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Thursday, October 11, 2012

मैंने देखी पहली फिल्म : पत्रकार कवि निखिल आनंद गिरी


मैंने देखी पहली फिल्म

भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष में ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ द्वारा आयोजित विशेष अनुष्ठान- ‘स्मृतियों के झरोखे से’ में आप सभी सिनेमा प्रेमियों का हार्दिक स्वागत है। आज माह का दूसरा गुरुवार है और आज बारी है- ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ की। इस द्विसाप्ताहिक स्तम्भ के पिछले अंक में आपने हमारे संचालक मण्डल के सदस्य अनुराग शर्मा की देखी पहली दो फिल्मों ‘गीत’ और ‘पुष्पांजलि’ के गैरप्रतियोगी संस्मरण के साझीदार रहे। आज निखिल आनन्द गिरि अपनी देखी कुछ ऐसी फिल्मों का जिक्र कर रहे हैं जिन्होने उनके मन पर गहरा प्रभाव छोड़ा। यह प्रतियोगी वर्ग की प्रविष्टि है।



मेरा बचपन बिहार (और झारखण्ड) के अलग-अलग कस्बों में बीता। पिताजी पुलिस अधिकारी रहे हैं तो अलग-अलग थानों में तबादले होते रहे और हम उनके साथ घूमते रहे। इन्हीं में से किसी इलाके में पहली फिल्म देखी होगी, मगर मुझे ठीक से याद नहीं। हाँ, फिल्म देखने जाने के कई खट्टे-मीठे अनुभव याद हैं, जिन्हें बताना पहला अनुभव जानने से कम ज़रूरी नहीं। क्योंकि सिनेमा के सौ साल का सफर उन्हीं सिनेमाघरों में हम और आप जैसे तमाम दर्शकों के होते हुए गुज़रा है।  

मैं शायद छह या सात साल का रहा होऊंगा जब पिताजी के किसी 'इलाके' में 'सूरज' फिल्म लगी थी। हमारे परिवार के लिए फिल्म देखने का मतलब ये होता था कि टिकट पिताजी से लें। मतलब, एक सादी पर्ची (पान के साथ चूना दिये जाने जैसी) पर पिता जी कुछ लिख भर देते थे और हम आराम से हॉल में जाते और हॉल का मैनेजर पर्ची देखते ही पूरे 'सम्मान' से सीट देकर हमें फिल्म देखने देता। मैं तब न तो फिल्म समझता था, न फिल्म देखने के लिए फिल्म देखने जाता था। घर में सबसे छोटा था, तो जो सब करते वही करना ही होता था। ऐसे ही पर्चियों वाली हमने कई फिल्में देखीं। गाइड, मर्दों वाली बात, गंगा-जमुना, गंगा किनारे मोरा गाँव और फिर बाद में मोहरा तक। ये सब वैसे ही पर्ची लिखा-लिखा कर सीधा हॉल में प्रवेश करने वाली फिल्में थीं। हमारी तरफ भोजपुरी फिल्में ख़ूब लगती थीं, और उन फिल्मों के बारे में जानने के लिए हमें किसी ब्लॉग, रिसर्च पेपर या समीक्षा नहीं देखनी पड़ती थी। गाँव भर की बुआ, चाची, दीदी को हर फिल्म में नाम के साथ सब कुछ याद रहता था। भोजपुरी स्टार कुणाल सिंह हमारे बचपन के महानायक थे। वो जितेंद्र से मिलते-जुलते लगते थे तो मुझे जितेंद्र की फिल्में भी अच्छी लगती थीं। लखीसराय का अनुभव सबसे यादगार था, जहाँ एक बार पिक्चर शुरू हो गई और हम बाहर से एक बेंच लाए और फिर पिक्चर देखने बैठे।

तब हमारे घर टीवी नहीं हुआ करता था। रविवार को चार बजे शाम में फिल्म आती थी और हम देखने के लिए पड़ोस में जाते थे। ऐसे देखी गई पहली फिल्मों में से थी 'एक चादर मैली सी', 'एक दिन अचानक' और 'पार्टी'। आप समझ सकते हैं कि 'गंगा किनारे मोरा गाँव' तक से 'पार्टी' तक एक ही बचपन में देखने से सिनेमा कितनी गहराई से भीतर घुस रहा था।

जब राँची में स्कूल के दोस्तों के साथ पहली बार टिकट के पैसे चुकाकर फिल्म देखनी पड़ी तो लगा जैसे कोई गुनाह कर रहे हैं। तब तक 'पुलिसिया पहचान के नाम पर फिल्म देखना बुरा है', समझ आने लगा था। तब शायद पहली देखी फिल्म 'गॉडजिला' थी। बाद में एनाकान्डा, मोहब्बतें, गदर वगैरह-वगैरह। फिर जमशेदपुर गए तो वहाँ बैचलर लाइफ शुरु हुई। एक दोस्त ने पहली बार सुबह वाला 'शो' दिखाया। फिर तो सिनेमा आदत बन गया। हर नई रिलीज़ देखना ही देखना था। जमशेदपुर के बसन्त टॉकीज़ (जो अब नहीं रहा) में पाँच रुपये और ग्यारह रुपये के टिकट हुआ करते थे। पाँच रुपये की टिकट के हिसाब से साल में सौ शो देखने के भी लगभग पाँच सौ रुपये ही खर्च होते थे। इसीलिए सभी 'तरह' की फिल्में अफॉर्ड हो जाती थीं। कला के लिए जागरुक शहर जमशेदपुर में फिल्म महोत्सवों का चस्का लगा, जो अब तक कायम है।

