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Monday, November 4, 2013

जुदा हो गयी सदा के लिए "लंबी जुदाई" देकर गायिका रेशमा

गायिका रेशमा को श्रद्धांजली





"जो फूल यहाँ पर खिल न सके, वो फूल वहाँ खिल जायेंगे, हम इस दुनिया में मिल न सके तो उस दुनिया में मिल जायेंगे" - दोस्तों, कल सुबह जैसे ही गायिका रेशमा के निधन की ख़बर रेडियो पर सुनी तो उनके गाये इस गीत की पंक्ति जैसे कानों में बजने लगी। कहते हैं कि आवाज़ें सरहदों से आज़ाद हुआ करती हैं, रेशमा की आवाज़ भी एक ऐसी आवाज़ रही जिसने कभी भी सरहदों को नहीं माना। चाहे वो कहीं भी रहीं, उनकी आवाज़ ने दुनिया भर की फ़िज़ाओं में ख़ुशबू बिखेरी। उनकी आवाज़ मिट्टी की आवाज़ थी, जिसमें से मिट्टी की भीनी-भीनी सौंधी ख़ुशबू उड़ा करती। 

रेशमा का जन्म यहीं भारत में, राजस्थान में हुआ था और उनका बचपन भी राजस्थान में ही बीता। राजस्थान, जिसकी सीमा पाक़िस्तान के सरहद के बहुत करीब है; आज़ादी के बाद देश के बटवारे के बाद रेशमा सरहद के उस पार चली गईं। रेशमा का ताल्लुख़ बंजारा समुदाय से था जो कभी एक जगह नहीं ठहरता। बंजारे यायावर की तरह भटकते रहते हैं, कभी घर नहीं बनाते, और हर बार नई मंज़िल की तलाश में निकल पड़ते हैं। रेशमा को गायिकी की प्रतिभा अपने समुदाय से विरासत में मिली और वो सुफ़ियाना शैली में गाने लगीं। बचपन से ही रेशमा की आवाज़ में वह कशिश थी कि जब वो कोई आध्यात्मिल या रूहानी रचना गातीं तो लोगों के दिलों में ख़लिश सी पैदा कर देतीं। वो जब भी रूहानी अशार गातीं, वो उसमें डूब सी जातीं और उनकी यह तन्मयता और लगन उनकी आवाज़ में साफ़ छलक आता। रेशमा पढ़ना-लिखना नहीं जानती थीं, लेकिन संगीत की रियाज़ से जो कुछ सीखा है वो पढ़े लिखे लोग भी नहीं सीख पाये।

किसी गुमनान जंगली फूल की तरह महकती रही हैं रेशमा की आवाज़ और एक बार सेहवान में हज़रत कलंदरलाल शाह्बाज़ की दरगाह पर उनकी आवाज़ सुन अक्र जमा हो गए थे लोग। आपको बता दें कि सेहवान पाक़िस्तान का एक छोटा सा शहर है और हज़रत कलंदरलाल शाहबाज़ की दरगाह पर उस दिन शामिल थे पाक़िस्तान रेडियो के एक अधिकारी जिन्होंने रेशमा की आवाज़ सुनी और युं प्रभावित हुए कि रेडियो तक उन्होंने रेशमा की आवाज़ को पहुँचा ही दिया। और इस तरह से बंजारों के समुदाय से निकल कर उनकी आवाज़ रेडियो की तरंगों पर सवार होकर पूरी दुनिया में फैल गई, और लोग उन्हें जानने लगे। "दमादम मस्त कलंदर, अली दा पहला नंबर", "ओ रब्बा दिल आये मुश्किल के", "कौन रूठे यार मनाये", "रब्बा हुण की करिये", "ना दिल देंदी बेदर्दी नु" जैसे गीत बेहद मक़बूल हुए।

80 के दशक में संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने फ़िल्म 'हीरो' में रेशमा से गवाया "लम्बी जुदाई"। यह ग़मज़दा नग़मा जब रिलीज़ हुआ था तो लोगों ने इसे फ़ौरन हाथों-हाथ लिया। इस फ़िल्म के अन्य कई गीत सुपरहिट हुए, पर इस गीत में जो बात है, वह बात किसी अन्य गीत में नहीं। आज इस गीत के बने हुए 30 साल बीत चुके हैं, पर आज भी, जितनी बार भी हम इस गीत को सुनते हैं, कलेजा जैसे चीर कर रख देती है रेशमा की आवाज़। जुदाई के भाव पर बनने वाले तमाम फ़िल्मी गीतों में यह गीत एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इस गीत में जुदाई के दर्द को रेशमा ने जिस तरह से उभारा है, उसे शायद फ़िल्म जगत की नामचीन गायिकायें न उभार सके। यह गीत जैसे ही मक़बूल हुआ, सारी दुनिया भर से उन्हें कॉनसर्ट्स के लिए बुलाया गया, और वो और भी मशहूर हो गईं।


