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Wednesday, June 3, 2009

"प्यार किया तो डरना क्या..."- हिंदी फिल्म संगीत के प्रेमियों ने 100 दिनों तक एक सुर में दोहराई यही बात

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 100

'ओल्ड इज़ गोल्ड' की सुर धाराओं के साथ बहते बहते कैसे १०० दिन गुज़र गये पता ही नहीं चला। गुज़रे ज़माने के ये सदाबहार नग़में जितने भी सुने जायें मानो दिल ही नहीं भरता। शायद यही वजह है इन १०० दिनों के इतनी जल्दी जल्दी बीत जाने की। दोस्तों, आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' मना रहा है अपनी हीरक जयंती, यानी कि 'डायमंड जुबिली' एपिसोड, और इस ख़ास मौके पर हम इस शृंखला को लगातार पढ़ने और सुनने वालों का तह-ए-दिल से शुक्रिया अदा करते हैं। आप के लगातार सुझावों, विचारों, तारीफ़ों, और त्रुटि-सुधारों का ही यह परिणाम है कि यह शृंखला आज अपना हीरक जयंती पर्व मना रही है। इस मौके पर हम आपसे यही कहेंगे कि "तुम अगर साथ देने का वादा करो, हम युंही मस्त नग़में लुटाते रहें"। आज के इस ख़ास एपिसोड को और भी ज़्यादा ख़ास बनाने के लिए किस गीत को बजाया जाये, इस बारे में हमने काफ़ी मंथन किया, कई लोगों के परामर्श लिए और आख़िर में जो गीत निर्धारित हुआ वह आपके सम्मुख प्रस्तुत है। हिंदी फ़िल्म इतिहास की एक ऐतिहासिक फ़िल्म रही है 'मुग़ल-ए-आज़म' जो फ़िल्मी इतिहास का एक स्वर्णिम अध्याय है। इस फ़िल्म ने वह इतिहास क़ायम किया है कि जब भी हिंदी फ़िल्म इतिहास के १० सर्वश्रेष्ठ फ़िल्मों की सूची बनायी जाती है तो इस फ़िल्म का शुमार ज़रूर होता है। और जब फ़िल्म संगीत के १० सर्वाधिक लोकप्रिय गीतों की बात चलती है तो इसी फ़िल्म का "जब प्यार किया तो डरना क्या" का ज़िक्र ज़रूर होता है। इस गीत को फ़िल्म संगीत इतिहास का सबसे रोमांटिक गीत भी कहा जाता है। अब आप ही कहिए कि क्या आज के इस हीरक जयंती के अवसर पर इस गीत से बेहतर कोई गीत हो सकता था भला!

