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Sunday, December 27, 2015

नौशाद के गीतों में राग-दर्शन : SWARGOSHTHI – 250 : RAG BASED SONGS BY NAUSHAD


स्वरगोष्ठी – 250 में आज


संगीत के शिखर पर – 11 : फिल्म संगीतकार नौशाद अली


फिल्मों में रागदारी संगीत की सुगन्ध बिखेरने वाले अप्रतिम साधक नौशाद अली




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी सुरीली श्रृंखला – ‘संगीत के शिखर पर’ की ग्यारहवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-रसिकों का एक बार पुनः हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय संगीत की विभिन्न विधाओं में शिखर पर विराजमान व्यक्तित्व और उनके कृतित्व पर चर्चा कर रहे हैं। संगीत गायन और वादन की विविध लोकप्रिय शैलियों में किसी एक शीर्षस्थ कलासाधक का चुनाव कर हम उनके व्यक्तित्व का उल्लेख और उनकी कृतियों के कुछ उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। आज श्रृंखला की ग्यारहवीं कड़ी में हम आपको फिल्म संगीत के माध्यम से रागों की सुगन्ध बिखेरने वाले अप्रतिम संगीतकार नौशाद अली के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा कर रहे हैं। आपको हम यह भी अवगत कराना चाहते हैं कि दो दिन पूर्व, अर्थात 25 दिसम्बर को नौशाद अली का 96वीं जयन्ती थी। इस उपलक्ष्य में हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक में नौशाद अली के चार महत्त्वपूर्ण दशकों की संगीत-यात्रा के कुछ चुने हुए गीतों का उल्लेख कर रहे हैं। पाँचवें से लेकर आठवें दशक के बीच नौशाद सर्वाधिक सक्रिय थे। इन चार दशकों में से प्रत्येक दशक के एक-एक गीत चुन कर हम आपके लिए प्रस्तुत करेंगे। इन गीतों में आपको क्रमशः राग बिहाग, मालकौंस, वृन्दावनी सारंग और पहाड़ी के स्वरों के दर्शन होंगे।



25 दिसम्बर, 1919 को सांगीतिक परम्परा से समृद्ध शहर लखनऊ के कन्धारी बाज़ार में एक साधारण परिवार में नौशाद का जन्म हुआ था। नौशाद जब कुछ बड़े हुए तो उनके पिता घसियारी मण्डी स्थित अपने नए घर में आ गए। यहीं निकट ही मुख्य मार्ग लाटूश रोड (वर्तमान गौतम बुद्ध मार्ग) पर संगीत के वाद्ययंत्र बनाने और बेचने वाली दूकाने थीं। उधर से गुजरते हुए बालक नौशाद घण्टों दूकान में रखे साज़ों को निहारा करता था। एक बार तो दूकान के मालिक गुरबत अली ने नौशाद को फटकारा भी, लेकिन नौशाद ने उनसे आग्रह किया की वे बिना वेतन के दूकान पर रख लें। नौशाद उस दूकान पर रोज बैठते, साज़ों की झाड़-पोछ करते और दूकान के मालिक का हुक्का तैयार करते। साज़ों की झाड़-पोछ के दौरान उन्हें कभी-कभी बजाने का मौका भी मिल जाता था। उन दिनों मूक फिल्मों का युग था। लखनऊ के रॉयल सिनेमाघर में फिल्मों के प्रदर्शन के दौरान एक लद्दन खाँ थे जो हारमोनियम बजाया करते थे। यही खाँ साहब नौशाद के पहले गुरु बने। नौशाद के पिता संगीत के सख्त विरोधी थे, अतः घर में बिना किसी को बताए सितार नवाज़ युसुफ अली और गायक बब्बन खाँ की शागिर्दी की। कुछ बड़े हुए तो उस दौर के नाटकों की संगीत मण्डली में भी काम किया। घर वालों की फटकार बदस्तूर जारी रहा। अन्ततः एक दिन घर में बिना किसी को बताए मायानगरी बम्बई की ओर रुख किया।

इसके आगे का वृतान्त हम जारी रखेंगे, इस बीच थोड़ा विराम लेकर हम आपको नौशाद के फिल्मी सफर के पहले दशक का संगीतबद्ध किया एक गीत सुनवाते हैं। यह गीत हमने 1946 में प्रदर्शित फिल्म ‘शाहजहाँ’ से लिया है। फिल्म के नायक और गायक कुन्दनलाल (के.एल.) सहगल थे। कई अर्थों में यह फिल्म भारतीय फिल्म इतिहास के पन्नों पर स्वर्णाक्षरों से अंकित है। इस फिल्म का गीत- ‘जब दिल ही टूट गया...’ सहगल का अन्तिम गीत हुआ। इसी गीत के गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी की यह पहली फिल्म थी। इसी गीत को नौशाद ने सहगल से आग्रह कर दो बार, एक बार बिना शराब पिये और फिर दोबारा शराब पिला कर रिकार्ड कराया और उन्हें यह एहसास कराया कि बिना पिये वे बेहतर गाते हैं। बहरहाल, आइए हम आपको सहगल का गाया और नौशाद का संगीतबद्ध किया फिल्म ‘शाहजहाँ’ का वह गीत सुनवाते हैं जो राग बिहाग पर आधारित है। इस गीत में राग के स्वर और भाव स्पष्ट रूप से झलकते हैं।


राग बिहाग : फिल्म ‘शाहजहाँ’ : ‘ऐ दिल-ए-बेकरार झूम…’ : कुन्दनलाल सहगल




घर से भाग कर बम्बई (अब मुम्बई) पहुँचे नौशाद अली कुछ समय तक भटकते रहे। एक दिन न्यू पिक्चर कम्पनी में संगीत वादकों के चयन के लिए प्रकाशित विज्ञापन के आधार पर नौशाद बड़ी उम्मीद लेकर ग्रांट रोड स्थित कम्पनी के कार्यालय पहुँचे। वहाँ उस समय के जाने-माने संगीतकार उस्ताद झण्डे खाँ वादकों का इंटरव्यू ले रहे थे। नौशाद ने भी खाँ साहब को कुछ सुनाया। उन्होने बाद में आने को कह कर नौशाद को रुखसत किया। उसी इंटरव्यू में नौशाद की भेंट गुलाम मोहम्मद से हुई, जो आगे चलकर पहले उनके सहायक बने और फिर बाद में स्वतंत्र संगीतकार भी हुए। बहरहाल, उस्ताद झण्डे खाँ ने नौशाद को पियानो वादक के रूप में चालीस रुपये और गुलाम मोहम्मद को तबला व ढोलक वादक के रूप में साठ रुपये मासिक वेतन पर रख लिया। और इस तरह नौशाद का प्रवेश फिल्म संगीत के क्षेत्र में हुआ।

नौशाद की छठें दशक की फिल्मों में रागदारी संगीत का प्रभुत्व बढ़ता गया। आइए अब हम वर्ष 1952 की उस फिल्म और उसके एक गीत की चर्चा करते हैं जिसने नौशाद की राग आधारित गीतों की रचना करने की अपनी क्षमता को उजागर किया। इस वर्ष प्रदर्शित फिल्म ‘बैजू बावरा’ में नौशाद ने कई कालजयी गीतो की रचना कर अपने शास्त्रीय संगीत के प्रति अनुराग को सिद्ध किया। फिल्म के गीतों के लिए उनके पास मोहम्मद रफी और लता मंगेशकर की आवाज़ का साथ तो था ही, रागों का शुद्ध रूप में प्रस्तुत करने की ललक के कारण उन्होने उस समय के प्रख्यात शास्त्रीय गायक उस्ताद अमीर खाँ और पण्डित दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर को भी फिल्म गीत गाने के लिए राजी किया। खाँ साहब और पण्डित पलुस्कर द्वारा प्रस्तुत राग देशी के स्वरों में जुगलबन्दी वाला गीत- ‘आज गावत मन मेरो...’ तो फिल्म संगीत के इतिहास में एक अमर गीत बन चुका है। इसके अलावा उस्ताद अमीर खाँ ने अपने एकल स्वर में राग पूरिया धनाश्री में गीत- ‘तोरी जय जय करतार...’ भी गाया था। परन्तु आज हम आपको नौशाद के सर्वप्रिय पार्श्वगायक मोहम्मद रफी के स्वर में राग मालकौंस पर आधारित वह गीत सुनवाते हैं, जिसकी लोकप्रियता आज भी कायम है।


राग मालकौंस : फिल्म ‘बैजू बावरा’ : ‘मन तड़पत हरिदर्शन को आज...’ : मोहम्मद रफी




पियानो वादक के रूप में नौशाद को न्यू पिक्चर कम्पनी में एक ठिकाना तो मिल गया, परन्तु मंज़िल तो अभी कोसों दूर थी। अभी तक नौशाद मुम्बई (तब बम्बई) में रह रहे अलीम साहब के नाम लखनऊ से अपने एक मित्र का खत लेकर आए थे और उन्हीं के साथ गुजर कर रहे थे। नौकरी मिलते ही उन्होने अलीम साहब पर बोझ बने रहना उचित नहीं समझा और लखनऊ के ही एक अख्तर साहब के साथ दादर में रहने लगे। नौशाद के यह दूसरे आश्रयदाता एक दूकान में सेल्समैन थे और रात में दूकान बन्द होने के बाद दरवाजा बन्द कर अन्दर ही सोते थे। नौशाद को भी ऐसे ही रहना पड़ता था। कभी जब दूकान में गर्मी अधिक होती तो दोनों बाहर फुटपाथ पर रात गुजारते थे।

फिल्मों के प्रसंग के अनुसार नौशाद उस समय के दिग्गज शास्त्रीय गायकों को आमंत्रित कर गवाने से भी नहीं चूके। 1952 की फिल्म ‘बैजू बावरा’ में उस्ताद अमीर खाँ और पण्डित दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर के स्वरों में तथा 1954 की फिल्म ‘शबाब’ में दोबारा उस्ताद अमीर खाँ के स्वर में ऐसा प्रयोग वे कर चुके थे। फिल्म ‘मुगल-ए-आज़म’ के एक प्रसंग में अकबर के दरबारी गायक तानसेन के स्वर में जब एक गीत की आवश्यकता हुई तो नौशाद ने उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ को गाने के लिए बड़ी मुश्किल से राजी किया। उस्ताद का राग सोहनी में गाया वह गीत था- ‘प्रेम जोगन बनके…’। इस ठुमरीनुमा गीत के लिए के. आसिफ ने उस्ताद को पचीस हजार रुपये मानदेय के रूप में दिया था। यह गीत उन्हें इतना पसन्द आया कि के. आसिफ ने उस्ताद बड़े गुलाम अली को पचीस हजार रुपये और देकर एक और गीत ‘शुभ दिन आयो राजदुलारा...’ (राग रागेश्री) भी गवाया था। लोकधुनों और राग आधारित गीतों के अलावा गज़लों की संगीत-रचना में भी नौशाद सिद्ध थे। फिल्म ‘मुगल-ए-आज़म’, ‘मेरे महबूब’, ‘दिल दिया दर्द लिया’, ‘पालकी’ आदि फिल्मों में उनकी संगीतबद्ध गज़लें बेहद लोकप्रिय हुई थीं। सातवें दशक की फिल्म ‘दिल दिया दर्द लिया’ में मोहम्मद रफी का गाया- ‘कोई सागर दिल को बहलाता नहीं...’और ‘गुजरे हैं आज इश्क़ में...’ की धुनें बेहद आकर्षक थीं। परन्तु आज हम इस दशक के गीतों में से चुन कर आपको फिल्म का जो गीत सुनवा रहे हैं, वह राग वृन्दावनी सारंग पर आधारित है। मोहम्मद रफी और आशा भोसले के स्वरों में प्रस्तुत इस युगल गीत के बोल हैं- ‘सावन आए या न आए, जिया जब झूमे सावन है...’। तीनताल और कहरवा में निबद्ध इस गीत का आनन्द आप लीजिए।


