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Thursday, August 13, 2009

ये बरकत उन हज़रत की है....मोहित चौहान ने किया कबूल गुलज़ार के शब्दों में

ताजा सुर ताल (14)

जीव - नमस्कार दोस्तों, मैं हूँ सजीव और मेरे साथ है, आवाज़ के हमकदम सुजॉय...

सुजॉय - सभी दोस्तों को मेरा नमस्कार...

सजीव - सुजॉय लगता है ताज़ा सुर ताल धीरे धीरे अपने उद्देश्य में कामियाब हो रहा है. बिलकुल वैसे ही जैसे ओल्ड इस गोल्ड का उद्देश्य आज की पीढी को पुराने गीतों से जोड़ना था, ताज़ा सुर ताल का लक्ष्य संगीत की दुनिया में उभरते नये नामों से बीती पीढी को मिलवाना है और देखिये पिछले अंक में शरद जी ने हमें लिखा कि उन्होंने मोहित चौहान का नाम उस दिन पहली बार सुना था हमें यकीं है शरद जी अब कभी इस नाम को नहीं भूलेंगे...

सुजॉय - हाँ सजीव, ये स्वाभाविक ही है. जैसा कि उन्होंने खुद भी लिखा कि जिन दिग्गजों को वो सुनते आ रहे हैं उनके समक्ष उन्हें इन गायकों में वो दम नज़र नहीं आता. पर ये भी सच है कि आज की पीढी इन्हीं नए कलाकारों की मुरीद है तो संगीत तो बहता ही रहेगा...फनकार आते जाते रहेंगें...

सजीव - बिलकुल सही....इसलिए ये भी ज़रूरी है कि हम समझें आज के इस नए दौर के युवाओं के दिलों पर राज़ कर रहे फनकारों को भी. तो सुजॉय जैसा कि हमने वादा किया था कि हम मोहित के दो गीत एक के बाद एक सुनवायेंगे, तो आज कौन सा गीत लेकर आये हैं आप मोहित का...कहीं ये वो तो नहीं जो इन दिनों हर किसी की जुबां पर है ?

सुजॉय - बिलकुल सही पहचाना....पहले प्यार का पहला पहला नजराना...

सजीव - पहले प्यार की बहुत अहमियत है जीवन में....कहते हैं प्यार बस एक ही बार होता है....यानी जो पहला है वही आखिरी भी....क्या मैं सही कह रहा हूँ ?

सुजॉय - १९९३ में जब "हम आपके हैं कौन" प्रर्दशित हुई थी तो उसका एक गीत "पहला पहला प्यार है..." इतना लोकप्रिय हो गया था कि युवा दिलों का एक एंथम जैसा बन गया था...कुछ वैसा ही अब है २००९ में आये फिल्म "कमीने" के इस गीत की बात. बहुत कुछ इस दरमियाँ बदल गया बस नहीं बदला तो यही पहला पहला प्यार....जहाँ अब ये मोहर भी लग गयी है कि यही आखिरी प्यार भी है....

सजीव - इस पहले और आखिरी प्यार को अभिव्यक्ति दी है गुलज़ार साहब ने....उनका लेखन सबसे अलहदा है -

याद है पीपल कि जिसके घने साए थे,
हमने गिलहरी के झूठे मटर खाए थे,
ये बरकत उन हज़रत की है...

सुजॉय - हाँ "ख्वाब के बोझ से....पलकों का कंपकपाना" भी बहुत खूब है, एक बात और ये जो शब्द है "टीपना" (गाल पे), ये बंगला में हम लोग बहुत इस्तेमाल करते हैं, पर हिंदी में इस शब्द का अधिक इस्तेमाल नहीं होता, पर गुलज़ार साहब ने यहाँ बहुत बढ़िया ढंग से पिरोया है गाने में.

सजीव - अब कोई ऐसे शब्द लिखे तो हम तारीफ कैसे न करें भाई....पर जितने सुंदर शब्द है उतना ही सूथिंग और मन लुभावना संगीत है विशाल का और इस तरह के गीत मोहित के फोर्टे हैं जैसा कि हम पहले भी बता चुके हैं. पिछली बार हमने श्रोताओं से पुछा था कि मोहित का सबसे पहला गीत कौन सा था.....हमें सही जवाब नहीं मिला....सुजॉय आप बताएं कि सही जवाब क्या था.

