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Saturday, March 25, 2017

चित्रकथा - 11: 1997 की तीन फ़िल्मों में तीसरे लिंग का सकारात्मक चित्रण


अंक - 11

1997 की तीन फ़िल्मों में तीसरे लिंग का सकारात्मक चित्रण

अपने देस में हम हैं परदेसी कोई ना पहचाने...



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ में आपका हार्दिक स्वागत है। 

हिन्दी फ़िल्मों में तीसरे लिंग का चित्रण दशकों से होता आया है। अफ़सोस की बात है कि ऐसे चरित्रों को सस्ती कॉमेडी के लिए प्रयोग में लाये जाते हैं या फिर घृणा की नज़रों से देखा जाता है। बार-बार वही घिसा-पिटा रूढ़ीबद्ध रूप दिखाया गया है। फ़िल्मी गीतों में भी उनका मज़ाक उड़ाया गया है। कई बार तो सामान्य चरित्र किन्नर/हिजड़े जैसा मेक-अप लेकर दर्शकों को हँसाने की कोशिशें करते रहे हैं। समय के साथ-साथ इस तरह का बेहुदा हास्य कम हुआ है और तीसरे लिंग का मज़ाक उड़ाया जाना फ़िल्मों में कम हुआ है। पिछले कुछ दशकों में कुछ संवेदनशील फ़िल्मकारों ने तीसरे लिंग का सकारात्मक चित्रण अपनी फ़िल्मों में किया है, जिनकी वजह से आज हमारे समाज में तीसरे लिंग की स्वीकृति को काफ़ी हद तक बढ़ावा मिला है। आइए आज ’चित्रकथा’ में चर्चा करें 1997 में प्रदर्शित तीन फ़िल्मों की जिनमें हमें मिलता है तीसरे लिंग का सकारात्मक चित्रण।




स दुनिया में यह रवायत है कि जो संख्यलघु में आता है, उसे दुनिया अलग-थलग कर देती है। तीसरे
लिंग के व्यक्तियों के साथ भी यही हुआ। सामाजिक स्वीकृति न मिलने की वजह से ये लोग अपनी अलग की समुदाय बना ली। हमारी फ़िल्मों की कहानियों में अक्सर तीसरे लिंग को पैसा वसूली करते हुए, शादी-व्याह और बच्चे के जनम पर नाचते-गाते हुए या फिर किसी हास्यास्पद तरीके से दिखाया जाता है। लेकिन कुछ संवेदनशील फ़िल्मकार ऐसे हुए हैं जिन्होंने इस विषय को गंभीरता और संवेदनशीलता से अपनी फ़िल्मों में साकार किया। आज बातें 1997 की तीन ऐसी ही फ़िल्मों की। सबसे पहले बातें फ़िल्म ’तमन्ना’ और निर्देशक महेश भट्ट की। इस फ़िल्म में हिजड़ा-संस्कृति के विभिन्न पहलुओं का चित्रण किया गया है। यह फ़िल्म सहानुभूति और सकारात्मक नज़रिए से देखती है तीसरे लिंग को, और इस फ़िल्म ने ऐसी सीमाएँ पार की जो इससे पहले भारतीय सिनेमा ने नहीं की थी। किसी भी फ़िल्मकार ने इससे पहले इस तरह के विषय पर फ़िल्म बनाने की नहीं सोची थी। ’तमन्ना’ एक सत्य घटना और सत्य कहानी पर आधारित फ़िल्म है। कहानी परेश रावल अभिनीत हिजड़ा चरित्र पर केन्द्रित है और इसमें इस समुदाय द्वारा झेले जाने वाले तमाम समस्याओं पर रोशनी डाली गई है। 1975 के पार्श्व की यह कहानी तमन्ना नामक एक लड़की की कहानी है जिसे टिकू नामक हिजड़ा पाल पोस कर बड़ा करता है। टिकू औरतों जैसी पोशाक नहीं पहनता और ना ही हिजड़ा समुदाय में रहता है, बल्कि वो पुरुषों से भरे समाज में ही रहता है। इस तरह से महेश भट्ट ने यह साबित करने की कोशिश की कि तीसरे लिंग के लोग भी ’साधारण’ लोगों के बीच रह सकते हैं। टिकू अपने सबसे अच्छे दोस्त सलीम के साथ रहता है जिसे वो भाई कह कर बुलाता है। टिकू और सलीम के बीच किसी तरह का यौन संबंध ना दिखा कर भट्ट साहब ने यह सिद्ध किया कि आम तौर पर हिजड़ों द्वारा किसी पुरुष को अपने पास रखने के पीछे यौन संबंध होने का कारण समझने का कोई वजूद नहीं है। टिकू एक भावुक इंसान है और कई बार उसका नारीत्व उभर कर सामने आता है। उदाहरण के तौर पर टिकू तमन्ना को एक पिता की तरह नहीं बल्कि माँ की तरह पालता है। एक दृश्य में टिकू नन्ही तमन्ना के लिए लड़कियों की तरह नृत्य करता दिखाई देता है। वैसे तमन्ना टिकू को अब्बु कह कर ही बुलाती है। टिकू एक मेक-अप आर्टिस्ट है और वो अपने समुदाय के दूसरे लोगों की तरह शादी-ब्याह या बच्चे के जनम पर पैसे माँगने नहीं जाता और ना ही वेश्यावृत्ति करता है। बस फ़िल्म के अन्त में टिकू को आर्थिक मजबूरी के कारण हिजड़े के पारम्परिक रूप में सज कर नृत्य करना पड़ता है।

