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Saturday, October 14, 2017

चित्रकथा - 40: किशोर कुमार को याद करती हुईं फ़िल्म जगत की पाँच अभिनेत्री और गायिकाएँ

अंक - 40

किशोर कुमार को याद करती हुईं फ़िल्म जगत की पाँच अभिनेत्री और गायिकाएँ


"बेक़रार दिल तू गाएजा..." 



दोस्तों, एक ज़माना था जब घर बैठे प्राप्त होने वाले मनोरंजन का एकमात्र साधन रेडियो हुआ करता था। गीत-संगीत सुनने के साथ-साथ बहुत से कार्यक्रम ऐसे हुआ करते थे जिनमें कलाकारों से साक्षात्कार करवाये जाते थे और जिनके ज़रिये फ़िल्म और संगीत जगत की इन हस्तियों की ज़िन्दगी से जुड़ी बहुत सी बातें जानने को मिलती थी। गुज़रे ज़माने के इन अमर फ़नकारों की आवाज़ें आज केवल आकाशवाणी और दूरदर्शन के संग्रहालय में ही सुरक्षित हैं। मैं ख़ुशक़िस्मत हूँ कि शौकीया तौर पर मैंने पिछले बीस वर्षों में बहुत से ऐसे कार्यक्रमों को लिपिबद्ध कर अपने पास एक ख़ज़ाने के रूप में समेट रखा है। आज ’चित्रकथा’ के इस अंक में प्रस्तुत है हरफ़नमौला कलाकार किशोर कुमार के बारे में फ़िल्म जगत की कुछ अभिनेत्रियों व गायिकाओँ द्वारा कहे हुए शब्द और किशोर दा से जुड़ी उनकी स्मृतियाँ। कल 13 अक्तुबर को किशोर दा की पुण्यतिथि थी; अत: आज का यह अंख उन्ही को समर्पित करते हैं।



माला सिन्हा

"वो सबसे अच्छा कॉमेडियन, और एक बहुत अच्छे इंसान थे। मैंने उनके साथ दो हिन्दी फ़िल्मों में काम किया। एक था आइ. एस. जौहर का 'बेवकूफ़' और दूसरा एस. डी. नारंग का 'बम्बई का ठग'। सेट पे वो एक मिनट चुप नहीं बैठने का। जैसे कोई स्प्रिंग्‍ लगा हो! हर डिरेक्टर का नकल करना, एस. डी. नारंग कैसे बात करते हैं, के. एन. सिंह का इतना अच्छा नकल करते थे वो। टैप डान्स मैंने उन जैसा किसी को करते हुए नहीं देखा। किशोर दा असली जीनियस थे। He was a great actor, वो जो दादा गये, सो गये, उन जैसा अब कोई नहीं आ सकता, कोई आनेवाला नहीं। उनका गाना, गाना जैसे नहीं लगता, जैसे कि वो बात कर रहे हैं, very very expressive। मुझे गाने के रेकॉर्डिंग्‍स पर जाने का शौक था। जब भी मुझे पता चलता कि कहीं पे रेकॉर्डिंग्‍ चल रही है, मैं वहाँ पहुँच जाती थी। एक बार 'महबून स्टुडियोस' में किशोर दा के किसी गाने की रेकॉर्डिंग्‍ में मैं पहुँच गई। रेकॉर्डिंग्‍ से पहले कोई भी सिंगर कुछ चीज़ों से परहेज़ करते हैं, जैसे कि ठंडा पानी, इमली वगेरह। तो किशोर दा ने कहा कि मेरे लिए लेमन सोडा ले आओ, वह भी बरफ़ डाल कर। मैंने उनसे जाके पूछा, "दादा, आप रेकॉर्डिंग्‍ के समय ठंडा पीने की ज़िद कर रहे हैं, गला ख़राब नहीं हो जायेगा?" तो उन्होंने कहा कि अरे ये सब वहम है, जिसको उपरवाले का देन है, उसे कुछ नहीं होता। इतना ज़िंदा दिल इंसान मैंने कहीं और नहीं देखा।"



