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Sunday, April 28, 2019

राग शंकरा : SWARGOSHTHI – 417 : RAG SHANKARA






स्वरगोष्ठी – 417 में आज

बिलावल थाट के राग – 5 : राग शंकरा

उस्ताद विलायत खाँ से राग शंकरा की रचना और मुबारक बेगम से फिल्मी गीत सुनिए




उस्ताद विलायत खां
मुबारक बेगम
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हमारी श्रृंखला “बिलावल थाट के राग” की पाँचवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट-व्यवस्था है। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट, रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट, स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाटों के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग 300 सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से दूसरा थाट बिलावल है। इस श्रृंखला में हम बिलावल थाट के रागों पर क्रमशः चर्चा कर रहे हैं। प्रत्येक थाट का एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। आज के अंक में बिलावल थाट के जन्य राग “शंकरा” पर चर्चा करेंगे। आज के अंक में हम आपको विश्वविख्यात सितार वादक उस्ताद विलायत खाँ का का बजाया राग शंकरा में एक आकर्षक गत सुनवाएँगे। साथ ही 1966 की फिल्म ‘सुशीला’ का राग शंकरा पर आधारित एक सदाबहार गीत सुनवाएँगे और इसके संगीतकार सी. अर्जुन के बारे में आपको कुछ जानकारी देंगे।



राग शंकरा भारतीय संगीत का एक गम्भीर प्रकृति का राग है। मयूर वीणा के सुविख्यात वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र के अनुसार, यह राग मानव की अन्तर्व्यथा को आध्यात्म से जोड़ने वाले भावों की अभिव्यक्ति के लिए समर्थ होता है। औड़व-षाड़व जाति के राग शंकरा के आरोह में ऋषभ और मध्यम तथा अवरोह में मध्यम स्वर का प्रयोग नहीं किया जाता। शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। उत्तरांग प्रधान इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी तार सप्तक का षडज स्वर होता है। रात्रि के दूसरे प्रहर में यह राग गाने-बजाने की परम्परा है। इस राग के स्वरूप के बारे में विद्वानो में कुछ मत-भिन्नता भी है। कुछ विद्वान इस राग को औड़व-औड़व जाति का मानते हैं, अर्थात आरोह और अवरोह, दोनों में ऋषभ और मध्यम स्वर का प्रयोग नहीं करते। एक अन्य मतानुसार केवल मध्यम स्वर ही वर्जित होता है। वर्तमान में राग शंकरा का औड़व-षाड़व जाति ही अधिक प्रचलित है। आइए, अब हम आपको तंत्रवाद्य सितार पर एक मोहक गत सुनवा रहे हैं। विश्वविख्यात सितार-वादक उस्ताद विलायत खाँ से सभी संगीत-प्रेमी परिचित हैं। राग शंकरा की तीनताल में निबद्ध यह रचना उन्हीं की कृति है। आप इस आकर्षक सितार-वादन की रसानुभूति कीजिए।

राग शंकरा : सितार पर तीनताल की गत : वादक उस्ताद विलायत खाँ


वर्ष 1966 में श्री विनायक चित्र द्वारा निर्मित और महेन्द्र प्राण द्वारा निर्देशित फिल्म ‘सुशीला’ प्रदर्शित हुई थी। मधुर गीतों के कारण यह फिल्म अत्यन्त सफल हुई थी। फिल्म के संगीतकार थे सी. अर्जुन, जिनकी प्रतिभा का उचित मूल्यांकन फिल्म संगीत के क्षेत्र में नहीं हुआ। 1 सितम्बर, 1933 को सिन्ध (वर्तमान पाकिस्तान) में जन्में सी. अर्जुन को संगीत अपने गायक पिता से विरासत में प्राप्त हुआ था। विभाजन के समय यह परिवार बड़ौदा आकर बस गया। सी. अर्जुन ने आरम्भ में कुछ समय तक रेलवे की नौकरी भी की, लेकिन संगीत के क्षेत्र में कुछ कर गुजरने के उद्देश्य से नौकरी छोड़ कर तत्कालीन बम्बई का रुख किया और यहाँ आकर संगीतकार बुलों सी. रानी के सहायक बन गए। उन दिनों गजलों के संगीत संयोजन में बुलों सी. रानी बड़े माहिर माने जाते थे। सी. अर्जुन ने गजल-संयोजन की कला उन्हीं से सीखी थी। स्वतंत्र संगीतकार के रूप में सी. अर्जुन की 1960 में प्रदर्शित प्रथम हिन्दी फिल्म ‘रोड नम्बर 303’ थी। इस फिल्म के गीत बेहद मोहक सिद्ध हुए। 1961 में प्रदर्शित फिल्म ‘मैं और मेरा भाई’ में सी. अर्जुन अपनी गजल-संयोजन की प्रतिभा को रेखांकित करने में सफल हुए। इस फिल्म के गीतकार जाँनिसार अख्तर थे। गीतकार और संगीतकार की इस जोड़ी ने इसके बाद कई फिल्मों में आकर्षक और लोकप्रिय गज़लों से फिल्म संगीत को समृद्ध किया। फिल्म ‘मैं और मेरा भाई’ में जाँनिसार अख्तर की लिखी, आशा भोसले और मुकेश के स्वरों में गायी सदाबहार गजल - ‘मैं अभी गैर हूँ मुझको अभी अपना न कहो...’ ने सी. अर्जुन को अमर बना दिया। इस फिल्म के बाद उन्होने अपनी फिल्मों में स्तरीय गज़लों का सिलसिला जारी रखा। 1964 की फिल्म ‘पुनर्मिलन’ में- ‘पास बैठो तबीयत बहल जाएगी...’, 1965 की फिल्म ‘एक साल पहले’ में - ‘नज़र उठा कि ये रंगीं समाँ रहे न रहे...’ और 1966 में ‘चले हैं ससुराल’ जैसी कम बजट की फिल्म को भी उन्होने - ‘हमने तेरी वफ़ा का जफ़ा नाम रख दिया...’ जैसी लोकप्रिय गजल से सँवार कर अपनी प्रतिभा का रेखांकन किया। गज़लों के श्रेष्ठ संगीतकार के रूप में सी. अर्जुन की सबसे सफल और लोकप्रिय 1966 की ही फिल्म थी ‘सुशीला’। इस फिल्म में उन्हें एक बार फिर जाँनिसार अख्तर का साथ मिला। इस फिल्म के सभी गीतों को अपार ख्याति मिली। गायिका मुबारक बेगम की आवाज़ में फिल्म की एक गजल - ‘बेमुरव्वत बेवफा बेगाना-ए-दिल आप हैं...’ तो आज भी सदाबहार है। राग शंकरा पर आधारित यह गजल जाँनिसार अख्तर की शायरी और सी. अर्जुन के उत्कृष्ट संगीत के लिए सदा याद रखा जाएगा। इस लघु श्रृंखला के आज के अंक के लिए हमने राग शंकरा पर आधारित यही गीत चुना है। लीजिए, आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग शंकरा : ‘बेमुरव्वत बेवफा बेगाना-ए-दिल आप हैं...’ : मुबारक बेगम : फिल्म - सुशीला