फिर, दिल्ली आए तो पहली फिल्म देखी 'ओंकारा'। जामिया से नेहरु प्लेस तक पैदल चलकर तीस रुपये की टिकट पर। फिर एक महिला-मित्र के साथ मॉल गए, कोई फालतू सी फिल्म देखने। इतना महँगा पड़ा कि साथ देखने से जी भर गया। जमशेदपुर और बचपन बहुत याद आया। फिर देखा कि उन्हीं फिल्मों के 12 बजे से पहले वाले शो सस्ते होते हैं। तो आज तक दिल्ली में सुबह जल्दी उठने का सिर्फ यही मकसद होता है। कभी-कभी जान-बूझ कर देर से उठता हूँ, जब किसी ख़ास के साथ पिक्चर हॉल जाना हो और पॉपकॉर्न खाते हुए पिक्चर देखनी हो।

निखिल जी ने अपने संस्मरण में जिन दो आरम्भिक फिल्मों- सूरज और गाइड का उल्लेख किया है। आपको हम इन दोनों फिल्मों से गीत सुनवा रहे हैं।

फिल्म सूरज : ‘बहारों फूल बरसाओ...’ : मुहम्मद रफी : संगीत – शंकर-जयकिशन



फिल्म गाइड : ‘पिया तोसे नैना लागे रे...’ : लता मंगेशकर : संगीत – सचिनदेव बर्मन



आपको निखिल जी का संस्मरण कैसा लगा? हमें अवश्य लिखिएगा। आप अपनी प्रतिक्रिया radioplaybackindia@live.com पर भेज सकते हैं। आप भी हमारे इस आयोजन- ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ में भाग ले सकते हैं। आपका संस्मरण हम रेडियो प्लेबैक इण्डिया के इस अनुष्ठान में सम्मिलित तो करेंगे ही, यदि हमारे निर्णायकों को पसन्द आया तो हम आपको पुरस्कृत भी करेंगे। आज ही अपना आलेख और एक चित्र हमे radioplaybackindia@live.com पर मेल करें। जिन्होने आलेख पहले भेजा है, उन प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपना एक चित्र भी भेज दें।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 



'मैंने देखी पहली फिल्म' : आपके लिए एक रोचक प्रतियोगिता
दोस्तों, भारतीय सिनेमा अपने उदगम के 100 वर्ष पूरा करने जा रहा है। फ़िल्में हमारे जीवन में बेहद खास महत्त्व रखती हैं, शायद ही हम में से कोई अपनी पहली देखी हुई फिल्म को भूल सकता है। वो पहली बार थियेटर जाना, वो संगी-साथी, वो सुरीले लम्हें। आपकी इन्हीं सब यादों को हम समेटेगें एक प्रतियोगिता के माध्यम से। 100 से 500 शब्दों में लिख भेजिए अपनी पहली देखी फिल्म का अनुभव radioplaybackindia@live.com पर। मेल के शीर्षक में लिखियेगा ‘मैंने देखी पहली फिल्म’। सर्वश्रेष्ठ तीन आलेखों को 500 रूपए मूल्य की पुस्तकें पुरस्कारस्वरुप प्रदान की जायेगीं। तो देर किस बात की, यादों की खिड़कियों को खोलिए, कीबोर्ड पर उँगलियाँ जमाइए और लिख डालिए अपनी देखी हुई पहली फिल्म का दिलचस्प अनुभव। प्रतियोगिता में आलेख भेजने की अन्तिम तिथि 31अक्टूबर, 2012 है।

Sunday, October 11, 2009

कलम, आज उनकी जय बोल कविता की संगीतमयी प्रस्तुति

गीतकास्ट प्रतियोगिता- परिणाम-5: कलम, आज उनकी जय बोल

मई 2009 में जब गीतकास्ट प्रतियोगिता की शुरूआत हुई थी, तब हमने आदित्य प्रकाश के साथ मिलकर इतना ही तय किया था कि हम छायावादी युगीन कवियों की कविताओं को संगीतबद्ध करने की प्रतियोगिता रखेंगे। आरम्भ की दो कड़ियों की सफलता के बाद हमने यह तय किया कि गीतकास्ट प्रतियोगिता में प्रमुख राष्ट्रकवियों की कविताओं को भी शामिल किया जाय। कमल किशोर सिंह जैसे सहयोगियों की मदद से हमने राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की कविता 'कलम, आज उनकी जय बोल' से गीतकास्ट प्रतियोगिता की 'राष्ट्रकवि शृंखला' की शुरूआत भी कर दी।

