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Friday, January 30, 2009

"केसरिया बालमा..", मांड एक - फनकार अनेक


राजस्थान के राजाओं की रूमानी कहानियों पर आधारित लोक गीत हैं जिन्हें मांड कहा जाता है. रेगिस्तान की मिटटी में रचे बसे इस राग पर जाने कितनी रचनाएँ बनी, जब भी किसी गायक/गायिका ने मांड को स्वर दिया सुनने वालों के जेहन में ऊंठों के गुजरते काफिलों पर गाते बंजारों की यायावरी जीवंत हो गई.

मांड ने हमेशा से संगीत प्रेमियों के के दिलों पर राज किया है. देशी- विदेशी सब पर इसने अपना जादू चलाया है. सही मायनों में मांड राजस्थानी लोक संस्कृति की सच्ची पहचान है. मांड के बारे में में संजय पटेल भाई ने हमें जानकारी दी कि पंडित अजय चक्रवर्ती के शोधों के अनुसार मांड के कई रंग होते है,और तक़रीबन सौ तरह की माँडें गाई बजाई जातीं रहीं हैं.

"केसरिया बालमा..." की धुन से हर संगीत प्रेमी परिचित है. ये लोक गीत मांड का एक शुद्धतम रूप है. बरसों बरस जाने कितने फनकारों ने इसे अपनी आवाज़ में तराशा. इसे गाने बजाने के मोह से शायद ही कोई बच पाया हो. यहाँ तक कि आज के पॉप गायक/ गायिकाएं भी इसके सम्मोहन में डूबे नज़र आए हैं. चलिए अब बातों को विराम देते हैं और आपको सुनवाते हैं मुक्तलिफ़ गायक /गायिकाओं की आवाज़ में "केसरिया" रंग रंगा राग मांड.

सबसे पहले सुनिए अल्लाह जिला बाई के कंठ स्वरों का नाद -


शुभा मुदगल के अंदाज़ का आनंद लें -


अकबर अली का निराला अंदाज़ -


ज़रीना बेगम -


लता मंगेशकर ने भी इसे गाया फ़िल्म "लेकिन" में -


पॉप/रॉक संगीत के अगुवा पलाश सेन भी पीछे नही रहे -


उम्मीद है कि "मिटटी के गीत" शृंखला की ये प्रस्तुति आपको पसंद आई होगी...जल्द ही मिलेंगें किसी अन्य प्रदेश के लोक संगीत का जायका लेकर.



Thursday, December 18, 2008

एक आम आदमी जिसने भोजपुरी को बना दिया खास...

भिखारी ठाकुर की जयंती पर हमारी संगीतमयी प्रस्तुति

भिखारी ठाकुर
एक आम आदमी के सतह से शिखर तक की बेजोड़ मिसाल हैं भिखारी ठाकुर... बहुत कम लोग होते हैं जो जीते-जी विभूति बन जाते हैं... दरअसल, इस भिखारी ठाकुर की जीवन-यात्रा भिखारी से ठाकुर होने की यात्रा ही है...फर्क सिर्फ यह है कि लीजेंड बनने की यह यात्रा भिखारी ने किसी रुपहले पर्दे पर नहीं असल ज़िंदगी में जिया.

भोजपुरी के नाम पर सस्ता मनोरंजन परोसने की परंपरा भी उतनी ही पुरानी है, जितना भोजपुरी का इतिहास....18 दिसंबर 1887 को छपरा के कुतुबपुर दियारा गांव में एक निम्नवर्गीय नाई परिवार में जन्म लेने वाले भिखारी ठाकुर ने विमुख होती भोजपुरी संस्कृति को नया जीवन दिया.....उन्होंने भोजपुरी संस्कृति को सामीजिक सरोकारों के साथ ऐसा पिरोया कि अभिव्यक्ति की एक धारा भिखारी शैली जानी जाने लगी...आज भी सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार का सशक्त मंच बन कर जहाँ-तहाँ भिखारी ठाकुर के नाटकों की गूंज सुनाई पड़ ही जाती है....
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भिखारी ठाकुर के स्वर में उन्हीं की कविता 'डगरिया जोहता ना".
यह काव्यपाठ 'बिदेसिया' फिल्म से ली गई है
बिदेसिया, गबर-घिचोर, बेटी-बियोग भा बेटी-बेचवा सहित उनके सभी नाटकों में बदलाव को दिशा देने वाले एक सामाजिक चिंतक की व्यथा साफ दिखती है....सबसे बड़ी बात कि उनके नाटकों में पात्र कभी केंद्र में नहीं रहे, हमेशा परिवेश केंद्र में रहा....यही वजह थी कि उनके पात्रों की निजी पीड़ा सार्वभौमिक रुप अख्तियार कर लेती थी... हर नयी शुरुआत को टेढ़ी आंखों से देखने वाले भिखारी के दौर में भी थे...सामाजिक व्यवस्था के ऐसे ठेकेदारों से भिखारी अपने नाटकों के साथ लड़े...वो अक्सर नाटकों में सूत्रधार बनते और अपनी बात बड़े चुटीले अंदाज़ में कह जाते....अपनी महीन मार की मार्फत वो अंतिम समय तक सामाजिक चेतना की अलख जगाते रहे....
कोई उन्हें भरतमुनि की परंपरा का पहला नाटककार मानता हैं तो कोई भोजपुरी का भारतेंदू हरिश्चंद्र.....महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने तो उन्हें "भोजपुरी का शेक्सपियर" की उपाधि दे दी.....इसके अलावा उन्हें कई और उपाधियाँ व सम्मान भी मिले....भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से भी सम्मानित किया..... इतना सम्मान मिलने पर भी भिखारी गर्व से फूले नहीं, उन्होंने बस अपना नाटककार ज़िंदा रखा...पूर्वांचल आज भी भिखारी से नाटकों से गुलज़ार है....ये बात अलग है कि सरकारी उपेक्षा का शिकार इनके गांव तक अब भी नाव से ही जाना पड़ता है....