राग वृन्दावनी सारंग : ‘सावन आए या न आए...’ : आशा भोसले और रफी : फिल्म दिल दिया दर्द लिया




स्वतंत्र संगीतकार के रूप में नौशाद को अवसर तो 1939-40 में ही मिल चुका था। अपने शुरुआती दौर में उन्होने उत्तर प्रदेश की लोकधुनों का प्रयोग करते हुए अनेक लोकप्रिय गीत रचे। ऐसे गीतों में प्रकृति के अनुपम सौन्दर्य की छटा थी। दरअसल नौशाद के ऐसे प्रयोगों से उन दिनों प्रचलित फिल्म संगीत को एक नया मुहावरा मिला। आगे चल कर अन्य संगीतकारों ने भी प्रादेशिक और क्षेत्रीय लोक संगीत से जुड़ कर ऐसे ही प्रयोग किए। लोक संगीत के साथ ही उन्होने शास्त्रीय राग आधारित गीतों का प्रचलन भी पाँचवें दशक से आरम्भ कर दिया था। नौशाद के संगीत से सजे अगले जिस गीत की हम चर्चा करने जा रहे हैं, वह आठवें दशक की फिल्म ‘पाकीजा’ की एक ठुमरी है। इस ठुमरी, ‘कौन गली गयो श्याम...’ के फिल्मी प्रयोग पर थोड़ी चर्चा करेंगे। फिल्म और फिल्म संगीत के इतिहास में दो दशकों का प्रतिनिधित्व करने वाली फिल्म ‘पाकीज़ा’ है। 60 के दशक के प्रारम्भिक वर्षों में फिल्म ‘पाकीजा’ के निर्माण की योजना बनी थी। फिल्म की निर्माण प्रक्रिया में इतना अधिक समय लग गया कि दो संगीतकारों को फिल्म का संगीत तैयार करना पड़ा। 1972 में प्रदर्शित इस फिल्म के संगीत के लिए संगीतकार गुलाम मोहम्मद ने शास्त्रीय रागों का आधार लेकर एक से एक गीतों की रचना की थी। गुलाम मोहम्मद ने इस फिल्म के अधिकतर गीत अपने जीवनकाल में ही रिकार्ड करा लिये थे। इसी दौरान वे ह्रदय रोग से पीड़ित हो गए थे। अन्ततः 17 मार्च, 1968 को उनका निधन हो गया। उनके निधन के बाद फिल्म का पृष्ठभूमि संगीत और तीन ठुमरियाँ- परवीन सुल्ताना, राजकुमारी और वाणी जयराम कि आवाज़ में संगीतकार नौशाद ने रिकार्ड किया। अन्ततः यह महत्वाकांक्षी फिल्म गुलाम मोहम्मद के निधन के लगभग चार वर्ष बाद प्रदर्शित हुई थी। संगीत इस फिल्म का सर्वाधिक आकर्षक पक्ष सिद्ध हुआ, किन्तु इसके सर्जक इस सफलता को देखने के लिए हमारे बीच नहीं थे। आइए, फिल्म ‘पाकीज़ा’ में नौशाद द्वारा शामिल की गई वह पारम्परिक ठुमरी सुनवाते हैं, जिसे सुप्रसिद्ध गायिका परवीन सुलताना ने राग पहाड़ी का स्वर दिया है। विदुषी परवीन सुलताना ने तीनों सप्तकों में फिरने वाले स्वरो में इस ठुमरी को एक अलग रंग दिया है। आप इस ठुमरी का रसास्वादन कीजिए और मुझे वर्ष 2015 के इस समापन अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग  पहाड़ी : फिल्म  पाकीज़ा : ‘कौन गली गयो श्याम...’ : बेगम परवीन सुलताना






संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 250वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वाद्य संगीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पाँचवीं श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा। ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी अंक में हम वार्षिक विजेताओं द्वारा प्रस्तुत ‘स्वरगोष्ठी’ का अंक प्रकाशित करेंगे।


1 – संगीत का यह अंश सुन कर बताइए कि आपको किस राग का आभास हो रहा है?

2 – संगीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप वाद्य के वादक के नाम का अनुमान लगा सकते हैं?

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 2 जनवरी, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 252वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 248 की संगीत पहेली में हमने आपको पण्डित रामनारायण द्वारा प्रस्तुत सारंगी पर राग दरबारी का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। इस पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग दरबारी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल मध्यलय तीनताल और तीसरे प्रश्न का उत्तर है- वाद्य – सारंगी। सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं- जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर लघु श्रृंखला ‘संगीत के शिखर पर’ का यह ग्यारहवाँ और समापन अंक था। इस अंक में हमने भारतीय फिल्मों के अप्रतिम संगीतकार नौशाद अली के व्यक्तित्व और कृतित्व पर संक्षिप्त प्रकाश डालने का प्रयत्न किया है। यह वर्ष 2015 का समापन अंक था। अगला अंक वर्ष 2016 का पहला अंक होगा। इस अंक में ‘स्वरगोष्ठी’ की पहेली के चौथे वार्षिक विजेता का परिचय प्राप्त करेंगे। आगामी अंकों में यदि आप किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  





Sunday, December 2, 2012

स्वरगोष्ठी में आज : ठुमरी- ‘गोरी तोरे नैन काजर बिन कारे...’


'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' की पहली वर्षगाँठ पर सभी पाठकों-श्रोताओं का हार्दिक अभिनन्दन   


स्वरगोष्ठी-९८  में आज 

फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी –९ 

श्रृंगार रस से परिपूर्ण ठुमरी ‘गोरी तोरे नैन काजर बिन कारे...’



फिल्मों में शामिल की गई पारम्परिक ठुमरियों पर केन्द्रित ‘स्वरगोष्ठी’ की लघु श्रृंखला ‘फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ के एक नए अंक में, मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, आज का यह अंक जारी श्रृंखला की ९वीं कड़ी है और आज की इस कड़ी में हम आपको पहले राग पीलू की ठुमरी ‘गोरी तोरे नैन, काजर बिन कारे... ’ का पारम्परिक स्वरूप, और फिर इसी ठुमरी का फिल्मी स्वरूप प्रस्तुत करेंगे। इसके अलावा इस अंक में एकल तथा युगल ठुमरी गायन की परम्परा के बारे में आपके साथ चर्चा करेंगे। 


ज पीलू की यह ठुमरी ‘गोरी तोरे नैन काजर बिन कारे...’ हम आपको सबसे पहले गायिका इकबाल बानो की आवाज़ में सुनवाते हैं। इकबाल बनो का जन्म १९३५ में दिल्ली के एक सामान्य परिवार में हुआ था। बचपन में ही उनकी प्रतिभा को पहचान कर दिल्ली के उस्ताद चाँद खाँ ने उन्हें रागदारी संगीत का प्रशिक्षण देना आरम्भ किया। कुछ वर्षों की संगीत-शिक्षा के दौरान उस्ताद ने अनुभव किया कि इकबाल बानो के स्वरों में भाव और रस के अभिव्यक्ति की अनूठी क्षमता है। उस्ताद ने उन्हें ठुमरी, दादरा और गजल गायन की ओर प्रेरित और प्रशिक्षित किया। मात्र १४ वर्ष की आयु में इकबाल बानो ने दिल्ली रेडियो से शास्त्रीय और उप-शास्त्रीय गायन आरम्भ कर दिया था। वर्ष १९५० में उन्हें देश की प्रख्यात गायिकाओं में शुमार कर लिया गया था। १९५२ में १७ वर्ष की आयु में उनका विवाह पाकिस्तान के एक समृद्ध परिवार में हुआ और उन्होने मुल्तान शहर को अपना नया ठिकाना बनाया। पाकिस्तान के संगीत-प्रेमियों ने इकबाल बानो को सर-आँखों पर बैठाया। शीघ्र ही वह रेडियो पाकिस्तान की नियमित गायिका बन गईं। यही नहीं उन्होने अनेक फिल्मों में पार्श्वगायन भी किया। १९८५ में उन्हें फैज अहमद ‘फैज’ की नज़मों पर विशेष शोध और गायन के लिए विश्वस्तर पर सम्मान प्राप्त हुआ था। २१ अप्रैल, २००९ को लाहौर में उनका निधन हो गया। इस अप्रतिम गायिका के स्वरों में ही है, आज की ठुमरी, लीजिए प्रस्तुत है।

पीलू ठुमरी : ‘गोरी तोरे नैन काजर बिन कारे...’ विदुषी इकबाल बानो



आम तौर पर मंच पर एकल ठुमरी गायन की ही परम्परा है। युगल ठुमरी गायन का उदाहरण कभी-कभी उस समय परिलक्षित होता है, जब युगल खयाल गायक खयाल के बाद अन्त में ठुमरी गाते है। इसके अलावा नृत्य के कार्यक्रम में भाव अंग के अन्तर्गत दो नर्तक या नृत्यांगना मंच पर जब भाव-प्रदर्शन करते हैं। बीसवीं शताब्दी के मध्यकाल में संगीत के मंच पर जिन युगल गायकों का वर्चस्व था उनमें शामचौरासी घराने के उस्ताद नज़ाकत अली (१९२०-१९८४) और सलामत अली (१९३४-२००१) बन्धुओं का नाम शीर्ष पर था। देश के विभाजन के बाद ये दोनों भाई पाकिस्तान के प्रमुख युगल गायक के रूप में प्रतिष्ठित हुए। इन्हीं के दो छोटे भाई अख्तर अली और ज़ाकिर अली हैं, जिनका ठुमरी-दादरा गायन संगीत के मंचों पर बेहद लोकप्रिय हुआ। आइए, अब हम आपको उस्ताद अख्तर अली और ज़ाकिर अली खाँ की आवाज़ में राग पीलू की यही ठुमरी- 'गोरी तोरे नैन काजर बिन कारे...' सुनवाते हैं।