'मुग़ल-ए-आज़म', के. आसिफ़ की फ़िल्म थी और बताने की ज़रूरत नहीं है कि फ़िल्म के मुख्य किरदारों में थे पृथ्वीराज कपूर, दिलीप कुमार, मधुबाला और दुर्गा खोटे। शक़ील बदायूनी के बोल और नौशाद का संगीत गूँजा था इस फ़िल्म के अमर गीतों में। नौशाद साहब के जुबान से 'मुग़ल-ए-आज़म' के साथ जुड़ी उनकी यादों के उजाले पेश हैं, नौशाद साहब की ये बातें हमें प्राप्त हुईं हैं विविध भारती के 'नौशाद-नामा' कार्यक्रम के ज़रिए - "मुझे एक क़िस्सा याद है, इसी घर में (जहाँ उनका यह साक्षात्कार रिकार्ड हुआ था) छत पर एक कमरा है। एक दिन मैं वहाँ बैठकर अपनी आँखें बंद करके फ़िल्म 'अमर' का एक गाना बना रहा था। ऐसे में के. आसिफ़ वहाँ आये और नोटों की एक गड्डी, जिसमें कुछ ५०,००० रूपए थे, उन्होने मेरी तरफ़ फेंका। यह अगली फ़िल्म के लिए 'अडवांस' था। मेरा सर फिर गया और उन पर चिल्लाया, "यह आपने क्या किया, आपने मेरा सारा काम ख़राब कर दिया, आप अभी ये पैसे उठाकर ले जाओ और ऐसे किसी आदमी को दे दो जो पैसों के बग़ैर काम नहीं करता हो।" थोड़ी देर के बाद आसिफ़ साहब कहने लगे कि मैं 'मुग़ल-ए-आज़म' बनाने जा रहा हूँ। मैने कहा, "कोई भी आज़म बनाइए, मैं आपके साथ हूँ क्योंकि आपका और हमारा उस वक़्त का साथ है जब दादर पर हम इरानी होटल में एक कप चाय आधी आधी पीते थे"। हमने कहा कि "हमारा आपका साथ उस वक़्त का है, क्या आप ये पैसे नहीं देंगे तो मैं काम नहीं करूँगा?" वो नीचे गये और मेरी पत्नी से कहा कि "अरे, वो उपर छत पर नोट फेंक रहे हैं।" वो मेरी पत्नी को उपर ले आये और ज़मीन पर फैले नोटों की तरफ़ इशारा करते हुए कहा, "मैनें दिया था उनको 'अडवांस', वो रखे नहीं"। तब मैने कहा, "देखिए, यह आप रखिए पैसे अपने, आप बनाइए, मैं आपके साथ हूँ, ख़ुदा आपको कामयाबी दे"। फिर वह फ़िल्म बनी, और बहुत सारे साल गुज़र गये इस फ़िल्म के बनते बनते। यह वही घर है जहाँ उस फ़िल्म की मीटिंग वगैरह हुआ करती थी। आख़िर में 'मुग़ल-ए-आज़म' बनकर तैयार हो गयी।" तो दोस्तों, ये तो थी नौशाद साहब की बातें। अब ज़रा इस गीत को गानेवालीं सुरकोकिला लता मंगेशकर की भी राय जान लें इस गीत के बनने की कहानी के बारे में। अभी हाल में जब IBN7 TV Channel वालों ने एक मुलाक़ात में लताजी से पूछा "६० के दशक की बात करें तो एक फ़िल्म जिसे हम नज़रंदाज़ नहीं कर सकते, 'मुग़ल-ए-आज़म'। वह एक गाना, जो आज भी लोगों को उतना ही 'हौंटिंग फ़ीलिंग' देता है, लोग कहते हैं कि 'रोंगटे खड़े हो जाते हैं उस गाने को सुनकर', 'प्यार किया तो डरना क्या'। गाना बहुत ही 'लीजेन्डरी' है, कहते हैं कि नौशाद साहब ने आपको बाथरूम मे वह गाना गवाया था, बताइए क्या यह सच है?" सवाल सुनते ही लताजी के साथ साथ सभी दर्शक ज़ोर से हँस पड़े, और फिर लताजी ने जवाब दिया - "नहीं, बाथरूम मे नहीं गवाया था, वह गाना जब हमने रिकार्ड किया, तो 'लास्ट लाइन' उनको 'रिपीट' करनी थी 'इको इफ़ेक्ट' के लिए। पर 'इको इफ़ेक्ट' तब ऐसे नहीं आता था, किसी मशीन से नहीं आता था। तो मुझे उन्होने दूसरे कमरे में खड़ा किया था, और वहाँ से मैने गाया, थोड़ा नज़दीक जाके गाया, मतलब, वही सर्कस ही चलता रहा, यहाँ से वहाँ, वहाँ से वहाँ, इस तरह से उन्होने रिकार्ड किया था।" तो दोस्तों, अब सुनिए आप यह गीत और एक बार फिर से आप सभी को 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की हीरक जयंती पर हिन्दयुग्म की तरफ़ से हार्दिक धन्यवाद!



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रखिये सबसे पहले सही जवाब देने वाले को २ अंक मिलेंगें, और २५ सही जवाबों के बाद आप बन जायेंगें हमारे "गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. चूँकि अगले ७ एपिसोड "राजकपूर विशेष" हैं, तो पहला सूत्र तो यही रहेगा कि गीत राज कपूर की फिल्म का है.
२. इस गीत का interlude राज कपूर के एक अन्य गीत "प्यार हुआ इकरार हुआ" में भी सुनाई देता है.
३. पहला अंतरा शुरू होता है इस शब्द से -"फूल".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी लौटे हैं विजेता बनकर. स्वप्न मंजूषा जी, रचना जी सुमित जी और मनु जी भी सही जवाब पर आकर रुके. बवाल (?) जी आप मज़े से फिल्म देखिये पर ओल्ड इस गोल्ड पर भी आते रहिये. तपन जी चलिए आज ही से शुभारम्भ कीजिये..और हाँ मनु जी, सालगिरह की बहुत बहुत बधाई पूरे युग्म परिवार की तरफ से भी.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