फ़िल्म का एक महत्वपूर्ण दृश्य है जब तमन्ना को पता चलता है कि टिकू एक हिजड़ा है। हिजड़ों के प्रति जो आम सामाजिक मान्यताएँ हैं, वो सब तमन्ना के मन में भी घर की हुई है। उसे यह पता है कि अगर हिजड़ा किसी को आशिर्वाद दे सकता है तो वो अभिषाप भी दे सकता है। यह समाज मानता है कि हिजड़ों के अभिषाप से व्यक्ति बांझ या नामर्द बन सकता है। ऐसी मानसिकता की वजह से जब तमन्ना को टिकू के बारे में पता चला तो उसके मन में टिकू के लिए घृणा उत्पन्न हुई और वो भूल गई कि किस तरह से लाड़-प्यार से टिकू ने उसे पाल-पोस कर बड़ा किया है। हिजड़े की जो छवि तमन्ना के दिल में बसी हुई है, उससे वो बाहर नहीं निकल सकी। महेश भट्ट ने इस फ़िल्म में हिजड़ों के प्रचलित रूप को दर्शाने के लिए हिजड़ों के एक दल को रंगीन साड़ियों और ज़ेवरों में तालियाँ बजाते, नृत्य करते दिखाया है, और साथ में यह भी दिखाया है कि टिकू इन जैसा नहीं है। फ़िल्म में यह भी दिखाया गया है कि बाकी हिजड़े किस तरह से टिकू का मज़ाक उड़ाते हैं यह कहते हुए कि आम समाज में रहने से वो सामान्य इंसान नहीं बन जाएगा और ना ही वो अपने लैंगिक भिन्नता वाले वजूद को भूला या मिटा पाएगा। महेश भट्ट ने हिजड़ों के प्रति रूढ़ीवादी नज़रिए को तोड़ने का साहस किया। भट्ट साहब ने समाज को दिखाया कि एक हिजड़ा एक अच्छा अभिभावक और एक अच्छा मित्र भी हो सकता है, और वो एक बच्चे को पाल पोस कर बड़ा कर सकता है। भले वो ख़ुद गर्भ धारण नहीं कर सकते पर प्यार लुटाने की क्षमता रखते हैं।

