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Wednesday, January 12, 2011

इसी को प्यार कहते हैं.. प्यार की परिभाषा जानने के लिए चलिए हम शरण लेते हैं हसरत जयपुरी और हुसैन बंधुओं की

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #१०८

ग़ज़लों की दुनिया में ग़ालिब का सानी कौन होगा! कोई नहीं! है ना? फिर आप उसे क्या कहेंगे जिसके एक शेर पर ग़ालिब ने अपना सारा का सारा दीवान लुटाने की बात कह दी थी.. "तुम मेरे पास होते हो गोया, जब कोई दूसरा नहीं होता।" इस शेर की कीमत आँकी नहीं जा सकती, क्योंकि इसे खरीदने वाला खुद बिकने को तैयार था। आपको पता न हो तो बता दूँ कि यह शेर उस्ताद मोमिन खाँ ’मोमिन’ का है। अब बात करते हैं उस शायर की, जिसने इस शेर पर अपना रंग डालकर एक रोमांटिक गाने में तब्दील कर दिया। न सिर्फ़ इसे तब्दील किया, बल्कि इस गाने में ऐसे शब्द डाले, जो उससे पहले उर्दू की किसी भी ग़ज़ल या नज़्म में नज़र नहीं आए थे - "शाह-ए-खुबां" (इस शब्द-युग्म का प्रयोग मैंने भी अपने एक गाने "हुस्न-ए-इलाही" में कर लिया है) एवं "जान-ए-जानाना"। दर-असल ये शायर ऐसे प्रयोगों के लिए "विख्यात"/"कुख्यात" थे। इनके गानों में ऐसे शब्द अमूमन हीं दिख जाते थे, जो या तो इनके हीं गढे होते थे या फिर न के बराबर प्रचलित। फिर भी इनके गानों की प्रसिद्धि कुछ कम न थी। इन्हें यूँ हीं "रोमांटिक गानों" का बादशाह नहीं कहा जाता। बस इनसे यही शिकायत रही थी कि ये नामी-गिरामी और किवदंती बन चुके शायरों के शेरों को तोड़-मरोड़कर अपने गानों में डालते थे (जैसा कि इन्होंने "मोमिन" के शेर के साथ किया), जबकि दूसरे गीतकार उन शेरों को जस-का-तस गानों में रखते थे/हैं और इस तरह से उन शायरों को श्रद्धांजलि देते थे/हैं। मेरे हिसाब से "गुलज़ार" ने सबसे ज्यादा अपने गानों में "ग़ालिब", "मीर", "जिगर" एवं "बुल्ले शाह" की रचनाओं का इस्तेमाल किया है, लेकिन उन शायरों के लिखे एक भी हर्फ़ में हेर-फेर नहीं किया, इसलिए कोई भी सुधि श्रोता/पाठक इनसे नाराज़ नहीं होता। हमारे आज के शायर ने यही एक गलती कर दी है... इसलिए मुमकिन है कि जब भी ऐसी कोई बात उठेगी तो ऊँगली इनकी तरफ़ खुद-ब-खुद हीं उठ जाएगी। खैर छोड़िये... हम भी कहाँ आ गए! हमें तो अपने इस रोमांटिक शायर से बहुत कुछ सुनना है, बहुत कुछ सीखना है और इनके बारे में बहुत कुछ जानना भी है।

बहुत देर से हम "इस" और "ये" के माया-जाल में फँसे थे, तो इस जाल से बाहर निकलते हुए, हम यह बता दें कि जिनकी बात यहाँ की जा रही है, वे और कोई नहीं राज कपूर साहब के चहेते जनाब "हसरत जयपुरी" हैं। ये क्या थे.... चलिए यह जानने के लिए हम कुछ चिट्ठों को खंगाल मारते हैं (साभार: लाईव हिन्दुस्तान, सुरयात्रा, पत्रिका, ड्रीम्स एवं कविताकोश)

१५ अप्रैल, १९१८ को जन्मे हसरत जयपुरी का मूल नाम इकबाल हुसैन था। उन्होंने जयपुर में प्रारंभिक शिक्षा हासिल करने के बाद अपने दादा फिदा हुसैन से उर्दू और फारसी की तालीम हासिल की। बीस वर्ष का होने तक उनका झुकाव शेरो-शायरी की तरफ होने लगा और वह छोटी-छोटी कविताएं लिखने लगे। वर्ष १९४० मे नौकरी की तलाश में हसरत जयपुरी ने मुंबई का रुख किया और आजीविका चलाने के लिए वहां बस कंडक्टर के रुप में नौकरी करने लगे। इस काम के लिए उन्हे मात्र ११ रुपये प्रति माह वेतन मिला करता था। इस बीच उन्होंने मुशायरा के कार्यक्रम में भाग लेना शुरू किया। ऐसे हीं एक मुशायरे मे उन्होंने मजदूरों के बीच अपनी कविता "मजदूर की लाश" पढ़ी, जिसे पृथ्वीराज कपूर ने भी सुना। उनकी काबिलियत से प्रभावित होकर वे उन्हें पृथ्वी थिएटर ले आए और राज कपूर से मिलने की सलाह दी। राज कपूर ने उनकी कविता "मैं बाजारों की नटखट रानी" सुनकर अपनी दूसरी फिल्म "बरसात" के गीत लिखने का ऑफर दे दिया। १५० रूपए माहवार पर उनकी नौकरी पक्की हो गई। इसे महज एक संयोग ही कहा जायेगा कि फिल्म बरसात से ही संगीतकार शंकर जयकिशन ने भी अपने सिने कैरियर की शुरूआत की थी।

राजकपूर के कहने पर शंकर जयकिशन ने हसरत जयपुरी को एक धुन सुनाई और उसपर उनसे गीत लिखने को कहा। धुन के बोल कुछ इस प्रकार थे- "अंबुआ का पेड़ है वहीं मुंडेर है आजा मेरे बालमा काहे की देर है" शंकर जयकिशन की इस धुन को सुनकर हसरत जयपुरी ने गीत लिखा "जिया बेकरार है छाई बहार है आजा मेरे बालमा तेरा इंतजार है"। वर्ष १९४९ में प्रदर्शित फिल्म बरसात में अपने इस गीम की कामयाबी के बाद हसरत जयपुरी रातोंरात बतौर गीतकार अपनी पहचान बनाने में सफल हो गए। इस फिल्म की कामयाबी के बाद राजकपूर, हसरत जयपुरी और शंकर जयकिशन की जोड़ी ने कई फिल्मों मे एक साथ काम किया। इनमें आवारा, श्री 420, चोरी चोरी, अनाड़ी, जिस देश में गंगा बहती है, संगम, तीसरी कसम, दीवाना, एराउंड द वर्ल्ड, मेरा नाम जोकर, कल आज और कल जैसी फिल्में शामिल है। यह जोड़ी १९७१ तक अनेक फिल्मो में साथ काम करती रही, "मेरा नाम जोकर " के फेल होने और जयकिशन के निधन होने के बाद राज कपूर ने इस टीम को छोड़ दिया और अपनी नयी टीम आनंद बक्षी - लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के साथ बना ली, लेकिन अपनी फ़िल्म "राम तेरी गंगा मैली" में हसरत को वापस ले आये, जहाँ हसरत ने "सुन साहिबा सुन" लिखा, लेकिन राज कपूर की मौत के बाद हसरत का फिल्मी सफ़र थम सा गया था, फिर भी वे कुछ संगीतकारों के साथ काम करते रहे।

हसरत जयपुरी को दो बार फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। उन्हें पहला फिल्म फेयर पुरस्कार वर्ष १९६६ में फिल्म सूरज के गीत बहारों फूल बरसाओ मेरा महबूब आया है के लिए दिया गया। वर्ष १९७१ मे फिल्म अंदाज में जिंदगी एक सफर है सुहाना गीत के लिए भी वह सर्वश्रेष्ठ गीतकार के फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किए गए। हसरत जयपुरी वर्ल्ड यूनिवर्सिटी टेबुल के डाक्ट्रेट अवार्ड और उर्दू कान्फ्रेंस में जोश मलीहाबादी अवार्ड से भी सम्मानित किए गए। फिल्म मेरे हुजूर में हिन्दी और ब्रज भाषा में रचित गीत झनक झनक तोरी बाजे पायलिया के लिए वह अम्बेडकर अवार्ड से सम्मानित किए गए।

