुत प्रसन्नता हुई। आँकड़ों के अनुसार इस लेख को करीब 162 पाठकों ने पढ़ा है। ’चित्रकथा’ के पिछले तीन अंकों का अब तक का मिला-जुला रीडरशिप है 580, आप सभी के इस स्नेह और सहयोगिता के लिए हम आपके अत्यन्त आभारी हैं और आशा करते हैं कि भविष्य में यूं ही आप अपना साथ बनाए रखेंगे।

आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!


शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Thursday, August 8, 2013

कातिल आँखों वाले दिलबर को रिझाती आशा की आवाज़

खरा सोना गीत - यार बादशाह यार दिलरुबा
स्वर  - दीप्ती सक्सेना
प्रस्तुति  - संज्ञा टंडन
स्क्रिप्ट - सुजॉय चट्टरजी



Wednesday, February 1, 2012

"जब से पी संग नैना लागे" - क्यों लता नहीं गा सकीं ओ.पी.नय्यर के इस पहले पहले कम्पोज़िशन को


लता मंगेशकर और ओ.पी.नय्यर के बीच की दूरी फ़िल्म-संगीत जगत में एक चर्चा का विषय रहा है। आज इसी ग़लतफ़हमी पर एक विस्तारित नज़र ओ.पी.नय्यर की पहली फ़िल्म 'आसमान' के एक गीत के ज़रिए सुजॉय चटर्जी के साथ, 'एक गीत सौ कहानियाँ' की पाँचवी कड़ी में...

एक गीत सौ कहानियाँ # 5

स्वर्ण-युग के संगीतकारों में बहुत कम ऐसे संगीतकार हुए हैं जिनकी धुनों पर लता मंगेशकर की आवाज़ न सजी हो। बल्कि यूं भी कह सकते हैं कि हर संगीतकार अपने गानें लता से गवाना चाहते थे। ऐसे में अगर कोई संगीतकार उम्र भर उनसे न गवाने की क़सम खा ले, तो यह मानना ही पड़ेगा कि उस संगीतकार में ज़रूर कोई ख़ास बात होगी, उसमें ज़रूर दम होगा। ओ.पी. नय्यर एक ऐसे ही संगीतकार हुए जिन्होने कभी लता से गाना नहीं लिया। अपनी पहली पहली फ़िल्म के समय ही किसी मनमुटाव के कारण जो दरार लता और नय्यर के बीच पड़ी, वह फिर कभी नहीं भर सकी। लता और नय्यर, दोनों से ही लगभग हर साक्षात्कार में यह सवाल ज़रूर पूछा जाता रहा है कि आख़िर क्या बात हो गई थी कि दोनों नें कभी एक दूसरे की तरफ़ क़दम नहीं बढ़ाया, पर हर बार ये दोनों असल बात को टालते रहे हैं। आज हम इन दोनों के वक्तव्य को जानने के साथ-साथ हक़ीक़त में क्या बात हुई थी, असल मुद्दा क्या था, उस पर भी ज़रा करीब से नज़र डालेंगे।

नय्यर साहब को जब पूछा गया कि क्या वजह है जो उन्होंने कभी लता जी को नहीं गवाया, तो उन्होंने ख़ुदा का वास्ता देते हुए कहा, "७८ की मेरी उम्र है, मुझे मरते वक़्त जान देनी है, तो मैं आपको बताऊँ कि कोई उनसे झगड़ा नहीं है, न मैंने उन्हे कभी ऐप्रोच किया। उनकी आवाज़ मेरी म्युज़िक को सूट नहीं करती। मुझे चाहिए सिडक्टिव वॉयस, जिसकी वॉयस में वेट हो, वह मुझे गीता दत्त, शमशाद बेगम और आशा भोसले में मिला। आशा भोसले बड़ी अच्छी गायिका है, लेकिन नम्बर वन गायिका लता मंगेशकर ही रहेगी, और नम्बर दो आशा भोसले ही रहेगी।" इस तरह से नय्यर साहब तो साफ़ मूकर गए इस बात से कि लता जी के साथ उनकी कोई भी अन-बन हुई थी। लता जी क्या कहती हैं इस बारे में? "जी मैं ज़रूर यह कहना चाहूँगी क्योंकि मेरा और नय्यर साहब का कोई झगड़ा तो था ही नहीं, न मेरे दिल में उनके लिए ऐसा था कि भई ये बहुत बुरा आदमी है, और न कुछ उनके दिल में। इतना मैं जानती हूँ कि वो जब पहली बार आए और वह शायद पंचोली साहब की कोई फ़िल्म कर रहे थे, तब मुझे उन्होंने बुलाया था, और एक गाना उन्होंने मेरे लिए निकाला था। पर क्या हुआ उस वक़्त कि मैं, उस वक़्त मुझे साइनस की बहुत ज़्यादा तकलीफ़ थी और वह गाना रेकॉर्ड नहीं हुआ। वह गाना रेकॉर्ड न होने के बाद, अब यह मैं सोच रही हूँ, हो सकता है कि ऐसा नहीं हो, मुझे ऐसा लगता है कि शायद उन्होंने फिर सोचा हो कि नहीं, लता से नहीं लेंगे। और यह बात उन्होंने बिलकुल सच कही है कि जो उनका स्टाइल था वह शायद मेरे गले से अच्छा नहीं लगता। आज भी मुझे ऐसा महसूस होता है। पर वो मेरे हिसाब से बहुत अच्छे म्युज़िक डिरेक्टर थे और बहुत ही अच्छा उन्होंने म्युज़िक दिया है। और जो म्युज़िक उस वक़्त चल रहा था, उससे हट के उन्होंने अपना एक स्टाइल उस वक़्त शुरु किया था जैसे कि मास्टर ग़ुलाम हैदर।"

जहाँ एक तरफ़ नय्यर साहब नें साफ़ मना कर दिया था कि उन्होंने कभी लता को ऐप्रोच किया ही नहीं था, वहीं दूसरी तरफ़ लता जी नें बताया कि एक गाना नय्यर साहब नें उनके लिए कम्पोज़ किया था, जिसे वो साइनस की बीमारी की वजह से नहीं गा सकीं। जो बात दोनों ने बताई, वह यह कि दोनों में कोई झगड़ा नहीं था। चलिए अब ज़रा हक़ीक़त पर नज़र डालें जो प्रकाशित हुई हैं हरीश भिमानी लिखित मशहूर किताब 'इन सर्च ऑफ़ लता मंगेशकर' में, और जिसका पंकज राग लिखित किताब 'धुनों की यात्रा' में भी उल्लेख मिलता है। ओ. पी. नय्यर की पहली फ़िल्म थी १९५२ की 'आसमान' जिसके निर्माता थे दलसुख पंचोली। यह फ़िल्म नय्यर को उनके मित्र एस. एन. भाटिया की मदद से मिली थी। इस फ़िल्म के कुछ गीत उन्होंने गीता रॉय के लिए तो कम्पोज़ किया ही, एक गीत ऐसा था जिसकी रचना उन्होंने लता मंगेशकर की गायन शैली को ध्यान में रख कर कम्पोज़ किया था। गीत के बोल थे "जब से पी संग नैना लागे, तब से नाहीं लागे नैन, हो गिन-गिन घड़ियाँ दिन काटूं मैं, गिन-गिन तारे काटूं रैन, पिया आन सखी मोरे नैन में, मोरी निन्दिया चुराये गयो"। इस गीत को लता ही गाने वाली थीं, पर कुछ ऐसा हुआ कि दो तीन दिनों तक लता लगातार अन्य रेकॉर्डिंगों में अत्यधिक व्यस्त रहने के कारण रिहर्सल पर नहीं आ सकीं। नय्यर नें भी कारण जानने की कोशिश नहीं की और पंचोली साहब को लता की शिकायत कर दी। जब तक लता बात संभालतीं, तब तक इस वाकए को बढ़ा-चढ़ाकर ऐसा रंग दिया जा चुका था कि लता और नय्यर के बीच एक अटूट ग़लतफ़हमी जन्म ले चुकी थीं। लता के बाद इस गीत को राजकुमारी से गवा लिया गया।

लता और नय्यर के बीच का मनमुटाव यहीं पर ख़त्म नहीं हुआ। नय्यर की पहली तीन फ़िल्में - 'आसमान', 'छम छमा छम' और 'बाज़' - तीनों ही बुरी तरह पिटीं। पर चौथी फ़िल्म के रूप में १९५४ की फ़िल्म 'आर पार' के गीतों नें रातों रात पूरे देश में धूम मचा दी। ये गानें इतने ज़्यादा लोकप्रिय हुए कि नय्यर रातों रात प्रथम श्रेणी के संगीतकार बन गए और कई फ़िल्मकार अपनी अपनी फ़िल्म के लिए उन्हें साइन करना चाहते थे। उदाहरण स्वरूप, उस समय निर्माणाधीन फ़िल्म 'महबूबा' में रोशन और 'मंगू' में मोहम्मद शफ़ी संगीत दे रहे थे। इन दोनों फ़िल्मों के निर्माताओं नें इन दो संगीतकारों को हटाकर नय्यर को इनके संगीत का दायित्व दे दिया। नय्यर के लिए भले यह ख़ुशी की बात रही हो, पर इन दो संगीतकारों के लिए तो यह अपमान ही था। लता नय्यर से नाराज़ तो थीं ही, इस बात से वो और भी ज़्यादा नाख़ुश हो गईं और इस बात को वो ले गईं संगीतकारों के ऐसोसिएशन तक। नतीजा यह हुआ कि इन दो फ़िल्मों में नय्यर के लिए कोई गायिका गाने को राज़ी नहीं हो रही थीं। इस मुश्किल घड़ी में नय्यर का साथ दिया शम्शाद बेगम नें, पर लता और नय्यर के बीच जो गहरी दरार पड़ गई थी, वह कभी नहीं भर पाई। बरसों बरस बाद जब नय्यर साहब का नाम मध्य प्रदेश शासन प्रदत्त 'लता मंगेशकर पुरस्कार' के लिए चुना गया, तो नय्यर साहब नें पुरस्कार लेने से साफ़ मना कर दिया। आज फ़िल्म 'आसमान' के गीत विस्मृत हो चुके हैं, राजकुमारी का गाया और गीतकार प्रेम धवन का लिखा यह गीत भी ज़्यादा लोकप्रिय नहीं हुआ और आज एक भूला-बिसरा गीत बन चुका है, पर इस बात के लिए यह गीत ज़रूर याद किया जाएगा कि नय्यर नें इस गीत को लता के लिए ही स्वरबद्ध किया था। कैसे कैसे गीत बने होते अगर लता गातीं नय्यर के लिए!

