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Sunday, May 28, 2017

राग खमाज : SWARGOSHTHI – 319 : RAG KHAMAJ




स्वरगोष्ठी – 319 में आज

संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन – 5 : राग खमाज का रंग

राग खमाज में उस्ताद उस्ताद निसार हुसैन खाँ से खयाल और मुहम्मद रफी से गीत सुनिए




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के मंच पर ‘स्वरगोष्ठी’ की जारी श्रृंखला “संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन” की पाँचवीं कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, इस श्रृंखला में हम फिल्म जगत में 1948 से लेकर 1967 तक सक्रिय रहे संगीतकार रोशन के राग आधारित गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। रोशन ने भारतीय फिल्मों में हर प्रकार का संगीत दिया है, किन्तु राग आधारित गीत और कव्वालियों को स्वरबद्ध करने में उन्हें विशिष्टता प्राप्त थी। भारतीय फिल्मों में राग आधारित गीतों को स्वरबद्ध करने में संगीतकार नौशाद और मदन मोहन के साथ रोशन का नाम भी चर्चित है। इस श्रृंखला में हम आपको संगीतकार रोशन के स्वरबद्ध किये राग आधारित गीतों में से कुछ गीतों को चुन कर सुनवा रहे हैं और इनके रागों पर चर्चा भी कर रहे हैं। इस परिश्रमी संगीतकार का पूरा नाम रोशन लाल नागरथ था। 14 जुलाई 1917 को तत्कालीन पश्चिमी पंजाब के गुजरावालॉ शहर (अब पाकिस्तान) में एक ठेकेदार के परिवार में जन्मे रोशन का रूझान बचपन से ही अपने पिता के पेशे की और न होकर संगीत की ओर था। संगीत की ओर रूझान के कारण वह अक्सर फिल्म देखने जाया करते थे। इसी दौरान उन्होंने एक फिल्म ‘पूरन भगत’ देखी। इस फिल्म में पार्श्वगायक सहगल की आवाज में एक भजन उन्हें काफी पसन्द आया। इस भजन से वह इतने ज्यादा प्रभावित हुए कि उन्होंने यह फिल्म कई बार देख डाली। ग्यारह वर्ष की उम्र आते-आते उनका रूझान संगीत की ओर हो गया और वह पण्डित मनोहर बर्वे से संगीत की शिक्षा लेने लगे। मनोहर बर्वे स्टेज के कार्यक्रम को भी संचालित किया करते थे। उनके साथ रोशन ने देशभर में हो रहे स्टेज कार्यक्रमों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया। मंच पर जाकर मनोहर बर्वे जब कहते कि “अब मैं आपके सामने देश का सबसे बडा गवैया पेश करने जा रहा हूँ” तो रोशन मायूस हो जाते क्योंकि “गवैया” शब्द उन्हें पसन्द नहीं था। उन दिनों तक रोशन यह तय नहीं कर पा रहे थे कि गायक बना जाये या फिर संगीतकार। कुछ समय के बाद रोशन घर छोडकर लखनऊ चले गये और पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी द्वारा स्थापित मॉरिस कॉलेज ऑफ हिन्दुस्तानी म्यूजिक (वर्तमान में भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय) में प्रवेश ले लिया और कॉलेज के प्रधानाचार्य डॉ. श्रीकृष्ण नारायण रातंजनकर के मार्गदर्शन में विधिवत संगीत की शिक्षा लेने लगे। पाँच वर्ष तक संगीत की शिक्षा लेने के बाद वह मैहर चले आये और उस्ताद अलाउदीन खान से संगीत की शिक्षा लेने लगे। एक दिन अलाउदीन खान ने रोशन से पूछा “तुम दिन में कितने घण्टे रियाज करते हो। ” रोशन ने गर्व के साथ कहा ‘दिन में दो घण्टे और शाम को दो घण्टे”, यह सुनकर अलाउदीन बोले “यदि तुम पूरे दिन में आठ घण्टे रियाज नहीं कर सकते हो तो अपना बोरिया बिस्तर उठाकर यहाँ से चले जाओ”। रोशन को यह बात चुभ गयी और उन्होंने लगन के साथ रियाज करना शुरू कर दिया। शीघ्र ही उनकी मेहनत रंग आई और उन्होंने सुरों के उतार चढ़ाव की बारीकियों को सीख लिया। इन सबके बीच रोशन ने उस्ताद बुन्दु खान से सांरगी की शिक्षा भी ली। उन्होंने वर्ष 1940 में दिल्ली रेडियो केंद्र के संगीत विभाग में बतौर संगीतकार अपने कैरियर की शुरूआत की। बाद में उन्होंने आकाशवाणी से प्रसारित कई कार्यक्रमों में बतौर हाउस कम्पोजर भी काम किया। वर्ष 1948 में फिल्मी संगीतकार बनने का सपना लेकर रोशन दिल्ली से मुम्बई आ गये। श्रृंखला की पाँचवीं कड़ी में आज हमने 1962 में प्रदर्शित फिल्म ‘आरती’ का एक गीत चुना है, जिसे रोशन ने राग खमाज के स्वरों में पिरोया है। यह गीत मुहम्मद रफी की आवाज़ में प्रस्तुत है। इसके साथ ही इसी राग में निबद्ध एक खयाल सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक उस्ताद निसार हुसैन खाँ के स्वरों में प्रस्तुत कर रहे हैं।



मुहम्मद रफी
ठे दशक के अन्तिम वर्षों में रोशन के संगीत में उत्कृष्टता के साथ-साथ लोकप्रियता का गुण भी आ चुका था। दशक के अन्त तक रोशन का संगीत वास्तव में सफलता की ओर अग्रसर हो चला था। पिछले अंक में प्रस्तुत किया गया फिल्म ‘बाबर’ का गीत और फिल्म के अन्य गीत रोशन के संगीत की उत्कृष्टता के उदाहरण थे। 1960 में बनी फिल्म ‘बरसात की रात’ का संगीत व्यावसायिक दृष्टि से रोशन का सफलतम संगीत माना जाएगा। फिल्म ‘बरसात की रात’ में कव्वालियों की धूम थी। इस फिल्म की कव्वाली –“ना तो कारवाँ की तलाश है...” और –“ये इश्क़ इश्क़ है इश्क़ इश्क़...” भारतीय फिल्म संगीत के इतिहास की सर्वश्रेष्ठ और लोकप्रिय कव्वालियों में से एक है। इस ऐतिहासिक कव्वाली की रिकार्डिंग 29 घण्टे में पूरी हुई थी। इसी फिल्म में रोशन ने राग गौड़ मल्हार के स्वरों की चाशनी में डूबे गीत –“गरजत बरसत सावन आयो री...” को भी शामिल किया था। इस गीत की संगीत रचना की कहानी भी अत्यन्त रोचक है। दरअसल यह गीत राग गौड़ मल्हार की एक पारम्परिक बन्दिश पर आधारित है, जिसके बोल हैं –“गरजत बरसात भीजत आई लो...”। रोशन ने थोड़े शाब्दिक हेर-फेर के साथ इस बन्दिश को इस्तेमाल किया था। मजे की बात यह है कि रोशन ने इस बन्दिश और संगीत रचना का प्रयोग लगभग एक दशक पहले 1951 में प्रदर्शित फिल्म ‘मल्हार’ में कर चुके थे, किन्तु तब फिल्म न चलने के कारण गीत भी अनसुना रह गया था। एक दशक बाद फिर गीतकार साहिर लुधियानवी द्वारा थोड़े शब्दों के फेरबदल से फिल्म ‘बरसात की रात’ का यह गीत रोशन का सदाबहार गीत बन गया। फिल्म ‘बरसात की रात’ के बाद के दौर में फिल्म संगीत समीक्षकों की दृष्टि में रोशन गीतों की लोकप्रियता की ओर अधिक ध्यान देने लगे थे। इस दौर के गीतों में लोकप्रियता के साथ-साथ माधुर्य भी बरकरार था। राग आधारित मधुर गीतों और लोकप्रियता की कसौटी पर समान रूप से खरे उतरे संगीत से सजी 1962 में फिल्म ‘आरती’ प्रदर्शित हुई था। इस फिल्म के गीतों में रागों का मजबूत आधार था। फिल्म के गीतों में राग खमाज और पहाड़ी का स्पर्श किया गया है। लता मंगेशकर की आवाज़ में राग पहाड़ी की छाया लिये गीत –“कभी तो मिलेगी, कहीं तो मिलेगी, बहारों की मंज़िल राही...” फिल्म का बेहद लोकप्रिय गीत है। फिल्म में आशा भोसले और मुहम्मद रफी की आवाज़ में एक कव्वाली –“वो तीर दिल पे चला...” भी शामिल थी। राग खमाज के स्वरों का स्पर्श करते दो गीत मधुरता और लोकप्रियता की कसौटी खरे उतरते हैं। लता मंगेशकर और मुहम्मद रफी के स्वरों में युगलगीत -"बार बार तोहें क्या समझाएँ पायल की झंकार...” और मुहम्मद रफी की एकल आवाज़ में –“अब क्या मिसाल दूँ मैं तुम्हारे शबाब की...” में राग खमाज का मधुर स्पर्श था। आज हमने आपके लिए राग खमाज पर आधारित, मुहम्मद रफी का गाया और मजरूह सुल्तानपुरी का लिखा गीत –“अब क्या मिसाल दूँ मैं तुम्हारे शबाब की...” चुना है। अब आप रोशन की इस मनमोहक रचना का रसास्वादन कीजिए।

राग खमाज : “अब क्या मिसाल दूँ मैं तुम्हारे शबाब की...” : मुहम्मद रफी : फिल्म – आरती