Friday, March 27, 2009

बीसवीं सदी की १० सर्वश्रेष्ठ हिंदी फिल्में (अंतिम भाग)

हम जिक्र कर रहे थे बीसवीं सदी की १० सर्वश्रेष्ठ फिल्मों का प्रतिष्टित हिंदी फिल्म समीक्षक विनोद भारद्वाज द्वारा चुनी गयी सूची के आधार पर. कल हमने ५ फिल्में किस्मत, आवारा, अलबेला, देवदास, और मदर इंडिया की चर्चा की, आगे बढ़ते हैं -

६. प्यासा (१९५७) -गुरुदत्त इस फिल्म के निर्देशक और नायक थे. वहीदा रहमान, माला सिन्हा, जॉनी वाकर, और रहमान थे अन्य प्रमुख भूमिकाओं में. फिल्म के केंद्र में एक प्रतिभाशाली मगर असफल कवि की त्रासदी है जिसे मारा हुआ समझा जाने के बाद खूब बिकने लगता है. जीवित कवि दर दर भटक रहा है पर उसके मृत रूप की पूजा हो रही है. "ये बस्ती है मुर्दा-परस्तों की बस्ती...", गीतकार शायर साहिर लुधियानवीं ने सुनिया की सच्चाईयों को अपनी कलम से नंगा किया और सचिन देव बर्मन ने अपने संगीत से इस कृति को अमर कर दिया. सुनिए इसी फिल्म से ये गीत -



७. मुग़ल - ए- आज़म (१९६०) - के आसिफ की इस एतिहासिक फिल्म को बनने में ९ साल लगे. अकबर बने पृथ्वी राज कपूर और शहजादे सलीम की भूमिका निभाई दिलीप कुमार ने. मधुबाला ने अपनी सुन्दरता और अदाकारी से अनारकली को परदे पर जिन्दा कर दिया. फिल्म के संवाद, अदाकारी, सेट संरचना, और सभी कलात्मक पक्ष बेहद सशक्त थे. संगीत था नौशाद साहब का. सुनते चलिए इस फिल्म का ये नायाब गीत -



८. गाईड (१९६५) - आर के नारायण के चर्चित अंग्रेजी उपन्यास पर आधारित इस फिल्म के निर्देशक थे विजय आनंद. देव आनंद, वहीदा रहमान और किशोर साहू के अभिनय से सजी इस फिल्म में गजब की कशिश है, क्योंकि इसके पात्र आम फिल्मों की तरफ "ब्लैक" और "व्हाइट" नहीं हैं उनके किरदार में "ग्रे" शेड्स हैं जो उन्हें वास्तविक बनाते हैं. मूल लेखक को तो इस फिल्म ने संतुष्ट नहीं किया पर हिंदी सिनेमा के इतिहास में यह एक मील का पत्थर थी. संगीत सचिन देव बर्मन का था, और इस फिल्म के संगीत की जितनी भी तारीफ की जाए कम है. सुनिए ये गीत -



९. शोले (1975) - सितारों से सजी इस फिल्म का निर्देशन किया था रमेश सिप्पी ने. धर्मेन्द्र, अमिताभ बच्चन, हेमा मैलिनी, जया भादुडी, संजीव कुमार, के अलावा फिल्म में एक नए रूप में खलनायक ने जन्म लिया गब्बर सिंह के रूप में जिसे अपने अभिनय से यादकर कर दिया अमजद खान ने. सलीम जावेद सरीखे सिनेमा ने यहीं से सफलता का स्वाद चखा. फिल्म के हर छोटे बड़े किरदारों को आज तक याद किया जाता है उनके संवाद तक बेहद लोकप्रिय हैं आज भी. संगीत था राहुल देव बर्मन का. इसी फिल्म से ये गीत -