राममुरारी के साथ निखिल आनंद गिरि



सन् १९६३ में भिखारी ठाकुर के अमर नृत्य-नाटक बिदेशिया पर एक फिल्म बनी, इसी नाम से। जिसका संगीत बहुत हिट हुआ। भिखारी ठाकुर का लिखा एक गीत 'हँसी-हँसी पनवा खियौलस बेइमनवा, अ रे बसेला परदेस' जिसे एस॰ एन॰ त्रिपाठी ने संगीतबद्द किया था और मन्ना डे गाया था। बहुत प्रसिद्ध हुआ। हम आज अपने श्रोताओं के लिए वह गीत तो लाये ही हैं, साथ में बिलकुल नये तरह से कम्पोज किया गया यही गीत लाये हैं।

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(फिल्म- बिदेसिया, संगीत- एस॰एन॰ त्रिपाठी, आवाज़- मन्ना डे)

यह प्रस्तुति हिन्द-युग्म से सितम्बर २००८ में जुड़े राजकुमार सिंह की है, जो न्यूयार्क रहते हैं। ये अपने साथियों के साथ मिलकर एक फिल्म बनाने की योजना बना रहे हैं। फिल्म का नाम होगा 'लूंगी, लोटा और सलाम'। राज भिखारी ठाकुर के इस गीत को अपनी फिल्म में रखना चाहते हैं। और यह गीत नये तरीके से तैयार भी हो गया है। 'हँसी-हँसी पनवा' को नया रूप दिया है 'Valley Of Flower' फिल्म के संगीत निर्देशक विवेक अस्थाना ने। गीत को गाया है भोजपुरी गीतों की चर्चित गायिका पूनम जैन ने। हम उम्मीद करते हैं कि यह नया प्रयोग आपको पसंद आयेगा।

इस फिल्म की बातें फिर कभी, पहले आप गीत सुनें।



(फिल्म- लूँगी, लोटा और सलाम (प्रस्तावित) , संगीत- विवेक अस्थाना और राजकुमार सिंह, आवाज़- पूनम जैन)

इस गीत के माध्यम से हम राजकुमार सिंह के साथ मिलकर अमर नाटककार भिखारी ठाकुर को श्रद्धाँजलि देना चाहते हैं।


साथ में पढ़िए भिखारी ठाकुर का दुर्लभ साक्षात्कार

Tuesday, November 4, 2008

केरवा जे फरेला घवद से : सुनिए छठ के अवसर पर ये लोक गीत

आज छठ पर्व है। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक श्रृद्धालु डूबते सूरज को अर्घ्य दे चुके होंगे और कल भोर में दूसरा अर्घ्य उगते सूरज को दिया जाएगा। छठ का नाम बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के सबसे पावन पर्वों में शुमार होता है। विश्व में जहाँ कहीं भी इन प्रदेशों के लोग गए हैं वो अपने साथ इसकी परंपराओं को ले कर गए हैं। छठ जिस धार्मिक उत्साह और श्रृद्धा से मनाया जाता है इसका अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि जब तीन चौथाई पुलिसवालों के छुट्टी पर रहते हुए भी बिहार जैसे राज्य में इस दौरान आपराधिक गतिविधियाँ सबसे कम हो जाती हैं।

