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Friday, September 17, 2010

भर के गागर कलियों से, ज्यों ढलके हों मोगरे....ब्रिज भाषा की मिठास और क्लास्सिकल पाश्चात्य संगीत का माधुर्य जब मिले

Season 3 of new Music, Song # 20

दोस्तों आज का हमारा नया गीत एकदम खास है, क्योंकि इसमें पहली बार ब्रिज भाषा की मिठास घुल रही है. नए प्रयोगों के लिए जाने जाने वाले हमारे इन हॉउस गीतकार विश्व दीपक लाए है एक बहुत मधुर गीत जिसे एक बेहद मीठी सी धुन देकर संवारा है सतीश वम्मी ने जो इससे पहले इसी सत्र में "जीनत" देकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर चुके हैं. गायिका हैं "बुलबुला" में जिंदगी का फलसफा देने वाली आवाज़ की शान गायिका ह्रिचा देबराज नील मुखर्जी. तो दोस्तों अब और अधिक भूमिका में आपको न उलझाते हुए सीधे गीत की तरफ़ बढते हैं. ऑंखें मूँद के सुनिए और खो जाईये, इस ताज़ा तरीन गीत की रुमानियत में....और हाँ हमारे युवा संगीतकार सतीश जी को विवाह की बधाईयां भी अवश्य दीजियेगा, क्योंकि कहीं न कहीं उनके जीवन में आये इस नए प्रेम का भी तो योगदान है इस गीत में. हैं न ?

गीत के बोल -


ढाई आखर अंखियों से
जब झलके हैं तो मोहे
मिल जावे चैना.... मोरे सांवरे!!

भर के गागर कलियों से
ज्यों ढलके हों मोगरे
बिछ जावें भौंरे..... होके बावरे!!

तोसे पुछूँ
तू नैनन से
यूँ पल-पल छल कर... लूटे है मोहे..
कि पक्की है... ये प्रीत रे!!!

ढाई आखर अंखियों से
जब झलके हैं तो मोहे
मिल जावे चैना.... मोरे सांवरे!!

भर के गागर कलियों से
ज्यों ढलके हों मोगरे
बिछ जावें भौंरे..... होके बावरे!!

काहे तू
हौले-हौले
कनखियों से खोले है घूँघट मोरी लाज-शरम के..

अब ना संभले मोसे,
सजना बीरहा तोसे,
धर ले सीने में तू,
मोहे टुकड़े कर के.....

ढाई आखर अंखियों से
जब झलके हैं तो मोहे
मिल जावे चैना.... मोरे सांवरे!!

भर के गागर कलियों से
ज्यों ढलके हों मोगरे
बिछ जावें भौंरे..... होके बावरे!!




मेकिंग ऑफ़ "ढाई आखर" - गीत की टीम द्वारा

सतीश वम्मी: "ढाई आखर" हिन्द-युग्म पर मेरा दूसरा गाना है और ह्रिचा देबराज के साथ पहला। ह्रिचा के बारे में मुझे जानकारी मुज़िबु से हासिल हुई थी। उनके साथ काम करने का मेरा अनुभव बड़ा हीं सुखद रहा। सच कहूँ तो अंतर्जाल के माध्यम से किसी गाने पर काम करना आसान नहीं होता क्योंकि उसमें आप खुलकर यह बता नहीं पाते कि आपको गीतकार या गायक/गायिका से कैसी अपेक्षाएँ हैं, लेकिन ह्रिचा के साथ बात कुछ अलग थी। उन्हें जैसे पहले से पता था कि गाना कैसा बनना है और इस कारण मेरा काम आसान हो गया। ह्रिचा ने गाने में एक नई जान डाल दी और इसके लिए मैं उनका शुक्रगुजार हूँ। विश्व भाई तो मेरे लिए फुल-टाईम गीतकार हो चुके हैं.. उनके साथ पहले "ज़ीनत" आई और अब "ढाई आखर"। अभी भी इनके लिखे ४ गाने मेरे पास पड़े हैं, जिन्हें मैं जल्द हीं खत्म करने की उम्मीद करता हूँ। "ढाई आखर" दर-असल एक मेल-सॉंग (निगाहें, जिसे बाद में "झीनी झालर" नाम दिया गया) होना था, लेकिन हमें लगा कि इस धुन पर फीमेल आवाज़ ज्यादा सुट करेगी। ऐसे में नए बोलों के साथ यह गाना "ढाई आखर" बन गया। बोल और धुन तैयार हो जाने के बाद मैंने ह्रिचा से बात की और अच्छी बात यह है कि उन्होंने पल में हीं हामी भर दी। अब चूँकि मैं कोई गायक नहीं, इसलिए डेमो तैयार करना मेरे लिए संभव न था। मैंने ह्रिचा के पास धुन और बोल भेजकर उनसे खुद हीं धुन पर बोल बैठाने का आग्रह किया। मेरी खुशी का ठिकाना तब न रहा जब मैंने ह्रिचा की आवाज़ में पहला ड्राफ्ट सुना। मुझे वह ड्राफ़्ट इतना पसंद आया कि अभी फाईनल प्रोडक्ट में भी मैने पहले ड्राफ्ट का हीं मुखरा हू-ब-हू रखा है। हाँ, अंतरा में बदलाव हुए क्योंकि हमें कई सारे हार्मोनिज़ एवं लेयर्स के साथ प्रयोग करने पड़े थे। अभी आप जो गीत सुन रहे हैं, उसमें एक हीं लिरिक़्स को छह अलग-अलग वोकल ट्रैक्स पर अलग-अलग धुनों पर गाया गया है। इस गाने की धुन रचने में मुझे ५ मिनट से भी कम का समय लगा था... मुझे उस वक़्त जो भी ध्यान में आया, मैंने उसे गाने का हिस्सा बना डाला। इससे मेरा काम तो आसान हो गया, लेकिन विश्व के लिए मुश्किलें बढ गईं। कई जगहॊं पर धुन ऐसी थी, जहाँ शब्द सही से नहीं समा रहे थे और मैं धुन बदलने को राज़ी नहीं था। हालांकि, विश्व ने मुझे बाद में बताया कि ऐसी स्थिति से उनका हीं फायदा होता है क्योंकि उन्हें नई सोच और नए शब्द ढूँढने होते हैं। गाना बनकर तैयार होने में ४-५ महिनों का वक़्त लग गया और इसमें सारा दोष मेरा है, क्योंकि मैं कुछ व्यक्तिगत मामलों में उलझ गया था। दर-असल, इसी बीच मेरी शादी हुई थी :) शुक्रिया.. बधाईयों के लिए शुक्रिया। यह गाना हमारा संयुक्त प्रयास है और हमने यथासंभव इसमें रूह डालने की कोशिश की है। आशा करता हूँ कि आपको हमारी यह छोटी पेशकश पसंद आएगी। आपकी टिप्पणियों का इंतज़ार रहेगा।

ह्रिचा देबराज नील मुखर्जी: गीत "ढाई आखर अंखियों से" बड़ा हीं प्रयोगात्मक गीत है.. शुरूआत में यह नज़्म सतीश की कल्पना-मात्र थी। उन्होंने ऐसे हीं पियानो पर एक टीज़र बना कर मुझे यह धुन भेजी और मुझे इस गीत में हिस्सा बनने के लिए पूछा, जिसके लिए मैने तुरंत हामी भर दी। लेकिन कहीं मैं इस सोच में थी कि यह धुन गीत से अधिक एक अच्छी खासी थीम म्युज़िक साउंड कर रही है, क्या इसकी रचना ठीक ढंग से हो भी पाएगी या नहीं.. इस के लिए विश्व जी की जितनी तारीफ़ की जाए कम है क्योंकि जिस तरह से सतीश ने इस गीत में पाश्चात्य बैले संगीत और कर्नाटिक अंग के साथ प्रयोग किया है उसी तरह विश्व जी ने शुद्ध हिन्दी के शब्दों में गीत के बोलों की रचना कर इसे और खूबसूरत बनाने में अपना सफल योगदान दिया है। आशा करती हूँ कि यह गीत सभी को पसंद आएगा।

विश्व दीपक: इस गीत के पीछे के कहानी बताते वक़्त सतीश जी ने "निगाहें" और "झीनी झालर" का ज़िक्र किया, लेकिन वो उससे भी पहले की एक चीज बताना भूल गए। जैसा कि ह्रिचा ने कहा कि यह धुन वास्तव में एक थीम म्युज़िक या इन्स्ट्रुमेन्टल जैसी प्रतीत हो रही थी तो असलियत भी यही है। लगभग चार महिने पहले सतीश जी ने इसे "क्लोज़ योर आईज़" नाम से मुज़िबु पर पोस्ट किया था और श्रोताओं की राय जाननी चाही थी कि क्या इसे गाने के रूप में विस्तार दिया जा सकता है। फिर मेरी सतीश जी से बात हुई और हमने यह निर्णय लिया कि इसे एक मेल सॉंग बनाते हैं। मेल सॉंग बनकर तैयार भी हो गया, लेकिन गायक की गैर-मौजूदगी के कारण इस गाने को पेंडिंग में डालना पड़ा। दर-असल सतीश जी चाहते थे कि यह गाना जॉर्ज गाएँ, लेकिन उसी दौरान जॉर्ज की कुछ जाती दिक्कतें निकल आईं, जिस कारण वे दो-तीन महिनों तक गायन से दूर हीं रहें। हमें लगने लगा था कि यह गीत अब बन नहीं पाएगा, लेकिन हम इस धुन को गंवाना नहीं चाहते थे। तभी सतीश जी ने यह सुझाया कि क्यों न इसे किसी गायिका से गवाया जाए, लेकिन उसके लिए बोलों में बदलाव जरूरी था। अमूमन मैं एक धुन पर एक से ज्यादा बार लिखना पसंद नहीं करता, क्योंकि उसमें आप न चाहते हुए भी कई सारे शब्द या पंक्तियाँ दुहरा देते हैं, जिससे उस गीत में नयापन जाता रहता है। लेकिन यहाँ कोई और उपाय न होने के कारण मुझे फिर से कलम उठानी पड़ी। कलम उठ गई तो कुछ अलग लिखने की जिद्द भी साथ आ गई और देखते-देखते मैने अपनी सबसे प्रिय भाषा "ब्रिज भाषा" (इसमें कितना सफल हुआ हूँ.. पता नहीं, लेकिन कोशिश यही थी कि उर्दू के शब्द न आएँ और जितना हो सके उतना ब्रिज भाषा के करीब रहूँ) में "ढाई आखर" लिख डाला। कहते हैं कि गीत तब तक मुकम्मल नहीं होता जब तक उसे आवाज़ की खनक नहीं पहनाई जाती, इसलिए मैं तो इतना हीं कहूँगा कि सतीश जी और मैने "ढाई आखर" के शरीर का निर्माण किया था, इसमें रूह तो ह्रिचा जी ने डाली है। कुहू जी के बाद मैं इनकी भी आवाज़ का मुरीद हो चुका हूँ। उम्मीद करता हूँ कि ह्रिचा जी की आवाज़ में आपको यह गीत पसंद आएगा।

सतीश वम्मी
सतीश वम्मी मूलत: विशाखापत्तनम से हैं और इन दिनों कैलिफ़ोर्निया में रहते हैं। बिजनेस एवं बायोसाइंस से ड्युअल मास्टर्स करने के लिए इनका अमेरिका जाना हुआ। 2008 में डिग्री हासिल करने के बाद से ये एक बहुराष्ट्रीय बायोटेक कम्पनी में काम कर रहे हैं। ये अपना परिचय एक संगीतकार के रूप में देना ज्यादा पसंद करते हैं लेकिन इनका मानना है कि अभी इन्होंने संगीत के सफ़र की शुरूआत हीं की है.. अभी बहुत आगे जाना है। शुरू-शुरू में संगीत इनके लिए एक शौक-मात्र था, जो धीरे-धीरे इनकी ज़िंदगी का एक अहम हिस्सा बनता जा रहा है। इन्होंने अपनी पढाई के दिनों में कई सारे गाने बनाए जो मुख्यत: अंग्रेजी या फिर तेलगु में थे। कई दिनों से ये हिन्दी में किसी गाने की रचना करना चाहते थे, जो अंतत: "ज़ीनत" के रूप में हम सबों के सामने है। सतीश की हमेशा यही कोशिश रहती है कि इनके गाने न सिर्फ़ औरों से बल्कि इनके पिछले गानों से भी अलहदा हों और इस प्रयास में वो अमूमन सफ़ल हीं होते हैं। इनके लिए किसी गीत की रचना करना एक नई दुनिया की खोज करने जैसा है, जिसमें आपको यह न पता हो कि अंत में हमें क्या हासिल होने वाला है, लेकिन रास्ते का अनुभव अद्भुत होता है।

ह्रिचा देबराज नील मुखर्जी
२००२ में ह्रिचा लगातार ७ बार जी के सारेगामापा कार्यक्रम में विजेता रही है, जो अब तक भी किसी भी महिला प्रतिभागी की तरफ़ से एक रिकॉर्ड है. स्वर्गीय मास्टर मदन की याद में संगम कला ग्रुप द्वारा आयोजित हीरो होंडा नेशनल टेलंट हंट में ह्रिचा विजेता रही. और भी ढेरों प्रतियोगिताओं में प्रथम रही ह्रिचा ने सहारा इंडिया के अन्तराष्ट्रीय आयोजन "भारती" में ३ सालों तक परफोर्म किया और देश विदेश में ढेरों शोस् किये. फ़्रांस, जर्मनी, पोलेंड, बेल्जियम, इस्राईल जैसे अनेक देशों में बहुत से अन्तराष्ट्रीय कलाकारों के साथ एक मंच पर कार्यक्रम देने का सौभाग्य इन्हें मिला और साथ ही बहुत से यूरोपियन टीवी कार्यक्रमों में भी शिरकत की. अनेकों रेडियो, टी वी धारावाहिकों, लोक अल्बम्स, और जिंगल्स में अपनी आवाज़ दे चुकी ह्रिचा, बौलीवुड की क्रोस ओवर फिल्म "भैरवी" और बहुत सी राजस्थानी फ़िल्में जैसे "दादोसा क्यों परणाई", "ताबीज", "मारी तीतरी" जैसी फिल्मों में पार्श्वगायन कर चुकी हैं.