1997 में ही अमोल पालेकर लेकर आए ’दाएरा’ जो एक सुन्दर कहानी पर बनी फ़िल्म थी जिसमें प्रेम,
वासना और लिंग को बड़े सुन्दर तरीके से उभारा गया। पालेकर साहब के साहसिक और समझ की दाद देनी पड़ेगी कि तीसरे लिंग का इतना सुन्दर चित्रण इस फ़िल्म में उन्होंने किया। स्वर्गीय निर्मल पाण्डेय ने इस चरित्र को इतनी सरलता से उभारा कि फ़िल्म के अन्त तक आपके मन में उस चरित्र के लिए भावनाएँ जाग उठेंगी। ’दाएरा’ हमें एक भावुक यात्रा पर ले जाती है क्योंकि इस फ़िल्म के तमाम चरित्र भी एक जटिल यात्रा के सहयात्री होते हैं जो पारम्परिक लैंगिकता, सामाजिक रवैये और प्रचलित फ़िल्मी परम्परा को धराशायी कर देते हैं। इस फ़िल्म के लिए अमोल पालेकर को कई पुरस्कार मिले हैं। फ़िल्म की कहानी एक अभिनेता (निर्मल पाण्डे) जो एक तीसरे लिंग का व्यक्ति है। एक रात वो एक लड़की (सोनाली कुलकर्णी) को बचाता है जिसका शादी से पहले अपहरण और बलात्कार हो जाता है। आगे की कहानी इन दोनों के संबंध के इर्द-गिर्द घूमती है। मानव लैंगिकता पर इस फ़िल्म की पहुँच सशक्त है और नारीशक्ति को सकारात्मक दृष्टि से दिखाया गया है। और तो और यह फ़िल्म उन अल्पसंख्यक लोगों के अधिकारों का भी मंथन करती है जो समाज के मुख्यधारा का अंग नहीं हैं, जैसे कि समलैंगिक स्त्री-पुरुष। यह फ़िल्म ऐसे लोगों के मन की गहराई तक जाता है जिन्हें इस समाज से सिर्फ़ तिरस्कार ही मिलते हैं बिना कोई गुनाह किए।

1997 में तो तीसरे लिंग पर आधारित सकारात्मक फ़िल्मों की कतार ही लग गई थी। ’तमन्ना’ और
’दाएरा’ के बाद इसी वर्ष प्रदर्शित हुई ’दर्मियाँ’। कल्पना लाजमी एक ऐसी फ़िल्मकार हैं जिन्होंने समय समय पर ऐसे ऐसे मुद्दों पर फ़िल्में बनाई हैं जिन मुद्दों पर दूसरे फ़िल्मकार फ़िल्म बनाने से पहले सौ बार सोचते होंगे। ’दर्मियाँ’ में उन्होंने एक पैदाइशी हिजड़ा लड़के की कहानी को केन्द्र में रख कर एक ऐसी फ़िल्म बनाई है जो सीधे दिल को छू जाती है। ’दर्मियाँ’ कहानी है सिंगिंग् स्टार ज़ीनत बेगम (किरोन खेर) की। यह 40 के दशक का पार्श्व है। इन्डस्ट्री की सबसे महँगी स्टार होने के अलावा वो एक नाजायज़ रिश्ते से उत्पन्न एक बच्चे की माँ भी है। इम्मी नाम का वह बच्चा जन्म से हिजड़ा है। शर्म से कहिए या स्टार होने की वजह से कहिए, ज़ीनत समाज के सामने यह स्वीकार नहीं करती कि इम्मी उसका बेटा है, वो उसे अपना भाई कह कर दुनिया के सामने पेश करती है। नन्हे इम्मी को इस बात का पता है कि ज़ीनत उसकी बड़ी बहन नहीं बल्कि माँ है पर वो किसी से कुछ नहीं कहता। वो अपनी नानी को ही माँ कहता है। ज़ीनत और इम्मी एक दूसरे से बहुत प्यार करते हैं। तभी तो जब उस इलाके की हिजड़ा समुदाय की नेत्री चम्पा (सायाजी शिन्डे) इम्मी को उसे सौंप देने के लिए ज़ीनत और उसकी माँ पर ज़ोर डालती है तो ज़ीनत उसे धक्के मार कर घर से बाहर निकाल देती है। इम्मी भी उसके साथ नहीं जाना चाहता। जब चम्पा कहती है कि एक हिजड़ा केवल अपने समुदाय में ही इज़्ज़त से जी सकता है और ज़ीनत के साथ रहने पर इम्मी कहीं का नहीं रहेगा, तब ज़ीनत यह स्वीकारने से भी मना कर देती है कि उसका बेटा हिजड़ा है। नन्हे इम्मी के मन में अपने वजूद को लेकर कश्मकश चलती रहती है। दिन गुज़रते जाते हैं, इम्मी एक युवक (आरिफ़ ज़कारिया) में परिवर्तित होता है और वो ज़ीनत के साथ शूटिंग् पे जाता है, उसके साथ-साथ रहता है। ज़ीनत बेगम शोहरत और कामयाबी की बुलन्दी पर पहुँचती है, उसे एक युवा अभिनेता इन्दर कुमार भल्ला (शहबाज़ ख़ान) से प्यार हो जाता है, पर समय बदलते देर नहीं लगती। ज़ीनत का करियर ढलान पर आ जाता है, और इन्दर कुमार भी एक नई अदाकारा चित्रा (तब्बु) से प्यार करने लगता है। ज़ीनत अपने आप को शराब और जुए में डुबो कर सब कुछ हार जाती है। उसका मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है। ज़ीनत के बरबाद हो जाने पर उधर इम्मी के साथ भी लोग बदतमीज़ी से पेश आते, उसे उसके वजूद को लेकर भला-बुरा कहते। अपने और अपनी माँ का पेट पालने के लिए इम्मी को आख़िर चम्पा के पास जाना पड़ता है। हिजड़े का पोशाक पहन कर इम्मी भी नाचता है, और जब एक रात वो एक वेश्या बन कर किसी अमीर आदमी के घर जाता है, तब वहाँ मौजूद उस आदमी के दोस्त लोग उसका बलात्कर कर उसे ज़ख़्मी बना देते हैं। इम्मी चम्पा के वहाँ से भाग जाता है। वो समझ जाता है कि वो ना आम समाज में जी सकता है और ना ही हिजड़ा समाज में। 

