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Tuesday, July 14, 2009

वो भूली दास्ताँ लो फिर याद आ गयी....और फिर याद आई संगीतकार मदन मोहन की

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 141

दन मोहन के संगीत की सुरीली धाराओं के साथ बहते बहते आज हम आ पहुँचे हैं 'मदन मोहन विशेष' की अंतिम कड़ी पर। आज है १४ जुलाई, आज ही के दिन सन् १९७५ में मदन साहब इस दुनिया को हमेशा के लिए छोड़ गये थे। विविध भारती के वरिष्ठ उद्‍घोषक कमल शर्मा के शब्दों में - "मदन मोहन के धुनों की मोहिनी में कभी प्रेम का समर्पण है तो कभी मादकता से भरी हैं, कभी विरह की वेदना है और कभी स्वर लहरी से भर देती हैं दिल को, जिसका मध्यम मध्यम नशा है। मदन मोहन के शास्त्रीय संगीत पर आधारित गीतों में साज़ों की अनर्थक ऐसी भीड़ भी नहीं है जिससे गाने की आत्मा ही खो जाये। उनके धुनों की स्वरधारा पर्वत से उतरती है और सुर सरिता में विलीन हो जाती है। धाराओं में धारा समाने लगते हैं, और ऐसी ही एक धारा में नहाकर आत्मा तृप्त हो जाती हैं। व्यक्तिगत अनुभव के स्तर पर हर श्रोता को कोई संगीतकार, गीतकार या गायक दूसरों से ज़्यादा पसंद आते हैं जिनकी कोई मौलिकता उन्हे प्रभावित कर जाती हैं। मदन मोहन के संगीत में भी मौलिकता है। फ़िल्म संगीत एक कला होने के साथ साथ एक व्यावसाय भी है जिसमें कई बार कलाकारों को समझौता करना पड़ता है। मदन मोहन जैसे संगीतकार को भी कहीं कहीं समझौता करना पड़ा है, लेकिन कल्पनाशील संगीतकार वो है जो कोई ना कोई रास्ता निकाल लेता है और हर बार अपना छाप छोड़ जाता है। मदन मोहन उनमें से एक हैं।" आज इस विशेष प्रस्तुति के अंतिम अध्याय में हमें याद आ रही है वो भूली दास्ताँ जिसे दशकों पहले लता मंगेशकर ने बयाँ किया था राजेन्द्र कृष्ण के शब्दों में, १९६१ की फ़िल्म 'संजोग' के प्रस्तुत गीत में। दर्द का ऐसा असरदार फ़ल्सफ़ा हर रोज़ बयाँ नहीं होता। और यही वजह है कि यह गीत मदन मोहन के 'मास्टर-पीस' गीतों में गिना जाता है।

प्रमोद चक्रवर्ती निर्देशित 'संजोग' के मुख्य कलाकार थे प्रदीप कुमार और अनीता गुहा। दोस्तों, आप को याद होगा कि 'मदन मोहन विशेष' का पहला गीत "बैरन नींद न आये" (चाचा ज़िंदाबाद) भी अभिनेत्री अनीता गुहा पर ही फ़िल्माया गया था। सही में यह संजोग की ही बात है कि इस शृंखला का अंतिम गीत फिर एक बार अनीता गुहा पर फ़िल्माया हुआ है। इस फ़िल्म के सभी गीत बेहद सुरीले भी हैं और लोकप्रिय भी, लेकिन प्रस्तुत गीत में कुछ ऐसी बात है कि जो इसे दूसरे गीतों के मुकाबिल दो क़दम आगे को रखती है। यह मदन मोहन और लता जी के हौंटिंग मेलडीज़ का एक बेमिसाल नग़मा है जो दिल को उदास भी कर देता है और साथ ही इसका सुरीलापन मन को एक अजीब शांति भी प्रदान करता है। और्केस्ट्रेशन की तो क्या बात है, शुरुवाती संगीत अद्‍भुत है, पहले इंटर्ल्युड में सैक्सोफ़ोन पुर-असर है, कुल मिलाकर पूरा का पूरा गीत एक मास्टरपीस है। "बड़े रंगीन ज़माने थे, तराने ही तराने थे, मगर अब पूछता है दिल वो दिन थे या फ़साने थे, फ़कत एक याद है बाक़ी, बस एक फ़रियाद है बाक़ी, वो ख़ुशियाँ लुट गयीं लेकिन दिल-ए-बरबाद है बाक़ी"। सच दोस्तों, कहाँ गये वो सुरीले दिन, फ़िल्म संगीत का वह सुनहरा युग! आज मदन मोहन हमारे बीच नहीं हैं, जुलाई का यह भीगा महीना बड़ी शिद्दत से उनकी याद हमें दिलाता है, पर आँखें नम करने का हक़ हमें नहीं है क्यूंकि उन्ही का एक गीत हम से यह कहता है कि "मेरे लिए न अश्क़ बहा मैं नहीं तो क्या, है तेरे साथ मेरी वफ़ा मैं नहीं तो क्या"। हिंद युग्म की तरफ़ से मदन मोहन की संगीत साधना को प्रणाम!