पीलू ठुमरी : ‘गोरी तोरे नैन काजर बिन कारे...’ उस्ताद अख्तर अली और ज़ाकिर अली खाँ



१९६४ में अजीत और माला सिन्हा अभिनीत फिल्म ‘मैं सुहागन हूँ’ प्रदर्शित हुई थी। इस फिल्म का संगीत फिल्मों के एक कम चर्चित संगीतकार लच्छीराम तँवर ने तैयार किया था। लच्छीराम की स्वतंत्र रूप से प्रथम संगीत निर्देशित १९४७ की फिल्म थी ‘आरसी’। इस पहली फिल्म का संगीत अत्यन्त लोकप्रिय भी हुआ, किन्तु १९४७ से १९६४ के बीच उन्हें साधारण स्तर की फिल्मों के प्रस्ताव ही मिले। इसके बावजूद उनकी प्रत्येक फिल्मों के एक-दो गीतों ने लोकप्रियता के मानक गढ़े। १९६४ की फिल्म ‘मैं सुहागन हूँ’ उनकी अन्तिम फिल्म थी। इस फिल्म में लच्छीराम ने इस परम्परागत ठुमरी को आशा भोसले और मोहम्मद रफ़ी के स्वरों में प्रस्तुत किया। फिल्मों में प्रयोग की गई ठुमरियों में सम्भवतः पहली बार युगल स्वरों में किसी ठुमरी को शामिल किया गया था। फिल्म में नायक-नायिका अजीत और माला सिन्हा हैं, परन्तु इस ठुमरी को फिल्म के सह-कलाकारों, सम्भवतः केवल कुमार और निशी पर फिल्माया गया है। ठुमरी के अन्त में अभिनेत्री द्वारा तीनताल में कथक के तत्कार और टुकड़े भी प्रस्तुत किये गए हैं। मूलतः यह ठुमरी राग पीलू की है। परन्तु लच्छीराम ने इसे राग देस के स्वरों में बाँधा है। आशा भोसले और मोहम्मद रफ़ी ने गायन में राग देस के स्वरों को बड़े आकर्षक ढंग से निखारा है। रफ़ी ने इस गीत को सपाट स्वरों में गाया है किन्तु आशा भोसले ने स्वरों में मुरकियाँ देकर और बोलों में भाव उत्पन्न कर ठुमरी को आकर्षक रूप दे दिया है। आइए सुनते हैं, श्रृंगार रस से ओतप्रोत राग देस में यह फिल्मी ठुमरी। आप इस ठुमरी का रसास्वादन करें और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

फिल्म ‘मैं सुहागन हूँ’ : देस ठुमरी : ‘गोरी तोरे नैन काजर बिन कारे...’ : आशा भोसले और मोहम्मद रफी



आज की पहेली

आज की संगीत पहेली में हम आपको एक पंजाब अंग के सुविख्यात गायक के स्वर में एक पारम्परिक ठुमरी का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली के सौवें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


१- यह ठुमरी किस विख्यात गायक की आवाज़ में है?

२- आपने अभी जिस पारम्परिक ठुमरी का अंश सुना है, इसी ठुमरी का प्रयोग आठवें दशक की एक फिल्म में किया गया था। क्या आप उस फिल्म में शामिल ठुमरी के राग का नाम हमें बता सकते हैं?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के १०० वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। हमसे सीधे सम्पर्क के लिए swargoshthi@gmail.com पर अपना सन्देश भेज सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ के ९६वें अंक की पहेली में हमने आपको रसूलन बाई के स्वरों में भैरवी की पारम्परिक ठुमरी ‘जा मैं तोसे नाहीं बोलूँ...’ का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग ‘भैरवी’ और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- फिल्म ‘सौतेला भाई’। दोनों प्रश्नों के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी, लखनऊ से प्रकाश गोविन्द और जौनपुर, उत्तर प्रदेश से डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर से हार्दिक बधाई।

झरोखा अगले अंक का



मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी लघु श्रृंखला ‘फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ की शुरुआत हमने १९३६ की फिल्म ‘देवदास’ में शामिल पारम्परिक ठुमरी ‘पिया बिन नाहीं आवत चैन....’ से किया था। अब हम आ पहुँचे हैं, इस श्रृंखला के समापन की दिशा में। अन्तिम दो अंकों में हम आठवें दशक की फिल्मों में शामिल ठुमरियों पर चर्चा करेंगे। अगले अंक में हम आपके लिए एक और मनमोहक पारम्परिक ठुमरी लेकर उपस्थित होंगे। अगले रविवार को प्रातः ९-३० पर हमारी इस सुरीली गोष्ठी में आप अपनी उपस्थिति अवश्य दर्ज़ कराइएगा। अब हमें आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

कृष्णमोहन मिश्र


Wednesday, April 25, 2012

"डफ़ली वाले डफ़ली बजा..." - शुरू-शुरू में नकार दिया गया यह गीत ही बना फ़िल्म का सफ़लतम गीत


कभी-कभी ऐसे गीत भी कमाल दिखा जाते हैं जिनसे निर्माण के समय किसी को कोई उम्मीद ही नहीं होती। शुरू-शुरू में नकार दिया गया गीत भी बन सकता है फ़िल्म का सर्वाधिक लोकप्रिय गीत। एक ऐसा ही गीत है फ़िल्म 'सरगम' का "डफ़ली वाले डफ़ली बजा"। यही है आज के 'एक गीत सौ कहानियाँ' के चर्चा का विषय। प्रस्तुत है इस शृंखला की १७-वीं कड़ी सुजॉय चटर्जी के साथ...



एक गीत सौ कहानियाँ # 17


फ़िल्म इंडस्ट्री एक ऐसी जगह है जहाँ किसी फ़िल्म के प्रदर्शित होने तक कोई १००% भरोसे के साथ यह नहीं कह सकता कि फ़िल्म चलेगी या नहीं, यहाँ तक कि फ़िल्म के गीतों की सफ़लता का भी पूर्व-अंदाज़ा लगाना कई बार मुश्किल हो जाता है। बहुत कम बजट पर बनी फ़िल्म और उसके गीत भी कई बार बहुत लोकप्रिय हो जाते हैं और कभी बहुत बड़ी बजट की फ़िल्म और उसके गीत-संगीत को जनता नकार देती है। मेहनत और लगन के साथ-साथ क़िस्मत भी बहुत मायने रखती है फ़िल्म उद्योग में। संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल के संगीत सफ़र का एक महत्वपूर्ण पड़ाव था फ़िल्म 'सरगम' का संगीत। १९७९ में प्रदर्शित इस फ़िल्म का "डफ़ली वाले डफ़ली बजा" गीत उस साल बिनाका गीतमाला में चोटी का गीत बना था। और इसी फ़िल्म के संगीत ने एल.पी को १९८० में सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार भी दिलवाया। भले यह पुरस्कार उन्हें मिला पर स्तर की अगर बात करें तो इस फ़िल्म के गीत चल्ताऊ क़िस्म के ही थे। 'सरगम' की तुलना में इसी वर्ष पं रविशंकर के संगीत में फ़िल्म 'मीरा' के गीत या कानु राय के संगीत में फ़िल्म 'गृहप्रवेश' के गीत कई गुणा ज़्यादा उत्कृष्ट थे, पर यह भी एक विडम्बना ही है कि फ़िल्मफ़ेयर कमिटी ने बहुत कम बार के लिए ही गुणवत्ता को पैमाना समझा है। "डफ़ली वाले" गीत के लिए आनन्द बक्शी को सर्वश्रेष्ठ गीतकार के फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार का नामांकन मिला था, पर यह पुरस्कार मिला था गुलज़ार को फ़िल्म 'गोलमाल' के "आने वाला पल जाने वाला है" गीत के लिए।

"डफ़ली वाले डफ़ली बजा" को जनता ने भी हाथों हाथ ग्रहण किया। पर मज़े की बात यह है कि शुरू-शुरू में फ़िल्म के निर्माता-निर्देशक ने इस गीत को फ़िल्म में रखने से इंकार कर दिया था। इस बात पर अभी आते हैं, उससे पहले 'सरगम' के पार्श्व पर एक नज़र डालते हैं। 'सरगम' एन. एन. सिप्पी द्वारा निर्मित फ़िल्म थी। के. विश्वनाथ लिखित व निर्देशित यह फ़िल्म १९७६ की सुपरहिट तेलुगू फ़िल्म 'सिरि सिरि मुव्वा' की रीमेक थी। 'सरगम' ने अभिनेत्री जया प्रदा को स्टार बना दिया, इस फ़िल्म के लिए उन्हें फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का नामांकन भी मिला था, और इस फ़िल्म को १९७९ के बॉक्स ऑफ़िस में तीसरा स्थान मिला था। अब आते हैं "डफ़ली वाले" गीत पर। जब लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल ने इस गीत की धुन बनाई और आनन्द बक्शी ने बोल लिखे, और निर्माता-निर्देशक को सुनाया तो उन्हें बिल्कुल पसन्द नहीं आया। उन्हें बोल और संगीत दोनों ही बेकार लगे। "डफ़ली वाले डफ़ली बजा, मेरे घुंघरू बुलाते हैं, आ, मैं नाचूँ तू नचा", ये बोल बहुत ही सस्ते और चल्ताऊ किस्म के लगे। सच भी है, फ़िल्म के अन्य गीतों ("पर्बत के इस पार", "कोयल बोली दुनिया डोली", "मुझे मत रोको मुझे गाने दो", "रामजी की निकली सवारी", "हम तो चले परदेस", "कहाँ तेरा इंसाफ़") की तुलना में "डफ़ली वाले" के बोल कम स्तरीय थे। "डफ़ली वाले" गाना रद्द हो गया। फ़िल्म की शूटिंग् शुरू हुई; एक एक कर सारे गानें फ़िल्माए गए। पर लक्ष्मी-प्यारे को पता नहीं क्यों ऐसा लग रहा था कि "डफ़ली वाले" को पब्लिक स्वीकार करेगी और गाना हिट होगा, पर उनकी बात को कोई नहीं मान रहा था। पूरी फ़िल्म कम्प्लीट हो गई पर "डफ़ली वाले" की क़िस्मत नहीं चमकी। पर अन्त में एल.पी के लगातार अनुरोध करने पर निर्माता मान गए और "डफ़ली वाले" गीत की रेकॉर्डिंग् को अप्रूव कर दिया।

लता और रफ़ी की आवाज़ों में लक्ष्मी-प्यारे ने "डफ़ली वाले डफ़ली बजा" को रेकॉर्ड तो कर लिया गया, पर अब अगली समस्या यह आन पड़ी की फ़िल्म में किसी और गीत की कोई गुंजाइश ही नहीं बची थी। ऐसी कोई सिचुएशन नहीं थी जिसमें "डफ़ली वाले" को फ़िट किया जाए। जिन लोगों ने यह फ़िल्म देखी है, उन्हें पता है कि "डफ़ली वाले" को फ़िल्म के बिल्कुल अन्त में, क्लाइमैक्स से पहले एक ऐसी जगह पर डाल दिया गया है, बल्कि यूं कहें कि ठूस दिया गया है, जहाँ पर गीत का कोई सिचुएशन ही नहीं था। मैंने जब यह फ़िल्म दूरदर्शन पर देखी थी, तब इस गीत को न पा कर शुरू शुरू में ऐसा लगा था जैसे दूरदर्शन वालों ने गीत को काट दिया है (ऐसा दूरदर्शन अक्सर करता था), पर मेरी यह धारणा ग़लत निकली और फ़िल्म के बिल्कुल अन्त में यह गीत सुनाई/दिखाई दिया। इस तरह से "डफ़ली वाले" को फ़िल्म में एन्ट्री तो मिल गई और गीत भी ख़ूब लोकप्रिय हुआ, पर एक अफ़सोस की बात यह रह गई कि फ़िल्म में इस गीत के लिए एक अच्छी सिचुएशन नहीं बन सकी। अगर निर्माता-निर्देशक शुरू में ही एल.पी की बात मान कर गीत को रख लेते तो शायद ऐसा नहीं होता। ख़ैर, अन्त भला तो सब भला।