संगीत पहेली

“स्वरगोष्ठी” के 417वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1956 में प्रदर्शित एक फिल्म के राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 420वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2019 के दूसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इस गीत में किस राग का स्पर्श है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किन युगल-गायकों के स्वर हैं?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 4 मई, 2019 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के अंक संख्या 419 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 415वें अंक की पहेली में हमने आपसे वर्ष 1960 में प्रदर्शित फिल्म “बंजारन” के एक गीत का एक अंश सुनवा कर तीन प्रश्नों में से पूर्ण अंक प्राप्त करने के लिए कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – दुर्गा, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – लता मंगेशकर और मुकेश

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, कल्याण, महाराष्ट्र से शुभा खाण्डेकर, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, अहमदाबाद, गुजरात से मुकेश लाडिया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर श्रृंखला “बिलावल थाट के राग” की चौथी कड़ी में आज आपने बिलावल थाट के राग “शंकरा” का परिचय प्राप्त किया। साथ ही इस राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए सुविख्यात सितार-वादक उस्ताद विलायत खाँ का बजाया तीनताल में एक रचना का रसास्वादन किया। इसके बाद इसी राग पर आधारित एक गीत फिल्म “सुशीला” से मुबारक बेगम के स्वर में प्रस्तुत किया गया। संगीतकार सी. अर्जुन ने इस गीत को राग शंकरा के स्वरों का आधार दिया है। “स्वरगोष्ठी” पर हमारी पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया  
राग शंकरा : SWARGOSHTHI – 417 : RAG SHANKARA : 28 अप्रैल, 2019

Sunday, May 4, 2014

अनूठा तालवाद्य नक्कारा अथवा नगाड़ा



स्वरगोष्ठी – 166 में आज

संगीत वाद्य परिचय श्रृंखला – 4

'नक्कारखाने में तूती की आवाज़'- अब तो इस मुहावरे का अर्थ ही बदल चुका है 

'तूती के शोर में गुम हुआ नक्कारा'  





‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी ‘संगीत वाद्य परिचय श्रृंखला’ की चौथी कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, सभी संगीतानुरागियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, इस लघु श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के कुछ कम प्रचलित, लुप्तप्राय अथवा अनूठे वाद्यों की चर्चा कर रहे हैं। वर्तमान में प्रचलित अनेक वाद्य हैं जो प्राचीन वैदिक परम्परा से जुड़े हैं और समय के साथ क्रमशः विकसित होकर हमारे सम्मुख आज भी उपस्थित हैं। कुछ ऐसे भी वाद्य हैं जिनकी उपयोगिता तो है किन्तु धीरे-धीरे अब ये लुप्तप्राय हो रहे हैं। इस श्रृंखला में हम कुछ लुप्तप्राय और कुछ प्राचीन वाद्यों के परिवर्तित व संशोधित स्वरूप में प्रचलित वाद्यों का उल्लेख करेंगे। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम आपसे एक ऐसे तालवाद्य की चर्चा करेंगे जिसका लोकसंगीत और लोकनाट्य में सर्वाधिक प्रयोग किया जाता रहा है। नक्कारा अथवा नगाड़ा नामक यह वाद्य अपनी ऊँची आवाज़ और विशिष्ट वादन शैली के कारण पिछली शताब्दी का सर्वाधिक लोकप्रिय तालवाद्य रहा है। आज भी कभी-कभी नक्कारा का उपयोग नज़र आ जाता है, परन्तु धीरे-धीरे यह लुप्तप्राय होता जा रहा है।  


ज के अंक में हम आपके साथ एक ऐसे लोक ताल वाद्य के बारे में चर्चा कर रहे हैं जो भारतीय ताल वाद्यों में सबसे प्राचीन है, किन्तु आज इस वाद्य के अस्तित्व पर ही संकट के बादल मँडरा रहे हैं। एक मुहावरा है- ‘नक्कारखाने में तूती की आवाज़’, जिसे हम बचपन से सुनते आ रहे हैं और समय-समय पर इसका प्रयोग भी करते रहते हैं। ऐसे माहौल में जहाँ अपनी कोई सुनवाई न हो या बहुत अधिक शोर-गुल में अपनी आवाज़ दब जाए, वहाँ हम इसी मुहावरे का प्रयोग करते हैं। परन्तु ऐसा प्रतीत हो रहा है कि आने वाले समय में यह मुहावरा ही अर्थहीन हो जाएगा, क्योंकि ऊँचे सुर वाला तालवाद्य नक्कारा या नगाड़ा ही नहीं बचेगा तो तूती (एक छोटे आकार और ऊँचे स्वरों वाला सुषिर वाद्य) की आवाज़ भला क्यों दबेगी?