पिछले वर्ष हमने मदन मोहन साहब को याद किया था संजय पटेल जी के इस अनूठे आलेख के माध्यम से. आज फिर एक बार जरूर पढें और सुनें ये भी.
नैना बरसे रिमझिम रिमझिम.....इस गीत से जुडा है एक मार्मिक संस्मरण


और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा पहला "गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. माउथ ओरगन की धुन इस गीत की खासियत है.
2. राहुल देव बर्मन ने बजायी थी वह धुन इस गीत में.
3. मस्ती से भरे इस गीत के एक अंतरे में "काज़ी" का जिक्र है.

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी, मात्र ४ अंक पीछे हैं अब आप अपनी मंजिल से, बहुत बहुत बधाई....पता नहीं हमारी स्वप्न मंजूषा जी कहाँ गायब हैं, पराग जी भी यही सवाल कर रहे हैं. जी पराग जी आपने सही कहा ये गीत रेडियो पर बहुत सुना गया है पर हमें तो यही लगता है कि यह गीत उस श्रेणी का है जिसे जितनी भी बार सुना जाए मन नहीं भरता.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Monday, July 13, 2009

मेरी आवाज़ सुनो, प्यार का राग सुनो.....स्वर्गीय मदन साहब के गीत बोले रफी के स्वरों में ढल कर

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 140

न् १९२४ में इराक़ के बग़दाद में जन्मे मदन मोहन कोहली को द्वितीय विश्व युद्ध के समय फ़ौजी बनकर बंदूक थामनी पड़ी थी। लेकिन बंदूक की जगह साज़ों को थामने की उनकी बेचैनी उन्हे संगीत के क्षेत्र में आख़िरकार ले ही आयी। १९४६ में आकाशवाणी के लखनऊ केन्द्र में वो कार्यरत हुए और वहीं वो सम्पर्क में आये उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ साहब और बेग़म अख्तर जैसे नामी फ़नकारों के। १९५० में देवेन्द्र गोयल की फ़िल्म 'आँखें' में उन्होने बतौर स्वतंत्र संगीतकार पहली बार संगीत दिया। फ़िल्म 'मदहोशी' के एक गीत में उन्होने पहली बार लता मंगेशकर और तलत महमूद को एक साथ ले आये थे। १९८० में उनके संगीत से सजी फ़िल्म आयी थी 'चालबाज़'. १९५० से १९८० के इन ३० सालों में उन्होने एक से बढ़कर एक धुन बनायी और सुननेवालों को मंत्रमुग्ध किया। उनका हर गीत जैसे हम से यही कहता कि "मेरी आवाज़ सुनो, प्यार का राग सुनो"। फ़िल्म 'नौनिहाल' के इस गीत की तरह कई अन्य गानें उनके ऐसे हैं जिनको समझने के लिए अहसास की ज़बान ही काफ़ी है। मदन मोहन के संगीत में समुन्दर सी गहराई है, रात की तन्हाई है, उनके दर्द भरे गानें भी अत्यन्त मीठे लगते हैं। मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ में आज सुनिये फ़िल्म 'नौनिहाल' का प्यार का राग सुनाता यही गीत। गीतकार हैं कैफ़ी आज़मी।

फ़िल्म 'नौनिहाल' बनी थी सन् १९६७ में। बलराज साहनी, संजीव कुमार और इंद्राणी मुखर्जी अभिनीत यह फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर ज़्यादा नहीं चली, लेकिन मदन मोहन का संगीत ज़रूर चला। यूं तो लता मंगेशकर, आशा भोंसले, उषा मंगेशकर, कमल बारोट और कृष्णा कल्ले ने इस फ़िल्म के कई गीत गाये, लेकिन रफ़ी साहब के गाये दोनों के दोनों एकल गीतों ने बाज़ी मार ली। आज इस फ़िल्म को याद किया जाता है रफ़ी साहब के गाये हुए इन दो गीतों की वजह से। एक तो है आज का प्रस्तुत गीत और दूसरा गीत है "तुम्हारी ज़ुल्फ़ के साये में शाम कर लूँगा, सफ़र एक उम्र का पल में तमाम कर लूँगा"। इस गीत को कैफ़ी आज़मी ने नहीं बल्कि राजा मेहंदी अली ख़ान ने लिखा था। बहरहाल वापस आते हैं आज के गीत पर। "मेरी आवाज़ सुनो" की अवधि है ६ मिनट ४३ सेकन्ड्स। उस समय की औसत अवधि से जो काफ़ी लम्बी है। संगीत वही है जिसकी संगती दिल को मोह ले। संगीत जो सिर्फ़ कानों में ही नहीं बल्कि दिल में भी रस घोल दे। मदन मोहन की धुनों का सुरूर भी कुछ ऐसा ही है। तो लीजिये पेश है मदन साहब की एक और बेमिसाल रचना। चलने से पहले आप को यह भी बता दें कि कल है १४ जुलाई, यानी कि मदन मोहन साहब का स्मृति दिवस और इस 'मदन मोहन विशेष' की अंतिम कड़ी। तो आज की तरह कल भी 'आवाज़' के इस स्तंभ पर पधारियेगा ज़रूर!