ॠषी कपूर, डफ़ली और लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल की तिकड़ी का एक बार फिर साथ हुआ 'सरगम' के बनने के १० साल बाद। १९८९ में एक फ़िल्म बनी थी 'बड़े घर की बेटी', जिसमें "डफ़ली वाले" गीत जैसा एक गीत बनाने की कोशिशें हुई थी। आनन्द बक्शी की जगह आ गए संतोष आनन्द, जया प्रदा की जगह आ गईं मीनाक्षी शेशाद्री, तथा लता-रफ़ी के जगह आ गए अनुराधा पौडवाल और मोहम्मद अज़ीज़। और गीत बना "तेरी पायल बजी जहाँ मैं घायल हुआ वहाँ, तेरी डफ़ली बजी जहाँ मैं पागल हुई वहाँ"। यह गीत "डफ़ली वाले" की तरह ब्लॉकबस्टर तो नहीं हुआ, पर अच्छी ख़ासी लोकप्रियता ज़रूर हासिल की थी। यूं तो फ़िल्मी गीतों के फ़िल्मांकन में डफ़ली का प्रयोग काफ़ी बार हुआ है, पर गीत के बोलों में डफ़ली का इस्तमाल इन्हीं दो गीतों में सबसे ज़्यादा चर्चित हुआ है। चलते चलते यही कहेंगे कि "डफ़ली वाले डफ़ली बजा" की सफलता से हमें ज़िन्दगी के लिए यही सबक मिलती है कि किसी को भी हमें अंडरेस्टिमेट नहीं करनी चाहिए, कब कौन बड़ा काम कर जाए कह नहीं सकते, किसी को भी कमज़ोर समझ कर उसका अपमान नहीं करना चाहिए; शुरू-शुरू में नकार दिया गया गीत "डफ़ली वाले डफ़ली बजा" ही बना था फ़िल्म का सफ़लतम गीत।

"डफ़ली वाले" सुनने के लिए नीचे प्लेयर पर क्लिक करें।


तो दोस्तों, यह था आज का 'एक गीत सौ कहानियाँ'। कैसा लगा ज़रूर बताइएगा टिप्पणी में या आप मुझ तक पहुँच सकते हैं cine.paheli@yahoo.com के पते पर भी। इस स्तंभ के लिए अपनी राय, सुझाव, शिकायतें और फ़रमाइशें इसी ईमेल आइडी पर ज़रूर लिख भेजें। आज बस इतना ही, अगले बुधवार फिर किसी गीत से जुड़ी बातें लेकर मैं फिर हाज़िर हो‍ऊंगा, तब तक के लिए अपने इस ई-दोस्त सुजॉय चटर्जी को इजाज़त दीजिए, नमस्कार!

Saturday, December 24, 2011

२४ दिसम्बर - आज का कलाकार - मोहम्मद रफ़ी - जन्मदिन मुबारक

मोहम्मद रफ़ी एक ऐसा नाम है जिसे किसी परिचय की जरूरत नहीं.आज २४ दिसम्बर रफ़ी साहब का ८४ वाँ जन्मदिन है.


हिन्दी सिनेमा के श्रेष्ठतम पार्श्व गायकों में से एक थे.इन्हें शहंशाह-ए-तरन्नुम भी कहा जाता था.१९४० के दशक से आरंभ कर १९८० तक तक इन्होने कुल २६००० गाने गाए.जिन अभिनेताओं पर उनके गाने फिल्माए गए उनमें गुरु दत्त, दिलीप कुमार, देव आनंद, भारत भूषण, जॉनी वॉकर, जॉय मुखर्जी, शम्मी कपूर, राजेन्द्र कुमार, राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन, धर्मेन्द्र, जीतेन्द्र तथा ऋषि कपूर के अलावे गायक अभिनेता किशोर कुमार का नाम भी शामिल है. हिन्दी के अलावा आपने अन्य भाषाओं में भी गाया.

Tuesday, May 31, 2011

तेरी बिंदिया रे....शब्द और सुरों का सुन्दर मिलन है ये गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 668/2011/108

'ओल्ड इज़ गोल्ड' में इन दिनों जारी है मजरूह सुल्तानपुरी पर केन्द्रित लघु शृंखला '...और कारवाँ बनता गया'। इसके तहत हम दस अलग अलग संगीतकारों द्वारा स्वरबद्ध मजरूह साहब के लिखे गीत सुनवा रहे हैं जो बने हैं अलग अलग दौर में। ४०, ५० और ६० के बाद आज हम क़दम रख रहे हैं ७० के दशक में। ५० के दशक में नौशाद, अनिल बिस्वास, ओ.पी. नय्यर, मदन मोहन, के अलावा एक और नाम है जिनका उल्लेख किये बग़ैर यह शृंखला अधूरी ही रह जायेगी। और वह नाम है सचिन देव बर्मन का। अब आप सोच रहे होंगे कि ५० के दशक के संगीतकारों के साथ हमनें उन्हें क्यों नहीं शामिल किया। दरअसल बात ऐसी है कि हम बर्मन दादा द्वारा स्वरबद्ध जिस गीत को सुनवाना चाहते हैं, वह गीत है ७० के दशक का। इससे पहले कि हम इस गीत का ज़िक्र करें, हम वापस ४०-५० के दशक में जाना चाहेंगे। मेरा मतलब है मजरूह साहब के कहे कुछ शब्द जिनका ताल्लुख़ उस ज़माने से है। विविध भारती के किसी कार्यक्रम में उन्होंने ये शब्द कहे थे - "१९४५ से १९५२ के दरमियाँ की बात है। उस समय मैंने तरक्की-पसंद अशार की शुरुआत की थी। मेरे उम्र के जानकार लोगों को यह मालूम होगा कि आज ऐसे अशार जो किसी और के नाम से लोग जानते हैं, वो तरक्की-पसंद शायरी मैंने ही शुरु की थी। मैं एक बार अमरीका और कैनाडा गया था। वहाँ के कई यूनिवर्सिटीज़ में मैं गया, मुझे इस बात की हैरानी हुई कि वहाँ के शायरी-पसंद लोगों को मेरे अशार तो याद हैं, पर कोई फ़ैज़ के नाम से, तो कोई फ़रहाद के नाम से, मजरूह के नाम से नहीं"।

सचिन देव बर्मन की धुन पर मजरूह साहब के लिखे बेशुमार गीतों में से आज सुनिये १९७३ की फ़िल्म 'अभिमान' से लता-रफ़ी की आवाज़ों में "तेरी बिंदिया रे, आये हाये"। 'अभिमान' हिंदी सिनेमा की सफलतम फ़िल्मों में से एक है। यह फ़िल्म न केवल अमिताभ बच्चन और जया भादुड़ी के करीयर के लिये मील का पत्थर साबित हुई थी, इस फ़िल्म के गीतों नें भी काफ़ी धूम मचाया। फ़िल्म का हर गीत सुपरहिट, हर गीत लाजवाब। आज ४० वर्ष बाद भी इस फ़िल्म के गीत आये दिन सुनाई देते हैं। फ़िल्म के तीनों युगल गीतों, "तेरे मेरे मिलन की यह रैना" (लता-किशोर), "लूटे कोई मन का नगर बनके मेरा साथी" (लता-मनहर) और आज का प्रस्तुत गीत, का सर्वाधिक, सदाबहार व लोकप्रिय युगल गीतों की श्रेणी में शुमार होता है। फ़िल्म के सभी एकल गीत, "नदिया किनारे हेराये आयी कंगना" (लता), "पिया बिना बासिया बाजे ना" (लता), "अब तो है तुमसे हर ख़ुशी अपनी" (लता) तथा "मीत ना मिला रे मन का" (किशोर), भी सफलता की दृष्टि से पीछे नहीं थे। आज के प्रस्तुत गीत की बात करें तो जितना श्रेय दादा बर्मन को इसके संगीत के लिये जाता है, उतना ही श्रेय मजरूह साहब को भी जाता है ऐसे ख़ूबसूरत बोल पिरोने के लिये। जहाँ एक तरफ़ मजरूह नें शृंगार रस की ऐसी सुंदर अभिव्यक्त्ति दी, वहीं दूसरी तरफ़ दादा बर्मन नें रूपक ताल में इसे कम्पोज़ कर जैसे कोमलता और मधुरता की एक नई धारा ही बहा दी। और दोस्तों, यह वह दौर था जब फ़िल्म-संगीत में शोर-शराबे की शुरुआत हो रही थी। इस फ़िल्म के लिये फ़िल्मफ़ेयर में सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का पुरस्कार जीत कर दादा नें नये दौर के सफल संगीतकारों को जैसे सीधी चुनौति दे दी। केवल तबला, सितार और बांसुरी की मधुर तानों से इस गीत को जिस तरह से दादा नें बांधा है, उन्होंने यह साबित किया कि एक ही समय पर कर्णप्रिय, स्तरीय और लोकप्रिय गीत बनाने के लिये आधुनिक तकनीकों की नहीं, बल्कि सृजनात्मक्ता की आवश्यक्ता होती है। 'ताज़ा सुर ताल' प्रस्तुत करते हुए मुझे यह अनुभव भी होता है और अफ़सोस भी कि फ़िल्म-संगीत के वाहक इसे किस मुक़ाम पर आज ले आये हैं! ख़ैर, फ़िल्हाल सुनते हैं 'अभिमान' का यह एवरग्रीन डुएट।



क्या आप जानते हैं...
कि मजरूह सुल्तानपुरी नें करीब करीब ३५० फ़िल्मों में करीब ४००० गीत लिखे हैं।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 8/शृंखला 17
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - बेहद आसान.
सवाल १ - फिल्म के मुख्य कलकार कौन कौन हैं (दो अभिनेत्रियों और एक अभिनेता का नाम बताएं) - ३ अंक
सवाल २ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक
सवाल ३ - संगीतकार बताएं- २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अविनाश जी बढ़त बनाये हुए हैं, शरद जी जरा लेट हुए मगर क्षिति जी चूक गयीं, कोई बात नहीं नेक्स्ट टाइम

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Friday, February 20, 2009

आपको प्यार छुपाने की बुरी आदत है...

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला (०१)

आवाज़ की दुनिया के मेरे दोस्तों, आज से आवाज़ पर हम शुरू कर रहे हैं एक नया स्तंभ -"ओल्ड इस गोल्ड".यह एक ऐसा स्तंभ है जो सलाम करती है फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर के उन बेशकीमती गीतों को जिनसे फ़िल्म संगीत संसार आज तक महका हुआ है. इस स्तंभ के अंतर्गत हम न केवल आपको उस गुज़रे दौर के लोकप्रिय गाने सुनवायेंगे, बल्कि उन गीतों की थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे. आज इस नए स्तंभ की पहली कड़ी में हमने जिस गीत को चुना है आपले साथ बाँटने के लिए, वो फ़िल्म "नीला आकाश" का है. ये फ़िल्म बनी थी १९६५ में. राजेंदर भाटिया द्वारा निर्देशित इस फ़िल्म के मुख्या कलाकार थे धर्मेन्द्र और माला सिन्हा.जहाँ तक इसके गीत संगीत का सवाल है, इस फ़िल्म के गाने लिखे रजा मेहंदी अली खान ने, और संगीतकार थे मदन मोहन. दोस्तों, आपको शायद ये बताने की जरुरत नही कि राजा मेहंदी अली खान और मदन मोहन की जोड़ी ने बहुत सारे खूबसूरत गीत हमें दिए हैं. बल्कि यूँ कहें कि राजेंदर कृष्ण के बाद मदन मोहन जिस गीतकार के सबसे ज्यादा गीत संगीतबद्ध किए, वो थे राजा मेहंदी अली खान.