अब छठ की बात हो और छठ के गीतों का जिक्र ना आए ये कैसे हो सकता है। बचपन से मुझे इन गीतों की लय ने खासा प्रभावित किया था। इन गीतों से जुड़ी एक रोचक बात ये है कि ये एक ही लए में गाए जाते हैं और सालों साल जब भी ये दिन आता है मुझे इस लय में छठ के गीतों को गुनगुनाने में बेहद आनंद आता है। यूँ तो शारदा सिन्हा ने छठ के तमाम गीत गा कर काफी प्रसिद्धि प्राप्त की है पर आज जिस छठ गीत की मैं चर्चा कर रहा हूँ उसे मैंने टीवी पर भोजपुरी लोक गीतों की गायिका देवी की आवाज में सुना था और इतने भावनात्मक अंदाज में उन्होंने इस गीत को गाया था कि मेरी आँखें भर आईं थीं।

इससे पहले कि ये गीत मैं आपको सुनाऊँ, इसकी पृष्ठभूमि से अवगत कराना आपको जरूरी होगा। छठ में सूर्य की अराधना के लिए जिन फलों का प्रयोग होता है उनमें केला और नारियल का प्रमुख स्थान है। नारियल और केले की पूरी घौद गुच्छा इस पर्व में प्रयुक्त होते हैं।

इस गीत में एक ऐसे ही तोते का जिक्र है जो केले के ऐसे ही एक गुच्छे के पास मंडरा रहा है। तोते को डराया जाता है कि अगर तुम इस पर चोंच मारोगे तो तुम्हारी शिकायत भगवान सूर्य से कर दी जाएगी जो तुम्हें नहीं माफ करेंगे। पर फिर भी तोता केले को जूठा कर देता है और सूर्य के कोप का भागी बनता है। पर उसकी भार्या सुगनी अब क्या करे बेचारी? कैसे सहे इस वियोग को ? अब तो ना देव या सूर्य कोई उसकी सहायता नहीं कर सकते आखिर पूजा की पवित्रता जो नष्ट की है उसने।

ये गीत थोड़ी बहुत फेर बदल के बाद सभी प्रमुख भोजपुरी गायकों द्वारा गाया गया है। पिछले साल मैंने इसे अपने चिट्ठे पर चढ़ाया था। आज छठ के गीत में छुपी भावनाओं को इस गीत के माध्यम से आवाज़ के सुधी श्रोताओं के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ।




केरवा जे फरेला घवद से
ओह पर सुगा मेड़राय


उ जे खबरी जनइबो अदिक (सूरज) से
सुगा देले जुठियाए


उ जे मरबो रे सुगवा धनुक से
सुगा गिरे मुरझाय


उ जे सुगनी जे रोए ले वियोग से
आदित होइ ना सहाय
देव होइ ना सहाय


अब देवी का गाया हुआ ये गीत तो मुझे नहीं मिल सका पर आप सब के लिए अनुराधा पोडवाल के स्वर में ये गीत प्रस्तुत है



Monday, November 3, 2008

छठ पर्व और शारदा सिंहा, कविता पौडवाल, अनुराधा पौडवाल, सुनील छैला बिहारी आदि के गाये गीत

भारत पर्व प्रधान देश है। बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में इन दिनों छठ पूजा की धूम है। इस अवसर हम आपके लिए गीत-संगीत से सजा आलेख लेकर आये हैं। छठ गीत की पारम्परिक धुन इतनी मधुर है कि जिसे भोजपुरी बोली समझ में न भी आती हो तो भी गीत सुंदर लगता है। यही कारण है कि इस पारम्परिक धुन का इस्तेमाल सैकड़ों गीतों में हुआ है, जिसपर लिखे बोलों को बहुत से गायक और गायिकाओं ने अपनी आवाज़ दी है। आलेख की शुरूआत पहले हम इसी पारम्परिक धुन पर पद्मश्री शारदा सिंहा द्वारा गाये एक गीत 'ओ दीनानाथ' को सुना कर करना चाहेंगे। पद्मश्री शारदा सिंहा को बिहार की कोकिला भी कहा जाता है। यह मशहूर लोकगायिका विंध्यवासिनी देवी की शिष्या थीं।




सुख-समृद्धि और और सूर्य उपासना का पर्व है 'छठ'