शशिकला

"'करोड़पति' हमारे घर की फ़िल्म थी। इसमें मैं थी, और हमारे किशोर कुमार थे। म्युज़िक था शंकर-जयकिशन का। लेकिन फ़िल्म बिल्कुल नहीं चली। गाने भी नहीं चले। शंकर-जयकिशन के होने के बावजूद नहीं चले। हम कहते थे कि 'करोड़पति' बनाते-बनाते हम कंगालपति बन गये। किशोर दा, उन दिनों में, मेरा ख़याल है सिर्फ़ तीन या चार आर्टिस्ट टॉप में थे - दिलीप कुमार, राज कपूर, देव आनन्द और किशोर कुमार। उनसे मिलना बहुत मुश्किल का काम था। टाइम देते थे, पर मिलते नहीं थे। टाइम देते थे, पर कभी नहीं आते थे। बिल्कुल शैतान बच्चे की तरह। आपको मैं उनका आख़िरी क़िस्सा सुनाती हूँ। फ़िल्म तो बन गई, फ़्लॉप भी हो गई, चली नहीं, ये सब हुआ, एक दिन मुझे फ़ोन आता है उनका कि शशि, तुम मुझे मिलने आओ। तो मैं गई अपने फ़्रेन्ड के साथ मिलने के लिए। तो बात कर रहे हैं, मुझे हार्ट-अटैक हो गया, ऐसा हुआ, वैसा हुआ, और अचानक मुझे आवाज़ आती है, 'टाइम अप, टाइम अप, टाइम अप'। मैं तो घबरा गई, मैंने कहा कि अरे यह आवाज़ कहाँ से आ रही है? हँसने लगे, हा हा हा, पता है मैं हार्ट का पेशण्ट हूँ न, इसलिए यहाँ पे एक रेकॉर्डिंग्‍ करके रखी है, पाँच मिनट से ज़्यादा किसी से बात नहीं करनी है। मैंने कहा कि किशोर दा, आपने मुझे डरा ही दिया बिल्कुल! और बहुत ईमोशनल थे मेरा ख़याल है, very emotional person। उनके तो कितने क़िस्से हैं, जितना सुनाये तो कम है, पर बहुत ही अच्छे, बहुत ही कमाल के आर्टिस्ट, जीनियस भी कहना चाहिए, देखिये गाने भी उन्होंने कितने अच्छे लिखे, म्युज़िक भी कितना अच्छा दिया, गाते तो अच्छा थे ही।"



लीना चन्दावरकर

"किशोर जी में जो एक बच्चा था, वह बच्चा उनके साथ ही रहता था, और वह आख़िर तक था। आशा जी को भी आप पूछिये कि किस तरह से वो... मैं शुरू शुरू में थोड़ा डर गई थी क्योंकि ये क्या करते हैं हरकतें न! और ऐसे डराते थे! मैंने उनके बारे में बहुत कुछ सुन रखा था, जब मैं फ़िल्मों में काम कर रही थी। कहीं न कहीं से उनका ज़िक्र आ ही जाता था। रवैल साहब, 'महबूब की मेहन्दी' के सेट पे, सब उनकी बातें कर रहे थे। किशोर जी के बारे में तो सबसे दिलचस्प टॉपिक होता था। तो 'शराफ़त' फ़िल्म में उन्होंने काम किया था रवैल साहब के साथ। राजकुमार जी, मीना जी। तो मैं वहाँ पे नयी थी तो सुनती थी इंटरेस्ट लेके कि क्या बातें हो रही हैं और ये सब सीनियर आर्टिस्ट्स हैं। तो बाद में (उनसे शादी होने के बाद) मुझे मालूम हुआ कि सब बढ़ा-चढ़ा कर बोलते थे। किशोर जी को मैंने ऐसा कभी नहीं देखा। बहुत ही बैलेन्स्ड इंसान थे, उनको थोड़ा सा था कि लोगों को दिखाये कि मैं पागलपन करता हूँ। उनको मज़ा आता था। दादामुनि थे न, अशोक कुमार जी, दादामुनि को वो कहते थे कि दादामुनि, तुम सयाने बन के फँस जाते हो, मैं पागल बन के बच जाता हूँ। क्योंकि एक दिन बर्थडे था उनका और उन्होंने किसी को इनवाइट नहीं किया था, और पता भी नहीं था कि खाना बनाना है कि क्या करना है! हम लोग गये थे, हमको तो पता था कि दादामुनि का बर्थडे है। भाभी ने हमारे लिए पूरी-तरकारी, उनको मालूम था कि इनकी क्या पसन्द है। बुलाने की क्या ज़रूरत है, सबको पता था कि दादामुनि का बर्थडे है तो करीबी लोग आने लगे। एक एक करके आने लगे और बैठ गये। किशोर जी भी बैठे हैं और एक दम, गाना भी गा रहे हैं। सुनाये जा रहे हैं, सबको मज़ा आ रहा है। तो खाने का वक़्त आ गया, डिनर। खाना भी बनाया था। लेकिन इतने लोग आ गये कि इतने लोगों का खाना है नहीं घर में। भाभी परेशान, बाद में कैसे भी करके मैनेज किया, होटल वगेरह से मँगवा के। हम इतने परेशान थे कि अभी ऑर्डर करेंगे, फिर दस लोग आ जायेंगे तो क्या होगा? क्योंकि रात हो चली थी। तो दादामुनि ने अन्दर आके मुझसे कहा कि अब क्या होगा, मैंने इतने लोगों को इनवाइट तो नहीं किया था, तेरी भाभी इतने लोगों का कैसे खाना बनायेगी? तो किशोर दा बड़ा मज़ा ले रहे थे। बोले कि तुम बड़े सयाने हो ना, इसलिये फँस जाते हो, मैं तो पागल हूँ, मैं बच जाता हूँ। दादामुनि ने कहा कि तू तो कंजूस है। तो किशोर जी ने कहा कि नहीं नहीं मैं कंजूस नहीं हूँ, लेकिन तुमको करना पड़ेगा, इस तरह से कोई उनको बोले तो अच्छा नहीं लगता था, कहते हैं न 'rules and regulations', उनको लगता था कि हर एक को आज़ादी मिलनी चाहिये। कोई ऐबनॉर्मल बीहेव नहीं करेंगे, लेकिन अगर कोई उनसे कहे तो ये करना पड़ेगा।"