नीला आकाश के ज्यादातर गाने आशा भोंसले और मोहम्मद रफी ने गाये सिवाय एक गीत के जिसे लता मंगेशकर ने गाया था. रफी और आशा की आवाजों में "तेरे पास आके मेरा वक्त गुजर जाता है...", इस फ़िल्म का सबसे हिट गीत रहा. लेकिन आज हम यहाँ जिस गीत का जिक्र कर रहे हैं वो है तो आशा और रफी की ही आवाजों में, लेकिन वो गीत है "आपको प्यार छुपाने की बुरी आदत है.." रूमानियत से भरे इस खूबसूरत युगल गीत में है मीठी छेड़ छाड़, कुछ शिकवे शिकायतें और हल्की फुल्की नोंक झोंक, जो हमें ले जाती है उस ज़माने में जहाँ प्यार बहुत मासूम हुआ करता था. "किसलिए आपने शरमा के झुका ली ऑंखें.." के जवाब में में नायिका का कहना -"इसलिए आपसे शरमा के झुका ली ऑंखें, आपको तीर चलाने की बुरी आदत है..", इसी मासूमियत की एक मिसाल है. इस गीत से जुड़ी एक और ख़ास बात यह है कि इस गीत का फिल्मांकन दिल्ली के लोधी गार्डन में किया गया था. तो अब सुनिए ये गीत और याद सजायिये अपने अपने प्रेमी/प्रेमिका के साथ गुजरे उन मीठी तकरारों वाले दिनों की -



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. किशोर कुमार और नूतन पर फिल्माए गए इस गीत में नूतन की अदाकारी को आवाज़ दी है आशा भोंसले ने.
२. १९५८ में आई इस फ़िल्म के इस जबरदस्त हास्य गीत ने बिनाका संगीत परेड में, टॉप ३ में अपनी जगह बनाई थी.
३. गीत में अंग्रेजी शब्दों का सुंदर इस्तेमाल हुआ है.

कुछ याद आया...?


प्रस्तुति - सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सदर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Wednesday, February 18, 2009

नौशाद की तीन सर्वश्रेष्ठ फिल्मों के संगीत पर एक चर्चा

(पिछले अंक से आगे ...)


नौशाद अली का संगीत सभी के दिलों पर राज़ करता है। यदि अब तक सभी संगीतकारों का जिक्र होगा तो नौशाद का नाम आर.डी.बर्मन,रहमान आदि के साथ लिया जायेगा। उनका संगीत हमेशा अमर रहेग और ऐसे ही चमकता रहेगा। आज की तारीख का कोई भी संगीतकार मुगल-ए-आज़म जैसी एल्बम तैयार नहीं कर सकता और शायद ऐसा अमर गीत भी कभी नही-



नौशाद ने तमाम फिल्मों में काम किया लेकिन यदि उनकी किन्हीं तीन फिल्मों का जिक्र करना चाहें तो वो शायद ये होंगी:
१. मुगल-ए-आज़म : शायद ही किसी को इस बारे में शक हो कि फिल्मी इतिहास में इस फिल्म का संगीत नौशाद का सर्वोत्तम संगीत रहा है। इस फिल्म के ज्यादातर गाने लता मंगेशकर द्वारा गाये गये हैं। हालाँकि ओर्केस्ट्रा आज के समय की तरह तकनीकी और आधुनिकता से लैस नहीं है लेकिन फिर भी उन गानों की मेलोडी की किसी भी अन्य गीत से तुलना नहीं की जा सकती। लता का गाया हुआ राग गारा में 'मोहे पनघट पे नंद लाल' एक तरह से कव्वाली भी है और उस गाने में हर बात सर्वोत्तम है... उसका ट्रैक..जबर्दस्त उर्दू शब्द...से लेकर लता मंगेशकर के साथ साथ कोरस भी कोई कमी नहीं छोड़ रहा था। नौशाद का संगीत उसमें चार-चाँद लगाता है। उसी फिल्म में रागदरबारी में 'प्यार किया तो डरना क्या..' एक और कव्वाली है जो ये सोचने पर मजबूर कर देती है कि 'मोहे..' और 'प्यार किया..' में से बेहतर कौन है। अगला गाना राग यमन में 'खुदा निगेबान..' में एक बार फिर उर्दू के खूबसुरत बोल हैं, लता की मिठास है और उस पर नौशाद का संगीत...कुल मिलाकर इस एल्बम में नौशाद ने फिल्म की जरुरत के हिसाब से वो जबर्दस्त संगीत दिया है जो उसके बाद से अब तक ५० वर्षॊं से न केवल टिका हुआ बल्कि आधुनिकता और सुविधा-सम्पन्न आज के संगीत को कड़ी टक्कर दे रहा है। आने वाले ५० बरसों में भी यही होगा।



२. दूसरी फिल्म है बैजू बावरा: ये वो फिल्म है जिसके बाद नौशाद की पहचान बनी, वे सब की नजरॊ में आये और उसके बाद ही उन्होंने मुगल-ए-आज़म, मेरे महबूब व बाकि फिल्मों में काम किया। ये फिल्म भारतीय सिनेमा के इतिहास अपना अलग महत्त्व रखती है। इसका मशहूर भजन 'मन तरपत हरि दर्शन..' को आज भी सबसे बढ़िया भक्ति गीतों में शुमार किया जाता है। गौर करने वाली बात यह है कि इस गीत के बोल लिखें हैं मोहम्मद शकील ने, इसको गाया है मोहम्मद रफी ने और धुन बनाई है नौशाद ने..ये तीनों ही मुस्लिम रहे हैं। नौशाद के संगीत और इस गीत ने ये साबित कर दिया है कि संगीत किसी एक धर्म का नहीं है। बाकि मशहूर गानों में 'ओ दुनिया के रखवाले..' जिसे गाया था नौशाद के पसंदीदा गायक रफी ने। "झूले में पवन के", जिसे लता और रफी दोनों ने अपनी आवाज़ दी। इनके गीतों को सुनना अपने आप में एक अलग अनुभव होता है। राग भैरवी में 'तू गंगा की मौज..' को कौन भूल सकता है... जिसके सुंदर बोल,कोरस एफैक्ट और ओर्केस्ट्रा सब मिलकर इस गीत को एक अमर रचना में तब्दील कर देते हैं.



३. कोहिनूर: नौशाद द्वारा संगीतबद्ध एक और फिल्म। यह फिल्म मेलोडी के अलावा भी और कईं कारणॊं से मील का पत्थर रही। 'मधुबन में राधिका नाचे रे..' गाना आज भी पसंद किया जाता है। इस पूर्णतया राग प्रधान गीत के लिये रफी साहब की जितनी तारीफ की जाये उतनी कम है। नौशाद जोखिम उठाने में कभी भी नहीं हिचकिचाते थे। नये नये प्रयोग करना उन्हें अच्छा लगता था। इस फिल्म के निर्देशक थोड़े घबराये हुए थे, क्योंकि यह गाना किसी भी लिहाज से पारंपरिक कव्वाली नहीं था और न ही ये सामान्य गानों की तरह अथवा पाश्चात्य समाये हुए था। फिर भी इस गाने की धुन अपने आप में आधुनिकता समेटे हुए थी जिसको अपनी आवाज़ से रफी साब ने और सुरीला बना दिया था। नौशाद इस गाने को लेकर इतने विश्वास से भरे हुए थे कि वे कोहिनूर के लिये जो भी पैसे उन्हें मिल रहे थे वे भी वापस करने को तैयार थे अगर बॉक्स ऑफिस पर ये गीत पिट जाता। लेकिन जो हुआ वो सब ने देखा और सुना। यह गाना पूरे भारत में अपने शास्त्रीय संगीत और रिद्म की वजह से कामयाब हुआ। इसी फिल्म के अन्य गीत थे 'ढल चुकी शाम-ए-गम...', 'जादूगर कातिल..' 'तन रंग लो जी..'। सभी गानों की खास बात उसका संगीत तो था ही साथ ही बहुत खूबसूरत बोल भी थे।



नौशाद के काम को और भारतीय संगीत में योगदान को इन तीन फिल्मों में कतई नहीं समेटा जा सकता। उनका योगदान निस्संदेह सराहनीय व अतुलनीय है। उनकी आखिरी फिल्म रही अकबर खान की 'ताजमहल'। ये फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कुछ खास कमाल नहीं दिखा पाई। नौशाद का खूबसूरत संगीत खराब स्टार कास्ट के कारण लोगों की नजरों में नहीं आ पाया। फिल्म के प्रोमोशन के लिये निर्माता नौशाद के गानों का भी सही इस्तेमाल नहीं कर सके। जबकि ये वो समय था कि इस फिल्म का संगीत उस समय की अन्य फिल्मों के मुकाबले कहीं बेहतर था। ताजमहल के संगीत को नौशाद का बेस्ट तो नहीं कह सकते किन्तु आज के समय के अन्य संगीतकारों हिमेश, प्रीतम व अनु मलिक तथा अन्यों से हजार गुणा अच्छा था। यदि इस फिल्म के गानों को सुनें तो सबसे अच्छा गीत 'अपनी ज़ुल्फें मेरे...' रहा जिसे हरिहरण ने गाया। हरिहरण उन गायकों में से हैं जिन्हें हमेशा ही कम आंका गया है। प्रीति उत्तम और हरिहरण का ही गाया हुआ एक और जबर्दस्त रोमांटिक गीत 'मुमताज़ तुझे देखा...' रहा। संगीत सुनेंगे तो आपको लगेगा ही नहीं कि ८६ वर्ष का कोई बुजुर्ग ये धुन बना रहा होगा। नौशाद के संगीत में हमेशा ताज़गी समाई हुई रहती है।



प्रस्तुति - तपन शर्मा


Tuesday, February 17, 2009

मछलियाँ पकड़ने का शौकीन भी था वो सुरों का चितेरा

(पिछले अंक से आगे ...)