सूर्य नमन
इस वर्ष ४ नवम्बर को मनाई जा रही सूर्य षष्ठी गायत्री साधको के लिए अनुदानों का अक्षय कोष है। गायत्री महामंत्र के अधिष्ठाता भगवन सूर्य प्रत्यक्ष देव हैं। सूर्य देव की आराधना एवं उपासना से शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक शान्ति एवं अध्यात्मिक अनुदान-वरदान की उपलब्धि होती है। सूर्योपासना के लिए निर्धारित तिथि को सूर्यषष्ठी के रूप में जाना जाता है। कार्तिक महीने की शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि सूर्यषष्ठी कहलाती है। सूर्यषष्ठी व्रत मुख्यतः रोग मुक्ति, पुत्र प्राप्ति तथा दीर्घायु की कामना के लिए किया जाता है।
श्रद्धा एवं भावना के साथ किया गया छठ या सूर्यषष्ठी व्रत अत्यंत लाभदायक एवं फलदायक होता है। छठ शब्द का प्रादुर्भाव षष्ठी यानी षष्ठ से हुआ है। यह सूर्य उपासना की विशिष्ठ एवं खास तिथि है। सूर्योपासना को सूर्योपस्थान भी कहते हैं, इसमें सूर्य भगवान को भाव भरा अर्घ्य भी चढ़ाया जाता है। इस अर्घ्य दान में वैज्ञानिकता के साथ-साथ आध्यात्मिकता का गहन एवं गूढ़ रहस्य भी भरा पड़ा है, जिसका वेद, उपनिषदों एवं पुराणों में विस्तार से उल्लेख किया गया है।

शारदा सिंहा के स्वर में कुछ प्रसिद्ध छठ गीत

1. ओ दीनानाथ
2. उठअऽ सुरुज होइल बिहान
3. उगीहें सुरुज गोसैया हो
4. साम चकेबा खेलब
5. केलवा के पात पर
6. हे छठी मैया
7. हे गंगा मैया

वैदिक साहित्य में सूर्य देव की महिमा का भाव भरा गायन किया गया है। इनमें सर्वसुलभ सूर्य देव के सूक्ष्म एवं दिव्य आध्यात्मिक तुल्य का प्रतिपादन करते हुए सविता को सूर्य की आत्मा कहा गया है। गायत्री महामंत्र का सूर्य से गहरा तादातम्य है, इस तथ्य के पीछे तीन कारण है-
१-गायत्री महामंत्र का देवता सविता है।
२-सूर्योपासना सार्वभौमिक है।
३-सूर्य की उपासना-आराधना से होने वाला प्रभाव सर्वथा वैज्ञानिक एवं तथ्यपूर्ण है।