अपने गीतों से कई वर्षों तक श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करने वाला यह शायर और गीतकार १७ सिंतबर, १९९९ को संगीतप्रेमियों को रोता और तनहा छोड़कर चला गया।

इन जानकारियों के बाद आज की नज़्म की ओर रुख करें.. उससे पहले बड़ी हीं मज़ेदार बात आपसे बाँटने का जी कर रहा है। २८ जुलाई, २००९ को सुजॉय जी ने अपने "ओल्ड इज गोल्ड" पर हमें एक गीत सुनाया था "ये मेरा प्रेम-पत्र पढकर" और उस आलेख में लिखा था कि "हसरत साहब ने इस गीत में अपने आप को इस क़दर डूबो दिया है कि सुनकर ऐसा लगता है कि उन्होने इसे अपनी महबूबा के लिए ही लिखा हो! इससे बेहतर प्रेम-पत्र शायद ही किसी ने आज तक लिखा होगा!" और इतना कहते-कहते सुजॉय जी रूक गए थे। तो दर-असल बात ये है कि "हसरत" साहब ने यह गीत अपने महबूबा के लिए हीं लिखा था। यह रही पूरी कहानी: लगभग बीस साल की उम्र में उनका राधा नाम की हिन्दू लड़की से प्रेम हो गया था, लेकिन उन्होंने अपने प्यार का इजहार नहीं किया। उन्होंने पत्र के माध्यम से अपने प्यार का इजहार करना चाहा, लेकिन उसे देने की हिम्मत वह नहीं जुटा पाए। वह लड़की उनकी प्रेरणा बन गई और उसी को कल्पना बनाकर वे जीवनभर शायरी करते रहे। बाद में राजकपूर ने उस पत्र में लिखी कविता 'ये मेरा प्रेम पत्र पढ़कर तुम नाराज ना होना...' का इस्तेमाल अपनी फिल्म संगम के लिए किया। नाकाम एकतरफ़ा प्रेम क्या-क्या न करवा देता है.. कोई हम जैसों से पूछे!! चलिए इसी बहाने एक शायर तो मिला हमें!

हमने एक बार जब "मुहम्मद हुसैन" और "अहमद हुसैन" यानि कि "हुसैन बंधुओं" की ग़ज़ल आप सबको सुनवाई थी तो लिखा था कि इनका हसरत जयपुरी से बड़ा हीं गहरा नाता है। आज उसी नाते के कारण हम आज की यह नज़्म लेकर आप सबके सामने हाज़िर हुए हैं। "हुसैन बंधुओं" ने इस "रोमांटिक"-से नज़्म को किस कशिश से गाया है, इसका अंदाजा बिना सुने नहीं लगाया जा सकता। इसलिए आईये हम और आप डूब जाते हैं "प्यार के इस सागर" में और जानते हैं कि "प्यार कहते किसे हैं":

नज़र मुझसे मिलाती हो तो तुम शरमा-सी जाती हो
इसी को प्यार कहते हैं, इसी को प्यार कहते हैं।

जबाँ ख़ामोश है लेकिन निग़ाहें बात करती हैं
अदाएँ लाख भी रोको अदाएँ बात करती हैं।
नज़र नीची किए दाँतों में ____ को दबाती हो।
इसी को प्यार कहते हैं, इसी को प्यार कहते हैं।

छुपाने से मेरी जानम कहीं क्या प्यार छुपता है
ये ऐसा मुश्क है ख़ुशबू हमेशा देता रहता है।
तुम तो सब जानती हो फिर भी क्यों मुझको सताती हो?
इसी को प्यार कहते हैं, इसी को प्यार कहते हैं।

तुम्हारे प्यार का ऐसे हमें इज़हार मिलता है
हमारा नाम सुनते ही तुम्हारा रंग खिलता है
और फिर साज़-ए-दिल पे तुम हमारे गीत गाती हो।
इसी को प्यार कहते हैं, इसी को प्यार कहते हैं।

तुम्हारे घर में जब आऊँ तो छुप जाती हो परदे में
मुझे जब देख ना पाओ तो घबराती हो परदे में
ख़ुद ही चिलमन उठा कर फिर इशारों से बुलाती हो।
इसी को प्यार कहते हैं, इसी को प्यार कहते हैं।




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल/नज़्म हमने पेश की है, उसके एक शेर/उसकी एक पंक्ति में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल/नज़्म को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "मोह-जाल" और मिसरे कुछ यूँ थे-

वर्त्तमान के मोह-जाल में,
आने वाला कल न भुलाएँ।

इस शब्द पर ये सारे शेर/रूबाईयाँ/नज़्म महफ़िल में कहे गए:

निश्छल, निष्कपट भावना हो
स्नेह से हो हर मन सुरभित
उलझे ना कोई भी मोहजाल में
उल्लास से हो हर मन कुंजित - शन्नो जी

जान लिखकर लगा दिए चार चाँद ,
सृजन कराता लिखने का मोह जाल . - मंजु जी

मोह-जाल का जाल न मोह सके
जीवन को सच का प्राण मिले - अवनींद्र जी

शुभ रेखांकित सप्त पदी से,
सरस नेत्र ने थामी अंगुल,
लिये हाथ में हाथ सदी से,
नव निर्मित बादामी अंगुल.
किंचित सरस नेत्र शरमाया,
मधुर मोह जाल यह पाया,
अधर पहन कर अधरों पर,
भरती लजीली हामी अंगुल
. - पूजा जी (पूरी कविता हीं पेश कर रहा हूँ क्योंकि मुझे यह रचना बेहद पसंद आई.. पूजा जी, आपने सारी शिकायतें पल में हीं दूर कर दीं)

पिछली महफ़िल की शान बनीं "शन्नो जी"। आपने "मोह-जाल" पर इतनी सारी पंक्तियाँ पेश कीं कि हम भी आपके मोह-जाल में फँस गए। अपना यह प्यार ऐसे हीं बनाए रखियेगा। शन्नो जी के बाद महफ़िल का हिस्सा बने अवध जी। हाँ, मोह-जाल शब्द थोड़ा अलग तरह का है, इसलिए इस पर शेर या दोहा लिखना आसान नहीं, लेकिन यह क्या, आप दुबारा आने का वादा करके मुकर गए, आए हीं नहीं.. ऐसे नहीं चलेगा :) इसकी सज़ा यह है कि आप आज की महफ़िल के कम से कम चार चक्कार लगाएँ। सही है ना? अगली बारी थी मंजु जी की। मंजु जी ने छुट्टियाँ का मोह-जाल समेटे हुए नए वर्ष में कदम रखा और हमें भी नए वर्ष की बधाईयाँ दी। आपका स्वागत है! नीलम जी, हम आपकी भी पंक्तियाँ इस महफ़िल में शामिल करते, लेकिन आपसे एक गलती हो गई। आपने "मोह-जाल" को एक शब्द की तरह नहीं रखा, बल्कि इसे "मोह का कोई जाल" बना दिया। आगे से ध्यान रखियेगा। पिछली महफ़िल में जिन दो फ़नकारों ने चार चाँद लगाए, वे हैं "अवनींद्र" जी एवं "पूजा" जी। मैं चाहता तो था कि अवनींद्र जी की भी कविता अपनी टिप्पणी में डालूँ, लेकिन वह बहुत बड़ी है, इसलिए उनका बस "ज़िक्र" हीं कर पा रहा हूँ, जहाँ तक पूजा जी की बात है तो आपने हमारा दिल जीत लिया। और क्या कहूँ! :)

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Wednesday, October 20, 2010

लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में.. मादर-ए-वतन से दूर होने के ज़फ़र के दर्द को हबीब की आवाज़ ने कुछ यूँ उभारा

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #१०१

पूरे एक महीने की छुट्टी के बाद मैं वापस आ गया हूँ महफ़िल-ए-ग़ज़ल की अगली कड़ी लेकर। यह छुट्टी वैसे तो एक हफ़्ते की हीं होनी थी, लेकिन कुछ ज्यादा हीं लंबी खींच गई। दर-असल मेरे साथ वही हुआ जो इन महाशय के साथ हुआ था जिन्होंने "कल करे सो आज कर" का नवीनीकरण किया है कुछ इस तरह से:

