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Tuesday, August 21, 2012

एक सुरीला दौर जो बीतकर भी नहीं बीता -राजेश खन्ना


सुनिए काका को श्रद्धान्जली देने को तैयार किया गया हमारा खास पॉडकास्ट  


मूल स्क्रिप्ट 

यह पोडकास्ट समर्पित है हिन्दी फिल्मों के निर्विवादित पहले सुपरस्टार को। इनकी मक़बूलियत के किस्से परिकथाओं और जनश्रुतियों की तरह दुनिया में मशहूर हैं। हमें उम्मीद और पक्का यकीन है कि हमें इनका नाम बताने की ज़रूरत न होगी। चलिए तो नाम पर पर्दा रहते हुए हीं इनके बारे में दो-चार बातें कर ली जाएँ। इन महानुभाव का जन्म २९ दिसंबर १९४२ को ब्रिटिश इंडिया के बुरेवाला में हुआ था। जब जन्म हुआ तो नाम भी रखना था तो नाम रखा गया जतिन अरोड़ा। लेकिन ज्यादा दिनों तक न जतिन रहा और न हीं अरोड़ा। १९४८ में जब इनके माता-पिता इन्हें अपने रिश्तेदारों चुन्नी लाल खन्ना और लीलावती खन्ना को सौंपकर पंजाब के अमृतसर चले गए तो ये अरोड़ा से खन्ना हो लिए। इनके नए माता-पिता बंबई के गिरगांव के नजदीक ठाकुरगांव में रहते थे। यही इनका भी लालन-पालन और बढना-पढना हुआ। इन्होंने स्कूल से लेकर कॉलेज तक की पढाई की अपने बचपन के दोस्त रवि कपूर के साथ जो आगे चलकर जितेंद्र कहलाए। ज्यों-ज्यों इनकी उम्र बढती गई, इन्हें अपने सही हुनर की पहचान और परख की ज़रूरत महसूस हुई और ये एक जुनून के साथ अदाकारी की ओर हो लिए। उस वक़्त थियेटर का रूतबा था तो इन्होंने भी कई सारे नाटक किए, रंगमंच की शोभा बढाई। रंगमंच ने इनकी अदाकारी में इतने रंग भर दिए और इन्हें इतना मुखर कर दिया कि जब फिल्मों में इन्हें पहला मौका मिलना था तो इन्होंने रूखे-सूखे संवाद को अपने थियेटर के अंदाज़ से ऐसा रंगीन कर दिया कि सारे चयनकर्ता हक्के-बक्के रह गए।

 बात करते हैं जतिन खन्ना के रंगमंच के दिनों की। फिल्मों में आने से पहले इन्होंने अपने आप को रंगमंच पर खूब मांजा। इन्होंने कई नाटक मंचित किए। वार्डन रोड के भूलाभाई देसाई मेमोरियल इंस्टीयूट में ये नाटकों के रिहर्सल करते थे। उन्हीं दिनों गीताबाली ने वहां अपना दफ्तर खोला था। वह पंजाबी फिल्म 'रानो' की योजना बना रही थीं। गीता बाली ने इन्हें अपनी फिल्म में एक भूमिका दी और यह भविष्यवाणी भी कर दी कि तुम एक दिन बड़े स्टार बनोगे। इन्हें यकीन नहीं हुआ। ये ज्योतिषी से मिले। ज्योतिषी ने बताया कि अभिनेता के तौर पर इनका कोई भविष्य नहीं है। हां, अगर ये लोखंड (लोहा) का कारोबार करें तो सफल हो सकते हैं। ज्योतिषी की भविष्यवाणी गलत साबित हुई और अभिनेता जतिन खन्ना का लोहा सभी ने माना।

 समय बीतता गया और देखते-देखते १९६५ आ गया। तब जतिन खन्ना महज २३ साल के थे। उस वक़्त "युनाइटेड प्रोड्युसर्स" जिसमें शीर्ष के १२ फिल्म निर्माता शामिल थे, ने एक ‘ऑल इंडिया टैलेंट हंट आयोजित किया था। निर्णायकों में चेतन आनंद, जी पी शिप्पी , नासिर हुसैन जैसे मंझे हुए निर्माता-निर्देशक थे। इस टैलेंट हंट में दस हज़ार से भी ज्यादा प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। जतिन खन्ना ने सबको पछाड़ते हुए जीत हासिल की। कहते हैं कि हारने वालों में विनोद मेहरा भी थे.. खैर वह कहानी फिर कभी। हाँ तो इस जीत के साथ यह निश्चित हो गया था कि जतिन खन्ना एक के बाद एक १२ निर्देशकों की फिल्मों में नज़र आएँगे। उस वक़्त यह जुमला बहुत मशहूर हुआ था कि जहाँ दूसरे नवोदित कलाकार फटे कपड़े और टूटी चप्पल में संघर्ष कर रहे थे, वहीं जतिन खन्ना का स्ट्रगल इनकी "इम्पाला" गाड़ी में होता था। हाँ तो जब फिल्मों का दौर शुरू होना था, तब इनके शुभचिंतकों को महसूस हुआ कि जतिन नाम "खास फिल्मी" नहीं लगता, यह किसी व्यावसायिक घराने से जुड़े इंसान का नाम लगता है, इसलिए इन्हें सलाह दिया गया कि जतिन की जगह ये "फिल्मों के किसी आम किरदार" का नाम रखे लें और तब "जतिन" "राजेश" में तब्दील हो गया। इन शुभचिंतकों में या तो इनके अपने चाचा के०के० तलवार थे या फिल्म निर्माता जी०पी०सिप्पी।

 जतिन राजेश कैसे हुए ये तो हम जान गए लेकिन राजेश काका कैसे हुए, चलिए यह भी जान लिया जाए। ज्यादातर लोगों को यह गलतफहमी रहती है कि राजेश खन्ना को "काका" यानि कि "चाचा" के नाम से संबोधित किया जाता है। लेकिन ऐसा नहीं है। पंजाबी में काका का मतलब होता है छोटा नन्हा-सा बच्चा। जब ये फिल्मों में आए तब इनकी उम्र बहुत हीं कम थी। इसलिए इनके सहकलाकारों और इनके निर्माता-निर्देशकों ने इन्हें प्यार से काका कहना शुरू कर दिया। फिर आगे क्या हुआ, यह तो इतिहास है। आप यकीन नहीं करेंगे लेकिन "काका" की पत्नी यानि कि डिंपल कपाड़िया भी इन्हें काका हीं कहा करती थीं, वैसे हीं जैसे दिलीप कुमार को शायरा बानो आज भी "साहब" हीं कहती हैं।

 राजेश खन्ना की सबसे पहली फिल्म आई "आखिरी खत"। इस फिल्म के निर्देशक थे चेतन आनंद। यह फिल्म १९६७ के ४०वें आस्कर अवार्ड में सर्वश्रेष्ठ विदेशी फिल्म के श्रेणी में भेजी गई थी। आखिरी खत के बाद रविन्द्र दवे की "राज़" आई। समयक्रम के हिसाब से तो "राज़" बाद में आई थी, लेकिन "द हिन्दु" को दिए एक साक्षात्कार में राजेश खन्ना ने कहा था कि "भले हीं आखिरी खत मेरी पहली फिल्म थी, लेकिन पहला ब्रेक मुझे रविन्द्र दवे ने दिया था अपनी फिल्म राज़ में। इस फिल्म में मेरे साथ बबीता थीं, जो उस समय बहुत हीं मशहूर थीं। चूँकि मैं पहली बार कैमरे के सामने थे, इसलिए मेरे अंदर का कलाकार खुल कर बाहर आने में वक़्त ले रहा था। मैंने अपनी संवाद अदायगी तो दो-चार टेक में सही कर ली, लेकिन मेरा बडी लैंग्वेज और मेरा मूवमेंट अभी भी गलत हीं जा रहा था। तब रविन्द्र दवे ने मुझे सीन सही से समझाया और मेरे चलने के तरीके को परफेक्ट कर दिया।" "राज़" के बाद नासिर हुसैन की बहारों के सपने आई। बदकिस्मती से ये तीनों फिल्में बॉक्स ऑफिस पे फ्लॉप हो गई। तीन लगातार फिल्मों के फ्लॉप होने के बाद निश्चित था कि निर्माता इनसे कन्नी काटने लगेंगे और वही हुआ, वही होता रहा.. जब तक अराधना नहीं आई थी।

 आराधना १९४६ की हॉलीवुड की फिल्म "टू इच हिज़ ओन" की रीमेक थी। कहते हैं कि अराधना जब आठ रील तक फिल्मा ली गई थी, तब तक इसके निर्देशक शक्ति सामंता काका की नाकामयाबी से इतने परेशान हो चले थे कि उन्होंने काका को फिल्म से निकाल देने तक का ख्याल कर लिया था। ऐसा इसलिए क्योंकि सारे वितरकों ने इस फिल्म से खुद को दूर करने की घोषणा कर दी थी। लेकिन फिर न जाने क्या हुआ, शक्ति सामंता को अपने मुख्य अभिनेता पर यकीन हो आया और उन्होंने इस फिल्म में न एक सिर्फ़ एक बल्कि दो-दो काका हमें दिए। कहते हैं कि जिस दिन फिल्म रीलिज हुई उस दिन दोपहर बारह बजे तक सिनेमा हॉल्स लगभग खाली थे, लेकिन शाम तक माउथ पब्लिसिटी इतनी फैली कि हॉल्स के बाहर हाउसफुल के बोर्ड लगाने पड़े। फिर तो राजेश खन्ना और शर्मिला टैगोर का एक फिल्म का सफर पूरी १२ फिल्मों तक चलता रहा। इस फिल्म से जुड़ी कुछ मज़ेदार कहानियाँ हैं। एक तो ये कि "रूप तेरा मस्ताना" हिन्दी फिल्मों का ऐसा पहला गाना है जो एक हीं टेक में फिल्माया गया था। इस फिल्म का एक और गाना "मेरे सपनों की रानी" सबको ज़रूर याद होगा। इस गाने की खासियत यह है कि काका की जीप और शर्मिला टैगोर की ट्वाय ट्रेन भले हीं एक साथ चलती दिखती हैं लेकिन दोनों का फिल्मांकन अलग-अलग जगहों पर हुआ था। शर्मिला उस वक़्त सत्यजीत रे की फिल्म कर रही थीं, इसलिए वो दार्जिलिंग न जा सकी और उनके दृश्य बंबे में हीं फिल्माए गए। काका अपनी धुन के पक्के थे इसलिए वे सुजीत कुमार को साथ लेकर निकल लिए दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे की सैर करने।

 काका की एक और जो बहुत मक़बूल फिल्म थी वह थी "हाथी मेरे साथी"। इस फिल्म के निर्माता थे तेवार फिल्म्स के चिनप्पा तेवार, जो कि अपनी फिल्मों में जानवरों के इस्तेमाल के लिए मशहूर थे। यह पहली फिल्म थी जिसमें सलीम-जावेद ने पटकथा लिखी थी। और इसका सारा श्रेय काका को जाता है। बकौल जावेद साहब: "एक दिन राजेश खन्ना सलीम साहब के पास आएँ और उन्होने कहा कि मिस्टर तेवार ने उन्हें बहुत बड़ा साइनिंग अमाउंट दिया है, जिससे वे अपने बंगले आशिर्वाद की किश्तें चुका पाएँगे। लेकिन दिक्कत यह है कि फिल्म की स्क्रिप्ट बेहतरीन क्या, अच्छी होने से भी कोसों दूर है। इसलिए वे चाहते थे कि हम दोनों सलीम और जावेद मिलकर इस पर काम करॆं और उन्होंने इस बात का पूरा ध्यान रखा कि हमें पैसों के साथ-साथ क्रेडिट भी पूरी मिले।" इस फिल्म से जुड़ा एक मज़ेदार वाक्या है। यह तो जगजाहिर था कि काका जब कामयाब हो लिए तो उन्होंने घड़ी पर ध्यान रखना लगभग छोड़ हीं दिया था। अगर फिल्म की शिफ्ट सुबह ६ बजे की हो तो ये सेट पर ३ बजे दिन में पहुँचते थे। अच्छे अदाकार थे इसलिए इन्हें ज्यादा टेक लेने की ज़रुरत नहीं पड़ती थी, लेकिन निर्माता-निर्देशक को नुकसान तो सहना हीं पड़ता था। तो हुआ यूँ कि जब भी काका हाथी मेरे साथी के सेट पर पहुँचते थे तो देखते थे कि चिनप्पा तेवार एक स्पॉट ब्यॉय की पिटाई कर रहे हैं। यह हर रोज़ होता था। थक-हारकर एक दिन जब काका ने उस लड़के से पिटाई की वजह पूछी तो मालूम चला कि निर्माता होते थे गुस्सा काका से लेकिन चूँकि काका को कुछ कह नहीं सकते इसलिए उन्हें दिखाकर अपना गुस्सा निकालते थे। तब से काका ने यह कोशिश करनी शुरू कर दी वे सेट पर लेट न पहुँचें। 

काका को गीत-संगीत का बहुत शौक था और वे ध्यान रखते थे कि इनकी फिल्मों के गानें कहीं से कमजोर न रहें। इनके गानों मे पंचम और किशोर अमूमन नियमित और निश्चित थे। कई बार तो इन्होंने जिद्द ठान ली थी कि किशोर नहीं गाएँगे तो गाना हीं नहीं होगा। एक ऐसे हीं वाक्ये का ज़िक्र किशोर दा ने एक इंटरव्यु में किया था। उस दौरान काका की पंचम दा से कुछ अनबन हो गई थी। इसलिए उन्होंने "दुश्मन" फिल्म के निर्माता से कहकर पंचम दा की जगह "लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल" को साईन करवा लिया था। तो जब उस फिल्म के एक गाने "वादा तेरा वादा" को गाने कि बारी आई तो किशोर दा को महसूस हुआ कि इसे अगर रफ़ी साहब गाएँगे तो ज्यादा जमेगा। उन्होंने यह बात एल-पी को बताई लेकिन काका के सामने किसकी चलनी थी। काका ने सीधा-सीधा कह दिया कि या तो किशोर या तो कोई नहीं। हार मानकर किशोर दा को हामी भरनी पड़ी। आराधना के दौरान काका ने शक्ति सामंता को इतना कह दिया था कि किशोर उनकी आत्मा हैं और वे किशोर के शरीर। काका किशोर दा और पंचम दा के साथ-साथ आनंद बक्शी के भी काफी नजदीक थे। कहते हैं कि जब १९९२ में ससदीय उपचुनाव चल रहे थे तब ये बक्षी साहब से कविताएँ लिखवाकर उन्हें मंच पर पढा करते थे। १९८५ में इन्होने जब अपनी फिल्म "अलग-अलग" बनाई थी, तब इन्होंने वादे के अनुसार पंचम दा और बक्षी साहब को एक-एक कार उपहार में दिए थे। तो ऐसा था इनका गीत-संगीत से प्यार।

 काका ने दो साल में चौदह गोल्डन-जुब्ली फिल्में दी थीं। इन्होंने बहुत कम हीं मल्टी-स्टारर फिल्में की थीं। उन मल्टी-स्टारर में दो जो खासे लोकप्रिय हुए वे थे आनंद और नमकहराम। दोनों फिल्मों में काका के साथ थे तब के उभरते स्टार अमिताभ बच्चन। दोनों हीं फिल्में ऋषिकेष मुखर्जी यानि कि राज कपूर के बाबू मोशाय की थीं। आनंद के बारे में क्या कहा जाए। बच्चे-बच्चे की जुबान पर "बाबू मोशाय" और "ज़िंदगी एक रंगमंच है और हम सब कठपुतलियाँ" आज भी वैसे हीं चस्पां है जैसे ३५ साल पहले था। कहते हैं कि भले हीं काका दूसरे निर्देशकों के सामने नखरे दिखाते हॊं लेकिन ऋषि दा के सामने उनकी एक न चलती थी। फिर भी अगर बीबीसी के संवाददाता जैक पिज़्ज़े की "बम्बे सुपरस्टार" नाम की डाक्यूमेंट्री देखें तो मालूम पड़ जाएगा कि नमकहराम की शूटिंग के दौरान काका के नखरे चरम पर थे। अमिताभ घंटों से इंतेज़ार कर रहे हैं, काका आते हैं, अपने संवाद देखते हैं, पढते हैं, निर्देशक को कुछ सुनाते हैं और निकल जाते हैं। वैसे भी अमिताभ और काका के बीच का यह फासला पुराने सूरज के डूबने के डर और नए के निकलने की तैयारी का था। तब के एक पत्रकार अली पीटर जॉन ने अपने संस्मरण में एक जगह लिखा भी था कि अमिताभ बच्चन के आगमन पर राजेश खन्ना की टिप्पणी थी कि ऐसे अटन-बटन आते-जाते रहते हैं। "बावर्ची" की शूटिंग के दौरान जया भादुड़ी और काका में इसी विषय पर बहस भी हो गई थी और जया भादुड़ी ने एक तरह से भविष्यवाणी कर दी थी कि "देखना एक दिन ये जो आदमी मेरे साथ खड़ा है वह कितना बड़ा स्टार होगा और वो जो अपने आप को खुदा समझता है वो कहीं का नहीं रहेगा।" काका की सबसे बड़ी खामी यही थी कि उन्होंने सफलता को सर पे चढा लिया। काश ऐसा न होता!!