आर्ष साहित्य में इस तथ्य को प्रमाणितत करते हुए उल्लेख किया गया है। इस कथानक के अनुसार "गायत्री वरदां देवीं सावत्रीं वेदमातरम्", प्रजापति बोले, हे देवताओ! यह जो अनेक प्रकार के वरदान देने वाली गायत्री है उसे तुम सावित्री अर्थात सूर्य से उद्भाषित होने वाला ज्ञान जानो। इसके अतिरिक्त गोपथ ब्राह्मण ५/३ में तेजो वै गायत्री, के रूप में इसका निरूपण किया गया है। इसके अतिरिक्त ज्योतिर्वे गायत्री छंद साम् ज्योतिर्वे गायत्री, दविद्युतती वैगायत्री गायत्र्यैव भर्ग, तेजसा वेगायत्रीपथमं त्रिरात्रं दाधार पदै द्वितीयं त्र्यक्षरै स्तृतीयम् के रूप में सूर्य और गायत्री के सम्बन्ध को दर्शाया गया है। गायत्री मन्त्र के सवितुः पद में इसी एकात्मकता का संकेत है। गायत्री मन्त्र सविता देव से आपको एकात्म करने की गुह्य तकनीक है। गायत्री का देवता सविता सूर्य संसार के जीवन के ज्ञान-विज्ञान का केन्द्र है। यह अन्य समस्त देव शक्तियों का मुख्य केन्द्र भी है।
चारों वेदों में भी जो कुछ है वो सब भी सविता सूर्य शक्ति का विवेचन-विश्लेषण मात्र है। शतपथ ब्राहमण में असौ व आदित्यो देवः सविता, कहकर सूर्य की प्रतिष्ठा की गई है। भविष्योत्तर पुराण में कृष्ण और अर्जुन संवाद में सूर्य को त्रिदेवों के गुणों से विभूषित किया गया है। इस संवाद के अनुसार सूर्य उदयकाल में ब्रह्म, मध्याह्न काल में महेश और संध्या काल में विष्णु के रूप हैं।
अन्य शास्त्रों में सूर्य देव को इस तरह अलंकृत किया गया है, सूर्यो वै सर्वेषा देवानामात्मा अर्थात् सूर्य ही समस्त देवों की आत्मा है, सर्वदेवामय रविः अर्थात् सूर्य सर्वदेवमय है। मनुस्मृति का वचन है, सूर्य से वर्षा, वर्षा से अन्न और अन्न से प्रजा (प्राणी) का जन्म होता है। पौराणिक कथानकों के अनुसार सूर्य महर्षि कश्यप के पुत्र होने के कारण काश्यप कहलाये। उमका लोकावतरण महर्षि की पत्नी अदिति के गर्भ से हुआ था अतः उनका एक नाम आदित्य भी लोकविख्यात और प्रसिद्ध हुआ।
एक व्रती
उपनिषदों में आदित्य को ब्रह्मा के प्रतीक के रूप में दर्शाया गया है। छान्दोपनिषद् आदित्यो ब्रह्म कहता है तो तैत्तिरीयारण्यक असावादिव्यो ब्रह्म की उपमा देता है। अथर्ववेद की भी यही मान्यता है। इसके मतानुसार आदित्य ही ब्रह्म का साकार स्वरूप है। ऋग्वेद में सर्व्यापक ब्रह्म और सूर्य में समानता का स्पष्ट बोध होता है। यजुर्वेद सूर्य और भगवान में फर्क नहीं करता। कपिला तंत्र में, सूर्य को ब्रह्माण्ड में मूलभूत पंचतत्वों में से वायु का अधिपति घोषित किया गया है। हठ योग के अंतर्गत श्वास (वायु) को प्राण माना गया है। और सूर्य इन प्राणों का मूलाधार है। अतः आदित्यो वै प्राणः कहा गया है। योग साधना में प्रतिपादित मणि पूरक चक्र को सूर्य चक्र भी कहते हैं। हमारा नाभिकेंद्र (सूर्यचक्र) प्राणों का उद्गम स्थल ही नहीं, अपितु अचेतन मन के संस्कारों तथा चेतना का संप्रेषण केन्द्र भी है। सूर्यदेव इस चराचर जगत में प्राणों का प्रबल संचार करते हैं-"प्राणः प्रजानामुदयप्येषंषम सूर्यः"। सूर्य भगवान को मार्तंड भी कहते हैं, क्योंकि ये जगत को अपनी ऊष्मा और प्रकाश से ओत-प्रोत कर जीवन प्रदान करते हैं। सूर्यदेव कल्याण के उद्गम स्थान होने के कारण शम्भु भी कहलाते हैं। भक्तों का दुःख दूर करने अथवा जगत का संहार करने के कारण इन्हें त्वष्टा भी कहते हैं। किरण को धारण करने वाले सूर्यदेव अन्शुमान भी जाने जाते हैं। योग शास्त्र में पतंजलि उल्लेख करते हैं कि "भुवनज्ञानं सूर्य संयमात्" अर्थात् सूर्य के ध्यान एवं उपासना से समस्त संसार को ज्ञान प्राप्त हो जाता है।
बिहार के एक गाँव में पारम्परिक छठ-पर्व का दृश्य
सूर्य कालचक्र के महाप्रणेता हैं। सूर्य से ही दिन-रात्रि, मास, अयन एवं संवत्सर का निर्माण होता है। भारतीय संस्कृति में किसी वार का प्रारम्भ सूर्योदय से ही होता है। भारतीय सुर्योपासना के मूल में आध्यात्मिक लाभ के आलावा शारीरिक स्वास्थ्य एवं भौतिक लाभ का भाव निहित होता है। यह कई प्रकार के रोगों से रक्षा करता है। सूर्य की दिव्य किरणों में कुष्ठ तथ अन्य प्रकार के चर्म रोगों के किटाणुओं को नष्ट करने की अपार क्षमता एवं शक्ति सन्निहित है। इसी करण ऋग्वेद में कहा गया है " आदित्योऽसौजगप्स्याद् देवा विश्वस्य भुवनस्य गौपाः" अर्थात् सूर्य की किरणें सारे चराचर संसार की रक्षा करती हैं। ऋग्वेद में सूर्य की रश्मियों को हृदय रोग तथा पीलिया की चिकित्सा में लाभकारी बताया गया है। कुष्ठ रोग का शमन भी सूर्यदेव की कृपा से हो जाता है। श्री कृष्ण एवं जाबवंती के पुत्र सांब सूर्यदेव की उपासना से ही रोगमुक्त हुए थे। कृष्ण यजुर्वेदीय चाक्षुषोपनिषद् में सभी प्रकार के नेत्र रोगों से मुक्ति का उपाय सूर्य को बताया गया है।
तंत्र शास्त्र की मान्यता है कि नित्य सूर्य नमस्कार करने से सात पीढ़ियों से चली आ रही महा दरिद्रता दूर हो जाती है। सूर्य नमस्कार स्वयं में सूर्य आराधना भी है और स्वास्थ्य का व्यायाम भी। इसमें अनेक प्रकार की बीमारियों एवं विकृतियों का शमन होता है। इन्हीं कारणों से सूर्य को आरोग्य का देवता कहा गया है और उसकी किरणों को पवित्र, तेजस्वी एवं अक्षत माना गया है। सूर्य रश्मियाँ नदी की निर्मल धारा के सामान पावन हैं, जो अपने सानिध्य में आने वाले हर एक व्यक्ति को तेजस्विता, प्रखरता एवं पवित्रता से भर देती हैं। सूर्योपासना आरोग्य की रक्षा करने के आलावा अंतःकरण की चट्टानी मलिनता एवं कषाय-कलभषों को धोकर रख देती हैं। आरोग्य भास्करादिच्छेत् से स्वतः ही विदित होता है की सूर्य आरोग्य प्रदान करने वाले देवता है। यह आरोग्य केवल शरीर के धरातल तक ही सीमित नहीं है, वरन् मानसिक एवं आत्मिक स्तर पर प्रभाव छोड़ने में समर्थ एवं सक्षम है। अतः सूर्योपासना सभी रूपों में अनादिकाल से भारतवर्ष में ही नहीं, बल्कि समस्त विश्व के विभिन्न भागों में श्रद्धापूर्वक सूर्य की भक्ति की जाती रही है।