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा पहला "गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. मदन साहब के मास्टरपीस गीतों में से एक.
2. अभिनेत्री अनीता गुहा पर फिल्माया गया है ये गीत.
3. मुखड़े की आखिरी पंक्ति में शब्द है - "घटा".

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी को बधाई, ४४ अंक हो गए हैं आपके. पराग जी वाकई आपका दिल बड़ा है....मान गए. शमिख फ़राज़ और मनु जी आपका भी आभार. निर्मला जी आपकी पसंद का गीत पहले ही ओल्ड इस गोल्ड पर आ चुका है, लीजिये आप भी सुनिए यहाँ.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Sunday, July 12, 2009

वो देखो जला घर किसी का....लता- मदन मोहन टीम का एक बेहतरीन गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 139

'मदन मोहन विशेष' की पाँचवीं कड़ी के साथ हम हाज़िर हैं दोस्तों। मदन मोहन ने गीतकार राजा मेहंदी अली ख़ान के लिखे अनेक गीतों को संगीतबद्ध किया था। फ़िल्म 'अनपढ़' के एक गीत के बारे में ऐसा कहा जाता है कि इसकी धुन मदन मोहन ने अपने घर से 'रिकॉर्डिंग स्टुडियो' जाते वक़्त टैक्सी में बैठे बैठे केवल १० मिनट में बना लिया था। वह मन को छू लेनेवाली अमर रचना लता मंगेशकर की आवाज़ में थी "आप की नज़रों ने समझा प्यार के क़ाबिल मुझे"। इसी फ़िल्म में लता जी का गाया "जिया ले गयो जी मोरा साँवरिया" और "है इसी में प्यार की आबरू" गीत बहुत ज़्यादा मशहूर हुए थे। इनकी तुलना में लता जी का ही गाया एक ऐसा गीत भी था जो थोड़ा सा कम सुना गया, या फिर यूं कहिए कि जिसकी चर्चा कम हुई। वह गीत है "वह देखो जला घर किसी का, ये टूटे हैं किसके सितारे, वो क़िस्मत हँसीं और ऐसी हँसीं के रोने लगे ग़म के मारे"। अक्सर ऐसा देखा गया है फ़िल्मों में कि फ़िल्म के चंद मशहूर गीतों की चमक धमक से कुछ दूसरे गीत इस क़दर खो जाते हैं कि उनकी उत्कृष्टता लोगों तक सही अर्थों में पहुँच नहीं पाती। 'अनपढ़' फ़िल्म का प्रस्तुत गीत भी ऐसा ही एक गीत है।

फ़िल्म 'अनपढ़' आयी थी सन् १९६२ में। राजेन्द्र भाटिया निर्मित और मोहन कुमार निर्देशित इस फ़िल्म क्र मुख्य पात्रों में थे माला सिंहा, बलराज साहनी और धर्मेन्द्र। प्रस्तुत गीत संगीत संयोजन की दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा। बहुत सारे साज़ों के सम्मीश्रण से और्केस्ट्रेशन तैयार किया गया था। ४.५० मिनट के इस गीत का प्रील्युड संगीत ही करीब ५० सेकन्ड्स का है। इंटर्ल्युड संगीत में भारी भरकम और्केस्ट्रेशन का प्रयोग हुआ है। लेकिन मुखड़े और अंतरों के संगेत संयोजन को बहुत ही सीधा सरल रखा गया है। गीत के बोलों के साथ इंटर्ल्युड संगीत का जो कॊन्ट्रस्ट है, वह कुल मिलाकर इस गीत को और भी ज़्यादा मज़बूत बनाती है। राजा मेहंदी अली ख़ान के लिखे प्रस्तुत गीत में टूटे क़िस्मत के टूकड़ों का ज़िक्र है। "गया जैसे झोंका हवा का हमारी ख़ुशी का ज़माना, दिये हमको क़िस्मत ने आँसू जब आया हमें मुकुराना"। एक अन्य अंतरे में ख़ान साहब लिखते हैं कि "इधर रो रही हैं ये आँखें, उधर आसमाँ रो रहा है, मुझे करके बरबाद ज़ालिम, पशेमान अब हो रहा है, ये बरखा कभी तो रुक जायेगी, रूकेगी ना आँसू हमारे"; बरसात की धाराओं के साथ आँखों से बहती धारा की तुलना बेहद ख़ूबसूरत बन पड़ी है इस बात से कि बरसात तो रुक भी जायेगी लेकिन वो बरसात कैसे रुके जो आँखों से बरस रही है! सुनते हैं लता मंगेशकर और मदन मोहन के जोड़ी का एक और नायाब गीत 'मदन मोहन विशेष' के अंतर्गत।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा पहला "गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. मदन मोहन के संगीत को ही सलाम करता है ये गीत.
2. जवाहर लाल नेहरु की स्मृति में लिखा और गाया गया है ये गीत.
3. आपके इस प्रिय जालस्थल का नाम है इस गीत के मुखड़े में.