आज हम पाँचवीं गीतकास्ट प्रतियोगिता के परिणाम लेकर उपस्थित हैं। पिछले महीने राष्ट्रकवि दिनकर की जयंती थी, इसलिए हमने उनके सम्मान में उनकी कविता को स्वरबद्ध करने की प्रतियोगिता रखी। इस प्रतियोगिता में कुल सात प्रतिभागियों ने भाग लिया। संख्या के हिसाब से यह प्रतिभागिता तो कम है, लेकिन गुणवत्ता के हिसाब से यह बहुत बढ़िया है। सजीव सारथी, अनुराग पाण्डेय, शैलेश भारतवासी और आदित्य प्रकाश ने निर्णायक की भूमिका निभाई और तीसरी बार श्रीनिवास पंडा की प्रविष्टि को ही प्रथम चुना है।

इस बार से इनाम की राशि रु 4000 से बढ़ाकर रु 7000 की गई है।

इससे पहले की हम प्रविष्टियों के बारे में बात करें, हम श्रीनिवास की तारीफ़ कर लेना चाहेंगे। श्रीनिवास के रूप हिन्दी साहित्य-जगत और संगीत-जगत को एक बड़ा सितारा मिला है। श्रीनिवास कविता के भावों को पकड‌़ते हैं, समझते हैं और उसी के हिसाब संगीत देते हैं और गायक चुनते हैं। हम उम्मीद करते हैं कि श्रीनिवास निकट भविष्य में हिन्दी संगीत जगत को बहुत कुछ देंगे।


श्रीनिवास / प्रदीप सोमसुंदरन / निखिल आनंद गिरि
श्रीनिवास
प्रदीप
निखिल
संगीतकार श्रीनिवास पांडा ने इस बार एक स्टार गायक को इस आयोजन से जोड़ा है। उस गायक का नाम है प्रदीप सोमसुंदरन। जो लोग टीवी पर म्यूजिकल शो देखने के शौक़ीन हैं, उन्होंने भारतीय टेलीविजन पर पहले सांगैतिक आयोजन 'मेरी आवाज़ सुनो' को ज़रूर देखा होगा। प्रदीप सोमसुंदरन को इसी कार्यक्रम में सन 1996 में सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायक चुना गया था और लता मंगेशकर सम्मान से सम्मानित किया गया था। 26 जनवरी 1967 को नेल्लूवया, नेल्लूर, केरल में जन्मे प्रदीप पेशे से इलेक्ट्रानिक के प्राध्यापक हैं। त्रिचुर की श्रीमती गीता रानी से 12 वर्ष की अवस्था में ही प्रदीप ने कर्नाटक-संगीत की शिक्षा लेना शुरू कर दी थी और 16 वर्ष की अवस्था में स्टेज-परफॉर्मेन्स देने लेगे थे। प्रदीप कनार्टक शास्त्रीय गायन के अतिरिक्त हिन्दी, मलयालम, तमिल, तेलगू, अंग्रेज़ी और जापानी आदि भाषाओं में ग़ज़लें और भजन गाते हैं। इन्होंने कई मलयालम फिल्मी गीतों में अपनी आवाज़ दी है। और गैर मलयालम फिल्मी तथा गैर हिन्दी फिल्मी गीतों में ये काफी चर्चित रहे हैं। वस्तुतः इनका परिचय और इनकी उपलब्धियाँ इतनी अधिक हैं कि यह परिणाम फिर केवल उन्हीं की चर्चा बनकर ही रह जायेगा। जो श्रोता प्रदीप के बारे में अधिक जानने को इच्छुक हैं वे प्रदीप के वीकिपीडिया पृष्ठ और इनकी निजी वेबसाइट देखें।

इस गीत में शुरूआती उद्‍घोष में आवाज़ हिन्द-युग्म के मशहूर वाहक निखिल आनंद गिरि की है। निखिल की आवाज़ के हिन्द-युग्म के सभी श्रोता कायल हैं। हमारे सभी ज़िंगलों में इनकी ही आवाज़ गूँजती है। मन से कवि हैं, लेकिन इन दिनों रोज़ी-रोटी के लिए ज़ी (यूपी) चैनल की नौकरी कर रहे हैं। हिन्द-युग्म के बैठक-मंच के संपादक है।

मूलरूप से तेलगू और उड़िया गीतों में संगीत देने वाले श्रीनिवास पांडा का एक उड़िया एल्बम 'नुआ पीढ़ी' रीलिज हो चुका है। इन दिनों हैदराबाद में हैं और अमेरिकन बैंक में कार्यरत हैं। गीतकास्ट में लगातार तीन बार विजेता रह चुके हैं।

पुरस्कार- प्रथम पुरस्कार, रु 4000 का नग़द पुरस्कार

विशेष- अमेरिका के एफएम चैनल रेडियो सलाम नमस्ते के कार्यक्रम में आदित्य प्रकाश से इस गीत पर सीधी बात।