फ़िल्म 'आसमान' से "जब से पी संग नैना लागे..." सुनने के लिए नीचे प्लेयर में क्लिक करें...



तो दोस्तों, यह था आज का 'एक गीत सौ कहानियाँ'। अगले सप्ताह फिर किसी गीत से जुड़ी बातें लेकर मैं फिर उपस्थित हो‍ऊंगा, तब तक के लिए अनुमति दीजिए अपने इस ई-दोस्त, सुजॉय चटर्जी को, नमस्कार!

Wednesday, May 25, 2011

जा जा जा रे बेवफा...मजरूह साहब ने इस गीत के जरिये दर्शाये जीवन के मुक्तलिफ़ रूप

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 663/2011/103

'...और कारवाँ बनता गया', गीतकार व शायर मजरूह सुल्तानपुरी को समर्पित 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की इस लघु शृंखला की चौथी कड़ी में आप सभी का एक बार फिर से स्वागत है। मजरूह साहब पर एक किताब प्रकाशित हुई है जिसे उनके दो चाहनेवालों नें लिखे हैं। ये दो शख़्स हैं अमेरीका निवासी भारतीय मूल के बैदर बख़्त और उनकी अमरीकी सहयोगी मारीएन एर्की। इन दो मजरूह प्रशंसकों नें उनकी ग़ज़लों को संकलित कर एक किताब के रूप में प्रकाशित किया है, जिसका शीर्षक है 'Never Mind Your Chains'। यह शीर्षक मजरूह साहब के ही लिखे एक शेर से आया है - "देख ज़िदान के परे, रंग-ए-चमन जोश-ए-बहार, रक्स करना है तो फिर पाँव की ज़ंजीर न देख"। अर्थात् चमन खिला हुआ है पिंजरे के ठीक उस पार, अगर नाच उठना है तो फिर पांव की बेड़ियों की तरफ़ न देख, never mind your chains। थोड़ा और क़रीब से देखा जाये तो उनकी यह ख़ूबसूरत ग़ज़ल उनके करीयर पर भी लागू होती है। उनका कभी न रुकने, कभी न हार स्वीकारने की अदा, लाख पाबंदियों के बावजूद उन्हें न रोक सकी, और आज उन्होंने एक अमर शायर व गीतकार के रूप में इतिहास में अपनी जगह बना ली है। दोस्तों, इन दिनों चर्चा जारी है मजरूह साहब के लिखे ५० के दशक के गीतों की। यह सच है कि इस दशक में मजरूह नें 'आर पार', 'दिल्ली का ठग', 'चलती का नाम गाड़ी', 'नौ दो ग्यारह', 'सी.आइ.डी', 'पेयिंग् गेस्ट' और 'तुमसा नहीं देखा' जैसे फ़िल्मों में गीत लिखकर एक व्यावसायिक हल्के फुल्के गीतकार के रूप में अपने आप को प्रस्तुत किया, जहाँ दूसरी तरफ़ उनके समकालीनों में साहिर, प्रदीप, कैफ़ी आज़्मी, भरत व्यास और शैलेन्द्र जैसे गीतकार स्तरीय काम कर रहे थे। बावजूद इसके, मजरूह नें अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया और इसका नतीजा है कि गीतकारों में वो पहले व अकेले गीतकार हुए जिन्हें दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

नौशाद, अनिल बिस्वास और मदन मोहन के बाद आज हम जिस संगीतकार की रचना लेकर आये हैं, उस संगीतकार के साथ भी मजरूह साहब नें लम्बी पारी खेली, और सिर्फ़ लम्बी ही नहीं, बेहद सफल भी। ये थे ओ. पी. नय्यर साहब। जैसा कि कल की कड़ी में हमनें आपको बताया कि १९५३ में नय्यर साहब और मजरूह साहब के जोड़ी की पहली फ़िल्म 'बाज़' प्रदर्शित हुई थी। यह फ़िल्म बॉक्स ऑफ़िस पर पिट गई थी, लेकिन अगले ही साल, १९५४ में, इस जोड़ी की फ़िल्म 'आर-पार' नें जैसे चारों तरफ़ तहल्का मचा दिया। गायिका गीता दत्त, जो उन दिनों ज़्यादातर भक्तिमूलक और दर्दीले गीत ही गाती चली आ रहीं थीं, उनकी गायन क्षमता को एक नया आयाम मिला इस फ़िल्म से। "ए लो मैं हारी पिया हुई तेरी जीत रे", "बाबूजी धीरे चलना", "मोहब्बत कर लो जी भर लो", "हूँ अभी मैं जवान ऐ दिल", "अरे न न न तौबा तौबा", और "सुन सुन सुन सुन ज़ालिमा" जैसे गीतों में गीता जी की मादकता आज भी दिल में हलचल पैदा कर देती है। लेकिन इस फ़िल्म में एक और गीत भी है, जिसमें गीता जी का अंदाज़ कुछ ग़मगीन सा है। "सुन सुन ज़ालिमा" गीत का ही एक संस्करण हम इसे कह सकते हैं, जिसके बोल हैं "जा जा जा जा बेवफ़ा, कैसा प्यार कैसी प्रीत रे, तू ना किसी का मीत रे, झूठे तेरे प्यार की क़सम"। वैसे यही पंक्ति "सुन सुन ज़ालिमा" में भी गीता दत्त गाती हैं, लेकिन एक नोक-झोक टकरार वाली अंदाज़ में, और इसी को धीमी लय में और सैड मूड में परिवर्तित कर इसका गीता जी का एकल संस्करण बनाया गया है। तो आइए आज की कड़ी करें मजरूह और नय्यर की अमर जोड़ी के नाम, साथ ही गीता जी का भी स्मरण।



क्या आप जानते हैं...
कि फ़िल्म 'फागुन' के निर्माता शुरु शुरु में इस फ़िल्म के गीत मजरूह से लिखवाना चाहते थे, लेकिन ओ.पी. नय्यर के सुझाव पर क़मर जलालाबादी से गीत लिखवाये गये क्योंकि फ़िल्म की पटकथा व संवाद क़मर साहब नें ही लिखे थे।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 5/शृंखला 17
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - बेहद आसान.
सवाल १ - फिल्म में किन दो कलाकारों की प्रमुख भूमिकाएं है - ३ अंक
सवाल २ - फिल्म के निर्देशक कौन थे - २ अंक
सवाल ३ - संगीतकार बताएं- १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
प्रतीक जी एकदम सही जवाब है, २ अंक अविनाश जी के खाते में भी आये, क्षिति जी आपका जवाब स्वीकार्य न हो ऐसा कैसे संभव है, इंदु जी कभी कभार आ जाया कीजिये दिल खुश हो जाता है

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Wednesday, December 22, 2010

दीवाना हुआ बादल, सावन की घटा छायी...जब स्वीट सिक्सटीस् में परवान चढा प्रेम

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 554/2010/254

जीव जगत की तमाम अनुभूतियों में सब से प्यारी, सब से सुंदर, सब से सुरीली, और सब से मीठी अनुभूति है प्रेम की अनुभूति, प्यार की अनुभूति। यह प्यार ही तो है जो इस संसार को अनंतकाल से चलाता आ रहा है। ज़रा सोचिए तो, अगर प्यार ना होता, अगर चाहत ना होती, तो क्या किसी अन्य चीज़ की कल्पना भी हम कर सकते थे! फिर चाहे यह प्यार किसी भी तरह का क्यों ना हो। मनुष्य का मनुष्य से, मनुष्य का जानवरों से, प्रकृति से, अपने देश से, अपने समाज से। दोस्तों, यह 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल है, जो बुना हुआ है फ़िल्म संगीत के तार से। और हमारी फ़िल्मों और फ़िल्मी गीतों का केन्द्रबिंदु भी देखिए प्रेम ही तो है। प्रेमिक-प्रेमिका के प्यार को ही केन्द्र में रखते हुए यहाँ फ़िल्में बनती हैं, और इसलिए ज़ाहिर है कि फ़िल्मों के ज़्यादातर गानें भी प्यार-मोहब्बत के रंगों में ही रंगे होते हैं। दशकों से प्यार भरे युगल गीतों की परम्परा चली आई है, और एक से एक सुरीले युगल गीत हमें कलाकारों ने दिए हैं। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर इन दिनों आप सुन रहे हैं फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर से चु्ने हुए कुछ सदाबहार युगल गीत 'एक मैं और एक तू' लघु शृंखला के अंतर्गत। यह तो सच है कि केवल दस गीतों में हम सुनहरे दौर के सदाबहार युगल गीतों की फ़ेहरिस्त को समेट नहीं सकते। यह बस एक छोटी सी कोशिश है इस विशाल समुंदर में से कुछ दस मोतियाँ चुन लाने की जो फ़िल्म संगीत के बदलते मिज़ाज को दर्शा सके, कि किस तरह से ३० के दशक से लेकर ८० के दशक तक फ़िल्मी युगल गीतों का मिज़ाज, उनका रूप रंग बदला। ३०, ४० और ५० के दशकों से एक एक गीत सुनने के बाद आज हम क़दम रख रहे हैं ६० के दशक में। ६० का दशक, जिसे हम 'स्वीट सिक्स्टीज़' भी कहते हैं, और इस दशक में ही सब से ज़्यादा लोकप्रिय गीत बनें हैं। इसलिए हम इस दशक से एक नहीं बल्कि तीन तीन युगल गीत आपको एक के बाद एक सुनवाएँगे। इन गीतों का आधार हमने लिया है उन तीन गायिकाओं का जो इस दशक में सब से ज़्यादा सक्रीय रहे। ये गायिकाएँ हैं लता मंगेशकर, आशा भोसले और सुमन कल्याणपुर।