१०. हम आपके हैं कौन (१९९४) - एक बार फिर राजश्री वालों ने अपनी ही सफल फिल्म "नदिया के पार" को नए रूप में पेश किया. हिंसा और अश्लीलता से त्रसित हिंदी फिल्मों को इस साफ़ सुथरी पारिवारिक फिल्म ने नयी संजीवनी दे दी. लोग सपरिवार वापस सिनेमा घरों में जाने लगे. १५ गानों से भरी इस फिल्म अधिकतर बातें गीतों के माध्यम से ही कही गयी है. युवा निर्देशक सूरज भड्जात्या ने अपने बैनर की परम्पराओं को निभाते हुए मध्यम वर्गीय मूल्यों पर इस फिल्म का ताना बाना रचा. माधुरी दिक्षित ने अपनी अदाओं से सब के मन को मोह लिया, यहाँ तक कि मकबूल फ़िदा हुसैन को भी माधुरी फ़िदा हुसैन के नाम से जाना जाने लगा. राम लक्ष्मण का संगीत पारम्परिक और मधुर था. सुनिए ये गीत -



कल हमें कुछ पाठकों के विचार प्राप्त हुए. ज्ञानी मानन्धर ने जी ने जिन फिल्मों का जिक्र किया उनमें से बॉबी, दोस्ती, और अमर अकबर एंथोनी भी सफलता के लिहाज से और उन सभी कारणों से जिनका आपने जिक्र किया, निश्चित रूप से इस सूची के प्रबल दावेदार हैं. मेरे हिसाब से भी बॉबी और दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगें संगीत प्रधान रोमांटिक फिल्मों का प्रतिनिधित्व करती हैं. आचार्य जी ने भी बॉबी का जिक्र किया है. जंजीर भी एक सफलतम कृति है. पर जैसा कि हमने पहले भी बताया कि कोई भी सूची इस मामले में मुक्कमल नहीं हो सकती. नीरज गुरु ने भी हमें लिखा और बताया कि वो हिंदी की १०० श्रेष्ठ फिल्मों पर रिसर्च कर रहे हैं. उम्मीद करते है कि उस सूची में हम सब की प्रिय फिल्में अपना स्थान पाएंगीं.

विनोद जी ने फिल्म समीक्षक के नज़रिए से भी एक सूची बनायीं है. चलते चलते आईये एक नज़र डालें उस सूची पर भी. नीचा नगर (चेतन आनंद), जागते रहो (शम्भू मित्र), कागज़ के फूल (गुरु दत्त), भुवन शोम (मृणाल सेन), भूमिका और सूरज का सातवाँ घोड़ा (श्याम बेनेगल), दुविधा (मणि कॉल), तरंग (कुमार शहानी), तीसरी कसम (बासु भट्टाचार्य), और गर्म हवा (एम् एस सत्यु) विनोद की नज़र में समीक्षकों की टॉप १० फिल्में हैं.


Wednesday, February 18, 2009

नौशाद की तीन सर्वश्रेष्ठ फिल्मों के संगीत पर एक चर्चा

(पिछले अंक से आगे ...)


नौशाद अली का संगीत सभी के दिलों पर राज़ करता है। यदि अब तक सभी संगीतकारों का जिक्र होगा तो नौशाद का नाम आर.डी.बर्मन,रहमान आदि के साथ लिया जायेगा। उनका संगीत हमेशा अमर रहेग और ऐसे ही चमकता रहेगा। आज की तारीख का कोई भी संगीतकार मुगल-ए-आज़म जैसी एल्बम तैयार नहीं कर सकता और शायद ऐसा अमर गीत भी कभी नही-