घर की तरफ़ लौटते हुए उसे वीराने में एक नवजात शिशु मिलता है, जिसे वो घर ले आता है और ज़ीनत
को दिखाता है। मानसिक संतुलन खोने की वजह से ज़ीनत उस बच्चे को नन्हा इम्मी समझती है और उसके लिंग को देख कर चिल्ला-चिल्ला कर कहती है कि उसका इम्मी हिजड़ा नहीं है, उसका इम्मी हिजड़ा नहीं है। खुशी से वो नाचने लगती है। बरसों से एक हिजड़ा को जन्म देने का जो दर्द ज़ीनत के मन में पलता रहा है, वह बाहर आ जाता है। इम्मी को भी उस बच्चे में अपने जीने का मक़सद नज़र आता है। उसका नाम वो मुराद रखता है। उसे पाल पोस कर बड़ा करना ही इम्मी के जीवन का मकसद बन जाता है। पर समाज को यह भी मनज़ूर कहाँ? जैसे ही चम्पा को इसका पता चलता है, वो बच्चे को चुरा कर ले जाती है और उसे हिजड़ा बनाने का अनुष्ठान शुरु कर देती है। लेकिन ऐन वक़्त पर इम्मी वहाँ पहुँच जाता है और बच्चे को बचा लेता है। साथ ही पहली बार एक हिजड़े की तरह चम्पा को बद-दुआ देता है कि "मैं एक पैदाइशी हिजड़े की ताक़त से तुझे बद दुआ देता हूँ चम्पा कि तू हर जनम हिजड़ा ही जन्मेगी"। यह सुन कर चम्पा टूट जाती है, विध्वस्त हो जाती है और चीख उठती है यह कहते हुए, "अपनी काली ज़ुबान से फिर हिजड़ा पैदा होने की बद-दुआ मत दे मुझे। एक बार हिजड़ा होके बड़ी मुश्किल से कटी है यह ज़िन्दगी, नफ़रत की कड़वी घूंट पी के, सबसे लड़ के, अपने आप जैसे तैसे ज़िन्दा रही हूँ मैं, फिर से हिजड़ा बनने की ताकत नहीं है मुझमें, मुझे हिजड़ा बनना नहीं है, मुझे हिजड़ा बनना नहीं है।" उधर इम्मी को समझ आ जाती है कि उसके लिए उस बच्चे को पालना नामुमकिन है। और यह भी समझ जाता है कि वो अब ना तो आम समाज का है और ना ही हिजड़ा समाज का। वो उस बच्चे को लेकर अपने जैविक पिता के जायज़ संतान, यानी अपने भाई के पास जाता है, पर वो उस बच्चे को नहीं अपनाता और उसे अपमानित कर बाहर निकाल देता है। तब वो आख़िरी उम्मीद के साथ इन्दर कुमार और चित्रा के पास जाते हैं। नर्म दिल और ज़ीनत को इज़्ज़त करने वाली चित्रा से इम्मी कहता है, "देखिए चित्रा जी, इस बच्चे की तरफ़, इसे भी जीने का हक़ है ना? जब मुझे यह बच्चा मिला, तब मैंने इसमें अपने आप को देखा, पर अब आपको इसे मुझसे दूर ही रखना है। मैं एक पैदाइशी हिजड़ा हूँ पता है आपको? मुराद मेरे जैसा नहीं है चित्रा जी, वो मेरे जैसा नहीं है। मुझे तो हमेशा से बस यही सिखाया गया था कि एक हिजड़ा सबसे अलग होता है, वो कभी बाकियों की तरह ज़िन्दगी नहीं गुज़ार सकता।" आरिफ़ ज़कारिया के जानदार और अद्वितीय अभिनय ने इस सीन को ऐसा अनजाम दिया है कि कोई भी दर्शक अपनी आँसू नहीं रोक सकता। चित्रा इम्मी से कहती है कि वो और इन्दर मिल कर इम्मी और ज़ीनत की ज़िन्दगी को बसा देंगे। जवाब में इम्मी कहता है, "मेरी ज़िन्दगी अब कोई मायने नहीं रखती चित्रा जी, मैं तो बस यह चाहता हूँ कि मुराद को ज़िन्दगी में वो तमाम ख़ुशियाँ हासिल हो जो मुझे कभी ना मिल पायी। पता है एक हिजड़े की ज़िन्दगी होती ही मनहूस है चित्रा जी। आपा को मेरे पैदा होते ही हिजड़ों को दे देना चाहिए था, पर अब ना तो मेरी जगह इस दुनिया में है, न ही हिजड़ों की दुनिया में। दोनों के दर्मियाँ हूँ मैं! दोनों के दर्मियाँ हूँ मैं!" इन्दर कुमार के ना करने की बावजूद चित्रा बच्चे को अपना लेती है। इम्मी वहाँ से चला जाता है यह कहते हुए कि वो चित्रा की ज़िन्दगी में फिर कभी नहीं आएगा। घर वापस आकर वो ज़हर पी लेता है अपनी माँ को भी पिला देता है। अन्तिम दृश्य में इम्मी ज़ीनत से (जिसे वो ज़िन्दगी भर आपा कहता आया है) कहता है, "हम आप से बहुत प्यार करते हैं अम्मी जान"! ज़ीनत के मुंह से निकलता है "मेरा बेटा!" चारों तरफ़ ख़ामोशी। दोनों चले गए हमेशा के लिए।