नाथूलाल सोलंकी 
'नक्कारा' अथवा 'नगाड़ा' अतिप्राचीन घन वाद्य है। प्राचीन ग्रन्थों में इसका उल्लेख 'दुन्दुभी' नाम से किया गया है। देवालयों में इस घन वाद्य का प्रयोग ‘नौबत’ के अन्तर्गत प्राचीन काल से ही किया जा रहा है। नौबतखाना में नौ वाद्यों का समूह होता है, जिसमें अन्य वाद्यों- दमामा, कर्णा, सुरना, नफीरी, श्रृंगी, शंख, घण्टा और झाँझ के साथ नक्कारा का प्रयोग भी किया जाता है। परन्तु मन्दिरों में नक्कारा की भूमिका ताल वाद्य के रूप में नहीं, बल्कि प्रातःकाल मन्दिर के कपाट दर्शनार्थ खुलने की अथवा सांध्य आरती आदि की सूचना भक्तों अथवा दर्शनार्थियों को देने के रूप में होती रही है। अधिकांश मन्दिरों में यह परम्परा आज भी कायम है। मन्दिरों के अलावा नक्कारे का प्रयोग प्रचीनकाल में युद्धभूमि में भी किया जाता था| परन्तु यहाँ भी नक्कारा तालवाद्य नहीं, बल्कि सैनिकों के उत्साहवर्धन के लिए प्रयोग किया जाने वाला वाद्य ही था। ताल वाद्य के रूप में नक्कारा अथवा नगाड़ा लोक संगीत और लोक नाट्य का अभिन्न अंग रहा है। हिमांचल प्रदेश से लेकर बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान तक के विस्तृत क्षेत्र के लोक संगीत में इस ताल वाद्य का प्रयोग किया जाता रहा है। अब हम प्रस्तुत कर रहे है, स्वतंत्र नक्कारा वादन। वादक है, राजस्थान के चर्चित लोक कलाकार नाथूलाल सोलंकी। यह प्रस्तुति आठ मात्रा के कहरवा ताल में की गई है।



स्वतंत्र नक्कारा वादन : आठ मात्रा कहरवा ताल : वादक – नाथूलाल सोलंकी





मुबारक बेगम 
कव्वाली गायक शंकर और शम्भू 
पौराणिक काल में दो भिन्न ध्वनियों वाले अवनद्ध वाद्य का उल्लेख मिलता है, जिसे ‘सम्बल’ नाम से जाना जाता था। वर्तमान नक्कारा अथवा नगाड़ा इसी वाद्य का विकसित रूप है। यह धातु अथवा लकड़ी के दो खोखले अर्द्धगोलाकार आकृति पर चर्म मढ़ कर बनाया जाता है। नक्कारा के बड़े हिस्से अर्थात बाएँ हिस्से का व्यास 75 से लेकर 120 सेंटीमीटर तक होता है। यह निचले स्वरों की उत्पत्ति करता है। वादन के दौरान वादक प्रायः पानी से भीगे कपड़े इसके सतह पर फेरते रहते हैं। इस क्रिया से इसकी ध्वनि ऊँची नहीं होती और इसकी गूँज बनी रहती है। नक्कारा के दाएँ हिस्से को ‘झील’ या ‘डुग्गी’ कहा जाता है। इसका व्यास 25 से लेकर 40 सेंटीमीटर तक होता है। इसका स्वर काफी ऊँचा होता है। वादक प्रायः इस हिस्से पर मढ़े चमड़े को आग से सेंक कर बजाते हैं। इससे टंकार उत्पन्न होता है। यह वाद्य लकड़ी के दो चोब के प्रहार से बजाया जाता है। जब कुशल वादक नक्कारा वादन करते हैं तो बिना माइक्रोफोन के इसकी आवाज़ दूर-दूर तक पहुँचती है। लोकगीतों के साथ तालवाद्य के रूप में आमतौर पर ढोलक और नक्कारा का प्रयोग होता रहा है। शहनाई या सुन्दरी वाद्य के साथ नक्कारा की संगति बेहद कर्णप्रिय होती है। अठारहवीं शताब्दी से हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान में अत्यन्त लोकप्रिय लोकनाट्य शैली ‘नौटंकी’ का तो यह अनिवार्य संगति वाद्य होता है। लोकनाट्य शैली नौटंकी को विभिन्न क्षेत्रों में सांगीत, स्वांग, रहस, भगत आदि नामों से भी पुकारा जाता है। नौटंकी संगीत प्रधान नाट्य शैली है जिसका कथानक पौराणिक, ऐतिहासिक अथवा लोकगाथाओं पर आधारित होता है। अधिकतर संवाद गेय और छन्दबद्ध होते हैं। नौटंकी के छन्द दोहा, चौबोला, दौड़, बहरेतबील, लावनी आदि के रूप में होते हैं। नौटंकी का ढाँचा पूरी तरह छन्दबद्ध होता है और इसके कलाकार काफी ऊँचे स्वर में गायन करते हैं, इसीलिए ऊँचे स्वर वाला नक्कारा ही इन छन्दों के लिए अनुकूल संगति वाद्य है। आइए अब हम आपको प्रसिद्ध नौटंकी ‘लैला मजनूँ’ के कुछ छंदों का रसास्वादन कराते है। इन अंशों में नक्कारे की आकर्षक संगति की गई है। इन प्रसंगों को हमने 1966 की फिल्म ‘तीसरी कसम’ से लिया है। चर्चित गीतकार शैलेन्द्र की यह महत्वाकांक्षी फिल्म थी जिसमें संगीतकार शंकर जयकिशन ने लोकगीतों की मौलिकता को बरक़रार रखा। इसी फिल्म के एक प्रसंग में ग्रामीण मंच पर नौटंकी ‘लैला मजनूँ’ का मंचन हो रहा है। अभिनेत्री वहीदा रहमान नौटंकी की नायिका हैं। नौटंकी के दोहा, चौबोला, दौड़ और बहरेतबील छंदों के उदाहरण इस अंश में उपस्थित है। अपने समय के चर्चित कव्वाली गायक शंकर व शम्भू तथा पार्श्वगायिका मुबारक बेगम ने इन अंशों में अपने स्वर दिये हैं। नौटंकी लोकनाट्य में नक्कारा एक संगति वाद्य के रूप में कितना महत्त्वपूर्ण है, इसका स्पष्ट अनुभव आपको यह संगीत अंश सुन कर सहज ही होगा। आप इन छंदों का रसास्वादन कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।



नक्कारा संगति: नौटंकी – लैला मजनूँ : फिल्म – तीसरी कसम : स्वर – शंकर, शम्भू और मुबारक बेगम : संगीत – शंकर जयकिशन






आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 166वें अंक की पहेली में आज हम आपको एक कम प्रचलित वाद्य पर राग रचना का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 170वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।





1 – संगीत रचना के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि इस रचना में किस राग की झलक है?