पिछली पहेली का परिणाम -
पराग जी एक बार फिर माफ़ी, फिर एक बार वही हुआ जो नहीं होना चाहिए था....पहेली के सूत्रों के मुताबिक वो गीत भी सही है जो आपने बताया, पर हमने जो चुना वो गीत तो अब आप जान ही चुके हैं....अन्तः सबसे निवेदन है कि इस स्तिथि में कल की पहेली को निरस्त माना जाए.....सभी का धन्येवाद...

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Saturday, July 11, 2009

जमीन से हमें आसमान पर बिठाके गिरा तो न दोगे....एक मासूम सा सवाल इस प्रेम गीत में

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 138

'ओल्ड इज़ गोल्ड' में आप इन दिनों सुन रहे हैं 'मदन मोहन विशेष'। मदन मोहन का मनमोहक संगीत फ़िल्म संगीत के स्वर्णयुग का एक सुरीला अध्याय है। उनकी हर रचना बेजोड़ है, बावजूद इसके कि उन्होने दूसरे सफल संगीतकारों की तरह बहुत ज़्यादा फ़िल्मों में संगीत नहीं दिया है। उनके गीतों में हमारी संस्कृति की अनुगूँज सुनाई देती है। उनके संगीत में है रागों का अनुराग, संगीत का वह रस भरा संसार है कि जिसमें बार बार डुबकी लगाने को जी चाहता है। फ़िल्म संगीत की दुनिया से जुड़े संगीतकारों की इस दुनिया में मदन मोहन अलग ही नज़र आते हैं। संगीतकार बेशक़ एक दौर में अपनी संगीत यात्रा पूरी कर चला जाता है, लेकिन उनका संगीत काल और समय से परे होता है। मदन मोहन का संगीत भी कालजयी है और रहेगा जो साया बन हमेशा हमारे साथ चलेगा और बाँटता रहेगा हमारी ख़ुशियाँ, हमारे ग़म। मदन मोहन साहब को हम ने जिस क़दर अपने दिलों में बसा रखा है, वो कभी वहाँ से उतर नहीं पायेंगे। कुछ इसी तरह का भाव उनके उस गीत में भी है जो आज हम चुनकर लाये हैं इस महफ़िल के लिए। "ज़मीं से हमें आसमाँ पर बिठाके गिरा तो न दोगे, अगर हम यह पूछें कि दिल में बसा के भुला तो न दोगे"। मदन मोहन का संगीत न कभी आसमाँ से ज़मीं पर गिरेगा और न ही हम कभी उन्हे भुला पायेंगे। आशा भोंसले और मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ों में राजेन्द्र कृष्ण का लिखा 'अदालत' फ़िल्म का यह युगल गीत आज पेश है 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में।

सन्‍ १९५८ में मदन मोहन ने कुल ८ फ़िल्मों में संगीत दिया था और ख़ास बात यह कि ये आठों फ़िल्में अलग अलग बैनर की थीं। ये ८ फ़िल्में हैं - आखिरी दाव, एक शोला, नाइट क्लब, अदालत, चांदनी, जेलर, ख़ज़ांची, और खोटा पैसा। पहले तीन फ़िल्मों में गीतकार थे मजरूह सुल्तानपुरी और बाक़ियों में राजेन्द्र कृष्ण साहब। 'अदालत' क्वात्रा फ़िल्म्स की प्रस्तुति थी जिसके निर्देशक थे कालीदास, और मुख्य भूमिकायों में थे प्रदीप कुमार, नरगिस और प्राण। इस फ़िल्म में लता जी के गाये तीन ग़ज़लों ने फ़िल्म जगत में तहलका मचा दिया था और इसी फ़िल्म के बाद से मदन मोहन साहब को फ़िल्मी ग़ज़लों का शहज़ादा कहा जाने लगा था। लताजी की गायी हुई ये तीन ग़ज़लें थीं "युं हसरतों के दाग़ मोहब्बत में धो लिए", "जाना था हमसे दूर बहाने बना लिए" और "उनको यह शिकायत है के हम कुछ नहीं कहते"। लेकिन आशा जी और रफ़ी साहब का गाया प्रस्तुत युगल गीत भी उतना ही पुर-असर है। नर्मोनाज़ुक रोमांटिक गीतों में यह गीत एक बेहद सम्मानीय स्थान रखता है इसमें कोई दोराय नहीं है। आज जब आशा जी और मदन साहब की एक साथ बात चली है तो विविध भारती के 'संगीत सरिता' कार्यक्रम में आशा जी, पंचम दा और गुलज़ार साहब की बातचीत का एक अंश यहाँ पेश कर रहा हूँ जिसमें मदन मोहन का ज़िक्र छिड़ा है -