उस्ताद निसार हुसैन खाँ  (दाहिने)
आज का राग खमाज इसी नाम से प्रचलित खमाज थाट से सम्बन्धित माना जाता है। खमाज थाट के स्वर होते हैं- सा, रे ग, म, प ध, नि॒(कोमल)। अर्थात इस थाट में निषाद स्वर कोमल और शेष सभी स्वर शुद्ध होते हैं। इस थाट का आश्रय राग ‘खमाज’ कहलाता है। ‘खमाज’ राग में थाट के अनुकूल निषाद स्वर कोमल और शेष सभी स्वर शुद्ध होते हैं। यह षाड़व-सम्पूर्ण जाति का राग है। अर्थात राग के आरोह में छः स्वर और अवरोह में सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं। राग खमाज के आरोह में सा, ग, म, प, ध नि सां और अवरोह में सां, नि(कोमल), ध, प, म, ग, रे, सा स्वरों का प्रयोग होता है। आरोह में ऋषभ स्वर नहीं लगता। राग में दोनों निषाद का प्रयोग होता है। आरोह में शुद्ध निषाद और अवरोह में कोमल निषाद लगाया जाता है। वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है। इस राग के गायन-वादन का समय रात्रि का दूसरा प्रहर होता है।

राग खमाज का उदाहरण प्रस्तुत करने के लिए हमने रामपुर सहसवान घराने के प्रमुख स्तम्भ उस्ताद निसार हुसेन खाँ (1909-1993) द्वारा प्रस्तुत एक दुर्लभ बन्दिश का चुनाव किया है। राग खमाज की यह अनमोल रचना 1929 में रिकार्ड की गई थी। उस्ताद निसार हुसेन खाँ को अपने पिता और गुरु उस्ताद फिदा हुसेन खाँ से संगीत विरासत में प्राप्त हुआ था। बहुत छोटी आयु में उन्हें बड़ौदा के महाराज सयाजी राव गायकवाड़ के दरबारी संगीतज्ञ होने का गौरव प्राप्त हुआ था। आगे चलकर खाँ साहब ‘आकाशवाणी’ से भी जुड़े। 1977 में आई.टी.सी. संगीत रिसर्च अकादमी, कोलकाता में प्रधान गुरु नियुक्त किया गया। यहाँ रह कर उन्होने उस्ताद राशिद खाँ सहित अनेक योग्य शिष्यो को तैयार किया। भारत सरकार द्वारा 1970 में उन्हें ‘पद्मभूषण’ सम्मान से विभूषित किया गया। इसके अलावा खाँ साहब को संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, तानसेन सम्मान सहित गन्धर्व महाविद्यालय से डाक्टरेट की उपाधि से भी नवाजा गाय था। आइए गायकी के इस शिखर-पुरुष की आवाज़ में सुनते हैं, राग खमाज की यह बन्दिश। आप इस बन्दिश का रसास्वादन कीजिए और हमें आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। 

राग खमाज : ‘कोयलिया कूक सुनावे...’ : उस्ताद निसार हुसेन खाँ




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 319वें अंक की पहेली में आज हम आपको वर्ष 1962 में प्रदशित एक पुरानी फिल्म के एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 320वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के दूसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।





1 – गीत के इस अंश में आपको किस राग का आधार परिलक्षित हो रहा है?

2 – रचना के इस अंश में किस ताल का प्रयोग किया गया है?

3 – यह किस मशहूर पार्श्वगायिका की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार 3 जून, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 321वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।



पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 317वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको 1960 में प्रदर्शित फिल्म ‘बाबर’ से एक राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन में से दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग – कल्याण अथवा यमन, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, स्वर – सुधा मल्होत्रा

इस अंक की पहेली में हमारे चार नियमित प्रतिभागियों ने दो-दो अंक अपने खाते में जोड़ लिये हैं। वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी इस सप्ताह के विजेता हैं। उपरोक्त सभी चार प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला ‘संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन’ के इस पाँचवें अंक में हमने आपके लिए राग खमाज पर आधारित फिल्म ‘आरती’ से रोशन के एक गीत और इस राग की शास्त्रीय संरचना पर चर्चा की और इस राग का एक परम्परागत उदाहरण उस्ताद निसार हुसैन खाँ के स्वरों में प्रस्तुत किया। रोशन के संगीत पर चर्चा के लिए हमने फिल्म संगीत के सुप्रसिद्ध इतिहासकार सुजॉय चटर्जी के आलेख और लेखक पंकज राग की पुस्तक ‘धुनों की यात्रा’ का सहयोग लिया है। हम इन दोनों विद्वानों का आभार प्रकट करते हैं। आगामी अंक में हम भारतीय संगीत जगत के सुविख्यात संगीतकार रोशन के एक अन्य राग आधारित गीत पर चर्चा करेंगे। हमारी आगामी श्रृंखलाओं के विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें  swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 8 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Sunday, October 16, 2016

राग भैरवी : SWARGOSHTHI – 288 : RAG BHAIRAVI



स्वरगोष्ठी – 288 में आज

नौशाद के गीतों में राग-दर्शन – 1 : सहगल ने गाया यह गीत

“जब दिल ही टूट गया, हम जी के क्या करेंगे...”




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से शुरू हो रही हमारी नई श्रृंखला – “नौशाद के गीतों में राग-दर्शन” में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय फिल्म संगीत के शिखर पर विराजमान नौशाद अली के व्यक्तित्व और उनके कृतित्व पर चर्चा करेंगे। श्रृंखला की विभिन्न कड़ियों में हम आपको फिल्म संगीत के माध्यम से रागों की सुगन्ध बिखेरने वाले अप्रतिम संगीतकार नौशाद अली के कुछ राग-आधारित गीत प्रस्तुत करेंगे। इस श्रृंखला का समापन हम आगामी 25 दिसम्बर को नौशाद अली के 98वीं जयन्ती के अवसर पर करेंगे। 25 दिसम्बर, 1919 को सांगीतिक परम्परा से समृद्ध शहर लखनऊ के कन्धारी बाज़ार में एक साधारण परिवार में नौशाद का जन्म हुआ था। नौशाद जब कुछ बड़े हुए तो उनके पिता वाहिद अली घसियारी मण्डी स्थित अपने नए घर में आ गए। यहीं निकट ही मुख्य मार्ग लाटूश रोड (वर्तमान गौतम बुद्ध मार्ग) पर संगीत के वाद्ययंत्र बनाने और बेचने वाली दूकाने थीं। उधर से गुजरते हुए बालक नौशाद घण्टों दूकान में रखे साज़ों को निहारा करते थे। एक बार तो दूकान के मालिक गुरबत अली ने नौशाद को फटकारा भी, लेकिन नौशाद ने उनसे आग्रह किया की वे बिना वेतन के दूकान पर रख लें। नौशाद उस दूकान पर रोज बैठने लगे। वहाँ वह साज़ों की झाड़-पोछ करते और दूकान के मालिक का हुक्का तैयार करते। साज़ों की झाड़-पोछ के दौरान उन्हें कभी-कभी बजाने का मौका भी मिल जाता था। उन दिनों मूक फिल्मों का युग था। फिल्म प्रदर्शन के दौरान दृश्य के अनुकूल सजीव संगीत प्रसारित हुआ करता था। लखनऊ के रॉयल सिनेमाघर में फिल्मों के प्रदर्शन के दौरान एक लद्दन खाँ थे जो हारमोनियम बजाया करते थे। यही लद्दन खाँ साहब नौशाद के पहले गुरु बने। नौशाद के पिता संगीत के सख्त विरोधी थे, अतः घर में बिना किसी को बताए सितार नवाज़ युसुफ अली और गायक बब्बन खाँ की शागिर्दी की। कुछ बड़े हुए तो उस दौर के नाटकों की संगीत मण्डली में भी काम किया। घर वालों की फटकार बदस्तूर जारी रहा। अन्ततः 1937 में एक दिन घर में बिना किसी को बताए माया नगरी बम्बई की ओर रुख किया।


र से भाग कर नौशाद बम्बई (अब मुम्बई) पहुँचे। कुछ समय तक भटकते रहे। एक दिन न्यू पिक्चर कम्पनी में संगीत वादकों के चयन के लिए प्रकाशित विज्ञापन के आधार पर नौशाद बड़ी उम्मीद लेकर ग्राण्ट रोड स्थित कम्पनी के कार्यालय पहुँचे। वहाँ उस समय के जाने-माने संगीतकार उस्ताद झण्डे खाँ वादकों का इण्टरव्यू ले रहे थे। नौशाद ने भी खाँ साहब को कुछ सुनाया। उन्होने बाद में आने को कह कर नौशाद को रुखसत किया। उसी इण्टरव्यू में नौशाद की भेंट गुलाम मोहम्मद से हुई, जो आगे चलकर पहले उनके सहायक बने और फिर बाद में स्वतंत्र संगीतकार भी हुए। बहरहाल, उस्ताद झण्डे खाँ ने नौशाद को पियानो वादक के रूप में चालीस रुपये और गुलाम मोहम्मद को तबला व ढोलक वादक के रूप में साठ रुपये मासिक वेतन पर रख लिया। और इस तरह नौशाद का प्रवेश फिल्म संगीत के क्षेत्र में हुआ।

अब हम आपको नौशाद के फिल्मी सफर के पहले दशक का संगीतबद्ध किया एक महत्त्वपूर्ण गीत सुनवाते हैं। यह गीत हमने 1946 में प्रदर्शित फिल्म ‘शाहजहाँ’ से लिया है। फिल्म के नायक और गायक कुन्दनलाल सहगल थे। कई अर्थों में यह फिल्म भारतीय फिल्म इतिहास के पन्नों पर स्वर्णाक्षरों से अंकित है। इस फिल्म का गीत- ‘जब दिल ही टूट गया...’ सहगल का अन्तिम गीत सिद्ध हुआ। इसी गीत के गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी की यह पहली फिल्म थी। इसी गीत को नौशाद ने सहगल से आग्रह कर दो बार, एक बार बिना शराब पिये और फिर दोबारा शराब पीने के बाद रिकार्ड कराया और उन्हें यह एहसास कराया कि बिना पिये वे बेहतर गाते हैं। बहरहाल, आइए हम आपको सहगल का गाया और नौशाद का संगीतबद्ध किया फिल्म ‘शाहजहाँ’ का वही गीत सुनवाते हैं जो राग भैरवी पर आधारित है। इस गीत में राग के स्वर के माध्यम से करुणा भाव स्पष्ट रूप से झलकते हैं।