विश्व दीपक
विश्व दीपक हिन्द-युग्म की शुरूआत से ही हिन्द-युग्म से जुड़े हैं। आई आई टी, खड़गपुर से कम्प्यूटर साइंस में बी॰टेक॰ विश्व दीपक इन दिनों पुणे स्थित एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी में बतौर सॉफ्टवेयर इंजीनियर अपनी सेवाएँ दे रहे हैं। अपनी विशेष कहन शैली के लिए हिन्द-युग्म के कविताप्रेमियों के बीच लोकप्रिय विश्व दीपक आवाज़ का चर्चित स्तम्भ 'महफिल-ए-ग़ज़ल' के स्तम्भकार हैं। विश्व दीपक ने दूसरे संगीतबद्ध सत्र में दो गीतों की रचना की। इसके अलावा दुनिया भर की माँओं के लिए एक गीत को लिखा जो काफी पसंद किया गया।
Song - Dhaayi Aakhar
Vocals - Hricha Debraj
Music - Satish Vammi
Lyrics - Vishwa Deepak "Tanha"
Graphics - Prashen's media


Song # 19, Season # 03, All rights reserved with the artists and Hind Yugm

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Friday, September 3, 2010

ये इंतज़ार बड़ा मुश्किल, कितनी हीं रंगीं हो महफ़िल...महसूस किया कुहू ने रूचि और वेंकटेश के साथ

Season 3 of new Music, Song # 18

नए गीतों से रोशन आवाज़ महोत्सव २०१० में आज बारी है १८ वें गीत की, और आज फिर उसी गायिका की आवाज़ से रोशन है ये महफ़िल जो पहले ही इस सत्र में ५ गीतों को अपनी आवाज़ दे चुकी हैं, जी हाँ आपने सही पहचाना ये उभरती हुई बेहद प्रतिभशाली गायिका है कुहू गुप्ता, जिन पर पूरे आवाज़ परिवार को नाज़ है, तभी तो वो हर उभरते हुए संगीतकार की पहली पसंद बन चुकी हैं आज. आज का गीत कुछ शास्त्रीय रंग लिए हुए है जिसके माध्यम से पहली बार आवाज़ के मंच पर उतर रहे हैं एक हुनरमंद संगीतकार और एक बेहद नयी गीतकारा. संगीतकार वेंकटेश शंकरण हैं जिनका परिचय आप नीचे पढ़ सकते हैं, गीत को लिखा है रूचि लाम्बा ने. निलंजन नंदी ने गीत का संयोजन किया है. हमें पूरा यकीन है बेहद मधुर और बेहद कर्णप्रिय इस गीत को आप हमेशा अपने संकलन में रखना चाह्गें. तो सुनिए ये गीत

गीत के बोल -

कुछ ना भाये मन को मेरे,
हर पल देखूँ सपने तेरे, तेरे , तेरे
जिया लागे ना, तेरे बिन..

जिया लागे ना, नहीं लागे लागे, नहीं लागे लागे, जिया लागे ना,
तेरे बिन, नींद आवे ना, नैना जागे जागे, नैना जागे जागे, नींद आवे ना,
तेरे बिन, जिया लागे ना..

जग को रजनी सुलाए,
मझको यादें जगाए,
सर्द पुरवा के झोंके,
तेरी आहट सुनाए..

जिया लागे ना, तेरे बिन,
जिया लागे ना, नहीं लागे लागे, नहीं लागे लागे, जिया लागे ना,
तेरे बिन
नींद आवे ना,
तेरे बिन
जिया लागे ना,
तेरे बिन

साँझ के धुंधले आँचल छाए,
मुझको घेरे यादों के साये, जिया लागे ना,

साँझ के धुंधले आँचल छाए,
मुझको घेरे यादों के साये, जिया लागे ना,

ये इंतज़ार बड़ा मुश्किल,
कितनी हीं रंगीं हो महफ़िल

तू हीं मेरे
मन में है,
तू हीं धड़कन में है,
तेरे बिना,
मेरा जिया,
कहीं नहीं,
लागे पिया.. ना ना ना ना ना

तेरे बिन, जिया लागे ना,
जिया लागे ना, नहीं लागे लागे, नहीं लागे लागे, जिया लागे ना,
तेरे बिन, नींद आवे ना, नैना जागे जागे, नैना जागे जागे, नींद आवे ना,
तेरे बिन, जिया लागे ना..



मेकिंग ऑफ़ "तेरे बिन" - गीत की टीम द्वारा

वेंकटेश शंकरण: मैंने कुहू के साथ पहले भी एक गाना किया है, जो अब एक व्यावसायिक एलबम का हिस्सा बन चुका है। मुझे कुहू के बारे में जानकारी एक अंतर्जालीय संगीत समूह (इंटरनेट म्युज़िक फोरम) से मिली थी। जहाँ तक रूचि का सवाल है, तो इनसे मैं सबसे पहले अपनी हीं अकादमी में मिला था और अपनी धुन पर गीत लिखने की मैंने इनसे पेशकश की थी। मेरा यह सौभाग्य है कि ये खुशी-खुशी राजी हो गईं। निलंजन के अरेंजमेंट के बारे में मैं क्या कहूँ, मैंने इनसे जिस चीज की उम्मीद की थी, आखिरकार मैंने वही पाया। मैं तो यही कहूँगा कि कैलिफ़ोर्निया के इन दो हुनरमंदों और कुहू के साथ काम करने का मेरा अनुभव बहुत हीं अच्छा रहा। गाने की फाईनल मिक्सिंग आने से पहले इसमें थोड़े-बहुत बदलाव हुए थे, ताकि गाना जो बनकर निकले वह लोगों के दिलों को छू जाए। कोशिश तो यही थी, पता नहीं हम इसमें कितना सफल हुए हैं। अब सब कुछ आप श्रोताओं के हाथ में हैं..उम्मीद करता हूँ कि हमारा यह प्रयास आप सबों को पसंद आएगा।

रूचि लांबा: इस गाने की धुन वेंकटेश जी ने जब मुझे सुनाई, तो ये गीत मुझे सुनते हीं पसंद आ गया। धुन इतनी सुंदर थी कि इस पर गीत के बोल अपने आप हीं आते गए। ये मेरा सौभाग्य है कि वेंकटेश जी ने मुझसे गीत के बोल लिखने को कहे। बिरहा (विरह) और प्रेम से भरा ये गीत, कुहू जी ने बहुत खूबसूरती से गाया है। मैं आशा करती हूँ कि ये गीत और लोगों को भी बहुत पसंद आएगा।

कुहू गुप्ता: वेंकटेश के साथ किया गया मेरा पहला गाना बहुत हीं लोकप्रिय रहा है और ये गाना भी मुझे बेहद पसंद आया। इस गाने के लफ़्ज़ों में जो दर्द है वो गाने में ज़ाहिर करना मेरे लिए एक मुश्किल काम था। ऐसा खूबसूरत गीत लिखने के लिए मैं रूचि को बधाई देना चाहूँगी। निलंजन ने जो अरेंजमेंट किया है, वो गाने के लिए एकदम उपयुक्त है। आशा करती हूँ कि श्रोताओं को यह गाना पसंद पाएगा।

वेंकटेश शंकरण (संगीतकार)
कैलिफोर्निया में रह रहे वेंकटेश संगीत को अपनी ज़िंदगी का एक हिस्सा मानते हैं। इन्होंने अब तक न सिर्फ़ हिन्दुस्तानी कलाकारों के लिए धुनें तैयार की हैं, बल्कि कई सारे अमरीकियों के लिए भी गानों का निर्माण किया है। ये वहाँ पर "सुर म्युज़िक अकादमी" नाम की एक संगीत संस्था चलाते हैं, जहाँ पर हिन्दुस्तानी संगीत, हिन्दुस्तानी साज़ और नृत्य की शिक्षा दी जाती है। आवाज़ पर "तेरे बिन" गाने के साथ ये पहली बार हाज़िर हुए हैं।

रूचि लांबा (गीतकारा)
इनका जन्म मुंबई में हुआ , लेकिन जब ये बस ग्यारह साल की थीं तभी अपने परिवार के साथ आस्ट्रेलिया चली गईं। वहाँ पर पलने-बढने के बावजूद इन्हें हिन्दुस्तानी संगीत और कविताओं से बहुत प्यार रहा है। शादी के बाद ये कैलिफ़ोर्निया आ गईं और आठ साल से अमरीका में हीं हैं। ये पेशे से एक जर्नलिस्ट (पत्रकार) और पब्लिक रिलेशन्स कंसल्टेंट हैं। जब भी वक़्त मिलता है, ये गीत और शेर लिख लिया करती हैं। "तेरे बिन" आवाज़ पर इनकी पहली प्रस्तुति है।

निलंजन नंदी (अरेंजर एवं मिक्सिंग इंजीनियर)
१९६९ में जब निलंजन महज ६ साल के थे, तभी से इन्होंने बाल-कलाकार के तौर पर प्रदर्शन करना शुरू कर दिया था। बचपन से हीं (छठी कक्षा से) इनमें संगीतकार बनने की एक ललक थी। इसलिए इन्होंने वोकल म्युज़िक, गिटार, सरोद, मेलोडिका, पियानो, सिंथेसाइज़र एवं इंडो-अफ़्रो वाद्य-यंत्रों,जिनमें ड्रम इन्हें सबसे ज्यादा पसंद था, को सीखना शुरू कर दिया। ये फ़्युज़न संगीत एवं एथनीक तरीकों(स्टाइल्स) में पारंगत हैं। ये अपनी धुनों को प्रोग्राम करना, साथ हीं साथ अपने स्टुडियो में मिक्स एवं रिकार्ड करना काफी पसंद करते हैं। किसी भी धुन को अरेंज करते समय इनकी दिली ख्वाहिश रहती है कि कम से कम साज़ों का इस्तेमाल हो। "तेरे बिन", जो आवाज़ पर इनकी पहली पेशकश है, को अरेंज करते समय भी इन्होंने इसी बात का ध्यान रखा है।

कुहू गुप्ता (गायिका)
पुणे में रहने वाली कुहू गुप्ता पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं। गायकी इनका जज्बा है। ये पिछले 6 वर्षों से हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ले रही हैं। इन्होंने राष्ट्रीय स्तर की कई गायन प्रतिस्पर्धाओं में भाग लिया है और इनाम जीते हैं। इन्होंने ज़ी टीवी के प्रचलित कार्यक्रम 'सारेगामा' में भी 2 बार भाग लिया है। जहाँ तक गायकी का सवाल है तो इन्होंने कुछ व्यवसायिक प्रोजेक्ट भी किये हैं। वैसे ये अपनी संतुष्टि के लिए गाना ही अधिक पसंद करती हैं। इंटरनेट पर नये संगीत में रुचि रखने वाले श्रोताओं के बीच कुहू काफी चर्चित हैं। कुहू ने हिन्द-युग्म के ताजातरीन एल्बम 'काव्यनाद' में महादेवी वर्मा की कविता 'जो तुम आ जाते एक बार' को गाया है, जो इस एल्बम का सबसे अधिक सराहा गया गीत है। इस संगीत के सत्र में भी यह इनका छठा गीत है।

Song - Tere Bin
Voice - Kuhoo Gupta
Music - Venkatesh Sankaran
Lyrics - Ruchi Lamba
Arrangement and Mixing - Nilanjan Nandy
Graphics - Prashen's media