नौशाद ने तमाम फिल्मों में काम किया लेकिन यदि उनकी किन्हीं तीन फिल्मों का जिक्र करना चाहें तो वो शायद ये होंगी:
१. मुगल-ए-आज़म : शायद ही किसी को इस बारे में शक हो कि फिल्मी इतिहास में इस फिल्म का संगीत नौशाद का सर्वोत्तम संगीत रहा है। इस फिल्म के ज्यादातर गाने लता मंगेशकर द्वारा गाये गये हैं। हालाँकि ओर्केस्ट्रा आज के समय की तरह तकनीकी और आधुनिकता से लैस नहीं है लेकिन फिर भी उन गानों की मेलोडी की किसी भी अन्य गीत से तुलना नहीं की जा सकती। लता का गाया हुआ राग गारा में 'मोहे पनघट पे नंद लाल' एक तरह से कव्वाली भी है और उस गाने में हर बात सर्वोत्तम है... उसका ट्रैक..जबर्दस्त उर्दू शब्द...से लेकर लता मंगेशकर के साथ साथ कोरस भी कोई कमी नहीं छोड़ रहा था। नौशाद का संगीत उसमें चार-चाँद लगाता है। उसी फिल्म में रागदरबारी में 'प्यार किया तो डरना क्या..' एक और कव्वाली है जो ये सोचने पर मजबूर कर देती है कि 'मोहे..' और 'प्यार किया..' में से बेहतर कौन है। अगला गाना राग यमन में 'खुदा निगेबान..' में एक बार फिर उर्दू के खूबसुरत बोल हैं, लता की मिठास है और उस पर नौशाद का संगीत...कुल मिलाकर इस एल्बम में नौशाद ने फिल्म की जरुरत के हिसाब से वो जबर्दस्त संगीत दिया है जो उसके बाद से अब तक ५० वर्षॊं से न केवल टिका हुआ बल्कि आधुनिकता और सुविधा-सम्पन्न आज के संगीत को कड़ी टक्कर दे रहा है। आने वाले ५० बरसों में भी यही होगा।



२. दूसरी फिल्म है बैजू बावरा: ये वो फिल्म है जिसके बाद नौशाद की पहचान बनी, वे सब की नजरॊ में आये और उसके बाद ही उन्होंने मुगल-ए-आज़म, मेरे महबूब व बाकि फिल्मों में काम किया। ये फिल्म भारतीय सिनेमा के इतिहास अपना अलग महत्त्व रखती है। इसका मशहूर भजन 'मन तरपत हरि दर्शन..' को आज भी सबसे बढ़िया भक्ति गीतों में शुमार किया जाता है। गौर करने वाली बात यह है कि इस गीत के बोल लिखें हैं मोहम्मद शकील ने, इसको गाया है मोहम्मद रफी ने और धुन बनाई है नौशाद ने..ये तीनों ही मुस्लिम रहे हैं। नौशाद के संगीत और इस गीत ने ये साबित कर दिया है कि संगीत किसी एक धर्म का नहीं है। बाकि मशहूर गानों में 'ओ दुनिया के रखवाले..' जिसे गाया था नौशाद के पसंदीदा गायक रफी ने। "झूले में पवन के", जिसे लता और रफी दोनों ने अपनी आवाज़ दी। इनके गीतों को सुनना अपने आप में एक अलग अनुभव होता है। राग भैरवी में 'तू गंगा की मौज..' को कौन भूल सकता है... जिसके सुंदर बोल,कोरस एफैक्ट और ओर्केस्ट्रा सब मिलकर इस गीत को एक अमर रचना में तब्दील कर देते हैं.



३. कोहिनूर: नौशाद द्वारा संगीतबद्ध एक और फिल्म। यह फिल्म मेलोडी के अलावा भी और कईं कारणॊं से मील का पत्थर रही। 'मधुबन में राधिका नाचे रे..' गाना आज भी पसंद किया जाता है। इस पूर्णतया राग प्रधान गीत के लिये रफी साहब की जितनी तारीफ की जाये उतनी कम है। नौशाद जोखिम उठाने में कभी भी नहीं हिचकिचाते थे। नये नये प्रयोग करना उन्हें अच्छा लगता था। इस फिल्म के निर्देशक थोड़े घबराये हुए थे, क्योंकि यह गाना किसी भी लिहाज से पारंपरिक कव्वाली नहीं था और न ही ये सामान्य गानों की तरह अथवा पाश्चात्य समाये हुए था। फिर भी इस गाने की धुन अपने आप में आधुनिकता समेटे हुए थी जिसको अपनी आवाज़ से रफी साब ने और सुरीला बना दिया था। नौशाद इस गाने को लेकर इतने विश्वास से भरे हुए थे कि वे कोहिनूर के लिये जो भी पैसे उन्हें मिल रहे थे वे भी वापस करने को तैयार थे अगर बॉक्स ऑफिस पर ये गीत पिट जाता। लेकिन जो हुआ वो सब ने देखा और सुना। यह गाना पूरे भारत में अपने शास्त्रीय संगीत और रिद्म की वजह से कामयाब हुआ। इसी फिल्म के अन्य गीत थे 'ढल चुकी शाम-ए-गम...', 'जादूगर कातिल..' 'तन रंग लो जी..'। सभी गानों की खास बात उसका संगीत तो था ही साथ ही बहुत खूबसूरत बोल भी थे।