अनुराधा पौडवाल के स्वर में छठ गीत


यद्यपि कालचक्र के दुष्प्रभाव से वर्त्तमान समय में सूर्योपासना कि परम्परा का अत्यन्त ह्रास हो गया है, परन्तु फिर भी धर्म प्रधान भारतवर्ष में सनातन धर्मोजनता आज भी किसी न किसी रूप में सूर्य को देवता मानकर उनकी पूजा-आराधना करती है। इसी क्रम में सूर्यषष्ठी व्रत को मनाया जाता है। बिहार एवं झारखण्ड की जनता इस पावन तिथि को छठ पूजा के रूप में अत्यन्त श्रद्धा, उत्साह एवं उमंग के साथ मनाती है। वाराणसी एवं पूर्वांचल में इसे डालछठ कहा जाता है। कार्तिक शुल्क चतुर्थी के दिन नियम-स्नानादि से निवृत हो कर फलाहार किया जाता है। पंचमी में दिन भर उपवास करके किसी नदी या सरोवर में स्नान करके अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। इसके पश्चात् अस्वाद भोजन किया जाता है। गायत्री महामंत्र का भाव भरा उच्चारण कर विविध पूजोपहार वस्तुओं से सूर्य अर्घ्यदान दिया जाता है। तथा मनोकामना की जाती है। छठ, पुत्र प्राप्ति की कामना को पूर्ति करता है। अतः इसका सम्बन्ध षष्ठी माता से जोड़ दिया गया है। षष्ठी देवी दुर्गा की ही प्रतिरूप हैं। इसीलिए छठ व्रत के अवसर पर सूर्यदेव और षष्ठी माता के प्रति समान भक्ति भावना के दर्शन होते हैं।
इस व्रत को सर्वप्रथम यवन मुनि की पुत्नी सुकन्या ने अपने जराजीर्ण अधिपति के आरोग्य के निमित्त किया था। व्रत के सफल अनुष्ठान के सुप्रभाव से ऋषि को नेत्र ज्योति प्राप्त हुई और वे जराजीर्ण वृद्ध से युवा हो गये। ऐसी मान्यता है कि आज भी गायत्री महामंत्र का जप करते हुए नियमपूर्वक १२ वर्षों तक जो भी यह व्रत करता है, उसकी इच्छित मनोकामना की पूर्ति होती है। सूर्य षष्ठी में गायत्री मन्त्र के जप एवं सुर्यध्यान करने से सहज ही आतंरिक चेतना परिष्कृत होती है, साथ ही पवित्रता, प्रखरता में अभिवृद्धि होती है।

लेखक- सिद्धार्थ शंकर (साभार 'साधना-पथः नवम्बर २००८ अंक)
प्रस्तुति- शैलेश भारतवासी
प्रस्तुति- दीपाली मिश्रा और अमिताभ मीत


कविता पौडवाल के स्वर में छठ गीत
पटना के हाट पर नरियर कीनबे जरूर
छठी मैया हसिया पूरन हो
रखी सभी छठ के बरात मनावो
अगना में पोखरी खानिब