"आशा: एक बात है, मदन भ‍इया ने ग़ज़ल, ठुमरी, कजरी पर बहुत सारे गानें बनाये हैं।
पंचम: वो अख़तरी बाई, सिद्धेश्वरी बाई जैसे कलाकारों को इतना सुनते थे, और एक और बात वो खाना भी बहुत अच्छा बनाते थे, आप को पता है?
गुलज़ार: मैं तो स्वाद से बता देता था कि यह मदन भाईसाहब ने बनाया है।
पंचम: वो मेरे पिताजी के लिए बनाकर लाते थे, टिंडे-गोश्त।
आशा: मैने तो भिंडी-गोश्त खाया है!"


अब इससे पहले कि आप के मुँह में पानी आये (अगर आप नॊन-वेज हैं तो), आप को सुनवा रहे हैं यह गीत!



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा पहला "गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. मदन साहब के लाजवाब संगीत से सजी फिल्म का है ये गीत.
2. राजा मेहंदी अली खान के हैं बोल इस दर्द भरे गीत में.
3. मुखड़े में शब्द है - "सितारे".

पिछली पहेली का परिणाम -
पराग जी ने बहुत दिनों बाद बाज़ी मारी आपके अंक हुए ६. मंजू जी बस ज़रा सा पीछे रह गयी. शरद जी, मनु जी, तपन जी और शमिख जी सब आये सही जवाब की पड़ताल करने, दिलीप जी आपने बिलकुल सही कहा मदन साहब के इस गीत की और उनके संगीत जितनी तारीफ की जाए कम है, कल स्वप्न जी नज़र नहीं आई.....आपकी कमी खली....:)

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Friday, July 10, 2009

मैं ये सोच कर उसके दर से उठा था...रफी साहब के गाये बहतरीन नज्मों में से एक

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 137

'ओल्ड इज़ गोल्ड' में इन दिनों हम उस सुर साधक की बातें कर रहे हैं जिनका अंदाज़ था सब से जुदा, जिनका संगीत कानों से होते हुए सीधे रूह में समा जाता है। वह संगीत, जो कभी प्रेम, कभी विरह, कभी पीड़ा, तो कभी प्यार में समर्पण की भावना जगाती है। अपने संगीत से श्रोताओं को बेसुध कर देनेवाले उस सुर-गंधर्व को हम और आप मदन मोहन के नाम से जानते हैं। 'मदन मोहन विशेष' के तीसरे अंक में आज हम उनके संगीत के जिस रंग को लेकर आये हैं वह रंग है अपनी महबूबा से बिछड़ने की घड़ी में दिल से निकलती पुकार, कि काश वो एक बार हमें जाने से रोक ले। छुट्टी पर आये सैनिक को अचानक तार मिलता है कि पड़ोसी मुल्क ने हमारे देश पर हमला बोल दिया है और उसे तुरंत सीमा पर पहुँचना है। ऐसे में एक दम से महबूबा से जुदा होने का ख़याल सैनिक के दिल को दहलाकर रख देता है। क्या पता कि फिर कभी उन से इस ज़िंदगी में मुलाक़ात हो, ना हो! १९६४ में बनी चेतन आनंद की फ़िल्म 'हक़ीक़त' की हम बात कर रहे हैं, जिसके मुख्य कलाकार थे चेतन आनंद और प्रिया राजवंश। १९६२ के 'इंडो-चायना वार' पर आधारित इस फ़िल्म की कहानी बहुत ही मार्मिक थी। चेतन आनंद को इस फ़िल्म के लिए भरपूर सराहना तो मिली ही, ऐसी युद्ध वाली फ़िल्म में भी बेहद सुरीला संगीत देकर मदन मोहन साहब ने उस से भी ज़्यादा प्रशंसा बटोरी। यूं तो युद्ध की पृष्ठभूमी पर केन्द्रित कई फ़िल्में बनीं हैं और उनमें वीर रस के कई गानें भी शामिल हुए हैं, लेकिन 'हक़ीक़त' के रफ़ी साहब का गाया "कर चले हम फ़िदा जान-ओ-तन साथियों" को सुनकर एक अजीब सी अनुभूती होती है। न चाहते हुए भी आँखें भर आती हैं हर बार, रोंगटें खड़े हो जाते हैं, यह गीत उन जाँबाज़ सैनिकों के लिए हमें अपना सर श्रद्धा से झुकाने पर विवश कर देती है। लेकिन रफ़ी साहब की ही आवाज़ में आज का प्रस्तुत गीत भले ही वीर रस से ओत प्रोत न हो, लेकिन उसमें भी कुछ ऐसी बात है कि यकायक आँखें नम सी हो जाती हैं। मैने पहले भी दो एक बार कहा है कि कुछ गानें ऐसे होते हैं कि जिनके बारे में ज़्यादा कहना नहीं चाहिए बल्कि सिर्फ़ उसे सुनकर दिल से महसूस करनी चाहिए, यह गीत भी इसी श्रेणी में आता है। इस फ़िल्म के गीतों में मदन साहब का जितना योगदान है, उतना ही योगदान है गीतकार और शायर कैफ़ी आज़्मी का, जिनके कलेजा चीर कर रख देने वाले बोलों ने फ़िल्म के गीतों को अमर बना दिया है।