 काका बड़े हीं मूडियल थे। अपनी ज़िंदगी के दो सबसे बड़े निर्णय उन्होंने इसी ताव मॆं लिए थे। डिम्पल कपाड़िया से शादी के पहले उनकी अंजु महेंद्रु नाम की गर्लफ्रेंड हुआ करती थी और वे दोनों साथ रहते थे। किसी कारण से काका और अंजु महेंद्रु की माँ के बीच अनबन हो गई और अंजु घर छोड़कर चली गईं। अपने आप को सही साबित करने के लिए काका ने आनन-फानन में अपने से १५ साल छोटी डिंपल से शादी कर ली,जिनकी बॉबी अभी-अभी सुपरहिट हुई थी। काका की लाखों चाहने वालियों में डिंपल भी एक थीं और उन्होंने भी काका के घर के बाहर इनकी एक झलक का घंटों इंतेज़ार किया था, इसलिए डिंपल शादी के लिए झट तैयार हो गईं। ये अलग बात है कि काका ने उन्हें सुपरस्टार का खिताब देने वालीं देवयानी चौबल को झूठी कहानी बताई थी कि इन्होंने डिंपल को समुद्र में डूबने से बचाया था और उसी दौरान डिंपल की सुंदरता पर मोहित हो गए। ऐसा हीं ताव काका ने तब दिखाया था जब वे जुबली कुमार राजेंद्र कुमार से उनका डिंपल नाम का घर खरीद रहे थे। काका के पास उतने पैसे नहीं तो उन्होंने यश चोपड़ा से कहा था कि वे इनसे चाहे जिस फिल्म में काम करवा लें लेकिन तत्काल घर खरीदने का पैसा दे दें। घर खरीद लेने पर वे घर का नाम डिंपल हीं रहने देना चाहते थे। लेकिन चूँकि राजेंद्र कुमार की बेटी का नाम डिंपल था तो उन्होंने काका के इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। काका ताव में तो जीत गए लेकिन इन्हें खून का घूंट पीकर अपने मकान का नाम "डिंपल" से "आशीर्वाद" करना पड़ा।

 १९७८-७९ के बाद काका को अपनी रोमांटिक हीरो की छवि छोड़कर दुसरे किरदार निभाने पड़े। इनमें से बहुत सारी फिल्में तो प्लॉप रहीं लेकिन आलोचकों ने इनके अभिनय को काफी सराहा। ऐसी हीं एक फिल्म थी "भारती राजा" की "रेड रोज़"। यह फिल्म भारती राजा की हीं १९७८ की तमिल फिल्म "सिगप्पु रोजक्कल" की रीमेक थी,जिसमें कमल हसन मुख्य अभिनेता थे। रेड रोज़ में काका का किरदार एक "साईकोपैथ" का था। माना जाता है कि काका का अभिनय कमल हसन से भी बेहतर था। ऐसी हीं लीक से हटकर एक फिल्म थी "खुदाई", जिसमें काका ने कमाल किया था। राजनीति में आने से पहले काका की अंतिम फिल्म डेविड धवन की स्वर्ग थी। आगे चलकर इन्होंने ऋषि कपूर की "आ अब लौट चलें" की,जिसमें ये उतने कामयाब न हो सके। काका की आखिरी फिल्म हाल में हीं सूर्खियों में रही मरहूम लैला खान के साथ "वफ़ा" थी। संयोग या यूँ कहें कि कुयोग देखिए कि वफ़ा के दोनों मुख्य कलाकार एक महिने के अंदर दिवंगत हो लिए। लैला खान को उसके पूरे परिवार के साथ किसी की गोलियों ने मौत के घाट उतार दिया तो काका को उनकी शराब की आदतों और लंबी बीमारी ने । काका आखिरी बार हैवल्स फैन के ऐड में पर्दे पर नज़र आए थे..... मेरे फैन्स मुझसे कोई नहीं छीन सकता। १८ जुलाई २०१२ को ऊपर वाले ने काका को हीं हम सबसे छीन लिया। "टाईम हो गया है, पैक अप" कहते हुए वे ज़िंदगी से मौत की और चल पड़े।

Saturday, December 3, 2011

विशेष - सिने-संगीत के कलाकारों के लिए उस्ताद सुल्तान ख़ाँ का योगदान

ओल्ड इज़ गोल्ड - शनिवार विशेष - 70
एक बार सुल्तान ख़ाँ साहब नें कहा था कि जो कलाकार संगत करते हैं उन्हें अपने अहम को त्याग कर मुख्य कलाकार से थोड़ा कम कम बजाना चाहिए। उन्होंने बड़ा अच्छा उदाहरण दिया था कि अगर आप बाराती बन के जा रहे हो किसी शादी में तो आपकी साज-सज्जा दुल्हे से बेहतर तो नहीं होगी न! पूरे बारात में दुल्हा ही केन्द्रमणि होता है। ठीक उसी तरह, संगत देने वाले कलाकार को भी (चाहे वो कितना भी बड़ा कलाकार हो) मुख्य कलाकार के साथ सहयोग देना चाहिए।

Saturday, July 9, 2011

ओल्ड इस गोल्ड -शनिवार विशेष - संगीतकार दान सिंह को भावभीनी श्रद्धाजंली

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के सभी दोस्तों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार, और स्वागत है आप सभी का इस 'शनिवार विशेषांक' में। फ़िल्म-संगीत के सुनहरे दौर के बहुत से ऐसे कमचर्चित संगीतकार हुए हैं जिन्होंने बहुत ही गिनी चुनी फ़िल्मों में संगीत दिया, पर संख्या में कम होने की वजह से ये संगीतकार धीरे धीरे हमारी आँखों से ओझल हो गये। हम भले इनके रचे गीतों को यदा-कदा सुन भी लेते हैं, पर इनके व्यक्तिगत जीवन के बारे में बहुत कम लोगों को पता होता है। यहाँ तक कि कई बार इनकी खोज ही नहीं मिल पाती, ये जीवित हैं या नहीं, सटीक रूप से कहा भी नहीं जा सकता। और जिस दिन ये संगीतकार इस जगत को छोड़ कर चले जाते हैं, उस दिन उनके परिवार वालों के सहयोग से किसी अख़्बार के कोने में यह ख़बर छप जाती है कि फ़लाना संगीतकार नहीं रहे। पिछले महीने एक ऐसे ही कमचर्चित संगीतकार हमसे हमेशा के लिए जुदा हो गये। लीवर की बीमारी से ग्रस्त, ७८ वर्ष की आयु में संगीतकार दान सिंह नें १८ जून को अंतिम सांस ली। दान सिंह का नाम लेते ही फ़िल्म 'माइ लव' के दो गीत "वो तेरे प्यार का ग़म" और "ज़िक्र होता है जब क़यामत का" झट से ज़हन में आ जाते हैं। आइए आज इस विशेषांक में हम दान सिंह के जीवन और संगीत सफ़र पर थोड़ा नज़र डालें।

दान सिंह राजस्थान के रहनेवाले थे, जिन्होंने संगीतकार खेमचंद प्रकाश से संगीत सीखा। वो एक अच्छा संगीतकार होने के साथ साथ एक अच्छा गायक भी थे। मुंबई आकर दो साल के संघर्ष के बाद १९६९ में उनको पहला अवसर मिला किसी फ़िल्म में संगीत देने का और वह फ़िल्म थी 'तूफ़ान'। यह फ़िल्म नहीं चली। उसके अगले ही साल आई फ़िल्म 'माइ लव', जिसके गीतों नें धूम मचा दी। लेकिन अफ़सोस की बात कि 'माइ लव' के गीतों की अपार कामयाबी के बावजूद किसी नें उनकी तरफ़ न कोई तारीफ़ की और न ही कोई प्रोत्साहन मिला। वो पार्टियों में जाते और अपनी धुनें सुनाते। "वो तेरे प्यार का ग़म, एक बहाना था सनम" गीत में दान सिंह नें जिस तरह से राग भैरवी का इस्तेमाल किया, संगीतकार मदन मोहन को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने दान सिंह को कहा था कि "भैरवी का इस्तेमाल तो हमने भी किया, पर आप इसमें ऐसा वेरिएशन कैसे ले आये?" दान सिंह को किसी नें मौका तो नहीं दिया पर उन पार्टियों में मौजूद कुछ नामी संगीतकार उनकी धुनों को चुराने लगे और अपने गीतों में उन्हें इस्तेमाल करते रहे। इससे वो इतने हताश हो गए कि अपनी डॉक्टर पत्नी उमा के साथ जयपुर लौट गए। जयपुर लौटने से पहले उन्होंने 'भूल न जाना', 'मतलबी' और 'बहादुर शाह ज़फ़र' जैसी फ़िल्मों में संगीत दिया, पर इनमें से कोई भी फ़िल्म नहीं चली।

बरसों बाद राजस्थान की पृष्ठभूमि पर फ़िल्म बनी 'बवंडर', जिसका संगीत तैयार किया दान सिंह नें, और उन्होंने यह साबित भी किया कि उनके संगीत में ठेठ और जादू आज भी बरक़रार है। विषय-वस्तु की वजह से फ़िल्म चर्चा में तो आई पर एक बार फिर दान सिंह का संगीत नहीं चल पाया। क़िस्मत के सिवा किसे दोष दें!!! किसी पत्रकार नें जब एक बार उनकी असफलता का कारण पूछा तो उनका जवाब था, "न पूछिये अपनी दास्तान।" दान सिंह के जीवन को देख कर यह स्पष्ट है कि प्रतिभा के साथ साथ क़िस्मत का होना भी अत्यावश्यक है, वर्ना इतने प्रतिभाशाली और सुरीले संगीतकार होने के बावजूद क्यों किसी नें उन्हें बड़ी फ़िल्मों में मौका नहीं दिया होगा! ख़ैर, आज इन सब बातों में उलझकर क्या फ़ायदा। आज दान सिंह हमारे बीच नहीं है, पर इस बात की संतुष्टि ज़रूर है कि अच्छे संगीत के रसिक कभी उनके कम पर स्तरीय योगदान को नहीं भूलेंगे। दोस्तों, पिछले दिनों मैंने जाने-माने गीतकार और रिलायन्स एण्टरटेनमेण्ट लिमिटेड के चेयरमैन अमित खन्ना का साक्षात्कार लिया था (जिसे आप इसी साप्ताहिक स्तंभ में निकट भविष्य में पढ़ेंगे), उस साक्षात्कार में उन्होंने यह बताया कि उन्होंने दान सिंह के साथ भी काम किया है। उस साक्षात्कार के वक़्त दान सिंह जीवित थे, शायद इसीलिए मुझे उनके बारे में जानने की लालसा नहीं हुई। पर आज उनके न रहने से शायद उनकी अहमियत हमारे लिए बढ़ गई है। मैंने दोबारा अमित जी से सम्पर्क किया और उनसे पूछा:

सुजॉय - अमित जी, पिछले १८ जून को संगीतकार दान सिंह का निधन हो गया। मुझे याद है आपने कहा था कि आपने उनके साथ भी काम किया है। अगर आप दान सिंह साहब के बारे में कुछ बतायें तो हम आपके आभारी रहेंगे।

अमित खन्ना - जी हाँ, मैंने उनके लिए एक गीत लिखा था। उन्होंने उस फ़िल्म में बस इसी एक गीत की धुन बनाई थी, बाक़ी के गीत बप्पी लाहिड़ी नें कम्पोज़ किए। गीत कुछ इस तरह से था "दो लफ़्ज़ों में कैसे कह दूँ ज़िंदगी भर की बात"।

सुजॉय - इस मुखड़े को सुन कर जैसे दान सिंह साहब ख़ुद ही अपनी ज़िंदगी के बारे में कह रहे हों। तभी उन्होंने भी कहा था कि न पूछिये अपनी दास्तान।

अमित खन्ना - दान सिंह की धुनों में बहुत मेलडी था, और वो बहुत सहज-सरल इंसान थे, उन्हें वो सब कुछ नहीं मिला जिसके वो हक़दार थे।

सुजॉय - बहुत बहुत धन्यवाद अमित जी!

और दोस्तों, आइए आज दान सिंह साहब की याद में सुनते हैं आनन्द बक्शी का लिखा और मुकेश का गाया फ़िल्म 'माइ लव' से "ज़िक्र होता है जब क़यामत का, तेरे जलवों की बात चलती है"। और हम यह कहते हैं कि जब जब फ़िल्म-संगीत के सुनहरे दौर के इतिहास का ज़िक्र छिड़ेगा, संगीतकार दान सिंह का नाम भी सम्मान के साथ लिया जाएगा। 'हिंद-युग्म आवाज़' परिवार की ओर से संगीतकार दान सिंह को श्रद्धा सुमन।

गीत - ज़िक्र होता है जब क़यामत का (माइ लव, १९७०)


तो ये था आज का 'ओल्ड इज़ गोल्ड शनिवार विशेषांक' जो समर्पित था संगीतकार दान सिंह की स्मृति को, जिनका गत १८ जून को निधन हो गया था। आज अनुमति दीजिये, फिर मुलाक़ात होगी, नमस्कार!

Saturday, April 2, 2011

शनिवार विशेष में आज हम दे रहे हैं एक भावभीनी श्रद्धांजली स्वर्णिम दिनों के संगीतकार अजीत मर्चैण्ट को

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों नमस्कार। मैं, सुजॊय चटर्जी एक बार फिर हाज़िर हूँ इस साप्ताहिक विशेषांक के साथ। यह करीब दो साल पहले की बात है। मुझे मेरे दोस्त रामास्वामी से गुज़रे ज़माने के इस विस्मृत संगीतकार का टेलीफ़ोन नंबर प्राप्त हुआ था। उस वक़्त मैं ख़ुद इंटरव्युज़ नहीं करता था और 'हिंद-युग्म' से बस जुड़ा ही था। यह सोच कर कि अगर इस भूले बिसरे संगीतकार का इंटरव्यु 'विविध भारती' पर प्रसारित हो जाये, तो कितना अच्छा हो! इस ख़याल और लालच से मैंने इस संगीतकार का टेलीफ़ोन नंबर 'विविध भारती' के एक उच्च अधिकारी को भेज दिया और उनसे इस इंटरव्यु की गुज़ारिश कर बैठा। लेकिन पता नहीं इनकी कोई मजबूरी ही रही होगी कि यह इंटरव्यु संभव नहीं हो पाया। पिछले कुछ महीनों से जब मैंने ख़ुद इंटरव्युज़ लेना शुरु किया तो इस संगीतकार का नाम भी मेरी लिस्ट में था। दो तीन महीनों से मैं सोच ही रहा था कि किसी रविवार के दिन उन्हें टेलीफ़ोन करूँगा और उनसे कुछ बातचीत करूँगा। आप शायद मेरी बात का यकीन न करें कि मैं पिछले ही रविवार २७ मार्च को उन्हें फ़ोन करने ही वाला था कि उससे पहले किसी कारणवश मैंने रामास्वामी को फ़ोन कर लिया। और रामास्वामी नें मुझे बताया कि संगीतकार अजीत मर्चैण्ट का पिछले १८ मार्च २०११ को लम्बी बीमारी के बाद निधन हो गया है। कुछ पल के लिए मेरे मुंह से शब्द ही नहीं निकल पाये। हताशा और अफ़सोस की सीमा न थी। अजीत जी की काफ़ी उम्र हो गई थी; प्राकृतिक नियम से उनकी मृत्यु अस्वाभाविक नहीं थी, लेकिन मुझे एक अपराधबोध नें घेर लिया कि काश मैं कुछ दिन पहले उन्हें फ़ोन कर लिया होता। वो बीमार थे, इसलिए इंटरव्यु तो शायद मुमकिन नहीं होता, पर कम से कम उनकी बोलती हुई आवाज़ तो सुन लेता। और यह अफ़सोस शायद मेरे साथ एक लम्बे समय तक चलेगा। अफ़सोस इस बात का भी है कि अजीत जी की मृत्यु की ख़बर न किसी राष्ट्रीय अख़्बार में छपी, और न ही किसी टीवी चैनल नें अपना 'ब्रेकिंग् न्युज़' बनाया, जो किसी बिल्ली के पानी की टंकी के उपर चढ़ जाने और फिर नीचे न उतर पाने की ख़बर को भी 'ब्रेकिंग् न्युज़' में जगह दिया करते हैं। गुजरात के अखबारों और इंटरनेट के माध्यम से उनकी मृत्यु-संवाद लोगों तक पहुंचा। दोस्तों, अजीत जी से मैं ख़ुद आपका परिचय तो नहीं करवा सका, लेकिन आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का यह विशेषांक उन्हीं को समर्पित कर अपने दिल का बोझ थोड़ा कम करना चाहता हूँ, जिस बोझ को मैं पिछले कुछ दिनों से अपने साथ लिए घूम रहा हूँ।

१९५७ की फ़िल्म 'चंडीपूजा' के कवि प्रदीप के लिखे और गाये गीत "कोई लाख करे चतुराई" को आप नें कई कई बार विविध भारती के 'भूले बिसरे गीत' कार्यक्रम में सुना होगा। यह अभिनेत्री शांता आप्टे की अंतिम हिंदी फ़िल्म थी। 'चंडीपूजा' के कुछ गीत लोकप्रिय हुए तो थे लेकिन उनका श्रेय प्रदीप को ज़्यादा और अजीत मर्चैण्ट को कम दिया गया। अजीत मर्चैण्ट उसी बिल्डिंग् में रहते थे जिसमें गायक मुकेश भी रहते थे। लेकिन मुकेश नें जहाँ सफलता के नभ चूमें, अजीत जी की झोली ख़ाली ही रही। एक से एक सुरीली धुन देने वाले अजीतभाई एक कमचर्चित संगीतकार के रूप में ही जाने गये और आज की पीढ़ी नें तो शायद उनका नाम भी नहीं सुना होगा। पर गुज़रे ज़माने के संगीत रसिक अजीत मर्चैण्ट का नाम सम्मान के साथ लेते हैं।

अजीत मर्चैण्ट एक गुजराती फ़िल्म संगीतकार के रूप में ज़्यादा जाने गये और उन्हें शोहरत भी गुजराती फ़िल्मों से ही प्राप्त हुई। १९५० की गुजराती फ़िल्म 'दीवादांडी' में दिलीप ढोलकिया के गाये लोकप्रिय भजन "तारी आँखनो अफ़ीनी" के संगीतकार के रूप में अजीत मर्चैण्ट हमेशा याद किए जायेंगे। ग़ज़ल सम्राट जगजीत सिंह को पहला मौका अजीत मर्चैण्ट नें ही दिया था। गुजराती में "लागी राम भजन" को जगजीत सिंह की आवाज़ में सुनना भी एक अनोखा अनुभव है। अभी कुछ साल पहले, जगजीत सिंह पर एक कार्यक्रम आयोजित हुआ था 'माइ लाइफ़ माइ स्टोरी'। उसमें जगजीत जी नें अपने भाषण में कहा था, "जब मैं संघर्ष कर रहा था, एक गुजराती भाई नें अपना हाथ मेरी तरफ़ बढ़ाया था"। जज़्बाती जगजीत सिंह नें फिर ज़ोर से आवाज़ लगाई, "आप कहाँ पर हो अजीत भाई?" अजीत जी बिल्कुल पीछे की तरफ़ बैठे हुए थे। जगजीत साहब नें दोबारा आवाज़ दी, "आप कहाँ पर हो अजीत भाई?" जब अजीत जी नें अपना हाथ उपर किया, तब जगजीत सिंह ख़ुद मंच से उतरकर अजीत भाई के पास गये और उनसे गले मिले। दोनों के ही आँखों में आँसू थे।