छठ का एक एल्बम बहुत मशहूर हुआ जिसे भोजपुरी लोकगीत गायकों में सबसे अधिक लोकप्रिय गायक-संगीतकार भरत शर्मा 'व्यास' ने अनुराधा पौडवाल से साथ आवाज़ दी थी और संगीत भी दिया था।
एल्बम- आहो दीनानाथ
स्वर- अनुराधा पौडवाल और भरत शर्मा 'व्यास'
बोल- आलोक शिवपुरी
संगीत- भरत शर्मा 'व्यास'
पटना के घाट पर देलू अरगवा केकरा
कार्तिक में ऐहू परदेसी बलम घर
फलवा से भरल दौरिया उसपे पियरी
नैहरे में करबो परब हम
साँझ भईल सूरज डुबिहे चल
आहो दीनानाथ दरसन दीजिए
बाझीन पर बैठ बाघिन बन छठ
चैती के छठवा तो हल्का बुझाला
रोजे-रोजे उगेला फजिराही आधी



एक और एल्बम के गीत हम आपके लिए लेकर आये हैं जिसे भोजपुरी और अंगिका लोकगीतों के मशहूर गायक सुनील छैला बिहारी, अपने पहले ही एल्बम 'कभी राम बनके, कभी श्याम बनके' से पूरे उत्तर भारत में प्रसिद्ध हुईं गायिका तृप्ति शाक्या तथा ९० के दशक में हिन्दी पार्श्व गीतों में अपना विशेष स्थान बनाने वाली गायिका अनुराधा पौडवाल ने आवाज़ दी है।
एल्बम- उगऽहो सूरज देब हमार
स्वर- सुनील छैला बिहारी, अनुराधा पौडवाल, तृप्ति शाक्या
बोल- राम मौसम, बिनय बिहारी, सुनील छैला बिहारी तथा कुछ पारम्परिक गीत
संगीत- सुनील छैला बिहारी

छठी मैया आही जइयो मोर अंगना
छठी मैया के महिमा छे भारी
छठी माई के दौरा रखे रे बबुआ
चारी ओ घाट के तलैया जलवा उमरत
कखनो रवि बन के कखनो आदित
दलिइवा कबूल करअ गगन बिहारी
भूऊल माफ करियअ हे छठी मैया
कहवाँ तोहार नहिरा गे धोबिन कहवाँ
कहवाँ-कहवाँ के सुरजधाम छै नामी
दोहरी कल सुपने सविता अरग देबे
काहे लगे सेवें तुलसी-खरना गीत

Monday, October 20, 2008

पिया मेहंदी लियादा मोती झील से...जाके सायिकील से न...

मिट्टी के गीत में- कजली गीत

मिर्जापुर उत्तर प्रदेश में एक लोक कथा चलती है, कजली की कथा. ये कथा विस्थापन के दर्द की है. रोजगार की तलाश में शहर गए पति की याद में जल रही है कजली. सावन आया और विरह की पीडा असहनीय होती चली गयी. काले बादल उमड़ घुमड़ छाए. कजली के नैना भी बरसे. बिजली चमक चमक जाए तो जैसे कलेजे पर छुरी सी चले. जब सखी सहेलियां सवान में झूम झूम पिया संग झूले, कजली दूर परदेश में बसे अपने साजन को याद कर तड़प तड़प रह जाए. आह ने गीत का रूप लिया. काजमल माई के चरणों में सर रख जो गीत उसने बुने, उन्ही पीडा के तारों से बने कजरी के लोकप्रिय लोक गीत. सावन में गाये जाने वाले ये लोकगीत अमूमन औरतों द्वारा झुंड बना कर गाये जाते हैं (धुनमुनिया कजरी). कजरी गीत गावों देहातों में इतने लोकप्रिय हैं की हर बार सावन के दौरान क्षेत्रीय कलाकारों द्वारा गाये इन गीतों की cd बाज़ार में आती है और बेहद सुनी और सराही जाती है.

आसाम की वादियों और कश्मीर की घाटियों की सैर के बाद आईये चलते हैं विविधताओं से भरे पूरे प्रदेश, उत्तर प्रदेश की तरफ़. कण कण में संगीत समेटे उत्तर प्रदेश में गाये जाने वाले सावन के गीत कजरी का आनंद लीजिये आज मिटटी के गीत श्रंखला में -

बदरा घुमरी घुमरी घन गरजे... स्वर - रश्मि दत्त व् साथी



सोमा घोष कजरी की विख्यात गायिका हैं...उनकी आवाज़ में ये कजरी सुनें. जरूरी नही की सभी कजरी गीत विरहा के हों जैसे ये गीत,लौट आए पिया से की जानी वाली फरमाईशों का है - "पिया मेहंदी लियादा न मोती झील से जाके सायिकील से न...." यहाँ "सैकील" की घंटी का इस्तेमाल संगीतकार ने बहुत खूबी से किया है, सुनिए -



और अंत में सुनिए ये भोजपुरी कजरी भी "झुलाए गए झुलवा..."