राग भैरवी : “जब दिल ही टूट गया...” : कुन्दनलाल सहगल : फिल्म – शाहजहाँ




अभी आपने जो गीत सुना, उसमें राग भैरवी के स्वर लगे हैं। स्वरों के माध्यम से प्रत्येक रस का सृजन करने में राग भैरवी सर्वाधिक उपयुक्त राग है। संगीतज्ञ इसे ‘सदा सुहागिन राग’ तथा ‘सदाबहार’ राग के विशेषण से अलंकृत करते हैं। सम्पूर्ण जाति का यह राग भैरवी थाट का आश्रय राग माना जाता है। राग भैरवी में ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद सभी कोमल स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। राग भैरवी के आरोह स्वर हैं, सा, रे॒ (कोमल), ग॒ (कोमल), म, प, ध॒ (कोमल), नि॒ (कोमल), सां  तथा अवरोह के स्वर, सां, नि॒ (कोमल), ध॒ (कोमल), प, म ग (कोमल), रे॒ (कोमल), सा  होते हैं। यूँ तो इस राग के गायन-वादन का समय प्रातःकाल, सन्धिप्रकाश बेला है, किन्तु आमतौर पर इसका गायन-वादन किसी संगीत-सभा अथवा समारोह के अन्त में किये जाने की परम्परा बन गई है। ‘भारतीय संगीत के विविध रागों का मानव जीवन पर प्रभाव’ विषय पर अध्ययन और शोध कर रहे लखनऊ के जाने-माने मयूर वीणा और इसराज वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र से जब मैंने राग भैरवी पर चर्चा की तो उन्होने स्पष्ट बताया कि भारतीय रागदारी संगीत से राग भैरवी को अलग करने की कल्पना ही नहीं की जा सकती। यदि ऐसा किया गया तो मानव जाति प्रातःकालीन ऊर्जा की प्राप्ति से वंचित हो जाएगी। राग भैरवी मानसिक शान्ति प्रदान करता है। इसकी अनुपस्थिति से मनुष्य डिप्रेशन, उलझन, तनाव जैसी असामान्य मनःस्थितियों का शिकार हो सकता है। प्रातःकाल सूर्योदय का परिवेश परमशान्ति का सूचक होता है। ऐसी स्थिति में भैरवी के कोमल स्वर- ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद, मस्तिष्क की संवेदना तंत्र को सहज ढंग से ग्राह्य होते है। कोमल स्वर मस्तिष्क में सकारात्मक हारमोन रसों का स्राव करते हैं। इससे मानव मानसिक और शारीरिक विसंगतियों से मुक्त रहता है। भैरवी के विभिन्न स्वरों के प्रभाव के विषय में श्री मिश्र ने बताया कि कोमल ऋषभ स्वर करुणा, दया और संवेदनशीलता का भाव सृजित करने में समर्थ है। कोमल गान्धार स्वर आशा का भाव, कोमल धैवत जागृति भाव और कोमल निषाद स्फूर्ति का सृजन करने में सक्षम होता है। भैरवी का शुद्ध मध्यम इन सभी भावों को गाम्भीर्य प्रदान करता है। धैवत की जागृति को पंचम स्वर सबल बनाता है। इस राग के गायन-वादन का सर्वाधिक उपयुक्त समय प्रातःकाल होता है। भैरवी के स्वरों की सार्थक अनुभूति कराने के लिए अब हम प्रस्तुत कर रहे हैं, रामपुर, सहसवान घराने की गायकी के संवाहक उस्ताद राशिद खाँ के स्वर में राग भैरवी में निबद्ध एक वंदना गीत। ऐसी मान्यता है कि इस गीत की रचना संगीत सम्राट तानसेन ने की थी। आप इस रचना के माध्यम से राग भैरवी के भक्तिरस का अनुभव कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। 

राग भैरवी : "जय शारदा भवानी भारती..." : उस्ताद राशिद खाँ





संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 288वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको सात दशक पुरानी हिन्दी फिल्म के लोकप्रिय गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 290वें अंक के उत्तर सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की चौथी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की छाया है?

2 – गीत के इस अंश में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गायिका को पहचान सकते हैं? हमे उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 22 अक्तूबर, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 290वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 286 की संगीत पहेली में हमने आपको उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ और साथियों द्वारा शहनाई पर प्रस्तुत कजरी वादन का अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- वाद्य – शहनाई, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल - दादरा औए कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- वादक – उस्ताद बिसमिल्लाह खाँ औए साथी

इस बार की पहेली में हमारी नियमित प्रतिभागियों में से पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर से क्षिति तिवारी, वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने सही उत्तर दिये हैं। सभी पाँच प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात 


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर अपने सैकड़ों पाठकों के अनुरोध पर आज से एक नई लघु श्रृंखला “नौशाद के गीतों में राग-दर्शन” आरम्भ किया है। इस श्रृंखला के लिए हमने संगीतकार नौशाद के आरम्भिक दो दशकों की फिल्मों के गीत चुने हैं। श्रृंखला के आलेख को तैयार करने के लिए हमने फिल्म संगीत के जाने-माने इतिहासकार और हमारे सहयोगी स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी और लेखक पंकज राग की पुस्तक ‘धुनों की यात्रा’ का सहयोग लिया है। गीतों के चयन के लिए हमने अपने पाठकों की फरमाइश का ध्यान रखा है। यदि आप भी किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



 

Sunday, December 28, 2014

‘हमें तुमसे प्यार कितना...’ : SWARGOSHTHI – 200 : RAG BHAIRAVI




स्वरगोष्ठी – 200 में आज

शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मी गीत – 9 : राग भैरवी


विदुषी परवीन सुल्ताना से सुनिए भैरवी के स्वरों में पिरोया गीत- ‘हमें तुमसे प्यार कितना ये हम नहीं जानते...’ 




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के 200वें अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। वर्ष 2014 के इस समापन अंक के साथ ही शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, लोक और फिल्म संगीत पर केन्द्रित हमारे साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ की चार वर्षों की यात्रा पूर्ण होती है। हमारी इस यात्रा में असंख्य संगीतानुरागी सहयात्री बने। उन सभी का नामोल्लेख इस एक अंक में सम्भव नहीं है। हमारे कुछ श्रोता और पाठक समय-समय पर अपने सुझावों और फरमाइशों से अवगत कराते रहते हैं। आपके सुझावों के आधार पर ही हम आगामी अंकों की रूपरेखा निर्धारित करते हैं। वर्ष 2014 में लगभग 12 संगीत प्रेमियों ने हमारी संगीत पहेली में भाग लिया, जिनमें से 4-5 प्रतिभागी तो नियमित थे। ‘स्वरगोष्ठी’ के इस 200वें अंक के माध्यम से हम सभी पाठको, श्रोताओं, सुझाव देने वालों और पहेली में भाग लेने वाले प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त करते हैं। आइए, अब आज के इस अंक की प्रस्तुतियों पर कुछ चर्चा करते हैं। इन दिनों ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी है, हमारी लघु श्रृंखला, ‘शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मी गीत’। यह इस लघु श्रृंखला की समापन कड़ी है। इस श्रृंखला में आप फिल्मों के ऐसे गीत सुन रहे हैं जो रागों पर आधारित हैं और इन्हें किसी फिल्मी पार्श्वगायक या गायिका ने नहीं बल्कि समर्थ शास्त्रीय गायक या गायिका ने गाया है। आज का गीत नौवें दशक के शुरुआती दौर अर्थात 1981 में प्रदर्शित फिल्म ‘कुदरत’ से लिया गया है। यह गीत राग भैरवी पर आधारित है और इसे सुप्रसिद्ध गायिका परवीन सुल्ताना ने गाया है। इसके साथ ही राग भैरवी के एक अलग रंग का अनुभव करने के लिए हम आपको विदुषी एन. राजम् की वायलिन पर एक दादरा भी प्रस्तुत कर रहे हैं।



नौवें दशक के आरम्भिक वर्ष अर्थात वर्ष 1981 में फिल्म ‘कुदरत’ प्रदर्शित हुई थी। इसके संगीतकार राहुलदेव बर्मन थे। उन्होने फिल्म के एक प्रसंग के लिए राग भैरवी के स्वरों में एक गीत की धुन बनाई। फिल्म में यह गीत दो भिन्न प्रसंगों में और दो भिन्न आवाज़ों में शामिल किया गया है। गीत का एक संस्करण पार्श्वगायक किशोर कुमार की आवाज़ में है तो दूसरा संस्करण विदुषी परवीन सुल्ताना की आवाज़ में है। आज हम आपको परवीन जी की आवाज़ में राग भैरवी के स्वरों में पिरोया वही गीत सुनवाते हैं। बेगम परवीन सुल्ताना का नाम देश की शीर्षस्थ गायिकाओं में शामिल है। उनका जन्म नौगाँव, असम में 10 जुलाई 1950 को एक संगीतप्रेमी परिवार में हुआ था। बचपन में ही उन्हें संगीत की शिक्षा अपने दादा मोहम्मद नजीब खाँ से मिली। बाद में बंगाल के जाने-माने संगीतज्ञ पण्डित चिन्मय लाहिड़ी से विधिवत प्रशिक्षण प्राप्त किया। पटियाला घराने की परम्परागत गायकी का मार्गदर्शन उन्हें उस्ताद दिलशाद खाँ ने प्रदान किया। बाद में उस्ताद दिलशाद खाँ से ही उनका विवाह हुआ। दोनों का पहला सार्वजनिक जुगलबन्दी गायन का प्रदर्शन अफगानिस्तान के जाशीन समारोह में हुआ था। परवीन जी का पहला एकल गायन का प्रदर्शन 1962 में मात्र 12 वर्ष की आयु में हुआ था और 1965 से ही उनके संगीत की रिकार्डिंग होने लगी थी। भारत सरकार ने उन्हें 1976 में ‘पद्मश्री’ सम्मान और इसी वर्ष यानी 2014 में ‘पद्मभूषण’ सम्मान प्रदान किया है। इसके अलावा 1986 में देश के प्रतिष्ठित ‘तानसेन पुरस्कार’ और 1999 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार’ से भी अलंकृत किया जा चुका है। परवीन सुल्ताना जी ने खयाल, ठुमरी, भजन के साथ ही कुछ फिल्मों में भी गीत गाये हैं। फिल्म ‘कुदरत’ के अलावा ‘दो बूँद पानी’, ‘पाकीजा’ और ‘गदर’ जैसी फिल्मों के गीत गाये हैं। आज की ‘स्वरगोष्ठी’ में फिल्म कुदरत का जो गीत हम प्रस्तुत कर रहे हैं, उसके बोल हैं- ‘हमें तुमसे प्यार कितना ये हम नहीं जानते...’। जैसा कि हमने पूर्व में उल्लेख किया है, इस गीत का एक और संस्करण पार्श्वगायक किशोर कुमार की आवाज में है। उस वर्ष के फिल्मफेयर पुरस्कार के लिए गीत के दोनों संस्करण नामित हुए थे, किन्तु पुरस्कार मिला, महिला वर्ग में परवीन जी के गाये इसी गीत को। इसके अलावा फिल्म के लेखक और निर्देशक सुप्रसिद्ध फ़िल्मकार चेतन आनन्द को सर्वश्रेष्ठ लेखन का फिल्मफेयर पुरस्कार भी प्राप्त हुआ था। इस गीत के संगीतकार राहुलदेव बर्मन और गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी हैं। परदे पर यह गीत सुप्रसिद्ध अभिनेत्री अरुणा ईरानी पर फिल्माया गया है। लीजिए, आप यह गीत सुनिए।