दोस्तों, मेरा वही मित्र रामास्वामी एक बार अजीत मर्चैण्ट से जाकर मिला। मौका था एक नये म्युज़िक क्लब 'गीत-गुंजन' का गठन, जिसमें अजीत जी को बतौर मुख्य अतिथि निमंत्रित किया गया था। स्थान था गुजराती सेवा मंडल, माटुंगा, मुंबई। उस कार्यक्रम में अजीत जी को संबोधित करते हुए प्रकाश पुरंदरे नें यह जानकारी दी कि अजीत मर्चैण्ट नें हिंदी और गुजराती मिलाकर कुल ४५ फ़िल्मों में संगीत दिया है, और बहुत सारे ड्रामा में भी संगीत दिया है, जिसकी संख्या २५० से उपर है। एक दिलचस्प बात जिसका ज़िक्र प्रकाश जी नें किया, वह यह कि कवि प्रदीप नें "ऐ मेरे वतन के लोगों" अजीत जी के ही घर पर लिखा था। उस जल्से में अजीत मर्चैण्ट के स्वरबद्ध २० गीत सुनवाये गये जिसका सुभाष भट्ट नें संकलन किया था। ये रहे वो २० गीत। इस लिस्ट के ज़रिए आइए आज हम भी यादें ताज़ा कर लें अजीत जी के सुरीले गीतों का।

१. तारी आँखेनो अफ़ीनी (दीवादांडी - गुजराती), गायक- दिलीप ढोलकिया, गीत- बाल मुकुंद दवे
२. वगदवच्चे तलावाडी ने (दीवादांडी - गुजराती), गायक- दिलीप ढोलकिया, रोहिणी रॊय, गीत- बाल मुकुंद दवे
३. पंछी गाने लगे: भाग-१ (इंद्रलीला, १९५६), गायक- मोहम्मद रफ़ी, गीत- सरस्वती कुमार दीपक
४. पंछी गाने लगे: भाग-२ (इंद्रलीला, १९५६), गायक- मोहम्मद रफ़ी, गीत- सरस्वती कुमार दीपक
५. पर्वत हट जा धरती फट जा (इंद्रलीला, १९५६), गायक- आशा भोसले, गीत- सरस्वती कुमार दीपक
६. सुन लो जिया की बात (इंद्रलीला, १९५६), गायक- आशा भोसले, गीत- सरस्वती कुमार दीपक
७. पूरब दिसा की चंचल बदरिया (चंडीपूजा, १९५७), गायक- सुधा मल्होत्रा, साथी, गीत- कवि प्रदीप
८. अजी ओ जी कहो (चंडीपूजा, १९५७), गायक- शम्शाद बेगम, मोहम्मद रफ़ी, गीत- कवि प्रदीप
९. सुनो सुनाओ तुम एक कहानी (चंडीपूजा, १९५७), गायक व गीत- कवि प्रदीप
१०. कोई लाख करे चतुराई (चंडीपूजा, १९५७), गायक व गीत- कवि प्रदीप
११. रूप तुम्हारा आँखों से पी लूँ (सपेरा, १९६१), गायक- मन्ना डे, गीत - इंदीवर
१२. रात नें गेसू बिखराये (सपेरा, १९६१), गायक- मन्ना डे, सुमन कल्याणपुर, गीत - इंदीवर
१३. मैं हूँ सपेरे तेरे जादू के देश में (सपेरा, १९६१), गायक- सुमन कल्याणपुर, गीत - इंदीवर
१४. बैरी छेड़ ना ऐसे राग (सपेरा, १९६१), गायक- सुमन कल्याणपुर, गीत - इंदीवर
१५. बोलो बोलो बोलो पिया (सपेरा, १९६१), गायक- सुमन कल्याणपुर, गीत - इंदीवर
१६. ओ री पिया मोरा तड़पे जिया (सपेरा, १९६१), गायक- सुमन कल्याणपुर, गीत- इंदीवर
१७. कुछ तुमनें कहा कुछ हमनें सुना (चैलेंज, १९६४), गायक- आशा भोसले, गीत- प्रेम धवन
१८. मैं भी हूँ मजबूर सजन (चैलेंज, १९६४), गायक- मुकेश, आशा भोसले, गीत- प्रेम धवन
१९. बदले रे रंग बदले ज़माना कहीं (चैलेंज, १९६४), गायक- लता मंगेशकर, साथी, गीत- प्रेम धवन
२०. मैं हो गई रे तेरे लिए बदनाम (चैलेंज, १९६४), गायक- आशा भोसले, गीत- प्रेम धवन


अजीत मर्चैण्ट के बारे में और विस्तारित जानकारी आप पंकज राग लिखित किताब 'धुनों की यात्रा' तथा योगेश जाधव लिखित किताब 'स्वर्णयुग के संगीतकार' से प्राप्त कर सकते हैं। अजीत मर्चैण्ट की प्रतिभा का मूल्यांकन हम इस बात से भी कर सकते हैं कि इस ज़मानें में कई जानेमाने संगीतकार अजीत जी से उनकी धुनें १०,००० रुपय तक में ख़रीदना चाहते थे। और इस राह में राज कपूर जैसे स्तंभ फ़िल्मकार भी पीछे नहीं थे। लेकिन अजीत जी नें कभी अपनी धुनें नहीं बेची। इससे ज़्यादा अफ़सोस की बात क्या हो सकती है संगीत के लिए। आज अजीत जी हमारे बीच नहीं रहे, लेकिन उनके स्वरबद्ध तमाम गुजराती गीत और 'इंद्रलीला', 'चंडीपूजा', 'सपेरा', 'लेडी-किलर' और 'चैलेंज' जैसी फ़िल्मों के गानें हमें उनकी याद दिलाते रहेंगे, जिन्हें सुन कर कभी हम ख़ुश होंगे और कभी यह सोच कर मन उदास भी होगा कि अजीत मर्चैण्ट तो वो सबकुछ क्यों नहीं मिल पाया जो उनके समकालीन दूसरे सफल संगीतकारों को मिला? 'हिंद-युग्म आवाज़' परिवार की तरफ़ से स्वर्गीय अजीत मर्चैण्ट को भावभीनी श्रद्धांजली। अब इस प्रस्तुति को समाप्त करने से पहले आइए सुनें फ़िल्म 'चण्डीपूजा' का वही मशहूर गीत "कोई लाख करे चतुराई", और इसी के साथ इस विशेष प्रस्तुति को समाप्त करने की दीजिए इजाज़त, नमस्कार!

गीत - कोई लाख करे चतुराई


आलेख - सुजॉय चट्टर्जी

Wednesday, July 29, 2009

लोग उन्हें "गाने वाली" कहकर चिढ़ाते थे, धीरे धीरे ये उनका उपनाम हो गया....

दुनिया में कुछ ही लोग ऐसे होते हैं जो अपनी अमिट छाप छोड़ जाते हैं, जिनके जाने के बाद भी उनकी मधुर स्मृतियाँ हमें प्रेरित करती हैं. सपने देखने और उन्हें पूरा करने का हौसला देती हैं. इसी श्रेणी में एक नाम और दर्ज हुआ है, वो है शास्त्रीय संगीत की मल्लिका गंगूबाई का. गीता में कहा है कि 'शरीर मरता है आत्मा नही'. गंगूबाई शास्त्रीय संगीत की आत्मा हैं. आज वो नहीं रहीं लेकिन उनकी संगीत शैली आत्मा के रुप में हमारे बीच विराजमान है.

यूँ तो आज गंगूबाई संगीत के शिखर पर विराजित थीं लेकिन उस शिखर तक पहुँचने का रास्ता उन्होंने बहुत ही कठिनाईयों से तय किया था. गंगूबाई का जन्म १९१३ में धारवाड़ में हुआ था. देवदासी कुल में जन्म लेने वाली गंगूबाई ने छुटपन से संगीत की शिक्षा लेनी शुरु कर दी थी. अक्सर उन्हें जातीय टिप्पणी का सामना करना पड़ता और उनकी गायन कला को लेकर लोग मजाक बनाया करते थे. उस समय गायन को अच्छा नहीं माना जाता था, इसलिए लोग उन्हें 'गाने वाली' कहकर चिढ़ाते थे. धीरे-धीरे यह उनका उपनाम हो गया.

गंगूबाई कर्नाटक के दूरस्थ इलाके हंगल में रहती थीं. इसी से उनकी पहचान बनी और उनके नाम के साथ गाँव का नाम हंगल जुड़ गया. गंगूबाई हंगल की माँ कर्नाटक शैली की गायिका थीं लेकिन गंगूबाई ने हिन्दुस्तानी शैली का गायन सीखने का फैसला किया. अपने गुरु सवाई गंधर्व से हिन्दुस्तानी शास्त्रीय गायन सीखने के लिये गंगूबाई कुडगोल जाया करती थीं. गंगूबाई ने कई बाधाओं को पार कर शास्त्रीय संगीत को एक मुकाम तक पहुँचाया. गंगूबाई ने गुरु-शिष्य परम्परा को बरकरार रखा. उन्होंने अपने गुरु सवाई गंधर्व की शिक्षाओं के बारे में एक बार कहा था कि -'मेरे गुरु जी ने मुझे सिखाया है कि जिस तरह एक कंजूस अपने पैसों के साथ व्यवहार करता है उसी तरह सुर का इस्तेमाल करो ताकि श्रोता राग की हर बारीकी को समझ सके'.

गंगूबाई ने भारत रत्न से सम्मानित पंडित भीमसेन जोशी जी के साथ संगीत शिक्षा ली थी. किराना घराने की परम्परा को बरकरार रखने वाली गंगूबाई ने कभी भी इससे जुड़ी शैली की शुद्धता के साथ समझौता नहीं किया. गंगूबाई को 'भैरव, असावरी, तोड़ी, भीमपलासी, पुरिया, धनश्री, मारवा, केदार और चन्द्रकौंस' रागों की गायिकी के लिये अधिक सम्मान मिला. उनका कहना था कि 'मैं रागों को धीरे-धीरे आगे बढ़ाने की हिमायती हूँ, इससे श्रोता की उत्सुकता बनी रहती है और उसमें अगले चरण को जानने की इच्छा बढ़ती है'. एक बार फ़िल्म मेकर विजया मूले से बात करते हुए गंगूबाई ने कहा था कि 'पुरुष संगीतकार अगर मुसलमान हो तो उस्ताद कहलाने लगता है, हिन्दु हो तो पंडित हो जाता है, लेकिन केसरबाई, हीराबाई और मो्गाबाई जैसी गायिकायें बाई ही रह जाती हैं उनके व्यक्तित्व में जीवन से और स्त्री होने से मिले दुखों की झलक साफ नजर आती थी. उनकी आवाज में दर्द था लेकिन उसे भी उन्होंने मधुरता से सजाया. ईश्वर के प्रति श्रद्धा होने के कारण गंगूबाई ने भक्ति संगीत को भी नई ऊँचाईयों तक पहुँचाया.

गंगूबाई एक महान गायिका थीं. उन्हें पद्म विभूषण, तानसेन पुरुस्कार, संगीत नृत्य अकादमी पुरुस्कार और संगीत नाटक अकादमी जैसे पुरुस्कारों से नवाजा गया. गंगूबाई हंगल ने हर तरह का वक्त देखा था. गंगूबाई को नौ प्रधानमंत्रियों और पाँच राष्ट्रपतियों द्वार सम्मान प्राप्त हुआ जो अपने आप में एक उपलब्धि है. उन्होंने भारत में दो सौ से अधिक स्कूलों मे भारतीय शास्त्रीय संगीत को बढ़ावा देने के लिये कार्यक्रम किये साथ ही देश के बाहर भी भारतीय शास्त्रीय संगीत को पहुँचाया.

यह सच है कि पद्म भूषण गंगूबाई हंगल नहीं रहीं लेकिन उनकी आँखे आज भी दुनिया देखेंगी. गंगूबाई हंगल अपनी आँखे दान कर गयीं हैं. कहते हैं कि एक श्रेष्ठ व्यक्ति कभी नहीं मरता है उसकी उपस्थिति उसके अनगिनत महान कार्यों से दुनिया में रहती है. गंगूबाई हंगल भी अपने संगीत और आँखों द्वारा इस दुनिया में रहेंगी. गंगूबाई हंगल एक ऐसी गायिका थीं जिन्होने अपने शास्त्रीय गायन में कभी कोई मिलावट नहीं की. उन्होंने अपना रास्ता खुद बनाया. ऐसी महान शास्त्रीय गायिका को हम श्रद्धाजंली देते हैं और सुनते हैं उनकी आवाज़ में आज राग दुर्गा, प्ले का बटन दबाईये, ऑंखें बंद कीजिये और महसूस कीजिये आवाज़ के इस तिलस्मी अहसास को-



आलेख - दीपाली तिवारी "दिशा"

Sunday, July 12, 2009

रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत (९)

जून २५, २००९ को संगीत दुनिया का एक आफताबी सितारा हमेशा के लिए रुखसत हो गया. माइकल जोसफ जैक्सन जिन्हें लोग प्यार से "जैको" भी कहते थे, आधुनिक संगीत के एक महत्वपूर्ण प्रेरणा स्तम्भ थे, जिन्हें "किंग ऑफ़ पॉप" की उपाधि से भी नवाजा गया. एक संगीतमय परिवार में जन्में जैक्सन ने १९६८ में अपने पूरे परिवार के सम्मिलित प्रयासों से बने एल्बम "जैक्सन ५" से अपना सफ़र शुरू किया. १९८२ में आई उनकी एल्बम "थ्रिलर" विश्व भर में सबसे अधिक बिकने वाली एल्बम का रिकॉर्ड रखती है. "बेड", "डेंजरस" और "हिस्ट्री" जैसी अल्बम्स और उनके हिट गीतों पर उनके अद्भुत और अनूठे नृत्य संयोजन, उच्चतम श्रेणी के संगीत विडियो, संगीत के माध्यम से सामाजिक सरोकारों की तरफ दुनिया का ध्यान खीचना, अपने लाइव कार्यक्रमों के माध्यम से अनूठे प्रयोग कर दर्शकों का अधिकतम मनोरंजन करना आदि जैको की कुछ ऐसी उपलब्धियां हैं, जिन्हें छू पाना अब शायद किसी और के बस की बात न हो. जैको का प्रभाव पूरे विश्व संगीत पर पड़ा तो जाहिर है एशियाई देशों में भी उनका असर देखा गया. उनके नृत्य की नक़ल ढेरों कलाकारों ने की, हिंदी फिल्मों में तो नृत्य संयोजन का नक्शा ही बदल गया. सरोज खान और प्रभु देवा जैसे नृत्य निर्देशकों ने अपने फन पर उनके असर के होने की बात कबूली है. पॉप संगीत की ऐसी आंधी चली कि ढेरों नए कलाकारों ने हिंदी पॉप के इस नए जेनर में कदम रखा और कमियाबी भी पायी. अलीशा चुनोय, सुनीता राव, आदि तो चले ही, सरहद पार पाकिस्तान से आई आवाजों ने भी अपना जादू खूब चलाया भारतीय श्रोताओं पर. नाजिया हसन का जिक्र हमें पिछले एक एपिसोड में किया था. आज बात करते हैं है एक और ऐसी ही आवाज़ जो सरहद पार से आई एक "हवा" के झोंके की तरह और सालों तक दोनों मुल्कों के संगीत प्रेमियों पर अपना जादू चला कर फिर किसी खला में में ऐसे खो गयी कि फिर किसी को उनकी कोई खबर न मिल सकी.

"हवा हवा ऐ हवा, खुशबू लुटा दे..." गीत कुछ यूं आया कि उसकी भीनी खुशबू में सब जैसे बह चले. हसन जहाँगीर घर घर में पहचाने जाने लगे. बच्चे बूढे और जवान सब उनके संगीत के दीवाने से होने लगे. पाकिस्तान विभाजन के बाद बंगलादेश से पाकिस्तान आ बसे हसन जहाँगीर ने पाकिस्तान की विश्व विजेता टीम के कप्तान इमरान खान के लिए गीत लिखा "इमरान खान सुपरमैन है" और चर्चा में आये. उनकी एल्बम "हवा हवा" की कई लाखों में प्रतियाँ बिकी. चलिए इस रविवार हम सब भी MJ को श्रद्धाजंली देते हैं हसन जहाँगीर के इसी सुपर डुपर हिट एल्बम को सुनकर क्योंकि ८० के दशक में इस और ऐसी अन्य अल्बम्स की आपार लोकप्रियता का काफी श्रेय विश्व संगीत पर माइकल का प्रभाव भी था. दक्षिण एशिया के इस पहले पॉप सनसनी रहे हसन जहाँगीर ने हवा हवा के बाद भी कुछ अल्बम्स की पर हवा हवा की कामियाबी को फिर दोहरा न सके. हिंदी फिल्मों के लिए भी हसन ने कुछ गीत गाये जिसमें से अनु मालिक के लिया गाया "अपुन का तो दिल है आवारा" लोकप्रिय हुआ था, पर इसके बाद अचानक हसन कहीं पार्श्व में खो गए. धीरे धीरे लोग भी भूलने लगे. हालाँकि हसन ने कभी भी अपने इस मशहूर गीत के अधिकार किसी को नहीं बेचे पर इस गीत के बहुत से फूहड़ संस्करण कई रूपों में बाज़ार में आता रहा, पर उस दौर के संगीत प्रेमी मेरा दावा है आज तक उस जूनून के असर को नहीं भूल पाए होंगें जो उन दिनों हसन की गायिकी ने हर किसी के दिल में पैदा कर दिया था.