आज के अंक में प्रस्तुत है आशा भोसले और मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ों में फ़िल्म 'कश्मीर की कली' का सदाबहार युगल गीत "दीवाना हुआ बादल, सावन की घटा छायी"। युं तो यह १९६४ की फ़िल्म है, लेकिन ऐसा प्रतीत होता है जैसे इस फ़िल्म के गीतों पर वक़्त की ज़रा सी भी आंच नहीं लग पायी है। आज भी इस फ़िल्म के तमाम गानें उसी रूप में ब-दस्तूर बजते चले जा रहे हैं जैसे फ़िल्म के प्रदर्शन के दौर में बजे होंगे। ओ. पी. नय्यर के ६० के दशक की शायद यह सफलतम फ़िल्म रही होगी। शम्मी कपूर, शर्मीला टैगोर और नज़ीर हुसैन अभिनीत इस फ़िल्म के गीत लिखे थे एस.एच. बिहारी साहब ने। शक्ति दा, यानी शक्ति सामंत की यह फ़िल्म थी, और आप में से कुछ दोस्तों को याद होगा कि शक्ति दा के निधन के बाद जब हमने उन पर एक ख़ास शृंखला 'सफल हुई तेरी आराधना' प्रस्तुत की थी, उसमें हमने इस फ़िल्म की विस्तारीत चर्चा की थी। आज इस गीत के बारे में बस यही कहना चाहते हैं कि इसके मुखड़े का जो धुन है, वह दरअसल नय्यर साहब ने एक पीस के तौर पर "आँखों ही आँखों में इशारा हो गया" गीत के इंटरल्युड म्युज़िक में किया था। यह १९५६ की फ़िल्म 'सी.आइ.डी' का गीत है, और देखिये इसके ८ साल बाद इस धुन का इस्तमाल नय्यर साहब ने दोबारा किया और यह गीत एक माइलस्टोन बन गया ना केवल उनके करीयर का बल्कि फ़िल्म संगीत के धरोहर का भी। तो आइए अब इस गीत का आनंद उठाते हैं। रुत तो नहीं है सावन की, लेकिन ऐसे मधुर गीतों की बौछार का तो हमेशा ही स्वागत है, है न!



क्या आप जानते हैं...
कि 'कश्मीर की कली' फ़िल्म साइन करने के वक़्त शर्मीला टैगोर की उम्र केवल १४ वर्ष थी।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 5/शृंखला 06
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - किसी अन्य सूत्र की दरकार नहीं.

सवाल १ - लता जी के साथ किस गायक ने दिया है यहाँ - १ अंक
सवाल २ - गीतकार कौन हैं - २ अंक
सवाल ३ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी बहुत बढ़िया चल रहे हैं इस बार, प्रतिभा जी और रोमेंद्र जी बहुत दिनों में दिखे

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Sunday, December 12, 2010

कभी आर कभी पार लागा तीरे नज़र.....आज भी इस गीत की रिदम को सुनकर मन थिरकने नहीं लगता क्या आपका ?

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 546/2010/246

मस्कार! 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक और नए सप्ताह में आप सभी का बहुत बहुत स्वागत है। दोस्तों, पिछले तीन हफ़्तों से 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर सज रही है एक ऐसी महफ़िल जिसे रोशन कर रहे हैं हिंदी सिनेमा के लौह स्तंभ समान फ़िल्मकार। 'हिंदी सिनेमा के लौह स्तंभ' लघु शृंखला के पहले तीन खण्डों में वी. शांताराम, महबूब ख़ान और बिमल रॊय के फ़िल्मी सफ़र पर नज़र डालने के बाद आज से हम इस शृंखला का चौथा और अंतिम खण्ड शुरु कर रहे हैं। और इस खण्ड के लिए हमने जिस फ़िल्मकार को चुना है, वो एक बहुमुखी प्रतिभा के धनी कलाकार हैं। फ़िल्म निर्माण और निर्देशन के लिए तो वो मशहूर हैं ही, अभिनय के क्षेत्र में भी उन्होंने लोहा मनवाया है और साथ ही एक अच्छे नृत्य निर्देशक भी रहे हैं। इस बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न फ़िल्मकार को दुनिया जानती है गुरु दत्त के नाम से। आज से अगले चार अंकों में हम गुरु दत्त को और उनके फ़िल्मी सफ़र को थोड़ा नज़दीक से जानने और समझने की कोशिश करेंगे और साथ ही उनके द्वारा निर्मित और/या निर्देशित फ़िल्मों के कुछ बेहद लोकप्रिय व सदाबहार गानें भी सुनेंगे। गुरु दत्त पडुकोण का जन्म ९ जुलाई १९२५ को बैंगलोर (मैसूर प्रोविंस) में हुआ था। उनके पिता शिवशंकरराव पडुकोण और माँ वसंती पडुकोण चित्रपुर के सारस्वत थे। पिता पहले पहले स्कूल के हेडमास्टर थे और बाद में बैंक की नौकरी कर ली, जब कि उनकी माँ एक स्कूल में पढ़ाती थीं और लघु कहानियाँ लिखती थीं, तथा बांगला के उपन्यासों को कन्नड़ में अनुवाद भी करती थीं। जब गुरु दत्त का जन्म हुआ, उस वक़्त वसंती पडुकोण की उम्र केवल १६ वर्ष थी। परिवार की आर्थिक अवस्था ठीक ना होने और माता-पिता में संबंध अच्छे ना होने की वजह से गुरु दत्त का बचपन कठिन ही रहा। गुरु दत्त का नाम शुरु में वसंत कुमार रखा गया था, लेकिन बालावस्था में एक हादसे का शिकार होने के बाद उनका बदलकर गुरु दत्त कर दिया गया, क्योंकि परिवार के हिसाब से यह नाम ज़्यादा शुभ था। गुरु दत्त के तीन छोटे भाई थे आत्माराम, देवीदास और विजय, और उनकी एकमात्र बहन थी ललिता। निर्देशिका कल्पना लाजमी ललिता की ही बेटी हैं। गुरु दत्त बचपन में अपना बहुत सारा समय अपने मामा बालाकृष्णा बी. बेनेगल के साथ बिताया करते थे, जिन्हें वो बकुटमामा कहकर बुलाते थे। बकुटमामा उन दिनों फ़िल्मों के पोस्टर्स पेण्ट किया करते थे। इसी बकौटमामा के भतीजे हैं महान फ़िल्मकार श्याम बेनेगल। तो दोस्तों, यह था गुरु दत्त साहब के परिवार का पार्श्व।

दोस्तों, गुरु दत्त के नाम से बहुत से लोगों को आज भी यह लगता है कि बंगाली थे, जब कि ऐसी कोई बात नहीं है। लेकिन उनका बंगाल से नाता तो ज़रूर है। जैसा कि हमने बताया कि गुरु दत्त के पिता हेडमास्टर थे और उसके बाद बैंक की नौकरी की। फिर उसके बाद वो एक क्लर्क की हैसियत से बर्मा शेल कंपनी में कार्यरत हो गये और इस तरह से कलकत्ते के भवानीपुर में रहने लगे। यहीं पर गुरु दत्त की स्कूली शिक्षा सम्पन्न हुई। और इसी वजह से गुरु दत्त बंगला भी बहुत फ़ुर्ती से बोल लेते थे। बंगाल की संस्कृति को उन्होंने इतने अच्छे से अपने में समाहित किया कि बाद में जब बंगाल के पार्श्व पर बनी फ़िल्मों का निर्माण किया तो उनमें जान डाल दी। दोस्तों, गुरु दत्त के फ़िल्मी सफ़र की कहानी हम कल के अंक से शुरु करेंगे, आइए अब सीधे आ जाते हम आज बजने वाले गीत पर। इस पहले अंक के लिए हमने उस फ़िल्म का शीर्षक गीत चुना है जो गुरु दत्त निर्मित, निर्देशित व अभिनीत पहली ब्लॊकबस्टर फ़िल्म थी। जी हाँ, 'आर-पार'। ऐसी बात नहीं कि इससे पहले उन्होंने फ़िल्में निर्देशित नहीं की, लेकिन 'आर पार' को जो शोहरत और बुलंदी हासिल हुई थी, वह बुलंदी पहले की फ़िल्मों को नसीब नहीं हुई थी। शम्शाद बेगम की आवाज़ में मजरूह सुल्तनपुरी की रचना और संगीतकार, जी हाँ, हमारे ओ.पी. नय्यर साहब, जिनके साथ गुरु दत्त की बहुत अच्छी ट्युनिंग् जमी थी। नय्यर साहब भी इसी गीत को अपना पहला कामयाब गीत बताते रहे हैं। विविध भारती के 'दास्तान-ए-नय्यर' शृंखला में जब कमल शर्मा ने उनसे पूछा कि क्या वो अपना पहला गीत "प्रीतम आन मिलो" को मानते हैं, तो नय्यर साहब ने खारिज करते हुए "कभी आर कभी पार लागा तीर-ए-नज़र" का ही ज़िक्र किया। तो आइए शम्शाद बेगम की खनकती आवाज़ में इस गीत को सुनते हैं।



क्या आप जानते हैं...
कि इसी वर्ष २०१० में गुरु दत्त को सी.एन.एन ने अपने "Top 25 Asian actors of all time" की सूची में शामिल किया है।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली ०७ /शृंखला ०५
गीत का इंटरल्यूड सुनिए-


अतिरिक्त सूत्र - इससे आसान कुछ हो ही नहीं सकता :).