नौशाद के काम को और भारतीय संगीत में योगदान को इन तीन फिल्मों में कतई नहीं समेटा जा सकता। उनका योगदान निस्संदेह सराहनीय व अतुलनीय है। उनकी आखिरी फिल्म रही अकबर खान की 'ताजमहल'। ये फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कुछ खास कमाल नहीं दिखा पाई। नौशाद का खूबसूरत संगीत खराब स्टार कास्ट के कारण लोगों की नजरों में नहीं आ पाया। फिल्म के प्रोमोशन के लिये निर्माता नौशाद के गानों का भी सही इस्तेमाल नहीं कर सके। जबकि ये वो समय था कि इस फिल्म का संगीत उस समय की अन्य फिल्मों के मुकाबले कहीं बेहतर था। ताजमहल के संगीत को नौशाद का बेस्ट तो नहीं कह सकते किन्तु आज के समय के अन्य संगीतकारों हिमेश, प्रीतम व अनु मलिक तथा अन्यों से हजार गुणा अच्छा था। यदि इस फिल्म के गानों को सुनें तो सबसे अच्छा गीत 'अपनी ज़ुल्फें मेरे...' रहा जिसे हरिहरण ने गाया। हरिहरण उन गायकों में से हैं जिन्हें हमेशा ही कम आंका गया है। प्रीति उत्तम और हरिहरण का ही गाया हुआ एक और जबर्दस्त रोमांटिक गीत 'मुमताज़ तुझे देखा...' रहा। संगीत सुनेंगे तो आपको लगेगा ही नहीं कि ८६ वर्ष का कोई बुजुर्ग ये धुन बना रहा होगा। नौशाद के संगीत में हमेशा ताज़गी समाई हुई रहती है।



प्रस्तुति - तपन शर्मा


Tuesday, February 17, 2009

मछलियाँ पकड़ने का शौकीन भी था वो सुरों का चितेरा

(पिछले अंक से आगे ...)

चाहें कोई पिछली पीढ़ी का श्रोता हो या आज की पीढ़ी का युवा वर्ग हर कोई नौशाद के संगीत पर झूमता है। ज़रा कुछ गीतों पर नजर डालिये... मधुबाला का 'प्यार किया तो डरना क्या' जिस पर आज के दौर में रीमिक्स बनाया जाता है... और जब दिलीप कुमार का "नैन लड़ जई हैं तो मनवा मा.." सुन ले तो कदम अपने आप थिरकने लगते हैं। आज ज्यादातर लोग उस दौर से ताल्लुक नहीं रखते पर फिर भी लगता है कि नौशाद फिल्मों में संगीत नहीं देते थे...बल्कि जादू बिखेरते थे। उनके संगीत में लोक संगीत की झलक मिलती है।

लखनऊ में जन्में १८ वर्षीय बालक से जब उसके पिता ने घर और संगीत में से एक को चुनने को कहा तब उसने संगीत को चुना और खूबसूरत सपने और कड़वी सच्चाइयों वाले मुम्बई शहर जा पहुँचा। आँखों में हजारों सपने लिये फुटपाथ को घर बनाये इस शानदार संगीतकार ने सैकड़ों धुनें तैयार कर दी। यदि फिल्मों पर गौर करें तो महल, बैजू बावरा, मदर इंडिया, मुगल-ए-आज़म, दर्द, मेला, संघर्ष, राम और श्याम, मेरे महबूब-जैसी न जाने कितनी ही फिल्में हैं।



नौशाद की बात करें और लता व रफी की बात न हो तो क्या फायदा। मुगल-ए-आज़म के राग दरबारी में 'मोहब्बत की झूठी कहानी पे रोय' से लेकर गंगा जमुना के 'ढूँढो ढूँढो रे साजना' तक यदि किसी संगीतकार ने गीत की जरूरत, उसके बोल और गायिका की आवाज़ को समझा है तो वो नैशाद ही हैं।

रफी की बात करें तो गानों की लाइन लग सकती है पर फिर भी यदि किन्हीं दो गानों को चुनना पड़े तो शायद हर कोई 'ए दुनिया के रखवाले' और राग मालकौस 'मन तड़पत हरि दर्शन को आज' को ही चुनेगा।