’दर्मियाँ’ एक ऐसी फ़िल्म है जिसे देख कर दिल उदास हो जाता है, तीसरे लिंग के लोगों के लिए मन सहानुभूति से भर उठता है। कल्पना लाजमी ने हिजरा समाज और फ़िल्म के मुख्य पात्र इम्मी का जो चित्र प्रस्तुत किया है, उससे हिजड़ों के प्रति जो आमतौर पर दुर्व्यवहार होता आया है, निस्सन्देह लोगों के दिलों में उनके लिए आदर ना सही पर सहानुभूति ज़रूर उत्पन्न होगी। ’दर्मियाँ’ में जावेद अख़्तर ने बेहद दिल को छू लेने वाला गीत लिखा है जो फ़िल्म का सार भी है और तीसरे लिंग के लोगों के दिल की पुकार भी। भूपेन हज़ारिका के संगीत और आवाज़ में यह गीत दिल को चीर कर रख देता है। गीत के बोल पेश कर रहे हैं...

भाग-1:

(दृश्य: दोस्तों द्वारा चिढ़ाने और चम्पा के डराने के बाद बालक इम्मी अपनी आपा (हक़ीक़त में माँ) के गोदी में सर छुपा कर रो रहा है। और माँ लाचार है, उसके पास कोई जवाब नहीं, किसी से कुछ नहीं कह सकती। अपने बेटे को बेटा नहीं कह सकती।)

कैसा ग़म है क्या मजबूरी है, पास है जो उनसे भी दूरी है
दिल यूं धड़के जैसे कोई गूंगा बोलना चाहे, लेकिन सब हैं अनजाने
अपने देस में हम हैं परदेसी, कोई न पहचाने
दुनिया परायी लोग यहाँ बेगाने
दिल पर जो बीते वो दिल ही जाने