बरसों तक हसन क्यों खामोश रहे, ये तो हम नहीं जानते पर आज एक बार फिर वो चर्चा में हैं, अभिनेत्री से निर्देशक बनी रेवती ने अब पहली बार उनके उसी हिट गीत को अधिकारिक रूप से अपनी नयी फिल्म "आप के लिए हम" में इस्तेमाल करने की योजना बनायीं है. इसके लिए उन्होंने बाकायदा हसन की इजाज़त ली है और ये भी संभव हो सकता है कि खुद हसन जहाँगीर इस गीत पर अभिनय भी करते हुए दिखें. इसी फिल्म से रवीना टंडन अपनी वापसी कर रही है. बहरहाल हवा हवा गीत के इस नए संस्करण का तो हम इंतज़ार करेंगे, पर फिलहाल इस रविवार सुबह की कॉफी के साथ आनंद लीजिये उस लाजवाब अल्बम के बाकी गीतों का. यकीन मानिये जैसे जैसे आप इन गीतों को सुनते जायेंगें, आपके भी मन में यादों के झरोखे खुलते जायेंगें, आज भी हसन की आवाज़ में वही ताजगी और उनके संगीत में वही सादापन नज़र आता है. यदि आप उस दौर के नहीं हैं तब तो अवश्य ही सुनियेगा, क्योंकि हमें पूरा विश्वास है कि आज भी इन गीतों को सुनकर आपको भी हसन जहाँगीर की उस नशीली आवाज़ से प्यार हो जायेगा. तो पेश है अल्बम "हवा हवा" के ये जोरदार गीत -

आजा न दिल है दीवाना ...


दिल जो तुझपे आया है...


जिंदगी है प्यार....


मेघा जैसे रोये साथी.....(मेरा सबसे पसंदीदा गीत)


ले भी ले दिल तू मेरा ओ जानेमन....


शावा ये नखरा गोरी का...


न जाओ ज़रा मेहंदी लगाओ....


ये फैशन के नए रंग है....


जी जी ओ पारा डिस्को...


किस नाम से पुकारूं...




"रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत" एक शृंखला है कुछ बेहद दुर्लभ गीतों के संकलन की. कुछ ऐसे गीत जो अमूमन कहीं सुनने को नहीं मिलते, या फिर ऐसे गीत जिन्हें पर्याप्त प्रचार नहीं मिल पाया और अच्छे होने के बावजूद एक बड़े श्रोता वर्ग तक वो नहीं पहुँच पाया. ये गीत नए भी हो सकते हैं और पुराने भी. आवाज़ के बहुत से ऐसे नियमित श्रोता हैं जो न सिर्फ संगीत प्रेमी हैं बल्कि उनके पास अपने पसंदीदा संगीत का एक विशाल खजाना भी उपलब्ध है. इस स्तम्भ के माध्यम से हम उनका परिचय आप सब से करवाते रहेंगें. और सुनवाते रहेंगें उनके संकलन के वो अनूठे गीत. यदि आपके पास भी हैं कुछ ऐसे अनमोल गीत और उन्हें आप अपने जैसे अन्य संगीत प्रेमियों के साथ बाँटना चाहते हैं, तो हमें लिखिए. यदि कोई ख़ास गीत ऐसा है जिसे आप ढूंढ रहे हैं तो उनकी फरमाईश भी यहाँ रख सकते हैं. हो सकता है किसी रसिक के पास वो गीत हो जिसे आप खोज रहे हों.

Monday, May 25, 2009

सफल 'हुई' तेरी आराधना - अंतिम कडी

अब तक आपने पढ़ा -

आनंद आश्रम से शुरू हुआ सफ़र...., हावड़ाब्रिज से कश्मीर की कली तक... ,रोमांटिक फिल्मों के दौर में आराधना की धूम..., और अमर प्रेम, अजनबी और अनुराग जैसी कामियाब फिल्मों का सफ़र अब पढें आगे....


शक्ति सामंत को समर्पित 'आवाज़' की यह प्रस्तुति "सफल हुई तेरी आराधना" एक प्रयास है शक्तिदा के 'फ़िल्मोग्राफी' को बारीक़ी से जानने का और उनके फ़िल्मों के सदाबहार 'हिट' गीतों को एक बार फिर से सुनने का। पिछले अंक में हमने ज़िक्र किया था १९७४ की फ़िल्म 'अजनबी' का। आइए अब आगे बढ़ते हैं और क़दम रखते हैं सन १९७५ में। यह साल भी शक्तिदा के लिए एक महत्वपूर्ण साल रहा, इसी साल आयी फ़िल्म 'अमानुष' जिसका निर्माण व निर्देशन दोनो ही उन्होने किया। पहली बार बंगला के सर्वोत्तम नायक उत्तम कुमार को लेकर उन्होने यह फ़िल्म बनायी, साथ में थीं उनकी प्रिय अभिनेत्री शर्मिला। इसी फ़िल्म के बारे में बता रहे हैं ख़ुद शक्तिदा - "१९७२ में कलकत्ता में 'नक्सालाइट' का बहुत ज़्यादा 'प्राबलेम' शुरु हो गया था। कलकत्ता फ़िल्म इंडस्ट्री का बुरा हाल था। उससे पहले उत्तमदा ने एक 'पिक्चर' यहाँ बनाई थी 'छोटी सी मुलाक़ात' जो शायद अच्छी नहीं चली थी, या जो भी थी, 'He couldn't establish himself yet'। तो एक दिन रात को उन्होने ऐसे ही कह दिया कि 'क्या मैं दोबारा यहाँ पे आ नहीं सकता हूँ?' मैने कहा 'ज़रूर, मैं आपको लेकर एक 'पिक्चर' बनाउँगा'। तो मैने सोचा कि यह बंगला 'पिक्चर' है तो ज़्यादातर 'आर्टिस्ट्स' वहीं के ले लूँ। कुछ यहाँ के 'आर्टिस्ट्स' को छोड़कर सब वहाँ के 'आर्टिस्ट्स' को मैने लिया। और भगवान की दया से वह पिक्चर भी चल पड़ी।"

'अमानुष' फ़िल्म की 'शूटिंग भी रोमांच से भरा हुआ था। इस फ़िल्म को 'शूट' करने के लिए शक्तिदा अपनी पूरी टीम को लेकर बंगाल के सामुद्रिक इलाके 'सुंदरबन' गए जो 'रायल बेंगाल टाइगर' के लिए प्रसिद्ध है। पूरी टीम के लिए वह एक अविस्मरणीय यात्रा रही। वहाँ पर सिर्फ़ एक ऐसी जगह थी जहाँ शेर नहीं आ सकते थे। एक छोटा सा द्वीप जिसके चारों तरफ़ सिर्फ़ पानी ही पानी। वहाँ पर १५० लोगों के रहने लायक तंबू लगाये गये थे और 'मोटर बोट्स' की सहायता से सामानों का आवाजाही हो रहा था। उन लोगों ने साफ़ देखा की पानी में छोटी छोटी 'शार्क' मछलियाँ तैर रही हैं। इसलिए उन्हे यह निर्देश था कि कोई भी पानी में ना उतरें। साथ ही यह भी बताया गया था कि रात में कोई तंबू से बाहर ना निकले, यहाँ तक कि हाथ भी तंबू से बाहर ना निकालें क्युंकि एक ताज़े माँस के टुकड़े के लिए ख़ूंखार शेर पानी में डुबकी लगाए छुपे होते हैं। 'अमानुष' के शुरुआती दिनों में शक्तिदा उत्तम कुमार के घर ख़ूब जाया करते थे। उन्ही के घर पर वो गायक संगीतकार श्यामल मित्रा से मिले, और वहीं पर उन्होने श्यामलदा से निवेदन किया कि वो इस फ़िल्म के गीतों को स्वरबद्ध करें। श्यामल मित्रा इस बात पर राज़ी हुए कि गीतों के बोल अच्छे स्तर के होने चाहिए।

गीत: दिल ऐसा किसी ने मेरा तोड़ा (अमानुष)


'अमानुष' फ़िल्म में गीत लिखे थे इंदीवर साहब ने। कितनी अजीब बात है कि 'अमानुष' के इस 'हिट' गीत के लिए गीतकार इंदीवर और गायक किशोर कुमार को 'फ़िल्म-फ़ेयर अवार्ड' से सम्मानित किया गया, लेकिन संगीतकार श्यामल मित्रा वंचित रह गये। ख़ुशी फिर भी इस बात की रही कि हिंदी फ़िल्मों के पहली ब्रेक में ही उन्होने अपार सफलता हासिल की। हिंदी फ़िल्मों में आने से पहले वे बंगाल के जानेमाने गायक और संगीतकार बन चुके थे। फ़िल्म 'अमानुष' में इस तरह के असाधारण गाने लिखने के बाद शक्तिदा इंदीवर साहब के 'फ़ैन' बन गए। लेकिन क्या आपको पता है कि इंदीवर का लिखा कौन सा गाना शक्तिदा को सबसे ज़्यादा पसंद था? वह गीत था १९५४ की फ़िल्म 'बादबान' का। यह गीत सुनने से पहले आपको यह भी बता दें कि इस फ़िल्म के संवाद और स्क्रीनप्ले शक्तिदा ने ख़ुद लिखे थे जो उन दिनो निर्देशक फणी मजुमदार के सहायक के रूप में काम कर रहे थे बौम्बे टाकीज़ में। बौम्बे टाकीज़ की आर्थिक अवस्था बहुत ख़राब हो चुकी थी। यह फ़िल्म इस कंपनी में काम करने वाले मज़दूरों के लिए बनाई गयी थी, जिसके लिए किसी भी कलाकार ने कोई पैसे नहीं लिए। अशोक कुमार, देव आनंद, लीला चिटनिस, उषा किरन जैसे कलाकारों ने इस फ़िल्म में काम किया था। संगीतकार थे तिमिर बरन और एस. के पाल। अभी उपर इंदीवर के लिखे जिस गीत का ज़िक्र हम कर रहे थे, उसे गाया था गीता दत्त ने, और एक वर्ज़न हेमन्त कुमार की आवाज़ में भी था। सुनिए गीताजी की वेदना भरी आवाज़ में "कैसे कोई जीये ज़हर है ज़िंदगी"।

गीत: कैसे कोई जियें ज़हर है ज़िंदगी (बादबान)


अमानुष के बाद ७० के दशक के आख़िर के चंद सालों में भी शक्तिदा के फ़िल्मों का जादू वैसा ही बरक़रार रहा। निर्माता-निर्देशक के रूप मे १९७७ मे उनकी फ़िल्म आयी 'आनंद आश्रम' जो 'अमानुष' की ही तरह बंगाल के पार्श्वभूमि पर बनाया गया था। इस फ़िल्म का निर्माण बंगला में भी किया गया था, और इस फ़िल्म मे भी उत्तम कुमार और शर्मिला टैगोर ने अभिनय किया था। बतौर निर्माता, शक्तिदा ने १९७६ मे फ़िल्म 'बालिका बधु' का निर्माण किया, जिसका एक बार फिर बंगाल की धरती से ताल्लुख़ था। शरतचंद्र की बंगला उपन्यास पर आधारित इस फ़िल्म को निर्देशित किया था तरु मजुम्दार ने और फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे सचिन और रजनी शर्मा। गाने लिखे आनंद बक्शी ने और संगीत दिया राहुल देव बर्मन ने। इस फ़िल्म मे आशा भोसले, मोह्द रफ़ी, किशोर कुमार, अमित कुमार और चंद्राणी मुखर्जी ने तो गीत गाये ही थे, ख़ास बात यह है कि इस फ़िल्म मे आनद बक्शी, आर.डी. बर्मन और उनके सहायक और गायक सपन चक्रवर्ती ने भी गानें गाये, और वह भी अलग अलग एकल गीत। इस फ़िल्म का मशहूर होली गीत हमने 'ओल्ड इज़ गोल्ड' मे आपको सुनवा ही चुके हैं। बतौर निर्देशक, शक्तिदा ने १९७६ मे 'महबूबा', १९७७ में 'अनुरोध' और १९७९ मे 'दि ग्रेट गैम्बलर' जैसी सफल फ़िल्मों का निर्देशन किया। ये सभी फ़िल्में अपने ज़माने की सुपरहिट फ़िल्में रहीं हैं। वह दौर ऐसा था दोस्तों कि सफल फ़िल्में कहें या शक्तिदा की फ़िल्में कहें, मतलब एक ही निकलता था।

गीत: आप के अनुरोध पे मैं यह गीत सुनाता हूँ (अनुरोध)


८० के दशक के आते आते फ़िल्मों का मिज़ाज बदलने लगा था। कोमलता फ़िल्मों से विलुप्त होती जा रही थी और उनकी जगह ले रहा था 'ऐक्शन' फ़िल्में। बावजूद इस बदलती मिज़ाज के, शक्तिदा ने अपना वही अंदाज़ बरक़रार रखा। इस दशक मे जिन हिंदी फ़िल्मों के वो निर्माता-निर्देशक बने, वो फ़िल्में थीं 'बरसात की एक रात', 'अय्याश', और 'आर-पार'। इन फ़िल्मों के अलावा उन्होने 'आमने सामने', 'मैं आवारा हूँ', 'पाले ख़ान' और 'आख़िरी बाज़ी' जैसी फ़िल्मों का निर्माण किया, तथा 'ख़्वाब', 'आवाज़', और 'अलग अलग' जैसी फ़िल्मों का निर्देशन भी किया। ९० के दशक मे 'गीतांजली' फ़िल्म के वो निर्माता-निर्देशक रहे, तथा 'आँखों में तुम हो' का निर्माण किया व 'दुश्मन' का निर्देशन किया।

शक्ति दा आज इतनी दूर चले गये हैं लेकिन जो काम वो कर गये हैं, उसकी लौ हमेशा नयी पीढ़ी को राह दिखाती रहेगी, नये फ़िल्मकारों को अच्छी फ़िल्में बनाने की प्रेरणा प्रदान करती रहेगी। दूसरे शब्दों में उनकी आराधना ज़रूर सफल होगी। चलते चलते उनकी फ़िल्म 'आनंद आश्रम' के शीर्षक गीत का मुखड़ा याद आ रहा है "सफल वही जीवन है, औरों के लिए जो अर्पण है"। शक्तिदा ने भी अपना पूरा जीवन फ़िल्म जगत को और पूरे समाज को सीख देनेवाली अच्छी अच्छी फ़िल्में देते हुए गुज़ार दिये। शक्तिदा को हिंद युग्म की तरफ़ से भावभीनी श्रद्धाजंली।

५ अंकों के इस पूरे आलेख को तैयार करने में विविध भारती के निम्नलिखित कार्यक्रमों से जानकारियाँ बटोरी गयीं:

१. युनूस ख़ान द्वारा प्रस्तुत शक्तिदा को श्रद्धांजलि - "सफल होगी तेरी आराधना"
२. कमल शर्मा से की गयी शक्तिदा की लम्बी बातचीत - "उजाले उनकी यादों के"
३. शक्तिदा द्वारा प्रस्तुत फ़ौजी भाइयों के लिए "विशेष जयमाला" कार्यक्रम


प्रस्तुति: सुजॉय चटर्जी
समाप्त



Thursday, March 19, 2009

माँ! तेरी जय हो। 'जय हो' का एक रूप यह भी

रहमान और भारत माता को राजकुमार 'राकू' का सलाम


रहमान के गीत 'जय हो' को ऑस्कर मिलने के बाद इस गीत के ढेरों संस्करण इंटरनेट पर उपलब्ध हो गये। भारतीय राजनीतिज्ञों के ऊपर व्यंग्य कसती 'जेल हो' गीत भी चर्चा में है। हिन्द-युग्म के राजकुमार राकू' ने रहमान की इस उपलब्धि को रहमान को भारत माँ को सलाम कहा। सब अपनी-अपनी तरह से रहमान को सलाम कर रहे थे, इसी बीच राजकुमार 'राकू' और उनकी टीम ने एक नया गीत गढ़ा 'माँ! तेरी जय हो'। इस गीत को लिखा है खुद राकुमार 'राकू' ने। राकू ने संगीत विवेक अस्थाना के साथ मिलकर इस गीत को धुन दी है। संगीत-संयोजन किया है बॉलीवुड के उभरते संगीतकार विवेक अस्थाना ने। गीत में आवाज़ें हैं राजकुमार राकू (कमेंट्री), राजेश बिसेन, सुमेधा और साथियों की। आपको बताते चलें कि यह गीत आने वाली फिल्म 'कलाम का सलाम' का हिस्सा होगा। इस गीत में सभी भारतीय वाद्य-यंत्रों का इस्तेमाल किया गया है। 'माँ' से जुड़ीं भावों को पिरोने के लिए राग दुर्गा का और विजय भाव के लिए राग जयजयवंती का प्रयोग किया गया है। आवाज़ के श्रोताओं को दुबारा याद दिला दें कि राकू और विवेक अस्थाना की जोड़ी द्वारा तैयार भिखारी ठाकुर का गीत 'हँसी-हँसी पनवा' हमने आपको दिसम्बर २००८ में सुनवाया था। आज सुनिए रहमान और भारत माँ को समर्पित यह गीत



वॉयस ओवर-
तेरी संतानों ........तेरे बच्चों ने, कला की दुनिया में तेरा नाम आसमानों पे लिख दिया। माता तेरी जय हो।
लेकिन तेरी ' आन, बान, शान, मान ' से से बढ़ कर क्या हो सकता है कोई भी सम्मान? तेरे बेटे 'रहमान' ने तो कह भी दिया .........." मेरे पास माँ है ...........!"
सच्चा बेटा तेरा ! सच्चा हिन्दोस्तानी ! उसकी गूँज तो सभी ने सुनी
और आज, उसकी शानदार ऊँचाई को मेरा छोटा सा सलाम ...........माँ! तेरे नाम!

गीत के बोल-
जय हो.........जय हो..............जय हो !
जननी मेरी .................. तेरी जय हो !
माता मेरी ....................तेरी जय हो !