सवाल १ - संगीतकार बताएं - १ अंक
सवाल २ - गीतकार बताएं - २ अंक
सवाल ३ - गायिका का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
इंदु जी ने दो अंकों की छलांग लगायी, मगर श्याम जी अभी भी आगे हैं, भाई श्याम का कोई तोड़ फिलहाल नज़र नहीं आ रहा.....बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Wednesday, October 27, 2010

मैं प्यार का राही हूँ...मुसाफिर रफ़ी साहब ने हसीना आशा के कहा कुछ- सुना कुछ

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 514/2010/214

'गीत गड़बड़ी वाले' शृंखला की आज है चौथी कड़ी। पिछले तीन कड़ियों में आपने सुने गायकों द्वारा की हुईं गड़बड़ियाँ। आज हम बात करते हैं एक ऐसी गड़बड़ी की जो किस तरह से हुई यह बता पाना बहुत मुश्किल है। यह गड़बड़ी है किसी युगल गीत में गायक और गायिका के दो अंतरों की लाइनों का आपस में बदल जाना। यानी कि गायक ने कुछ गाया, जिसका गायिका को जवाब देना है। और अगर यह जवाब गायिका दूसरे अंतरें में दे और दूसरे अंतरे में गायक के सवाल का जवाब वो पहले अंतरे में दे, इसको तो हम गड़बड़ई ही कहेंगे ना! ऐसी ही एक गड़बड़ी हुई थी फ़िल्म 'एक मुसाफ़िर एक हसीना' के एक गीत में। यह फ़िल्मालय की फ़िल्म थी जिसका निर्माण शशधर मुखर्जी ने किया था, राज खोसला इसके निर्देशक थे। ओ. पी. नय्यर द्वारा स्वरबद्ध यह एक आशा-रफ़ी डुएट था "मैं प्यार का राही हूँ"। गीतकार थे राजा मेहन्दी अली ख़ान। अब इस गीत में क्या गड़बड़ी हुई है, यह समझने के लिए गीत के पूरे बोल यहाँ पर लिखना ज़रूरी है। तो पहले इस गीत के बोलों को पढिए, फिर हम बात को आगे बढ़ाते हैं।

मैं प्यार का राही हूँ,
तेरी ज़ुल्फ़ के साये में,
कुछ देर ठहर जाऊँ।

तुम एक मुसाफ़िर हो,
कब छोड़ के चल दोगे,
यह सोच के घबराऊँ।

तेरे बिन जी ना लगे अकेले,
हो सके तो मुझे साथ ले ले,
नाज़नीं तू नहीं जा सकेगी,
छोड़ कर ज़िंदगी के झमेले,
जब छाये घटा याद करना ज़रा,
सात रंगों की उम्र कहानी।

प्यार की बिजलियाँ मुस्कुरायें,
देखिए आप पर गिर ना जाये,
दिल कहे देखता ही रहूँ मैं,
सामने बैठकर ये अदायें,
ना मैं हूँ नाज़नीं ना मैं हूँ महजबीं,
आप ही की नज़र की दीवानी।

इस गीत के पहले अन्तरे में रफी की पंक्तियाँ हैं, "तेरे बिन जी लगे ना अकेले... नाज़नीं तू नहीं जा सकेगी छोड़कर ज़िन्दगी के झमेले", जिसके जवाब में आशा गाती हैं, "जब भी छाए घटा याद करना ज़रा सात रंगों की हूँ मैं कहानी"; और फिर दूसरे अन्तरे में रफी गाते हैं, "प्यार की बिजलियाँ मुस्कुराएँ ... दिल कहे देखता ही रहूँ मैं सामने बैठकर ये अदाएँ", जिसके जवाब में आशा की पंक्तियाँ हैं, "ना मैं हूँ नाज़नीं ना मैं हूँ महजबीं"। अगर गीत के भाव, अर्थ और भाव की दृष्टि से देखें तो प्रतीत होता है कि इन दो अंतरों में आशा भोसले की पंकियाँ आपस में बदल गईं हैं। अब गीत लिखते वक़्त राजा मेहन्दी अली ख़ान से ऐसी भूल तो यकीनन असम्भव है, तो फिर ऐसी गड़बड़ी हो कैसे गई। हाँ, यह हो सकता है कि उन दिनों ज़ेरॊक्स की सुविधा या कम्प्युटर प्रिण्ट तो होते नहीं थे, गायकों को अपने गानें ख़ुद ही गीतकार से लेकर लिख लेने पड़ते थे। तो हो सकता है कि किसी ने लिखते वक़्त यह गड़बड़ी कर दी होगी। क्या असल में यह एक गड़बड़ी थी या फिर राजा साहब ने ऐसा ही लिखा था, यह अब हम कभी नहीं जान पाएँगे क्योंकि राजा साहब तो अब हमारे बीच रहे नहीं। शायद यह राज़ एक राज़ बन कर ही रह जाएगी। तो आइए इस गड़बड़ी का किसी को भी दोष दिए बग़ैर इस सुंदर युगल गीत का आनंद उठाएँ।



क्या आप जानते हैं...
कि गीतकार राजा मेहन्दी अली ख़ान फ़िल्मी गीतकार बनने से पहले आकाशवाणी में काम करते थे, जहाँ पर उनके साथियों में से एक थे जाने माने साहित्यिक उपेन्द्रनाथ अश्क़।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली ०५ /शृंखला ०२
ये धुन है गीत के प्रील्यूड की है-


अतिरिक्त सूत्र - लता की आवाज़ में आपने ये शुरूआती बोल सुने गीत के

सवाल १ - गीतकार बताएं - २ अंक
सवाल २ - संगीतकार कौन थे इस लो बजट फिल्म के - १ अंक
सवाल ३ - फिल्म में थी रेहाना सुल्तान, निर्देशक बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अमित जी २ अंक कमा लिए आपने. श्याम कान्त जी दरअसल आपके अमित जी के और बिट्टू जी के जवाब देने का अंदाज़ एक जैसा है इस करण हो सकता है सुजॉय जी ने कुछ शंका व्यक्त की हो, बहरहाल आप जारी रहे, शरद जी सही जवाब १ अंक आपके, और अवध जी एक जवाब रह गया था कम से कम वही दे देते :)

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


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Monday, July 26, 2010

बाबूजी धीरे चलना.....ओ पी ने बनाया इस प्रेरित गीत को इतना लोकप्रिय

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 447/2010/147

विदेशी धुनों पर आधारित हिंदी फ़िल्मी गीतों की लघु शृंखला 'गीत अपना धुन पराई' इन दिनों जारी है 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर। ५० के दशक से क्लब सॊंग्स का एक ट्रेण्ड चल पड़ा था हिंदी फ़िल्मों में। यक़ीनन इन गीतों का आधार पाश्चात्य संगीत ही होना था। ऐसे में हमारे कई संगीतकारों ने इस तरह के क्लब सॊंग्स के लिए सहारा लिया विदेशी धुनों का, विदेशी गीतों का। ओ. पी. नय्यर साहब ने ५० के दशक में गीता दत्त से बहुत से ऐसे नशीले क्लब सॊंग्स गवाए और उन्ही में से एक बेहद मशूर गीत आज हम आपको सुनवाने जा रहे हैं। १९५४ की फ़िल्म 'आर पार' का वही मशहूर गीत "बाबूजी धीरे चलना, प्यार में ज़रा संभलना"। मजरूह साहब के बोल और गीता जी की नशीली आवाज़। 'आर पार' से पहले ओ.पी. नय्यर तीन फ़िल्मों में संगीत दे चुके थे - 'आसमान', 'छम छमा छम', और 'बाज़'। ये तीनों ही फ़िल्में फ़्लॊप हो जाने की वजह से इस नए संगीतकार की तरफ़ किसी ने ध्यान नहीं दिया। लेकिन जब १९५४ में 'आर पार' हिट हुई तो नय्यर साहब का यूनिक स्टाइल को लोगों ने महसूस किया और इतना पसंद किया गया कि देखते ही देखते नय्यर साहब बन गए फ़िल्म इंडस्ट्री के रीदम किंग। 'आर पार' गुरु दत्त की फ़िल्म थी। प्रभात फ़िल्म कंपनी में नृत्य निर्देशक के रूप में करीयर शुरु करने के बाद देव आनंद ने उन्हे १९५१ में अपनी फ़िल्म 'बाज़ी' निर्देशित करने का मौका। उसके बाद आई 'जाल' और 'बाज़'। १९५४ में गुरु दत्त ने अपना बैनर स्थापित किया और 'आर पार' इस बैनर की पहली फ़िल्म थी। उधर नय्यर साहब, जो अपने पहले तीन फ़िल्मों की असफलता से निराश होकर बम्बई नगरी छोड़ने का प्लान बना रहे थे, 'आर पार' की सफलता ने उनके क़दमों को रोक लिया और जिसकी वजह से हमें अगले दो दशकों तक मिलते रहे एक से एक लाजवाब गीत।