भाग-2:

(दृश्य: मानसिक रूप से विध्वस्त ज़ीनत अपने बहनोई से यह चुनौती ले लेती है कि उसका बेटा हिजड़ा नहीं है, और अपने बात को साबित करने के लिए वो एक वेश्या लड़की को अपने बेटे के कमरे में भेज देती है। वेश्या को जैसे ही पता चलता है कि इम्मी हिजड़ा है, वो उसका अपमान कर चली जाती है। युवा इम्मी अपनी माँ के पास आकर रोने लगता है।)

कोई बता दे हम क्यों ज़िन्दा हैं, हम क्यों ख़ुद से भी शर्मिन्दा हैं
अपनी ही आँखों से गिरे हैं बनके हम एक आँसू, माने कोई या नहीं माने
अपने देस में हम हैं परदेसी, कोई न पहचाने
दुनिया परायी लोग यहाँ बेगाने
दिल पर जो बीते वो दिल ही जाने

भाग-3:

(दृश्य: बलात्कार से ज़ख़्मी होकर हिजड़ा समाज को हमेशा के लिए छोड़ आते समय जब मौत के अलावा इम्मी के लिए कुछ और नहीं बचा, तभी उसे एक अनाथ शिशु मिला, जिसे गोद में लेकर उसमें उसे अपने जीने का बहाना दिखा।)

कोई तो जीने का बहाना हो, कोई वादा हो जो निभाना हो
कोई सफ़र कोई तो रस्ता कोई तो मंज़िल हो, सुन ले ऐ दिल दीवाने
अपने देस में हम हैं परदेसी, कोई न पहचाने
दुनिया परायी लोग यहाँ बेगाने
दिल पर जो बीते वो दिल ही जाने

भाग-4:

(दृश्य: अन्तिम दृश्य में ख़ुद ज़हर पी कर अपनी माँ को ज़हर पिला रहा है इम्मी।)

सोचा है अब दूर चले जाएँ, अपने सपनों की दुनिया पाएँ
उस दुनिया में प्यार के फूल और ख़ुशियों के मोती हैं जो न दिए इस दुनिया ने
अपने देस में हम हैं परदेसी, कोई न पहचाने
दुनिया परायी लोग यहाँ बेगाने
दिल पर जो बीते वो दिल ही जाने

1997 के तीन फ़िल्मों की चर्चा हमने की। ये फ़िल्में हमें यह सोचने पर मजबूर कर देती है कि क्यों हम इतने उदासीन हैं तीसरे लिंग के प्रति? क्यों हम उनका सामाजिक तिरस्कार करते हैं? ईश्वर के लिए सभी जीव-जन्तु समान हैं, जब हम जानवरों से प्यार कर सकते हैं, तो ये तो इंसान हैं हमारी आपकी तरह। क्या हम इन्हें थोड़ा सा प्यार, थोड़ी सी स्वीकृति नहीं दे सकते? क्या यह वाक़ई इतना कठिन है? मु तो नहीं लगता, और आपको?


आपकी बात

’चित्रकथा’ के पिछले अंक में हमने "मेरा रंग दे बसन्ती चोला" गीत के इतिहास से आपको अवगत करवाया था। हमारी एक पाठिका काव्या सरिता जी ने इस गीत के हमारे दिए बोलों में एक ग़लती ढूंढ़ निकाला और हमें सूचित किया। हमने इस ग़ौर किया और अपने आलेख में सुधार कर ली। काव्या जी को हमारा धन्यवाद। आप सभी इतने मनोयोग से हमारा आलेख पढ़ते हैं, यह देख कर हमें बेहद ख़ुशी हुई। हमारे एक और नियमित पाठक श्री पंकज मुकेश ने टिप्पणी की है - "प्रस्तुत लेख द्वारा आगामी शहीद दिवस 23 मार्च 2017 पर देश के तीन वीरों को सच्ची श्रद्धांजलि है। अमर शहीद!!!" बिल्कुल सही कहा आपने पंकज जी। और इस अंक की अब तक की कुल रीडरशिप 165 है। आगे भी आप सब बने रहिए ’चित्रकथा’ के साथ। धन्यवाद!


आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!





शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



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