यह तो आप को पता ही होगा कि लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की जोड़ी के प्यारेलाल-जी शुरु शुरु में वायलिन बजाया करते थे। कई संगीतकारों के लिए उन्होने बजाया और उनमें से एक मदन मोहन भी थी। स्वतंत्र संगीतकार बन जाने के बाद भी कुछ समय तक उन्होने दूसरे संगीतकारों के गीतों में अपने वायलिन के जलवे दिखाये हैं, और फ़िल्म 'हक़ीक़त' का प्रस्तुत नग़मा इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। आइए जानते हैं इस गीत मे प्यारेलाल जी के योगदान के बारे में ख़ुद उन्ही के शब्दों में, जो उन्होने विविध भारती के 'उजाले उनकी यादों के' शृंखला में कहे थे - "एक गाना मैं आप को, एक हादसा बताऊँ मैं आप को, कि 'हक़ीक़त' पिक्चर के अंदर मदन मोहन जी का "मैं यह सोचकर उसके दर से", तो यह गाना रिकार्ड हो रहा था महबूब स्टुडियोज़ के अंदर। इस गीत में पहले 'फ़्ल्युट सोलो' था, और 'पियानो सोलो' था, लेकिन बाद में, मुझे मालूम नहीं क्यों, मदन जी बाहर आये और बात की सोनिक जी से। सोनिक-ओमी, तो सोनिक जी से बात की कि 'भई कुछ चेंज करना है', और ऐसा था कि जो शुरु से लेकर आख़िर तक आप सिर्फ़ 'वायलिन' सुनेंगे, और एंड में जाकर पियानो आता है।" दोस्तों, कहने का तात्पर्य यह है कि पहले इस गीत के लिए बाँसुरी और पियानो की धुन रखी गयी थी, लेकिन बाद में पूरे गीत में केवल प्यारेलाल जी का वायलिन रखा गया। गीत में बस यही एक साज़ मुख्य रूप से सुनायी देता है, और बिछड़ने के दर्द भरे पल को और भी ज़्यादा सजीव बनानें में वायलिन जो कमाल दिखा सकता है वह कोई और साज़ नहीं दिखा सकता तो लीजिये, मदन मोहन, कैफ़ी आज़्मी, मोहम्मद रफ़ी, प्यारेलाल और चेतन आनंद को सलामी देते हुए सुनते हैं आज का यह दिल को छू लेनेवाला गीत।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा पहला "गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. मदन साहब ने बेहद खूबसूरत गीत दिए थे इस फिल्म में.
2. आशा -रफी के युगल स्वर है इस गीत में.
3. पहला अंतरा शुरू होता है इन शब्दों से -"ऐ रात..."

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी एक बार फिर बाज़ी मार गए, ४२ अंकों के लिए बधाई जनाब. सवाल आसान था, पर स्वप्न जी का कंप्यूटर धोखा दे गया. मनु जी, रचना जी, सुमित जी, मीत जी और दिलीप जी उम्मीद है आप सब मदन मोहन साहब पर प्रस्तुत इस श्रृंखला का भरपूर आनंद ले रहे होंगें.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Thursday, July 9, 2009

तू प्यार करे या ठुकराए हम तो हैं तेरे दीवानों में - मानते हैं आज भी मदन साहब के दीवाने