चाहें कोई पिछली पीढ़ी का श्रोता हो या आज की पीढ़ी का युवा वर्ग हर कोई नौशाद के संगीत पर झूमता है। ज़रा कुछ गीतों पर नजर डालिये... मधुबाला का 'प्यार किया तो डरना क्या' जिस पर आज के दौर में रीमिक्स बनाया जाता है... और जब दिलीप कुमार का "नैन लड़ जई हैं तो मनवा मा.." सुन ले तो कदम अपने आप थिरकने लगते हैं। आज ज्यादातर लोग उस दौर से ताल्लुक नहीं रखते पर फिर भी लगता है कि नौशाद फिल्मों में संगीत नहीं देते थे...बल्कि जादू बिखेरते थे। उनके संगीत में लोक संगीत की झलक मिलती है।

लखनऊ में जन्में १८ वर्षीय बालक से जब उसके पिता ने घर और संगीत में से एक को चुनने को कहा तब उसने संगीत को चुना और खूबसूरत सपने और कड़वी सच्चाइयों वाले मुम्बई शहर जा पहुँचा। आँखों में हजारों सपने लिये फुटपाथ को घर बनाये इस शानदार संगीतकार ने सैकड़ों धुनें तैयार कर दी। यदि फिल्मों पर गौर करें तो महल, बैजू बावरा, मदर इंडिया, मुगल-ए-आज़म, दर्द, मेला, संघर्ष, राम और श्याम, मेरे महबूब-जैसी न जाने कितनी ही फिल्में हैं।



नौशाद की बात करें और लता व रफी की बात न हो तो क्या फायदा। मुगल-ए-आज़म के राग दरबारी में 'मोहब्बत की झूठी कहानी पे रोय' से लेकर गंगा जमुना के 'ढूँढो ढूँढो रे साजना' तक यदि किसी संगीतकार ने गीत की जरूरत, उसके बोल और गायिका की आवाज़ को समझा है तो वो नैशाद ही हैं।

रफी की बात करें तो गानों की लाइन लग सकती है पर फिर भी यदि किन्हीं दो गानों को चुनना पड़े तो शायद हर कोई 'ए दुनिया के रखवाले' और राग मालकौस 'मन तड़पत हरि दर्शन को आज' को ही चुनेगा।



लता मंगेशकर कहती हैं, "मैंने नौशाद साहब के साथ कईं महत्त्वपूर्ण गानों में काम किया है। उनकी शास्त्रीय संगीत में पकड़ और नये पॉपुलर संगीत की समझ ने उन्हें उस समय के सदाबहार गानों को कॉम्पोज़ करने का सबसे योग्य उम्मीदवार बना दिया था। वे याद करती हैं और हँसती हैं जब 'प्यार किया तो डरना क्या' गीत रिकॉर्ड हो रहा था तब बीच में आवाज़ में गुंजन पैदा करनी थी। जिसके लिये नौशाद ने उन्हें बाथरूम से गाने को कहा। उस समय आवाज़ को गुँजाने का कोई साधन नहीं था, इसलिये नौशादा साहब ने ये तरीका ईज़ाद किया। वे आगे बताती हैं कि नौशाद अपनी धुनों व आवाज़ में लगातार प्रयोग करते रहते थे जिसके लिये उन्होंने पाश्चात्य ओर्केस्ट्रा का प्रयोग करने में भी नहीम हिचकिचाये। उनके पसंदीदा गीतों में 'उठाये जा उनके सितम' (अंदाज़), 'जाने वाले से मुलाकात', 'न मिलता गम' (अमर), 'मोहे पनघट पे नंदलाल', राग केदार में 'बेकस पे करम' और राग दरबारी में 'प्यार किया तो..' गाने प्रमुख रहे। आज के समय में ऐसा संगीत दिया ही कहाँ जाता है।



जिन कलाकारों ने उनके साथ काम किया वे उन्हें मिश्रित संस्कृति का प्रतीक मानते हैं। जावेद अख्तर कहते हैं कि नौशाद न केवल एक संगीतकार थे बल्कि देश के मिश्रित संस्कृति के ऐसे प्रतीक थे जिन्होंने भारतीय फिल्म संगीत में कईं परिवर्तन लाये व इसको गरिमा प्रदान की। वे बताते हैं कि नौशाद का फिल्म संगीत में योगदान अद्वितीय था। उनका नाम हमेशा ही श्रद्धा और सम्मान के साथ लिया जाता रहेगा।

जानेमाने निर्देशक महेश भट्ट भी कुछ ऐसा ही कहते हैं। वे कहते हैं कि नौशाद सेक्युलर भारत के प्रतीक थे। उनका सम्गीत संयुक्त सम्स्कृति की प्रतिध्वनि था। जब वे भजन में संगीत दिया करते थे ऐसा लगता था मानो वे हिन्दू हों। उनमें भारतीयता की गहराई थी और यही महान इतिहास व संस्कृति उनके खून में बह रही थी।



नौशाद तेजी से बढ़ते 'रीमिक्स कल्चर' से दूर भागने का प्रयास करते और हमेशा कहते कि हमें समय के साथ आगे बढ़ना तो चाहिये पर अपनी जड़ों के साथ पकड़ हमेशा बना कर रखनी चाहिये।

और अंत में एक ऐसी बात जो शायद बहुत कम लोगों को ही पता होगी। नौशाद साहब को मछली पकड़ने का शौक था। संगीत निर्देशन के अति व्यस्त कार्यक्रम से समय निकाल कर वे "एंग्लिंग" खेलने जाया करते थे। ये एक तरह का मछली पकड़ने का खेल है। उन्होंने १९५९ में महाराष्ट्र स्टेट ऐंग्लिंग एसोसियेशन की सदस्यता प्राप्त की। जब नौशाद युवा थे तो मुम्बई की पोवई झील में गीतकार शकील बदईयुनि और मजरूह सुल्तानपुरी के साथ मछलियाँ पकड़ने जाया करते थे।

नौशाद फिल्मी संगीत के स्वर्णयुग का सबसे अहम संगीतकार थे जिसने शास्त्रीय संगीत में पगे गीतों को लोकप्रिय बनाया और उनके संगीत का जादू ही है जो बैजू बावरा और मुगले आजम का संगीत आज भी ताजातरीन लगता है।



अगले अंक में : नौशाद की तीन बेहतरीन फिल्मों के गाने और मुलाकात उन गीतों से जिनकी धुनें नौशाद साब की आखिरी धुनें थीं

प्रस्तुति- तपन शर्मा


Monday, February 16, 2009

जवाँ है मुहब्बत, हसीं है ज़माना....आज भी नौशाद के संगीत का


"आज पुरानी यादों से कोई मुझे आवाज़ न दे...", नौशाद साहब के इस दर्द भरे नग्में को आवाज़ दी थी मोहम्मद रफी साहब ने, पर नौशाद साहब चाहें या न चाहें संगीत प्रेमी तो उन्हें आवाज़ देते रहेंगें, उनके अमर गीतों को जब सुनेंगें उन्हें याद करते रहेंगे. तपन शर्मा सुना रहें हैं दास्ताने नौशाद, और आज की महफ़िल है उन्हीं की मौसिकी से आबाद.


नौशाद का जन्म २५ दिसम्बर १९१९ में एक ऐसे परिवार में हुआ, जिसका संगीत से दूर दूर तक नाता नहीं था और न ही संगीत में कोई रुचि थी। पर नौशाद शायद जानते थे कि उन्हें क्या करना है। दस साल की उम्र में भी जब वे फिल्म देख कर लौटते तो उनकी डंडे से पिटाई हुआ करती थी। ये उस समय की बातें हैं जब फिल्मों में संगीत नहीं हुआ करता था। और थियेटर में पर्दे के पास बैठे संगीतकार ही संगीत बजा कर फिल्म के दृश्य के हिसाब से तालमेल बिठाया करते थे। वे कहते थे कि वे फिल्म के लिये थियेटर नहीं जाते बल्कि उस ओर्केस्ट्रा को सुनने जाते हैं। उन संगीतकारों को सुनने जो हारमोनियम, पियानो, वायलिन आदि बजाते हुए भी दृश्य की गतिविधियों के आधार पर आपस में संतुलन बनाये रखते हैं। और यही वो पल होते थे जिनमें उन्हें सबसे ज्यादा मज़ा आता था। और वो भी चार-आने वाली पहली कतार में बैठ कर।



नौशाद ने एक वाद्ययंत्र बेचने वाली दुकान पर काम किया और हारमोनियम खरीदा। उनका अगला कदम था स्थानीय ओर्केस्ट्रा में शामिल होना। जाहिर तौर पर यह सब उन्होंने अपने पिता से विपरीत जाते हुए किया। उसके बाद नौशाद एक जूनियर थियेटर क्लब से जुड़ गये। फिर उन्होंने एक नाटक कम्पनी में काम किया जो उस समय लखनऊ गई हुई थी। वे लैला मजनू पर आधारित नाटक कर रहे थे। ये पहली मर्तबा था कि उन्होंने घर में किसी की परवाह नहीं की। वे वहाँ से भाग गये और नाटक कम्पनी के साथ कभी जयपुर, जोधपुर, बरेली और गुजरात गये। विरम्गाम में उनकी कम्पनी फ्लॉप हो गई और वे वापस घर नहीं गये।

१९३७ में हताश नौशाद ने बम्बई में कदम रखा। और तब उनका संघर्ष दोबारा शुरू हुआ। जिस अकेले आदमी को वे बम्बई में जानते थे, वे थे अन्जुमन-ए-इस्लाम हाई स्कूल के हैडमास्टर जिनके साथ उन्होंने कुछ समय बिताया। ये किस्मत की बात थी कि वे हैरी डरोविट्स के सम्पर्क में आये जो समन्दर नाम की एक फिल्म बना रहे थे। नौशाद को मुश्ताक हुसैन के ओर्केस्ट्रा में ४० रूपय प्रतिमाह की तन्ख्वाह पर पियानो बजाने की नौकरी मिली। गुलाम मोहम्मद जो बाद में नौशाद अली के सहायक बने, उस समय ६० रूपये कमाया करते थे। मुश्ताक हुसैन न्यू थियेटर, कोलकाता के मशहूर संगीत निर्देशक थे। बाद में नौशाद अपना हुनर रुसी निर्माता हेनरी डारविज की फिल्म "सुनहरी मकड़ी" में दिखाने में सफल हुए।

जब हरीश्चंद्र बाली ने फिल्म "पति-पत्नी" को छोड़ा तब उस समय नौशाद को पहली बार संगीतकार के तौर पर काम मिला। उन्हें मुश्ताक हुसैन का सहायक बनाया गया लेकिन ये ज्यादा दिन नही चला और फिल्म बंद हो गई। भाग्य ने फिर साथ दिया और वे मनोहर कपूर से मिले। मनोहर उस समय पंजाबी फिल्म "मिरज़ा साहिबान" के लिये संगीत दे रहे थे। नौशाद ने कपूर के साथ काम करना शुरु कर दिया और उन्हें ७५ रू महीने के हिसाब से मिलने लगे। ये फिल्म सभी को पसंद आई और बॉक्स ऑफिस पर जबर्दस्त हिट साबित हुई।



खेमचंद प्रकाश, मदहोक, भवनानी और ग्वालानी आदि की सहायता से नौशाद धीरे धीरे आगे बढ़ने लगे। उन्होंने भवनानी की फिल्म प्रेम नगर में संगीत दिया। उसके बाद उनकी गिनती ऊँचे संगीतकारों में होने लगी और देखते ही देखते वे ६०० रू. से १५०० रू. प्रति फिल्म के कमाने लगे। ए.आर.करदार की फिल्म नई दुनिया (१९४२) ने पहली बार उन्हें संगीत निर्देशक का दर्जा दिलवाया। करदार की फिल्मों में वे लगातार संगीत देने लगे। और फिल्म शारदा में उन्होंने १३ वर्षीय सुरैया के साथ "पंछी जा" गाने के लिये काम किया। रतन(१९४४) वो फिल्म थी जिसने उन्हें ऊँचाई तक पहुँचा दिया और उस समय के हिसाब से उन्हें एक फिल्म के २५००० रू मिलने लगे!!