आज करे सो कल कर, कल करे सो परसो,
इतनी जल्दी क्या है भाई, जीना है अभी बरसों।

तो आप समझ गए ना? हर बुधवार को मैं यही सोचता था कि भाई पूरे सौ अंकों के बाद जाकर मुझे आराम करने का यह मौका नसीब हुआ है, तो इसे ज़ाया क्यों गंवाया जाए, चलो आज भी महफ़िल से नदारद हो लेता हूँ। यही सोचते-सोचते ४ हफ़्ते निकल गए। फिर जब इस बार बुधवार नजदीक आया तो विश्राम करने के विचार के साथ-साथ अपराध-बोध भी अपना सर उठाने लगा। अपराधबोध का मंतव्य था कि भाई तुमने तो सभी पाठकों से यह वादा किया था कि एक हफ़्ते में वापस आ जाओगे, फिर ये वादाखिलाफ़ी क्यों? अपराधबोध कम होता, अगर मेरे सामने सुजॉय जी का उदाहरण न होता। एक मैं हूँ जो सप्ताह में एक आलेख लिखता हूँ और अभी तक उन आलेखों की संख्या १०० तक हीं पहुँची है और एक ये हुज़ूर हैं जो हरदिन लिखते हैं और अभी तक ५०० कड़ियाँ लिख चुके हैं, फिर भी अगर इन्हें छुट्टी पर घर जाना होता है तो पहले से हीं उतने आलेख लिखकर सजीव जी को थमा जाते हैं, ताकि "ओल्ड इज गोल्ड" सटीक समय पर हर दिन आए, ताकि नियम की अवहेलना न हो पाए। ये तो कभी आराम नहीं करते, फिर मैं क्यों आराम के पीछे भाग रहा हूँ। चाचा नेहरू भी कह गए हैं कि आराम हराम है। इस अपराधबोध का आना था कि मैने विश्राम करने के प्रबलतम विचार को एक एंड़ी मारी और बढ निकला आज की कड़ी की ओर। तो चलिए आज से आपकी महफ़िल-ए-ग़ज़ल फिर से सजने वाली है.. हर बुधवार, बिना रूके...वैसे हीं मज़ेदार अंदाज़ में।

आज की महफ़िल में हम जो ग़ज़ल लेकर हाज़िर हैं, उस ग़ज़ल का ज़िक्र हमने आज से पूरे ९ महीने पहले "गजरा बना के ले आ... एक मखमली नज़्म के बहाने अफ़शां और हबीब की जुगलबंदी" शीर्षक से प्रकाशित आलेख में किया था। "गजरा बना के.." को जिस गुलुकार ने अपनी आवाज़ से मुकम्मल किया था, वही गुलुकार, वही फ़नकार आज की ग़ज़ल में अपनी आवाज़ के जरिये मौजूद है। बस फ़र्क इतना है कि उस ग़ज़ल/नज़्म के ग़ज़लगो और आज के ग़ज़लगो दो मुक्तलिफ़ इंसान हैं। उस कड़ी में हमने कहा तो यह था कि हबीब साहब जल्द हीं ग़ालिब की एक ग़ज़ल के साथ हाज़िर हो रहे हैं.. लेकिन सच ये है कि हम जिस ग़ज़ल की बात कर रहे थे, वह ग़ालिब की नहीं है, बल्कि मुगलिया सल्तनत के अंतिम बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र की है। हमने जल्दबाजी में ज़फ़र की ग़ज़ल ग़ालिब के हवाले कर दी थी.. हम उस गलती के लिए आपसे अभी माफ़ी माँगते हैं।

ये तो सभी जानते हैं कि १८५७ के गदर के वक़्त ज़फ़र ने अपने किले बागियों के लिए खोल दिए थे। इस गुस्ताखी की उन्हें यह सज़ा मिली की उनके दो बेटों और एक पोते को मौत के घाट उतार दिया गया.. बहादुर शाह जफर ने हुमायूं के मकबरे में शरण ली, लेकिन मेजर हडस ने उन्हें उनके बेटे मिर्जा मुगल और खिजर सुल्तान व पोते अबू बकर के साथ पकड़ लिया। अंग्रेजों ने जुल्म की सभी हदें पार कर दीं। जब बहादुर शाह जफर को भूख लगी तो अंग्रेज उनके सामने थाली में परोसकर उनके बेटों के सिर ले आए। ८२ साल के उस बूढे पर उस वक़्त क्या गुजरी होगी, इसका अंदाजा लगाना भी नामुमकिन है। क्या ये कम था कि अंग्रेजों ने ज़फ़र को कैद करके दिल्ली से बाहर .. दिल्ली हीं नहीं उनकी सरज़मीं हिन्दुस्तान के बाहर बर्मा(आज का मयन्मार) भेज दिया.. कालापानी के तौर पर। ज़फ़र अपनी मौत के अंतिम दिन तक अपनी सरज़मों को वापस आने के लिए तड़पते रहे। उन्हें अपनी मौत का कोई गिला न था, उन्हें गिला..उन्हें अफसोस तो इस बात का था कि मरने के बाद जो मिट्टी उनके सीने पर डाली जायगी, वह मिट्टी पराई होगी। वे अपने कू-ए-यार में, अपने मादर-ए-वतन की गोद में दफ़न होना चाहते थे, लेकिन ऐसा न हुआ। बर्मा की गुमनाम गलियों में घुट-घुटकर मरने के बाद उन्हीं अजनबी पौधों और परिंदों के बीच सुपूर्द-ए-खाक होना उनके नसीब में था। ७ नवंबर १८६२ को उनकी मौत के बाद उन्हें वहीं रंगून (आज का यंगुन) में श्वेडागोन पैगोडा के नजदीक दफ़ना दिया गया। वह जगह बहादुर शाह ज़फ़र दरगाह के नाम से आज भी प्रसिद्ध है। शायद ज़फ़र को अपनी मौत का पूर्वाभास हो चुका था, तभी तो इस ग़ज़ल के एक-एक हर्फ़ में उनका दर्द मुखर होकर हमारे सामने आता है:

लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में
किस की बनी है आलम-ए-नापायेदार में

कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें
इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दाग़दार में

उम्र-ए-दराज़ माँग कर लाये थे चार दिन
दो _____ में कट गये दो इन्तज़ार में

कितना है बदनसीब "ज़फ़र" दफ़्न के लिये
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में


यह ग़ज़ल पढने वक़्त जितना असर करती है, उससे हज़ार गुणा असर तब होता है, जब इसे हबीब वली मोहम्मद की आवाज़ में सुना जाए। तो लीजिए पेश है हबीब साहब की यह पेशकश:


हाँ तो बात ज़फ़र की हो रही थी, तो आज भी हमारे हिन्दुस्तान में ऐसे कई सारे मुहिम चल रहे हैं, जिनके माध्यम से ज़फ़र की आखिरी मिट्टी, ज़फ़र के कब्र को हिन्दुस्तान लाए जाने के लिए सरकार पर दबाव डाला जा रहा है। हम भी यही दुआ करते हैं कि सरकार जगे और उसे इस बात का बोध हो कि स्वतंत्रता-सेनानियों के साथ किस तरह का व्यवहार किया जाना चाहिए। आज़ादी की लड़ाई में आगे रहने वाले धुरंधरों और रणबांकुरों को इस तरह से नज़र-अंदाज़ किया जाना सही नहीं।

ज़फ़र उस वक़्त के शायर हैं जब ग़ालिब, ज़ौक़ और मोमिन जैसे शायर अपनी काबिलियत से सबके बीच लोहा मनवा रहे थे। ऐसे में भी ज़फ़र ने अपनी खासी पहचान बनाने में कामयाबी हासिल की। (और क्यों न करते, जब ये तीनों शायर इन्हीं के राज-दरबार में बैठकर अपनी शायरी सुनाया करते थे.. जब ज़ौक़ ज़फ़र के उस्ताद थे और ज़ौक़ की असमय मौत के बाद ग़ालिब ज़फ़र के साहबजादे के उस्ताद बने) ज़फ़र किस हद तक शेर कह जाते थे, यह जानने के लिए उनकी इस ग़ज़ल पर नज़र दौड़ाना जरूरी हो जाता है:

या मुझे अफ़सर-ए-शाहा न बनाया होता
या मेरा ताज गदाया न बनाया होता

ख़ाकसारी के लिये गरचे बनाया था मुझे
काश ख़ाक-ए-दर-ए-जानाँ न बनाया होता

नशा-ए-इश्क़ का गर ज़र्फ़ दिया था मुझ को
उम्र का तंग न पैमाना बनाया होता

अपना दीवाना बनाया मुझे होता तूने
क्यों ख़िरद्मन्द बनाया न बनाया होता

शोला-ए-हुस्न चमन् में न दिखाया उस ने
वरना बुलबुल को भी परवाना बनाया होता

रोज़-ए-ममूरा-ए-दुनिया में ख़राबी है 'ज़फ़र'
ऐसी बस्ती से तो वीराना बनाया होता


चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "अनमोल" और शेर कुछ यूँ था-

याद थे मुझको जो पैगाम-ए-जुबानी की तरह,
मुझको प्यारे थे जो अनमोल निशानी की तरह

इस शब्द पर ये सारे शेर महफ़िल में कहे गए:

रिश्तों के पुल
मिलाते रहे
स्वार्थ के तटों को
और
अनमोल भावना की
नदी
बहती रही
नीचे से होकर
अछूती सी !! (अवनींद्र जी)

आँसू आँखों में छिपे होते हैं गम दिखाये नहीं जाते
बड़े अनमोल होते हैं वो लोग जो भुलाये नहीं जाते. (शन्नो जी)

ग़ज़ल की महफ़िल का अनमोल तोहफा तुमने दिया
बधाई हो सौवां अंक जो तुमने पूरा किया (नीलम जी)

अनमोल शतक की दे रही बधाई ,
'विश्व 'ने खुशियों की शहनाई बजाई . (मंजु जी)

बेशक हो मुश्किल भरी वो डगर,
मगर था 'अनमोल' ग़ज़ल का सफर (अवध जी)

जब तक बिके ना थे कोई पूछता ना था,
तूने मुझे खरीद कर अनमोल कर दिया। (अनाम)

चूँकि पिछली महफ़िल में हमने शतक पूरा किया था, इसलिए हमारे सभी शुभचिंतकों और मित्रों से हमें शुभकामनाएँ प्राप्त हुईं। हम आप सभी का तह-ए-दिल से शुक्रिया अदा करते हैं। पिछली महफ़िल में सबसे पहले शन्नो जी का आना हुआ और आपने हमें हमारी भूल (शब्द गायब न करना) से अवगत कराया। शिकायत करने में काहे की मुश्किल.. आगे से ऐसे कभी भी किंकर्तव्यविमूढ न होईयेगा। समझीं ना? :) आपके बाद सजीव जी ने हमें बधाईयाँ दीं। सजीव जी, सब कुछ तो आपके कारण हीं संभव हो सका है। आपसे प्रोत्साहन पाकर हीं तो मैं महफ़िल-ए-ग़ज़ल की दूसरी पारी लेकर हाज़िर हो पाया हूँ। अवनींद्र जी, आपने महफ़िल की पहली नज़्म कही, लेकिन चूँकि शब्द गायब करने में मुझसे देर हो गई थी, इसलिए "शान-ए-महफ़िल" की पदवी मैं आपको दे नहीं पाऊँगा.. मुझे मुआफ़ कीजिएगा। नीलम जी, आपके बधाई-पत्र की अंतिम पंक्ति (अब क्यों कोई करे कोई शिकवा न गिला) मैं समझ नहीं पाया, ज़रा प्रकाश डालियेगा। :) सुजॉय जी, आप मुझे यूँ लज्जित न कीजिए। आप ५०० एपिसोड तक पहुँच चुके हैं और जिस तरह की आप जानकारियाँ देते हैं, वह अंतर्जाल पर कहीं नहीं है, इसलिए आपका यह कहना कि फिल्मी गानों के बारे में जानकारी लाना आसान होता है.. आपकी बड़प्पन का परिचय देता है। पूजा जी, आपने कुछ दिन विश्राम करने को कहा था और मैंने महिने भर विश्राम कर लिया। आप नाराज़ तो नहीं हैं ना? :) चलिए अब आप फिर से नियमित हो जाईये, क्योंकि मैं भी नियमित होने जा रहा हूँ। मंजु जी और अवध जी, आपके "अनमोल" शब्द मेरी सर-आँखों पर.. प्रतीक जी, क्षमा कीजिएगा मैंने आपकी आग्रह के बावजूद महफ़िल को महिने भर का विराम दे दिया, आगे से ऐसा न होगा। :) सुमित भाई, महफ़िल आ गई फिर से, अब आप भी आ जाईये..

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Thursday, October 16, 2008

कोशिश जब तेरी हद से गुज़र जायेगी...मंजिल ख़ुद ब ख़ुद तेरे पास चली आएगी

पिछले लगभग एक हफ्ते से हम आपको सुनवा रहे हैं एक ऐसे गायक को जिसने अपनी खनकती आवाज़ में संगीतमय श्रद्धाजंली प्रस्तुत की अजीम ओ उस्ताद शायरों को,जिसे आप सब ने सुना और बेहद सराहा भी. ,

लीजिये आज हम आपके रूबरू लेकर आये हैं उसी जबरदस्त फनकार को जिसकी आवाज़ में सोज़ भी है और साज़ भी और जिसका है सबसे मुक्तलिफ़ अंदाज़ भी. आवाज़ की खोजी टीम निरंतर नई और पुरकशिश आवाजों की तलाश में जुटी है, और हमें बेहद खुशी और फक्र है की हम कुछ नायाब आवाजों को आपके समक्ष लाने में सफल रहे हैं. आवाज़ की टीम आज गर्व के साथ पेश कर रही है गायन और संगीत की दुनिया का एक बेहद चमकता सितारा - शिशिर पारखी. इससे पहले कि हम शिशिर जी से मुखातिब हों आईये जान लें उनका एक संक्षिप्त परिचय.

एक संगीतमय परिवार में जन्में शिशिर को संगीत जैसे विरासत में मिला था. उनकी माँ श्रीमती प्रतिमा पारखी संगीत विशारद और बेहद मशहूर संगीत अध्यापिका होने के साथ साथ पिछले ३५ वर्षों से आल इंडिया रेडियो की ग्रेडड आर्टिस्ट भी हैं. स्वर्गीय पिता श्री शरद पारखी बोकारों के SAIL प्लांट में चीफ आर्किटेक्ट होने के साथ साथ एक बेहतरीन संगीतकार और संगीत प्रेमी थे, दोनों ने ही बचपन से शिशिर को संगीत सीखने के लिए प्रेरित किया जिसका परिणाम ये हुआ कि मात्र ६ साल की उम्र में उन्होंने गायन और तबला सीखना शुरू किया, स्कूल प्रतियोगिताओं में रंग ज़माने के बाद उन्हें अंतर्राष्ट्रीय बाल वर्ष के दौरान आल इंडिया रेडियो पर गाने के लिए आमंत्रित किया गया, १५ वर्ष की आयु में उन्होंने अपना पहला स्टेज परफॉर्मेंस (solo ghazal concert) पेश किया. आज वो ख़ुद भी दूरदर्शन और AIR के ग्रेडड आर्टिस्ट हैं और बहुत बार आपने इन्हे दूरदर्शन पर अपनी आवाज़ का जादू बिखेरते हुए देखा भी होगा, अगर नही तो कुछ क्लिपिंग यहाँ से आप देख सकते हैं -

http://in.youtube.com/user/ghazalsingershishir



चाहे वो ग़ज़ल हो, या फ़िर भजन, सुगम संगीत हो या फ़िर हिन्दी फिल्मी गीत, शास्त्रीय गायन हो या फ़िर क्षेत्रीय लोक गीत, शिशिर की महारत गायन की हर विधा में आपको मिलेगी. आज उनके खाते में २००० से भी अधिक लाइव शो दर्ज हैं, विभिन्न विधाओं में उनकी लगभग १०० के आस पास कासेस्ट्स, ऑडियो CDS और VCDs टी सीरीज़ और वीनस बाज़ार में ला चुकी है. "एहतराम" उनकी सबसे ताज़ी और अब तक कि सबसे दमदार प्रस्तुति है जिसकी पीछे बहुत उनकी पूरी टीम ने बहुत मेहनत से काम किया है, यह एक कोशिश है उर्दू अदब के अजीम शायरों को एक tribute देने की, इन ग़ज़लों को आप आवाज़ पर सुन ही चुके हैं. इस खूबसूरत से संकलन से यदि आप अपने सगीत संग्रहालय को और समृद्ध बनाना चाहते हैं तो इस लिंक पर जाकर इस ACD को हमेशा के लिए अपना बना सकते हैं -

http://webstore.tseries.com/product_details.php?type=acd&pid=1985

आवाज़ के लिए विश्व दीपक "तन्हा" ने की शिशिर जी से एक खास मुलाकात, पेश है उसी बातचीत के अंश -

शिशिर जी आपके लगभग १०० से ज्यादा कैसेट्स रीलिज हो चुके हैं। संगीत की दुनिया में आप अपने आप को कहाँ पाते हैं?