2 – यह रचना किस ताल में निबद्ध है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 168वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 164वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको परदे वाले अप्रचलित गज-तंत्र वाद्य मयूर वीणा के वादन का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। इस जाति के वाद्य- इसराज, दिलरुबा, तार शहनाई, ताऊस और मयूर वीणा की बनावट और इनके स्वर निकास में काफी समानता होती है। पहले प्रश्न के रूप में हमने वाद्ययंत्र का नाम पूछा था, जिसका सही उत्तर है- मयूर वीणा। परन्तु जिन प्रतिभागियों ने इसके समान वाद्यों का उल्लेख किया है, उनके उत्तर को भी हमने सही माना है। पहेली के दूसरे दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- राग मारू बिहाग। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी (इसराज), हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी (तार शहनाई/दिलरुबा) तथा हमारी एक नई संगीतसाधिका पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने (दिलरुबा) दिया है। चण्डीगढ़ के हरकीरत सिंह ने और जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने केवल दूसरे प्रश्न का सही उत्तर दिया है। सभी पाँच प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात




मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के आज के अंक में हमने संगीत वाद्य परिचय श्रृंखला के आज के अंक में हमने एक लुप्तप्राय अवनद्ध वाद्य नक्कारा अथवा नगाड़ा के बारे में चर्चा की। अगले अंक में हम एक अप्रचलित तंत्रवाद्य पर चर्चा करेंगे। इस प्राचीन किन्तु कम प्रचलित वाद्य की बनावट, इसके गुण और इसकी वादन शैली हमारी चर्चा के केन्द्र में होगा। आप भी अपनी पसन्द के गीत-संगीत की फरमाइश हमे भेज सकते हैं। हमारी अगली श्रृंखलाओं के लिए आप किसी नए विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे एक नए अंक के साथ हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों की प्रतीक्षा करेंगे। 



प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

Sunday, July 28, 2013

उस्ताद विलायत खाँ से सुनिए राग शंकरा


  
स्वरगोष्ठी – 130 में आज

भूले-बिसरे संगीतकार की कालजयी कृति – 10

राग शंकरा पर आधारित एक अनूठा गीत

‘बेमुरव्वत बेवफा बेगाना-ए-दिल आप हैं...’


इन दिनों आप ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘भूले-बिसरे संगीतकार की कालजयी कृति’ का रसास्वादन कर रहे हैं। इस लघु श्रृंखला की दसवीं और समापन कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों की इस संगोष्ठी में उपस्थित हूँ और आपका हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला के अन्तर्गत अब तक हम आपको राग-आधारित कुछ ऐसे फिल्मी गीत सुनवा चुके हैं, जो छः दशक से भी पूर्व की अवधि के हैं। रागों के आधार के कारण ये आज भी सदाबहार गीत के रूप में हमारे बीच प्रतिष्ठित हैं। परन्तु इनके संगीतकार हमारी स्मृतियों में धूमिल हो गए हैं। इस श्रृंखला को प्रस्तुत करने का हमारा उद्देश्य यही है कि इन कालजयी, राग आधारित गीतों के माध्यम से हम उन भूले-बिसरे संगीतकारों को स्मरण करें। आज के अंक में हम आपको 1966 की फिल्म ‘सुशीला’ का राग शंकरा पर आधारित एक सदाबहार गीत सुनवाएँगे और इस गीत के संगीतकार सी. अर्जुन के बारे में आपको कुछ जानकारी देंगे। इसके साथ ही विश्वविख्यात सितार वादक उस्ताद विलायत खाँ का का बजाया राग शंकरा का एक आकर्षक गत भी सुनवाएँगे। 

सी. अर्जुन
र्ष 1966 में श्री विनायक चित्र द्वारा निर्मित और महेन्द्र प्राण द्वारा निर्देशित फिल्म ‘सुशीला’ प्रदर्शित हुई थी। मधुर गीतों के कारण यह फिल्म अत्यन्त सफल हुई थी। फिल्म के संगीतकार थे सी. अर्जुन, जिनकी प्रतिभा का उचित मूल्यांकन फिल्म संगीत के क्षेत्र में नहीं हुआ। 1 सितम्बर, 1933 को सिन्ध (वर्तमान पाकिस्तान) में जन्में सी. अर्जुन को संगीत अपने गायक पिता से विरासत में प्राप्त हुआ था। विभाजन के समय यह परिवार बड़ौदा आकर बस गया। सी. अर्जुन ने आरम्भ में कुछ समय तक रेलवे की नौकरी भी की, लेकिन संगीत के क्षेत्र में कुछ कर गुजरने के उद्देश्य से नौकरी छोड़ कर तत्कालीन बम्बई का रुख किया और यहाँ आकर संगीतकार बुलों सी. रानी के सहायक बन गए। उन दिनों गजलों के संगीत संयोजन में बुलों सी. रानी बड़े माहिर माने जाते थे। सी. अर्जुन ने गजल-संयोजन की कला उन्हीं से सीखी थी। स्वतंत्र संगीतकार के रूप में सी. अर्जुन की 1960 में प्रदर्शित प्रथम हिन्दी फिल्म ‘रोड नम्बर 303’ थी। इस फिल्म के गीत बेहद मोहक सिद्ध हुए। 1961 में प्रदर्शित फिल्म ‘मैं और मेरा भाई’ में सी. अर्जुन अपनी गजल-संयोजन की प्रतिभा को रेखांकित करने में सफल हुए।

मुबारक बेगम
इस फिल्म के गीतकार जाँनिसार अख्तर थे। गीतकार और संगीतकार की इस जोड़ी ने इसके बाद कई फिल्मों में आकर्षक और लोकप्रिय गज़लों से फिल्म संगीत को समृद्ध किया। फिल्म ‘मैं और मेरा भाई’ में जाँनिसार अख्तर की लिखी, आशा भोसले और मुकेश के स्वरों में गायी सदाबहार गजल- ‘मैं अभी गैर हूँ मुझको अभी अपना न कहो...’ ने सी. अर्जुन को अमर बना दिया। इस फिल्म के बाद उन्होने अपनी फिल्मों में स्तरीय गज़लों का सिलसिला जारी रखा। 1964 की फिल्म ‘पुनर्मिलन’ में- ‘पास बैठो तबीयत बहल जाएगी...’, 1965 की फिल्म ‘एक साल पहले’ में- ‘नज़र उठा कि ये रंगीं समाँ रहे न रहे...’ और 1966 में ‘चले हैं ससुराल’ जैसी कम बजट की फिल्म को भी उन्होने- ‘हमने तेरी वफ़ा का जफ़ा नाम रख दिया...’ जैसी लोकप्रिय गजल से सँवार कर अपनी प्रतिभा का रेखांकन किया। गज़लों के श्रेष्ठ संगीतकार के रूप में सी. अर्जुन की सबसे सफल और लोकप्रिय 1966 की ही फिल्म थी ‘सुशीला’। इस फिल्म में उन्हें एक बार फिर जाँनिसार अख्तर का साथ मिला। इस फिल्म के सभी गीतों को अपार ख्याति मिली। गायिका मुबारक बेगम की आवाज़ में फिल्म की एक गजल- ‘बेमुरव्वत बेवफा बेगाना-ए-दिल आप हैं...’ तो आज भी सदाबहार है। राग शंकरा पर आधारित यह गजल जाँनिसार अख्तर की शायरी और सी. अर्जुन के उत्कृष्ट संगीत के लिए सदा याद रखा जाएगा। लघु श्रृंखला ‘भूले-बिसरे संगीतकार की कालजयी कृति’ के आज के समापन अंक के लिए हमने राग शंकरा पर आधारित यही गीत चुना है। लीजिए, पहले आप यह गीत सुनिए।