"बाबूजी धीरे चलना" की धुन जिस विदेशी धुन से प्रेरीत है वह गीत है "परहैप्स परहैप्स परहैप्स"। गीत का मुखड़ा कुछ इस तरह का है - "You won't admit you love me, And so how am I ever to know? You always tell me, Perhaps, perhaps, perhaps"। दरअसल यह एक स्पैनिश गीत है जिसके बोल हैं "Quizás, Quizás, Quizás" जिसे लिखा व स्वरबद्ध किया था क्यूबा के गीतकार ओसवाल्डो फ़ारे ने सन् १९४७ में। बाद में इसी धुन पर अंग्रेज़ी के बोल लिखे जो डेविस ने, लेकिन यह बताना ज़रूरी है कि यह स्पैनिश गीत का अनुवाद नहीं है, बल्कि सिर्फ़ उसकी धुन का इस्तेमाल किया गया है। यह धुन इतनी प्रचलित हुई कि उसके बाद बहुत सारे वर्ज़न बने जो समय समय पर रेकॊर्ड कंपनियों ने जारी भी किए। पहले दस वर्ज़नों की सूची हम यहाँ आपको दे रहे हैं (सौजन्य: विकिपीडिया):

1949: The Gordon Jenkins version, with Tony Bavaar as vocalist, was recorded on August 12, 1939 and released by Decca Records as catalog number 24720.

1958: Nat King Cole regularly performed the song with a heavy American accent. His version appeared on his 1958 album Cole Español.

1958: The Algerian Abdelhakim Garami wrote the Arabic lyrics "Chehilet laayani" inspired by the music of "Quizas quizas".

1959: Finnish singer Olavi Virta recorded this song in Spanish.

1960s: The Jamaican ska musician Prince Buster recorded the song in the 1960s as "Rude, Rude, Rudee".

1964: The Doris Day version was recorded on November 5, 1964 for Columbia Records and not released as a single, but only on albums (see Latin for Lovers). It was featured in the Australian film Strictly Ballroom in 1992.

1964: The Trini Lopez version was recorded for Reprise Records and also not released as a single; from the album entitled The Latin Album released as "RS 6125".

1965: Celia Cruz originally recorded a version of the song; later re-released on the 1994 greatest-hits album Irrepetible.

1965: The Skatalites recorded "Perhaps" on Blue Beat in 1965 for the Latin American Music Company, similar to Prince Buster's "Rude, Rude, Rudee" version of the song.

1969: Paco de Lucia recorded an instrumental flamenco version on the album Hispanoamérica.

तो चलिए, इस विदेशी धुन का आनंद लेते हैं देशी अंदाज़ में गीता दत्त की आवाज़ में। इस फ़िल्म में श्यामा और शकीला ने अभिनय किया था गुरु दत्त के साथ, यह गीत फ़िल्माया गया था शकीला पर। सुनते हैं...



क्या आप जानते हैं...
कि अभी इसी साल यानी २०१० में इस गीत का एक अरबी वर्ज़न निकला है जिसे ईजीप्शियन सिंगर रूला ज़ाकी ने गाया है अपने ऐल्बम "ज़िक्रायती' में और जिसके बोल हैं "अहवक अहवक अहवक"।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. Ciao, ciao bambina से प्रेरित है ये गीत, गायक बताएं - २ अंक.
२. संगीतकार जोड़ी कौन सी है - ३ अंक.
३. ग्रेट शो मैन की इस कामियाब फिल्म का नाम बताएं - १ अंक.
४. गीतकार कौन है इस राष्ट्प्रेम की बात करने वाले गीत के - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
बहुत बढ़िया अवध जी, ३ शानदार अंक आपके खाते में आये, शरद जी २ अंकों से सुन्तुष्ठ होना पड़ेगा आज आपको, पवन कुमार जी आप तनिक लेट हो गए, रोमेंद्र बहुत दिनों बाद आपको देखकर अच्छा लगा, बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Wednesday, May 26, 2010

फिल्म में गीत लिखना एक अलग ही किस्म की चुनौती है जिसे बेहद सफलता पूर्वक निभाया बीते दौर के गीतकारों ने

ओल्ड इस गोल्ड /रिवाइवल # ३६

१९५५ में निर्माता निर्देशक ए. आर. कारदार ने किशोर कुमार और चांद उसमानी को लेकर बनायी फ़िल्म 'बाप रे बाप'। १९५२ तक नौशाद साहब ही कारदार साहब की फ़िल्मों में संगीत दे रहे थे। उसके बाद ग़ुलाम मोहम्मद, मदन मोहन और रोशन जैसे संगीतकार उनके साथ जुड़े। और 'बाप रे बाप' के लिए कारदार साहब ने चुना ओ.पी. नय्यर साहब को। और गीतकार चुना गया जाँनिसार अख़्तर को। जाँनिसार अख़्तर, जो जावेद अख़्तर साहब के पिता हैं, उन्होने नय्यर साहब के साथ कई फ़िल्मों में काम किया। जाँनिसार साहब ने भले ही बहुत सारी फ़िल्मों के लिए गानें लिखे, लेकिन उन्हे दूसरे गीतकारों की तुलना में कुछ कम ही याद किया जाता है। जाने क्यों! दोस्तों, अभी हाल में आइ.बी.एन-७ चैनल पर लता जी का एक इंटरव्यू लिया गया था और जावेद अख़्तर साहब उसमें लता जी से बातचीत कर रहे थे। तो जब जावेद साहब ने लता जी से पूछा कि कोई एक ऐसा गाना वो बताएँ जो सब से ज़्यादा उन्हे पसंद रहा है, तो पहले तो लता जी हिचकिचाई यह कहते हुए कि किसी एक गीत को चुनना नामुमकिन है। फिर भी जावेद साहब के ज़िद करने पर उन्होने युंही कह दिया कि फ़िल्म 'रज़िया सुल्तान' का गीत "ऐ दिल-ए-नादान" उन्हे बहुत पसंद है। लता जी उस वक़्त यह भूल गईं थीं कि इस गीत के गीतकार जाँनिसार अख़्तर हैं। लेकिन जब जावेद साहब ने कहा कि 'लता जी, मैंने आपको अपने पसंद का एक गीत चुनने को कहा, तो मैं बड़े फ़क्र के साथ यह कहता हूँ कि यह गीत मेरे वालिद साहब ने लिखा था'। यह सुनते ही लता जी चौंक उठीं और तालियों की गड़गड़ाहट से स्टुडियो गूंज उठा। दोस्तों, जाँनिसार साहब के स्तर का अहसास बस यही घटना करा देती है कि लता जी ने अपनी पसंद का केवल एक गीत चुना और वह उनका लिखा हुअ था। ख़ैर, अब हम आते हैं 'बाप रे बाप' पर। यह एक रोमांटिक कॊमेडी फ़िल्म थी। फ़िल्म में तमाम हास्य रस के गानें थे, लेकिन जो गीत सब से ज़्यादा लोकप्रिय हुआ, वह था "पिया पिया पिया मेरा जिया पुकारे, हम भी चलेंगे स‍इंया संग तुम्हारे"। इस गीत की लोकप्रियता इसकी गायकी, बोल, धुन और रीदम की वजह से तो है ही, लेकिन उससे भी ज़्यादा यह गीत इसलिए यादगार बन गया क्योंकि इस गीत में आशा जी से एक भूल हुई है। जी हाँ, एक ऐसी भूल जिसे सुधारा नहीं गया, बल्कि उस भूल को बड़ी ही चतुराई के साथ फ़िल्माया गया। लीजिए अपनी इस भूल के बारे में आशा जे से ही जानिए। "मैं किशोर दा के साथ एक गीत गा रही थी। ये वह गीत था "पिया पिया पिया"। रिहर्सल ख़त्म होने के बाद फ़ाइनल रोकोर्डिंग शुरू हुई। और मैंने ग़लती से किशोर दा के लाइन के उपर गा उठी। मैं बस 'हं' ऐसे गा उठी और तुरंत अपनी ग़लती का अहसास हो गया। किशोर मेरी तरफ़ देख कर अपने हाथ से मुझे इशारा किया कि मैं गाना जारी रखूँ। जैसे ही रिकार्डिंग् ख़त्म हुई, मैं नय्यर साहब से माफ़ी मांगी और गाना दोबारा रिकार्ड करने का अनुरोध भी किया क्योंकि वह एक बहुत बड़ी ग़लती मुझसे हो गई थी। मैं बीच में ही ग़लत जगह पर गाना शुरु कर दिया था। लेकिन किशोर दा ने मुझे आश्वस्त किया और कहा कि 'आप थोड़ा भी परेशान ना हों, मैं हूँ ना उस फ़िल्म में हीरो, मैं उस सीन में हीरोइन के मुंह पे हाथ रख दूँगा जब वो उस जगह पे गाने लगेगी।" और वाक़ई इसी तरह से इस गीत का फ़िल्मांकन हुआ। दोस्तों, आप में से बहुतों को यह मालूम होगा। जिन्हे पता नहीं था, वो अब बेक़रार हो रहे होंगे आशा जी की इस ग़लती को ढूंढ निकालने का। तो उन सब के लिए हम यह बता दें कि इसे आप गीत के दूसरे अंतरे में महसूस कर सकते हैं। और रही बात इस गीत के प्रस्तुत रिवाइव्ड वर्ज़न की, तो आप ख़ुद ही सुनिए कि क्या इसमें भी वही ग़लती, जो ग़लती हो कर भी फ़िल्मांकन की वजह से ग़लती नहीं रही, दोहराई गई है!