क्षेत्रीय गीतों की जानकारी और संकलन के इस कार्य में आप भी हमारी मदद कर सकते हैं. यदि किसी क्षेत्र विशेष के लोक गीत की जानकारी आप रखते हैं तो इस मंच के माध्यम से हम सब के साथ बंट सकते हैं. संपर्क करें podcast.hindyugm@gmail.com.

Saturday, September 13, 2008

मिट्टी के गीत ( ३), कश्मीर की वादियों में महकता सूफी संगीत

उस्ताद गुलाम मोहमद साज़नवाज़ का जादूई संगीत

असाम के मिटटी की महक लेने के बाद आईये चलते हैं, हिमालय की गोद में बसे धरती के स्वर्ग कश्मीर की खूबसूरत वादियों में. यहाँ तो चप्पे चप्पे में संगीत है, बहते झरनों में कहीं संतूर की स्वरलहरियाँ मिलेंगीं तो कहीं चनारों के बीच बहती हवाओं में बजते सितारों के स्वर मिलेंगे आपको, कहीं रबाब तो कहीं नगाडा, कहीं "रौफ" पर थिरकती कश्मीरी सुंदरियाँ तो कहीं पानी का भरा प्याला सर पर रख कर "नगमा" पर नाचते लड़के. कश्मीर के संगीत में सूफियाना संगीत रचा बसा है.सूफियाना कलाम कश्मीरी संगीत की आत्मा है. गुलाम मोहमद साज़नवाज़ कश्मीरी सूफी संगीत के एक "लिविंग लीजेंड" कहे जा सकते हैं. आईये उन्ही की आवाज़ और मौसिकी का आनंद लें इस विडियो में, जो हम तक पहुँचा कश्मीर निवासी और कश्मीरी सूफी संगीत के बहुत बड़े प्रेमी साजिद हमदानी की बदौलत, तो सुनते हैं उस्ताद को और घूम आते हैं संगीत के पंखों पर बैठकर दिलकश कश्मीर की मस्त फ़िज़ाओं में.



Indian Folk Music Series, Kashmeeri Sudiyana Sangeet, Ustad Ghulam Md. Saaznawaaz

Thursday, August 28, 2008

मिटटी के गीत ( २ ), लोक गीतों की अनमोल धरोहर संभाले हैं - ये संगीत युगल

लोक गीतों की बात चल रही है, और हम है आसाम की हरियाली वादियों में, जुबीन की मधुर आवाज़ में हम सुन चुके हैं ये भोरगीत, आसाम के लोकगीतों को मुख्यता दो प्रकारों में बांटा जा सकता है. कमरुपिया और गुवाल्पोरिया, आज हम आपको सुनाते हैं एक कमरुपिया लोक गीत, आवाजें हैं आसाम के बेहद मशहूर लोकगीत गायक दम्पति, रामेश्वर पाठक और धनादा पाठक की,

This perfect couple continued making waves with their magnificent renderings of the folk tunes in never before styles. Dhanada Pathak originally comes from a culturally enlightened family of Barpeta who owned a Jatra party in their home called "The Rowly Opera". Her elder brothers were actively associated with the opera in many ways. They acted, sang, played instruments like the dotora, flute and others and initiated the functioning of the opera. So when she got married to Sri Rameshwar Pathak, their association nourished their individual dreams that had by the time taken an united shape. Today, for the masses, Rameshwar Pathak and Dhanada Pathak are among those few people of the state who are considered as doyens of Assamese folk music. With a number of gramophone records and over a hundred and fifty audio cassettes under their belt, they are the people who presented Assamese lokageet (folk songs) in duet and chorus style for the very first time, and in that way they can be called pioneers in the field.


Awarded with the Sangeet Natak Akademi award in the year 1997, Rameshwar Pathak was selected for the Artist’s pension of the state government the same year.

A couple who have contributed richly towards the development of Assamese folk music, and who has shared the stage with legendary artistes like Manna Dey, Shyamal Mitra, Purna Das, Arati Mukherji and others, Assam and the Assamese people owe a lot to them.

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इन लोक गीतों में, दुतारा ( चार तारों का एक क्षेत्रीय गिटार ), डोगोर ( बड़े कटोरे के आकर का वाध्य ), ताल, और कभी कभी एकतारा और अन्य सहायक वाध्य, गीत को सजाने के लिए इस्तेमाल होते हैं. गीत के भाव अक्सर भक्ति रस में डूबे होते हैं ये वो गीत होते हैं जो कई पुरखों से इन क्षेत्रों में ईश्वर की आराधना के लिए गाये जाते रहें हैं.

सुनिए और इस भाव में डूब जाइए, यकीं मानिये ये लोक गीत आपके दिल को छू जाएगा.



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गीत व जानकारी साभार - सत्यजीत बरोह

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