राग शंकरा : फिल्म सुशीला : ‘बेमुरव्वत बेवफा बेगाना-ए-दिल आप हैं...’ : संगीत सी. अर्जुन 



उस्ताद विलायत खाँ
राग शंकरा भारतीय संगीत का एक गम्भीर प्रकृति का राग है। मयूर वीणा के सुविख्यात वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र के अनुसार, यह राग मानव की अन्तर्व्यथा को आध्यात्म से जोड़ने वाले भावों की अभिव्यक्ति के लिए समर्थ होता है। औड़व-षाड़व जाति के राग शंकरा के आरोह में ऋषभ और मध्यम तथा अवरोह में मध्यम स्वर का प्रयोग नहीं किया जाता। शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। उत्तरांग प्रधान इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी तार सप्तक का षडज स्वर होता है। रात्रि के दूसरे प्रहर में यह राग गाने-बजाने की परम्परा है। इस राग के स्वरूप के बारे में विद्वानो में कुछ मत-भिन्नता भी है। कुछ विद्वान इस राग को औड़व-औड़व जाति का मानते हैं, अर्थात आरोह और अवरोह, दोनों में ऋषभ और मध्यम स्वर का प्रयोग नहीं करते। एक अन्य मतानुसार केवल मध्यम स्वर ही वर्जित होता है। वर्तमान में राग शंकरा का औड़व-षाड़व जाति ही अधिक प्रचलित है। आइए, अब हम आपको तंत्रवाद्य सितार पर एक मोहक गत सुनवा रहे हैं। विश्वविख्यात सितार-वादक उस्ताद विलायत खाँ से सभी संगीत-प्रेमी परिचित हैं। राग शंकरा की तीनताल में निबद्ध यह रचना उन्हीं की कृति है। आप इस आकर्षक सितार-वादन की रसानुभूति कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग शंकरा : सितार पर तीनताल की गत : वादक उस्ताद विलायत खाँ 




आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 130वें अंक की पहेली में आज हम आपको सुषिर वाद्य पर एक रचना का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। इस अंक की समाप्ति तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – वाद्य संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह भारतीय संगीत की कौन सी विधा अथवा शैली है?

2 – संगीत के इस अंश में किन तालों का प्रयोग किया गया है?

आप अपने उत्तर केवल radioplaybackindia@live.com या swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 130वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा radioplaybackindia@live.com या swargoshthi@gmail.com पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ के 128वें अंक की पहेली में हमने आपको खयाल अंग में आलाप का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग मियाँ की मल्हार और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- पण्डित राजन और साजन मिश्र। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर लखनऊ के प्रकाश गोविन्द, जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी और जबलपुर की क्षिति तिवारी ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


झरोखा अगले अंक का

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘भूले-बिसरे संगीतकार की कालजयी कृति’ का यह समापन अंक था। आगामी अंक में हम आपसे भारतीय संगीत की एक ऐसी शैली पर चर्चा करेंगे जो उपशास्त्रीय संगीत और लोक संगीत के क्षेत्र में समान रूप से लोकप्रिय है। अगले अंक में इस नई लघु श्रृंखला की अगली कड़ी के साथ रविवार को प्रातः 9 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की प्रतीक्षा करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

Tuesday, December 7, 2010

वो न आयेंगें पलट के, उन्हें लाख हम बुलाएं....मुबारक बेगम की आवाज़ में चंद्रमुखी के जज़्बात

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 543/2010/243

'हिंदी सिनेमा के लौह स्तंभ' - 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की इस लघु शृंखला के तीसरे खण्ड में इन दिनों आप सुन रहे हैं बिमल रॊय निर्देशित फ़िल्मों के गीत और बिमल दा के फ़िल्मी यात्रा का विवरण। कल बात आकर रुकी थी 'परिणीता' में। १९५४ से अब बात को आगे बढ़ाते हैं। इस साल बिमल दा के निर्देशन में तीन फ़िल्में आईं - 'नौकरी', 'बिराज बहू' और 'बाप-बेटी'। 'नौकरी' 'दो बीघा ज़मीन' का ही शहरीकरण था। फ़िल्म में किशोर कुमार को नायक बनाया गया था, लेकिन यह फ़िल्म 'दो बीघा ज़मीन' जैसा कमाल नहीं दिखा सकी, हालाँकि "छोटा सा घर होगा बादलों की छाँव में" गीत ख़ूब लोकप्रिय हुआ। 'बिराज बहू' भी शरतचन्द्र की इसी नाम की उपन्यास पर बनी थी जिसका निर्माण किया था हितेन चौधरी ने। 'नौकरी' और 'बिराज बहू' में सलिल दा का संगीत था, लेकिन 'बाप-बेटी' में संगीत दिया रोशन ने। फिर आया साल १९५५ और एक बार फिर शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय की लोकप्रिय उपन्यास 'देवदास' पर बिमल रॊय ने फ़िल्म बनाई। १९३५ में प्रमथेश चन्द्र बरुआ ने पहली बार न्यु थिएटर्स में 'देवदास' का निर्माण किया था और उस समय बिमल दा उनके सहायक थे। इसके २० साल बाद, १९५५ में बिमल दा ने अपने तरीक़े से 'देवदास' को फ़िल्मी पर्दे पर उतारा। सहगल साहब की छवि देवदास की भूमिका में सब के दिल में बैठ चुकी थी। ऐसे में फिर से 'देवदास' बनाना ख़तरे से ख़ाली नहीं था। लेकिन बिमल दा ने यह रिस्क लिया और दिलीप कुमार को देवदास के रूप में उतारा। वैसे भी दिलीप साहब के अलावा किसी और की कल्पना उस वक़्त देवदास के रूप में नहीं की जा सकती थी। सबकी उम्मीदों पर खरा उतरकर दिलीप साहब को इस फ़िल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। सुचित्रा सेन और वैजयंतीमाला ने क्रम से पारो और चन्द्रमुखी की भूमिकाएँ निभाईं।