गीत सुनें-


दूसरे स्थान के विजता एक बार फिर से कृष्ण राज कुमार हैं।


कृष्ण राज कुमार

कृष्ण राज कुमार एक मात्र ऐसे संगीतकार-गायक हैं, जिन्होंने पाँचों दफ़ा इस प्रतियोगिता में भाग लिया। और इन्होंने मात्र भाग ही नहीं लिया, बल्कि पाँचों बार हमारे निर्णायकों का ध्यान आकृष्ट किया। जयशंकर प्रसाद की कविता 'अरुण यह मधुमय देश हमारा' के लिए प्रथम पुरस्कार, सुमित्रा नंदन पंत की कविता 'प्रथम रश्मि' के लिए द्वितीय पुरस्कार, महादेवी वर्मा के लिए भी प्रथम पुरस्कार। निराला की कविता 'स्नेह निर्झर बह गया है' के लिए भी इनकी प्रविष्टि उल्लेखनीय थी। और इस बार द्वितीय पुरस्कार। कृष्ण राज कुमार जो मात्र 22 वर्ष के हैं, और जिन्होंने अभी-अभी अपने B.Tech की पढ़ाई पूरी की है, पिछले 14 सालों से कर्नाटक गायन की दीक्षा ले रहे हैं। इन्होंने हिन्द-युग्म के दूसरे सत्र के संगीतबद्धों गीतों में से एक गीत 'राहतें सारी' को संगीतबद्ध भी किया है। ये कोच्चि (केरल) के रहने वाले हैं। जब ये दसवीं में पढ़ रहे थे तभी से इनमें संगीतबद्ध करने का शौक जगा।

पुरस्कार- द्वितीय पुरस्कार, रु 1500 का नग़द पुरस्कार

विशेष- डैलास, अमेरिका के एफएम चैनल रेडियो सलाम नमस्ते के कार्यक्रम में आदित्य प्रकाश से इस गीत पर सीधी बात।

गीत सुनें-



हमने इस बार तृतीय स्थान के किसी को भी विजेता न घोषित कर तीन प्रविष्टियों को रु 500- रु 500 के सांत्वना पुरस्कार दे रहे हैं।


सुकून बैंड
यह दो युवाओं सौरभ मल्होत्रा और भरत हंस का सांगैतिक बैंड है, इनमें बहुत जोश है। हम उम्मीद करते हैं कि भविष्य में इनसे बेहतर कम्पोजिशन मिलेंगे।

पुरस्कार- सांत्वना पुरस्कार, रु 500 का नग़द पुरस्कार

गीत सुनें-


शरद तैलंग

शरद तैलंग महादेवी वर्मा की कविता को संगीतबद्ध कर चुके हैं और तीसरे स्थान के विजेता रहे हैं। इस बार भी इनकी प्रविष्टि उल्लेखनीय रही।

पुरस्कार- सांत्वना पुरस्कार, रु 500 का नग़द पुरस्कार

गीत सुनें-


मधुबाला श्रीवास्तव

मधुबाला नई गायिका हैं। इनके बारे में अधिक जानकारी हमारे पास उपलब्ध नहीं है।

पुरस्कार- सांत्वना पुरस्कार, रु 500 का नग़द पुरस्कार

गीत सुनें-



इनके अतिरिक्त हम सखी सिंह और ब्रजेश दाधीच के भी आभारी है, जिन्होंने इसमें भाग लेकर हमारा प्रोत्साहन किया और इस प्रतियोगिता को सफल बनाया। हमारा मानना है कि यदि आप इन महाकवियों की कविताओं को यथाशक्ति गाते हैं, पढ़ते हैं या संगीतबद्ध करते हैं तो आपका यह छोटा प्रयास एक सच्ची श्रद्धाँजलि बन जाता है और एक महाप्रयास के द्वार खोलता है। हम निवेदन करेंगे कि आप इसी ऊर्जा के साथ गीतकास्ट के अन्य अंक में भी भाग लेते रहें।


इस कड़ी के प्रायोजक है रिवरहेड, न्यूयार्क के कमल किशोर सिंह हैं। पेशे से डॉक्टर हैं। हिन्दी तथा भोजपुरी में कविताएँ लिखते हैं। आवाज़ की गीतकास्ट प्रतियोगिता में हर बार ज़रूर भाग लेते हैं। यदि आप भी इस आयोजन को स्पॉनसर करता चाहते हैं तो hindyugm@gmail.com पर सम्पर्क करें।








Thursday, August 20, 2009

प्यार में आता नहीं उसको गुंजाइशें करना- हुमैरा रहमान

सुनिए मशहूर ऊर्दू शायरा हुमैरा रहमान का साक्षात्कार

हम समय-समय पर कला, साहित्य और संस्कृति जगत की हस्तियों से आपको रूबरु करवाते रहते हैं। आज मिलिए प्रसिद्ध ऊर्दू शायरा हुमैरा रहमान से, जिनका नाम परवीन शाक़िर की परम्परा को आगे बढ़ाने के तौर पर भी लिया जाता है। हुमैरा रहमान जब दिल्ली में हुए एक अंतर्राष्ट्रीय मुशायरा 'जश्न-ए-बहारा' में भाग लेने भारत आई थीं तो हमारे साथी निखिल आनंद गिरि ने उनसे मुलाक़ात की और इंटरनेट की दुनिया का परिचय दिया। हुमैरा ने पूरे एक घंटे तक कविता (ग़ज़ल), हिन्दुस्तान-पाकिस्तान-अमेरिका, रिश्ते, शिक्षा, राजनीति और अपनी पसंद-नापसंद, अपने बचपन पर खुलकर बात की। कुछ ग़ज़लें भी कहीं, कुछ सलाहें भी दी। सुनिए और बताइए कि आपको यह साक्षात्कार कैसा लगा?