तेरी गोद रहे ................आँगन मेरा!
आँचल हो तेरा ............चाहत मेरी!
ममता से भरी ............आँखें तेरी,
काबा मेरा ......काशी मेरी ..........
जय माँ मेरी माँ जय हो
महिमा तेरी माँ, जय हो
माँ शक्तिशाली जय हो
माँ सबसे न्यारी, जय हो
जयति जय, जयति जय, जय हो ..........जय हो .......जय ,जय ,जय , जय , जय , जय , हो !

ये सारा सम्मान मेरा
सौभाग्य मेरा .........अरमान मेरा !
ईमान मेरा ............भगवान् मेरा !
ये सारा हिन्दुस्ताँ, ये सारा हिन्दुस्ताँ मेरा
माँ सब कुछ है ..............वरदान तेरा !
जय हो, जय हो, जय हो
जयति जय, जय हो
जय हो ..........जय हो .......जय ,जय ,जय , जय , जय , जय , हो !

तेरी सेवा ................अनहद नाद रहे
बस तू ही तूही .........याद रहे !
आनंद रहे ..........उन्माद रहे !
हम मिट जायें ....कि..... रहे न रहें ।
बस तेरे सर पे .............ताज रहे ।
तेरे दामन में .........आबाद हैं हम ,
तो फिर कैसी......... फरियाद रहे ?

दुनिया देखे ............देखे दुनिया...............ऐसी तेरी, माँ तेरी जय हो ...ऐसी तेरी, माँ तेरी जय हो

जय हो.....जय हो ! ................जय ही जय हो !
आई मेरी ..............माई मेरी !
जननी मेरी .........माता मेरी !
भारतमाता ..........माय मदर इंडिया
माय मदर इंडिया ...........भारतमाता !
जय हो .......तेरी.तेरी जय हो .........तेरी जय हो .....................जय हो !
जय हो !

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Wednesday, December 17, 2008

हम भूल न जाए उनको, इसलिए कही ये कहानी...

आईये नमन करें उन शहीदों को जो क्रूर आतंकवादियों का सामना करते हुए शहीद हो गए


२६ नवम्बर की वह रात कितनी भयावह थी, जब चारों ओर आग बरस रही थी और सम्पूर्ण भारतीय आतंकित और भयभीत था। एक पिता के कानों में पुत्र की करूण पुकार गूँज रही थी और अपने लाल को बचाने के लिए वह दीवार पर सिर पटक रहा था, प्रशासन के सामने गिड़गिड़ा रहा था। कितनी ही माताएँ अपनी गोद उजड़ने का दृश्य अपनी आँखों से देख रही थी। देश-विदेश के अतिथि किंकर्तव्य विमूढ़ थे। । सबकी साँसें रूकी हुई थी। पल-पल की खबर सबकी धड़कनों को तीव्र कर रही थी। आतंकवादियों ने हमारे स्वाभिमान को ठेस लगाई। मानवता पर कलंक लगाया। कुछ लोगों के कुकृत्यों एवं हिंसक योजनाओं ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया। वीरों की संतान कहलाने वाले हम सब कितने असहाय,कितने कमजोर और कितने असावधान थे। अपनी सुरक्षा व्यवस्था के सुराग बहुत स्पष्ट दिखाई दिए। देश के नागरिकों ने अपने दायित्वों को भी जाना ।

सुरक्षा बल अपनी सम्पूर्ण लगाकर भी इसे रोक पाने में असमर्थ था। ऐसे में देश के बलिदानी निकल पड़े जान हथेली पर लेकर। उनकी आँखों में बस एक ही सपना था। देश की सुरक्षा का । उन्होंने माता की आँखों के आँसुओं को पोंछा और उसे अभय प्रदान किया। आतंक का सामना किया । आग उगलती गोलियों की वर्षा उनका मार्ग अवरूद्ध ना कर सकी। उस समय सुरक्षा बल के कमांडो भगवान बन गए। प्रत्यक देशवासी बहुत आशापूर्ण दृष्टि से उन्हें निहार रहा था उस पल यदि वो जा भी चूक जाते तो आतंक का राक्षस विजयी हो जाता। धन्य है उनकी शक्ति और उनका बलिदान। इस पुन्य कार्य को करते हुए उन्हें अपनी जान भी गँवानी पड़ी। उनका परिवार सारा देश बन गया। उनके बलिदान पर हर भारतीय का सिर गर्व से ऊँचा हो गया। तुमने देखा होगा आकाश से कि सम्पूर्ण भारत मुक्त कंठ से उन्हें दुआएँ दे रहा था । उनपर पुष्प वर्षा कर रहा था। वो मरे नहीं अमर हो गए। हर भारतीय के दिल में हमेशा-हमेशा रहेंगें। उन्होने भारत के उस स्वरूप का दर्शन करा दिया जो विश्व के लिए वन्दनीय है। तुमने आज भारत की ही नहीं विश्व की भी आँखें नम कर दी तथा सभी को कर्तव्य उन्मुख बना दिया। तुम्हारा बलिदान प्रत्येक भारतीय के दिल को दहला गया। तुम्हारा बलिदान व्यर्थ नहीं गया। उसने हम सब के हृदयों में राष्ट्रीयता की एक तीव्र लहर का संचार किया, बिखरे देश को एकता के सूत्र में बाँध दिया तथा मदहोशी की नींद में सोए भारतीयों को होश में ला दिया। हर भारतीय आँखों में आँसू और दिल में नूतन संकल्प लिए तुम्हारे सामने नत पूरे भारत ने मोमबत्तियाँ जलाकर तुम्हारे प्रति अपने श्रद्धा सुमन अर्पित किए हैं। हम हिन्दुस्तानी कोमल हृदय हैं, तुम्हारे बलिदान ने हमारे दिलों को द्रवित कर दिया है। मेरे देश के शहीद वीरों! हमारे श्रद्धा सुमन स्वीकार करो।


(यह विशेष कार्यक्रम NDTV पर प्रसारित हुआ था)

प्रस्तुति- शोभा महेन्द्रू

Wednesday, October 15, 2008

एहतराम की अंतिम कड़ी- मीर तकी 'मीर' की ग़ज़ल

एहतराम - अजीम शायरों को सलाम

इस श्रृंखला में अब तक हम ६ उस्ताद शायरों का एहतराम कर चुके हैं. आज पेश है शिशिर पारखी साहब के आवाज़ में ये आखिरी सलाम अजीम शायर मीर के नाम, सुनिए ये लाजवाब ग़ज़ल-

हस्ती अपनी हुबाब की सी है ।
ये नुमाइश सराब की सी है ।।

नाज़ुकी उस के लब की क्या कहिए,
हर एक पंखुड़ी गुलाब की सी है ।

चश्मे-दिल खोल इस भी आलम पर,
याँ की औक़ात ख़्वाब की सी है ।

बार-बार उस के दर पे जाता हूँ,
हालत अब इज्तेराब की सी है ।

मैं जो बोला कहा के ये आवाज़,
उसी ख़ाना ख़राब की सी है ।

‘मीर’ उन नीमबाज़ आँखों में,
सारी मस्ती शराब की सी है ।

हुबाब=bubble; सराब=illusion, mirage
इज्तेराब=anxiety, नीमबाज=half open



मीर तकी 'मीर'

आगरा में रहने वाले सूफी फ़कीर मीर अली मुत्तकी की दूसरी पत्नी के पहले पुत्र मुहम्मद तकी, जिन्हें उर्दू शायरी की दुनिया में मीर तकी 'मीर' के नाम से जाना जाता है का जन्म वर्ष अंदाज़न 1724 ई. माना गया है. वैसे एकदम सही जन्म वर्ष का भी कहीं लेखा जोखा नहीं मिलता. ख़ुद मीर तकी 'मीर' ने अपनी फारसी पुस्तक 'जिक्रे मीर' अपना संक्षिप्त सा परिचय दिया है उसी से उनका जन्म वर्ष आँका गया है. मीर के पूर्वज साउदी अरेबिया (हेजाज़) से हिंदुस्तान में आए थे. दस वर्ष के होने पर मीर के पिता का इंतकाल हो गया. सौतेले भाई मुहम्मद हसन ने पिता की संपत्ति पर हक़ जमा लिया और क़र्ज़ देने का बोझ इन पर डाल दिया. पिता के किसी मित्र के एक शिष्य की मदद से मीर ने कर्जा उतार दिया और नौकरी खोजने दिल्ली चले आए. यहाँ नवाब सम्सामुद्दौला ने मीर साहब को एक रूपए रोजाना गुजारे का दे कर उन्हें कुछ सहारा दिया.



यहीं इन्हें ज़ुबान-ओ-अदब सीखने का भी मौक़ा मिला। कुछ अच्छे शायरों की सोहबत भी मिली जिससे इनकी शायरी का ज़ौक़ परवान चढ़ा। मीर की घरेलू हालत बद से बदतर होती जा रही थी लेकिन शे'र-ओ-अदब का ख़ज़ाना रोज़-ब-रोज़ बढ़ता जा रहा था। रफ़्ता-रफ़्ता मीर ने वो मक़ाम शायरी में हासिल कर लिया कि ग़ालिब जैसे शायर को भी कहना पड़ा कि

रेख़ती के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो ग़ालिब
कहते हैं अगले ज़माने में कोई मीर भी था

पर जब नादिर शाह ने दिल्ली पर हमला किया तो नवाब सम्सामुद्दौला उसमें मारे गए. कुछ समय बाद मीर साहब को सहारा तो मिला पर वहां उन पर एक आफत सी आ गई. उनके सौतेले भाई के मामा खान आरजू एक मशहूर शायर थे. मीर साहब को उन्होंने ने अपने यहाँ रखा. पर मीर साहब कुछ समय बाद पगला से गए क्यों की उन्हें खान आरजू की बेटी से इश्क हो गया और उन्हें चाँद में भी अपनी महबूबा नज़र आने लगी. किसी फखरुद्दीन नाम के भले मानुष ने हकीमों की मदद से उनका इलाज किया. कुछ और भले लोगों के सहारा मिलने पर वे मुशायरों में जाने लगे और शायरी में शुरूआती तौर पर अच्छी तरक्की कर ली. खान आरजू से उनके रिश्ते बिगड़ चुके थे और उनके घर से अलग हो कर एक दिन वे किसी रियायत खान के यहाँ नौकरी करने लगे. फ़िर वहां भी बिगड़ गई. इस तरह कुछ लोगों से बनाते बिगाड़ते वे किसी राजा नागर मल के दरबार में लग गए. फ़िर वे पहुँच गए सूरज मल जाट के दरबार में. पर हालात कुछ ऐसे बने कि वे फ़िर रजा नागर मल के यहाँ पहुँच गए. अब तक कई सहारे तो बदले पर इस बीच वे खासे मशहूर हो गए. दिल्ली के बादशाह आलमगीर II के पास भी रहे. पर लडाइयों और मारकाट ने उनके शायराना दिल को पस्त कर दिया.आख़िर मीर साहब को परिस्थितियों ने पहुँचा दिया लखनऊ, जहाँ अवध के नवाब आसफ उद्दौला ने जब उन्हें अपने यहाँ शरण दी तो उन्होंने एक प्रकार से जीवन भर की दिल्ली और दिल्ली से बाहर की भटकन के बाद निजात पाई.नवाब साहब के साथ घोडे पर सवार मीर तकी 'मीर' शिकार पर बहराइच गए तो 'शिकार-नामा लिखा. फ़िर वे नवाब के साथ हिमालय के तलहटियों में गए तो एक और 'शिकार-नामा' लिखा. यहीं से वे शायरी के शिखर तक पहुँच कर चौतरफ मशहूर भी हो गए. वैसे परिस्थितियों ने उन्हें इतने कड़वे अनुभव दिखाए के शख्सियत के तौर पर मीर साहब बेहद बदमिजाज व्यक्ति माने जाते थे जो कई बार उनका अपमान करते भी देर न करते थे जो उन्हें सहारा देते थे. उनका गुरूर अक्सर बर्दाश्त से बाहर हो जाता था. मीर ख़ुद अपनी कलम से लिखते हैं:

सीना तमाम चाक है सारा जिगर है दाग
है मजलिसों में नाम मेरा 'मीरे' बेदिमाग.

उर्दू के इस अज़ीम शायर का इंतिक़ाल सन 1810 में लखनऊ में हुआ। आज हम यहाँ उनकी दो ग़ज़लें पेश कर रहे हैं।

मुँह तका ही करे है जिस-तिस का
हैरती है ये आईना किस का

शाम से कुछ बुझा सा रहता है
दिल हुआ है चराग़ मुफ़लिस का

फ़ैज़ अय अब्र चश्म-ए-तर से उठा
आज दामन वसीअ है इसका

ताब किसको जो हाल-ए-मीर सुने
हाल ही और कुछ है मजलिस का

कठिन शब्दों के अर्थ
हैरती---चकित, ताज्जुब में, मुफ़लिस---ग़रीब आदमी
फ़ैज़----लाभ, फ़ायदा, चश्म-ए-तर ---आंसू बहाती हुई आँख
अब्र---बादल, वसीअ-----फैला हुआ, विशाल
ताब--- ताक़त, फ़ुरसत, मजलिस---- महफ़िल, सभा

राहे-दूरे-इश्क़ से रोता है क्या
आगे-आगे देखिए होता है क्या

सब्ज़ होती ही नहीं ये सरज़मीं
तुख़्मे-ख़्वाहिश दिल में तू बोता है क्या

क़ाफ़िले में सुबह के इक शोर है
यानी ग़ाफ़िल हम चले सोता है क्या

ग़ैरते-युसुफ़ है ये वक़्ते-अज़ीज़
मीर इसको रायगाँ खोता है क्या

कठिन श्ब्दों के अर्थ
राहे-दूरे-इश्क़----- इश्क़ के लम्बे रास्ते
सब्ज़-----हरी, सरज़मीं-----धरती
तुख़्मे-ख़्वाहिश -----इच्छाओं के बीज
वक़्ते-अज़ीज़------बहूमूल्य समय
रायगाँ------फ़िज़ूल--बेकार---व्यर्थ

Ghazal - Hasti Apni Hubab ki si...
Artist - Shishir Parkhie
Album - Ahetaram

तस्कीं को हम न रोएँ जो ज़ौक़-ए-नज़र मिले...मिर्जा ग़ालिब / शिशिर पारखी

एहतराम - अजीम शायरों को सलाम ( अंक -06 )

आज शिशिर परखी साहब एहतराम कर रहे है उस्तादों के उस्ताद शायर मिर्जा ग़ालिब का, पेश है ग़ालिब का कलाम शिशिर जी की जादूभरी आवाज़ में -

तस्कीं को हम न रोएँ जो ज़ौक़-ए-नज़र मिले
हूराँ-ए-ख़ुल्द में तेरी सूरत मगर मिले

अपनी गली में मुझ को न कर दफ़्न बाद-ए-क़त्ल
मेरे पते से ख़ल्क़ को क्यों तेरा घर मिले

साक़ी गरी की शर्म करो आज वर्ना हम
हर शब पिया ही करते हैं मेय जिस क़दर मिले

तुम को भी हम दिखाये के मजनूँ ने क्या किया
फ़ुर्सत कशाकश-ए-ग़म-ए-पिन्हाँ से गर मिले

लाज़िम नहीं के ख़िज्र की हम पैरवी करें
माना के एक बुज़ुर्ग हमें हम सफ़र मिले

आए साकनान-ए-कुचा-ए-दिलदार देखना
तुम को कहीं जो ग़लिब-ए-आशुफ़्ता सर मिले

तस्कीं : Consolation, ज़ौक़ _ Taste, हूराँ - Fairy, ख़ुल्द - Paradise
ख़ल्क़ - People, पिन्हाँ - Secret, साकनान - Inhabitants, Steady
कुचा - Narrow lane, आशुफ़्ता सर - Uneasy, Restless.



सदी के सबसे महान शायर का एक संक्षिप्त परिचय -

पूछते हैं वो कि ‘ग़ालिब’ कौन है,
कोई बतलाओ कि हम बतलाएं क्या

मिर्जा असद्दुल्लाह खान जिन्हें सारी दुनिया मिर्जा 'ग़ालिब' के नाम से जानती है का जन्म आगरा में 27 दिसम्बर 1797 को आगरा में हुआ. उनके दादा मिर्जा कोकब खान समरकंद से हिन्दुस्तान आए और लाहौर में मुइनउल मुल्क के यहाँ नौकर लग गए. उनके बड़े बेटे अब्दुल्लाह बेग से मिर्जा गालिब हुए. अब्दुल्लाह बेग नवाब आसिफ उद्दौला की फौज में शामिल हुए और फ़िर हैदराबाद से होते हुए अलवर के राजा बख्तावर सिंह के यहाँ लग गए. पर जब मिर्जा गालिब महज़ 5 वर्ष के थे तब एक लड़ाई में शहीद हो गए. मिर्जा गालिब को तब उनके चचा जान नस्रउल्लाह बेग खान ने संभाला पर गालिब के बचपन में अभी और दुःख शामिल होने थे. जब वे 9 साल के थे तब चचा जान भी चल बसे. जब मिर्जा 13 वर्ष के थे तब उनका निकाह हुआ, सात बच्चे भी हुए पर अफ़सोस की एक के बाद एक उन पर बिजली गिरती चली गई. सातों बच्चे जाते रहे. मिर्जा की निजी जिंदगी सचमुच दर्द की एक लम्बी दास्ताँ थी. तभी तो लिखा उन्होंने -

दिल ही तो है न संगो-खिश्त, दर्द से भर न आए क्यों,
रोयेंगे हम हज़ार बार, कोई हमें सताए क्यों.


मिर्जा ने दिल्ली में 'असद' नाम से शायरी शुरू की. ‘ग़ालिब’ से पहले उर्दू शायरी में भाव-भावनाएं तो थीं, भाषा तथा शैली के ‘चमत्कार ‘गुलो-बुलबुल’, ‘जुल्फ़ो-कमर’ (माशूक़ के केश और कमर) ‘मीना-ओ-जाम’ (शराब की सुराही और प्याला) के वर्णन तक सीमित थे। बहुत हुआ तो किसी ने तसव्वुफ़ (सूफ़ीवाद) का सहारा लेकर संसार की असारता एवं नश्वरता पर दो-चार आँसू बहा दिए और निराशावाद के बिल में दुबक गया। इसे समय में ‘ग़ालिब’ ने

दाम हर मौज में है हल्क़ा-ए-सदकामे-नहंग।
देखें क्या गुज़रे है क़तरे पे गुहर होने तक ?