बिमल रॊय की शान में 'देवदास' के नायक दिलीप कुमार ने कहा है - "Nobody has ever mentioned that while shooting in the suburbs of Bombay – behind his own Mohan studio, in Andheri or other selected exteriors, Bimal Roy captured the very ethos of rural Bengal. He did not need to go there. To me it was an education to work with him. In my formative year it was important to work with a director who lead you gently under the skin of the character. Today we have institutions, they teach cinema, acting etc. We did not have these in our times. We had instead directors like Bimal Roy. Add to this my own application as an actor. Take making Devdas. The question often while doing my role was ‘not to do’ than do anything." फ़िल्म 'देवदास' के दो गीत हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर सुनवा चुके हैं - "जिसे तू क़ुबूल कर ले" और "आन मिलो श्याम सांवरे"। आज हम आपको सुनवा रहे हैं मुबारक़ बेगम की आवाज़ में "वो ना आएँगे पलटकर, उन्हें लाख हम बुलाएँ, मेरी हसरतों से यह कहदो मेरे ख़्वाब भूल जाए"। यह गीत मुबारक़ बेगम की सब से लोकप्रिय गीतों में से एक है, हालाँकि यह गीत भी मुबारक़ बेगम के कई फ़िल्मों के कईगीतों की तरह इस फ़िल्म में भी पूरा नहीं लिया गया। राग खमाज पर आधारित इस मुजरे में सारंगी का सुंदर इस्तेमाल सुनने को मिलता है। यकीनन इस गीत को चंद्रमुखी (वैजयंतीमाला) पर फ़िल्माया गया होगा। फ़िल्म 'देवदास' में बिमल दा ने अपने साथी सलिल चौधरी को ना लेकर संगीतकार के रूप में चुना सचिन देव बर्मन को और गीतकार के रूप में शैलेन्द्र की जगह ले ली साहिर लुधियानवी ने। तो लीजिए इस ख़ूबसूरत मुजरे को सुनिए मुबारक़ जी की मिट्टी की सौंधी सौंधी ख़ुशबूदार आवाज़ में।



क्या आप जानते हैं...
कि गायिका मुबारक़ बेगम को पढ़ना लिखना नहीं आता था, रेकॊर्डिंग् में उनकी बेटी उनके साथ जाती थी और गीत लिख लेती थी।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली ०४ /शृंखला ०५
गीत का इंटर ल्यूड सुनिए-


अतिरिक्त सूत्र - बिमल रॉय की एक और नायाब फिल्म.

सवाल १ - गायिका कौन हैं इस गीत की - १ अंक
सवाल २ - गीतकार बताएं - २ अंक
सवाल ३ - संगीतकार का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
श्याम कान्त जी ने एक बार फिर बढ़त बना ली है, रोमेंद्र जी सही कहा आपने, वाकई इस देवदास का जवाब नहीं...इंदु जी आप पर इल्जाम लगाएं....इतनी हिम्मत कहाँ हमने...और वैसे भी आप है ही इतनी प्यारी कि एक दिन भी न दिखें तो हमें कमी खलती है :)

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Wednesday, April 7, 2010

ये मूह और मसूर की दाल....मुहावरों ने छेड़ी दिल की बात और बना एक और फिमेल डूईट

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 397/2010/97

भाषा की सजावट के लिए पौराणिक समय से जो अलग अलग तरह के माध्यम चले आ रहे हैं, उनमें से एक बेहद लोकप्रिय माध्यम है मुहावरे। मुहावरों की खासियत यह होती है कि इन्हे बोलने के लिए साहित्यिक होने की या फिर शुद्ध भाषा बोलने की ज़रूरत नहीं पड़ती। ये मुहावरे पीढ़ी दर पीढ़ी ज़बानी आगे बढ़ती चली जाती है। क्या आप ने कभी ग़ौर किया है कि हिंदी फ़िल्मी गीतों में किसी मुहावरे का इस्तेमाल हुआ है या नहीं। हमें तो भई कम से कम एक ऐसा मुहवरा मिला है जो एक नहीं बल्कि दो दो गीतों में मुखड़े के तौर पर इस्तेमाल हुए हैं। इनमें से एक है लता मंगेशकर का गाया १९५७ की फ़िल्म 'बारिश' का गीत "ये मुंह और दाल मसूर की, ज़रा देखो तो सूरत हुज़ूर की"। और दूसरा गीत है फ़िल्म 'अराउंड दि वर्ल्ड' फ़िल्म का "ये मुंह और मसूर की दाल, वाह रे वाह मेरे बांके लाल, हुस्न जो देखा हाल बेहाल, वाह रे वाह मेरे बांके लाल"। जी हाँ, मुहावरा है 'ये मुंह और मसूर की दाल', और 'अराउंड दि वर्ल्ड' के इस गीत को गाया था जो गायिकाओं ने - शारदा और मुबारक़ बेग़म। आज 'सखी सहेली' शृंखला की सातवीं कड़ी में प्रस्तुत है इन्ही दो गायिकाओं की आवाज़ों में यह यादगार गीत। शैलेन्द्र का गीत, शंकर जयकिशन का संगीत। 'अराउंड दि वर्ल्ड' १९६७ की फ़िल्म थी जिसका निर्माण व निर्देशन पछी ने किया था और फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे राज कपूर, राजश्री और अमीता। मेरी थोड़ी बहुत हिंदी की जो जानकारी है, उसके अनुसार यह मुहावरा उस आदमी के लिए कहा जाना चाहिए जिसे कुछ हासिल हुआ है लेकिन जिसका वो लायक नहीं है। अगर मैं ग़लत हूँ तो इसका सुधार ज़रूर कीजिएगा और यह मुहावरा कैसे बना, उसके पीछे की कहानी भी लिखिएगा टिप्पणी में। हर मुहावरे के पीछे कोई ना कोई पौराणिक कहानी ज़रूर होती है और इस मुहावरे के पीछे भी यकीनन होगी।

पाश्चात्य शैली में स्वरबद्ध इस गीत के साथ शारदा की यादें जुड़ी हुईं हैं जो उन्होने विविध भारती पर हाल ही में 'उजाले उनकी यादों के' कार्यक्रम में व्यक्त किए थे।

प्र: कोई घटना या कोई गाना आपको याद आ रहा है जो बहुत दिलचस्प तरीके से बना था?