Song # 18, Season # 03, All rights reserved with the artists and Hind Yugm

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Friday, August 20, 2010

जब हुस्न-ए-इलाही बेपर्दा हुआ वी डी, ऋषि और नए गायक श्रीराम के रूबरू

Season 3 of new Music, Song # 17

सूफी गीतों का चलन इन दिनों इंडस्ट्री में काफी बढ़ गया है. लगभग हर फिल्म में एक सूफियाना गीत अवश्य होता है. ऐसे में हमारे संगीतकर्मी भी भला कैसे पीछे रह सकते हैं. सूफी संगीत की रूहानियत एक अलग ही किस्म का आनंद लेकर आती है श्रोताओं के लिए, खास तौर पे जब बात हुस्न-ए-इलाही की तो कहने ही क्या. जिगर मुरादाबादी के कलाम को विस्तार दिया है विश्व दीपक तन्हा ने. दोस्तों गुलज़ार साहब इंडस्ट्री में इस फन के माहिर समझे जाते हैं. ग़ालिब, मीर आदि उस्ताद शायरों के शेरों को मुखड़े की तरह इस्तेमाल कर आगे एक मुक्कमल गीत में ढाल देने का काम बेहद खूबसूरती से अंजाम देते रहे हैं वो. हम ये दावे के साथ कह सकते हैं इस बार हमारे गीतकार उनसे इक्कीस नहीं तो उन्नीस भी नहीं हैं यहाँ. ऋषि ने पारंपरिक वाद्यों का इस्तेमाल कर सुर रचे हैं तो गर्व के साथ हम लाये हैं एक नए गायक श्रीराम को आपके सामने जो दक्षिण भारतीय होते हुए भी उर्दू के शब्दों को बेहद उ्म्दा अंदाज़ में निभाने का मुश्किल काम कर गए हैं इस गीत में. साथ में हैं श्रीविद्या, जो इससे पहले "आवारगी का रक्स" गा चुकी हैं हमारे लिए. तो एक बार सूफियाना रंग में रंग जाईये, और डूब जाईये इस ताज़ा गीत के नशे में.

गीत के बोल -


इश्क़.. इश्क़
मौला का करम
इश्क़... इश्क़
आशिक का धरम

हम कहीं जाने वाले हैं दामन-ए-इश्क़ छोड़कर,
ज़ीस्त तेरे हुज़ूर में, मौत तेरे दयार में.....

हबीब-ए-हुस्न-ए-इलाही
हबीब-ए-हुस्न-ए-इलाही

हम ने जिगर की
बातें सुनी हैं
मीलों आँखें रखके
रातें सुनी हैं
एक हीं जिकर है
सब की जुबां पे
साँसें सारी जड़ दे
शाहे-खुबां पे

सालों ढूँढा खुद में जो रेहां
हमने पाया तुझमें वो निहां..

खुल्द पूरा हीं वार दें, हम तो तेरे क़रार पे....

हबीब-ए-हुस्न-ए-इलाही...
हबीब-ए-हुस्न-ए-इलाही...

मोहब्बत काबा-काशी
मोहब्बत कासा-कलगी
मोहब्बत सूफ़ी- साकी,
मोहब्बत हर्फ़े-हस्ती..

एक तेरे इश्क़ में डूबकर हमें मौत की कमी न थी,
पर जी गए तुझे देखकर, हमें ज़िंदगी अच्छी लगी।



मेकिंग ऑफ़ "हुस्न-ए-इलाही" - गीत की टीम द्वारा

श्रीराम: मैं सूफ़ी गानों का हमेशा से हीं प्रशंसक रहा हूँ, इसलिए जब ऋषि ने मुझसे यह पूछा कि क्या मैं "हुस्न-ए-इलाही" गाना चाहूँगा, तो मैंने बिना कुछ सोचे फटाफट हाँ कह दिया। इस गाने की धुन और बोल इतने खूबसूरत हैं कि पहली मर्तबा सुनने पर हीं मैं इसका आदी हो चुका था। गाने की धुन साधारण लग सकती है, लेकिन गायक के लिए इसमें भी कई सारे रोचक चैलेंजेज थे/हैं। ऋषि चाहते थे कि कि "सालों ढूँढा खुद में जो रेहां" पंक्ति को एक हीं साँस में गाया जाए। अब चूँकि यह पंक्ति बड़ी हीं खूबसूरत है तो मुझे हर लफ़्ज़ में जरूरी इमोशन्स और एक्सप्रेसन्स भी डालने थे और बिना साँस तोड़े हुए (जो कि असल में टूटी भी) यह करना लगभग नामुमकिन था। मैं उम्मीद करता हूँ कि मैंने इस पंक्ति के साथ पूरा न्याय किया होगा। इस गाने में कुछ शब्द ऐसे भी हैं, जिन्हें पूरे जोश में गाया जाना था और साथ हीं साथ गाने की स्मूथनेस भी बरकरार रखनी थी, इसलिए आवाज़ के ऊपर पूरा नियंत्रण रखना जरूरी हो गया था। विशेषकर गाने की पहली पंक्ति, जो हाई-पिच पर है.. इसे ऋषि ने गाने में तब जोड़ा जब पूरे गाने की रिकार्डिंग हो चुकी थी। चूँकि यह मेरा पहला ओरिजिनल है, इसलिए मेरी पूरी कोशिश थी कि यह गाना वैसा हीं बनकर निकले, जैसा ऋषि चाहते थे। मैं यह कहना चाहूँगा कि इसे गाने का मेरा अनुभव शानदार रहा। साथ हीं मैं श्रीविद्या की तारीफ़ करना चाहूँगा। उनकी मधुर मेलोडियस आवाज़ ने इस गाने में चार चाँद लगा दिए हैं। और अंत में मैं ऋषि और विश्व दीपक को इस खूबसूरत गाने के लिए बधाई देना चाहूँगा।

श्रीविद्या:मेर हिसाब से हर गीत कुछ न कुछ आपको सिखा जाता है. इस गीत में मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया इसकी धुन ने जो सूफी अंदाज़ की गायिकी मांगती है. हालाँकि मेरा रोल गीत में बेहद कम है पर फिर भी मैं खुश हूँ कि मैं इस गीत का हिस्सा हूँ. ये ऋषि के साथ मेरा दूसरा प्रोजेक्ट है और मुझे ख़ुशी है विश्व दीपक और श्रीराम जैसे पतिभाशाली कलाकारों के साथ ऋषि ने मुझे इस गीत के माध्यम से काम करने का मौका दिया

ऋषि एस: "हुस्न-ए-इलाही" गाने का मुखड़ा "जिगर मुरादाबादी" का है.. मेरे हिसाब से मुखड़ा जितना खूबसूरत है, उतनी हीं खूबसूरती से वी डी जी ने इसके आस-पास शब्द डाले हैं और अंतरा लिखा है। आजकल की तकनीकी ध्वनियों (टेक्नो साउंड्स) के बीच मुझे लगा कि एक पारंपरिक तबला, ढोलक , डफ़्फ़ वाला गाना होना चाहिए, और यही ख्याल में रखकर मैंने इस गाने को संगीतबद्ध किया है। मुंबई के श्रीराम का यह पहला ओरिज़िनल गाना है। उन्होंने इस गाने के लिए काफ़ी मेहनत की है और अपने धैर्य का भी परिचय दिया है। मैंने उनसे इस गाने के कई सारे ड्राफ़्ट्स करवाए, लेकिन वे कभी भी मजबूरी बताकर पीछे नहीं हटे। उनकी यह मेहनत इस गाने में खुलकर झलकती है। आउटपुट कैसा रहा, यह तो आप गाना सुनकर हीं जान पाएँगें। इस गाने में फीमेल लाइन्स बहुत हीं कम हैं, फिर भी श्रीविद्या जी ने अपनी आवाज़ देकर गाने की खूबसूरती बढा दी है। इस गाने को साकार करने के लिए मैं पूरी टीम का तह-ए-दिल से आभारी हूँ।

विश्व दीपक: आवाज़ पर महफ़िल-ए-ग़ज़ल लिखते-लिखते न जाने मैंने कितना कुछ जाना, कितना कुछ सीखा और कितना कुछ पाया.. यह गाना भी उसी महफ़िल-ए-ग़ज़ल की देन है। जिगर मुरादाबादी पर महफ़िल सजाने के लिए मैंने उनकी कितनी ग़ज़लें खंगाल डाली थी, उसी दौरान एक शेर पर मेरी नज़र गई। शेर अच्छा लगा तो मैंने उसे अपना स्टेटस मैसेज बना लिया। अब इत्तेफ़ाक देखिए कि उस शेर पर ऋषि जी की नज़र गई और उन्होंने उस शेर को मेरा शेर समझकर एक गाने का मुखरा गढ डाला। आगे की कहानी यह सूफ़ियाना नज़्म है| जहाँ तक इस नज़्म में गायिकी की बात है, तो पहले हम इसे पुरूष एकल (मेल सिंगल) हीं बनाना चाहते थे, लेकिन हमें सही मेल सिंगर मिल नहीं रहा था। हमने यह गाना श्रीराम से पहले और दो लोगों को दिया था। एक ने पूरा रिकार्ड कर भेज भी दिया, लेकिन हमें उसकी गायिकी में कुछ कमी-सी लगी। तब तक हमारा काफ़ी समय जा चुका था। ऋषि इस गाने को जल्द हीं रिकार्ड करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने मुझसे पूछा कि हमारे पास फीमेल सिंगर्स हैं, क्या हम इसे फीमेल सॉंग बना सकते हैं। मुझे कोई आपत्ति नहीं थी, लेकिन ऋषि को हीं लगा कि गाने का मूड और गाने का थीम मेल सिंगर को ज्यादा सूट करता है। इस मुद्दे पर सोच-विचार करने के बाद आखिरकार हमने इसे दो-गाना (डुएट) बनाने का निर्णय लिया। श्रीविद्या ने अपनी रिकार्डिंग हमें लगभग एक महीने पहले हीं भेज दी थी। उनकी मीठी आवाज़ में आलाप और "इश्क़ इश्क़" सुनकर हमें अपना गाना सफल होता दिखने लगा। लेकिन गाना तभी पूरा हो सकता था, जब हमें एक सही मेल सिंगर मिल जाता। इस मामले में मैं कुहू जी का शुक्रिया अदा करना चाहूँगा, जिन्होंने ऋषि को श्रीराम का नाम सुझाया। श्रीराम की आवाज़ में यह गाना सुन लेने के बाद हमें यह पक्का यकीन हो चला था कि गाना लोगों को पसंद आएगा। मुज़िबु पर इस गाने को लोगों ने हाथों-हाथ लिया है, आशा करता हूँ कि हमारे आवाज़ के श्रोता भी इसे उतना हीं प्यार देंगे।

श्रीराम ऐमनी
मुम्बई में जन्मे और पले-बढे श्रीराम गायन के क्षेत्र में महज़ ७ साल की उम्र से सक्रिय हैं। ये लगभग एक दशक से कर्नाटक संगीत की शिक्षा ले रहे हैं। आई०आई०टी० बम्बे से स्नातक करने के बाद इन्होंने कुछ दिनों तक एक मैनेजमेंट कंसल्टिंग कंपनी में काम किया और आज-कल नेशनल सेंटर फॉर द परफ़ोर्मिंग आर्ट्स (एन०सी०पी०ए०) में बिज़नेस डेवलपेंट मैनेज़र के तौर पर कार्यरत हैं। श्रीराम ने अपने स्कूल और आई०आई०टी० बम्बे के दिनों में कई सारे स्टेज़ परफोरमेंश दिए थे और कई सारे पुरस्कार भी जीते थे। ये आई०आई०टी० के दो सबसे बड़े म्युज़िकल नाईट्स "सुरबहार" और "स्वर संध्या" के लीड सिंगर रह चुके हैं। श्रीराम हर ज़ौनर का गाना गाना पसंद करते हैं, फिर चाहे वो शास्त्रीय रागों पर आधारित गाना हो या फिर कोई तड़कता-फड़कता बालीवुड नंबर। इनका मानना है कि कर्नाटक संगीत में ली जा रही शिक्षा के कारण हीं इनकी गायकी को आधार प्राप्त हुआ है। ये हर गायक के लिए शास्त्रीय शिक्षा जरूरी मानते हैं। हिन्द-युग्म (आवाज़) पर यह इनका पहला गाना है।

श्रीविद्या कस्तूरी
कर्णाटक संगीत की शिक्षा बचपन में ले चुकी विद्या को पुराने हिंदी फ़िल्मी गीतों का खास शौक है, ये भी मुजीबु पे सक्रिय सदस्या हैं. ये इनका दूसरा मूल हिंदी गीत है। हिन्द-युग्म पर इनकी दस्तक सजीव सारथी के लिखे और ऋषि द्वारा संगीतबद्ध गीत "आवारगी का रक्स" के साथ हुई थी।