और
है परे सरहदे-इदराक से अपना मसजूद।
क़िबला को अहले-नज़र क़िबलानुमा कहते हैं।।

की बुलंदी से ग़ज़लगो शायरों को, और :

बक़द्रे-शौक़ नहीं ज़र्फे-तंगनाए ग़ज़ल।
कुछ और चाहिए वुसअ़त मेरे बयां के लिए।।

की बुलंदी से नाजुकमिज़ाज ग़ज़ल को ललकारा तो नींद के मातों और माशूक़ की कमर की तलाश करने वालों ने चौंककर इस उद्दण्ड नवागान्तुक की ओर देखा। कौन है यह ? यह किस संसार की बातें करता है ? फब्तियां कसी गईं। मुशायरों में मज़ाक उड़ाया गया। किसी ने उन्हें मुश्किल-पसंद (जटिल भाषा लिखने वाला) कहा, तो किसी ने मोह-मल-गो (अर्थहीन शे’र कहने वाला) और किसी ने तो सिरे से सौदाई ही कह डाला। लेकिन, जैसा कि होना चाहिए था, ‘ग़ालिब’ इन समस्त विरोधों और निन्दाओं को सहन करते रहे-हंस-हंसकर.

हैं और भी दुनिया में सुख़नवर बहुत अच्छे।
कहते हैं कि ग़ालिब का है अंदाज़े-बयां और।।

उनकी पुश्तैनी जागीरें ज़ब्त कर ली गई थी. वे पेंशन पाने के लिए सरकारी दरवाजों पर भटकने लगे. उनकी खोई हुई जागीर के बदले उनके और रिश्तेदारों के लिए दस हज़ार रुपये सालाना जागीर तय हुई पर असल में मिली सिर्फ़ तीन हज़ार, जिस में से उनका हिस्सा सात सौ रूपए सालाना था. उन्होंने शिकायत की तो रेसिडेंट बहादुर बर्खास्त हुए पर रकम में कुछ इजाफा न हुआ. दिल्ली के बादशाह ने पचास रूपए महीना वजीफा बाँधा पर इस फैसले के दो साल बाद उस के उत्तराधिकारी चल बसे. अवध के नवाब वाजिद अली शाह ने पाँच सौ रूपए सालाना मुक़र्रर किए पर दो साल बाद वह भी नहीं रहा.

क़र्ज की पीते थे मैं और समझते थे कि हाँ।
रंग लायेगी हमारी फ़ाक़ामस्ती एक दिन।।

पर अमल करते हुए चालीस-पचास हज़ार के ऋणी हो गए; और एक दीवानी मुक़दमे के सिलसिले में जब उनके विरुद्ध 5000 रुपये की डिगरी हो गई, तो उनका घर से बाहर कदम रखना असम्भव हो गया। (उन दिनों यह नियम था कि यदि ऋणी कोई सम्मानित व्यक्ति हो तो डिगरी की रक़म अदा न करने की हालत में उसे केवल उस समय गिरफ़्तार किया जा सकता था जब वह अपने घर की चारदीवारी से बाहर हो।) यह इन्हीं और भावी विपत्तियों की ही देन थी कि उनके क़लम से :

रंज से ख़ूगर * हुआ इन्सां तो मिट जाता है रंज।
मुश्किलें मुझ पर पड़ीं इतनी कि आसां हो गईं।।

* ख़ूगर- अभ्यस्त

गालिब ने 1857 का ग़दर भी आंखों से देखा और हर किस्म की राजनैतिक हलचल भी. शायरों में पूरी दुनिया में शायद उनका कोई सानी नहीं. गालिब फारसी बोली के विद्वान् थे इसलिए ज़्यादा से ज़्यादा फारसी में लिखा. बहुत नगण्य सा उर्दू में लिखा जो आज उर्दू शायरी की एक अनमोल विरासत है. गालिब की कुछ लोकप्रिय ग़ज़लों का आनंद लें -

बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया है मेरे आगे
होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मेरे आगे।

होता है निहाँ गर्द में सहरा मेरे होते
घिसता है जबीं ख़ाक पे दरिया मेरे आगे।

मत पूछ कि क्या हाल है मेरा तेरे पीछे
तू देख कि क्या रंग है तेरा मेरे आगे।

ईमान मुझे रोके है जो खींचे है मुझे कुफ़्र
काबा मेरे पीछे है कलीसा मेरे आगे।

गो हाथ को जुम्बिश नहीं आँखों में तो दम है
रहने दो अभी सागर-ओ-मीना मेरे आगे।

बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल = Children’s Playground
शब-ओ-रोज़ = Night and Day
निहाँ = निहान = Hidden, Buried, Latent
जबीं = जबीन = Brow, Forehead
कुफ़्र = Infidelity, Profanity, Impiety
कलीसा = Church
जुम्बिश = Movement, Vibration
सागर = Wine Goblet, Ocean, Wine-Glass, Wine-Cup
मीना = Wine Decanter, कंटेनर

( २ )

दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है?

हमको उनसे वफ़ा की है उम्मीद
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है।

हम हैं मुश्ताक़ और वो बेज़ार
या इलाही ये माजरा क्या है।

जब कि तुझ बिन नहीं कोई मौजूद
फिर ये हंगामा ऐ ख़ुदा क्या है।

जान तुम पर निसार करता हूँ
मैंने नहीं जानता दुआ क्या है।

मुश्ताक़ = Eager, Ardent
बेज़ार = Angry, Disgusted

( ३ )

हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है?
तुम ही कहो कि ये अंदाज़-ए-ग़ुफ़्तगू क्या है?

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ायल
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है?

चिपक रहा है बदन पर लहू से पैराहन
हमारी जेब को अब हाजत-ए-रफ़ू क्या है?

जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा,
कुरेदते हो जो अब राख जुस्तजू क्या है?

रही ना ताक़त-ए-गुफ़्तार और हो भी
तो किस उम्मीद पे कहिए कि आरज़ू क्या है?

ग़ुफ़्तगू = Conversation
अंदाज़-ए-ग़ुफ़्तगू = Style of Conversation
पैराहन = Shirt, Robe, Clothe
हाजत-ए-रफ़ू = Need of mending (हाजत = Need)
गुफ़्तार = Conversation
ताक़त-ए-गुफ़्तार = Strength for Conversation


और रचनाएँ आप यहाँ पढ़ सकते हैं

सन 1879 में गालिब का इंतकाल हुआ और उनकी मजार दिल्ली में हज़रात निजामुद्दीन औलिया की दरगाह के पास है.

हाज़िर जवाब ग़ालिब साहब कुछ रोचक किस्से -

पुल्लिंग या स्त्रीलिंग
शब्दों को लेकर मिर्ज़ा ग़ालिब के कई लतीफ़ा प्रसिद्ध हैं । उनमें से एक प्रस्तुत है । दिल्ली में ‘रथ’ को कुछ लोग स्त्रीलिंग और कुछ लोग पुल्लिंग मानते थे । किसी ने मिर्ज़ा से एक बार पूछा कि “हज़रत रथ मोअन्नस (स्त्रीलिंग) है या मुज़क्कर (पुल्लिंग) है?” मिर्ज़ा तपाक से बोले- “भैया, जब रथ में औरतें बैठी हो तो उसे मोअन्नस कहो और जब मर्द बैठे हों तो मुज़क्कर समझो ।”

आधा मुसलमान हूँ
अपनी हाज़िरजवाबी और विनोदवृत्ति के कारण मिर्ज़ा जहाँ कई बार कठिनाईयों में फँस जाते थे वहीं कई बार बड़ी-बड़ी मुसीबतों से बच निकलते थे ।ग़दर के दिनों की बात है । उन दिनों का माहौल ऐसा था कि अँगरेज़ सभी मुसलमानों को शक की नज़र से देखते थे । दिल्ली लगभग मुसलमानों से खाली हो गयी थी । पर ग़ालिब थे कि वहीँ चुपचाप अपने घर में पड़े रहे । आखिर एक दिन कुछ गोरे सिपाही उन्हें भी पकड़कर कर्नल ब्राउन के पास ले गये । जब ग़ालिब को कर्नल के सम्मुख उपस्थित किया गया मिर्ज़ा के सिर पर ऊँची टोपी थी । वेशभूषा भी अजब थी । कर्नल ने मिर्ज़ा की यह सजधज देखी तो पूछा- “वेल टुम मुसलमान ?”
मिर्ज़ा ने कहा- “आधा ।”
कर्नल से पूछा- “इसका क्या मटलब है ?”
मिर्ज़ा बोले- “मतलब साफ है, शराब पीता हूँ, सुअर नहीं खाता ।“
कर्नल सुनकर हँसने लगा और हँसते-हँसते मिर्ज़ा को घर लौटने की इजाजत दे दी ।

तुम सौदाई हो
बात एक गोष्ठी की है । मिर्ज़ा ग़ालिब मशहूर शायर मीर तक़ी मीर की तारीफ़ में कसीदे गढ़ रहे थे । शेख इब्राहीम ‘जौक’ भी वहीं मौज़ूद थे । ज़ौक की मिर्ज़ा से कुछ ठस रहती थी । ग़ालिब जो भी कहते वे उसे काटने की फ़िराक में रहते थे । अक्सर दोनों में छेड़छाड़ चलती रहती थी । ग़ालिब द्वारा मीर की तारीफ़ सुनकर वे बैचेन हो उठे । उन्होंने सौदा नामक शायर को श्रेष्ठ बताने लगे । मिर्ज़ा ने झट से चोट की- “ मैं तो तुमको मीरी* समझता था मगर अब जाकर मालूम हुआ कि आप तो सौदाई* हैं ।”

* मीरी और सौदाई दोनों में श्लेष है । मीरी का मायने मीर का समर्थक होता है और नेता या आगे चलने वाला भी । इसी तरह सौदाई का पहला अर्थ है सौदा या अनुयायी, दूसरा है- पागल ।

ख़ुदा या आप
बात उन दिनों की है जब रामपुर के नवाब यूसुफ़ अली खाँ का इंतकाल हो चुका था और नये नवाब क़लब अली खाँ गद्दी पर बैठ चुके थे । मियां मिर्ज़ा मातमपुर्सी और नये नवाब के प्रति आदर प्रकट करने के लिए रामपुर जा पहुँचे । उस दिन कलब अली लेफ्टिनेंट गवर्नर से मिलने बरेली जा रहे थे । रवानगी के वक़्त, परंपरा का ख़याल करते हुए मिर्ज़ा से उन्होंने कहा- “ख़ुदा के सुपुर्द ।”
मिर्ज़ा झट बोल उठे- “हजरत ! ख़ुदा ने तो मुझे आपके सुपुर्द किया है । आप फिर उलटा मुझको ख़ुदा के सुपुर्द करते हैं ” सारे लोग हँस पड़े ।

बीबी पास
एक बार गालिब के घर कोई उनका प्रशंसक मिलने आया. गालिब साहब अपने शयन कक्ष में सपत्नीक बैठे थे. आगंतुक ने बैठक में बैठे नौकर को अपना 'विजिटिंग-कार्ड' दिया कि गालिब साहब से गुजारिश कीजिये की यह शख्स आपसे मिलने चाहता है. पर फ़िर उस व्यक्ति ने अपना 'विजिटिंग कार्ड' ले कर उस में फाउंटेन पेन से अपने नाम के आगे बी.ए. जोड़ दिया, क्यों कि उस ने कार्ड छपवाने के बाद बी.ए. पास किया था. नौकर आगंतुक का आग्रह देख कर किसी प्रकार गालिब से इजाज़त ले कर अन्दर गया और 'विजिटिंग-कार्ड' दिखाया. थोडी देर बाद नौकर बाहर आया और आगंतुक को उनका कार्ड वापस दे दिया. कार्ड के पीछे गालिब ने एक शेर लिख दिया था:

शेख जी घर से न निकले और यह कहला दिया
आप बी ए पास हैं तो मैं भी बीबी पास हूँ

आलेख प्रस्तुतीकरण सहयोग - प्रेमचंद सहजवाला

Tuesday, October 14, 2008

अदा की आड़ में खंजर.... सुनिये उस्ताद शायर अमीर मिनाई की ग़ज़ल - शिशिर पारखी

एहतराम - अजीम शायरों को सलाम ( अंक ०४ )

शिशिर परखी के स्वरों में जारी है सफर एहतराम का, आज के उस्ताद शायर हैं अमीर मीनाई.
निदा फाजिल साहब के शब्दों में अगर ग़ज़ल को समझें तो -
"गजल केवल एक काव्य विधा नहीं है, यह उस संस्कृति या कल्चर को परिभाषित करती है जो गतिशील है और जो पल-पल बदलता रहता है।विश्व-साहित्य में यह एकमात्र अकेली विधा है जो महात्मा बुद्घ की मूर्ति की तरह जहाँ भी आती है अपने रूप-रंग, नैन-नक्श से वहीं की बन जाती है। "

ग़ज़ल की इससे बेहतर परिभाषा क्या होगी.



हजरत अमीर मीनाई (1828 –1901) लखनऊ में जन्में और रामपुर के सूफी संत अमीर शाह के शिष्य बने. अगर मीर और ग़ालिब ज़िंदगी पर एतबार के शायर थे तो दाग़ और अमीर बाज़ार के कारोबारी थे...उनके शेर हम आमो-खास की जुबां पर चढ़ जाते थे. देखिये ये बानगी -

सुनी एक भी बात तुमने न मेरी
सुनी हमने सारे ज़माने की बातें

अंगूर में थी ये शै पानी की चार बूँदें
जिस दिन से खिंच गई है तलवार हो गई है

और

खंजर चले किसी पे तड़पते हैं हम अमीर
सारे जहाँ का दर्द हमारे जिगर में है

या फ़िर ये -

किसी अमीर की महफ़िल का ज़िक्र क्या है अमीर
खुदा के घर भी न जाऊँगा बिन बुलाए हुए

पेश है ऐसे ही तेवर लिए हुए हजरत अमीर कि ये दिलकश ग़ज़ल, शिशिर जी ने एक बार यहाँ फ़िर वैसा ही रंग जमाया है,



इस गुरूवार को हम लेकर हाज़िर होंगे शिशिर पारखी जी एक एक्सक्लूसिव इंटरव्यू आवाज़ पर. तब तक एहतराम का सफर हम जारी रखेंगे.

Ghazal - Ada kii aad men...
Artist - Shishir Parkhie
Album - Ahetram

Monday, October 13, 2008

शिशिर पारखी की आवाज़ में मिर्जा दाग़ दहलवी की ग़ज़ल

एहतराम - अज़ीम शायरों का सलाम

"एहतराम - अजीम शायरों को सलाम" की अगली कड़ी के रूप में आईये सुनें शिशिर पारखी की बेमिसाल आवाज़ में उस्ताद शायर मिर्जा दाग़ दहलवी की ये ग़ज़ल -




आज एक उस्ताद शायर हैं मिर्जा दाग़ दहलवी - एक संक्षिप्त परिचय

मिर्ज़ा ‘दाग़’ को अपने जीवनकाल में जो ख्याति, प्रतिष्ठा और शानो-शौकत प्राप्त हुई, वह किसी बड़े-से-बड़े शाइर को अपनी ज़िन्दगी में मयस्सर न हुई। स्वयं उनके उस्ताद शैख़, ‘ज़ौक़’ शाही क़फ़स में पड़े हुए ‘तूतिये-हिन्द’ कहलाते रहे, मगर 100 रू० माहवारी से ज़्यादा का आबो-दाना कभी नहीं पा सके। ख़ुदा-ए-सुख़न ‘मीर’ ‘अमर-शाइर’ ‘गा़लिब’ और ‘आतिश’-जैसे आग्नेय शाइरों को अर्थ-चिन्ता जीवनभर घुनके कीड़े की तरह खाती रही। हकीम ‘मोमिन शैख़’ ‘नासिख़’ अलबत्ता अर्थाभाव से किसी क़द्र निश्चन्त रहे, मगर ‘दाग़’ जैसी फ़राग़त उन्हें भी कहाँ नसीब हुई
यूँ अपने ज़माने में एक-से-एक बढ़कर उस्ताद एवं ख्याति-प्राप्त शाइर हुए, मगर जो ख्याति और शुहरत अपनी ज़िन्दगीमें ‘दाग़’ को मिली, वह औरों को मयस्सर नहीं हुई। भले ही आज उनकी शाइरी का ज़माना लद गया है और मीर, दर्द, आतिश, ग़लिब, मोमिन, ज़ौक़, आज भी पूरे आबो-ताबके साथ चमक रहे हैं। लेकिन अपने ही जीवनकाल में उन्हें ‘दाग़’-जैसी ख्याति प्राप्त नहीं हो सकी।

जनसाधराण के वे महबूब शायर थे। उनके सामने मुशाअरो में किसी का भी रंग नहीं जमने पाता था। हजरत ‘नूह’ नारवी लिखते हैं कि -‘‘मुझसे रामपुर के एक सिन-रसीदा (वयोवृद्ध) साहब ने जिक्र किया कि नवाब कल्बअली खाँ साहब का मामूल था कि मुशाअरे के वक़्त कुछ लोगों को मुशाअरे के बाहर महज़ इस ख्याल बैठा देते थे कि बाद में ख़त्म मुशाअरा लोग किसका शेर पढ़ते हुए मुशाइरे से बाहर निकलते हैं। चुनाव हमेशा यही होता था कि ‘दाग़’ साहब का शेर पढ़ते हुए लोग अपने-अपने घरों को जाते थे।

‘‘एक बार मुंशी ‘मुनीर’ शिकोहाबादीने सरे-दरबार हजरत ‘दाग़’ का दामन थामकर कहा कि-‘क्या तुम्हारे शेर लोगों की ज़वानों पर रह जाते हैं और मेरे शेरों पर लोंगों की न ख़ास तवज्जह होती है, न कोई याद रखता है।’ इसपर जनाब ‘अमीर मीनाई’ ने फ़र्माया- ‘‘यह खुदादाद मक़बूलियत है, इसपर किसी का बस नहीं।’’