लता मंगेशकर कहती हैं, "मैंने नौशाद साहब के साथ कईं महत्त्वपूर्ण गानों में काम किया है। उनकी शास्त्रीय संगीत में पकड़ और नये पॉपुलर संगीत की समझ ने उन्हें उस समय के सदाबहार गानों को कॉम्पोज़ करने का सबसे योग्य उम्मीदवार बना दिया था। वे याद करती हैं और हँसती हैं जब 'प्यार किया तो डरना क्या' गीत रिकॉर्ड हो रहा था तब बीच में आवाज़ में गुंजन पैदा करनी थी। जिसके लिये नौशाद ने उन्हें बाथरूम से गाने को कहा। उस समय आवाज़ को गुँजाने का कोई साधन नहीं था, इसलिये नौशादा साहब ने ये तरीका ईज़ाद किया। वे आगे बताती हैं कि नौशाद अपनी धुनों व आवाज़ में लगातार प्रयोग करते रहते थे जिसके लिये उन्होंने पाश्चात्य ओर्केस्ट्रा का प्रयोग करने में भी नहीम हिचकिचाये। उनके पसंदीदा गीतों में 'उठाये जा उनके सितम' (अंदाज़), 'जाने वाले से मुलाकात', 'न मिलता गम' (अमर), 'मोहे पनघट पे नंदलाल', राग केदार में 'बेकस पे करम' और राग दरबारी में 'प्यार किया तो..' गाने प्रमुख रहे। आज के समय में ऐसा संगीत दिया ही कहाँ जाता है।



जिन कलाकारों ने उनके साथ काम किया वे उन्हें मिश्रित संस्कृति का प्रतीक मानते हैं। जावेद अख्तर कहते हैं कि नौशाद न केवल एक संगीतकार थे बल्कि देश के मिश्रित संस्कृति के ऐसे प्रतीक थे जिन्होंने भारतीय फिल्म संगीत में कईं परिवर्तन लाये व इसको गरिमा प्रदान की। वे बताते हैं कि नौशाद का फिल्म संगीत में योगदान अद्वितीय था। उनका नाम हमेशा ही श्रद्धा और सम्मान के साथ लिया जाता रहेगा।

जानेमाने निर्देशक महेश भट्ट भी कुछ ऐसा ही कहते हैं। वे कहते हैं कि नौशाद सेक्युलर भारत के प्रतीक थे। उनका सम्गीत संयुक्त सम्स्कृति की प्रतिध्वनि था। जब वे भजन में संगीत दिया करते थे ऐसा लगता था मानो वे हिन्दू हों। उनमें भारतीयता की गहराई थी और यही महान इतिहास व संस्कृति उनके खून में बह रही थी।



नौशाद तेजी से बढ़ते 'रीमिक्स कल्चर' से दूर भागने का प्रयास करते और हमेशा कहते कि हमें समय के साथ आगे बढ़ना तो चाहिये पर अपनी जड़ों के साथ पकड़ हमेशा बना कर रखनी चाहिये।

और अंत में एक ऐसी बात जो शायद बहुत कम लोगों को ही पता होगी। नौशाद साहब को मछली पकड़ने का शौक था। संगीत निर्देशन के अति व्यस्त कार्यक्रम से समय निकाल कर वे "एंग्लिंग" खेलने जाया करते थे। ये एक तरह का मछली पकड़ने का खेल है। उन्होंने १९५९ में महाराष्ट्र स्टेट ऐंग्लिंग एसोसियेशन की सदस्यता प्राप्त की। जब नौशाद युवा थे तो मुम्बई की पोवई झील में गीतकार शकील बदईयुनि और मजरूह सुल्तानपुरी के साथ मछलियाँ पकड़ने जाया करते थे।

नौशाद फिल्मी संगीत के स्वर्णयुग का सबसे अहम संगीतकार थे जिसने शास्त्रीय संगीत में पगे गीतों को लोकप्रिय बनाया और उनके संगीत का जादू ही है जो बैजू बावरा और मुगले आजम का संगीत आज भी ताजातरीन लगता है।



अगले अंक में : नौशाद की तीन बेहतरीन फिल्मों के गाने और मुलाकात उन गीतों से जिनकी धुनें नौशाद साब की आखिरी धुनें थीं

प्रस्तुति- तपन शर्मा


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