संगीत एक महासागर है.इसकी गहराई और विशालता में कौन कहाँ है ये समझ पाना नामुमकिन है.
बस यही कह सकता हूँ .....

अपनी ऊँचाइओं का ज़िक्र मैं क्या करूँ
सामने हूँ मैं, और ऊपर आस्मां है

हालाँकि संगीत के भरोसे अपनी उपजीविका अर्जन करना साधना है, उपासना है, तपस्या है .... मेरी हर एक कैसेट या सीडी मेरेलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इस क्षेत्र में जो स्थिरता मुझे मिली है वह मैं नाज़रंदाज़ नहीं कर सकता. प्रत्येक एल्बम में मेरा समर्पण और मुझे सुनने वालों की बढ़ती चाहत, यही मेरी संपत्ति है.

गज़ल, भजन, सुगम संगीत , हिंदी फिल्मी संगीत और क्षेत्रीय (रीजनल) संगीत में आप किसे ज्यादा तवज्जो देते हैं और क्यों?

जैसा कि मैंने कहा संगीत तो महासागर है. चाहे भजन हो, गीत हो, ग़ज़ल हो या फिर लोक संगीत, हर एक का अपना ख़ास अंदाज़ व महत्व है यह सारे अंदाज़ अत्मसाद करके सही तरीके से प्रस्तुत करना यही एक कलाकार की असल कला का मापदंड होता है. इसलिए किसी एक गायन पद्धति या शैली को तवज्जो देना मेरी नज़र में ज्यादती होगी. इनके अलावा भी संगीत के जो प्रकार हैं, उनकी नवीनता स्वीकार करने के लिए सदैव मैं तत्पर रहूँगा. हाँ लेकिन यह कह सकता हूँ कि मैं गा रहा हूँ और सामने श्रोता बैठे हों यानी जब मैं लाइव कंसर्ट करता हूँ तो उसका आनंद और अंदाज़ ही कुछ निराला होता है. मैं ग़ज़ल, भजन व हिन्दी फिल्मी गीतों के लाइव प्रोग्राम्स अक़्सर करता रहता हूँ.

"एहतराम" आपकी जानीमानी गज़लों की एलबम है। इस एलबम के बारे में अपने कुछ अनुभव बताएँ।

एहतराम मेरा ' ड्रीम प्रोजेक्ट ' है. जिन महान शायरों के दम पर उर्दू शायरी का आधार टिका है, उनका एहतराम लाज़मी ही है. मैं पिछले २० वर्षों से लाइव ग़ज़ल कंसर्ट्स करता आ रहा हूँ. मैं चाहता था की मेरे ग़ज़ल अल्बम्स का आगाज़ इन महान शायरों के एहतराम से ही हो. इसके निर्माण की कल्पना के साथ ही मुझे हर जगह से काफी प्रोत्साहन मिला.टी-सीरीज़ के लिए मैंने पिछले कुछ वर्षों में करीब बीस devotional अल्बम्स किए हैं. इस पहले ग़ज़ल अल्बम के लिए भी टी-सीरीज़ के श्री अजीत कोहली जी ने काफी सहयोग दिया व प्रोत्साहित किया और इस ग़ज़ल सीडी को worldwide रिलीज़ किया गया. यह टी-सीरीज़ के webstores पर भी उपलब्ध है.

लोगों की फरमाइश पर एहतिराम की सभी ग़ज़लों को Nairobi, Kenya के १०६.३ ईस्ट फम पर कई बार बजाया गया व विदेशों में भी इसे worldspace Radio पर सुना गया.इसके अलावा दुनियाँ भर की कई जगहों से लगातार e- mails आते रहते हैं.विदेशों में लाइव ग़ज़ल कंसर्ट्स के लिए भी काफी लोग पूछ रहे हैं. इन प्रतिक्रियाओं से यह लगता है की लोगों को ये ग़ज़लें काफी पसंद आ रही है. इन शुरवाती अनुभवों के बाद देखते हैं आगे आगे और क्या क्या अनुभव आते हैं. 'एहतराम' सही मायने में एहतराम के काबिल महसूस हो रहा है ये निश्चित है.

जी सही कहा आपने इन्हे आवाज़ पर भी काफी पसंद किया गया है. "अहतराम" में संजोई गई सारी गज़लें सुप्रसिद्ध शाइरों की है। गज़लों को देखकर महसूस होता है कि गज़लों को चुनने में अच्छी खासी स्टडी की गई है। गज़लों का चुनाव आपने किया है या फिर किसी और की सहायता ली है?

जब तक गानेवाला किसी भी ग़ज़ल के लफ्जों से अच्छी तरह वाकिफ़ न हो वह सही भाव प्रस्तुत नही कर सकता और इसलिए यह सारी मशक्कत मैने ही की है और तहे दिल से की है. अगर आप उर्दू शायरी का इतिहास देखें तो मीर से लेकर दाग़ तक का काल उर्दू शायरी का स्वर्णकाल कहलाता है. उस समय के हर नामचीन शायरों की रचनाओं को पढ़ना, समझना और ख़ास अदा से प्रस्तुत करना यह एक लंबा दौर मैंने गुज़ारा है.काफी सालों से अध्ययन करते करते मेरे पास ग़ज़ल और शायरी से सम्बंधित कई किताबों का अच्छा खासा संग्रह तैयार हो गया है.कुल मिलकर एहतिराम मेरा एक सफल प्रयत्न है यह चाहनेवालों के प्रतिसाद से साबित हो रहा है.

यकीनन शिशिर जी, गज़लों को संगीत से सजाना आप कितना कठिन मानते हैं? चूँकि गज़लें खालिस उर्दू की हैं, तो क्या गज़लों में भाव जगाने के लिए आपके लिहाज से उर्दू की जानकारी नितांत जरूरी है।

निश्चित ही ग़ज़ल की खासिअत यही है की उसके नियमो के आधार पर ही वह खरी उतरती है.किसी शायर ने कहा है-

खामोशी से हज़ार ग़म सहना
कितना दुश्वार है ग़ज़ल कहना

दूसरे शायर कहते हैं -

शायरी क्या है, दिली जज़्बात का इज़हार है
दिल अगर बेकार है तो शायरी बेकार है

ग़ज़ल की बहर के आधार पर और ख़ास लफ्जों के आधार पर तर्ज़ का होना ज़रूरी है. यह निश्चित रूप से थोड़ा कठिन है. अब जिन्हें उर्दू भाषा की जानकारी न हो वह ग़ज़ल के साथ न्याय कैसे कर सकता है? उर्दू भाषा का उच्चारण भी सही होना अनिवार्य है और साथ ही उसके अर्थ को समझना भी. हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में भी ख़ास भाव प्रस्तुत करने के लिए ख़ास रागों का व सुरों का प्रावधान है. उन्ही सुरों में वह प्रभावी भी होता है. इसलिए ग़ज़ल गाने के लिए पुरी तरह उस ग़ज़ल का हो जाना ज़रूरी है ऐसा मैं मानता हूँ. इस सब के बावजूद किसी शायर ने सच कहा है-

ग़ज़ल में बंदिशे-अल्फाज़ ही नहीं सब कुछ
जिगर का खून भी कुछ चाहिए असर के लिए

मराठी पृष्ठभूमि (background) के होने के कारण आपको हिंदी और उर्दू की रचनाओं में संगीत देने और गाने में कोई दिक्कत महसूस होती है?