राग भैरवी : ‘हमें तुमसे प्यार कितना...’ : फिल्म – कुदरत : विदुषी परवीन सुल्ताना




अभी आपने जो गीत सुना, उसमें राग भैरवी के स्वर लगे हैं। स्वरों के माध्यम से प्रत्येक रस का सृजन करने में राग भैरवी सर्वाधिक उपयुक्त राग है। संगीतज्ञ इसे सदा सुहागिन राग तथा सदाबहार राग के विशेषण से अलंकृत करते हैं। सम्पूर्ण जाति का यह राग भैरवी थाट का ही आश्रय राग माना जाता है।

कोमल सबही सुर भले, मध्यम वादी बखान,
षडज जहाँ संवादी है, ताहि भैरवी जान।

राग भैरवी में ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद सभी कोमल स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। राग भैरवी के आरोह स्वर हैं, सा, रे॒ (कोमल), ग॒ (कोमल), म, प, ध॒ (कोमल), नि॒ (कोमल), सां तथा अवरोह के स्वर, सां, नि॒ (कोमल), ध॒ (कोमल), प, म (कोमल), रे॒ (कोमल), सा होते हैं। यूँ तो इस राग के गायन-वादन का समय प्रातःकाल, सन्धिप्रकाश बेला में है, किन्तु आम तौर पर इसका गायन-वादन किसी संगीत-सभा अथवा समारोह के अन्त में किये जाने की परम्परा बन गई है। ‘भारतीय संगीत के विविध रागों का मानव जीवन पर प्रभाव’ विषय पर अध्ययन और शोध कर रहे लखनऊ के जाने-माने मयूर वीणा और इसराज वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र से जब मैंने राग भैरवी पर चर्चा की तो उन्होने स्पष्ट बताया कि भारतीय रागदारी संगीत से राग भैरवी को अलग करने की कल्पना ही नहीं की जा सकती। यदि ऐसा किया गया तो मानव जाति प्रातःकालीन ऊर्जा की प्राप्ति से वंचित हो जाएगा। राग भैरवी मानसिक शान्ति प्रदान करता है। इसकी अनुपस्थिति से मनुष्य डिप्रेशन, उलझन, तनाव जैसी असामान्य मनःस्थितियों का शिकार हो सकता है। प्रातःकाल सूर्योदय का परिवेश परमशान्ति का सूचक होता है। ऐसी स्थिति में भैरवी के कोमल स्वर- ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद, मस्तिष्क की संवेदना तंत्र को सहज ढंग से ग्राह्य होते है। कोमल स्वर मस्तिष्क में सकारात्मक हारमोन रसों का स्राव करते हैं। इससे मानव मानसिक और शारीरिक विसंगतियों से मुक्त रहता है। भैरवी के विभिन्न स्वरों के प्रभाव के विषय में श्री मिश्र ने बताया कि कोमल ऋषभ स्वर करुणा, दया और संवेदनशीलता का भाव सृजित करने में समर्थ है। कोमल गान्धार स्वर आशा का भाव, कोमल धैवत जागृति भाव और कोमल निषाद स्फूर्ति का सृजन करने में सक्षम होता है। भैरवी का शुद्ध मध्यम इन सभी भावों को गाम्भीर्य प्रदान करता है। धैवत की जागृति को पंचम स्वर सबल बनाता है। इस राग के गायन-वादन का सर्वाधिक उपयुक्त समय प्रातःकाल होता है। भैरवी के स्वरों की सार्थक अनुभूति कराने के लिए अब हम प्रस्तुत कर रहे हैं, वायलिन पर इस राग का भावपूर्ण वादन। विश्वविख्यात वायलिन-साधिका विदुषी एन. राजम् प्रस्तुत कर रही हैं, गायकी अंग में एक भावपूर्ण दादरा। आप इस दादरा के माध्यम से भैरवी के रस का अनुभव कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग भैरवी : वायलिन पर गायकी अंग में परम्परागत दादरा : विदुषी एन. राजम्





आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 200वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको दो महान कलासाधकों की वाद्य संगीत जुगलबन्दी का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के अंक की समाप्ति तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा तथा वर्ष 2014 में सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाले प्रतिभागी को वार्षिक विजेता घोषित किया जाएगा।



1 – संगीत का यह अंश सुन कर बताइए कि आपको किस राग की अनुभूति हो रही है?

2 – इस जुगलबन्दी में कौन से स्वरवाद्यों का प्रयोग हुआ है? वाद्यों के नाम बताइए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार 3 जनवरी, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। इस श्रृंखला और पहेली के वार्षिक विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 202वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ की 198वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको 1985 में प्रदर्शित फिल्म ‘सुर संगम’ के लिए पण्डित राजन मिश्र और एस. जानकी के स्वरों में एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग भटियार और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल अद्धा तीनताल अथवा सितारखानी अथवा पंजाबी ठेका। पहेली के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी, जबलपुर से क्षिति तिवारी और पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी लघु श्रृंखला ‘शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मों गीत’ की यह समापन कड़ी थी। ‘स्वरगोष्ठी’ का अगला अंक नये वर्ष 2015 के पहले रविवार को प्रस्तुत किया जाएगा। इस अंक में हम आपको परिवेश के अनुकूल संगीत का रसास्वादन कराएँगे। आगामी श्रृंखलाओं के बारे में आपके सुझाव सादर आमंत्रित हैं। नए वर्ष से ‘स्वरगोष्ठी’ स्तम्भ के अन्तर्गत आप क्या पढ़ना और सुनना चाहते हैं, हमे आविलम्ब लिखें। अपनी पसन्द के विषय और गीत-संगीत की फरमाइश अथवा अगली श्रृंखलाओं के लिए आप किसी नए विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  








Saturday, December 6, 2014

"अंगना आयेंगे साँवरिया..." - देवेन वर्मा को श्रद्धांजलि, उन्हीं के गाये इस गीत के माध्यम से



एक गीत सौ कहानियाँ - 47
 

देवेन वर्मा की आवाज़ में सुनिए- ‘अँगना आयेंगे साँवरिया...





'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 47-वीं कड़ी में आज श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं अभिनेता देवेन वर्मा को उन्हीं के गाए 'दूसरा आदमी' फ़िल्म के गीत "अंगना आयेंगे साँवरिया..." के ज़रिए। 



देवेन वर्मा उन हास्य अभिनेताओं में से एक थे जिन्हें अपने दर्शकों को हँसाने के लिए लाउड कॉमेडी की ज़रूरत नहीं पड़ती थी। अपने सीधे-सरल अभिनय, ज़बरदस्त कॉमिक टाइमिंग और अभिव्यक्ति के माध्यम से देवेन वर्मा हर बार दर्शकों के दिलों में उतर जाते थे। हर किरदार को उन्होंने बख़ूबी निभाया, और नायक-नायिका और तमाम बड़े स्टार्स के होने के बावजूद अपनी हर फ़िल्म में वो भीड़ में से अलग नज़र आए। उनके अभिनय का लोहा हर कोई मानता था। 70 और 80 के दशक में देवेन वर्मा मध्यवित्त पृष्ठभूमि पर बनने वाली फ़िल्मों में नियमित रूप से नज़र आए; फिर वह ॠषीकेश मुखर्जी की 'गोलमाल' और 'रंग बिरंगी' हो या फिर बासु चटर्जी की 'खट्टा-मीठा' हो या 'प्रियतमा' या फिर 'दिल्लगी'। इन समस्त फ़िल्मों में देवेन वर्मा ने अपने स्तरीय हास्य अभिनय क्षमता का प्रदर्शन कराते हुए दर्शकों के दिलों में घर कर गए। देवेन वर्मा सिर्फ़ अभिनय तक ही सीमित नहीं रहे, उन्होंने फ़िल्मों का निर्माण भी किया और कुछ फ़िल्मों का निर्देशन भी। लेकिन उनकी जिस प्रतिभा से आम जनता सबसे कम वाक़िफ़ हैं, वह है उनकी गायकी। देवेन वर्मा एक अच्छे गायक भी थे जिसका प्रमाण उन्होंने दो तीन फ़िल्मों के गीतों में आवाज़ देकर दिया। वैसे देखा जाए तो समय समय पर कई हास्य अभिनेताओं ने फ़िल्मों में गीत गाए हैं। आइ. एस. जौहर ने मोहम्मद रफ़ी के साथ 'शागिर्द' के "बड़े मियाँ दीवाने ऐसे न बनो..." गीत में "यही तो मालूम नहीं है" कहे थे। महमूद ने एक नहीं बल्कि कई कई गीत गाये हैं, उदाहरण के तौर पर फ़िल्म 'शाबाश डैडी' में उनका गाया एक एकल गीत था, 'पड़ोसन' में किशोर कुमार और मन्ना डे के साथ, 'एक बाप छह बेटे' में सुलक्षणा पंडित और विजेता पंडित के साथ, 'कुंवारा बाप' में एक बार फिर किशोर कुमार के साथ, और 'काश' में मोहम्मद अज़ीज़ और सोनाली मुखर्जी के साथ महमूद ने गीत गाये। एक बार फिर कल्याणजी-आनंदजी नें फ़िल्म 'वरदान' के किसी गीत में महमूद साहब की आवाज़ ली। अमरीश पुरी ने अल्का याज्ञ्निक के साथ 'आज का अर्जुन' में "माशूका माशूका" गीत में दो लाइनें गाये, शक्ति कपूर की आवाज़ सुनाई दी शैलेन्द्र सिंह के साथ फ़िल्म 'पसंद अपनी अपनी' के एक गीत में, जॉनी लीवर ने भी अपना रंग जमाया 'इश्क़' और 'इण्टरनैशनल खिलाड़ी' जैसी फ़िल्मों के गीतों में, तो अनुपम खेर साहब गाये उषा कृष्णदास के साथ 'एक अलग मौसम' फ़िल्म का गीत और यश चोपड़ा की पत्नी व गायिका पामेला चोपड़ा के साथ 'विजय' फ़िल्म का एक गीत।