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 136

'मदन मोहन विशेष' की दूसरी कड़ी में आप सभी का हार्दिक स्वागत है। कल इसकी पहली कड़ी में मदन मोहन के संगीत में लताजी का गाया और राजेन्द्र कृष्ण का लिखा हुआ गीत आप ने सुना था। आज भी इसी तिकड़ी के स्वर गूँज रहे हैं इस महफ़िल में, लेकिन एक अलग ही अंदाज़ में। यूं तो आम तौर पर नायक ही नायिका के दिल को जीतने की कोशिश करता है, लेकिन हमारी फ़िल्मों में कभी कभी हालात ऐसे भी बने हैं कि यह काम नायक के बजाय नायिका के उपर आन पड़ी है। धर्मेन्द्र-मुमताज़ की फ़िल्म 'लोफ़र' में लताजी का ही एक गीत था "मैं तेरे इश्क़ में मर ना जाऊँ कहीं, तू मुझे आज़माने की कोशिश न कर", जो बहुत मक़बूल हुआ था। लेकिन आज जिस गीत की हम बात कर रहे हैं वह है १९५७ की फ़िल्म 'देख कबीरा रोया' का "तू प्यार करे या ठुकराये हम तो हैं तेरे दीवानों में, चाहे तू हमें अपना न बना लेकिन न समझ बेगानों में"। है न वही बात इस गीत में भी! वैसे यह गीत शुरु होता है एक शेर से - "न गिला होगा न शिकायत होगी, अर्ज़ है छोटी सी सुन लो तो इनायत होगी"। राजेन्द्र कृष्ण साहब ने भी एक अंतरे में क्या ख़ूब लिखा है कि "मिटते हैं मगर हौले हौले, जलते हैं मगर एक बार नहीं, हम शम्मा का सीना रखते हैं, रहते हैं मगर परवानों में"। वाह भई, इससे बेहतर अंतरा इस गीत में और क्या हो सकता था भला! वैसे शायरी के अच्छे जानकार तो मदन मोहन साहब भी थे, इस बारे में बता रहीं हैं ख़ुद लता जी - "यह मेरी आँखों देखी बात है कि कभी कभी मदन भ‍इया बस मिनटों में तर्ज़ बना देते थे। और तर्ज़ भी कैसी, वाह! शायरी पर वो बहुत ज़ोर देते थे। जब तक शब्दों में गहराई न हो, गीतकार को काग़ज़ लौटा देते थे। 'फिर कोशिश कीजिए, जब दिल से बात निकलेगी तब असर करेगी।'"

अमीय चक्रबर्ती के 'मार्स ऐंड मूवीज़' के बैनेर तले बनी इस कम बजट फ़िल्म 'देख कबीरा रोया' के मुख्य कलाकार थे अनीता गुहा, अमीता और अनूप कुमार। आज अगर यह फ़िल्म जीवित है तो सिर्फ़ और सिर्फ़ इसके गीतों की वजह से। लता जी के गाये प्रस्तुत गीत के अलावा उनका गाया "मेरी वीणा तुम बिन रोये", मन्ना डे का गाया "कौन आया मेरे मन के द्वारे पायल की झंकार लिए" तथा तलत महमूद का गाया "हम से आया न गया तुम से बुलाया न गया" आदि खासे लोकप्रिय हुए थे और आज भी बड़े चाव से सुने जाते हैं। "मदन भ‍इया ज़िंदगी की इस महफ़िल से उठ कर कब के जा चुके हैं। उनके बाद आज जब उनके अफ़साने बयान कर रही हूँ, तो वो जहाँ भी हैं, मैं उन से यही कहूँगी कि 'मदन भ‍इया, बहारें आप को क्यों ढ़ूंढे, चाहे हज़ारों मंज़िलें हों, चाहे हज़ारों कारवाँ, अपने गीतों के साथ आप हमेशा बहार बन कर छाते रहेंगे, आप के संगीत प्रेमियों की वफ़ा कम नहीं होंगी, बल्कि बढ़ती ही जा रही है।" लता जी के इन्ही अनमोल शब्दों के साथ आइये सुनते हैं आज का यह गोल्डन गीत।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा पहला "गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. मदन मोहन साहब के श्रेष्ठतम कामों में से एक.
2. हिंदी फिल्मों में बहुत कम नज़्म सुनने को मिलती है, ये एक बेहद मशहूर नज़्म है.
3. आखिरी पंक्ति में शब्द है -"यहाँ".

पिछली पहेली का परिणाम -
जिस दिन हमारे धुरंधर सोच में पड़ जाते हैं उस दिन हमें मज़ा आता है. स्वप्न मंजूषा जी के दोनों अंदाजे गलत निकले. पराग जी भी सोच में पड़ गए पर मान गए भाई शरद जी को. एक दम सही जवाब. ४० का आंकडा छू लिया आपने..बहुत बहुत बधाई...मनु जी आप आजकल उलझे उलझे ही मिलते हैं और मीत जी आपका भी महफिल में आने का आभार, आप तो धुरंधर संगीत प्रेमी हैं पहेली में भी हिस्सा लिया कीजिये.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Wednesday, July 8, 2009

बैरन नींद न आये....मदन मोहन साहब की यादों को समर्पित ओल्ड इस गोल्ड विशेष.