जैसा कि मैने कहा की ग़ज़ल गाने के लिए उसके प्रति पुरी तरह समर्पित होना ज़रूरी है दरअसल शुरू से हिन्दी व उर्दू मेरी पसंद रही है और मेरा कार्यक्षेत्र रहा है.आज भी हमारे देश में ऐसे कई सफल ग़ज़ल गायक है जिनकी मातृभाषा हिन्दी या उर्दू नहीं है.भाषा किसी की बपौती नहीं है बशर्ते आप उसके प्रति पुरी तरह समर्पित हों. मेरी ग़ज़लों को सुनने वाले कुछ जानकार लोग ही यह तय करें की मै उन ग़ज़लों के साथ न्याय कर पाया हूँ या नहीं.

आपको एक और उदाहरण देना चाहूँगा की कुछ वर्ष पहले मैं गल्फ टूर पर गया था. टीम में अकेला गायक था और वहां तो सभी भाषाओँ के गीत गाने पड़ते थे. मराठी ही क्या, मलयाली, तमिल, तेलगु व पंजाबी सभी श्रोताओं को मैने संतुस्ट किया.

बिल्कुल सही कहा आपने शिशिर जी, भाषा किसी कि बपौती बिल्कुल नही है, ये बतायें आपने सुरेश वाडेकर, अनुराधा पौंडवाल और साधना सरगम जैसे नामी फ़नकारों के साथ भी काम किया है। उनके साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा?

अनुभव अच्छा ही रहा. वे सभी बहुत अच्छे कलाकार हैं उनसे प्रोत्साहन भी मिला. आगे भी मेरे स्वरबद्ध किए हुआ गाने वो ज़रूर गायेंगे ऐसी उम्मीद है.

बतौर संगीतकार हिंदी फिल्मों में संगीत देने के बारे में आप क्या सोचते हैं?

दरअसल इस क्षेत्र में अपनी सोच ही काफी नहीं होती पर फ़िल्म में संगीत देना कौन नहीं चाहेगा? मुझे अलग अलग प्रकार के गीत, भजन, ग़ज़ल, क्षेत्रीय संगीत को स्वरबद्ध करने का या संगीत देने का अनुभव रहा है. ग़ज़ल, भजन के अलावा फिल्मी गीतों पर आधारित नए पुराने गानों के लाइव प्रोग्राम्स भी कई सालों से करता आ रहा हूँ. लोगों की पसंद मैं काफी हद तक समझता हूँ. इसके अलावा कई टेलिविज़न सेरिअल्स में भी संगीत दिया व प्लेबैक किया है. इसलिए मौका मिला तो फ़िल्म संगीत में भी पुरा न्याय करूँगा ये मेरा विश्वास है.


संगीत की दुनिया में संघर्ष का क्या स्थान है? चूँकि आप एक मुकाम हासिल कर चुके हैं, इस क्षेत्र में नए लोगों को आप क्या सलाह देना चाहेंगे?

संघर्ष जीवन का अविभाज्य अंग है. जीवन के हर क्षेत्र में संघर्ष ज़रूरी है जितने भी बड़े कलाकार है वो संघर्ष के बिना ऊपर नहीं आए हैं.पर हाँ किस्मत भी अपनी जगह महत्व रखती है पर सबसे ज़रूरी है लगन और लक्ष्य प्राप्ति के लिए संघर्ष की तैयारी. प्रातियोगिता आज सर चढ़ कर बोल रही है. हर नए कलाकार को इस प्रवाह में ख़ुद को प्रवाहित करना ज़रूरी है और जब प्रवाहित होना ही है तो तैरना सीख लेना फायदेमंद होगा . मतलब यह कि पहले संपूर्ण संगीत का ज्ञान और बाद में बदलते समय के साथ संगीत के प्रति समर्पण और न्याय. अर्जुन की तरह बस आँख देखते रहे और निशाना लगते रहे क्योंकि-

कोशिश जब तेरी हद से गुज़र जायेगी
मंजिल ख़ुद ब ख़ुद तेरे पास चली आएगी

भविष्य के लिए आपकी क्या योजनाएँ हैं?

फिलहाल तो लाइव प्रोग्राम्स ख़ास कर ग़ज़लों की महफिलों में व्यस्त हूँ. अगले ग़ज़ल एल्बम की तैयारी चल रही है एक बिल्कुल नए शायर के साथ. और बहुत से प्लान्स हैं आगे आपको बताते रहूँगा. हिंद युग्म के साथ एक लम्बी पारी की उम्मीद कर रहा हूँ, कुछ योजनाओं पर बात चल रही है देखते हैं कहाँ तक बात पहुँचती है.

बहुत से नए कलाकारों को आवाज़ एक मंच दे चुका है. ये सब अभी अपने शुरुवाती दौर में हैं. और आप बेहद अनुभवी. इन नए कलाकारों के लिए आप क्या सदेश देना चाहेंगे ?

चाहे शायर हो,गायक या संगीतकार उनके अवश्यकता के अनुसार उचित मार्गदर्शन व सहयोग देने के लिए मै सदा तैयार हूँ. किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए आप हिंद युग्म या मुझे shishir.parkhie@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

आप संगीत के क्षेत्र में यूँ हीं दिन दुनी रात चौगुनी तरक्की करते रहें हिंद युग्म परिवार यही दुआ करता हैं.

शिशिर पारखी जी का संपर्क सूत्र -

Shishir parkhie
Singer & Music Composer
13, Kasturba Layout, Ambazari, Nagpur
Mahashtra, India. Zip- 440033
Cell:00919823113823
Land: 91-712-2241663

Thursday, October 9, 2008

सुनिए शिशिर पारखी से ग़ज़ल "तुम मेरे पास होते हो गोया...जब कोई दूसरा नही होता....."

आवाज़ की नई पहल - "एहतराम... उस्ताद शायरों को सलाम." (अंक ०१)

७ अजीम शायरों का आवाज़ पर एहतराम करने से पहले ग़ज़ल के इतिहास पर एक नज़र डालें, बरिष्ट ब्लॉगर अनूप शुक्ला जी(फुरसतिया) ने डॉ अरशद जमाल के इस आलेख को पहली बार इन्टरनेट पर प्रस्तुत किया था, आवाज़ के पाठक / श्रोता भी इससे लाभान्वित हो इस के लिए हम इसे पुनर्प्रस्तुत कर रहे हैं -

फ़ारसी से ग़ज़ल उर्दू में आई। उर्दू का पहला शायर जिसका काव्य संकलन(दीवान)प्रकाशित हुआ है,वह हैं मोहम्मद क़ुली क़ुतुबशाह। आप दकन के बादशाह थे और आपकी शायरी में फ़ारसी के अलावा उर्दू और उस वक्त की दकनी बोली शामिल थी।

पिया बाज प्याला पिया जाये ना।
पिया बाज इक तिल जिया जाये ना।।

क़ुली क़ुतुबशाह के बाद के शायर हैं ग़व्वासी, वज़ही,बह्‌री और कई अन्य। इस दौर से गुज़रती हुई ग़ज़ल वली दकनी तक आ पहुंची और उस समय तक ग़ज़ल पर छाई हुई दकनी(शब्दों की) छाप काफी कम हो गई। वली ने सर्वप्रथम ग़ज़ल को अच्छी शायरी का दर्जा दिया और फ़ारसी के बराबर ला खड़ा किया। दकन के लगभग तमाम शायरों की ग़ज़लें बिल्कुल सीधी साधी और सुगम शब्दों के माध्यम से हुआ करती थीं।

वली के साथ साथ उर्दू शायरी दकन से उत्तर की ओर आई। यहां से उर्दू शायरी का पहला दौर शुरू होता है। उस वक्त के शायर आबरू, नाजी, मज्‍़नून, हातिम, इत्यादि थे। इन सब में वली की शायरी सबसे अच्छी थी। इस दौर में उर्दू शायरी में दकनी शब्द काफी़ हद तक हो गये थे। इसी दौर के आख़िर में आने वाले शायरों के नाम हैं-मज़हर जाने-जानाँ, सादुल्ला ‘गुलशन’,ख़ान’आरजू’ इत्यादि। यक़ीनन इन सब ने मिलकर उर्दू शायरी को अच्छी तरक्क़ी दी। मिसाल के तौर पर उनके कुछ शेर नीचे दिये गये हैं-

ये हसरत रह गई कि किस किस मजे़ से ज़िंदगी करते।
अगर होता चमन अपना, गुल अपना,बागबाँ अपना।।-मज़हर जाने-जानाँ