सुलक्षणा पण्डित

जब सुलक्षणा पण्डित को एक साक्षात्कार में यह पूछा गया कि उन्होंने किशोर दा के साथ ’दूर का राही’ फ़िल्म में एक कालजयी गीत "बेक़रार दिल" गाया है, इसके बारे में वो कुछ बताएँ, तब सुलक्षणा जी ने कहा - "oh my God, उस गाने में किशोर दा ने मुझे बहुत चिढ़ाया था। उन्होंने कहा, "नहीं तुम बेक़रारे बोलोगी"; मैंने कहा, "मैं बेक़रार बोलूंगी।" उन्होंने फिर कहा कि नहीं तुम "बेक़रारे" कहोगी। तो मैं बोली कि नहीं, मैं "बेक़रार" ही बोलूंगी। तो ऐसे करते करते हम स्टुडियो पहुँचे - फ़िल्म सेन्टर। वहाँ पर रेखा भी थीं। योगिता बाली भी थीं, तो किशोर दा तो किशोर दा, बोले कि इस लड़की को हटाओ यहाँ से, नहीं तो परदा लगा दो, बहुत देखती है मुझे। तो ये सब करने के बाद इस तरह से "बेक़रार दिल" हमने साथ में गाया।" सुलक्षणा जी से जब आगे पूछा गया कि यह गाना कितनी देर में रेकॉर्ड हुआ था, तो उन्होंने बताया, "मैं आपको बताऊँ, "बेक़रार दिल" सिर्फ़ दो बार गाया गया था, तो किशोर दा की माँगें कि ये लगा दो, परदा लगा दो, लड़कियों को भगा दो, और मैं भी खड़ी हुई थी वहाँ पे, अब मैं कुछ बोलूंगी तो...पर काफ़ी जब ऐसा होने लगा तो मैंने बोला, "देखिए, आप इतना क्यों कर रहे हैं, हम लोग तो ऐसे नहीं"। "तेरे को मालूम चलेगा क्या है"। फिर मैंने गाना गाया उनके साथ, और किशोर कुमार तो धनी हैं हर चीज़ के, म्युज़िक डिरेक्टर वो हैं, ऐक्टर वो हैं, राइटर वो हैं, फ़िल्ममेकर वो हैं, क्या नहीं हैं वो, हर चीज़ से भरपूर, सराफ़ा एक आर्टिस्ट नज़र आता है उनमें। उमर में वो मेरे पंडित जसराज जी जैसे ही थे लेकिन अन्दर से बच्चे, और बातें करना अपने पत्तों से, अपने गार्डन से, रोज़ अपना घर बदलना, बिगाड़ना, कभी झोपड़ी बना देते थे, इतना सा, टाइम ज़रा भी नहीं लेते थे वो। मैंने उनके साथ हज़ारों स्टेज शोज़ भी किए हैं और इतना मज़ा भी आया, इतना कुछ सीखा भी है उनसे, बहुत कमाल के हैं, किशोर कुमार दोबारा पैदा नहीं हुआ।"