यह मशूहूर है कि दाग़ की ग़ज़ल के बाद मुशआर के किसी शाइर का शेर विर्दे-जबा़न न होता था। ‘असीर’ (अमीर मीनाई के उस्ताद) का मक़ूला है कि वह कलाम पसन्दीदा है, जो मुशाअरे से बाहर जाये। फ़र्माते थे कि मैंने बाहर जाने वालों में अक्सर मिर्जा ‘दाग़’ का शेर बाहर निकलते देखा है।

हज़रत मुहम्मदअली खाँ ‘असर’ रामपुरी लिखते हैं-‘‘जब ‘दाग़’ मुशाअरे में अपनी ग़ज़ल सुनाते थे, तो रामपुर के पठान उन्हें सैकड़ों गालियाँ देते थे। दारियाफ़्त किया गया कि गालियों का क्या मौका था। पता चला कि कलाम की तासीर (असर) और हुस्ने-कुबून (पसन्दीदगी) का यह आलम था कि पठान बेसाख्ता चीख़ें मार-मार कर कहते थे कि-‘उफ़ ज़ालिम मार डाला।’ ओफ़्फोह ! गला हलाल कर दिया। उफ़-उफ़ सितम कर दिया, ग़ज़ब ढा दिया।

एक दिन नवाब खुल्द-आशियाँने नवाब अब्दुलखाँ से पूछा कि ‘दाग़’ के मुतअल्लिक़ तुम्हारी क्या राय है। जवाब दिया कि -‘‘तीतड़े में गुलाब भरा हुआ है।’’ मक्सद यह है कि सूरत तो काली है, लेकिन बातिन (अंतरंग) गुलहार-मआनीकी खुशबुओ (कविता-कुसुम की सुगन्धों) से महक रहा है।



जब उनकी ग़ज़ले थिरकती थीं। यहाँ तक कि उनकी ख्यातिसे प्रभवित होकर उनके कितने समकालीन शाइर अपना रंग छोड़कर रंगे-दाग़ में ग़ज़ल कहने लगे थे। दाग़ की ख्याति और लोक-प्रियता का यह आलम था कि उनकी शिष्य मण्डली में सम्मलित होना बहुत बड़ा सौभाग्य एवं गौरव समझा जाता था। हैदराबाद-जैसे सुदूर प्रान्त में ‘दाग़’ के समीप जो शाइर नहीं रह सकते थे, वे लगभग शिष्य संशोधनार्थ ग़ज़लें भेजते थे। ‘दाग़’ का शिष्य कहलाना ही उन दिनों शाइर होने का बहुत बड़ा प्रमाणपत्र समझा जाता था और उन दिनों क्यों, आज भी ऐसे शाइर मौजूद हैं, जिन्हें ब-मुश्किल एक-दो ग़ज़लों पर इस्लाह लेना नशीब होगा, फिर भी बड़े फ़ख़्र के साथ अपनेको मिर्जा ‘दाग़’ का शिष्य कहते हैं।

मिर्जा दाग़ के जन्नत-नशीं होने के बाद एक दर्जन से अधिक शिष्य अपने को ‘जा-नशीने-दाग़’ (गुरु का उत्तराधिकारी शिष्य) लिखने लगे। हालाँकि शाइरीमें उत्तराधिकारी स्वरूप कुछ भी प्राप्त नहीं होता। शाइरी तो उस स्रोत के समान है, जो पृथ्वी से स्वयं फूट निकलता है। यह अन्य पेशे की तरह वंश परम्परागत नहीं चलता। यह ज़रूरी नहीं कि शाइर की संतान भी शाइर हो।

मीर, ग़ालिब, मोमिन, ज़ौक़, आतिश, मुस्हफ़ी के पिता शाइर नहीं थे। उनकी सन्तान भी शाइरों में कोई उल्लेख योग्य नहीं। शाइर अपने कलाम से ही ख्याति पाता है। यह समझते हुए भी कई शाइर ‘जानशीने-दाग़’ कहलाने का मोह नहीं त्याग सके।

नवाब ‘साइल’ मिर्जा ‘दाग़’ के दामाद भी थे और शिष्य भी। अतः बहुत बड़ी संख्या उन्हीं को ‘जानशीने-दाग़’ समझती थी। ‘बेखुद’ देहलवी, ‘बेखुद’ बेख़ुद’ बदायूनी, ‘आगा’ शाइर क़िज़िलबाश, ‘अहसन’ मारहरवी’, ‘नूह’ नारवी, भी अपने को ‘जानशीने-दाग़’ लिखने में बहुत अधिक गर्व का अनुभव करते हैं; और किसी कि मजाल नहीं जो उन्हें इस गौरवास्पद शब्द से वंचित कर सके। वास्तविक उत्ताधिकारी कौन है, इस प्रश्न को सुलझाने के लिए वर्षों वाद-विवाद चले है। बीसवीं शताब्दी-का वह प्रारम्भिक युग ही ऐसा था कि दाग़के नाम पर हर शाइर अपने-को उस्ताद घोषित कर सकता था। जैसे कि आज गान्धीके नाम पर हर कांग्रेसी अपने को पुजवा सकता है और उल्टी-सीधी हर बात गान्धी के नाम पर जनता के गले के नीचे उतार सकता है।

यद्यपि ‘दाग़’ के जीवनकाल में ही उनकी शाइरी पर आक्षेप होने लगे थे। उनकी शाइरी को निम्नस्तर की, शोख़, बाज़ारू,-शाइरी समझा जाने लगा था। फिर भी ‘दाग़’ के परिस्तार एवं प्रशंसक बहुत अधिक संख्या में थे। समस्त भारतमें उनके कलामकी धूम एवं चाहत थी।

दाग़ जन्न्त-नशीं हुए तो ऊर्दू-संसारमें सफें-मातम बिछ गई। औरों–का तो ज़िक्र ही क्या, सर ‘इकबाल’ –जैसा गम्भीर शाइर अपने उस्ताद की मौत पर टस-टस रो पड़ा।

सुनिए इब्राहीम ज़ौक का कलाम और शिशिर पारखी की आवाज़

एहतराम - अज़ीम शायरों को सलाम ( अंक - ०२ )

आवाज़ मशहूर ग़ज़ल गायक शिशिर पारखी के साथ मिल कर संगीतमय स्मरण कर रहा है उस्ताद शायरों का, जिन्होंने ग़ज़ल लेखन को बुलंदियां से नवाजा. हम थे ग़ज़ल के सुनहरे दौर में जहाँ एक शाहंशाह जो ख़ुद भी शायर था और जिसके दरबार में हर शाम ग़ज़लों की महफिलें आबाद होती थी. मोमिन खान मोमिन के बाद आईये ज़िक्र करें इब्राहीम ज़ौक का. पहले सुन लेते हैं इस दरबारी शायर का ये कलाम, शिशिर परखी की मखमली आवाज़ में -



मोहम्मद इब्राहीम ज़ौक - एक परिचय

‘ज़ौक़’ 1204 हि. तदनुसार 1789 ई. में दिल्ली के एक ग़रीब सिपाही शेख़ मुहम्मद रमज़ान के घर पैदा हुए थे। शेख़ रमज़ान नवाब लुत्फअली खां के नौकर थे और काबुली दरवाज़े के पास रहते थे। शैख़ इब्राहीम इनके इकलौते बेटे थे। बचपन में मुहल्ले के एक अध्यापक हाफ़िज़ गुलाम रसूल के पास पढ़ने के लिए जाते। हाफ़िज़ जी शायर भी थे और मदरसे में भी ‘शे’रो-शायरी का चर्चा होता रहता था, इसी से मियां इब्राहीम की तबीयत भी इधर झुकी। इनके एक सहपाठी मीर काज़िम हुसैन ‘बेक़रार’ भी शायरी करते थे और हाफ़िज जी से इस्लाह लेते थे। मियां इब्राहीम की उनसे दोस्ती थी। एक रोज़ उन्होंने एक ग़ज़ल सुनायी जो मियां इब्राहीम को पसंद आयी। पूछने पर काज़िम हुसैन ने बताया कि हम तो शाह नसीर (उस ज़माने के एक मशहूर शायर) के शागिर्द हो गये हैं और ग़ज़ल उन्हीं की संशोधित की हुई है। चुनांचे इब्राहीम साहब को भी शौक़ पैदा हुआ कि उनके साथ जाकर शाह नसीर के शिष्य हो गए।

लेकिन शाह नसीर ने इनके साथ वैसा सुलूक न किया जैसा बुजुर्ग उस्ताद को करना चाहिए था। मियां इब्राहीम में काव्य-रचना की प्रतिभा प्रकृति-प्रदत्त थी और शीघ्र ही मुशायरों में इनकी ग़जलों की तारीफ़ होने लगी। शाह नसीर को ख़याल हुआ कि शायद शागिर्द उस्ताद से भी आगे बढ़ जाय और उन्होंने न केवल इनकी ओर से बेरुख़ी बरती बल्कि इन्हें निरुत्साहित भी किया। इनकी ग़ज़लों में कभी बेपरवाही से इस्लाह दी और अक्सर बग़ैर इस्लाह के ही बेकार कहकर वापस फेरने लगे। इनके अस्वीकृत शे’रों के मज़मून भी शाह नसीर के पुत्र शाह वजीहुद्दीन ‘मुनीर’ की ग़ज़लों में आने लगे जिससे इन्हें ख़याल हुआ कि उस्ताद इनके विषयों पर शे’र कहकर अपने पुत्र को दे देते हैं। इससे कुछ यह खुद ही असंतुष्ट हुए, कुछ मित्रों ने उस्ताद के ख़िलाफ़ इन्हें उभारा। इसी दशा में एक दिन यह ‘सौदा’ की एक ग़ज़ल पर ग़ज़ल कहकर उस्ताद के पास लेकर गए। उन्होंने नाराज़ होकर ग़ज़ल फेंक दी और कहा ‘‘अब तू मिर्ज़ा रफ़ी सौदा से भी ऊंचा उड़ने लगा ?’’ यह हतोत्साह होकर जामा मस्जिद में आ बैठे। वहां एक बुजुर्ग मीर कल्लू ‘हक़ीर’ के प्रोत्साहन से ग़ज़ल मुशायरे में पढ़ी और खूब वाहवाही लूटी। उस दिन से ‘ज़ौक़’ ने शाह नसीर की शागिर्दी छोड़ दी।

उस्ताद से आज़ाद हो गये तो ख़याल हुआ कि शहर में होने वाली नामवरी को आगे बढ़ाकर शाही किले पहुँचाया जाय। उन दिनों अकबर शाह द्वितीय बादशाह थे। उन्हें कविता से कुछ लगाव न था लेकिन युवराज मिर्ज़ा अबू ज़फ़र (जो बाद में बहादुरशाह द्वितीय के नाम से बादशाह हुए) स्वयं कवि थे और क़िले में अक्सर काव्य-गोष्ठियां कराया करते थे जिनमें उस समय के पुराने-पुराने शायर आते थे। लेकिन मियां इब्राहीम एक ग़रीब सिपाही के बेटे, किसी रईस की ज़मानत के बग़ैर क़िले में कैसे जाने पायें। काफ़ी कोशिश के बाद मीर काज़िम हुसैन की मध्यस्थता से क़िले के मुशायरों में शरीक होने लगे। काज़िम साहब खुद भी उस ज़माने के अच्छे शायरों में समझे जाने लगे थे। उन दिनों शाह नसीर युवराज के कविता-गुरु थे। कुछ दिनों बाद वे दीवान चन्दूलाल के बुलावे पर हैदराबाद चले गए क्योंकि आर्थिक दृष्टि से वह दरबार दिल्ली से कहीं लाभदायक था। उनके बाद मीर काज़िम हुसैन युवराज को इस्लाह देने लगे लेकिन कुछ दिनों बाद वे भी मि. जॉन ऐलफ़िन्सटन के मीर-मुंशी होकर पश्चिम की ओर चले गये। ऐसे ही में एक दिन संयोगवश युवराज ने ‘ज़ौक़’ को (जो अभी बिल्कुल लड़के ही थे) अपनी ग़ज़ल दिखायी। इस्लाह उन्हें इतनी पसंद आयी कि उन्होंने इन्हें अपना कविता गुरु बना लिया और तनख़्वाह भी चार रुपया महीना मुक़र्रर कर दी। इस अल्प वेतन का भी दिलचस्प इतिहास है। बादशाह अकबर शाह अपनी एक बेग़म मुमताज़ से खुश थे और उनके कहने से मिर्ज़ा ज़फ़र को युवराज-पद से अलग करना चाहते थे। अंगरेज़ी अदालत में इसका मुकद्दमा भी चल रहा था। युवराज को उनके नियत 5000 रुपये की बजाय 500 रुपया महीना ही मिलता था। इसी में सारे शाही ठाठ-बाट करने पड़ते थे। उनके मुख़्तारे-आ़म मिर्ज़ा मुग़ल बेग थे इन महानुभाव का काम यह था कि युवराज पर जिसकी कृपा होती थी उसका पत्ता काटने की फ़िक्र में लग जाते थे। चुनांचे इन की मेहरबानी से तनख़्वाह चार रुपये से शुरू हुई और फिर दो बार तरक़्क़ी हुई तो चार से पांच और पांच से सात हो गयी। ‘ज़ौक़’ अगर चाहते तो युवराज से कहकर इस ज़लील तनख़्वाह को क़ायदे की करा सकते थे, लेकिन उन्होंने इस बारे में कभी अपने मालिक से एक शब्द भी नहीं कहा।

‘ज़ौक़’ के पिता ने उन्हें बादशाह से बिगाड़ करने वाले युवराज की इतनी कम तनख़्वाह पर नौकरी करने से मना भी किया लेकिन इन्हें कुछ युवराज की तबियत इतनी भा गई थी कि किसी बात का ख़याल न किया और नौकरी करते रहे। इधर दिल्ली के एक पुराने रईस और मिर्ज़ा ग़ालिब के ससुर नवाब इलाही बख़्श खां ने इन्हें बुलवाया और यद्यपि वे स्वयं बहुत बूढ़े हो चुके थे तथापि इस अल्पायु कवि से अपनी कविताओं में संशोधन कराने लगे। ‘ज़ौक़’ अपने इन दोनों ‘शागिर्दों’ से उम्र और रुतबे में बहुत ही कम थे। साथ ही ख़ानदानी ग़रीबी ने पढ़ने भी ज़्यादा न दिया था। इसलिए यह अपनी उस्तादी क़ायम रखने के लिए खुद ही कविता का जी तोड़कर अभ्यास करने लगे और अपनी जन्मजात प्रतिभा के बल पर इस कला में शीघ्र ही निपुण हो गये। ख़ास तौर पर नवाब साहब की उस्तादी ने, जो हर रंग के शे’र कहते थे, इन्हें हर रंग का उस्ताद बना दिया।

इसी ज़माने में शाह नसीर हैदराबाद से लौटे। (शाह नसीर धनार्जन के लिए तीन बार हैदराबाद गये और फिर दिल्ली के आकर्षण ने उन्हें यहां ला खैंचा। लखनऊ भी दो बार जाकर लौट आये। अंत में चौथी बार की हैदराबाद यात्रा में उनका वहीं देहान्त हुआ।) दिल्ली आकर उन्होंने फिर अपने मुशायरे जारी कराये। अब ‘ज़ौक़’ इनमें शामिल हुए तो शागिर्द की नहीं, प्रतिद्वंद्वी की हैसियत से शामिल हुए। शाह नसीर ने एक ग़ज़ल लिखी थी जिसकी रदीफ़ थी ‘‘आबो-ख़ाको-बाद’’। उन दिनों मुश्किल रदीफ़ क़ाफ़ियों में पूरे मतलब के साथ और काव्य-परम्परा क़ायम रखते हुए ग़ज़लें कहना ही काव्य-कला का चरमोत्कर्ष समझा जाता था। शाह नसीर ने चुनौती दी कि इस रदीफ़ क़ाफ़िए में कोई ग़ज़ल कह दे तो उसे उस्ताद मान लूं। ‘ज़ौक़’ को तो शाह साहब को नीचा दिखाना था। उन्होंने इस ज़मीन में एक ग़ज़ल और तीन कसीदे कह दिये। शाह साहब ने मुशायरे ही में उस पर अपने शागिर्दों से एतराज करवाये और खुद भी किये लेकिन ‘ज़ौक़’ ने अपने तर्कों से सब को चुप कर दिया। अब ‘ज़ौक़’ की धाक उस्ताद की हैसियत से अच्छी तरह जम गयी। लेकिन इससे यह न समझना चाहिए कि ‘ज़ौक़’ की व्यक्तिगत रूप से भी शाह साहब से अनबन हो गयी थी। दोनों के मैत्री-संबंध अंत तक बने रहे। शाह नसीर की उर्स आदि की दावत में ‘ज़ौक़’ बराबर जाते थे। शाह नसीर अंतिम बार जब हैदराबाद गये तो ‘ज़ौक़’ ने बुढ़ापे के ख़याल से उन्हें वहां जाने से रोकना भी चाहा था।

लेकिन ‘ज़ौक़’ को अपनी कविता की धाक बिठाने से अधिक अपनी कमजोरियों को दूर करने की चिन्ता थी। (बड़प्पन इसी तरह मिलता है।) उन्हें अपने अध्ययन के अभाव की बराबर खटक रहा करती थी। संयोग से अवध के नवाब के मुख्तार राजा साहब राम ने अपने पुत्र को तत्कालीन विद्याओं-इतिहास, तर्कशास्त्र, गणित आदि-में पारंगत करना चाहा और इसके लिए ‘ज़ौक़’ के एक पुराने गुरु मौलवी अब्दुर्रज़ाक को नियुक्त किया। एक दिन ‘ज़ौक़’ भी मौलवी साहब के यहां चले गये। राजा साहब उनकी योग्यता से इतने प्रभावित हुए कि इनसे कहा कि तुम बराबर पढ़ने आया करो। यहां तक कि अगर किसी कारण ‘ज़ौक़’ किसी दिन न आते तो राजा साहब का आदमी उन्हें ढूँढ़ने के लिए भेजा जाता और अगर फिर भी वे न आते तो उस दिन की पढ़ाई स्थगित हो जाती। ‘ज़ौक़’ की क़िस्मत ही ज़ोरदार थी, वर्ना इतने निस्वार्थ सहायक कितनों को मिल पाते हैं।