उ: "ये मुंह और मसूर की दाल"! ऐसे ही किसी ने बात करते करते कहा था कि ये मुंह और मसूर की दाल। शंकर साहब ने बोला कि इसको रखो मेरे लिए किसी गाने में, और तुरंत वह गाना ऐसे बन गया। और बहुत मशहूर हुआ था यह गाना।

प्र: वाह! तो शंकर जयकिशन का जो क्रीएटिव प्रोसेस है, किस तरह से वो काम करते थे और किस तरह से एक पूरा गाना कम्प्लीटे करते थे?

उ: इसके लिए तो एक किताब लिख सकते थे, क्योंकि मेरा तो लास्ट के कुछ दिन ही उनके साथ उठना बैठना रहा और I used to go to the studio 2-3 times a week। जब वो शाम को सिटिंग्‍ करते थे, शाम ४ से ८ बजे, तो वो फ़्लोर सिटिंग्‍ करते थे और हर दिन कुछ ना कुछ कॊम्पोज़िंग्‍ का काम चलता था। शैलेन्द्र जी और हसरत जी, दोनों बैठे रहते थे, कुछ ना कुछ मुखड़ा, शकर जी ट्युन बजाते थे, और वो मुखड़ा कह देते थे तो उसको बिठा देते थे। इस तरह से कॊम्पोज़िंग् का काम चलता था।


दोस्तों, शारदा ने शंकर जयकिशन के बारे में और भी बहुत सी बातें बताई थीं उस मुलाक़ात में जिन्हे हम धीरे धीरे 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में शामिल करते चलेंगे। लेकिन फिलहाल वक़्त हो चला है आज के गीत को सुनने का, सुनते हैं दो कमचर्चित गायिकाएँ, शारदा व मुबारक़ बेग़म की अनूठी आवाज़ों में यह सदाबहार गीत।



क्या आप जानते हैं...
कि कई जगहों पर यह सुनने व पढ़ने को मिलता है कि गायिका शारदा शंकर जयकिशन की खोज है, लेकिन हक़ीक़त यह है कि शारदा राज कपूर की खोज है। राज कपूर ने शारदा को तेहरान में पहली बार सुना था और उसी वक़्त उन्हे बम्बई आकर ऒडिशन देने का सुझाव दिया था।

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. फिल्म का शीर्षक भी इस गाने में आता है, गीतकार बताएं-३ अंक.
2. आशा भोसले का साथ इस जबरदस्त गाने में एक शानदार गायिका ने दिया है, नाम बताएं- २ अंक.
3. उस संगीतकार का नाम बताएं जिसने इस तदाकते फडकते गीत को रचा -२ अंक.
4. जीनत अमान इस फिल्म में एक अहम भूमिका में थी, फिल्म का नाम बताएं-२ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
इंदु जी ३ अंक, शरद जी, पदम जी और अनीता जी २-२ अंकों का इजाफा हुआ आपके भी स्कोर में, उम्मीद है अब आप शारदा जी के बारे में थोडा बहुत जाँ गयी होंगीं.

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Tuesday, February 9, 2010

कभी तन्हाईयों में यूं हमारी याद आएगी....मुबारक बेगम की दर्द भरी सदा

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 340/2010/40

फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर की कमचर्चित पार्श्वगायिकाओं को सलाम करते हुए आज हम आ पहुँचे हैं इस ख़ास शृंखला की अंतिम कड़ी पर। अब तक हमने इस शृंखला में क्रम से सुलोचना कदम, उमा देवी, मीना कपूर, सुधा मल्होत्रा, जगजीत कौर, कमल बारोट, मधुबाला ज़वेरी, मुनू पुरुषोत्तम और शारदा का ज़िक्र कर चुके हैं। आज बारी है उस गयिका की जिनके गाए सब से मशहूर गीत के मुखड़े को ही हमने इस शृंखला का नाम दिया है। जी हाँ, "कभी तन्हाइयों में युं हमारी याद आएगी" गीत की गयिका मुबारक़ बेग़म आज 'ओल्ड इस गोल्ड' की केन्द्रबिंदु हैं। मुबारक़ बेग़म के गाए फ़िल्म 'हमारी याद आएगी' के इस शीर्षक गीत को सुनते हुए जैसे महसूस होने लगता है इस गीत में छुपा हुआ दर्द। जिस अंदाज़ में मुबारक़ जी ने "याद आएगी" वाले हिस्से को गाया है, इसे सुनते हुए सचमुच ही किसी ख़ास बिछड़े हुए की याद आ ही जाती है और कलेजा जैसे कांप उठता है। इस गीत में, इसकी धुन में, इसकी गायकी में कुछ ऐसी शक्ति है कि सीधे आत्मा को कुछ देर के लिए जैसे अपनी ओर सम्मोहित कर लेती है और गीत ख़त्म होने के बाद ही हमारा होश वापस आता है। किदार शर्मा का लिखा हुआ यह गीत है जिसकी तर्ज़ बनाई है स्नेहल भाटकर ने। किदार शर्मा ने कई नए कलाकारों को समय समय पर मौका दिया है जिनमें शामिल हैं कई अभिनेता अभिनेत्री, संगीतकार, गायक और गायिकाएँ। 'हमारी याद आएगी' फ़िल्म जितना मुबारक़ बेग़म के लिए यादगार फ़िल्म है, उतनी ही यादगार साबित हुई संगीतकार स्नेहल भाटकर के लिए भी। स्नेहल भी एक कमचर्चित फ़नकार हैं। भविष्य में जब हम कमचर्चित संगीतकारों पर किसी शृंखला का आयोजन करेंगे तो स्नेहल भाटकर से सबंधित जानकारी आपको ज़रूर देंगे। आज करते हैं मुबारक़ बेग़म की बातें। लेकिन उससे पहले आपको बता दें कि आज हम इसी कालजयी गीत को सुनेंगे।