पामेला चोपड़ा ने पहली बार 1977 की यश चोपड़ा की फ़िल्म 'दूसरा आदमी' में देवेन वर्मा के साथ मिल कर एक गीत गाया था जिसके बोल थे "माथे पे लगाइके बिंदिया, अँखियन उड़ाइके निंदिया, खड़ी रे निहारे गोरी, आयेंगे साँवरिया, अँगना आयेंगे साँवरिया..."। इस फ़िल्म के सभी गीत बेहद लोकप्रिय हुए। अधिकांश गीत किशोर कुमार और लता मंगेशकर की युगल आवाज़ों में थे जैसे कि "नैनों में काजल है", "आओ मनायें जश्न-ए-मोहब्बत जाम उठायें जाम के बाद", "नज़रों से कहदो प्यार में मिलने का मौसम आ गया", और "क्या मौसम है" (रफ़ी के साथ)। किशोर कुमार और पामेला चोपड़ा का गाया "जान मेरी रूठ गई" भी हिट रहा। पर देवेन वर्मा और पामेला चोपड़ा के गाए "अंगना आयेंगे साँवरिया" गीत की बात ही कुछ और है। देवेन वर्मा के चाहने वालों को अचम्भित कर दिया था यह गीत क्योंकि यह कोई साधारण गीत नहीं था, बहुत ऊँची पट्टी पर गाया हुआ भोजपुरी लोक-शैली का यह गीत है जिसे हर कोई नहीं गा सकता। फ़िल्म में सिचुएशन कुछ ऐसी है कि नायिका (नीतू सिंह) अपने मामा जी (देवेन वर्मा) के घर एक जन्मदिन की पार्टी में गईं हुईं है और उनके पति (ॠषी कपूर) को दफ़्तर से सीधे वहीं पार्टी में आना है। अन्य सभी निमंत्रित आ चुके हैं, पार्टी शुरू हो चुकी है। लेकिन ऋषी कपूर आने में देर कर रहे हैं और नीतू सिंह उदास हो रही है और बार बार दरवाज़े की तरफ़ देख रही है। ऐसे में देवेन वर्मा साहब हारमोनियम और पूरी संगीतमय टोली के साथ ज़मीन पर बैठे गीत छेड़ते हैं "माथे पे लगाइके बिंदिया..."। यह सांकेतिक गीत है जो नीतू सिंह के उस समय के दिल का हाल बयान कर रहे हैं।

कहा जाता है कि इस गीत को शुरू-शुरू में किशोर कुमार और पामेला चोपड़ा से ही गवाने का ख़याल आया था, पर म्युज़िक सिटिंग के दौरान यूँ ही एक दिन देवेन वर्मा इस गीत को गा उठे। संगीत की अच्छी समझ रखने वाले यश चोपड़ा को यह निर्णय लेने में ज़रा सी भी देर नहीं लगी कि इस गीत के लिए देवेन वर्मा की आवाज़ और गायकी का अंदाज़ ही सर्वोत्तम रहेगा। इस तरह से यह गीत आ गया देवेन वर्मा की झोली में। राजेश रोशन ने देवेन वर्मा को कुछ टिप्स दिये और इस तरह से रेकॉर्ड हो गया यह गीत। इसी साल 1977 में देवेन वर्मा अभिनीत फ़िल्म 'आदमी सड़क का' में भी उन्हें दो गीत गाने के अवसर मिले - "आज मेरे यार की शादी है" और अनुराधा के साथ "बुरा ना मानो दोस्ती यारी में"। 1981 की फ़िल्म 'जोश' में अमजद ख़ान के साथ गाया हुआ उनका "खाट पे खटमल चलेगा जब दिन में सूरज ढलेगा" गीत वैसे ज़्यादा सुनने को नहीं मिला। आश्चर्य की बात है कि देवेन वर्मा अभिनीत सर्वाधिक चर्चित फ़िल्म 'अंगूर' में गायक सपन चक्रवर्ती ने सी. एच. आत्मा का मशहूर गीत "प्रीतम आन मिलो" को गाया था जो देवेन वर्मा पर फ़िल्माया गया था। सपन चक्रवर्ती की आवाज़ देवेन वर्मा पर इतनी फ़िट बैठी और देवेन वर्मा ने भी उसे इतना अच्छा निभाया कि लोगों को लगा कि इसे देवेन वर्मा ने ख़ुद ही गाया है। देवेन वर्मा आज हमारे बीच नहीं हैं पर उनका अभिनय हमारे पास सुरक्षित है, जब भी हम उदास होंगे, उनकी फ़िल्में हमें गुदगुदा जायेंगी, हँसा जायेंगी, उदासी के बादल को उड़ा जायेंगी। 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' की ओर से देवेन वर्मा की पुण्य स्मृति को विनम्र नमन। सुनते हैं फ़िल्म 'दूसरा आदमी' का यह गीत।

फिल्म - दूसरा आदमी : ‘अँगना आयेंगे साँवरिया...’ : स्वर - देवेन वर्मा और पामेला चोपड़ा : संगीत - राजेश रोशन : गीत - मजरूह सुल्तानपुरी 




अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तम्भ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर।


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 

Saturday, November 15, 2014

"हमको हँसते देख ज़माना जलता है..." - जानिये कैसे एक दूसरे की मदद की थी रफ़ी और दुर्रानी ने


एक गीत सौ कहानियाँ - 45
 

हमको हँसते देख ज़माना जलता है...



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ- 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 45वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म 'हम सब चोर हैं' के गीत "हमको हँसते देख ज़माना जलता है..." के बारे में जिसे मोहम्मद रफी और जी. एम. दुर्रानी ने गाया था।



जी. एम. दुर्रानी
र कलाकार का अपना एक वक़्त होता है जब उसकी चमक, उसका तेज सूरज की तरह होता है, और फिर एक ऐसा समय आता है जब यह चमक धीरे धीरे कम होने लगती है, उस कलाकार का वक़्त पूरा हुआ चाहता है। कुछ कलाकारों का यह वक़्त लम्बा होता है, और कुछ कलाकारों का छोटा। गायक जी. एम. दुर्रानी के गाये हुए गीतों की कामयाबी का दौर केवल 6-7 साल चला, यानी 1943 से 1951 तक। और फिर न जाने क्या हुआ कि फ़िल्मी दुनिया उनसे दूर होती चली गई। मोहम्मद रफ़ी, जो दुर्रानी साहब के नक्श-ए-क़दम पर, उन्हीं की आवाज़ का अनुकरण कर पार्श्वगायन की दुनिया में उतरे थे, वो कामयाबी की ऊँचाइयाँ चढ़ते चले गये, जबकि मूल आवाज़ का मालिक जी. एम. दुर्रानी ढलान पर उतरते चले गये। जी. एम. दुर्रानी के अपने शब्दों में - "मैं जब टॉप पर था, शोहरत की ऊँचाइयों पर था, मैंने गाना छोड़ दिया। मेरे गाना छोड़ने के दो ओजुहात हैं। सबसे पहली वजह तो यह है कि उपरवाले की मर्ज़ी। यानी जिसने आपको, मुझको, तमाम दुनिया वालों को पैदा किया है, उसके क़रीब पहुँचने के लिए मैंने गाना बजाना और यह फ़िल्म लाइन छोड़ दिया। बंगले में रहना, गाड़ियों में घूमना, नोटों को गिनना, उसके पीछे-पीछे भागना, यह बात सन् 1951 की है। मैने किसी फ़िल्मवाले को देख कर गर्दन नीची कर लिया करता था और सोचता था कि इससे बात करूँगा तो फ़िजूल बातें मुँह से निकलेंगी और दाढ़ी भी मैंने इसलिए बढ़ा ली थी कि कोई मुझे जल्दी पहचान ना सके।बस मेरे दिल में यह होता रहता कि गाना बजाना, फ़िल्म लाइन, ये सब बुरी बातें हैं। मैंने बैंक से थोड़े से कुछ पैसे निकाल कर लोगों में, ग़रीबों में बाँटने शुरु कर दिये और बे-नियाज़ हो गया। अंजाम यह हुआ कि मैं फ़क्कड़ हो गया। फिर साहब, किसी से मैंने थोड़े से क़र्ज़-वर्ज़ लेकर जनरल मर्चैन्ट की दुकान खोल ली।" और इस तरह से गुज़रे ज़माने का एक शानदार गायक और संगीतकार बन गया एक मामूली दुकानदार।