अलका यागनिक

13 अक्टुबर 1987 के दिन किशोर कुमार इस फ़ानी दुनिया को अलविदा कह गए थे। इसी दिन रेकॉर्ड हुआ था फ़िल्म ’बटवारा’ का गीत "तेरे वास्ते रे ढोला नैन म्हारे जागे रे जागे, तू म्हारो कोण लागे" जिसे अलका यागनिक, अनुराधा पौडवाल और कविता कृष्णमूर्ती ने गाया था। इस गीत की रेकॉर्डिंग् से जुड़ी एक दुखद याद के बारे में अलका यागनिक ने एक साक्षात्कार में बताया था। तीनों गायिकाएँ तैयार थीं, दवाब भी था उन पर क्योंकि तीनों में उन दिनों प्रतियोगिता थी। इसलिए इस दवाब में थीं कि कहीं मुझसे इस गीत में कोई ग़लती ना हो जाए! गीत रेकॉर्ड हो गया, तीनों गायिकाएँ काँच के कमरे से बाहर आ गईं। लक्ष्मी-प्यारे भी उनकी तरफ़ चले आ रहे थे कन्डक्टिंग् रूम की तरफ़ से, पर किसी के चेहरे पर कोई मुस्कुराहट नहीं थी जो आम तौर पर होता है अगर गीत अच्छा रेकॉर्ड हो जाए तो। लक्ष्मी-प्यारे के उतरे हुए चेहरे देख कर तीनों गायिकाएँ घबरा गईं यह सोच कर कि कहीं उनसे कोई ग़लती तो नहीं हो गई इस गीत में? पास आने पर अलका याज्ञनिक ने प्यारेलाल जी से पूछा कि क्या बात है? प्यारेलाल जी ने बताया, "किशोर दा नहीं रहे!" दिन था 13 अक्टुबर 1987। इसी दिन किशोर दा चले गए और इसी दिन रेकॉर्ड हुआ था ’बटवारा’ का यह गीत, हालाँकि फ़िल्म 1989 में रिलीज़ हुई थी।


आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!




शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Saturday, January 10, 2015

अभिनेत्री जयश्री टी. और माला सिन्हा की स्मृतियों में मोहम्मद रफ़ी, मुकेश और लता मंगेशकर


स्मृतियों के स्वर - 15

अभिनेत्री जयश्री टी. और माला सिन्हा की स्मृतियों में रफ़ी, मुकेश और लता 





'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! दोस्तों, एक ज़माना था जब घर बैठे प्राप्त होने वाले मनोरंजन का एकमात्र साधन रेडियो हुआ करता था। गीत-संगीत सुनने के साथ-साथ बहुत से कार्यक्रम ऐसे हुआ करते थे जिनमें कलाकारों से साक्षात्कार करवाये जाते थे और जिनके ज़रिये फ़िल्म और संगीत जगत के इन हस्तियों की ज़िन्दगी से जुड़ी बहुत सी बातें जानने को मिलती थी। गुज़रे ज़माने के इन अमर फ़नकारों की आवाज़ें आज केवल आकाशवाणी और दूरदर्शन के संग्रहालय में ही सुरक्षित हैं। मैं ख़ुशक़िस्मत हूँ कि शौकीया तौर पर मैंने पिछले बीस वर्षों में बहुत से ऐसे कार्यक्रमों को लिपिबद्ध कर अपने पास एक ख़ज़ाने के रूप में समेट रखा है। 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' पर, महीने के हर दूसरे और चौथे शनिवार को इसी ख़ज़ाने में से मैं निकाल लाता हूँ कुछ अनमोल मोतियाँ हमारे इस स्तंभ में, जिसका शीर्षक है - स्मृतियों के स्वर, जिसमें हम और आप साथ मिल कर गुज़रते हैं स्मृतियों के इन हसीन गलियारों से। आज की कड़ी में प्रस्तुत है अभिनेत्री जयश्री टी. और माला सिन्हा की स्मृतियाँ। बरसों बरस पहले जयश्री टी. ने मोहम्मद रफ़ी और मुकेश के साथ कई सारे स्टेज शोज़ किये हैं और इस तरह से इन दो गायकों को करीब से देखा और जाना है। जयश्री टी. बता रही हैं रफ़ी साहब और मुकेश जी के बारे में। इसी तरह माला जी बता रही हैं लता से उनकी मुलाक़ात के बारे में। 