कई साल पहले मुबारक़ बेग़म विविध भारती पर तशरीफ़ लाई थीं और वरिष्ठ उद्‍घोषक कमल शर्मा ने उनसे मुलाक़ात की थी। उसी मुलाक़ात में मुबारक़ जी ने इस गीत के पीछे की कहानी का ज़िक्र किया था। पेश है उसी बातचीत का वह अंश। दोस्तों, आप सोचते होंगे कि मैं लगभग सभी आलेख में विविध भारती के कार्यक्रमों का ही ज़िक्र करता रहता हूँ। दरअसल बात ही ऐसी है कि उस गुज़रे ज़माने के कलाकारों से संबंधित सब सर्वाधिक सटीक जानकारी केवल विविध भारती के पास ही उपलब्ध है। फ़िल्म संगीत के इतिहास को आने वाली पीढ़ियों के लिए सहज कर रखने में विविध भारती के योगदान को अगर हम सिर्फ़ उल्लेखनीय कहें तो कम होगा। ख़ैर, आइए मुबारक़ बेग़म के उस इंटरव्यू को पढ़ा जाए।

प्र: यह गीत (कभी तन्हाइयों में युं) किदार शर्मा की फ़िल्म 'हमारी याद आएगी' का है, संगीतकार स्नेहल भाटकर।

उ: पहले पहले यह गीत रिकार्ड पर नहीं था। इस गीत के बस कुछ लाइनें बैकग्राउंड के लिए लिया गया था।

प्र: किदर शर्मा की और कौन कौन सी फ़िल्मों में आपने गीत गाए?

उ: 'शोख़ियाँ', 'फ़रीयाद'।

प्र: किदार शर्मा के लिए आप की पहली फ़िल्म कौन सी थी?

उ: 'शोख़ियाँ'। संगीत जमाल सेन का था। मैं जो बात बता रही थी कि "हमारी याद आएगी" गाना रिकार्ड पर नहीं था। इसे पार्ट्स मे बैकग्राउंड म्युज़िक के तौर पर फ़िल्म में इस्तेमाल किया जाना था। मुझे याद है बी. एन. शर्मा गीतकार थे, स्नेहल और किदार शर्मा बैठे हुए थे। रिकार्डिंग् के बाद किदार शर्मा ने मुझे ४ आने दिए। मैंने किदार शर्मा की तरफ़ देखा। उन्होने मुझसे उसे रखने को कहा और कहा कि यह 'गुड-लक' के लिए है। सच में वह मेरे लिए लकी साबित हुई।

प्र: आप बता रहीं थीं कि शुरु शुरु में यह गीत रिकार्ड पर नहीं था?

उ: हाँ, लेकिन बाद में उन लोगों को गीत इतना पसंद आया कि उन्होने सारे पार्ट्स जोड़कर गीत की शक्ल में रिकार्ड पर डालने का फ़ैसला किया। मैं अभी आपको बता नहीं सकती, लेकिन अगर आप गाना बजाओ तो मैं ज़रूर बता सकती हूँ कि कहाँ कहाँ गीत को जोड़ा गया है।

प्र: आपको यह पता था कि ऐसा हो रहा है?

उ: पहले मुझे मालूम नहीं था, लेकिन रिकार्ड रिलीज़ होने के बाद पता चला।

प्र: आपने अपना शेयर नहीं माँगा?

उ: दरअसल मैं तब बहुत नई थी, इसलिए मैंने अपना मुंह बंद ही रखा, वरना मुझे जो कुछ भी मिल रहा था वो भी बंद हो जाता। आगे भी कई बार ऐसे मौके हुए कि जब मुझसे कुछ कुछ लाइनें गवा ली गई और बाद में उन लोगों ने उसे एक गीत के शक्ल में रिकार्ड पर उतार दिया।


दोस्तों, इस अंश को पढ़कर आप समझ सकते हैं कि मुबारक़ बेग़म जैसी कमचर्चित गायिकाओं को किस किस तरह का संघर्ष करना पड़ता होगा! ये सब जानकर दिल उदास हो जाता है कि इतनी सुरीले कलाकारों को उन्हे अपना हिस्सा नहीं मिला जिसके वो हक़दार थे। 'आवाज़' की तरफ़ से हमारी ये छोटी सी कोशिश थी इन कमचर्चित गायिकाओं को याद करने की, आशा है आपको पसंद आई होगी। अपनी राय आप टिपण्णी के अलावा hindyugm@gmail.com के पते पर भी लिख भेज सकते हैं। आप से हमारा बस यही गुज़ारिश है कि इन कमचर्चित कलाकारों को कभी भुला ना दीजिएगा, अपनी दिल की वादियों में इन सुरीली आवाज़ों को हमेशा गूंजते रहने दीजिए, क्योंकि ये आवाज़ें आज भी बार बार हमसे यही कहती है कि कभी तन्हाइयों में युं हमारी याद आएगी।



चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम रोज आपको देंगें ४ पंक्तियाँ और हर पंक्ति में कोई एक शब्द होगा जो होगा आपका सूत्र. यानी कुल चार शब्द आपको मिलेंगें जो अगले गीत के किसी एक अंतरे में इस्तेमाल हुए होंगें, जो शब्द बोल्ड दिख रहे हैं वो आपके सूत्र हैं बाकी शब्द बची हुई पंक्तियों में से चुनकर आपने पहेली सुलझानी है, और बूझना है वो अगला गीत. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

नैनों में छुपे,
कुछ ख्वाब मिले,
मन झूम उठा,
कुछ कहा होगा, भूले ख्वाबों ने...

अतिरिक्त सूत्र- शुद्ध सोने से सजे गीतों की शृंखला में कल फिर गूंजेगी कुंदन लाल सहगल की आवाज़

पिछली पहेली का परिणाम-
बिलकुल सही शरद जी, एक अंक और आपके खाते में, एक गुजारिश है आपसे, आप अपने ऐसे शोस् जिनमे आपको ऐसे गजब के फनकारों की संगती मिली हो, उनके अनुभव अन्य श्रोताओं के साथ भी अवश्य बाँटें

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



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