ऋषि एस
ऋषि एस॰ ने हिन्द-युग्म पर इंटरनेट की जुगलबंदी से संगीतबद्ध गीतों के निर्माण की नींव डाली है। पेशे से इंजीनियर ऋषि ने सजीव सारथी के बोलों (सुबह की ताज़गी) को अक्टूबर 2007 में संगीतबद्ध किया जो हिन्द-युग्म का पहला संगीतबद्ध गीत बना। हिन्द-युग्म के पहले एल्बम 'पहला सुर' में ऋषि के 3 गीत संकलित थे। ऋषि ने हिन्द-युग्म के दूसरे संगीतबद्ध सत्र में भी 5 गीतों में संगीत दिया। हिन्द-युग्म के थीम-गीत को भी संगीतबद्ध करने का श्रेय ऋषि एस॰ को जाता है। इसके अतिरिक्त ऋषि ने भारत-रूस मित्रता गीत 'द्रुजबा' को संगीत किया। मातृ दिवस के उपलक्ष्य में भी एक गीत का निर्माण किया। भारतीय फिल्म संगीत को कुछ नया देने का इरादा रखते हैं।

विश्व दीपक 'तन्हा'
विश्व दीपक हिन्द-युग्म की शुरूआत से ही हिन्द-युग्म से जुड़े हैं। आई आई टी, खड़गपुर से कम्प्यूटर साइंस में बी॰टेक॰ विश्व दीपक इन दिनों पुणे स्थित एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी में बतौर सॉफ्टवेयर इंजीनियर अपनी सेवाएँ दे रहे हैं। अपनी विशेष कहन शैली के लिए हिन्द-युग्म के कविताप्रेमियों के बीच लोकप्रिय विश्व दीपक आवाज़ का चर्चित स्तम्भ 'महफिल-ए-ग़ज़ल' के स्तम्भकार हैं। विश्व दीपक ने दूसरे संगीतबद्ध सत्र में दो गीतों की रचना की। इसके अलावा दुनिया भर की माँओं के लिए एक गीत को लिखा जो काफी पसंद किया गया।

Song - Husn-E-Ilaahi
Voice - Sriraam and Srividya
Music - Rishi S
Lyrics - Vishwa Deepak
Graphics - Prashen's media


Song # 16, Season # 03, All rights reserved with the artists and Hind Yugm

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Saturday, August 14, 2010

जिसे अंधी गंदी खाईयों से लाए हम बचा के, उस आजादी को हरगिज़ न मिटने देंगें- ये प्रण लिया वी डी, बिस्वजीत और सुभोजीत ने

Season 3 of new Music, Song # 16

६३ वर्ष बीत चुके हैं हमें आजाद हुए. मगर अब समय है सचमुच की आजादी का. तन मन और सोच की आजादी का. अभी बहुत से काम बाकी है, क्योंकि जंग अभी भी जारी है. आतंकवाद, नक्सलवाद, भ्रष्टाचार, जाने कितने अन्दुरुनी दुश्मन हैं जो हमारे इस देश की जड़ों को अंदर से खोखला कर रहे हैं. आज समय आ गया है कि हम स्मरण करें उन देशभक्तों की कुर्बानियों का जिनके बदौलत आज हम खुली हवा में सांस ले पा रहे हैं. आज समय है एक बार फिर उस सोयी हुई देशभक्ति को जगाने का जिसके अभाव में हम ईमानदारी, इंसानियत और इन्साफ के कायदों को भूल ही चुके हैं. आज समय है उस राष्ट्रप्रेम में सरोबोर हो जाने का जो त्याग और कुर्बानी मांगती है, जो एक होकर चलने की रवानी मांगती है. कुछ यही सोच यही विचार हम पिरो कर लाये हैं अपने इस नए स्वतंत्रता दिवस विशेष गीत में, जिसे लिखा है विश्व दीपक तन्हा ने, सुरों से सजाया है सुभोजित ने और गाया है बिस्वजीत ने. जी हाँ इस तिकड़ी का कमाल आप बहुत से पिछले गीतों में भी सुन ही चुके है, जाहिर है इस गीत में भी इन तीनों ने जम कर मेहनत की है. तो आईये सुनते है आज का ये ताज़ा अपलोड और इस स्वतंत्र दिवस को महज एक छुट्टी का दिन न रहने दें बल्कि इसे एक नए शुरूआत का शुभ मुहूर्त बन जाने दें, क्योंकि एक छोटी सी कोशिश ही एक बड़े आन्दोलन की शुरूआत होती है.

गीत के बोल -

हिन्दोस्तां.. मेरी खुशी
हिन्दोस्तां.. मेरी हँसी
हिन्दोस्तां.. मेरे आँसू
हिन्दोस्तां.. मेरा लहू..

इसे अंधी गंदी खाईयों से लाए हम बचा के,
इसे गोरी गाली गोलियों से लाए सर भिड़ा के,
इसे हमने अपने माथे रखा सरपंच बना के...

इसे अंधी गंदी खाईयों से लाए हम बचा के,
इसे गोरी गाली गोलियों से लाए सर भिड़ा के,
इसे हमने अपने माथे रखा सरपंच बना के...


हिम्मत जब जागे,
कुदरत भी पग लागे,
भारत के आगे
दहशत फिर काहे...

आ जा हर डर
को कर दें
ज़र्रा..
स्वाहा..

हाँ दिखला दें
इस हिन्द पर
कुर्बां.....
है जां...

गर चाहें हम
थर्रा दें..
अंबर..
भूतल..

यूँ चुप हैं
पर दम लें
बनकर
शंकर..

ये तो नीली काली आँखों तले सुनामी उछाले
ये तो खौली खौली साँसों में सौ तूफ़ानें उबाले
ये तो सोए सोए सीनों में भी हड़कंप मचा दे....

ये तो नीली काली आँखों तले सुनामी उछाले
ये तो खौली खौली साँसों में सौ तूफ़ानें उबाले
ये तो सोए सोए सीनों में भी हड़कंप मचा दे....



मेकिंग ऑफ़ "हिन्दोस्तां" - गीत की टीम द्वारा

बिस्वजीत: माँ और मातृभूमि दोनों के लिए गाना गाना एक सौभाग्य की बात होती है। मैं चाहे कितनी भी दूर रहूँ, जब भी राष्ट्रगान सुनता हूँ, रौंगटे खड़े हो जाते हैं। सुभो ने जब ये गाना भेजा, मैं बहुत खुश हुआ था। इसलिए नहीं कि मुझे एक गाना मिला, बल्कि इसलिए कि मेरी मातृभूमि के लिए एक गाना मैं गा पाऊँगा। और उन सबके लिए एक संदेश दे पाऊँगा जो हमारी धरती को बाँटने की कोशिश में जुड़े हैं। लेकिन उनको नहीं पता कि जिस धरती को वो तोड़ना चाहते हैं वो धरती नानक, वीर भगत सिंह और राम जी की है। हम अगर एक बार जग गए तो मिट जाएँगे वो लोग। आज मेरा जन्मदिन भी है। जन्मदिन पे इससे बड़ा तोहफ़ा और क्या मिल सकता है। वीडी भाई के बारे में आजकल बोलना हीं मैंने बंद कर दिया है। भाई, जो गगन को छूए, उसकी ऊँचाई की क्या तारीफ़ की जाए। सुभो का संगीत भी दिल को छू लेने वाला है। कुल-मिलाकर यह कह सकता हूँ कि यह गाना मेरे लिए बहुत हीं खास है और मैंने इसके लिए बहुत मेहनत की है। गाना रिकार्ड करने के लिए मुझे कितने पापड़ बेलने पड़े, यह मैं हीं जानता हूँ, लेकिन देश के लिए अगर इतना भी न किया तो फिर गायकी का क्या फ़ायदा। हाँ, रिकार्डिंग स्टुडियो के चक्कर लगा-लगाकर थक जाने के बाद मैंने यह निर्णय ले लिया है कि जल्द हीं अपना "होम स्टुडियो" सेट-अप करूँगा। उसके बाद तो दोस्तों की यह शिकायत भी दूर हो जाएगी कि मैं हमेशा गायब हो जाता हूँ। फिर मेरे गाने नियमित अंतराल पर आने लगेंगे। मुझे बस उसी दिन का इंतज़ार है।

सुभोजित: "उड़न-छूं" गाने पर काम करते वक़्त हमें यह ख्याल आया था कि इसी तरह का जोश भरा एक और गाना किया जाए। विषय कौन-सा हो, यह प्रश्न था, लेकिन हमारी यह मुश्किल भी आसान हो गई, जब बिस्वजीत ने स्वतंत्रता दिवस के नज़दीक होने की बात उठा दी। हम सबने मिलकर यही निर्णय लिया कि देश-भक्ति से ओत-प्रोत एक गाना तैयार किया जाए। "उडन-छूं" के खत्म होने की देर थी कि हमारी तिकड़ी "हिन्दोस्तां" की ओर चल पड़ी। मैंने कुछ महिनों पहले दो-चार देश-भक्ति गानों की धुन बनाई थी, लेकिन वे गाने धुन तक हीं सीमित थे। जब "हिन्दोस्तां" की बात चली तो मैंने उन्हीं में से एक धुन विश्व दीपक के पास भेज दी। कम्पोजिशन और अरेंज़मेंट हो जाने के बाद बिस्वजीत भाई गाने का हिस्सा बन गए। जिस वक्त गाना तैयार हुआ, उस वक्त बिस्वजीत भारत आए हुए थे, इसलिए हमें डर था कि यह गाना १५ अगस्त से पहले हो पाएगा या नहीं। लेकिन मैं बिस्वजीत की तारीफ़ करूँगा जो भारत से लौटने के बाद बड़े हीं कम वक़्त में उन्होंने गाना रिकार्ड कर लिया। अभी तक मैंने बिस्वजीत और विश्व दीपक के साथ कई सारे गाने किये हैं, मेरा अनुभव इनके साथ बहुत हीं अच्छा रहा है, इसलिए उम्मीद करता हूँ कि आगे भी हमारी यह तिकड़ी कायम रहेगी और इसी तरह नए-नए गानों पर काम करती रहेगी।

विश्व दीपक:अब इसे विडंबना कहिए या फिर हमारा दुर्भाग्य कि हमारी देश-भक्ति साल के बस दो या तीन दिनों के आसपास हीं सिमट कर रह गई है। १५ अगस्त पास हो या २६ जनवरी आने वाली हो, तो यकायक लोगों को हिन्दुस्तान की याद हो जाती है। बातों में कहीं से छुपते-छुपाते देश-प्रेम के दो बोल उभर आते हैं या फिर देश के लिए कोई चिंता हीं ज़ाहिर कर दी जाती है। जहाँ हमें साल के ३६५ दिन हिन्द का ख्याल रखना चाहिए था, वहाँ बस दो-तीन दिन यह जोश-ओ-जुनून देखकर बुरा लगता है। अगर हम इस स्थिति को सुधारना चाहते हैं और चाहते हैं कि लोग अपने देश को पूरी तरह से न भूल जाएँ तो हमें अपने भाईयों को यह याद दिलाना होगा कि यह हिन्द क्या है, क्या था, क्या हो सकता है और क्या कर सकता है। बस यही प्रयास लेकर हम इस गाने के साथ हाज़िर हुए हैं.. गाना बनाने का विचार कहाँ से आया? तो "उड़न छूं" की सफ़लता के बाद बिस्वजीत भाई उसी जोश को दुहराना चाहते थे। उन्होंने हीं सुझाया कि एक देशभक्ति गाना किया जाए। सुभोजित ने अपनी तिजोड़ी से एक धुन निकालकर मेरे हवाले कर दिया। मैं चाहता था कि मुखरे का पहला शब्द हीं देश को समर्पित हो। मेरा सौभाग्य देखिए कि "हिन्दोस्तां" शब्द ट्युन पर फिट बैठ गया। "हिन्दोस्तां" शब्द इस्तेमाल करने के पीछे मेरा एक और मक़सद था। एक दोस्त के साथ झड़प हो गई थी कि "हिन्दोस्तां" और "हिन्दी" में कोई संबंध है या नहीं। उसने "हिन्दोस्तां" को सांप्रदायिक बनाने के लिए इसे "हिन्दु" से जोड़ दिया और कहा कि अपना देश "भारत" कहा जाना चाहिए। मुझे यह दिखाना था कि चाहे कोई कुछ भी कहे "हिन्दोस्तां" शब्द सांप्रदायिक नहीं और अपने देश को इस नाम से पुकारने में कोई बुराई नहीं। बस इसी वज़ह से मैंने गाने में अपने देश को "हिन्दोस्तां" से संबोधित किया है.. हाँ अंतरा में एक जगह भारत भी है.. और वह इसलिए कि मुझे अपने देश के हर नाम से प्यार है। आपको भी होगा.. है ना?