खुदा के वास्ते इसको न टोको।
यही एक शहर में क़ातिल रहा है।।-मज़हर जाने-जानाँ

जान,तुझपर कुछ एतबार नहीं ।
कि जिंदगानी का क्या भरोसा है।।-खान आरजू

फ़िर आया दूसरा दौर. इस दौर के सब से मशहूर शायर हैं’मीर’और‘सौदा’। इस दौर को उर्दू शायरी का ‘सुवर्णकाल’ कहा जाता है। इस दौर के अन्य शायरों में मीर’दर्द’ और मीर ग़ुलाम हसन का नाम भी काफी़ मशहूर था। इस जमाने में उच्च कोटि की ग़ज़लें लिखीं गईं जिसमें ग़ज़ल की भाषा, ग़ज़ल का उद्देश्य और उसकी नाजुकी को एक हद तक संवारा गया। मीर की शायरी में दर्द कुछ इस तरह उभरा कि उसे दिल और दिल्ली का मर्सिया कहा जाने लगा।

देखे तो दिल कि जाँ से उठता है।
ये धुँआ सा कहाँ से उठता है।।

दर्द के साथ साथ मीर की शायरी में नज़ाकत भी तारीफ़ के काबिल थी।

नाजु़की उसके लब की क्या कहिये।
पंखुड़ी इक गुलाब की सी है।।

‘मीर’ इन नीमबाज़ आखों में।
सारी मस्ती शराब की सी है।।

इस दौर की शायरी में एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि इस ज़माने के अधिकांश शायर सूफी पंथ के थे। इसलिये इस दौर की ग़ज़लों में सूफी पंथ के पवित्र विचारों का विवरण भी मिलता है।

वक्‍़त ने करवट बदली और दिल्ली की सल्तनत का चिराग़ टिमटिमाने लगा। फैज़ाबाद और लखनऊ में ,जहां दौलत की भरमार थी, शायर दिल्ली और दूसरी जगहों को छोड़कर, इकट्ठा होने लगे। इसी समय ‘मुसहफ़ी’ और ‘इंशा’ की आपसी नोकझोंक के कारण उर्दू शायरी की गंभीरता कम हुई। ‘जुर्रअत’ ने बिल्कुल हलकी-फुलकी और कभी-कभी सस्ती और अश्लील शायरी की। लेकिन जहां तक लखनवी अंदाज़ का सवाल है ,उसकी बुनियाद ‘नासिख़’ और ‘आतिश’ ने डाली। दुर्भाग्यवश इन दोनों की शायरी में हृदय और मन की कोमल तरल भावनाओं का बयान कम है और शारीरिक उतार-चढ़ाव,बनाव-सिंगार और लिबास का वर्णन ज्‍़यादा है। उर्दू शायरी अब दो अंदाज़ों में बंट गयी। ‘लखनवी’ और’देहलवी’। दिल्ली वाले जहां आशिक़ और माशूक़ के हृदय की गहराइयों में झांक रहे थे ,वहां लखनऊ वाले महबूब के जिस्म,उसकी खूबसूरती,बनाव-सिंगार और नाज़ो-अदा पर फ़िदा हो रहे थे। दिल्ली और लखनऊ की शायरी जब इस मोड़ पर थी .उसी समय दिल्ली में ‘जौ़क़’, ‘ग़ालिब’ और ‘मोमिन’ उर्दू ग़ज़ल की परंपरा को आगे बढ़ाने में जुटे हुये थे। यह कहना गलत नहीं होगा कि ‘गा़लिब’ ने ग़ज़ल में दार्शनिकता भरी ,’मोमिन’ ने कोमलता पैदा की और ‘जौ़क़’ ने भाषा को साफ़-सुथरा,सुगम और आसान बनाया। लीजिये इन शायरों के कुछ शेर पढ़िये-

ग़मे हस्ती का ‘असद’ किस से हो जुज़ मर्ग इलाज।
शमा हर रंग में जलती है सहर होने तक।।-गालिब़

तुम मेरे पास हो गोया।
जब कोई दूसरा नहीं होता।।- मोमिन

लाई हयात आये,कज़ा ले चली,चले।
अपनी खु़शी न आये, न अपनी खुशी चले।।-जौ़क़

इन तीनों महान शायरों के साथ एक बदनसीब शायर भी था जिसनें जिंदगी के अंतिम क्षणों में वतन से दूर किसी जेल की अंधेरी कोठरी में लड़खड़ाती ज़बान से कहा था-

कितना बदनसीन ‘ज़फ़र’ दफ्‍़न के लिये।
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में।।-बहादुरशाहज़फ़र

१८५७ में दिल्ली उजड़ी,लखनऊ बर्बाद हुआ। ऐशो-आराम और शांति के दिन ख़त्म हुये। शायर अब दिल्ली और लखनऊ छोड़कर रामपुर,भोपाल, मटियाब्रिज और हैदराबाद पहुंच वहांके दरबारों की शोभा बढ़ाने लगे। अब उर्दू शायरी में दिल्ली और लखनऊ का मिला जुला अंदाज़ नज़र आने लगा। इस दौर के दो मशहूर शायर’दा़ग’ और ‘अमीर मीनाई’ हैं।

यह वक्‍़त अंग्रेजी हुकूमत की गिरफ्‍़त का होते हुये भी भारतीय इंसान आजा़दी के लिये छटपटा रहा था और कभी कभी बगा़वत भी कर बैठता था। जन-जीवन जागृत हो रहा था। आजा़दी के सपने देखे जा रहे थे और लेखनी तलवार बन रही थी। अब ग़ज़लों में चारित्य और तत्वज्ञान की बातें उभरने लगीं। राष्ट्रीयता यानी कौ़मी भावनाओं पर कवितायें लिखीं गईं और अंग्रेजी हुकूमत एवं उसकी संस्कृति पर ढके छुपे लेकिन तीखे व्यंग्यात्मक शेर भी लिखे जाने लगे। अब ग़ज़ल में इश्क़ का केंद्र ख़ुदा या माशूक़ न होकर राष्ट्र और मातृभूमि हुई। इसका मुख्य उद्देश्य अब आजा़दी हो गया। ‘हाली’,'अकबर इलाहाबादी’ ,’चकबिस्त’, और ‘इक़बाल’ इस युग के ज्वलंत शायर हैं।

सारे जहाँ से अच्छा हिंदोस्ताँ हमारा।
हम बुलबुले हैं इसकी ,ये गुलिस्ताँ हमारा।।

‘इक़बाल’ की यह नज्‍़म हर भारतीय की ज़बान पर थी और आज भी है। ‘अकबर’ के व्यंग्य भी इतने ही मशहूर हैं।लेकिन एक बात का उल्लेख यहाँ पर करना यहां जरूरी है कि इन शायरों ने ग़ज़लें कम और नज्‍़में अथवा कवियायें ज्यादा लिखीं।और यथार्थ में ग़ज़ल को पहला धक्का यहीं लगा। कुछ लोगों ने तो समझा कि ग़ज़ल ख़त्म की जा रही है।

लेकिन ग़ज़ल की खु़शक़िस्मती कहिये कि उसकी डगमगाती नाव को ‘हसरत’,जिगर’ ‘फा़नी’,'असग़र गोंडवी’ जैसे महान शायरों ने संभाला ,उसे नयी और अच्छी दिशा दिखलाई ,दुबारा जिंदा किया और उसे फिर से मक़बूल किया।’जिगर’ और ‘हसरत’ ने महबूब को काल्पनिक दुनिया से उतार निकालकर चलती-फिरती दुनिया में ला खड़ा किया। पुरानी शायरी में महबूब सिर्फ़ महबूब था,कभी आशिक़ न बना था। ‘हसरत’ और ‘जिगर’ ने महबूब को महबूब तो माना ही साथ ही उसे एक सर्वांग संपूर्ण इंसान भी बना दिया जिसने दूसरों को चाहा ,प्यार किया और दूसरों से भी यही अपेक्षा की।

दोपहर की धूप में मेरे बुलाने के लिये।
वो तेरा कोठे पे नंगे पांव आना याद है।। -हसरत