सूत्र: 'उजाले उनकी यादों के', विविध भारती


जयश्री टी - मोहम्मद रफ़ी

"मैंने रफ़ी साहब के साथ बहुत शोज़ किये हैं। साउथ अफ़्रीका मैं गई थी उनके साथ, वहाँ पर हम लोगों ने बहुत सारे शोज़ किये। वहाँ जाने के लिए हमें बड़ी तकलीफ़ हुई, मतलब तकलीफ़ in the sense कि हमें काफ़ी वेट करना पड़ा। लेकिन वहाँ जाने के बाद जो प्यार मोहब्बत मिली है वहाँ के लोगों से यह आप इमाजिन नहीं कर सकते। जितनी पब्लिक अन्दर थी, वहाँ ऐसे टेण्ट जैसे लगे होते थे बड़े-बड़े, उसके अन्दर जितनी पब्लिक होती थी, उतनी ही पब्लिक बाहर होती थी। सूट-बूट पहने हुए लोग, कहते थे हमको टिकट दे दीजिये, हम कहीं भी नीचे बैठ जायेंगे, हमको शो देखना है। और जयश्री टी, मीना टी, मोहम्मद रफ़ी। उन दिनो मतलब इतने सारे शोज़, इतने सारे आर्टिस्ट्स नहीं आते थे। यानी कि हीरो-हीरोइन तो कोई आता ही नहीं था। लोग मुझसे कहते थे कि जयश्री, तुम स्टेज पे कैसे डान्स कर लेती हो, तुम तो फ़िल्मस्टार हो। मैंने कहा तो क्या हुआ? I was much ahead of time. वहाँ पर लोगों ने हमें बहुत रेस्पॉन्स दिया, वन्स मोर हमें मिलता था। और रफ़ी साहब was a great man, मैं रफ़ी साहब के बारे में एक बात कहना चाहूँगी कि जब हम स्टेज पे जाते थे, हम उनके पैर छूते थे, लेकिन वो जब स्टेज पे जाते थे तो मेरी माँ के पैर छूते थे और कहते थे माँ भगवान का रूप होती है। बहुत ही प्यारे, बहुत ही नेक इंसान थे। तो उनके साथ प्रोग्राम करने में बहुत मज़ा आया, और हम लोग वहाँ पे खाना खाते थे तो रफ़ी साहब कहते थे कि पहले सबको बुलाओ, एक साथ बैठ के खाना खायेंगे। बिल्कुल परिवार का माहौल था और हम घूमने भी जाते थे तो सबको साथ में लेके जाते थे। उनकी मिसेस, उनके जो ज़हीर साहब थे, और मेरी माँ थीं, मीना टी थीं, मेरी सिस्टर, तो हम लोग सब साथ में ही जाते थे।

रफ़ी साहब गाते हुए बीच में कभी-कभी हाथ को ऐसे उठा कर, जैसे ऐक्शन करते थे तो पब्लिक खिल जाती थी, तालियाँ मार कर सपोर्ट करती थी। तो कभी कभी ऐसा जेस्चर मार कर, ख़ुश हो जाती थी पब्लिक। रफ़ी साहब बातें बहुत कम करते थे। और आपस में जब हम बात करते थे तो बहुत सॉफ़्ट स्पोकेन एक दम, एक दम आहिस्ते से बात करते थे, कभी उनको ऊँची आवाज़ में आज तक सुना ही नहीं, किसी से भी नहीं। बहुत अच्छे से बात करते थे। रफ़ी साहब के साथ हम कई बार स्टेज पे गये, तो उनसे कहा जाता था कि दो शब्द कहिये। तो वो कहते थे कि मैं दो शब्द नहीं, दो लाइन गा के सुनाऊँगा। और वो हमेशा गा के सुनाते थे। कुछ कहते नहीं थे।"



जयश्री टी - मुकेश

"मुकेश जी के साथ मैंने बचपन में शोज़ किये हैं। जब मैं छोटी थी तो हम लोगों ने गुजरात के बहुत दौरे किये। तो हम क्या करते थे कि शो ख़तम हो जाने के बाद हम कार में बैठ के दूसरे गाँव जाते थे और वहाँ पे हम होटल में जाते थे। तो मुकेश जी हमेशा मुझसे और मेरी माँ से कहते थे कि आप लोग सो जाओ, मैं ड्राइवर से बात करता हूँ ताकि वो सोये नहीं ट्रैवलिंग में। और मुकेश जी was the first person who told me कि जयश्री, देखो तुम फ़िल्मों में आयी हो, तुम्हारा नाम हो गया है, तो सबसे पहले यह शो बिज़नेस है, यहाँ पे तुम जितना शो-ऑफ़ करोगी, उतना तुम्हारा मार्केट बढ़ेगा। यह उन्होंने मुझे सिखाया। और उन्होंने सबसे पहले मुझको बताया कि तुम घर लेने से पहले गाड़ी ले लो। एक बड़ी गाड़ी ले लो और इसलिए मैंने फ़ोर्ड की गाड़ी उस वक़्त ली थी। और एक बात बताना चाहूँगी, पता नहीं रफ़ी साहब और मुकेश जी के साथ, शायद मेरी माँ का, अगले जनम का, या मैं उनकी माँ रह चुकी हूँ पता नहीं, जब मुकेश जी फ़ॉरेन चले गये अमरीका शो के लिये तो जाने से पहले वहाँ हमारे घर आ के हमसे मिल के गये। और मेरी माँ से भी आशीर्वाद लेके गये। और वहाँ जाने के बाद वो गुज़र गये।"