बिस्वजीत
बिस्वजीत युग्म पर पिछले 1 साल से सक्रिय हैं। हिन्द-युग्म के दूसरे सत्र में इनके 5 गीत (जीत के गीत, मेरे सरकार, ओ साहिबा, रूबरू और वन अर्थ-हमारी एक सभ्यता) ज़ारी हो चुके हैं। ओडिसा की मिट्टी में जन्मे बिस्वजीत शौकिया तौर पर गाने में दिलचस्पी रखते हैं। वर्तमान में लंदन (यूके) में सॉफ्टवेयर इंजीनियर की नौकरी कर रहे हैं। इनका एक और गीत जो माँ को समर्पित है, उसे हमने विश्व माँ दिवस पर रीलिज किया था।

सुभोजित
संगीतकार सुभोजित स्नातक के प्रथम वर्ष के छात्र हैं, युग्म के दूसरे सत्र में इनका धमाकेदार आगमन हुआ था हिट गीत "आवारा दिल" के साथ, जब मात्र १८ वर्षीय सुभोजित ने अपने उत्कृष्ट संगीत संयोजन से संबको हैरान कर दिया था. उसके बाद "ओ साहिबा" भी आया इनका और बिस्वजीत के साथ ही "मेरे सरकार" वर्ष २००९ में दूसरा सबसे लोकप्रिय गीत बना. अपनी बारहवीं की परीक्षाओं के बाद कोलकत्ता का ये हुनरमंद संगीतकार
तीसरे सत्र में उड़न छूं के साथ लौटा। विश्व दीपक के लिखे और बिस्वजीत के गाए उस गीत को भी खूब पसंद किया गया था।

विश्व दीपक 'तन्हा'
विश्व दीपक हिन्द-युग्म की शुरूआत से ही हिन्द-युग्म से जुड़े हैं। आई आई टी, खड़गपुर से कम्प्यूटर साइंस में बी॰टेक॰ विश्व दीपक इन दिनों पुणे स्थित एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी में बतौर सॉफ्टवेयर इंजीनियर अपनी सेवाएँ दे रहे हैं। अपनी विशेष कहन शैली के लिए हिन्द-युग्म के कविताप्रेमियों के बीच लोकप्रिय विश्व दीपक आवाज़ का चर्चित स्तम्भ 'महफिल-ए-ग़ज़ल' के स्तम्भकार हैं। विश्व दीपक ने दूसरे संगीतबद्ध सत्र में दो गीतों की रचना की। इसके अलावा दुनिया भर की माँओं के लिए एक गीत को लिखा जो काफी पसंद किया गया।

Song - Hindostaan
Voice - Biswajith Nanda
Music - Subhojit
Lyrics - Vishwa Deepak
Graphics - Prashen's media


Song # 16, Season # 03, All rights reserved with the artists and Hind Yugm

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Friday, July 23, 2010

दुम न हिलाओ, कान काट खाओ.....उबलता आक्रोश युवाओं का समेटा वी डी, ऋषि और उन्नी ने इस नए गीत में

Season 3 of new Music, Song # 15

"जला दो अभी फूंक डालो ये दुनिया...", गुरु दत्त के स्वरों में एक सहमा मगर संतुलित आक्रोश था जिसे पूरे देश के युवाओं में समझा. बाद के दशकों में ये स्वर और भी मुखरित हुए, कभी व्यंग बनकर (हाल चाल ठीक ठाक है) कभी गुस्सा (दुनिया माने बुरा तो गोली मारो) तो कभी अंडर करंट आक्रोश (खून चला) बनकर. कुछ ऐसे ही भाव लेकर आये हैं आज के युवा गीतकार विश्व दीपक "तन्हा" अपने इस नए गीत में. ऋषि पर आरोप थे कि उनकी धुनों में नयापन नहीं दिख रहा, पर हम बताना चाहेंगें कि हमारे अब तक के सभी सत्रों में ऋषि के गीत सबसे अधिक बजे हैं, जाहिर है एक संगीतकार के लिहाज से उनका अपना एक स्टाइल है जो अब निखर कर सामने आ रहा है, रही बात विविधता की तो हमें लगता है कि जितने विविध अंदाज़ ऋषि ने आजमाए हैं शायद ही किसी ने किये होंगें. अब आज का ही गीत ले लीजिए, ये उनके अब तक के सभी गीतों से एकदम अलग है. गायक उन्नी का ये दूसरा गीत है इस सत्र में, पर पहला एकल गीत भी है ये उनका. गीत के अंत में कुछ संवाद भी हैं जिन्हें आवाज़ दी है खुद विश्व दीपक ने, बैक अप आवाज़ तो ऋषि की है ही....तो लीजिए सुनिए आज का ये जोश से भरा दनदनाता गीत.

गीत के बोल -

सादी या आधी या पौनी थालियाँ,
भूखे को सारी……. हैं गालियाँ….

झटका ज़रा दो,
फ़टका जमा दो,
हक़ ना मिले तो,
ऐसी की तैसी……

दुम ना हिलाओ,
कान काट खाओ,
हड्डियाँ चबाओ,
ऐसी की तैसी….

भुलावे में जिये अभी तक,
चढावे में दिये उन्हें सब,
मावे की लगी जो हीं लत,
वादों पे लगी चपत…….

झटका ज़रा दो,
फ़टका जमा दो,
हक़ ना मिले तो,
ऐसी की तैसी……

दुम ना हिलाओ,
कान काट खाओ,
हड्डियाँ चबाओ,
ऐसी की तैसी….

लुट के, घुट के, फुट के, रोना क्या?
लुट के, घुट के, फुट के, रोना क्या?
लुट के, घुट के, फुट के, रोना क्या?
लुट के, घुट के, फुट के, रोना क्या?

बढ के गढ ले…. आ जा………. बरछा धर ले…….

ऐसी की तैसी….

मौका है ये
जाने ना दे
कांधे पर से

बेताल फिर डाल पर….

छलावे से छिने हुए घर ,
अलावे जां जमीं मुकद्दर,
दावे से तेरे होंगे सब,
हो ले जो ऐसा अजब…

झटका ज़रा दो,
फ़टका जमा दो,
हक़ ना मिले तो,
ऐसी की तैसी……

दुम ना हिलाओ,
कान काट खाओ,
हड्डियाँ चबाओ,
ऐसी की तैसी….

कचरा हटा दो,
ऐसी की तैसी….
लफ़ड़ा मिटा दो,
ऐसी की तैसी…

तुम्हें बिगड़ा कहे जो,
पिछड़ा कहे जो,
उसकी तो
ऐसी की तैसी…



ऐसी की तैसी - द रीबेल है मुज़ीबु पर भी, जिसे श्रोताओं ने खूब सराहा है... देखिए यहाँ

मेकिंग ऑफ़ "ऐसी की तैसी- द रीबेल" - गीत की टीम द्वारा

ऋषि एस: ये शायद मेरा पहला गाना है जो मेलोडी पर आधारित नहीं है। ऐसे गानों की उम्र कम होती है क्योंकि ५ या १० सालों बाद समकालीन संगीत (contemporary music) का साउंड बदल जाएगा और ऐसे गानों को सुनने में तब मज़ा नहीं आएगा जितना आज आता है। ऐसी हालत में गाने को जीवित रखने वाली बात उसके बोल में होती है, और इस गाने में वीडी ने सामाजिक मुद्दों से जुड़ा विषय चुना है। गाने में जो संदेश है वही इस गाने को समय के साथ बिखरने, बिगड़ने और पुराना होने से बचाएगा और यही संदेश गाने में जो मेलोडी की कमी है उसे पूरा करेगा। इसलिए मुझे इस गाने पर फख्र है। उन्नी के साथ यह मेरा पहला गाना है। भले हीं उन्नी ने इस जौनर का कोई भी गाना पहले नहीं गाया है, लेकिन पहले प्रयास में हीं उन्नी ने इस गाने को बखूबी निभाया है।

उन्नीकृष्णन के बी: ये एक बहुत ही शानदार तजुर्बा रहा मेरे लिए. अमूमन मैं कुछ शास्त्रीय या राग आधारित रोमांटिक गीत गाना अधिक पसंद करता था, पर ये गाना अपने संगीत में, शब्दों में ट्रीटमेंट में हर लिहाज से एकदम अलग था. इसे गाने के लिए मुझे अपने कम्फर्ट जोन से बाहर आना था, ऋषि और वी डी का ये आईडिया था और उन्हें इस पर पूरा विश्वास भी था, संशय था तो बस मुझे था क्योंकि मेरे लिए ये स्टाईल बिलकुल अलग था, पर इन दोनों के निर्देशन में मैंने ये कोशिश की, और मुझे गर्व है जो भी अंतिम परिणाम आया है, इस गीत का हिस्सा मुझे बनाया इसके लिए मैं ऋषि और वी डी का शुक्रगुजार हूँ.

विश्व दीपक तन्हा: बहुत दिनों से मेरी चाहत थी कि ऐसा हीं कुछ लिखूँ, लेकिन सही मौका नहीं मिल पा रहा था। फिर एक दिन ऋषि जी ने इस गाने का ट्युन भेजा। पहली मर्तबा सुनने पर हीं यह जाहिर हो गया कि इसके साथ कुछ अलग किया जा सकता है। लेकिन ऋषि जी ने समय की कमी का हवाला देकर यह कह दिया कि आप जो कुछ भी लिख सकते हो, लिख दो, जरूरी नहीं कि हम कोई ठोस संदेश दे हीं। फिर भी मैंने उन्हें विश्वास दिलाया कि कुछ न कुछ संदेश तो होगा हीं, क्योंकि किसी मस्ती भरे गाने के माध्यम से अगर हम समाज को मैसेज़ देने में कामयाब होते हैं तो इसमें हमारी जीत है। मैने उन्हें यह भी यकीन दिलाया कि मैं इसे लिखने में ज्यादा समय न लूँगा, इसलिए आप मेरी तरफ से निश्चिंत रहें। गाना लिखने के दौरान मैंने एक-दो जगहों पर ट्युन से भी छेड़-छाड़ की, जैसे "बेताल फिर डाल पर" यह पंक्ति कहीं भी फिट नहीं हो रही थी, फिर भी ऋषि जी ने मेरी भावनाओं का सम्मान करते हुए बोल के हिसाब से धुन में परिवर्त्तन कर दिया। गाने के बोल और धुन तैयार हो जाने के बाद गायक की बात आई तो ऋषि जी ने उन्नी के नाम का सुझाव दिया। मैने उन्नी को पहले सुना था और मुझे उनकी आवाज़ पसंद भी आई थी, इसलिए मैंने भी हामी भर दी। मेरे हिसाब से उन्नी ने इस गाने के लिए अच्छी-खासी मेहनत की है और यह मेहनत गाने में दिखती है। हम तीनों ने मिलकर जितना हो सकता था, उतना "आक्रोश" इस गाने में डाला है.. उम्मीद करता हूँ कि आप तक हमारी यह फीलिंग पहूँचेगी। और हाँ, इस गाने के अंतिम ५ या १० सेकंड मेरी आवाज़ में हैं। ऋषि जी कहते हैं कि यह मेरी गायकी की शुरूआत है, आपको भी ऐसा लगता है क्या? :)
उन्नीकृष्णन के बी
उन्नीकृष्णन पेशे से कम्प्यूटर इन्जीनियर हैं लेकिन संगीत का शौक बचपन से ही रखते हैं। कर्नाटक शास्त्रीय संगीत में इन्होंने विधिवत शिक्षा प्राप्त की है तथा स्कूल व कालिज में भी स्टेज पर गाते आये हैं। नौकरी शुरू करने के बाद कुछ समय तक उन्नी संगीत को अपनी दिनचर्या में शामिल नहीं कर पाये मगर पिछले काफी वक्त से वो फिर से नियमित रूप से रियाज़ कर रहे हैं‚ हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ले रहे हैं‚ गाने रिकार्ड कर रहे हैं और आशा करते हैं कि अपनी आवाज़ के माध्यम से अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचें।

ऋषि एस
ऋषि एस॰ ने हिन्द-युग्म पर इंटरनेट की जुगलबंदी से संगीतबद्ध गीतों के निर्माण की नींव डाली है। पेशे से इंजीनियर ऋषि ने सजीव सारथी के बोलों (सुबह की ताज़गी) को अक्टूबर 2007 में संगीतबद्ध किया जो हिन्द-युग्म का पहला संगीतबद्ध गीत बना। हिन्द-युग्म के पहले एल्बम 'पहला सुर' में ऋषि के 3 गीत संकलित थे। ऋषि ने हिन्द-युग्म के दूसरे संगीतबद्ध सत्र में भी 5 गीतों में संगीत दिया। हिन्द-युग्म के थीम-गीत को भी संगीतबद्ध करने का श्रेय ऋषि एस॰ को जाता है। इसके अतिरिक्त ऋषि ने भारत-रूस मित्रता गीत 'द्रुजबा' को संगीत किया। मातृ दिवस के उपलक्ष्य में भी एक गीत का निर्माण किया। भारतीय फिल्म संगीत को कुछ नया देने का इरादा रखते हैं।