हुमैरा रहमान

हुमैरा रहमान ऊर्दू शायरी का एक चर्चित नाम है और एक अंतर्राष्ट्रीय चेहरा है। हुमैरा की बचपन से ही साहित्य में रुचि थी। स्नातक की पढ़ाई करने के दरम्यान गवर्नमेंट कॉलेज ऑफ मुल्तान (पाकिस्तान) के स्टूडेंट यूनियन की ये महासचिव रहीं। कॉलेज के दिनों से ही ये ग़ज़लपाठ, कार्यक्रम-प्रबंधन से जुड़ी रहीं। कॉलेज से पहले के दिनों में (1969-70) इन्होंने महिलाओं के लिए 'बज़्म-ए-हरीम-ए-फ़न' नामक साहित्यिक संस्था का गठन किया और इसकी महासचिव रहीं। आगे इनका जुड़ाव रेडियो पाकिस्तान, कराची (1971-76) से हुआ, जहाँ इन्होंने रेडियो उद्‍घोषक और ड्रामा कलाकार के तौर पर अपनी सेवाएँ दीं। हुमैरा का नाम पाकिस्तान की शुरू के तीन महिला उद्‍घोषकों में भी लिया जाता है। सन 1977 में ये बीबीसी, लंदन से जुड़ गयीं, जहाँ इन्होंने एनांउसर, स्क्रिप्ट लेखक के तौर पर काम किया (1988 तक)।

बाद में यह न्यूयॉर्क चली आयीं जहाँ 1990 में न्यूयॉर्क स्थित यॉन्कर्स पब्लिक लाइबरेरी में ये मॉडरेटर हो गईं और पाकिस्तान की सांस्कृतिक विरासत को दुनिया की नज़र करने के लिए अनेक प्रोग्रेम किये। 1999 में न्यूयॉर्क की एशिया सोशायटी के लिए भी मॉडरेटर का काम किया। 2000-2002 तक इन्होंने वेस्टचेस्टर मुस्लिम सेंटर, न्यूयॉर्क में ऊर्दू भाषा अध्यापन का काम किया। पिछले 1 साल से न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय में ऊर्दू भाषा की संयुक्त प्रशिक्षक के तौर पर काम कर रही हैं।

दुनिया भर के लगभग सभी नामी मुशायरों में हुमैरा रहमान काव्यपाठ कर चुकी हैं। देश-विदेश के रेडियो और टीवी कार्यक्रमों में अपनी ग़ज़लों के हवाले से लोगों के दिलों में अपना विशेष स्थान बना चुकीं हुमैरा की तीन पुस्तकें 'ज़ख़्म ज़ख़्म उजाला'(संपादन), 'इंदेमाल', 'इंतेसाब' भी प्रकाशित हैं।

Thursday, January 8, 2009

कुछ यूँ दिये निदा फ़ाज़ली ने जवाब

निदा फ़ाज़ली की ही आवाज़ में सुनिए हिन्द-युग्म के पाठकों के सवालों के जवाब


जवाब देते निदा फ़ाज़ली
हिन्द-युग्म ने यह तय किया है कि जनवरी २००९ से प्रत्येक माह कला और साहित्य से जुड़ी किसी एक नामी हस्ती से आपकी मुलाक़ात कराया करेगा। आपसे से सवाल माँगेंगे जो आप उस विभूति से पूछना चाहते हैं और उसे आपकी ओर से आपके प्रिय कलाकार या साहित्यकार के सामने रखेंगे। सारा कार्रक्रम रिकॉर्ड करके हम आपको अपने आवाज़ मंच द्वारा सुनवायेंगे।

हमने सोचा कि शुरूआत क्यों न किसी शायर से हो जाय। क्योंकि हिन्द-युग्म की शुरूआत भी कुछ रचनाकारों से ही हुई थी। ४ जनवरी २००९ को हमने आपसे मशहूर शायर निदा फ़ाज़ली से पूछने के लिए सवाल माँगे। आपने भेजे और हम ६ जनवरी को पहुँच गये निदा के पास। मुलाक़ात से जुड़े निखिल आनंद गिरि के अनुभव आप बैठक पर पढ़ भी चुके हैं।
आज हम लेकर आये हैं आपके सवालों के जवाब निदा फ़ाजली की ज़ुबाँ से। यह मुलाकात बहुत अनौपचारिक मुलाक़ात थी, इसलिए रिकॉर्डिंग की बातचीत भी वैसी है। आप भी सुनिए।




निदा फ़ाज़ली से पाठकों की ओर से सवाल किया है निखिल आनंद गिरि और शैलेश भारतवासी ने।

अंत में प्रेमचंद सहजवाला की निदा फ़ाजली से हुई बातचीत के अंश भी हैं।

ज़रूर बतायें कि आपको हमारा यह प्रयास कैसा लगा?