ओल्ड इस गोल्ड एक ऐसी शृंखला जिसने अंतरजाल पर ४०० शानदार एपिसोड पूरे कर एक नया रिकॉर्ड बनाया. हिंदी फिल्मों के ये सदाबहार ओल्ड गोल्ड नगमें जब भी रेडियो/ टेलीविज़न या फिर ओल्ड इस गोल्ड जैसे मंचों से आपके कानों तक पहुँचते हैं तो इनका जादू आपके दिलो जेहन पर चढ कर बोलने लगता है. आपका भी मन कर उठता है न कुछ गुनगुनाने को ?, कुछ लोग बाथरूम तक सीमित रह जाते हैं तो कुछ माईक उठा कर गाने की हिम्मत जुटा लेते हैं, गुजरे दिनों के उन महान फनकारों की कलात्मक ऊर्जा को स्वरांजली दे रहे हैं, आज के युग के कुछ अमेच्युर तो कुछ सधे हुए कलाकार. तो सुनिए आज का कवर संस्करण

गीत -पिया पिया...
कवर गायन -पारसमणी आचार्य और आज़म खान




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पारसमणी आचार्य
मैं पारसमणी राजकोट गुजरात से हूँ, पापा पुलिस में थे और बहुत से वाध्य बजा लेते थे, उनमें से सितार मेरा पसंदीदा था. माँ भी HMV और AIR के लिए क्षेत्रीय भाषा में पार्श्वगायन करती थी, रेडियो पर मेरा गायन काफी छोटी उम्र से शुरू हो गया था. मैं खुशकिस्मत हूँ कि उस्ताद सुलतान खान साहब, बेगम अख्तर, रफ़ी साहब और पंडित रवि शंकर जी जैसे दिग्गजों को मैंने करीब से देखा और उनका आशीर्वाद पाया. गायन मेरा शौक तब भी था और अब भी है, रफ़ी साहब, लता मंगेशकर, सहगल साहब, बड़े गुलाम अली खान साहब और आशा भोसले मेरी सबसे पसंदीदा हैं
आज़म खान
रफ़ी साहब, किशोर कुमार, येसुदास, हरिहरन, सुरेश वाडेकर, सोनू निगम और उदित नारायण इनके पसंदीदा गायक हैं. आज़म फर्मवेयर इंजिनियर है अमेरिका में और गायन का विशेष शौक रखते हैं. इन्टरनेट पर बहुत से संगीत मंचों पर इनकी महफिलें सजती रहती हैं


विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड के ४०० शानदार एपिसोड आप सब के सहयोग और निरंतर मिलती प्रेरणा से संभव हुए. इस लंबे सफर में कुछ साथी व्यस्तता के चलते कभी साथ नहीं चल पाए तो कुछ हमसे जुड़े बहुत आगे चलकर. इन दिनों हम इन्हीं बीते ४०० एपिसोडों के कुछ चर्चित अंश आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं इस रीवायिवल सीरीस में, ताकि आप सब जो किन्हीं कारणों वश इस आयोजन के कुछ अंश मिस कर गए वो इस मिनी केप्सूल में उनका आनंद उठा सकें. नयी कड़ियों के साथ हम जल्द ही वापस लौटेंगें

Friday, May 14, 2010

कुछ गीत इंडस्ट्री में ऐसे भी बने जिनका सम्बन्ध केवल फिल्म और उसके किरदारों तक सीमित नहीं था...

ओल्ड इस गोल्ड /रिवाइवल # २४

"चैन से हमको कभी आप ने जीने ना दिया, ज़हर जो चाहा अगर पीना तो पीने ना दिया"। फ़िल्म 'प्राण जाए पर वचन ना जाए' का यह दिल को छू लेने वाला गीत आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड रिवाइवल' की महफ़िल को रोशन कर रहा है। ओ. पी. नय्यर और आशा भोसले ने साथ साथ फ़िल्म संगीत में एक लम्बी पारी खेली है। करीब करीब १५ सालों तक एक के बाद एक सुपर डुपर हिट गानें ये दोनों देते चले आए हैं। कहा जाता है कि प्रोफ़ेशनल से कुछ हद तक उनका रिश्ता पर्सनल भी हो गया था। ७० के दशक के आते आते जब नय्यर साहब का स्थान शिखर से डगमगा रहा था, उन दिनों दोनों के बीच भी मतभेद होने शुरु हो गए थे। दोनों ही अपने अपने उसूलों के पक्के। फलस्वरूप, दोनों ने एक दूसरे से किनारा कर लिया सन् १९७२ में। इसके ठीक कुछ दिन पहले ही इस गीत की रिकार्डिंग् हुई थी। दोनों के बीच चाहे कुछ भी मतभेद चल रहा हो, दोनों ने ही प्रोफ़ेशनलिज़्म का उदाहरण प्रस्तुत किया और गीत में जान डाल दी। फ़िल्म के रिलीज़ होने के पहले ही इस फ़िल्म के गानें चारों तरफ़ छा गए। ख़ास कर यह गीत इतना ज़्यादा लोकप्रिय हो गया था कि फ़िल्मफ़ेयर पत्रिका ने आशा भोसले को उस साल के अवार्ड फ़ंकशन के लिए 'सिंगर ऒफ़ दि ईयर' चुन लिया। लेकिन दुखद बात यह हो गई कि आशा जी नय्यर साहब से कुछ इस क़दर ख़फ़ा हो गए कि वो ना केवल फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड लेने नहीं आईं, बल्कि इस फ़िल्म से यह गाना भी हटवा दिया जब कि गाना रेखा पर फ़िल्माया जा चुका था। फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड फ़ंकशन में नय्यर साहब ने आशा जी का पुरस्कार ग्रहण किया, और ऐसा कहा जाता है कि उस फ़ंकशन से लौटते वक़्त उस अवार्ड को गाड़ी से बाहर फेंक दिया और उसके टूटने की आवाज़ भी सुनी। कहने की आवश्यकता नहीं कि आशा और नय्यर के संगम का यह आख़िरी गाना था। समय का उपहास देखिए, इधर इतना सब कुछ हो गया, और उधर इस गीत में कैसे कैसे बोल थे, "आप ने जो है दिया वो तो किसी ने ना दिया", "काश ना आती आपकी जुदाई मौत ही आ जाती"। ऐसा लगा कि आशा जी नय्यर साहब के लिए ही ये बोल गा रही हैं। बहुत अफ़सोस होता है यह सोचकर कि इस ख़ूबसूरत संगीतमय जोड़ी का इस तरह से दुखद अंत हुआ। ख़ैर, सुनिए यह मास्टरपीस और सल्युट कीजिए ओ. पी. नय्यर की प्रतिभा को!

ओल्ड इस गोल्ड एक ऐसी शृंखला जिसने अंतरजाल पर ४०० शानदार एपिसोड पूरे कर एक नया रिकॉर्ड बनाया. हिंदी फिल्मों के ये सदाबहार ओल्ड गोल्ड नगमें जब भी रेडियो/ टेलीविज़न या फिर ओल्ड इस गोल्ड जैसे मंचों से आपके कानों तक पहुँचते हैं तो इनका जादू आपके दिलो जेहन पर चढ कर बोलने लगता है. आपका भी मन कर उठता है न कुछ गुनगुनाने को ?, कुछ लोग बाथरूम तक सीमित रह जाते हैं तो कुछ माईक उठा कर गाने की हिम्मत जुटा लेते हैं, गुजरे दिनों के उन महान फनकारों की कलात्मक ऊर्जा को स्वरांजली दे रहे हैं, आज के युग के कुछ अमेच्युर तो कुछ सधे हुए कलाकार. तो सुनिए आज का कवर संस्करण

गीत -चैन से हमको कभी...
कवर गायन - कुहू गुप्ता




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कुहू गुप्ता
कुहू गुप्ता पेशे से पुणे में कार्यरत एक सॉफ्टवेर एन्जिनेअर हैं लेकिन इनका संगीत के साथ लगाव बचपन से ही रहा है. कहा जा सकता है कि इन्हें भगवान ने एक मधुर आवाज़ से नवांजा है और इनकी कोशिश यही है कि अपनी गायकी को हर दिन बेहतर बनाती जाएँ. इन्होने हिन्दुस्तानी शाश्त्रीय संगीत कि शिक्षा ११ साल की उम्र से शुरू की और ४ साल तक सीखा. ज़ी टीवी के मशहूर प्रोग्राम सारेगामापा में ये २ बार अपनी गायकी दिखा चुकी हैं. इन्होने कुछ मूल रचनाएँ भी गई हैं, जिनमे से एक हिंद युग्म के काव्य नाद एल्बम का हिस्सा है और कुछ व्यावसायिक तौर पर इस्तेमाल हुई हैं. इनके गाये हुए हिन्दी फिल्मों के गानों के कवर्स आज कल इन्टरनेट डेक्कन रेडियो पर भी सुनाये जा रहे हैं. इन सब के साथ साथ ये स्टेज शोव्स भी करती हैं.


विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



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Saturday, April 24, 2010

सेन्शुअस गीतों को एक नयी परिभाषा दी ओ पी नय्यर साहब ने

ओल्ड इस गोल्ड /रिवाइवल # ०४

१९६८ में कमल मेहरा की बनायी फ़िल्म आयी थी 'क़िस्मत'। मनमोहन देसाई निर्देशित फ़िल्म 'क़िस्मत' की क़िस्मत बुलंद थी। फ़िल्म तो कामयाब रही ही, फ़िल्म के गीतों ने भी ख़ासा धूम मचाये। अपनी दूसरी फ़िल्मों की तरह इस फ़िल्म में भी ओ. पी. नय्यर ने यह सिद्ध किया कि ६० के दशक के अंत में भी वो नयी पीढ़ी के किसी भी लोकप्रिय संगीतकार को सीधी टक्कर दे सकते हैं। इस फ़िल्म का वह हास्य गीत तो आपको याद है न "कजरा मोहब्बतवाला", जिसमें शमशाद बेग़म ने विश्वजीत का प्लेबैक किया था! फ़िल्म की नायिका बबिता के लिये गीत गाये आशा भोसले ने। इस फ़िल्म में नय्यर साहब की सबसे ख़ास गायिका आशाजी ने कई अच्छे गीत गाये जिनमें से सबसे लोकप्रिय गीत आज हम इस महफ़िल के लिए चुन लाये हैं। तो चलिये हुज़ूर, देर किस बात की, आपको सितारों की सैर करवा लाते हैं आज! "आओ हुज़ूर तुमको सितारों में ले चलूँ, दिल झूम जाये ऐसी बहारों में ले चलूँ", यह एक पार्टी गीत है, जिसे नायिका शराब के नशे मे गाती हैं। और आपको पता ही है कि इस तरह के हिचकियाँ वाले नशीले गीतों को आशाजी किस तरह का अंजाम देती हैं। तो साहब, यह गीत भी उनकी गायिकी और अदायिगी से अमरत्व को प्राप्त हो चुका है। इस गीत में बबिता का मेक-अप कुछ इस तरह का था कि वो कुछ हद तक करिश्मा कपूर की ९० के दशक के दिनों की तरह लग रहीं थीं। इस फ़िल्म के सभी गीतों को एस. एच. बिहारी साहब ने लिखे थे सिवाय इस गीत के जिसे एक बहुत ही कमचर्चित गीतकार नूर देवासी ने लिखा था। दशकों बाद १९९४ में ओ.पी. नय्यर के संगीत से सजी एक फ़िल्म आयी थी 'ज़िद' जिसमें नूर देवासी साहब ने एक बार फिर उनके लिए गीत लिखे, जिसे मोहम्मद अज़िज़ ने गाया था "दर्द-ए-दिल की क्या है दवा"।

ओल्ड इस गोल्ड एक ऐसी शृंखला जिसने अंतरजाल पर ४०० शानदार एपिसोड पूरे कर एक नया रिकॉर्ड बनाया. हिंदी फिल्मों के ये सदाबहार ओल्ड गोल्ड नगमें जब भी रेडियो/ टेलीविज़न या फिर ओल्ड इस गोल्ड जैसे मंचों से आपके कानों तक पहुँचते हैं तो इनका जादू आपके दिलो जेहन पर चढ कर बोलने लगता है. आपका भी मन कर उठता है न कुछ गुनगुनाने को ?, कुछ लोग बाथरूम तक सीमित रह जाते हैं तो कुछ माईक उठा कर गाने की हिम्मत जुटा लेते हैं, गुजरे दिनों के उन महान फनकारों की कलात्मक ऊर्जा को स्वरांजली दे रहे हैं, आज के युग के कुछ अमेच्युर तो कुछ सधे हुए कलाकार. तो सुनिए आज का कवर संस्करण

गीत - आओ हुज़ूर तुमको
कवर गायन - कुहू गुप्ता




ये कवर संस्करण आपको कैसा लगा ? अपनी राय टिप्पणियों के माध्यम से हम तक और इस युवा कलाकार तक अवश्य पहुंचाएं


कुहू गुप्ता
कुहू गुप्ता पेशे से पुणे में कार्यरत एक सॉफ्टवेर एन्जिनेअर हैं लेकिन इनका संगीत के साथ लगाव बचपन से ही रहा है. कहा जा सकता है कि इन्हें भगवान ने एक मधुर आवाज़ से नवांजा है और इनकी कोशिश यही है कि अपनी गायकी को हर दिन बेहतर बनाती जाएँ. इन्होने हिन्दुस्तानी शाश्त्रीय संगीत कि शिक्षा ११ साल की उम्र से शुरू की और ४ साल तक सीखा. ज़ी टीवी के मशहूर प्रोग्राम सारेगामापा में ये २ बार अपनी गायकी दिखा चुकी हैं. इन्होने कुछ मूल रचनाएँ भी गई हैं, जिनमे से एक हिंद युग्म के काव्य नाद एल्बम का हिस्सा है और कुछ व्यावसायिक तौर पर इस्तेमाल हुई हैं. इनके गाये हुए हिन्दी फिल्मों के गानों के कवर्स आज कल इन्टरनेट डेक्कन रेडियो पर भी सुनाये जा रहे हैं. इन सब के साथ साथ ये स्टेज शोव्स भी करती हैं.


विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड के ४०० शानदार एपिसोड आप सब के सहयोग और निरंतर मिलती प्रेरणा से संभव हुए. इस लंबे सफर में कुछ साथी व्यस्तता के चलते कभी साथ नहीं चल पाए तो कुछ हमसे जुड़े बहुत आगे चलकर. इन दिनों हम इन्हीं बीते ४०० एपिसोडों के कुछ चर्चित अंश आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं इस रीवायिवल सीरीस में, ताकि आप सब जो किन्हीं कारणों वश इस आयोजन के कुछ अंश मिस कर गए वो इस मिनी केप्सूल में उनका आनंद उठा सकें. नयी कड़ियों के साथ हम जल्द ही वापस लौटेंगें

Sunday, January 24, 2010

आप यूं ही अगर हमसे मिलते रहें....देखिये आपको भी 'ओल्ड इस गोल्ड' से प्यार हो जायेगा

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 324/2010/24

'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर इन दिनों आप सुन रहे हैं इंदु जी के पसंद के गीतों को। कुल पाँच में से तीन गानें हम पिछले तीन कड़ियों में सुन चुके हैं। आज है चौथे गीत की बारी। मोहम्मद रफ़ी और आशा भोसले की आवाज़ों में यह है फ़िल्म 'एक मुसाफ़िर एक हसीना' का एक बड़ा ही ज़बरदस्त और सुपरहिट डुएट "आप युं ही अगर हमसे मिलते रहे, देखिए एक दिन प्यार हो जाएगा"। "मस्त, प्यारा सा खूबसूरत गीत जिस के बिना कोई पिकनिक, कोई प्रोग्राम पूरा नही होता। साधना की मासूमियत भरा सौन्दर्य, प्यार के इजहार का खूबसूरत अंदाज, मधुर संगीत, सब ने मिल कर एक ऐसा गीत दिया है जिसे आप किसी भी कार्यक्रम में गा कर समा बांध सकते हैं और इंदु पुरी का मतलब ही...समा बंध जाना, महफिल की जान।" बहुत सही कहा इंदु जी, आपने। आप के पसंद पर यह गीत आज इस महफ़िल में ऐसा समा बांधेगा कि लोग कह उठेंगे कि भई वाह! क्या पसंद है! साधना और जॊय मुखर्जी पर फ़िल्माया यह गीत कश्मीर की ख़ूबसूरत वादियों में पिक्चराइज़ हुआ था। इस फ़िल्म की चर्चा तो हम पहले कर चुके हैं इस महफ़िल में, तो क्यों ना आज इस गीत के संगीतकार ओ. पी. नय्यर साहब की कुछ बातें कर ली जाए! क्योंकि आज का गीत बड़ा रोमांटिक सा है, और नय्यर साहब के खयालात भी उतने ही रोमांटिक थे, तो क्यों ना आज इसी गीत के बहाने उनके शख्सियत के उस पक्ष को थोड़ा जानने की कोशिश करें जो उन्होने विविध भारती पर 'दास्तान-ए-नय्यर' शृंखला में अहमद वसी, कमल शर्मा और यूनुस ख़ान को कहे थे।

अहमद वसी: वक़्त चलता हुआ, चलता हुआ, कभी ना कभी आपको इस उमर पे लाता होगा जहाँ यह गुज़रा हुआ ज़माना जो है, ये गरदिशें जो हैं, ये अक्सर परछाइयाँ बन के चलती रहती हैं। तो क्या आप समझते हैं कि जो वक़्त गुज़रा वो बड़ा सुनहरा वक़्त था?