विश्व दीपक तन्हा
विश्व दीपक हिन्द-युग्म की शुरूआत से ही हिन्द-युग्म से जुड़े हैं। आई आई टी, खड़गपुर से कम्प्यूटर साइंस में बी॰टेक॰ विश्व दीपक इन दिनों पुणे स्थित एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी में बतौर सॉफ्टवेयर इंजीनियर अपनी सेवाएँ दे रहे हैं। अपनी विशेष कहन शैली के लिए हिन्द-युग्म के कविताप्रेमियों के बीच लोकप्रिय विश्व दीपक आवाज़ का चर्चित स्तम्भ 'महफिल-ए-ग़ज़ल' के स्तम्भकार हैं। विश्व दीपक ने दूसरे संगीतबद्ध सत्र में दो गीतों की रचना की। इसके अलावा दुनिया भर की माँओं के लिए एक गीत को लिखा जो काफी पसंद किया गया।
Song - Aaissi Kii Taiisi
Voice - Unnikrishnan K B
Backup voice - Rishi S
Music - Rishi S
Lyrics - Vishwa Deepak Tanha
Graphics - samarth garg


Song # 15, Season # 03, All rights reserved with the artists and Hind Yugm

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Friday, June 25, 2010

एक नया अंदाज़ फिज़ा में बिखेरा "उड़न छूं" ने, जिसके माध्यम से वापसी कर रहे हैं बिश्वजीत और सुभोजित

Season 3 of new Music, Song # 11

दोस्तों, आवाज़ संगीत महोत्सव २०१० में आज का ताज़ा गीत है एक बेहद शोख, और चुलबुले अंदाज़ का, इसकी धुन कुछ ऐसी है कि हमारा दावा है कि आप एक बार सुन लेंगें तो पूरे दिन गुनगुनाते रहेंगें. इस गीत के साथ इस सत्र में लौट रहे हैं पुराने दिग्गज यानी हमारे नन्हें सुभोजित और गायक बिस्वजीत एक बार फिर, और साथ हैं हमारे चिर परिचित गीतकार विश्व दीपक तन्हा भी. जहाँ पिछले वर्ष परीक्षाओं के चलते सुभोजित संगीत में बहुत अधिक सक्रिय नहीं रह पाए वहीं बिस्वजीत ने करीब एक वर्ष तक गायन से दूर रह कर रियाज़ पर ध्यान देने का विचार बनाया था. मगर देखिये जैसे ही आवाज़ का ये नया सत्र शुरू हुआ और नए गानों की मधुरता ने उन्हें अपने फैसले पर फिर से मनन करने पर मजबूर कर दिया, अब कोई मछली को पानी से कब तक दूर रख सकता है भला. तो लीजिए, एक बार फिर सुनिए बिस्वजीत को, एक ऐसे अंदाज़ में जो अब तक उनकी तरफ़ से कभी सामने नहीं आया, और सुभो ने भी वी डी के चुलबुले शब्दों में पंजाबी बीट्स और वेस्टर्न अंदाज़ का खूब तडका लगाया है इस गीत में

गीत के बोल -


आते जाते
काटे रास्ता क्यूँ,
बड़ी जिद्दी है री तू
हो जा चल उड़न छूं..

आते जाते
काटे रास्ता क्यूँ,
बड़ी जिद्दी है री तू
हो जा उड़न छूं..

तोले मोले जो तू हर दफ़ा,
हौले हौले छीने हर नफ़ा,
क्या बुरा कि आनाकानी करके
तेरे से बच लूँ..

तोले मोले जो तू हर दफ़ा,
हौले हौले छीने हर नफ़ा,
क्या बुरा कि आनाकानी करके
तेरे से बच लूँ..

छोरी! तू है काँटों जैसी लू.

आते जाते
काटे रास्ता क्यूँ,
बड़ी जिद्दी है री तू
हो जा चल उड़न छूं..

आते जाते
काटे रास्ता क्यूँ,
बड़ी जिद्दी है री तू
हो जा उड़न छूं

झोंके धोखे हीं तू हर जगह,
तोड़े वादे सारे हर तरह,
ये बता कि आवाज़ाही तेरी
कैसे मैं रोकूँ..

झोंके धोखे हीं तू हर जगह,
तोड़े वादे सारे हर तरह,
ये बता कि आवाज़ाही तेरी
कैसे मैं रोकूँ..

छोरी! मैं ना जलना हो के धूँ..

आते जाते
काटे रास्ता क्यूँ,
बड़ी जिद्दी है री तू
हो जा चल उड़न छूं..

आते जाते
काटे रास्ता क्यूँ,
बड़ी जिद्दी है री तू
हो जा उड़न छूं



मेकिंग ऑफ़ "उड़न छू" - गीत की टीम द्वारा

बिस्वजीत: "उड़न-छूं" मेरे लिए एक नया अनुभव था। मैंने आज तक जितने भी गाने किए हैं ये गाना सबसे हटकर है। सुभोजित और विश्व दीपक ने जब यह गाना मुझे सुनाया तभी मैंने इसे गाने का निर्णय कर लिया क्योंकि यह मेरे "ज़ौनर" का नहीं था। इसके शब्द और इसका संगीत मुझे इतना पसंद आया कि "फ़ीलिंग" खुद-ब-खुद आ गए। उम्मीद करता हूँ कि श्रोताओं को भी यह गाना सुनते हुए बहुत मज़ा आएगा।

सुभोजित: हिंद युग्म के लिए मैं २००८ से संगीत का काम कर रहा हूँ. बिस्वजीत और विश्व दीपक के साथ पहले भी बहुत से प्रोजेक्ट कर चुका हूं. ये गाना पहले से सोचकर तो नहीं बनाया था. बस अचानक यूहीं दिमाग में आया, और ट्रेक बना डाला, फिर मैंने विश्व दीपक को दिया इसे शब्द लिखने के लिए और फिर हमने बिस्वजीत को भेजा. अंतिम परिणाम हम सबके लिए बेहद संतोष जनक रहा.

विश्व दीपक: सुभोजित के लिए मैंने "मेरे सरकार" लिखा था, उसके बाद से सुभोजित के साथ जितने भी गाने किए (अमूमन ४-५ तो कर हीं लिए हैं) कोई भी रीलिज नहीं हो पाया, किसी न किसी वज़ह से गाने बीच में हीं अटक जा रहे थे। फिर एक दिन सुभोजित ने मुझे यह ट्युन भेजा.. ट्युन मुझे बेहद पसंद आया (इसमें सुभोजित की छाप नज़र आ रही थी) तो मैंने कह दिया कि यह गाना पेंडिंग में नहीं जाना चाहिए। अच्छी बात है कि उसी दौरान बिस्वजीत सक्रिय हो उठे और हमें पूरा यकीन हो गया कि यह गाना तो पूरा होगा हीं। मैंने इस तरह का गाना पहले कभी नहीं लिखा, जिसमें नायक नायिका से दूर हटने को कह रहा है (मैं तो प्यार-मोहब्बत के गाने लिखने में यकीन रखता हूँ :) ), लेकिन यह ट्युन सुनकर मुझे लगा कि छेड़-छाड़ भरा गाना लिखा जा सकता है। गाना पूरा होने और फिर बिस्वजीत की आवाज़ में इसे सुन लेने के बाद मुझे लगा कि मैं सफल हुआ हूँ.. कितना हुआ हूँ, यह तो आप सब हीं बताएँगे।

बिस्वजीत
बिस्वजीत युग्म पर पिछले 1 साल से सक्रिय हैं। हिन्द-युग्म के दूसरे सत्र में इनके 5 गीत (जीत के गीत, मेरे सरकार, ओ साहिबा, रूबरू और वन अर्थ-हमारी एक सभ्यता) ज़ारी हो चुके हैं। ओडिसा की मिट्टी में जन्मे बिस्वजीत शौकिया तौर पर गाने में दिलचस्पी रखते हैं। वर्तमान में लंदन (यूके) में सॉफ्टवेयर इंजीनियर की नौकरी कर रहे हैं। इनका एक और गीत जो माँ को समर्पित है, उसे हमने विश्व माँ दिवस पर रीलिज किया था।

सुभोजित
संगीतकार सुभोजित स्नातक के प्रथम वर्ष के छात्र हैं, युग्म के दूसरे सत्र में इनका धमाकेदार आगमन हुआ था हिट गीत "आवारा दिल" के साथ, जब मात्र १८ वर्षीया सुभोजित ने अपने उत्कृष्ट संगीत संयोजन से संबको हैरान कर दिया था. उसके बाद "ओ साहिबा" भी आया इनका और बिस्वजीत के साथ ही "मेरे सरकार" वर्ष २००९ में दूसरा सबसे लोकप्रिय गीत बना. अपनी बारहवीं की परीक्षाओं के बाद कोलकत्ता का ये हुनरमंद संगीतकार लौटा है पहली बार इस तीसरे सत्र में इस नए गीत के साथ

विश्व दीपक 'तन्हा'
विश्व दीपक हिन्द-युग्म की शुरूआत से ही हिन्द-युग्म से जुड़े हैं। आई आई टी, खड़गपुर से कम्प्यूटर साइंस में बी॰टेक॰ विश्व दीपक इन दिनों पुणे स्थित एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी में बतौर सॉफ्टवेयर इंजीनियर अपनी सेवाएँ दे रहे हैं। अपनी विशेष कहन शैली के लिए हिन्द-युग्म के कविताप्रेमियों के बीच लोकप्रिय विश्व दीपक आवाज़ का चर्चित स्तम्भ 'महफिल-ए-ग़ज़ल' के स्तम्भकार हैं। विश्व दीपक ने दूसरे संगीतबद्ध सत्र में दो गीतों की रचना की। इसके अलावा दुनिया भर की माँओं के लिए एक गीत को लिखा जो काफी पसंद किया गया।

Song - Udan Chhoo
Voice - Biswajith Nanda
Music - Subhojit
Lyrics - Vishwa Deepak
Graphics - Prashen's media


Song # 11, Season # 03, All rights reserved with the artists and Hind Yugm

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Friday, June 18, 2010

खुदा के अक्स और आवारगी के रक्स के बीच कुछ दर्द भी हैं मैले मैले से

Season 3 of new Music, Song # 10

12 जून को बाल श्रम निषेध दिवस मनाया गया, पर क्या इतने भर से हमारी जिम्मेदारी समाप्त हो जाती है ? श्रम करते, सड़कों पे पलते, अपने मूलभूत अधिकारों से वंचित बच्चे रोज हमारी आँखों के आगे से गुजरते हैं, और हम चुपचाप किनारा कर आगे बढ़ जाते हैं. हिंद युग्म आज एक कोशिश कर रहा है, इन उपेक्षित बच्चों के दर्द को कहीं न कहीं अपने श्रोताओं के ह्रदय में उतारने की, आवाज़ संगीत महोत्सव के तीसरे सत्र के दसवें गीत के माध्यम से. इस आयोजन में हमारे साथी बने हैं संगीतकार ऋषि एस, और गीतकार सजीव सारथी. साथ ही इस गीत के माध्यम से दो गायिकाओं की भी आमद हो रही है युग्म के मंच पर. ये गायिकाएं है श्रीविध्या कस्तूरी और तारा बालाकृष्णन. हम आपको याद दिला दें कि आवाज़ के इतिहास में ये पहला महिला युगल गीत है.

गीत के बोल -



उन नन्हीं आँखों में,
देखो तो देखो न,
उन हंसीं चेहरों को,
देखो तो देखो न,
शायद खुदा का अक्स है,
आवारगी का रक्स है,
सारे जहाँ का हुस्न है,
या जिंदगी का जश्न है...
उन नन्हीं....

बेपरवाह, बेगरज,
उडती तितलियों जैसी,
हर परवाज़ आसमां को,
छूती सी उनकी,

पथरीले रास्तों पे,
लेकर कांच के सपने,
आँधियों से, पल पल,
लड़ती लौ, जिंदगी उनकी,

हँसी ठहाकों में, छुपी गीतों में,
दबी आहें भी है, कौन देखे उन्हें,
जगी रातों में, घुटी बातों में,
रुंधी सांसें भी है, कौन समझे उन्हें...

उन सूनी आँखों में,
झांको तो, झांको न,
उन नंगे पैरों तले,
देखो तो देखो न,
कुछ अनकही सी बातें हैं,
सहमी सहमी सी रातें हैं,
सारे शहर का गर्द है,
मैले मैले से दर्द हैं....
.