Friday, December 26, 2008

मुझे वक्त दे मेरी जिंदगी...

दूसरे सत्र के २६ वें गीत विश्वव्यापी उदघाटन आज

दोस्तों आज यूँ तो हमारे नए गीतों के प्रकाशन के इस वर्तमान सत्र का अन्तिम शुक्रवार है पर इस प्रस्तुत गीत को मिलकर हमारे पास ३ प्रविष्टियाँ हैं ऐसी जो इस सत्र में अपना स्थान बनाना चाहती है, जिनका प्रकाशन हम क्रमश आने वाले सोमवार और बुधवार को करेंगें यानी कि सत्र का समापन २८ वें गीत के साथ होगा जो वर्ष की अन्तिम तारिख को प्रकाशित होगा, फिलहाल आनंद लेते हैं २६ वें गीत का. ये संयोग ही है की पिछले सत्र के अंत में भी जिस कलाकारा ने आकर अपनी आवाज़ और गायकी से सबके मन को चुरा लिया था उसी युवा संगीतकार/गायिका के दो नए गीत हैं दूसरे सत्र के अन्तिम ३ गीतों में भी.पिछले सत्र में भी आभा मिश्रा और निखिल आनंद गिरी की जोड़ी ने "पहला सुर" एल्बम दो खूबसूरत ग़ज़लें दी थी. कुछ श्रोताओं ने हिदायत दी थी कि यदि उन ग़ज़लों का संगीत संयोजन अच्छा होता तो और बेहतर होता. इस बार इसी कमी को दुरुस्त करने के लिए हमने सहारा लिया युग्मी संगीतकार साथी रुपेश ऋषि का. तो दोस्तों हिंद युग्म गर्व के साथ प्रस्तुत करता है एक बार फ़िर आभा मिश्रा को, जिन्होंने इस गीत को न सिर्फ़ अपनी आवाज़ दी है, वरन इसकी धुन भी उन्होंने ख़ुद बनाई है, संयोजन है रुपेश ऋषि का और गीत के बोल लिखे हैं निखिल आनंद गिरी ने. सुनें और बतायें कि कैसी लगी आपको हमारी ये ताज़ातरीन प्रस्तुति.

सुनने के लिए नीचे के प्लेयर पर क्लिक करें -






Song # 26, marks the return of very talented composer/singer of Hind Yugm family, Abha Mishra is here again along with lyricist Nikhil Anand Giri, and for their first song for this present season "mujhe waqt de jindagi" music arrangement has been done by our very own Rupesh Rishi. So guys, listen to this brand new song from this great musical "jodi", and do let us know what you feel about this new offering from Hind Yugm Awaaz.

To listen, please click on the player -




Lyrics - गीत के बोल -

मुझे वक्त दे मेरी जिंदगी, तेरा हाथ थामे चल सकूं,
मुझे भर ले मेरी मांग में, कि न रेत बन के फिसल सकूं,
मुझी वक्त दे, मुझे वक्त दे.....

अभी रौशनी की न बात कर, मैं हूँ आंसुओं से घिरा हुआ,
मेरे यार मुझको दे हौसला, मैं हूँ आंसुओं से घिरा हुआ....
मेरे आंसुओं में वो बात हो, लिखा वक्त का भी बदल सकूं...
मुझे वक्त दे....मुझे वक्त दे.....

अभी हूँ सवालों की क़ैद में, कई उलझनें, मजबूरियाँ,
अभी रहने भी दे ये दूरियां, कई उलझनें, मजबूरियां...
अभी उस मुकाम पे हूँ खड़ा, कि न गिर सकूं, न संभल सकूं,
मुझे वक्त दे.....मुझे वक्त दे....

मुझे एक रात नवाज़ दे, तुझे मैं खुदा-सा प्यार दूँ,
गुनाह सारे उतार दूँ, तुझे मैं खुदा-सा प्यार दूँ...
मुझे मां की तरह गोद में, तू चूम ले, मैं मचल सकूं....
मुझे वक्त दे, मुझे वक्त दे.....

SONG # 26, SEASON # 02, "MUJHE WAQT DE MERI JINDAGI", OPENED ON AWAAZ, HIND YUGM.
Music @ HInd Yugm, Where music is a passion.



Thursday, December 18, 2008

एक आम आदमी जिसने भोजपुरी को बना दिया खास...

भिखारी ठाकुर की जयंती पर हमारी संगीतमयी प्रस्तुति

भिखारी ठाकुर
एक आम आदमी के सतह से शिखर तक की बेजोड़ मिसाल हैं भिखारी ठाकुर... बहुत कम लोग होते हैं जो जीते-जी विभूति बन जाते हैं... दरअसल, इस भिखारी ठाकुर की जीवन-यात्रा भिखारी से ठाकुर होने की यात्रा ही है...फर्क सिर्फ यह है कि लीजेंड बनने की यह यात्रा भिखारी ने किसी रुपहले पर्दे पर नहीं असल ज़िंदगी में जिया.