सुजॉय - फ़िल्म संगीत में मोहित चौहान ने क़दम रखा एक 'लो बजट' फ़िल्म 'लेट्स एंजोय' में एक गीत गा कर, जिसके शुरूआती बोल थे "सब से पीछे"। इस गीत ने भले ही उन्हे सब से आगे ला कर खड़ा नहीं किया लेकिन उनकी गाड़ी चल पड़ी थी। थोड़े ही समय में उन्होने फ़िल्म 'रोड' का मशहूर गीत "पहली नज़र में करी थी" गा कर रातों रात सब की नज़र में आ गये। उसके बाद तो जे. ओम प्रकाश मेहरा की क्रांतिकारी फ़िल्म 'रंग दे बसंती' में रहमान ने उनसे गवाया ऐसा गीत जिसने बॉलीवुड के पार्श्वगायक समुदाय में हलचल पैदा कर दी। जी हाँ, वह गीत था "ख़ून चला"। ऐसा बिल्कुल नहीं है कि मोहित चौहान को किसी तरह की संघर्ष नहीं करना पड़ा, उन्होने इस संगीत की दुनिया में कई कई बार वापसी की और फिर से गुमनामी में खो गये। लेकिन पिछले कुछ महीनों में उनके गाये हुए गीतों को सुनकर अब ऐसा लगने लगा है कि मोहित भाई साहब यहाँ एक लम्बी पारी खेलने वाले हैं।

सजीव - हाँ बिलकुल, वैसे मुझे उनका गाया फिल्म "मैं मेरी पत्नी और वोह" का "गुंचा कोई" सबसे अधिक पसंद है. पर कमीने का ये गीत भी दोस्तों कुछ कम नहीं है. हालाँकि शुरू के बोलों को सुन कर कुछ कुछ "माँ" गीत जो कि फिल्म "तारे ज़मीन पर" का है उसकी याद आती है पर बाद में गीत का अपना एक मोल्ड बन जाता है. आवाज़ की टीम ने इस गीत को भी दिए हैं ४ अंक ५ में से. अब आप सुनें और बतायें कि आपके हिसाब से इस ताज़ा गीत को कितने अंक मिलने चाहिए.

सुजॉय - हाँ बोल कुछ इस प्रकार हैं -

थोड़े भीगे भीगे से थोड़े नम हैं हम,
कल से सोये वोए भी कम हैं हम,
दिल ने कैसी हरकत की है,
पहली बार मोहब्बत की है...
आखिरी बार मोहब्बत की है....

ऑंखें - डूबी डूबी सी सुरमई मध्यम...
झीलें - पानी पानी बस तुम और हम....
बात बड़ी हैरत की है....
पहली बार.....

ख्वाब के बोझ से कंपकपाती हुई,
हल्की पलकें तेरी, याद आता है सब,
तुझे गुदगुदाना, सताना,
यूहीं सोते हुए,
गाल पे टीपना, मीचना ,
बेवजह, बेसबब...
याद है पीपल कि जिसके घने साए थे,
हमें गिलहरी के झूठे मटर खाए थे...
ये बरकत उन हज़रत की है...
पहली बार....



आवाज़ की टीम ने दिए इस गीत को 4 की रेटिंग 5 में से. अब आप बताएं आपको ये गीत कैसा लगा? यदि आप समीक्षक होते तो प्रस्तुत गीत को 5 में से कितने अंक देते. कृपया ज़रूर बताएं आपकी वोटिंग हमारे सालाना संगीत चार्ट के निर्माण में बेहद मददगार साबित होगी.

क्या आप जानते हैं ?
आप नए संगीत को कितना समझते हैं चलिए इसे ज़रा यूं परखते हैं. गीतकार पियूष मिश्रा ने गुलाल के बाद एक ताजा तरीन फिल्म में एक दिग्गज संगीतकार के साथ काम किया है, कौन सी है ये फिल्म और कौन हैं वो संगीतकार ? बताईये और हाँ जवाब के साथ साथ प्रस्तुत गीत को अपनी रेटिंग भी अवश्य दीजियेगा.

पिछले सवाल का सही जवाब हम दे ही चुके हैं, हमारे श्रोताओं में से कोई इसे सही नहीं पकड़ पाया. पर ख़ुशी इस बात की है कि लगभग सभी श्रोताओं ने रेटिंग देकर हमारा हौंसला बढाया है. जमे रहिये आवाज़ के सगीत सफ़र में यूहीं....


अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं. क्या आप को भी आजकल कोई ऐसा गीत भा रहा है, जो आपको लगता है इस आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए तो हमें लिखे.

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