"आवारगी का रक्स" है मुजिबू पर भी, जहाँ श्रोताओं ने इसे खूब पसंद किया है

मेकिंग ऑफ़ "आवारगी का रक्स" - गीत की टीम द्वारा

श्रीविध्या कस्तूरी: मुझे इस गीत के बोल सबसे अधिक पसदं आये. ऐसे में इस शब्दों को गायन में व्यक्त करना मेरे हिसाब से इस प्रोजेक्ट का सबसे मुश्किल हिस्सा था मेरे लिए. पर ऋषि ने मुझे पूरे गीत का अर्थ, महत्त्व, और कहाँ मुझे कैसे गाना है आदि बहुत विस्तार से बताया, मैं उनकी शुक्रगुजार हूँ कि उन्होंने मुझे इस गीत का हिस्सा बनाया, मुझे आगे भी इस टीम के साथ काम करने में खुशी होगी.

तारा बालाकृष्णन: ऋषि, विध्या और सजीव के साथ इस प्रोजेक्ट में काम करना एक बेहद सुखद अनुभव रहा. ये एक बेहद खूबसूरत धुन है और उसी अनुरूप सटीक शब्द भी दिए है सजीव ने. मुझे भी सबसे अधिक इस गीत के थीम ने ही प्रभावित किया. ये अनाथ बच्चों के जीवन पर है और गीत में बहुत सी मिली जुली भावनाओं का समावेश है, मेरे लिए ये एक सीखने लायक अनुभव था, शुक्रिया ऋषि, आपने इस गीत के लिए मुझे चुना.

ऋषि एस: ये गीत लिखा गया था २००८ में, और ठीक १ साल बाद यानी २००९ में उसकी धुन बनी, और आज उसके १ साल बाद युग्म में शामिल हो रहा है ये गीत. रोमांटिक गीतों की भीड़ में कुछ अलग थीम पर काम करना बेहद उत्साहवर्धक होता है. शुक्रिया विध्या और तारा का जिन्होंने इस गीत में जान फूंकी, और शुक्रिया सजीव का जो हमेशा ही नए थीमों पर काम करने के लिए तत्पर रहते हैं.

सजीव सारथी:अपने खुद के लिखे गीतों में मेरे लिए ये गीत बेहद खास है. ये मूल रूप से एक कविता है, जिसे अपने मूल स्वरुप में स्वरबद्ध करने की कोशिश की पहले ऋषि ने, मगर नतीजा संतोषजनक न मिलने के करण हम सब दूसरे कामों में लग गए, मैं लगभग इसके बारे में भूल ही चुका था कि ऋषि ने एक दिन कविता में पंक्तियों के क्रमों में हल्की फेर बदल के साथ ये धुन पेश की, बस फिर तो ये नगमा हम सब की पहली पसंद बन गया. इसे एक महिला युगल रखने का विचार भी ऋषि का था और तारा -विध्या भी उन्हीं की खोज है, ये गीत मेरे दिल के बहुत करीब है और यदि संभव हुआ तो किसी दिन इसका एक विडियो संस्करण भी बनाऊंगा


तारा बालाकृष्णन
शास्त्रीय गायन में निपुण तारा के लिए गायन जूनून है. पिछले दस सालों से की बोर्ड भी सीख और बजा रही हैं. इन्टरनेट पर ख़ासा सक्रिय है विशेषकर मुजीबु पर, हिंद युग्म पर ये इनका पहला गीत है.

विध्या
कर्णाटक संगीत की शिक्षा बचपन में ले चुकी विध्या को पुराने हिंदी फ़िल्मी गीतों का खास शौक है, ये भी मुजीबु पे सक्रिय सदस्या हैं. ये इनका पहला मूल हिंदी गीत है, और युग्म पर भी आज इसी गीत के माध्यम से इनकी ये पहली दस्तक है

सजीव सारथी
हिन्द-युग्म के 'आवाज़' मंच के प्रधान संपादक सजीव सारथी हिन्द-युग्म के वरिष्ठतम गीतकार हैं। हिन्द-युग्म पर इंटरनेटीय जुगलबंदी से संगीतबद्ध गीत निर्माण का बीज सजीव ने ही डाला है, जो इन्हीं के बागवानी में लगातार फल-फूल रहा है। कविहृदयी सजीव की कविताएँ हिन्द-युग्म के बहुचर्चित कविता-संग्रह 'सम्भावना डॉट कॉम' में संकलित है। सजीव के निर्देशन में ही हिन्द-युग्म ने 3 फरवरी 2008 को अपना पहला संगीतमय एल्बम 'पहला सुर' ज़ारी किया जिसमें 6 गीत सजीव सारथी द्वारा लिखित थे। पूरी प्रोफाइल यहाँ देखें।

ऋषि एस
ऋषि एस॰ ने हिन्द-युग्म पर इंटरनेट की जुगलबंदी से संगीतबद्ध गीतों के निर्माण की नींव डाली है। पेशे से इंजीनियर ऋषि ने सजीव सारथी के बोलों (सुबह की ताज़गी) को अक्टूबर 2007 में संगीतबद्ध किया जो हिन्द-युग्म का पहला संगीतबद्ध गीत बना। हिन्द-युग्म के पहले एल्बम 'पहला सुर' में ऋषि के 3 गीत संकलित थे। ऋषि ने हिन्द-युग्म के दूसरे संगीतबद्ध सत्र में भी 5 गीतों में संगीत दिया। हिन्द-युग्म के थीम-गीत को भी संगीतबद्ध करने का श्रेय ऋषि एस॰ को जाता है। इसके अतिरिक्त ऋषि ने भारत-रूस मित्रता गीत 'द्रुजबा' को संगीत किया। मातृ दिवस के उपलक्ष्य में भी एक गीत का निर्माण किया। भारतीय फिल्म संगीत को कुछ नया देने का इरादा रखते हैं।

Song - Awargi ka raks
Voice - Tara Balakrishnan, Srividya Kasturi and Rishi S
Music - Rishi S
Lyrics - Sajeev Sarathie
Photograph - Manuj Mehta


Song # 10, Season # 03, All rights reserved with the artists and Hind Yugm

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Friday, June 11, 2010

जीवन एक बुलबुला है, मानते हैं बालमुरली बालू, ह्रिचा मुखर्जी और सजीव सारथी

Season 3 of new Music, Song # 09

तीसरे सत्र के नौवें गीत के साथ हम हाज़िर हैं एक बार फिर. सजीव सारथी की कलम का एक नया रंग है इसमें, तो इसी गीत के माध्यम से आज युग्म परिवार से जुड रहे हैं दो नए फनकार. अमेरिका में बसे संगीतकार बालामुरली बालू और अपने गायन से दुनिया भर में नाम कमा चुकी ह्रिचा हैं ये दो मेहमान. वैश्विक इंटरनेटिया जुगलबंदी से बने इस गीत में जीवन के प्रति एक सकारात्मक रुख रखने की बात की गयी है, लेकिन एक अलग अंदाज़ में.

गीत के बोल -


रोको न दिल को,
उड़ने दो खुल के तुम,
जी लो इस पल को,
खुश होके आज तुम,
कोशिश है तेरे हाथों में मेरे यार,
हंसके अपना ले हो जीत या हार,
बुलबुला है बुलबुला / दो पल का है ये सिलसिला/
तू मुस्कुरा गम को भुला अब यार,
सिम सिम खुला / हर दर मिला, होता कहाँ ऐसा भला /
तो क्यों करे कोई गिला मेरे यार,

सपनें जो देखते हों तो,
सच होंगें ये यकीं रखो,
just keep on going on and on,
एक दिन जो था बुरा तो क्या,
आएगा कल भी दिन नया,
don't think that u r all alone,
कोई रहबर की तुझको है क्यों तलाश,
जब वो खुदा है हर पल को तेरे पास,
कुछ तो है तुझमें बात ख़ास,
बुलबुला है बुलबुला / दो पल का है ये सिलसिला/
तू मुस्कुरा गम को भुला अब यार,
सिम सिम खुला / हर दर मिला, होता कहाँ ऐसा भला /
तो क्यों करे कोई गिला मेरे यार,

रोको न दिल को,
उड़ने दो खुल के तुम,
जी लो इस पल को,
खुश होके आज तुम,
कोशिश है तेरे हाथों में मेरे यार,
हंसके अपना ले हो जीत या हार,
बुलबुला है बुलबुला / दो पल का है ये सिलसिला/
तू मुस्कुरा गम को भुला अब यार,
सिम सिम खुला / हर दर मिला, होता कहाँ ऐसा भला /
तो क्यों करे कोई गिला हम यार..
.



बुलबुला है मुजिबू पर भी, जहाँ श्रोताओं ने इसे खूब पसंद किया है

मेकिंग ऑफ़ "बुलबुला" - गीत की टीम द्वारा

बालामुरली बालू शुरू में मैंने सोचा था कि एक "निराश" गीत बनाऊं, उनके लिए जो जीवन से हार चुके है या किसी कारणवश बेहद दुखी हैं, फिर सोचा कि क्यों न इसी बात को दुखी अंदाज़ में कहने की बजाय जरा अपबीट अंदाज़ में कहा जाए. तो इस तरह ये धुन बनी, उसके बाद मैंने इसका डेमो सजीव को भेजा. मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब मैंने उनका लिखा गीत पढ़ा, उन्होंने मेरे एक एक नोट इतने सुन्दर शब्दों से सजा दिया था, पर मुझे लगा कि शब्दों के मूल धुन से अधिक उर्जा है, तो उसे समतुल्य करने के लिए मैंने एक बार फिर गीत के अरेंजमेंट का निरिक्षण किया और जरूरी बदलाव किये. उसके बाद ये गीत ह्रिचा के पास गया, अब ७ बार सा रे गा मा पा की विजेता से आप यही तो उम्मीद करेंगें न कि वो आपके गीत एक नयी ऊंचाई दे, और यही ह्रिचा ने किया भी...

ह्रिचा नील मुखर्जी: जब बाला ने पहली बार मुझसे इस गीत के लिए संपर्क किया तो जो चीज मुझे सबसे ज्यादा आकर्षित कर रही थी वो था, उनका बहुआयामी व्यक्तित्त्व. मेरे अनुसार उन्होंने अपने अत्यधिक व्यस्त जीवनचर्या में भी जिस तरह संगीत की साधना की है वह बहुत प्रशंसनीय है. उनके इस गीत में मुझे दक्षिण भारतीय फिल संगीत शैली की झलक मिलती है जो सरल है और अत्यधिक सरस है. और इस गीत को जिस तरह लिखा गया है आज भी सार्थिक और भावप्रवल गीतों को तथाकथित अपबीट सुरों में कैसे पिरोया जा सकता है, इसकी एक मिसाल है, इसके लिए मैं सजीव को बधाई प्रेषित करती हूँ. उम्मीद है मेरा गायन भी आप सब को पसंद आएगा.

सजीव सारथी:"दिल यार यार" की मेकिंग के दौरान ही मेरी मुलाक़ात बाला से हुई, वो चाहते थे कि मैं उनके लिए एक युगल गीत लिखूं जिसका पूरा ट्रेक उनके पास तैयार था, और मैंने लिखा भी....पर जाने क्यों बाला उस गीत के संगीत संयोजन से संतुष्ट नहीं हो पा रहे थे, तभी उन्होंने इस धुन पर काम करने की सोची, व्यक्तिगत तौर पे कहूँ तो मुझे ये धुन उनके युगल गीत से अधिक अच्छी लगी, बाला की धुनें बेहद सरल होती है, इस गीत में भी जरुरत बस एक कैच वर्ड की थी जो बुलबुला के रूप में जब मुझे मिला तो फिर गीत लिखने में जरा भी समय नहीं लगा. "सिम सिम खुला" मैं रखना चाहता था, हालाँकि ये मूल धुन पर एक नोट ज्यादा था, पर बाला ने मेरी भावनाओं का ख्याल रखते हुए उसे बहुत खूबसूरती से इन्कोपरेट किया है गाने में. "अलीबाबा चालीस चोर" वाले किस्से के लिया है ये सिम सिम खुला :), ह्रिचा के बारे में क्या कहूँ, उनकी आवाज़ में ये छोटा सा गाना मेरे लिए एक मिनी कैप्सूल है जिसे जब भी सुनता हूँ नयी उर्जा मिल जाती है

ह्रिचा देबराज नील मुखर्जी
२००२ में ह्रिचा लगातार ७ बार जी के सारेगामापा कार्यक्रम में विजेता रही है, जो अब तक भी किसी भी महिला प्रतिभागी की तरफ़ से एक रिकॉर्ड है. स्वर्गीय मास्टर मदन की याद में संगम कला ग्रुप द्वारा आयोजित हीरो होंडा नेशनल टेलंट हंट में ह्रिचा विजेता रही. और भी ढेरों प्रतियोगिताओं में प्रथम रही ह्रिचा ने सहारा इंडिया के अन्तराष्ट्रीय आयोजन "भारती" में ३ सालों तक परफोर्म किया और देश विदेश में ढेरों शोस् किये. फ़्रांस, जर्मनी, पोलेंड, बेल्जियम, इस्राईल जैसे अनेक देशों में बहुत से अन्तराष्ट्रीय कलाकारों के साथ एक मंच पर कार्यक्रम देने का सौभाग्य इन्हें मिला और साथ ही बहुत से यूरोपियन टीवी कार्यक्रमों में भी शिरकत की. अनेकों रेडियो, टी वी धारावाहिकों, लोक अल्बम्स, और जिंगल्स में अपनी आवाज़ दे चुकी ह्रिचा, बौलीवुड की क्रोस ओवर फिल्म "भैरवी" और बहुत सी राजस्थानी फ़िल्में जैसे "दादोसा क्यों परणाई", "ताबीज", "मारी तीतरी" जैसी फिल्मों में पार्श्वगायन कर चुकी हैं.