दुर्रानी और रफ़ी
आज जब रफ़ी और दुर्रानी के गाये युगल गीत की बात चली है तो यह बताना बेहद ज़रूरी है कि रफ़ी साहब के संघर्ष के दिनों में दुर्रानी साहब ने उनकी बड़ी मदद की थी। यह वह वक़्त था जब जी. एम. दुर्रानी और कुन्दनलाल सहगल जैसे कुछ ही गायक फ़िल्म जगत में डिमाण्ड में थे। ऐसी स्थिति में किसी नये गायक का इस उद्योग में क़दम जमाना और मशहूर बनना आसान काम नहीं था। ऐसे समय में मोहम्मद रफ़ी ने फ़िल्मी गायन के क्षेत्र में पाँव रखने का निर्णय लिया और अपने संघर्ष की शुरुआत कर दी। तब जी. एम. दुर्रानी साहब ही एक मसीहा बन कर उनके सामने आये और उन्हें काम दिलवाने में उनकी बहुत मदद की। दुर्रानी साहब अच्छे गायक व संगीतकार तो थे ही, लेकिन उससे भी ज़्यादा अच्छे और भले इंसान भी थे। और यही कारण था कि एक ही व्यावसाय में होते हुए भी काम ढूँढ रहे रफ़ी को वो संगीतकार श्यामसुन्दर के पास ले गये। उन्होंने इस बात का तनिक भी विचार नहीं किया कि अगर रफ़ी का सितारा चमक गया तो उन्हीं की पेट पर लात पड़ सकती है। और श्यामसुन्दर से वो रफ़ी की सिफ़ारिश कर दी, और फ़िल्म 'गाँव की गोरी' के एक गाने में कोरस में गाने का मौका दिलवा दिया। इस सिफ़ारिश और दुर्रानी साहब के मदद का ही नतीजा था कि रफ़ी साहब को थोड़ा-थोड़ा काम मिलने लगा। और फिर अपनी मेहनत, लगन, प्रतिभा और ईश्वर-प्रदत्त आवाज़ के बल पर मोहम्मद रफ़ी बन गये हिन्दी सिनेमा संगीत जगत के महागायक।

ओ. पी. नय्यर
जब रफ़ी का सितारा दिन-ब-दिन चढ़ता चला जा रहा था, तब दुर्भाग्यवश जी. एम. दुर्रानी साहब का करीयर धीरे-धीरे ढलान पर आ गया। काम कम हो गया, काम नहीं मिलने की वजह से आमदनी कम हो गई, और घर में धीरे-धीरे मुफ़लिसी आने लगी। उपर लिखे दुर्रानी के शब्दों से प्रतीत होता है कि उन्होंने ही फ़िल्म लाइन छोड़ दी, पर हक़ीक़त यही था कि उन्हें काम मिलना बन्द हो गया था। नई पीढ़ी के गायकों के आने से सहगल-दुर्रानी युग समाप्त हो चुका था। दुर्रानी साहब की माली हालत बद से बदतर हो गई। उनकी इस ग़रीबी का पता रफ़ी साहब को चला और उन्हें बड़ी तक़लीफ़ हुई। अपने आइडल गायक, जिनकी आवाज़ का अनुसरण कर वो गायन के इस क्षेत्र में उतरे थे, जिन्हें वो अपना गुरु मानते थे, उस इंसान को ग़रीबी से परेशान देख वो ख़ुद भी बेचैन हो उठे और उन पुराने दिनों को याद करते हुए दुर्रानी साहब को हरसम्भव मदद करने का फ़ैसला लिया। रफ़ी साहब नय्यर साहब के पास जा कर उन्होंने रीक्वेस्ट की कि वो 1956 में बनने वाली फ़िल्म 'हम सब चोर हैं' के गाने में रफ़ी साहब के साथ दुर्रानी साहब को भी गाना गवाये। नय्यर साहब ने बात मान ली और इस फ़िल्म में एक गाना ऐसा रखा गया जिसमें नायक और हास्य चरित्र, दोनों गाते हैं। इस सिचुएशन के लिए रफ़ी साहब के साथ दुर्रानी का गाया गीत रखा गया। यह गीत था "हमको हँसते देख ज़माना जलता है..."। इस गीत के अलावा भी कुछ और संगीतकारों से कह कर रफ़ी साहब ने दुर्रानी साहब को गाने दिलवाये। जहाँ तक मेरा ख़याल है रफ़ी और दुर्रानी ने साथ में पहला डुएट 1946 की फ़िल्म 'सस्सी पुन्नु' में गाया था, गोविन्दराम के संगीत निर्देशन में। 'हम सब चोर हैं' के अलावा ओ. पी. नय्यर ने रफ़ी और दुर्रानी को साथ में फ़िल्म 'मुसाफ़िरख़ाना' में भी गवाया था जिसके बोल थे "कुछ आँख मिली कुछ पैसा मिला..."। इसके करीब 10 साल बाद भी नय्यर साहब ने दुर्रानी को 1966 में फ़िल्म 'अक्लमन्द' के एक गीत में गाने का मौका दिया जिसमें महेन्द्र कपूर और भूपेन्द्र की आवाज़ें भी थीं और गीत के बोल थे "ओ बेख़बर तुझको क्या पता..."। संगीतकार नाशाद ने रफ़ी और दुर्रानी से एक डुएट गवाया था, 1959 की फ़िल्म 'ज़रा बच के' में जिसके बोल थे "ऐ इश्क़ इसे बरबाद ना कर..."। रफ़ी और दुर्रानी ने साथ में मिल कर कुछ 6 डुएट गाने और कुछ कोरस भी गाये। इस तरह आगे चलकर भी नेकदिली का रफ़ी साहब को जब भी मौका मिला तो उन्होंने इस मौके को नहीं गँवाया, और सारी ज़िन्दगी उन्हें जहाँ पर भी लगा, वो हमेशा दूसरों के काम आये। गुरु-शिष्य के सम्बन्ध का इससे बेहतर उदाहरण और क्या हो सकता है कि शुरु में गुरु ने शिष्य को स्थापित करने का हर सम्भव प्रयास किया, और जब शिष्य स्थापित हो गया और गुरु के बुरे दिन आये तो उसी शिष्य ने अपने गुरु की हर सम्भव सेवा की। गुरु जी. एम. दुर्रानी और शिष्य मोहम्मद रफ़ी को हमारा नमन। अब आप गुरु-शिष्य के अनूठे सम्बन्ध को रेखांकित करता हुआ यह गीत सुनिए।

फिल्म - हम सब चोर हैं : 'हमको हँसते देख ज़माना जलता है...' : जी. एम. दुर्रानी और मोहम्मद रफी : संगीत - ओ. पी. नैयर : गीत - मजरूह सुल्तानपुरी



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खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 

Saturday, September 6, 2014

"तुम जियो हज़ारों साल...", आशा जी के जन्मदिन पर यही कह कर उन्हें शुभकामनाएँ देते हैं


एक गीत सौ कहानियाँ - 40
 

‘तुम जियो हज़ारों साल...





'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्युटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 40वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म 'सुजाता' के गीत "तुम जियो हज़ारों साल..." के बारे में। 

फ़िल्म-संगीत की एक ख़ास बात यह रही है कि इसमें मानव जीवन के हर रंग को, हर मूड को, हर त्योहार-पर्व को, और रोज़-मर्रा के जीवन के हर पहलू को दर्शाने वाले गीत मौजूद हैं। ये गीत हमारे पारिवारिक, सामाजिक, और धार्मिक जीवन से इस तरह से जुड़े हुए हैं कि अगर इन गीतों को हमारे जीवन से निकाल दिया जाये तो ये पर्व, ये त्योहार बड़े ही बदरंग, बड़े ही सूने से लगने लगेंगे। जन्मदिन पर बजाये या गाये जाने वाले गीत भी बहुत सारे बने हैं समय-समय पर। लेकिन जिन दो गीतों की गिनती सबसे पहले होती रही है, वो हैं फ़िल्म 'फ़र्ज़' का "बार-बार दिन यह आये, बार-बार दिन यह गाये" और दूसरा गीत है फ़िल्म 'सुजाता' का "तुम जियो हज़ारों साल, साल के दिन हों पचास हज़ार"। ये गीत फ़िल्मी गीत होते हुए भी फ़िल्म की कहानी के बाहर भी उतने ही सार्थक हैं। दूसरे शब्दों में यूँ कह सकते हैं कि ये यूनिवर्सल गीत हैं जो हर दौर में, हर समाज में, हर उम्र में समान अर्थ रखते हैं। 'सुजाता' को हिन्दी सिनेमा का एक माइलस्टोन फ़िल्म कहा जा सकता सकता है। इसमें बिमल राय ने नायक सुनील दत्त के एक निम्न जाति की लड़की सुजाता (नूतन द्वारा अभिनीत) से प्यार को दिखाया गया है। 'सुजाता' नाम का चुनाव भी बड़े सोच-समझ कर रखा गया था क्योंकि 'सुजाता' शब्द का अर्थ है 'अच्छी जाति का'। इस फ़िल्म में नूतन के जानदार और दिल को छू लेनेवाले अभिनय ने उन्हें जितवाया उस वर्ष की सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार। गीत-संगीत की बात करें तो सचिनदेव बर्मन के सुरीले संगीत और मजरूह सुल्तानपुरी के अर्थपूर्ण बोलों ने इस फ़िल्म के गीतों को अमर बना दिया है। "जलते हैं जिसके लिए मेरी आँखों के दीये" को न केवल तलत महमूद के सर्वोत्तम गीतों में माना जाता है, बल्कि रोमांटिक गीतों की श्रेणी में भी बहुत ऊपर स्थान दिया जाता है। दादा बर्मन की आवाज़ में "सुन मेरे बन्धु रे" हमें बंगाल के भटियाली जगत में ले जाता है तो रफ़ी साहब का गाया "वाह भई वाह" हमें गुदगुदा जाता है। गीता दत्त और आशा भोसले की आवाज़ों में "बचपन के दिन भी क्या दिन थे", गीता जी की एकल आवाज़ में "नन्ही कली सोने चली हवा धीरे आना", तथा आशा जी की एकल आवाज़ में "काली घटा छाये मोरा जिया तड़पाये" को सुनना जैसे एक स्वर्गिक अनुभूति है।