माला सिन्हा - लता मंगेशकर

"लता जी, लता जी, लता जी से हम मिलने गये तो मैं उनको निहारती ही रही, निहारती ही गई। पर लता जी जो हैं, वो धरती पर हैं, धरती के उपर न उनका दिमाग़ है और न पैर। तो उनको देखा, खिलखिलाके हँसती हैं, बहने कहकर बातचीत करती हैं, हमने सब बातचीत की, मैंने कहा कि दीदी, मुझे आपकी आवाज़ बहुत अच्छी लगती है, आपने इतने गाने गाये, मेरे लिये भी गाये, मैं तो बचपन से आपका फ़ैन रह चुकी हूँ। मैं आपका गाना गा गा कर मुझे 'बेबी लता' का खिताब मिला हुआ था। तो उन्होंने कहा कि फिर गाना क्यों प्रैक्टिस करती? उन्होंने मुझे कहा, मुझे डाँटा कि अरे इतनी अच्छी आवाज़ है, उन्होंने सुना भी मुझे, गाके बता, प्रैक्टिस किया करो, उनके भाई भी, हृदयनाथ जी ने भी कहा, दोनो ने मुझे सुना है, फ़ंक्शन में, गाना गाते हुए, क्योंकि बाँग्ला में मैंने बहुत सारे फ़ंक्शन में गाने गाये हैं। कल्याणजी-आनन्दजी भाई के गाने गाये, "कंकरिया मार के जगाया", यह गाना मैंने, तो उन्होंने मेरी आवाज़ सुनी हुई है। तो बोली कि तू पागल है, रियाज़ किया कर। तो मैंने बोला कि दीदी, आपके होते हुए मैं क्यों गाऊँ? आप इतना अच्छा गाती हैं मेरे लिए, मेरी ऐक्टिंग ही ठीक है।"



कॉपीराइट: विविध भारती



तो दोस्तों, आज बस इतना ही। आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आयी होगी। अगली बार ऐसे ही किसी स्मृतियों की गलियारों से आपको लिए चलेंगे उस स्वर्णिम युग में। तब तक के लिए अपने इस दोस्त, सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिये, नमस्कार! इस स्तम्भ के लिए आप अपने विचार और प्रतिक्रिया नीचे टिप्पणी में व्यक्त कर सकते हैं, हमें अत्यन्त ख़ुशी होगी।



प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

Saturday, October 11, 2014

किशोर कुमार को याद करती हुईं फ़िल्म-जगत की तीन देवियाँ



स्मृतियों के स्वर - 11


किशोर कुमार को याद करती हुईं फ़िल्म-जगत की तीन देवियाँ






'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, एक ज़माना था जब घर बैठे प्राप्त होने वाले मनोरंजन का एकमात्र साधन रेडियो हुआ करता था। गीत-संगीत सुनने के साथ-साथ बहुत से कार्यक्रम ऐसे हुआ करते थे जिनमें कलाकारों के साक्षात्कार प्रस्तुत किये जाते थे, जिनके ज़रिये फ़िल्म और संगीत जगत की तमाम हस्तियों की कलात्मक ज़िन्दगी से जुड़ी बहुत सी बातें जानने को मिलती थी। गुज़रे ज़माने के इन अमर फ़नकारों की आवाज़ें आज केवल आकाशवाणी और दूरदर्शन के संग्रहालय में ही सुरक्षित हैं। मैं ख़ुशक़िस्मत हूँ कि शौकिया तौर पर मैंने पिछले बीस वर्षों में बहुत से ऐसे कार्यक्रमों को लिपिबद्ध कर अपने पास एक ख़ज़ाने के रूप में समेट रखा है। 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' पर, महीने के हर दूसरे और चौथे शनिवार को इसी ख़ज़ाने में से मैं निकाल लाता हूँ कुछ अनमोल मोतियाँ हमारे इस स्तम्भ के लिए, जिसका शीर्षक है - स्मृतियों के स्वर। इस स्तम्भ में हम और आप, साथ मिल कर गुज़रते हैं स्मृतियों के इन हसीन गलियारों से। आज के इस अंक में प्रस्तुत है, हरफ़नमौला किशोर कुमार के बारे में फ़िल्म जगत की तीन अभिनेत्रियों द्वारा कहे हुए शब्द और किशोर दा से जुड़ी उनकी स्मृतियाँ। 13 अक्तुबर को किशोर कुमार की पुण्यतिथि है; किशोर दा को नमन करती है आज की यह प्रस्तुति। 
 