बालमुरली बालू
दिन में रिसर्चर बालामुरली बालू रात में संगीतकार का चोला पहन लेते हैं. १५ साल की उम्र से बाला ने धुनों का श्रृंगार शुरू कर दिया था. एक ड्रमर और गायक की हैसियत से कवर बैंडों के लिए १० वर्षों तक काम करने के बाद उन्हें महसूस हुआ उनकी प्रतिभा का सही अर्थ मूल गीतों को रचने में है. बाला मानते हैं कि उनकी रचनात्मकता और कुछ नया ईजाद करने की उनकी क्षमता ही उन्हें भीड़ से अलग साबित करती है. ये महत्वकांक्षी संगीतकार इन दिनों एक पॉप अल्बम "मद्रासी जेनर" पर काम रहा है, जिसके इसी वर्ष बाजार में आने की सम्भावना है

सजीव सारथी
हिन्द-युग्म के 'आवाज़' मंच के प्रधान संपादक सजीव सारथी हिन्द-युग्म के वरिष्ठतम गीतकार हैं। हिन्द-युग्म पर इंटरनेटीय जुगलबंदी से संगीतबद्ध गीत निर्माण का बीज सजीव ने ही डाला है, जो इन्हीं के बागवानी में लगातार फल-फूल रहा है। कविहृदयी सजीव की कविताएँ हिन्द-युग्म के बहुचर्चित कविता-संग्रह 'सम्भावना डॉट कॉम' में संकलित है। सजीव के निर्देशन में ही हिन्द-युग्म ने 3 फरवरी 2008 को अपना पहला संगीतमय एल्बम 'पहला सुर' ज़ारी किया जिसमें 6 गीत सजीव सारथी द्वारा लिखित थे। पूरी प्रोफाइल यहाँ देखें।

Song - Bulbula
Voice - Hricha Neel Mukherjee
Music - Balamurli Balu
Lyrics - Sajeev Sarathie
Graphics - puffwazz


Song # 09, Season # 03, All rights reserved with the artists and Hind Yugm

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Friday, April 23, 2010

मन के बंद कमरों को लौट चलने की सलाह देता एक रॉक गीत कृष्ण राजकुमार की आवाज़ में

Season 3 of new Music, Song # 04


दोस्तों, आवाज़ संगीत महोत्सव, सत्र ३ के चौथे गीत की है आज बारी. बतौर संगीतकार- गीतकार जोड़ी में ऋषि एस और सजीव सारथी ने गुजरे पिछले दो सत्रों में सुबह की ताजगी, मैं नदी, जीत के गीत, और वन वर्ल्ड, जैसे बेहद चर्चित और लोकप्रिय गीत आपकी नज़र किये हैं. इस सत्र में ये पहली बार आज साथ आ रहे हैं संगीत का एक नया (कम से कम युग्म के लिए) जॉनर लेकर, जी हाँ रॉक संगीत है आज का मीनू, रॉक संगीत में मुख्यता लीड और बेस गिटार का इस्तेमाल होता है जिसके साथ ताल के लिए ड्रम का प्रयोग होता है, अमूमन इस तरह के गीतों में एक लीड गायक/गायिका को सहयोग देने को एक या अधिक बैक अप आवाजें भी होती हैं. रॉक हार्ड और सोफ्ट हो सकता है. सोफ्ट रॉक अक्सर एक खास थीम को लेकर रचा जाता है. फिल्म "रॉक ऑन" के गीत इसके उदाहरण हैं. इसी तरह के एक थीम को लेकर रचा गया आज का ये सोफ्ट रॉक गीत है कृष्ण राज कुमार की आवाज़ में, जिन्हें ऋषि ने खुद अपनी आवाज़ में बैक अप दिया है. कृष्ण राज कुमार बतौर संगीत/गायक युग्म में पधारे थे "राहतें सारी" गीत के साथ. काव्यनाद के लिए आयोजित प्रतियोगिताओं में इन्होने अपने संगीत और गायन का उन्दा उदाहरण सामने रखा हर बार, और हर बार ही किसी न किसी सम्मान के ये हक़दार बनें. काव्यनाद में इनकी आवाज़ में दो शानदार गीत हैं, जिन्हें खासी सराहना मिली है. "अरुण ये मधुमय देश हमारा" राष्ट्रीय एफ एम् चैनल "एफ एम् रेनबो" से बज चुका है. तो सुनिए आज की ये प्रस्तुति और अपने स्नेह सुझावों से इन कलाकारों का मार्गदर्शन करें.

गीत के बोल -

ये गलियां, रंग रलियाँ,
ये तेरी नहीं हैं,
तेरा नहीं है जो उसे अब छोड़ चल,
लौट चल...लौट चल...
इस शोर के जंगल से निकल,
रफ़्तार के दल दल में बस,
तन्हाईयाँ है, बेजारियां है,
इस दौड से मुंह मोड चल,
लौट चल...लौट चल...

तुने देखा है फलक को कफस से आज तक,
कभी पंख फैला और उड़ने की कोशिश तो कर,
जो ये जहाँ है, बस एक गुमाँ है,
सारे भरम अब तोड़ चल,
लौट चल...लौट चल...

तू बन्दा अपने खुदा का है, तेरा सानी कौन है,
एक मकसद है यहाँ हर शय का बेमानी कौन है,
उसका निशाँ है, तू जो यहाँ है,
खुद को खुदी से अब जोड़ चल,
लौट चल...लौट चल...

इस धूप के परे भी है एक आसमां,
एक नूर से रोशन है वो तेरा जहाँ,
एक आसमां है, तेरा जहाँ है,
अपनी जमीं को अब खोज चल,
लौट चल...लौट चल...
लौट चल...आ लौट चल



मेकिंग ऑफ़ "लौट चल" - गीत की टीम द्वारा

ऋषि एस- "लौट चल" एक और कोशिश है सामान्य रोमांटिक गीतों से कुछ अलग करने का, एक थीम और उसमें छुपे सन्देश को युवाओं की अभिरुचि अनुरूप रॉक अंदाज़ में इसे किया गया है

कृष्ण राजकुमार- ऋषि ने करीब ५-६ महीने पहले मुझे इस गीत के लिए संपर्क किया था, वो किसी रॉक संगीत मुकाबले के लिए इसे भेजना चाहते थे, मुझे शक था कि क्या मैं रॉक गीत को निभा पाऊंगा, पर ऋषि ने मुझे पर विश्वास किया. और ईश्वर की कृपा से मुझे लगता है कि कुछ हद तक मैं इस गीत के साथ न्याय कर पाया हूँ, बाकी तो आप श्रोता ही बेहतर बता सकते हैं. मैं ऋषि का शुक्रगुजार हूँ कि उन्होंने मुझे इस गीत के काबिल समझा.

सजीव सारथी-ये गीत लगभग ५-६ महीने पहले बना था, एक दिन ऋषि कहने लगे कि कुछ अलग करना चाहिए, उस दिन वो कुछ दार्शनिक जैसी बातें कर रहे थे, मैंने कहा गीत तो हमारे किसी भी एक खास ख़याल से पैदा हो सकता है, तो उन्होंने कहा कि फिर आप कोई नयी थीम पर लिखिए, मैंने कहा लीजिए आज हम जिस विषय पर बात कर रहे हैं इसी पर आपको कुछ लिख कर भेजता हूँ, अमूमन मेरी और ऋषि की जब भी बात होती है संगीत से सम्बंधित ही होती है उसी से फुर्सत नहीं मिलती कि कुछ और कहा सुना जाए, मगर उस दिन हम कुछ इसी विषय पर चर्चा कर रहे थे, जो इस गीत का भी थीम है, दुनिया की दौड धूप जो शायद हमने खुद अपने ऊपर थोपी हुई है उससे अलग एक दुनिया है हमारे ही भीतर जिसे शास्त्रों में स्वर्ग जन्नत आदि नाम दिए गए हैं, जहाँ कविता है संगीत है रचनात्मकता है, और आप खुद है अपने वास्तविक स्वरुप में, तमाम वर्जनाओं से पृथक...खैर अब आप बताएं कि इस विषय पर आप क्या सोचते हैं और अपने इस गीत के माध्यम किस हद तक मैं इस बात को कहने में सफल हो पाया हूँ

ऋषि एस॰
ऋषि एस॰ ने हिन्द-युग्म पर इंटरनेट की जुगलबंदी से संगीतबद्ध गीतों के निर्माण की नींव डाली है। पेशे से इंजीनियर ऋषि ने सजीव सारथी के बोलों (सुबह की ताज़गी) को अक्टूबर 2007 में संगीतबद्ध किया जो हिन्द-युग्म का पहला संगीतबद्ध गीत बना। हिन्द-युग्म के पहले एल्बम 'पहला सुर' में ऋषि के 3 गीत संकलित थे। ऋषि ने हिन्द-युग्म के दूसरे संगीतबद्ध सत्र में भी 5 गीतों में संगीत दिया। हिन्द-युग्म के थीम-गीत को भी संगीतबद्ध करने का श्रेय ऋषि एस॰ को जाता है। इसके अतिरिक्त ऋषि ने भारत-रूस मित्रता गीत 'द्रुजबा' को संगीत किया। मातृ दिवस के उपलक्ष्य में भी एक गीत का निर्माण किया। भारतीय फिल्म संगीत को कुछ नया देने का इरादा रखते हैं।

कृष्ण राजकुमार
कृष्ण राज कुमार ने इस प्रतियोगिता की हर कड़ी में भाग लिया है। जयशंकर प्रसाद की कविता 'अरुण यह मधुमय देश हमारा' के लिए प्रथम पुरस्कार, सुमित्रा नंदन पंत की कविता 'प्रथम रश्मि' के लिए द्वितीय पुरस्कार, महादेवी वर्मा के लिए भी प्रथम पुरस्कार। निराला की कविता 'स्नेह निर्झर बह गया है' के लिए भी इनकी प्रविष्टि उल्लेखनीय थी। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की कविता 'कलम! आज उनकी जय बोल' के लिए द्वितीय पुरस्कार प्राप्त किया। और इस बार भी इन्होंने पहला स्थान बनाया है। कृष्ण राज कुमार जो मात्र 22 वर्ष के हैं, और जिन्होंने अभी-अभी अपने B.Tech की पढ़ाई पूरी की है, पिछले 14 सालों से कर्नाटक गायन की दीक्षा ले रहे हैं। इन्होंने हिन्द-युग्म के दूसरे सत्र के संगीतबद्धों गीतों में से एक गीत 'राहतें सारी' को संगीतबद्ध भी किया है। ये कोच्चि (केरल) के रहने वाले हैं। जब ये दसवीं में पढ़ रहे थे तभी से इनमें संगीतबद्ध करने का शौक जगा।

सजीव सारथी
हिन्द-युग्म के 'आवाज़' मंच के प्रधान संपादक सजीव सारथी हिन्द-युग्म के वरिष्ठतम गीतकार हैं। हिन्द-युग्म पर इंटरनेटीय जुगलबंदी से संगीतबद्ध गीत निर्माण का बीज सजीव ने ही डाला है, जो इन्हीं के बागवानी में लगातार फल-फूल रहा है। कविहृदयी सजीव की कविताएँ हिन्द-युग्म के बहुचर्चित कविता-संग्रह 'सम्भावना डॉट कॉम' में संकलित है। सजीव के निर्देशन में ही हिन्द-युग्म ने 3 फरवरी 2008 को अपना पहला संगीतमय एल्बम 'पहला सुर' ज़ारी किया जिसमें 6 गीत सजीव सारथी द्वारा लिखित थे। पूरी प्रोफाइल यहाँ देखें।
Song - Laut Chal
Voices - Krishna Raajkumar, Rishi S
Music - Rishi S
Lyrics - Sajeev Sarathie
Graphics - Samarth Garg


Song # 04, Season # 03, All rights reserved with the artists and Hind Yugm

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