भोजपुरी के नाम पर सस्ता मनोरंजन परोसने की परंपरा भी उतनी ही पुरानी है, जितना भोजपुरी का इतिहास....18 दिसंबर 1887 को छपरा के कुतुबपुर दियारा गांव में एक निम्नवर्गीय नाई परिवार में जन्म लेने वाले भिखारी ठाकुर ने विमुख होती भोजपुरी संस्कृति को नया जीवन दिया.....उन्होंने भोजपुरी संस्कृति को सामीजिक सरोकारों के साथ ऐसा पिरोया कि अभिव्यक्ति की एक धारा भिखारी शैली जानी जाने लगी...आज भी सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार का सशक्त मंच बन कर जहाँ-तहाँ भिखारी ठाकुर के नाटकों की गूंज सुनाई पड़ ही जाती है....
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भिखारी ठाकुर के स्वर में उन्हीं की कविता 'डगरिया जोहता ना".
यह काव्यपाठ 'बिदेसिया' फिल्म से ली गई है
बिदेसिया, गबर-घिचोर, बेटी-बियोग भा बेटी-बेचवा सहित उनके सभी नाटकों में बदलाव को दिशा देने वाले एक सामाजिक चिंतक की व्यथा साफ दिखती है....सबसे बड़ी बात कि उनके नाटकों में पात्र कभी केंद्र में नहीं रहे, हमेशा परिवेश केंद्र में रहा....यही वजह थी कि उनके पात्रों की निजी पीड़ा सार्वभौमिक रुप अख्तियार कर लेती थी... हर नयी शुरुआत को टेढ़ी आंखों से देखने वाले भिखारी के दौर में भी थे...सामाजिक व्यवस्था के ऐसे ठेकेदारों से भिखारी अपने नाटकों के साथ लड़े...वो अक्सर नाटकों में सूत्रधार बनते और अपनी बात बड़े चुटीले अंदाज़ में कह जाते....अपनी महीन मार की मार्फत वो अंतिम समय तक सामाजिक चेतना की अलख जगाते रहे....
कोई उन्हें भरतमुनि की परंपरा का पहला नाटककार मानता हैं तो कोई भोजपुरी का भारतेंदू हरिश्चंद्र.....महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने तो उन्हें "भोजपुरी का शेक्सपियर" की उपाधि दे दी.....इसके अलावा उन्हें कई और उपाधियाँ व सम्मान भी मिले....भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से भी सम्मानित किया..... इतना सम्मान मिलने पर भी भिखारी गर्व से फूले नहीं, उन्होंने बस अपना नाटककार ज़िंदा रखा...पूर्वांचल आज भी भिखारी से नाटकों से गुलज़ार है....ये बात अलग है कि सरकारी उपेक्षा का शिकार इनके गांव तक अब भी नाव से ही जाना पड़ता है....

राममुरारी के साथ निखिल आनंद गिरि



सन् १९६३ में भिखारी ठाकुर के अमर नृत्य-नाटक बिदेशिया पर एक फिल्म बनी, इसी नाम से। जिसका संगीत बहुत हिट हुआ। भिखारी ठाकुर का लिखा एक गीत 'हँसी-हँसी पनवा खियौलस बेइमनवा, अ रे बसेला परदेस' जिसे एस॰ एन॰ त्रिपाठी ने संगीतबद्द किया था और मन्ना डे गाया था। बहुत प्रसिद्ध हुआ। हम आज अपने श्रोताओं के लिए वह गीत तो लाये ही हैं, साथ में बिलकुल नये तरह से कम्पोज किया गया यही गीत लाये हैं।

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(फिल्म- बिदेसिया, संगीत- एस॰एन॰ त्रिपाठी, आवाज़- मन्ना डे)

यह प्रस्तुति हिन्द-युग्म से सितम्बर २००८ में जुड़े राजकुमार सिंह की है, जो न्यूयार्क रहते हैं। ये अपने साथियों के साथ मिलकर एक फिल्म बनाने की योजना बना रहे हैं। फिल्म का नाम होगा 'लूंगी, लोटा और सलाम'। राज भिखारी ठाकुर के इस गीत को अपनी फिल्म में रखना चाहते हैं। और यह गीत नये तरीके से तैयार भी हो गया है। 'हँसी-हँसी पनवा' को नया रूप दिया है 'Valley Of Flower' फिल्म के संगीत निर्देशक विवेक अस्थाना ने। गीत को गाया है भोजपुरी गीतों की चर्चित गायिका पूनम जैन ने। हम उम्मीद करते हैं कि यह नया प्रयोग आपको पसंद आयेगा।

इस फिल्म की बातें फिर कभी, पहले आप गीत सुनें।



(फिल्म- लूँगी, लोटा और सलाम (प्रस्तावित) , संगीत- विवेक अस्थाना और राजकुमार सिंह, आवाज़- पूनम जैन)

इस गीत के माध्यम से हम राजकुमार सिंह के साथ मिलकर अमर नाटककार भिखारी ठाकुर को श्रद्धाँजलि देना चाहते हैं।


साथ में पढ़िए भिखारी ठाकुर का दुर्लभ साक्षात्कार

Thursday, May 8, 2008

KAVI.DOT.COM लोधी गार्डन (काव्यपाठ)