सूत्र : 'विविध भारती' के अलग-अलग कार्यक्रमों से संकलित


माला सिन्हा



"वो सबसे अच्छे कॉमेडियन, और एक बहुत अच्छे इंसान थे। मैंने उनके साथ दो हिन्दी फ़िल्मों में काम किया। एक था आइ. एस. जौहर का 'बेवकूफ़' और दूसरा एस. डी. नारंग का 'बम्बई का ठग'। सेट पे वो एक मिनट चुप नहीं बैठते थे। जैसे कोई स्प्रिंग लगा हो। हर डिरेक्टर की नकल करना, एस. डी. नारंग कैसे बात करते हैं, के. एन. सिंह की इतनी अच्छी नकल करते थे वो। टैप डान्स, मैंने उन जैसा किसी को करते हुए नहीं देखा। किशोर दा असली जीनियस थे। He was a great actor, वो जो दादा गये, सो गये, उन जैसा अब कोई नहीं आ सकता, कोई आनेवाला नहीं। उनका गाना, गाना जैसे नहीं लगता, जैसे कि वो बात कर रहे हैं, very very expressive। मुझे गाने के रेकॉर्डिंग्‍स पर जाने का शौक था। जब भी मुझे पता चलता कि कहीं पे रेकॉर्डिंग चल रही है, मैं वहाँ पहुँच जाती थी। एक बार 'महबून स्टुडियोस' में किशोर दा के किसी गाने की रेकॉर्डिंग में मैं पहुँच गई। रेकॉर्डिंग से पहले कोई भी सिंगर कुछ चीज़ों से परहेज़ करते हैं, जैसे कि ठंडा पानी, इमली वगेरह। तो किशोर दा ने कहा कि मेरे लिए लेमन सोडा ले आओ, वह भी बरफ़ डाल कर। मैंने उनसे जाके पूछा, "दादा, आप रेकॉर्डिंग्‍ के समय ठंडा पीने की ज़िद कर रहे हैं, गला ख़राब नहीं हो जायेगा?" तो उन्होंने कहा कि अरे ये सब वहम है, जिसको उपरवाले का देन है, उसे कुछ नहीं होता। इतना ज़िंदादिल इंसान मैंने कहीं और नहीं देखा।"


शशिकला 


"'करोड़पति' हमारे घर की फ़िल्म थी। इसमें मैं थी, और हमारे किशोर कुमार थे। म्युज़िक था शंकर-जयकिशन का। लेकिन फ़िल्म बिल्कुल नहीं चली। गाने भी नहीं चले। शंकर-जयकिशन के होने के बावजूद नहीं चले। हम कहते थे कि 'करोड़पति' बनाते-बनाते हम कंगालपति बन गये। किशोर दा, उन दिनों में, मेरा ख़याल है सिर्फ़ तीन या चार आर्टिस्ट टॉप में थे - दिलीप कुमार, राज कपूर, देव आनन्द और किशोर कुमार। उनसे मिलना बहुत मुश्किल का काम था। टाइम देते थे, पर मिलते नहीं थे। टाइम देते थे, पर कभी नहीं आते थे। बिल्कुल शैतान बच्चे की तरह। आपको मैं उनका आख़िरी क़िस्सा सुनाती हूँ। फ़िल्म तो बन गई, फ़्लॉप भी हो गई, चली नहीं, ये सब हुआ, एक दिन मुझे फ़ोन आता है उनका कि शशि, तुम मुझे मिलने आओ। तो मैं गई अपने फ़्रेन्ड के साथ मिलने के लिए। तो बात कर रहे हैं, मुझे हार्ट-अटैक हो गया, ऐसा हुआ, वैसा हुआ, और अचानक मुझे आवाज़ आती है, 'टाइम अप, टाइम अप, टाइम अप'। मैं तो घबरा गई, मैंने कहा कि अरे यह आवाज़ कहाँ से आ रही है? हँसने लगे, हा हा हा, पता है मैं हार्ट का पेशण्ट हूँ न, इसलिए यहाँ पे एक रेकॉर्डिंग करके रखी है, पाँच मिनट से ज़्यादा किसी से बात नहीं करनी है। मैंने कहा कि किशोर दा, आपने मुझे डरा ही दिया बिल्कुल, और बहुत ईमोशनल थे। मेरा ख़याल है, very emotional person। उनके तो कितने क़िस्से हैं, जितना सुनाये तो कम है, पर बहुत ही अच्छे, बहुत ही कमाल के आर्टिस्ट, जीनियस भी कहना चाहिए, देखिये गाने भी उन्होंने कितने अच्छे लिखे, म्युज़िक भी कितना अच्छा दिया, गाते तो अच्छा थे ही।"