लखनऊ में उनका परिवार हमेशा संगीत के खिलाफ रहा और नौशाद को उनसे छुपा कर रखना पड़ा कि वे संगीत के क्षेत्र में काम करते हैं। जब नौशाद की शादी हो रही थी तो बैंड उन्हें की सुपारहिट फिल्म रतन('४४) के गाने बजा रहा था। उस समय उनके पिता व ससुर उस संगीतकार को दोष दे रहे थे जिसने वो संगीत दिया... तब नौशाद की सच्चाई बताने की हिम्मत नहीं हुई कि संगीत उनका ही दिया हुआ है।



१९४६ के वर्ष में उन्होंने नूरजहां के साथ "अनमोल घड़ी" और के.एल.सहगल के साथ "शाहजहां" की और दोनों ही फिल्मों का संगीत सुपरहिट रहा। १९४७ में बंटवारा हुआ और हिन्दू मुस्लिम दंगे हुए। मुम्बई से काफी मुस्लिम कलाकार पाकिस्तान चले गये। पर बॉलीवुड में नौशाद जैसे स्थापित कलाकार वहीं रहे। १९४२ से लेकर १९६० के दशक तक वे बॉलीवुड के नामी संगीतकारों में शुमार रहे। उन्होंने अपने जीवनकाल में १०० से भी कम फिल्मों में काम किया लेकिन जितनों में भी किया उनमें से २६ फिल्में सिल्वर जुबली (२५ हफ्ते), ८ गोल्डन जुबली (५० हफ्ते) और ४ ने डायमंड जुबली (६० हफ्ते) बनाई।

नौशाद ने अनेक गीतकारों के साथ काम किया जिनमें शकील बदायूनी, मजरूह सुल्तानपुरी, मदहोक, ज़िया सरहदी और कुमार बर्बंकवी शामिल हैं। मदर इंडिया (१९५७) फिल्म जो ऑस्कर में शामिल हुई थी, उसमें उन्हीं का संगीत था। नौशाद ने गुलाम मोहम्मद की मृत्य होने पर उनकी फिल्म पाकीज़ा (१९७२) का संगीत पूरा किया। गौरतलब है कि गुलाम मोहम्मद उनके सहायक भी रह चुके थे।



१९८१ में उन्हें भारतीय सिनेमा में योगदान के लिये दादा साहेब फाल्के अवार्ड मिला। १९८८ में उन्होंने मलयालम फिल्म "ध्वनि" के लिये काम किया। १९९५ में शाहरुख की फिल्म "गुड्डु" में भी संगीत दिया जिसके कुछ गाने पॉपुलर हुए थे। सन २००४ में जब "मुगल-ए-आज़म" (रंगीन) प्रर्दशित हुई तो नौशाद विशेष अतिथि के रूप में आमंत्रित थे। ८६ वर्ष की आयु में जब उन्होंने फिल्म ताजमहल(२००५) का संगीत निर्देशन दिया तो वे ऐसा करने वाले विश्व के सबसे बुजुर्ग संगीतकार बन गये। उनकी ज़िन्दगी पर आधारित ५ फिल्में भी बनी हैं-नौशाद का संगीत, संगीत का बादशाह, नौशाद पर दूरदर्शन द्वारा प्रसारित एक सीरियल, महल नौशाद और टी.वी सिरियल ज़िन्दा का सफर। उन पर किताबें भी लिखी गईं हैं चाहे मराठी में दास्तान-ए-नौशाद हो या गुजराती में 'आज अवत मन मेरो' हो।

उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री द्वारा रचित रचना 'उनकी याद करें' को भी संगीतबद्ध किया। इसको गाया था ४० कोरस गायकों के साथ ए. हरिहरन ने और निर्माता थे केशव कम्युनिकेशन्स। ये गीत सीमा पर तैनात जवानों के नाम था।
५ मई, २००६ को नौशाद दुनिया को अलविदा कह गये।

(जारी...)
अगले अंक में जानेंगे संगीत के अलावा क्या था नौशाद साहब का शौक और क्या कहती हैं फिल्मी हस्तियाँ मीठी धुनों के इस रचयिता के बारे में...


प्रस्तुति - तपन शर्मा


Monday, February 2, 2009

जिसके गीतों ने आम आदमी को अभिव्यक्ति दी - आनंद बख्शी

आनन्द बक्षी यह वह नाम है जिसके बिना आज तक बनी बहुत बड़ी-बड़ी म्यूज़िकल फ़िल्मों को शायद वह सफलता न मिलती जिनको बनाने वाले आज गर्व करते हैं। आनन्द साहब चंद उन नामी चित्रपट(फ़िल्म)गीतकारों में से एक हैं जिन्होंने एक के बाद एक अनेक और लगातार साल दर साल बहुचर्चित और दिल लुभाने वाले यादगार गीत लिखे, जिनको सुनने वाले आज भी गुनगुनाते हैं, गाते हैं। जो प्रेम गीत उनकी कलम से उतरे उनके बारे में जितना कहा जाये कम है, प्यार ही ऐसा शब्द है जो उनके गीतों को परिभाषित करता है और जब उन्होंने दर्द लिखा तो सुनने वालों की आँखें छलक उठीं दिल भर आया, ऐसे गीतकार थे आनन्द बक्षी। दोस्ती पर शोले फ़िल्म में लिखा वह गीत 'यह दोस्ती हम नहीं छोड़ेगे' आज तक कौन नहीं गाता-गुनगुनाता। ज़िन्दगी की तल्खियो को जब शब्द में पिरोया तो हर आदमी की ज़िन्दगी किसी न किसी सिरे से उस गीत से जुड़ गयी। गीत जितने सरल हैं उतनी ही सरलता से हर दिल में उतर जाते हैं, जैसे ख़ुशबू हवा में और चंदन पानी में घुल जाता है। मैं तो यह कहूँगा प्रेम शब्द को शहद से भी मीठा अगर महसूस करना हो तो आनन्द बक्षी साहब के गीत सुनिये। मजरूह सुल्तानपुरी के साथ-साथ एक आनन्द बक्षी ही ऐसे गीतकार हैं जिन्होने 43 वर्षों तक लगातार एक के बाद एक सुन्दर और कृतिमता(बनावट)से परे मनमोहक गीत लिखे, जब तक उनके तन में साँस का एक भी टुकड़ा बाक़ी रहा।

सुनिए सबसे पहले रफी साहब की आवाज़ में ये खूबसूरत प्रेम गीत -


21 जुलाई सन् 1930 को रावलपिण्डी में जन्मे आनंद बक्षी से एक यही सपना देखा था कि बम्बई (मुम्बई) जाकर पाश्र्व(प्लेबैक) गायक बनना है। इसी सपने के पीछे दौड़ते-भागते वे बम्बई आ गये और उन्होंने अजीविका के लिए 'जलसेना (नेवी), कँराची' के लिए नौकरी की, लेकिन किसी उच्च पदाधिकारी से कहा सुनी के कारण उन्होंने वह नौकरी छोड़ दी। इसी बीच भारत-पाकिस्तान बँटवारा हुआ और वह लखनऊ में अपने घर आ गये। यहाँ वह टेलीफोन आपरेटर का काम कर तो रहे थे लेकिन गायक बनने का सपना उनकी आँखों से कोहरे की तरह छँटा नहीं और वह एक बार फिर बम्बई को निकल पड़े।

उनका यही दीवानापन था जिसे किशोर ने अपना स्वर दिया -


बम्बई जाकर अन्होंने ठोकरों के अलावा कुछ नहीं मिला, न जाने यह क्यों हो रहा था? पर कहते हैं न कि जो होता है भले के लिए होता है। फिर वह दिल्ली तो आ गये और EME नाम की एक कम्पनी में मोटर मकैनिक की नौकरी भी करने लगे, लेकिन दीवाने के दिल को चैन नहीं आया और फिर वह भाग्य आज़माने बम्बई लौट गये। इस बार बार उनकी मुलाक़ात भगवान दादा से हुई जो फिल्म 'बड़ा आदमी(1956)' के लिए गीतकार ढूँढ़ रहे थे और उन्होंने आनन्द बक्षी से कहा कि वह उनकी फिल्म के लिए गीत लिख दें, इसके लिए वह उनको रुपये भी देने को तैयार हैं। पर कहते हैं न बुरे समय की काली छाया आसानी से साथ नहीं छोड़ती सो उन्हें तब तक गीतकार के रूप में संघर्ष करना पड़ा जब तक सूरज प्रकाश की फिल्म 'मेहदी लगी मेरे हाथ(1962)' और 'जब-जब फूल खिले(1965)' पर्दे पर नहीं आयी। अब भाग्य ने उनका साथ देना शुरु कर दिया था या यूँ कहिए उनकी मेहनत रंग ला रही थी और 'परदेसियों से न अँखियाँ मिलाना' और 'यह समा है प्यार का' जैसे लाजवाब गीतों ने उन्हें बहुत लोकप्रिय बना दिया। इसके बाद फ़िल्म 'मिलन(1967)' में उन्होंने जो गीत लिखे, उसके बाद तो वह गीतकारों की श्रेणी में सबसे ऊपर आ गये। अब 'सावन का महीना', 'बोल गोरी बोल', 'राम करे ऐसा हो जाये', 'मैं तो दीवाना' और 'हम-तुम युग-युग' यह गीत देश के घर-घर में गुनगुनाये जा रहे थे। इसके आनन्द बक्षी आगे ही आगे बढ़ते गये, उन्हें फिर कभी पीछे मुड़ के देखने की ज़रूरत नहीं पड़ी।

फ़िल्म मिलन का ये दर्द भरा गीत, लता की आवाज़ में भला कौन भूल सकता है -


यह सुनहरा दौर था जब गीतकार आनन्द बक्षी ने संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के साथ काम करते हुए 'फ़र्ज़(1967)', 'दो रास्ते(1969)', 'बॉबी(1973'), 'अमर अकबर एन्थॉनी(1977)', 'इक दूजे के लिए(1981)' और राहुल देव बर्मन के साथ 'कटी पतंग(1970)', 'अमर प्रेम(1971)', हरे रामा हरे कृष्णा(1971' और 'लव स्टोरी(1981)' फ़िल्मों में अमर गीत दिये। फ़िल्म अमर प्रेम(1971) के 'बड़ा नटखट है किशन कन्हैया', 'कुछ तो लोग कहेंगे', 'ये क्या हुआ', और 'रैना बीती जाये' जैसे उत्कृष्ट गीत हर दिल में धड़कते हैं और सुनने वाले के दिल की सदा में बसते हैं। अगर फ़िल्म निर्माताओं के साक्षेप चर्चा की जाये तो राज कपूर के लिए 'बॉबी(1973)', 'सत्यम् शिवम् सुन्दरम्(1978)'; सुभाष घई के लिए 'कर्ज़(1980)', 'हीरो(1983)', 'कर्मा(1986)', 'राम-लखन(1989)', 'सौदागर(1991)', 'खलनायक(1993)', 'ताल(1999)' और 'यादें(2001)'; और यश चोपड़ा के लिए 'चाँदनी(1989)', 'लम्हे(1991)', 'डर(1993)', 'दिल तो पागल है(1997)'; आदित्य चोपड़ा के लिए 'दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे(1995)', 'मोहब्बतें(2000)' फिल्मों में सदाबहार गीत लिखे।

बख्शी साहब पर और बातें करेंगें इस लेख के अगले अंक में तब तक फ़िल्म महबूबा का ये अमर गीत सुनें, और याद करें उस गीतकार को जिसने आम आदमी की सरल जुबान में फिल्मी किरदारों को जज़्बात दिए.


(जारी... continued.....)