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 135

जुलाई का महीना, यानी कि सावन का महीना। एक तरफ़ बरखा रानी अपने पूरे शबाब पर होती हैं और इस सूखी धरा को अपने प्रेम से हरा भरा करती है। लेकिन जुलाई के इसी महीने में एक और चीज़ है जो छम छम बरसती है, और वो है संगीतकार मदन मोहन की यादें। जी हाँ दोस्तों, करीब करीब ढाई दशक बीत चुके हैं, लेकिन अब भी दिल के किसी कोने में छुपी कोई आवाज़ अब भी इशारा करती है १४ जुलाई के उस दिन की तरफ़ जब वो महान संगीतकार हमें छोड़ गये थे। उनके जाने से फ़िल्म संगीत में जो शून्य पैदा हुआ है, उसे भर पाना अब नामुमकिन सा जान पड़ता है। मदन मोहन साहब की सुरीली याद में आज से लेकर अगले सात दिनों तक, यानी कि ८ जुलाई से लेकर १४ जुलाई तक, 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में आप सुनने वाले हैं 'मदन मोहन विशेष'। मदन मोहन के स्वरबद्ध गीतों में सर्वश्रेष्ठ सात गानें चुनना संभव नही है, और ना ही हम इसकी कोई कोशिश कर रहे हैं। हम तो बस उनके संगीत के सात अलग अलग रंगों से आपका परिचय करवायेंगे अगले सात दिनों में। तो तैयार हो जाइये दोस्तों, फ़िल्म जगत के अनूठे संगीतकार मदन मोहन साहब की धुनों में ग़ोते लगाने के लिए। मदन मोहन पर केन्द्रित किसी भी कार्यक्रम की शुरुआत लताजी के ही गाये गाने से होनी चाहिये ऐसा हमारा विचार है। कारण शायद बताने की ज़रूरत नहीं। तो लीजिये, आज भी हम इसी रवायत को जारी रखते हुए आप को सुनवाते हैं लता जी की आवाज़ में सन् १९५९ की फ़िल्म 'चाचा ज़िंदाबाद' से "बैरन नींद न आये"। जे. ओम प्रकाश निर्मित एवं निर्देशित इस हास्य फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे किशोर कुमार, अनीता गुहा, भगवान, अनूप कुमार, ओम प्रकाश और टुनटुन। गानें लिखे राजेन्द्र कृष्ण ने। फ़िल्म में कुल ८ गानें थे जिनमें से दो किशोर के एकल, दो आशा के एकल, दो किशोर-लता के युगल, एक लता-मन्ना डे के युगल, तथा एक लता जी की एकल आवाज़ में थे। इनमें से ज़्यादातर गीत हास्य और हल्के-फुल्के अंदाज़ वाले थे सिवाय लताजी के एकल गीत के, जिसमें मुख्यता विरह की वेदना का सुर था। और ख़ास बात यह कि इसी गीत ने सब से ज़्यादा वाह-वाही बटोरी। शास्त्रीय संगीत पर आधारित इस गीत के इंटर्ल्युड संगीत में सितार का अच्छा प्रयोग सुनने को मिलता है। यूं तो जब मदन मोहन और लता मंगेशकर की एक साथ बात चलती है तो लोग अपनी बातचीत का रुख़ ग़ज़लों की तरफ़ ले जाते हैं, लेकिन प्रस्तुत गीत प्रमाण है इस बात का कि सिर्फ़ ग़ज़लें ही नहीं, बल्कि गीतों को भी इन दोनों ने वही अंजाम दिया है।

क्योंकि आज का यह गीत शास्त्रीय संगीत पर आधारित है, तो इससे पहले कि आप यह गीत सुनें, क्यों न लता जी के उन शब्दों पर एक नज़र डालते चलें जो उन्होने अपने मदन भ‍इया के शास्त्रीय संगीत के ज्ञान के बारे में कहा था - "मदन भ‍इया ने शास्त्रीय संगीत सीखा भी था और महान गायकों को बहुत सुना भी था। संगीत की मज़बूत दुनिया इसी तरह बसती है। वो गाते थे और बड़े तैयार गले से। उनकी संगीत साधना और प्रतिभा से निखरे और स्वरों से सजे गीत, ग़ज़ल, भजन इसीलिए इतने पुर-असर होते थे। मदन भ‍इया सही माईनों में आर्टिस्ट थे और बड़े ही सुरीले थे।" तो लीजिए दोस्तों, पेश है 'मदन मोहन विशेष' की पहली कड़ी में उनके साथ साथ लता जी और राजेन्द्र कृष्ण का यह नायाब तोहफ़ा।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा पहला "गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. संगीतकार मदन मोहन का रचा एक और उत्कृष्ट गीत.
2. लता की आवाज़ में है ये गीत.
3. गीत से पहले एक शेर है जिसमें "शिकायत" और "इनायत" का काफिया इस्तेमाल हुआ है.

पिछली पहेली का परिणाम -
पराग जी आपने सही कहा, पहेली के सूत्र के मुताबिक दोनों ही गीत सही बैठते हैं. पर सही जवाब तो एक ही हो सकता है. अंत शरद जी के खाते में २ अंक और देने पडेंगें हमें,शरद के कुल अंक हुए ३८. पराग जी, आपको अंक न दे पाने का दुःख है पर हमें विशवास है कि आप बुरा नहीं मानेंगें. अब इतने सारे गीत हैं तो कभी कभी हमसे भी ऐसी भूल हो ही जाती है :)

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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