लीना चन्दावरकर



"किशोर जी में जो एक बच्चा था, वह बच्चा उनके साथ ही रहता था, और वह आख़िर तक था। आशा जी को भी आप पूछिये कि किस तरह से वो... मैं शुरू शुरू में थोड़ा डर गई थी क्योंकि ये क्या करते हैं हरकतें न! और ऐसे डराते थे! मैंने उनके बारे में बहुत कुछ सुन रखा था, जब मैं फ़िल्मों में काम कर रही थी। कहीं न कहीं से उनका ज़िक्र आ ही जाता था। रवैल साहब, 'महबूब की मेहन्दी' के सेट पे, सब उनकी बातें कर रहे थे। किशोर जी के बारे में तो सबसे दिलचस्प टॉपिक होता था। तो 'शराफ़त' फ़िल्म में उन्होंने काम किया था रवैल साहब के साथ। राजकुमार जी, मीना जी। तो मैं वहाँ पे नयी थी तो सुनती थी इंटरेस्ट लेके कि क्या बातें हो रही हैं और ये सब सीनियर आर्टिस्ट्स हैं। तो बाद में (उनसे शादी होने के बाद) मुझे मालूम हुआ कि सब बढ़ा-चढ़ा कर बोलते थे। किशोर जी को मैंने ऐसा कभी नहीं देखा। बहुत ही बैलेन्स्ड इंसान थे, उनको थोड़ा सा था कि लोगों को दिखाये कि मैं पागलपन करता हूँ। उनको मज़ा आता था। दादामुनि थे न, अशोक कुमार जी, दादामुनि को वो कहते थे कि दादामुनि, तुम सयाने बन के फँस जाते हो, मैं पागल बन के बच जाता हूँ। क्योंकि एक दिन बर्थडे था उनका और उन्होंने किसी को इनवाइट नहीं किया था, और पता भी नहीं था कि खाना बनाना है कि क्या करना है! हम लोग गये थे, हमको तो पता था कि दादामुनि का बर्थडे है। भाभी ने हमारे लिए पूरी-तरकारी, उनको मालूम था कि इनकी क्या पसन्द है। बुलाने की क्या ज़रूरत है, सबको पता था कि दादामुनि का बर्थडे है तो करीबी लोग आने लगे। एक एक करके आने लगे और बैठ गये। किशोर जी भी बैठे हैं और एक दम, गाना भी गा रहे हैं। सुनाये जा रहे हैं, सबको मज़ा आ रहा है। तो खाने का वक़्त आ गया, डिनर। खाना भी बनाया था। लेकिन इतने लोग आ गये कि इतने लोगों का खाना है नहीं घर में। भाभी परेशान, बाद में कैसे भी करके मैनेज किया, होटल वगेरह से मँगवा के। हम इतने परेशान थे कि अभी ऑर्डर करेंगे, फिर दस लोग आ जायेंगे तो क्या होगा? क्योंकि रात हो चली थी। तो दादामुनि ने अन्दर आके मुझसे कहा कि अब क्या होगा, मैंने इतने लोगों को इनवाइट तो नहीं किया था, तेरी भाभी इतने लोगों का कैसे खाना बनायेगी? तो किशोर दा बड़ा मज़ा ले रहे थे। बोले कि तुम बड़े सयाने हो ना, इसलिये फँस जाते हो, मैं तो पागल हूँ, मैं बच जाता हूँ। दादामुनि ने कहा कि तू तो कंजूस है। तो किशोर जी ने कहा कि नहीं नहीं मैं कंजूस नहीं हूँ, लेकिन तुमको करना पड़ेगा, इस तरह से कोई उनको बोले तो अच्छा नहीं लगता था, कहते हैं न 'rules and regulations', उनको लगता था कि हर एक को आज़ादी मिलनी चाहिये। कोई ऐबनॉर्मल बीहेव नहीं करेंगे, लेकिन अगर कोई उनसे कहे तो ये करना पड़ेगा।"


कॉपीराइट: विविध भारती



तो दोस्तों, आज बस इतना ही। आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आयी होगी। अगली बार ऐसे ही किसी स्मृतियों की गलियारों से आपको लिए चलेंगे उस स्वर्णिम युग में। तब तक के लिए अपने इस दोस्त, सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिये, नमस्कार! इस स्तम्भ के लिए आप अपने विचार और प्रतिक्रिया नीचे टिप्पणी में व्यक्त कर सकते हैं, हमें अत्यन्त ख़ुशी होगी।



प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

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