प्रस्तुति - विनय प्रजापति "नज़र"

Wednesday, January 28, 2009

बरकरार है आज भी ओ पी नैयर के संगीत का मदभरा जादू

जीनिअस संगीतकार ओ पी नैयर की दूसरी पुण्यतिथि पर विशेष -

१९५२ में एक फ़िल्म आई थी, -आसमान, जिसमें गीता दत्त ने एक बेहद खूबसूरत गीत गाया था -"देखो जादू भरे मोरे नैन..." यह संगीतकार ओ पी नैयर की पहली फ़िल्म थी, जो पहला गाना इस फ़िल्म के लिए रिकॉर्ड हुआ था वो था "बेवफा जहाँ में वफ़ा ढूँढ़ते रहे..." गायक थे सी एच आत्मा साहब. दो अन्य गीत सी एच आत्मा की आवाज़ में होने थे जो नासिर पर फिल्माए जाने थे और ४ अन्य गीत, गीता ने गाने थे जो नायिका श्यामा पर फिल्मांकित होने थे. फ़िल्म के कुल ८ गीतों में से आखिरी एक गीत जो फ़िल्म की सहनायिका पर चित्रित होना था उसके बोल थे "जब से पी संग नैना लगे...". नैयर ने इस गीत के लिए लता जी को तलब किया पर जब लता जी को ख़बर मिली कि उन्हें एक ऐसा गीत गाने को कहा जा रहा है जो नायिका पर नही फिल्माया जाएगा (ये उन दिनों बहुत बड़ी बात हुआ करती थी) उनके अहम् को धक्का लगा. वो उन दिनों की (और उसके बाद के दिनों की भी) सबसे सफल गायिका थी. लता ने ओ पी के लिए इस गीत को गाने से साफ़ इनकार कर दिया और जब नैयर साहब तक ये बात पहुँची, तो उन्होंने भी एक दृढ़ निश्चय किया, कि वो अपने कैरिअर में कभी भी लता के साथ काम नही करेंगें. ज़रा सोचिये इंडस्ट्री में कौन होगा ऐसा दूसरा, जो अपनी पहली फ़िल्म में ऐसा दबंग फैसला कर ले और लगभग दो दशकों तक जब तक भी उन्होंने फिल्मों में संगीत दिया वो अपने उस फैसले पर अडिग रहे. उस वक्त वो मात्र २५ साल के थे और पहली और आखिरी बार उन्होंने "जब से पी संग..." गीत के लिए चुना गायिका राजकुमारी को.

बेवफा जहाँ में वफ़ा ढूँढ़ते रहे (सुनिए ओ पी का सबसे पहला रेकॉर्डेड गीत)


हालांकि “आसमान” और उसके बाद आयी “छम छमा छम” और “बाज़”, तीनों ही फिल्में बुरी तरह पिट गई. पर गायिका गीता रॉय (दत्त) ने इस नए संगीतकार के हुनर को पहचान लिया था, उन्होंने गुरु दत्त से जब वो अपनी पहली प्रोडक्शन पर काम शुरू करने वाले थे ओ पी की सिफारिश की. गीता के आग्रह को गुरु टाल नही पाये और इस तरह ओ पी को मिली "आर पार". इस फ़िल्म ने नैयर ने गीता के साथ मिलकर वो गीत रचे कि आज तक जिनके रिमिक्सिस बनते और बिकते हैं. और इसी के साथ हिन्दी फिल्मों को मिला एक बेमिसाल संगीतकार. “आर पार” के बाद गुरु दत्त प्रोडक्शन के साथ नैयर ने अपनी हैट ट्रिक पूरी की मिस्टर और मिसिस ५५ (१९५५), और सी ई डी (१९५६) से. अब उनका सिक्का चल निकला था.

सुनिए गीता की मदभरी आवाज़ में "हूँ अभी मैं जवां..."


वो जिनके गीत आज भी हमें दौड़ भाग भरी इस जिंदगी में सकून देते हैं, उस ओ पी नैयर साहब के जीवन मगर फूलों की सेज नही रही कभी, कुछ स्वभाव से भी वो शुद्ध थे, खरे को खरा और खोटे को खोटा कहने से वो कभी नही चूकते थे. शायद यही वजह थी कि उनकी फिल्मी दुनिया में बहुत कम लोगों के साथ पटरी बैठी, यहाँ तक कि उनकी सबसे पसंदीदा गायिका गीता दत्त और आशा के साथ भी एक मोड़ पर आकर उन्होंने रिश्ता तोड़ दिया.

उनके दर्द को ही शायद आवाज़ दे रहे हैं मुकेश यहाँ -


स्कूल कॉलेजों में कभी उनका मन नही लगा था. मात्र 8 वर्ष की आयु में उन्हें लाहोर रेडियो में गाने का अवसर मिला. १० वर्ष की उम्र में वो संगीतकार बन गए पंजाबी फ़िल्म “धुलिया भट्टी” से जिसमें सी एच आत्मा का गाया गीत जिसे एच एम् वी ने रीलीस किया था "प्रीतम आन मिलो..." सुपर हिट साबित हुआ, इस फ़िल्म में उन्होंने एक छोटी सी भूमिका भी की. बँटवारे के बाद वो मुंबई आ गए. १९५२ में "आसमान" से शुरू हुआ संगीत सफर १९९३ में आई "जिद्द" फ़िल्म के साथ ख़तम हुआ. इस A टू Z के बीच ७३ फिल्में आई और ओ पी नैयर अपने कभी न भूल सकने वाले, गुनगुने, दिल के तार बरबस छेड़ते गीतों के साथ संगीत प्रेमियों के जेहन में हमेशा के लिए कैद हो गए. "आखों ही आखों में इशारा हो गया..." क्या ये गीत अपने बनने के आज लगभग ५०-५२ सालों के बाद भी उतना ही तारो ताज़ा नही लगता आपको, भाई हमें तो लगता है -



कितनी अजीब बात है कि आल इंडिया रेडियो ने उनके कुछ गीत ब्रोडकास्ट करने पर प्रतिबन्ध लगा दिया था यह कहकर कि इनके बोल और धुन युवा पीढी को पथभ्रमित करने वाले हैं. हँसी आती है आज सोच कर भी (निखिल भाई गौर कीजिये, आप अकले नही हैं). बाद में रेडियो सीलोन पर उनके गीतों को सुनने की बढती चाहत से हार कर ख़ुद मंत्री महोदय को इस अंकुशता को हटाने के लिए आगे आना पड़ा. मात्र ३० साल की उम्र में उन्हें “रिदम किंग” की उपाधि मिल गई थी. उन्होंने संगीतकार के दर्जे को हमेशा ऊँचा माना और एक लाख रुपये पाने वाले पहले संगीत निर्देशक बने. १९५७ में आई "नया दौर" संगीत के आयाम से देखें तो उनके सफर का "मील का पत्थर" थी. शम्मी कपूर के आने के बाद तो ओ पी नैयर के साथ साथ हिन्दी फ़िल्म संगीत भी जैसे फ़िर से जवान हो उठा. मधुबाला ने तो यहाँ तक कह दिया था कि वो अपना पारिश्रमिक उन निर्माताओं के लिए कम कर देंगीं जो ओ पी को संगीतकार लेंगें. मधुबाला की ६ फिल्मों के लिए ओ पी ने संगीत दिया. वो उन दिनों के सबसे मंहगे संगीतकार होने के बावजूद उनकी मांग सबसे अधिक थी. फ़िल्म के शो रील में उनका नाम अभिनेताओं के नाम से पहले आता था. ऐसा पहले किसी और संगीतकार के लिए नही हुआ था, ओ पी ने ट्रेंड शुरू किया जिसे बाद में बहुत से सफल संगीतकारों ने अपनाया.

फ़िल्म १२ o clock का ये गीत सुनिए -"कैसा जादू..." (गौर कीजियेगा इसमें जब गायिका "तौबा तौबा" बोलती है सुनने वालों के दिल में एक अजीब सी कसक उठती है, यही ओ पी का जादू था)


एक साल ऐसा भी आया जब ओ पी की एक भी फ़िल्म नही आई. वर्ष १९६१ को याद कर ओ पी कहते थे -"मोहब्बत में सारा जहाँ लुट गया था..". दरअसल ओ पी अपनी सबसे पसंदीदा पार्श्व गायिका (आशा) के साथ अपने संबंधों की बात कर रहे थे. १९६२ में उन्होंने शानदार वापसी की फ़िल्म 'एक मुसाफिर एक हसीना" से. इसी दशक में उन्होंने "फ़िर वही दिल लाया हूँ"(१९६३), काश्मीर की कली (१९६४, और "मेरे सनम(१९६५) जैसी फिल्मों के संगीत से शीर्ष पर स्थान बरकरार रखा. एक बार वो शर्मीला टैगोर पर फिल्माए अपने किसी गीत पर उनके अभिनय से खुश नही थे, उन्होंने बढ़ कर शर्मीला को सलाह दे डाली कि मेरे गीतों आप बस खड़े रहकर लब नही हिला सकते ये गाने हरकतों के हैं आपको अपने शरीर के हाव भावों का भी इस्तेमाल करना पड़ेगा. शर्मीला ने उनकी इस सलाह को गांठ बाँध ली और अपनी हर फ़िल्म में इस बात का ख़ास ध्यान रखा. ओ पी का सीमित संगीत ज्ञान कभी भी उनके आडे नही आया फ़िल्म "बहारें फ़िर भी आयेंगीं" के गीत "आपके हसीं रुख पे...." के लिए उन्होंने सारंगी का बहुत सुंदर इस्तेमाल किया.

रफी साहब की आवाज़ में पेश है "आपके हसीन रुख पे..."


पर दशक खत्म होते होते अच्छे संगीत के बावजूद उनकी फिल्में फ्लॉप होने लगी. रफी साहब से भी उनके सम्बन्ध बिगड़ चुके थे. गुरु दत्त की मौत के बाद गीता ने ख़ुद को शराब में डुबो दिया था और १९७२ में उनकी भी दुखद मौत हो गई, उधर आशा के साथ ओ पी के सम्बन्ध एक नाज़ुक दौर से गुजर रहा था. ये उनके लिए बेहद मुश्किल समय था. फ़िल्म "प्राण जाए पर वचन न जाए" में आशा ने उनके लिए गाया "चैन से हमको कभी....". अगस्त १९७२ में आखिरकार ओ पी और आशा ने कभी भी साथ न काम करने का फैसला किया और उसके बाद उन्हें कभी भी एक छत के नीचे एक साथ नही देखा गया. १९७३ में जब आशा को अपने इसी गीत के लिए फ़िल्म फेयर मिला तब वो वहां मौजूद नही थी (ऐसा उन्होंने जानकर ही किया होगा). ओ पी ने उनकी तरफ़ से पुरस्कार ले तो लिया, पर घर लौटते वक्त उन्होंने उस ट्रोफी को अपनी कार से बाहर फैंक दिया. कहते हैं उसके टूटने की गूँज आखिरी दम तक उन्हें सुनाई देती रही. जाहिर है, उसके बाद भी उन्होंने काम किया (लगभग १५० गीतों में) अलग अलग गायिकाओं को आजमाया, पर वो जादू अब खो चुका था. कहने को जनवरी २८, २००७ तक ओ पी जीवित रहे पर संगीतकार ओ पी नैयर को तो हम बहुत पहले ही कभी खो चुके थे….

"चैन से हमको कभी ...." (यकीनन ये आशा जी के गाये सर्वश्रेष्ठ गीतों में से एक है..महसूस कीजिये उस दर्द को जो उन्होंने आवाज़ में घोला है)


(जारी...)



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