ओ. पी. नय्यर: वसी साहब, एक तो मैंने आप से अर्ज़ की कि मेरी ज़िंदगी का 'aim and inspiration have been an woman'. अगर उसके अंदर ७०% स्वीट मिली है तो बाक़ी के ३०% अगर मिर्ची भी लगी है तो ३०% मिर्ची में क्यों चिल्लाते हो बेटा, 'you have enjoyed your life, I have loved you, what else do you want'

यूनुस ख़ान: नय्यर साहब, जब आपकी युवावस्था के दिन थे, जब आप कुछ करना चाह रहे थे, तो आपके अंदर का एक अकेलापन ज़रूर रहा होगा आपकी जवानी के दिनों में।

नय्यर: मैं बार बार कई दफ़ा बता चुका हूँ कि मैं सड़कों पे अकेला रोया करता था 'alone in the nights and for no reason'। एक दफ़ा तो हमको मार पड़ी, मैंने बोला हम आपके बेटे ही नहीं हैं, मेरे माँ बाप तो कोई और हैं। बहुत पिटाई हुई, 'But they could not understand the loneliness in me'। हमने धोखा खाया तो पुरुषों से खाया है, औरतों ने धोखा नही दिया है। मेरी ज़िंदगी में कई औरतें रहीं जिनके साथ बड़ा मेरा दिल खोल के बात होती थी, और वो 'this was about when I was 19 years old'। लाहोर में। मैंने उसको २१.५ बरस तक छोड़ा। बड़े हसीन दिन थे वो, क्योंकि एक तो मुझे लाहोर शहर पसंद था, और मेरी जो 'romantic life' शुरु हुई वो लाहोर से हुई।

कमल शर्मा: आपकी जो शादी थी वो अरेन्ज्ड थी या...

नय्यर: 'that was a love marriage'।

यूनुस: नय्यर साहब, बात लाहोर की चल रही थी, आप ने कहा आपकी 'romantic life' वहाँ से शुरु हुई, किस तरह से आप मिलते थे और किस तरह से अपनी बातें करते थे?

नय्यर: यूनुस साहब, पब्लिक में थोड़े मिलेंगे! हम तो कोना ढ़ूंढते थे कि अलग जगह बैठ के बातें करने का मौका मिले। या उसी लड़की के घर ही चले जाते थे।

यूनुस: आप ने कभी किसी को प्रेम पत्र लिखा?

नय्यर: कमाल है कि मेरे पास चिट्ठियाँ रहीं, पर मैं चिट्ठियाँ लिखने के लिए 'I feel bored'. जो कुछ कहना था अपने ज़बान से कह दिया जी।


दोस्तों, बिल्कुल इसी गीत की तरह कि जो कुछ कहना था ज़बान से ही कह दिया कि "आप युं ही अगर हमसे मिलते रहे, देखिए एक दिन प्यार हो जाएगा"। पेश-ए-ख़िदमत है आशा-रफ़ी की आवाज़ों में राजा मेहंदी अली ख़ान की गीत रचना।



चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम रोज आपको देंगें ४ पंक्तियाँ और हर पंक्ति में कोई एक शब्द होगा जो होगा आपका सूत्र. यानी कुल चार शब्द आपको मिलेंगें जो अगले गीत के किसी एक अंतरे में इस्तेमाल हुए होंगें, जो शब्द बोल्ड दिख रहे हैं वो आपके सूत्र हैं बाकी शब्द बची हुई पंक्तियों में से चुनकर आपने पहेली सुलझानी है, और बूझना है वो अगला गीत. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

कितनी हसीं है ये दुनिया,
तेरा कूचा नहीं ये जन्नत है,
ये गली जो तेरे दर से आ रही है,
यहीं मिट जाऊं सादगी में,यही आरज़ू है ...

अतिरिक्त सूत्र -रफ़ी साहब की मधुर रूमानी आवाज़ में है ये गीत

पिछली पहेली का परिणाम-
हा हा हा ...कल कुछ व्यस्तता के चलते सूत्र गढना समय से नहीं हो पाया...खैर शरद जी आपने एकदम सही गीत चुना, बधाई २ अंकों के लिए...

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Tuesday, December 22, 2009

यही वो जगह है, यही वो फिजायें....किसी की यादों में खोयी आशा की दर्द भरी सदा

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 298

रद तैलंग जी के पसंद के ज़रिए आज बहुत दिनों के बाद हम लेकर आए हैं आशा भोसले और ओ. पी. नय्यर साहब की जोड़ी का एक और सदाबहार नग़मा। फ़िल्म 'ये रात फिर ना आएगी' का यह गीत "यही वो जगह है, ये ही वो फ़िज़ाएँ" इस जोड़ी का एक बहुत ही महत्वपूर्ण गीत है। बीती पुरानी यादों को उसी जगह पे जा कर फिर से एक बार जी लेने की बातें हैं इस गीत में। एस. एच. बिहारी साहब ने ऐसे जज़्बाती बोल लिखे हैं कि सुन कर दिल भर आता है। इस गीत के साथ हर कोई अपने आप को कनेक्ट कर सकता है। ख़ास कर वो लोग तो ज़रूर महसूस कर पाएँगे जो कभी अपने घर से दूर किसी जगह पर जा कर रहे होंगे और वहाँ पर कई रिश्ते भी बनाएँ होंगे, दोस्त बनाए होंगे, प्यार पाया होगा। और फिर जब उस जगह को छोड़ कर चले जाना पड़ा तो बस यादें ही साथ में वापस गईं। और फिर कई बरस बाद जब उसी जगह पर वापस लौटे तो सब कुछ बदला हुआ सा पाया। अगर कुछ वैसे का वैसा था तो बस दिल में उन बीते दिनों की यादें। "यही पर मेरा हाथ में हाथ लेकर कभी ना बिछड़ने का वादा किया था, सदा के लिए हो गए हम तुम्हारे गले से लगा कर हमें ये कहा था, कभी कम ना होंगी हमारी वफ़ाएँ, यही पर कभी आप हमसे मिले थे"। नय्यर साहब के अनुसार किसी गीत की कामयाबी में ५०% श्रेय गीतकार का होता है, २५% संगीतकार का, और बाकी के २५% में शामिल है गायक और साज़िंदे। इस गीत के बोलों को सुन हम अंदाज़ा लगा सकते हैं कि इस बात में कितनी सच्चाई है।

दोस्तों, इस गीत में सैक्सोफ़ोन मुख्य साज़ के तौर पर इस्तेमाल किया गया है, और आपको पता है इस साज़ को इस गीत में किन्होने बजाया था? वो हैं जानेमाने सैक्सोफ़ोन वादक मनोहारी सिंह। मनोहारी दा ने तमाम संगीतकारों के साथ काम किया है और बहुत सारे हिट गीतों में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। आज बात करते है मनोहारी दा और नय्यर साहब के साथ की। प्रस्तुत गीत के अलावा नय्यर साहब के जिस गीत में उन्होने इस साज़ को मुख्य रूप से बजाया था वह गीत है "है दुनिया उसी की ज़माना उसी का", फ़िल्म 'कश्मीर की कली' में। मनोहारी दा का कहना है कि नय्यर साहब का एक यूनिक स्टाइल है और उनका संगीत बड़ा ही जोशीला हुआ करता था। अगर उन्हे लगा कि टेक ओ.के. है तो किसी की क्या मजाल जो एक और टेक लेने की बात करे! फ़िल्म 'एक बार मुस्कुरा दो' में भी "कितने अटल थे तेरे इरादे" गीत में मनोहारी दा ने सैक्सोफ़ोन बजाया था। फ़िल्म 'ये रात फिर ना आएगी' का यह गीत सैक्सोफ़ोन पर मनोहारी दा ने सन्‍ १९६२ में दिल्ली के उस डिफ़ेन्स शो में बजाया था जिस शो में लता जी ने "ऐ मेरे वतन के लोगों" गाया था, और जिस शो में पंडित नेहरु शामिल थे। मनोहारी दा ने "ऐ मेरे वतन के लोगों" में मेटल फ़्ल्युट बजाया था। इस गीत के बाद वो पीछे बैठे हुए थे। उन्हे नहीं मालूम था कि इस शो में आशा जी 'यही वो जगह है" गाने वाली हैं। तो जब आशा जी इस गीत को गाना शुरु किया तो मनोहारी दा अपने आप को रोक नहीं सके और सैक्सोफ़ोन हाथ में लेकर स्टेज पर चले आए और सही वक्त पर बजाना शुरु किया जैसे कि गीत में बजता है। जनता ख़ुशी से पागल हो गई। वापस लौटने पर जब आशा जी ने यह क़िस्सा नय्यर साहब को बताया, तो नय्यर साहब ने एक १०० रुपय का नोट निकाल कर मनोहारी दा के हाथ में थमा दिया। दोस्तों, यह एक यादगार क़िस्सा था लेकिन मुझे इसमें कुछ संशय है। 'ये रात फिर न आएगी' रिलीज़ हुई थी १९६५ में और वह शो हुआ था १९६२ में। तो फिर यह गीत ३ साल पहले कैसे गाया गया होगा उस शो में? ख़ैर जो भी है, नय्यर साहब ने 'दास्तान-ए-नय्यर' शृंखला में इस गीत के बारे में कहा था यह धुन उन्होने मसूरी में बनाई थी। और आश्चर्य की बात देखिए, इस गीत से भी वही पहाड़ी रंग छलकता है। तो आइए, बीते दिनों की यादों में खो जाते हैं आशा भोसले के गाए हुए इस गीत के साथ।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (अब तक के चार गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी (दो बार), स्वप्न मंजूषा जी, पूर्वी एस जी और पराग सांकला जी)"गेस्ट होस्ट".अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. भारतीय शास्त्रीय संगीत के एक बड़े स्तंभ कहे जा सकते हैं ये महान संगीतकार जिन्होंने रचा इस गीत को.
२. शैलेन्द्र है गीतकार.
३. मुखड़े की पहली पंक्ति में शब्द है -"दिन".

पिछली पहेली का परिणाम -
जी बिलकुल आप सही कह रही हैं, शायद आशा जी को सम्मान इस गीत के लिए नहीं मिला था, पर जवाब आपका एकदम सही है, अब बस आप एक कदम दूर हैं मंजिल से, अवध जी ने सही कहा, हमें आपकी पसंद के गीतसुनना बहुत अच्छा लगेगा

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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