58वें गणतंत्र दिवस के अवसर पर DU-FM के कार्यक्रम कवि डॉट कॉम का विशेष अंक हिन्द-युग्म के कवियों पर केन्द्रित था। आकाशवाणी के वरिष्ठ उद्घोषक प्रदीप शर्मा हिन्द-युग्म के कवियों से मिलने दिल्ली के मशहूर पार्क लोधी गार्डन पहुँचे। हिन्द-युग्म के सक्रिय कार्यकर्ता निखिल आनंद गिरि को संचालन की जिम्मेदारी सौंपी और 30 मिनट के इस विशेष कवि सम्मेलन की रिकार्डिंग की। भाग लेने वाले कवि थे-

मनीष वंदेमातरम्
रंजना भाटिया
भूपेन्द्र राघव
शैलेश भारतवासी
अजय यादव
राशी जमुआर
अवनीश गौतम
निखिल आनंद गिरि

इसकी रिकॉर्डिंग अब हम तक पहुँच पाई है। अब इसे हमें अपने इंटरनेटीय श्रोताओं के समक्ष लेकर प्रस्तुत हैं। आप भी सुनें और इस कवि सम्मेलन का आनंद लें।

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Kavya-path of many poets of Hind-Yugm @ Kavi.Com (a special programme of DU-FM

Saturday, April 12, 2008

रंजना भाटिया, निखिल आनंद गिरि, सुनीता 'शानू', मनीष वंदेमातरम्, शैलेश भारतवासी की बातें और काव्य-पाठ

हिन्द-युग्म की टीम विश्व पुस्तक मेला २००८ से मधुरतम समय निकाले तो शायद अभिनव शुक्ल से जुड़ी बातें उनमें से एक होंगी। मेले के पहले ही दिन से उनका स्टैंड पर आना, हिन्द-युग्म के वाहकों से इनके हाल-चाल लेना, नाश्ते-पानी का प्रबंध करके जाना आदि भावविभोर कर देते थे। कई कार्यकर्ता तो इसलिए हैरान थे कि उन्हें यह ही नहीं पता चल पाता था कि भला ये महानुभाव कौन हैं? अभिनव शुक्ल जी इतनी आत्मीयता से मिलते थे कि किसी की भी यह पूछने की हिम्मत नहीं होती थी कि भाईसाहब आपका नाम क्या है? अभिनव जी बहुत कम ही समय के लिए हिन्द-युग्म के स्टैंड पर आते थे मगर पूरे माहौल को खुशनुमा कर जाते थे।

मेले के समापन से एक दिन पहले स्टैंड को बंद करने के वक़्त इन्होंने वहाँ उपस्थित सभी साथियों का इंटरव्यू लिया और काव्य-पाठ रिकार्ड किया ताकि रेडियो सलाम नमस्ते के श्रोताओं को सुनवाया जा सके।

आप भी सुनिए रंजना भाटिया 'रंजू', निखिल आनंद गिरि, सुनीता 'शानू' और मनीष वंदेमातरम् की बातें और काव्यपाठ-

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अभिनव जी ने शैलेश भारतवासी के भी विचार जानें। पूरी बातचीत सुनें। यह मेरेकविमित्र से हिन्द-युग्म होने की कहानी है।

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(Interview of Ranjana Bhatia 'Ranju', Nikhil Anand Giri, Sunita Chotia 'Shanoo', Manish Vandemataram and Shailesh Bharatwasi for Radio Salaam Namaste)

Monday, April 7, 2008

निखिल आनंद गिरि का रेडियो सलाम नमस्ते पर काव्य-पाठ

7 अप्रैल 2008 के भारतीय समयानुसार सुबह 7:30 हिन्द-युग्म के सदस्य निखिल आनंद गिरि का जीवंत टेलीफोनिक साक्षात्कार और काव्य-पाठ प्रसारित किया गया। यह प्रसारण डैलास, अमेरिका के एफ॰एम॰ रेडियो स्टेशन 'रेडियो सलाम नमस्ते' से 'कवितांजलि' कार्यक्रम के अंतर्गत किया गया। यह कार्यक्रम वहाँ के स्थानीय समयानुसार प्रत्येक रविवार की रात्रि ९ बजे से १० बजे तक होता है जिसका संचालन श्री आदित्य प्रकाश जी करते हैं। इस कार्यक्रम में दुनिया भर से हिन्दी के लगभग सभी नामचीन मंचिय कवियों ने काव्य-पाठ किया है।

हमने निखिल के साक्षात्कार को रिकार्ड करने का यत्न किया है। डेंटन निवासी युवा कवयित्री रचना श्रीवास्तव ने भी हिन्द-युग्म के युवा कवि का प्रोत्साहन करने के लिए काव्य-पाठ और बातचीत के बाद स्टूडियों फोन किया था, मगर हम उनकी बातों को ठीक से रिकार्ड नहीं कर सके। फिर भी हिन्द-युग्म उन्हें लिखित धन्यवाद ज़रूर देना चाहेगा।

नीचे ले प्लेयर से सुनें.

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Kavya-path of Nikhil Anand Giri on Radio Salaam Namaste

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



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