ग़ज़ल का यह रूप लोगों को बहुत भाया। ग़ज़ल अब सही अर्थ में जवान हुई। इन शायरों के बाद नई नस्ल के शायरों में फ़िराक़, नुशूर, जज्‍़बी,जाँनिशार अख्‍़तर, शकील, मजरूह,साहिर,हफ़ीज़ होशियारपुरी,क़तील शिफ़ाई,इब्ने इंशा, फ़ैज़ अहमद’फ़ैज़’,और सेवकों का जिक्र किया जा सकता है। ‘हफ़ीज जालंधरी’ और ‘जोश मलीहाबादी’ के उल्लेख के बगैर उर्दू शायरी का इतिहास अधूरा रहेगा। यह सच है कि इन दोनों शायरों ने कवितायें(नज्‍़में) ज्‍़यादा लिखीं और ग़ज़लें कम। लेकिन इनका लिखा हुआ काव्य संग्रह उच्च कोटि का है। ‘जोश’ की एक नज्‍़म, जो दूसरे महायुद्द के वक्त लिखी गई थी और जिसमें हिटलर की तारीफ़ की गई थी,अंग्रेजी हुकूमत के द्वारा उनको जेल भिजवाने का कारण बनी।

फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’ की शायरी का जिक्र अलग से करना अनिवार्य है।यह पहले शायर हैं जिन्होंने ग़ज़ल में रा जनीति लाई और साथ साथ जिंदगी की सर्वसाधारण उलझनों और हकी़क़तों को बड़ी खू़बी और सफा़ई से पेश किया।

मता-ए- लौहो क़लम छिन गई तो क्या ग़म है।
कि खू़ने दिल में डुबो ली हैं उंगलियाँ मैंने।।

जेल की सीखचों के पीछे क़ैद ‘फ़ैज़’ के आजा़द क़लम का नमूना ऊपर लिखी बात को पूर्णत: सिद्ध करता है।

ग़ज़ल का इतिहास रोज़ लिखा जा रहा है। नये शायर ग़ज़ल के क्षितिज पर रोज़ उभर रहे हैं ,और उभरते रहेंगे। अपने फ़न से और अपनी शायरी से ये कलाकार ग़ज़ल की दुनिया को रोशन कर रहे हैं।

कुछ शायरों ने ग़ज़ल को एक नया मोड़ दिया है। इन ग़ज़लों में अलामती रुझान यानी सांकेतिक प्रवृत्ति प्रमुख रूप से होता है। उदाहरण के लिये निम्न अशआर पढ़िये-

वो तो बता रहा था बहोत दूर का सफ़र।
जंजीर खींचकर जो मुशाफ़िर उतर गया।।
साहिल की सारी रेत इमारत में लग गई।
अब लोग कैसे अपने घरौंदे बनायेंगे।। -मिद्‌ह‌तुल अख्‍़तर

इन शायरों में कुछ शायरों के नाम हैं- कुंवर महिंदर सिंह बेदी, ज़िया फ़तेहबादी, प्रेम वारबरटनी,मज़हर इमाम, अहमद फ़राज़,निदा फ़ाज़ली,सुदर्शन फ़ाकिर, नासिर काज़मी, परवीन शाकिर, अब्दुल हमीद अदम,सूफी़ तबस्सुम, ज़रीना सानी, मिद्‌हतुल अख्‍़तर, अब्दुल रहीम नश्तर, प्रो.युनुस, ख़लिश क़ादरी, ज़फ़र कलीम,शाहिद कबीर, प्रो. मंशा, जलील साज़, शहरयार, बशीर बद्र, शाज तम्कनत, वहीद अख्‍़तर, महबूब राही, इफ्‍़ितख़ार इमाम सिद्धीकी़,शबाब ललित, कृष्ण मोहन, याद देहलवी,ज़हीर गा़ज़ीपुरी, यूसुफ़ जमाल, राज नारायण राज़,गोपाल मित्तल,उमर अंशारी,करामत अली करामत, उनवान चिश्ती, मलिक़ जा़दा मंज़ूर,ग़ुलाम रब्बानी,ताबाँ,जज्‍़बी इत्यादि।

ग़ज़ल लेखन में एक और नया प्रयोग शुरू किया गया है जिसका उल्लेख यहाँ करना अनुचित न होगा। इन प्रायोगिक ग़ज़लों में शेर की दोनों पंक्तियों से मीटर की पाबंदी हटा दी गई है,लेकिन रदीफ़ और क़ाफिये की पाबंदी रखी गई है। इन ग़ज़लों को ‘आजा़द ग़ज़ल’ कहा जाता है।

फूल हो ,ज़हर में डूबा हुआ पत्थर न सही।
दोस्तों मेरा भी कुछ हक़ तो है,छुपकर सहीम खुलकर न सही।
यूं भी जीवन जी लेते हैं जीने वाले।
कोई तस्वीर सही,आपका पैकर न सही। -मज़हर इमाम

शक्‍ल धुंधली सी है,शीशे में निखर जायेगी।
मेरे एहसास की गर्मी से संवर जायेगी।।

आज वो काली घटाओं पे हैं नाजाँ लेकिन।
चांद सी रोशनी बालों में उतर जायेगी।। -ज़रीना सानी

फ़िलहाल यह ग़ज़लें प्रारंभिक अवस्था में हैं। ग़ज़ल के रसिया और ग़ज़ल गायक इन ग़ज़लों को पसंद करते हैं या नहीं यह भविष्य ही बतायेगा।निम्नलिखित शायर’ आजाद़ ग़ज़ल’के समर्थक हैं।ज़हीर ग़ाजीपुरी, मज़हर इमाम, युसुफ़ जमाल, डा.ज़रीना सानी,अलीम सबा नवीदी,मनाज़िर आशिक़ इत्यादि।

संगीत को त्रिवेणी संगम कहा जाता है। इस संगम में तीन बातें अनिवार्य हैं,शब्द,तर्ज़ और आवाज़। ग़ज़ल की लोकप्रियता इस बात की पुष्टि करती है कि अच्छे शब्द के साथ अच्छी तर्ज़ और मधुर आवाज़ अत्यंत अनिवार्य है। इसीलिये यह निसंकोच कहा जा सकता है कि ग़ज़ल को दिलकश संगीत में ढालने वाले संगीतकार और उसे बेहतरीन ढंग से रसिकों के आगे पेश करने वाले कलाकार गायक अगर नहीं होते तो ग़ज़ल यकीनन किताबों में ही बंद रह कर घुट जाती,सिमट जाती।

मूल आलेख- डा.अर्शद जमाल
(आईना-ए-ग़ज़ल से साभार)


तो दोस्तों,एक बार फ़िर अपनी कल्पना में सजाएँ शायरी का वो सुरहरा दौर और लौट चलें बहादुरशाह जफ़र के उस दरबार को जहाँ शायर थे, ग़ालिब, दाग, मोमिन, जौक़ और अमीर मीनाई जैसे. आवाज़ एक कोशिश कर रहा है ग़ज़ल गायक शिशिर पारखी के साथ मिल कर उर्दू अदब के सात मशहूर ओ मा'रूम शायरों को एक संगीतमय श्रद्धांजली देने की.

शिशिर जी के बारे में कल बात करेंगे हम. आईये आज सुनें ये पहली पेशकश.

आज के शायर हैं मोमिन खान मोमिन (१८०० - १८५१), जो कि पेशे से हाकिम थे. बाद में ब्रिटिश सरकार ने भी उन्हें नौकरी की पेशकश दी पर मोमिन साहब कहाँ रुकने वाले थे किसी नौकरी की कैद में. उनके समकालीन शायर मिर्जा ग़ालिब ने एक बार कहा था कि वो अपना पूरा दीवान मोमिन को दे सकते हें उनके एक शेर के बदले में, जानना चाहेंगे कि वो शेर कौन सा था और वो ग़ज़ल कौन सी थी ?

वो शेर था -

तुम मेरे पास होते हो गोया,
जब कोई दूसरा नही होता.....


और ग़ज़ल ??? जी हाँ यही लाजावाब ग़ज़ल हम आपके लिए लाये हें आज, शिशिर पारखी साहब की सुमधुर आवाज़ में-
सुनिए और आनंद लें मोमिन की शायरी और शिशिर जी का अंदाजे बयाँ, पेशे खिदमत है आपकी नज़र -




Ghazal- Asar usko zara nahi hota...
Shayar- Momon Khan Momin
Singer- Shishir Parkhie
Album - Ahatram

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