अगर आप यह सोच रहे हैं कि उपर इस फ़िल्म के गीतों और गायक कलाकारों का उल्लेख करते हुए "तुम जियो हज़ारों साल" का उल्लेख क्यों नहीं किया गया, तो उसके पीछे एक कारण है। और वह कारण यह कि एक लम्बे समय तक इस बात पर संशय बना रहा कि आख़िर इस गीत को गाया किसने है - गीता दत्त या फिर आशा भोसले। और यही है इस गीत से जुड़ा हुआ सबसे मज़ेदार किस्सा। हुआ यूँ कि सचिनदेव बर्मन ने शुरू शुरू में इस फ़िल्म के चार फ़ीमेल सोलो गीतों में से दो गीत गीता दत्त के लिए और दो गीत आशा भोसले के लिए विभाजित कर रखे थे। (लता मंगेशकर से हुए मन-मुटाव के कारण उन दिनों लता और उनका आपस में काम बन्द था)। "तुम जियो हज़ारों साल" गीत को दादा ने गीता दत्त की झोली में डाल रखा था और उनकी ही आवाज़ में इसे रेकॉर्ड भी कर लिया। गाना बहुत अच्छा बना, गीता दत्त ने भी बहुत ख़ूब गाया, दादा बर्मन को किसी भी शिकायत का मौका नहीं दिया। पर बर्मन दादा को पता नहीं क्यों इस गीत में कुछ कमी सी महसूस होने लगी। सब कुछ ठीक-ठाक होने के बावजूद उन्हें ऐसा लग रहा था कि कुछ तो कमी है इस गीत में। जब कुछ समझ नहीं आया तो उन्होंने यह निर्णय लिया कि वो इस गीत को दोबारा आशा भोसले की आवाज़ में रेकॉर्ड करेंगे। इस बात का पता न गीता जी को चला और ना ही आशा जी को यह किसी ने बताया कि गीता जी यह गीत रेकॉर्ड करवा चुकी हैं। नतीजा, आशा जी की आवाज़ में भी यह गीत रेकॉर्ड हो गया। और इस बार सचिन दा को गीत पसन्द आ गया और उन्होंने इसे ही फ़िल्म में और साउण्डट्रैक में रखने का फ़ैसला किया। और इसी फेर-बदल के चलते 'बिमल राय प्रोडक्शन्स' ने गलती से आशा जी के गाये इस गीत के लिए गीता जी का नाम डाल कर HMV को भेज दिया। इस तरह से ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड के कवर पर गीता दत्त का नाम प्रकाशित हो गया। अब आशा जी और गीता जी की आवाज़ों में और अंदाज़ में थोड़ी-बहुत समानता तो थी ही, जिस वजह से जनता तो क्या फ़िल्म-संगीत के बड़े से बड़े समीक्षक भी धोखा खा गए। सालों तक इस गीत के रेकॉर्ड पर गीता जी का नाम छपता चला गया। यहाँ तक कि गीता दत्त के देहान्त के बाद जब HMV ने उन पर एक LP जारी किया 'In Memorium Geeta Dutt' के शीर्षक से, उसमें आशा भोसले के गाये इस गीत को शामिल कर दिया गया। यह अपने आप में बहुत बड़ी गड़बड़ी थी। राहुलदेव बर्मन, जो इस गीत के निर्माण के समय अपने पिता के सहायक के रूप में कार्य कर रहे थे, ने यह कन्फ़र्म किया कि गीता जी के गाये गीत को उनके पिता ने दोबारा आशा जी से गवाया। HMV ने इस ग़लती का इल्ज़ाम अपने सर लेने से यह कहते हुए मना कर दिया कि उन्होंने वही छापा है जो उन्हें 'बिमल राय प्रोडक्शन्स' के तरफ़ से मिला था। लेकिन यह वाक़ई आश्चर्य में डालने वाली बात है कि बिमल राय, सचिन देव बर्मन, आशा भोसले और गीता दत्त में से किसी ने भी कभी इस बात का उल्लेख कभी नहीं किया! इस गीत के बनने के 27 साल बाद, 1986 में आशा भोसले ने यह स्वीकारा कि उन्होंने इस गीत को गाया था, पर उन्हें इस बात का पता ही नहीं चला कि रेकॉर्ड पर गीता दत्त का नाम दिया गया है क्योंकि न तो वो कभी रेडियो सुनती थी और न ही अपने गाये हुए गीतों को। गीत एक बार रेकॉर्ड हो गया तो वो अगले दिन से अगले गीत के पीछे लग जाती। आशा जी के इस खुलासे के बाद HMV ने इस ग़लती को सुधारा और आशा भोसले के गाये गीतों के अगले कलेक्शन में इस गीत को शामिल करवा दिया, तथा गीता जी के कलेक्शन से हटा दिया। आशा जी ने बड़प्पन का परिचय देते हुए और इस विवाद को ख़त्म करते हुए अन्त में कहा - "अगर इस गीत के लिए गीता जी को क्रेडिट दिया भी गया है, तो इससे न उनके नाम को कोई फ़र्क पड़ता है और न ही मेरे नाम को। यह बहुत ही छोटी सी बात है। और मैं उनकी बहुत इज़्ज़त करती हूँ।"
और अब आप यही गीत सुनिए-

फिल्म - सुजाता : 'तुम जियो हजारों साल, साल के दिन हों पचास हजार...' : आशा भोसले : संगीत - सचिनदेव बर्मन : गीत - मजरूह सुल्तानपुरी 




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खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

Saturday, August 9, 2014

स्वतंत्रता दिवस के इस सप्ताह में पढ़िये कुछ गीतकारों के संदेश हमारे फ़ौजी जवानों के नाम



स्मृतियों के स्वर - 07

स्वतंत्रता दिवस सप्ताह में विशेष

'उन सरहदों की बात कभी नहीं करता जो दिलों में पैदा हो जाती हैं...'




'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, एक ज़माना था जब घर बैठे प्राप्त होने वाले मनोरंजन का एकमात्र साधन रेडियो हुआ करता था। गीत-संगीत सुनने के साथ-साथ बहुत से कार्यक्रम ऐसे हुआ करते थे जिनमें कलाकारों के साक्षात्कार प्रस्तुत किये जाते थे और जिनके ज़रिये फ़िल्म और संगीत जगत के इन हस्तियों की ज़िन्दगी से जुड़ी बहुत सी बातें जानने को मिलती थी। गुज़रे ज़माने के इन अमर फ़नकारों की आवाज़ें आज केवल आकाशवाणी और दूरदर्शन के संग्रहालय में ही सुरक्षित हैं। मैं ख़ुशक़िस्मत हूँ कि शौकिया तौर पर मैंने पिछले बीस वर्षों में बहुत से ऐसे कार्यक्रमों को लिपिबद्ध कर अपने पास एक ख़ज़ाने के रूप में समेट रखा है। 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' पर, महीने के हर दूसरे और चौथे शनिवार को इसी ख़ज़ाने में से मैं निकाल लाता हूँ कुछ अनमोल मोतियाँ, हमारे इस स्तम्भ में, जिसका शीर्षक है - स्मृतियों के स्वर, जिसमें हम और आप साथ मिल कर गुज़रते हैं स्मृतियों के इन हसीन गलियारों से। अगस्त महीने का यह सप्ताह हमारे लिये बहुत मायने रखता है क्योंकि इस सप्ताह में है भारत का स्वतंत्रता दिवस। इसलिए आज के 'स्मृतियों के स्वर' में पढ़िये कुछ सन्देश हमारे फ़िल्मी गीतकारों की ओर से देश के वीर जवानों के नाम जो तैनात हैं सरहदों पर, दूर-दराज़ के इलाकों में।



सूत्र : विविध भारती

कार्य्रक्रम : 'विशेष जयमाला' के अलग-अलग कार्यक्रमों से संकलित




पण्डित नरेन्द्र शर्मा

भारतीय गणतन्त्र के वीर रक्षक, प्रहरी, अपने सैनिकों को सादर नमस्कार! आप के मनोरंजन के लिए 'जयमाला' में गूँथे हुए कुछ गीत-पुष्प आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ। मैं एक कवि, वीर सैनिकों से अपने आप को सम्बोधित कर रहा हूँ, और यह बोध प्राप्त कर रहा हूँ मन ही मन कि हम सब चाहे कवि हों, चाहे श्रमिक हों, चाहे कृषक हों, चाहे मनीषी हों, चाहे शिल्पी हों, हम सब एक हैं, हमारा देश एक है, इस देश का संविधान एक है। और हम सब पर इस बात की ज़िम्मेदारी है कि हम सब की एक निधि है, उसके हम अच्छे प्रतिनिधि बन सके। तो आपसे हम प्रेरणा ग्रहण करते हैं इस निधि के अच्छे प्रतिनिधि बनने के लिए। तो आपको सब से पहले जो गीत सुनवाना चाहता हूँ, उस गीत में इस महान देश की प्रीति की रीति का वर्णन किया गया है।


फिल्म - पूरब और पश्चिम : 'है प्रीत जहाँ की रीत सदा...' : महेन्द्र कपूर : कल्याण जी, आनन्द जी : इन्दीवर 





जाँनिसार अख़्तर (1974)

फ़ौजी भाइयों, आप जो इस मुल्क और क़ौम के बाग़बाँ हैं, जो देश की सरहदों की हिफ़ाज़त और निगरानी करते हैं, हमारी माताओं, बहनों और बेटियों की इस्मत के मुहाफ़िज़ हैं, हमारे लिए दुश्मनों के हमलों का सामना करते हैं, एक कड़ी और आज़माइशी ज़िन्दगी बसर करते हैं, मैं यह चन्द गीत जो आपको सुनाने जा रहा हूँ, इस ग़रज़ से है कि ज़िहानी और रूहानी ख़ुशी से आपके चन्द लम्हे भर सके। ये गीत मुख़्तलिब फ़िल्मों से लिए गये हैं। हमारी फ़िल्म इंडस्ट्री अपनी कमज़ोरियों के बावजूद बड़ी अहम सड़क है, हम गीतनिगार दूसरों के जज़्बात की तर्जुमानी करते हैं। ये गीत फ़िल्म की ज़रूरत के लिहाज़ से लिखे जाते हैं, फिर भी ये मुख़्तलिब इंसान के जज़्बात का बयान होते हैं। मैं सबसे पहले जो गीत आपको सुना रहा हूँ यह मैंने एक फ़िल्म 'हमारी कहानी' के लिए कहा है, यह देश के मुतालिक है और आपके हमारे हौसलों की नुमाइन्दगी करता है, मौसिक़ी सी. अर्जुन की है। सुनिये यह गीत।



फिल्म - हमारी कहानी : 'देश हमारा एक है...' : मोहम्मद रफी और साथी : सी. अर्जुन : जाँनिसार अख्तर 