लेकिन उनकी असली सहायक उनकी जन्मजात प्रतिभा और अध्ययनशीलता थी। कविता-अध्ययन का यह हाल कि पुराने उस्तादों के साढ़े तीन सौ दीवानों को पढ़कर उनका संक्षिप्त संस्करण किया। कविता की बात आने पर वह अपने हर तर्क की पुष्टि में तुरंत फ़ारसी के उस्तादों का कोई शे’र पढ़ देते थे। इतिहास में उनकी गहरी पैठ थी। तफ़सीर (कुरान की व्याख्या) में वे पारंगत थे, विशेषतः सूफी-दर्शन में उनका अध्ययन बहुत गहरा था। रमल और ज्योतिष में भी उन्हें अच्छा-खासा दख़ल था और उनकी भविष्यवाणियां अक्सर सही निकलती थीं। स्वप्न-फल बिल्कुल सही बताते थे। कुछ दिनों संगीत का भी अभ्यास किया था और कुछ तिब्ब (यूनानी चिकित्सा-शास्त्र) भी सीखी थी। धार्मिक तर्कशास्त्र (मंतक़) और गणित में भी वे पटु थे। उनके इस बहुमुखी अध्ययन का पता अक्सर उनके क़सीदों से चलता है जिनमें वे विभिन्न विद्याओं के पारिभाषिक शब्दों के इतने हवाले देते हैं कि कोई विद्वान ही उनका आनंद लेने में समर्थ हो सकता है। उर्दू कवियों में इस कोटि के विद्वान कम ही हुए हैं।

किन्तु उनकी पूरी प्रतिभा काव्य-क्षेत्र ही में दिखाई देती थी 19 वर्ष की अवस्था में उन्होंने बादशाह अकबर शाह के दरबार में एक क़सीदा सुनाया। इसमें फ़ारसी काव्य में वर्णित समस्त अलंकार तो थे ही, साथ ही विभिन्न विद्याओं की भी अच्छी जानकारी दर्शाई गई थी। इसके, अतिरिक्त इसमें एक ही ज़मीन में 18 विभिन्न भाषाओं में शे’र कहकर शामिल किये गए थे। इस क़सीदे का पहला शे’र यह है :

जब कि सरतानो-असद मेहर का ठहरा मसकन
आबो-ऐलोला हुए नश्वो-नुमाए-गुलशन

इस पर उन्हें ‘ख़ाक़ानी-ए-हिन्द’ का ख़िताब मिला। ख़ाकानी फ़ारसी भाषा का बहुत मशहूर क़सीदा कहने वाला शायर था। 19 वर्ष की अवस्था में यह ख़िताब पाना कमाल है।
36 वर्ष की अवस्था में समस्त पापों से तौबा की और इसकी तारीख़ कही:
ऐ ज़ौक़ बिगो सह बार तौबा।’’ यानी ‘‘ऐ ज़ौक़ तीन बार तौबा कह।

भगवान ने ‘ज़ौक़’ को बुद्धि और मृदु स्वभाव देने में जो दानशीलता दिखायी थी, शारीरिक व्यक्तित्व देने में उतनी ही बेपरवाही बरती। उनका क़द साधारण से कुछ कम ही था और रंगत सांवली। चेहरे पर चेचक के दाग़ बहुतायत से थे। खुद कहते थे कि मुझे नौ बार चेचक निकली थी किन्तु आंखें चमकती हुई थीं। चेहरे का नक़्शा खड़ा-खड़ा था। बदन में बहुत फुरती थी, बहुत तेज़ चलते थे। कपड़े अक्सर सफ़ेद पहनते थे, वह उन पर भले ही लगते थे। आवाज़ ऊंची और सुरीली थी। मुशायरे में ग़जल पढ़ते तो आवाज़ गूंजकर रह जाती थी। उनके पढ़ने का तर्ज़ भी बड़ा अच्छा था। हमेशा अपनी ग़ज़ल खुद ही पढ़ते थे, किसी और से कभी नहीं पढ़वाते थे।

उनकी स्मरण शक्ति बड़ी तीव्र थी। जितनी विद्याएं और उर्दू फ़ारसी की जितनी कविता-पुस्तकें उन्होंने पढ़ी थीं, उन्हें वे अपने मस्तिष्क में इस प्रकार सुरक्षित रखे हुए थे कि हवाला देने के लिए पुस्तकों की ज़रूरत नहीं पड़ती थी, अपनी स्मरण-शक्ति के बल पर हवाले देते चले जाते थे। सही बात तो यह है कि इतनी विद्याओं का सीखना भी अति तीक्ष्ण ग्रहण-शक्ति और स्मरण-शक्ति के बग़ैर संभव नहीं था।

बहादुरशाह बादशाह हुए तो उनके मुख़्तार मिर्ज़ा मुग़ल बेग मंत्री हुए। उन्होंने अपना पूरा कुनबा क़िले में भर लिया किन्तु उस्ताद की तनख़्वाह सात रुपये से बढ़ी तो तीस रुपया महीना हो गई। ‘ज़ौक़’ को यह बेक़दरी बहुत बुरी मालूम होती थी। लेकिन स्वभाव में संतोष बहुत था। कभी बादशाह से इसकी शिकायत नहीं की। उन्हें खुद क्या ख़बर होती कि किसे कितना मिल रहा है। ‘ज़ौक़’ ग़रीबी के दिन काटते रहे।

अंत में पाप का घड़ा फूटा। मिर्ज़ा मुग़ल बेग और उनका सारा कुनबा क़िले से निकाला गया। ‘ज़ौक़’ की तनख़्वाह बढ़कर सौ रुपया महीना हो गई। यद्यपि यह तनख़्वाह भी उनकी योग्यता को देखते हुए कुछ न थी और हैदराबाद से दीवान चन्दूलाल ने ख़िलअ़त और 500 रुपये भेजकर इन्हें बुलाया लेकिन यह ‘ज़फ़र’ का दामन छोड़कर कहीं न गये।
तनख़्वाह के अलावा ईद-बक़रीद पर इनाम भी मिला करते थे। अंतिम काल में उन्होंने बादशाह के बीमारी से अच्छे होने पर एक कंसीदा, ‘‘वाहवा, क्या मोतदिल है बाग़े-आ़लम की हवा’’ पढ़ा। इस पर उन्हें ख़िलअ़त, ख़ान बहादुरी का ख़िताब और चांदी के हौदे के साथ एक हाथी मिला। फिर उन्होंने एक क़सीदा कहा, ‘‘शब को मैं अपने सरे-बिस्तरे-ख़्वाबे-राहत।’’ इस पर उन्हें एक गांव जागीर में मिला।

अंत में इस कमाल के उस्ताद ने 1271 हिजरी (1854 ई.) में सत्रह दिन बीमार रहकर परलोक गमन किया। मरने के तीन घंटे पहले यह शे’र कहा था:

कहते हैं ‘ज़ौक़’ आज जहां से गुज़र गया
क्या खूब आदमी था, खुदा मग़फ़रत करे



ज़ौक़ और शाही फरमाईशों के दिलचस्प किस्से

मुग़लिया सल्तनत के आख़िरी चिराग़ बहादुरशाह द्वितीय के शहज़ादे जवांबख़्त की शादी है। ‘ग़ालिब’ एक सेहरा पेश करते हैं जिसका मक़तअ़ है :

हम सुखन-फ़हम हैं ‘ग़ालिब’ के तरफ़दार नहीं
देखें इस सेहरे से कह दे कोई बेहतर सेहरा

बादशाह को ख़याल होता है कि ‘ग़ालिब’ उनकी सुख़नफ़हमी पर चोट कर रहे हैं कि मुझे जैसे बाकमाल शायर के रहते हुए ‘ज़ौक़’ को उस्ताद किया है। फ़ौरन ही उस्ताद बुलाये जाते हैं और हुक्म होता है कि जवाब में सेहरा लिखो और इसी वक़्त लिखो। ‘ज़ौक़’ बेचारे वहीं बैठ जाते हैं और जवाब में सेहरा लिख देते हैं। बादशाह की उस्तादी भी पकड़बुलावे की नौकरी है।

लेकिन शायद आप यह कहें कि इसमें ज़बर्दस्ती की क्या बात है, ‘ज़ौक़’ ने तो खुशी से अपने ऊपर की गयी ‘चोट’ का जवाब दिया होगा। बहुत अच्छा, मान लिया। लेकिन इस पर क्या कहिएगा-बरसात का मौसम है, बादशाह के साथ युवराज मिर्ज़ा फ़ख़रू भी कुतुब साहब के पास चांदनी रात में तालाब के किनारे सैर कर रहे हैं। ‘ज़ौक़’ भी खड़े हैं। ‘मिर्ज़ा’ फ़ख़रू भी ‘ज़ौक’ के शागिर्द हैं। उनकी ज़बान से मिसरा निकलता है-‘‘चांदनी देखे अगर वह महजबीं तालाब पर’’, और साथ ही हुक्म होता है कि उस्ताद, इस पर मिसरा लगाना। उस्ताद फ़ौरन मिसरा लगाते हैं, ‘‘ताबे-अक़्से-रूख़ से पानी फेर दे महताब पर।’’

बादशाह की उस्तादी ‘ज़ौक़’ को किस क़दर महंगी पड़ी थी, यह उनके शागिर्द मौलाना मुहम्मद हुसैन आज़ाद की ज़बानी सुनिए:

‘‘वह अपनी ग़ज़ल खुद बादशाह को न सुनाते थे। अगर किसी तरह उस तक पहुंच जाती तो वह इसी ग़ज़ल पर खुद ग़ज़ल कहता था। अब अगर नयी ग़ज़ल कह कर दें और वह अपनी ग़ज़ल से पस्त हो तो बादशाह भी बच्चा न था, 70 बरस का सुख़न-फ़हन था। अगर उससे चुस्त कहें तो अपने कहे को आप मिटाना भी कुछ आसान काम नहीं। नाचार अपनी ग़ज़ल में उनका तख़ल्लुस डालकर दे देते थे। बादशाह को बड़ा ख़याल रहता था कि वह अपनी किसी चीज़ पर ज़ोर-तबअ़ न ख़र्च करें। जब उनके शौक़े-तबअ़ को किसी तरफ़ मुतवज्जह देखता जो बराबर ग़ज़लों का तार बांध देता कि तो कुछ जोशे-तबअ़ हो इधर ही आ जाय।’’

शाही फ़रमायशों की कोई हद न थी। किसी चूरन वाले की कोई कड़ी पसंद आयी और उस्ताद को पूरा लटका लिखने का हुक्म हुआ। किसी फ़क़ीर की आवाज़ हुजूर को भा गयी है और उस्ताद पूरा दादरा बना रहे हैं। टप्पे, ठुमरियां, होलियां, गीत भी हज़ारों कहे और बादशाह को भेंट किये। खुद भी झुंझला कर एक बार कह दिया :

ज़ौक मुरत्तिब क्योंकि हो दीवां शिकवाए-फुरसत किससे करें
बांधे हमने अपने गले में आप ‘ज़फ़र’ के झगड़े हैं

और एक वर्तमान आलोचक हैं कि ‘ज़ौक़’ का नाम महाकवियों की सूची में रखने में हिचकते हैं। ‘ग़ालिब’, ‘मोमिन’, ‘आतिश’, ‘नज़ीर’ सभी इस ज़माने के आलोचकों के प्रिय कवि हैं, ‘ज़ौक़’ की लोकप्रियता, मालूम होता है पिछली पीढ़ी के साथ तिरोहित हो गई। ‘ग़ालिब’, ‘मोमिन’ आदि के कमाल पर जिसे शक हो उस पर सौ लानतें, लेकिन उन उस्तादों की प्रशस्ति के लिए ‘ज़ौक़’ या ‘दाग़’ के अपने कमाल की ओर से उपेक्षा बरतना भी निष्पक्ष आलोचना नहीं कही जा सकती। अगर और बातों को छोड़ दिया जाय तो भी सिर्फ़ इतनी सी ही बात ‘ज़ौक़’ को अमर कर देने के लिए काफ़ी है कि वे उम्र भर अपने कांधे पर सल्तनते-मुग़लिया के भारी-भरकम ताज़िए बहादुर शाह ‘ज़फ़र’ को ढोये रहे और साथ ही साहित्य को स्पष्टतः कुछ ऐसी चीज़ें भी दे गये जिनका आज की अस्थिर मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि में चाहे कुछ महत्व न मालूम हो किन्तु जिनमें निस्सन्देह कुछ स्थायी मूल्य निहित हैं जिससे किसी ज़माने में इन्कार नहीं किया जा सकता।

लेकिन ‘ज़ौक़’ के काव्य के इन स्थायी तत्वों की व्याख्या के पहले उनके बारे में फैली हुई कुछ भ्रांतियों का निवारण आवश्यक मालूम होता है। पहली बात तो यह है कि समकालीन होने के लिहाज़ से उन्हें ‘ग़ालिब’ का प्रतिद्वंद्वी समझ लिया जाता है और चूंकि यह शताब्दी ‘ग़ालिब’ के उपासकों की है इसलिए ‘ज़ौक़’ से लोग खामखाह ख़ार खाये बैठे हैं। इसमें कोई शक नहीं कि समकालीन महाकवियों में कुछ न कुछ प्रतिद्वंद्विता होती ही है और ‘ज़ौक़’ ने भी कभी-कभी मिर्ज़ा ‘ग़ालिब’ की छेड़-छाड़ की बादशाह से शिकायत कर दी थी, लेकिन इन दोनों की प्रतिद्वंद्विता में न तो वह भद्दापन था जो ‘इंशा’ और ‘मसहफ़ी’ की प्रतिद्वंद्विता में था, न इतनी कटुता जो ‘मीर’ और ‘सौदा’ में-बावजूद इसके कि ‘मीर’ और ‘सौदा’ एक-दूसरे के कमाल के क़ायल थे-कभी-कभी दिखाई देती है। ‘ज़ौक़’ और ‘ग़ालिब’ में ‘दाग़’ और ‘अमीर’ की भांति समकालीन होते हुए भी प्रतिद्वंद्विता का अभाव और परस्पर प्रेम भी नहीं दिखाई देता, वास्तविकता यह है कि ‘ज़ौक़’ और ‘ग़ालिब’ दोनों ने इस बात को महसूस कर लिया था कि उनकी प्रतिद्वंद्विता का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। ‘ग़ालिब’ नयी भाव-भूमियों को अपनाने में दक्ष थे और वर्णन-सौंदर्य की ओर से उदासीन; ‘ज़ौक़’ का कमाल वर्णन-सौंदर्य में था और भावना के क्षेत्र में बुजुर्गों की देन ही को काफ़ी समझते थे। प्रतिद्वंद्विता का प्रश्न ही नहीं पैदा होता था।

साथ ही जैसा कि हर ज़माने के समकालीन महाकवि एक दूसरे के कमाल के क़ायल होते हैं, यह दोनों बुजुर्ग भी एक-दूसरे के प्रशंसक थे। ‘ग़ालिब’ तो बहते दरिया थे, उनकी ईमानदारी का क्या कहना !जैसा की हमने पिछली पोस्ट में ज़िक्र किया था कि ‘मोमिन’ के इस शेर के बदले में :

तुम मेरे पास होते हो गोया
जब कोई दूसरा नहीं होता।

-‘ग़ालिब’ अपना पूरा दीवान देने को तैयार थे। ‘ज़ौक़’ के भी वे प्रशंसक थे और अपने एक पत्र में उन्होंने ‘ज़ौक़’ के इस शे’र की प्रशंसा की है :

अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जायेंगे
मर गये पर न लगा जी तो किधर जायेंगे।

और उधर ‘ज़ौक़’ भी मुंह-देखी में नहीं बल्कि अपने दोस्तों और शागिर्दों मैं बैठकर कहा करते थे कि मिर्ज़ा (ग़ालिब) को खुद अपने अच्छे शे’रों का पता नहीं है और उनका यह शे’र सुनाया करते थे:

दरियाए-मआ़सी1 तुनुक-आबी से हुआ खुश्क
मेरा सरे-दामन भी अभी तक न हुआ था।

मैं नहीं कह सकता कि वर्तमान आलोचकों की निगाहें कहां तक इस शे’र की गहराई को देख सकी हैं लेकिन मुझे खुद मिर्ज़ा का यह शे’र उनके सारे दीवान से भारी मालूम होता है और मैं ‘ज़ौक़’ की परिष्कृत रुचि का क़ायल हो गया हूं जिन्होंने उस आकारवादी (Formalistic) युग में और स्वयं आकारवाद के एक प्रमुख स्तम्भ होते हुए भी इस शे’र को ‘ग़ालिब’ के दीवान के घने जंगल में से छांट लिया।

‘ज़ौक़’ के मुकाबले में ‘ग़ालिब’ को ऊंचा उठाने में कुछ लोग दो बातों पर ख़ास तौर पर ज़ोर देते हैं। एक तो ‘ग़ालिब’ की निर्धनता में भी कायम रहने वाली मस्ती और दूसरे उनका आत्म-सम्मान। ‘ग़ालिब’ में यह दोनों बातें थीं इससे किसी को इनकार न होना चाहिए, लेकिन मालूम नहीं लोग यह क्यों नहीं देख पाये कि ‘ज़ौक़’ में ये दोनों गुण ‘ग़ालिब’ से कम नहीं, कुछ
अधिक ही थे। हां, यह बात ज़रूर है कि ‘ग़ालिब’ ने अपने पत्रों में इन गुणों का स्वयं ही प्रदर्शन कर दिया है, ‘ज़ौक़’ बिल्कुल खामोश हैं और हमें खुद मेहनत करके उनके व्यक्तित्व की गहराई को जांचना पड़ेगा।


---प्रकाश पंडित की पुस्तक “ज़ौक़ और उनकी शायरी” से साभार

ghazal - laaye hayaat...
singer/composer - shishir parkhie
album - ahtaraam
tribute to the legend poets/shayar series part # 02

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