प्रेम धवन

मेरे फ़ौजी भाइयों, आप सब को मेरा नमस्कार! आज मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है इस प्रोग्राम में आपके लिए कुछ गीत पेश करते हुए। बहुत दूर से 'विविध भारती' के ज़रिये आप से मुलाक़ात हो रही है। आप लोग कैसी परिस्थितियों में रहते हैं, मैंने पर्सोनली नज़दीकी से देखा है जब हम लोग इंडो-पाक और इंडो-चाइनीज़ वार के समय आपकी सेवा में गये थे। इंडो-पाक वार के समय मैं सुनिल दत्त और नरगिस जी के साथ गया था। जब लदाख की राजधानी लेह पर पहुँचने के लिए हम मिलिटरी हेलिकॉप्टर पर बैठे तो देखा कि पिछले हिस्से में राशन की बोरियाँ और भेड़-बकरियाँ लदी हुई हैं। फिर भेड़-बकरियों को पैराशूट की मदद से उतारा जा रहा था। नरगिस जी के भाई अनवर हुसैन ने कहा कि शायद हमें भी भेड़-बकरियों की तरह पैराशूट में बांधकर उतार देंगे। जब हम लेह पहुँचे तो हमें यह बताया गया कि काफ़ी ऊँचाई पे होने की वजह से ऑक्सीज़न लेवल काफ़ी लो है, इसलिए हम जो भी करे आहिस्ता-आहिस्ता करे नहीं तो सर चकरा जायेगा। जब हमारा प्रोग्राम शुरू हुआ तो शहनाई वादक ने ऐसी तान उपर को लगाई कि तान उपर की उपर ही रह गई। हम लोगों ने ज़्यादातर छोटे-छोटे स्किट्स किए जो इन जवानों को सबसे ज़्यादा पसन्द आये। आइये अब एक गीत सुनते हैं फ़िल्म 'काबुलीवाला' से, "ऐ मेरे प्यारे वतन, तुझपे दिल क़ुर्बान..."।

फिल्म काबुलीवाला : 'ऐ मेरे प्यारे वतन तुझपे दिल कुर्बान...' : मन्ना डे : सलिल चौधरी : प्रेम धवन 





एम. जी. हशमत 

मेरे प्यारे फ़ौजी भाइयों, आप लोग उम्र में शायद मुझसे काफ़ी छोटे होंगे पर आप बहुत बड़ा काम कर रहे हैं, एक अज़ीम काम कर रहे हैं। अपने देश के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करना बड़ा काम नहीं तो फिर क्या है? वैसे देखा जाये तो हर आदमी एक फ़ौजी है। अपनी ज़िन्दगी की लड़ाई लड़ता रहता है आदमी। पर फ़ौजी भाइयों, आपकी लड़ाई को देख कर हम आपके सामने सर झुका कर आपको सलाम करते हैं। मैंने 'फ़ौजी' फ़िल्म में आप लोगों पर एक गीत लिखा था - "फ़ौजी रब का है दूसरा नाम", जो मैं समझता हूँ कि बिल्कुल सच बात है।

फिल्म फौजी : फौजी रब दा ऐ दूजा नाम...' : मोहम्मद रफी, मन्ना डे, मीनू पुरुषोत्तम और साथी : सोनिक - ओमी : एम.जी. हशमत  





गुलशन बावरा

 
फ़ौजी भाइयों, आपको गुल्शन बावरा का नमस्कार कुबूल हो। कहते हैं तलवार का और कलम का सदियों पुराना रिश्ता है। जब जब आप लोग मैदान-ए-जंग से जीत का झंडा लहराते हुए आते हैं, तब मेरे जैसे तुच्छ गीतकार के कलम से भी निकल आता है...




फिल्म उपकार : 'मेरे देश की धरती...' महेन्द्र कपूर और साथी : कल्याण जी, आनन्द जी : गुलशन बावरा 





कैफ़ी आज़मी (1988)


प्यारे फ़ौजी भाइयों, पूरे मुल्क की तरफ़ से मैं आपका शुक्रगुज़ार हूँ। आपका शुक्रिया इसलिए कि हम भारत में कोई भी त्योहार सिर्फ़ इसलिए मना सकते हैं और अपने घरों में सिर्फ़ इसलिए चादर तान के सो सकते हैं कि मुल्क की सरहदों पर आप जागते रहते हैं। हमारी आँखों में आप ही की नींदें हैं। इस ख़ुशी के मौके पर मैंने आप सब के लिए फ़िल्मी गीतों की एक 'जयमाला' गूँथी है, चाहता हूँ कि आप उसे कुबूल करें और हमारी मोहब्बत की निशानी समझ के उसको अपने गलों में डाल लें। मैं और मेरे हमकलम साथी फ़िल्मों के लिए गाने लिखते हैं, वो ऐसे सिपाही हैं जिनके हर हथियार छीन लिए जाते हैं, हाथ बाँध दिये जाते हैं, फिर उनको मैदान में उतारा जाता है। इन जकड़बन्दियों में अगर कभी कोई ऐसा गीत हो जाये जिसमें फेरियाँ भी हो और कोई पैग़ाम भी तो उसको दोहराते हुए किसी नग़मानिगार को शर्म आने की ज़रूरत नहीं। इस 'जयमाला' में पहला गीत मैंने ऐसा ही गूंथा है। बोल मेरे हैं, धुन एस. डी. बर्मन साहब की, और आवाज़ मन्ना डे की है। गीत सुनिये, "न तेल और न बाती, न काबू हवा पर, दीये क्यों जलाये चला जा रहा है..."।


फिल्म एक के बाद एक : 'न तेल और न बाती न काबू हवा पर दिये क्यों जलाए चला जा रहा है...' मन्ना डे : सचिनदेव बर्मन : कैफी आज़मी  





मजरूह सुल्तानपुरी (1985)

भाइयों, वैसे तो हम जानते हैं कि तोप के गोले से खेलना आप के लिए एक मामूली अमल है, आप तो जाँबाज़ वीर सिपाही हैं जिन्हे कोई ग़म छू ही नहीं सकता, लेकिन आप इंसान भी तो हैं, आप के दिल में भी जज्वे हैं, कभी कोई तो वक़्त आया होगा जब आप उदास होते होंगे, दुखी होते होंगे, तो यह उदासी बड़ा वक़्ती हो। मैंने और लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल ने और मरहूम रफ़ी ने मिल के काम की बात बतानी चाही है इस गीत में। अगर ऐसा कोई वक़्त हो तो इसे याद रखियेगा, इसमें काम की बातें हैं।

फिल्म दोस्ती : 'राही मनवा दुख की चिन्ता क्यों सताती है...' : मोहम्मद रफी : लक्ष्मीकान्त, प्यारेलाल : मजरूह सुल्तानपुरी





गुलज़ार

फ़ौजी भाइयों, आदाब! बहुत दिन बाद फिर आप की महफ़िल में शामिल हो रहा हूँ। इससे पहले जब भी आपके पास आया तो कोई ना कोई नई तरकीब लेकर, कोई न कोई नई आग़ाश लेकर गानो की, जिसमें मैंने कई तरह के गाने आप को सुनाये, जैसे रेल की पटरी पर चलते हुए गाने सुनाये थे एक बार, वो तमाम गाने जिनमें रेल की पटरी की आवाज़ भी सुनाई देती है। और एक बार आम आदमी के मसलों पर गाने आपको सुनाये जो लक्ष्मण के कार्टूनों जैसे लगते हैं। लेकिन मज़ाक के पीछे कहीं बहुत गहरे, बहुत संजीदे दर्द भरे हुए हैं इन गानो में। बच्चों के साथ गाये गाने भी आपको सुनाये, खेलते कूदते हुए गाने, लोरियाँ सुनाई आपको, और बहुत से दोस्तों की चिट्ठियाँ जब आयी, चाहनेवालों की चिट्ठियाँ आयी जिनमें शिकायतें भी, गिले भी, शिकवे भी, उनमें एक बात बहुत से दोस्तों ने कही कि हर बार आप कुछ मज़ाक करके, हँस-हँसाकर रेडियो से चले जाते हैं, जितनी बार आप आते हैं, हर बार हम आप से कुछ संजीदा बातें सुनना चाहते हैं, कि संजीदा सिचुएशनों पर आप कैसे लिखते हैं, क्या लिखते हैं, और हाँ, यह किसी ने नहीं कहा कि क्यों लिखते हैं? फ़ौजी भाइयों, आप तो वतन की सरहदों पर बैठे हैं, और मैं आपको बहलाते हुए आपके परिवारों को भी बहलाने की कोशिश करता रहता हूँ। हाँ, उन सरहदों की बात कभी नहीं करता जो दिलों में पैदा हो जाती हैं' कभी जुड़ती हुई, कभी टूटती हुई, कभी बनती हुई, गुम होती हुई सरहदें, या सिर्फ़ हदें। इस तरह के रिश्ते सभी के ज़िन्दगी से गुज़रते हैं, वो ज़िन्दगी जिसे एक सुबह एक मोड़ पर देखा था तो कहा था कि हाथ मिला ऐ ज़िन्दगी, आँख मिला कर बात कर।

फिल्म - हिप हिप हुर्रे : 'एक सुबह एक मोड पर...' : वनराज भाटिया : गुलजार 





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ज़रूरी सूचना:: उपर्युक्त लेख 'विविध भारती' के कार्यक्रम का अंश है। इसके सभी अधिकार 'विविध भारती' के पास सुरक्षित हैं। किसी भी व्यक्ति या संस्था द्वारा इस प्रस्तुति का इस्तेमाल व्यावसायिक रूप में करना कॉपीराइट कानून के ख़िलाफ़ होगा, जिसके लिए 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' ज़िम्मेदार नहीं होगा।



तो दोस्तों, आज बस इतना ही। आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आयी होगी। अगली बार ऐसे ही किसी स्मृतियों की गलियारों से आपको लिए चलेंगे उस स्वर्णिम युग में। तब तक के लिए अपने इस दोस्त, सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिये, नमस्कार! इस स्तम्भ के लिए आप अपने विचार और प्रतिक्रिया नीचे टिप्पणी में व्यक्त कर सकते हैं, हमें अत्यन्त ख़ुशी होगी।


प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी

प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 

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