गीतकार और शायर कैफ़ी आज़मी ने एक बार विविध भारती के किसी कार्यक्रम में रेशमा का ज़िक्र करते हुए कहा था - "अचानक एक दिन रेशमा की आवाज़ का झरना हिन्दुस्तान में इस तरह गिरने लगा कि हर म्युज़िक डिरेक्टर और हर नग़मानिगार के दिल में यह ख़्वाहिश जाग उठी कि काश कभी हमारे किसी गीत को यह आवाज़ मिल जाये! वक़्त गुज़रता रहा और भारत का हर सुरा और बेसुरा आदमी रेशमा के गाने गाता रहा। आते आते वह मुबारक़ दिन आ गया जब रेशमा भारत की महमान हुईं। कई म्युज़िक डिरेक्टर और फ़िल्मसाज़ उनके पास यही दरख़्वास्त लेकर पहुँचे कि आप हमारी फ़िल्म के कुछ गाने अपनी आवाज़ में रेकॉर्ड करवा दें। कानूनी मुश्किलों पर काबू पाने के बाद रेशमा ने कुछ गाने गाये भी। उनकी आवाज़ की एक ख़ुसूसियत यह है कि आप आँख बन्द करके सुने तो महसूस होगा कि आप किसी सेहरा में खड़े हैं और दूर से कोई ख़ानाबदोश जादूगरनी आप पर जादू कर रही है। लेकिन इसके लिए यह ज़रूरी है कि गाने के बोल और धुन, दोनों ऐसे हों कि जिन पर रेशमा की आवाज़ पूरी तरह गूंजने और तैरने लगे। म्युज़िक डिरेक्टर लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के डिरेक्शन में रेशमा ने यहाँ एक गाना रेकॉर्ड करवाया, जिसे सुन कर आपको रेशमा का वह मशहूर नग़मा ज़रूर याद आ जायेगा "हायो रब्बा नैयो लगदा दिल मेरा"। यह गाना है "लम्बी जुदाई"।"

करीब दो दशक बाद, साल 2006 में रेशमा भारत आयीं थीं और संगीतकार रूप कुमार राठौड़ के निर्देशन में फ़िल्म 'वह तेरा नाम था' के लिए एक गीत भी रेकॉर्ड करवाया था। गीत के बोल थे "अश्कां दी गली विच मुकाम दे गया"। इस तरह से हिन्दी फ़िल्मों के लिए रेशमा ने केवल दो ही गाये - "लम्बी जुदाई" और "अश्कां दी गली"। पर रेशमा जानी जाती हैं उनकी गाई लोक गीतों के लिए। आज वो भले इस फ़ानी दुनिया से बहुत दूर चली गईं हों, पर उनकी मिट्टी की ख़ुशबू लिए आवाज़ हमेशा इस मिट्टी को सुवासित करती रहेगी। गायिका रेशमा को 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के समूचे परिवार की तरफ़ से भावभीनी श्रद्धांजली, ईश्वर उनकी आत्मा को शान्ति दें!





संदर्भ: रेशमा पर केन्द्रित 'आज के फ़नकार' कार्यक्रम (विविध भारती)

प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी

Tuesday, September 29, 2009

घायल जो करने आए वही चोट खा गए........"गुमनाम" के शब्द और "रेशमा" आपा का दर्द

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #४९

ड़े दिनों के बाद ऐसा हुआ कि महफ़िल में हाज़िरी लगाने के मामले में सीमा जी पिछड़ गईं और महफ़िल का मज़ा कोई और लूट गया। जी हाँ, हम बात कर रहे हैं पिछली महफ़िल की प्रश्न-पहेली की। वैसे अगर शरद जी के लिए कुछ कहना हो तो हम यही कहेंगे कि "बड़े दिनों के बाद उन बेवतनों को याद वतन की मिट्टी आई है।" यूँ तो आप महफ़िल से कभी भी गायब नहीं हुए लेकिन ऐसा आना भी क्या आना कि आने की खबर न हो। वैसे तो हम सीधे-सादे गणित में अंकों का हिसाब लगाया करते हैं, लेकिन इस बार हमने सोचा कि क्यों न अंकों के मायाजाल में थोड़ा उलझा जाए। तो अगर हम ४७वीं कड़ी की प्रश्न-पहेली के अंकों को देखें तो हिसाब कुछ यूँ था: सीमा जी: ४ अंक, शरद जी: २ अंक और शामिख जी: १ अंक। अब हम इन अंकों को एक चक्रीय क्रम में आगे की ओर सरका देते हैं। फिर जो हिसाब बनता है, वही पिछली कड़ी की अंक-तालिका है यानि कि सीमा जी: १ अंक, शरद जी: ४ अंक और शामिख जी: २ अंक। अब बारी है आज के प्रश्नों की| तो ये रहे प्रतियोगिता के नियम और उसके आगे दो प्रश्न: ५० वें अंक तक हम हर बार आपसे दो सवाल पूछेंगे जिसके जवाब उस दिन के या फिर पिछली कड़ियों के आलेख में छुपे होंगे। अगर आपने पिछली कड़ियों को सही से पढा होगा तो आपको जवाब ढूँढने में मुश्किल नहीं होगी, नहीं तो आपको थोड़ी मेहनत करनी होगी। और हाँ, हर बार पहला सही जवाब देने वाले को ४ अंक, उसके बाद २ अंक और उसके बाद हर किसी को १ अंक मिलेंगे। इन १० कड़ियों में जो भी सबसे ज्यादा अंक हासिल करेगा, वह महफ़िल-ए-गज़ल में अपनी पसंद की ५ गज़लों की फरमाईश कर सकता है, वहीं दूसरे स्थान पर आने वाला पाठक अपनी पसंद की ३ गज़लों को सुनने का हक़दार होगा। इस तरह चुनी गई आठ गज़लों को हम ५३वीं से ६०वीं कड़ी के बीच पेश करेंगे। और साथ हीं एक बात और- जवाब देने वाले को यह भी बताना होगा कि "अमुक" सवाल किस कड़ी से जुड़ा है। तो ये रहे आज के सवाल: -

१) एक शायर जिसे जीते-जी अपना एक हीं गज़ल-संग्रह "बर्ग-ए-नै" देखना नसीब हुआ और जिसने पूरी की पूरी छंद में एक नाटिका की रचना की थी। उस शायर और उसकी उस नाटिका के नाम बताएँ।
२) "तीसरा मिसरा कहीं पहले दो मिसरों में गुप्त है"- इस पंक्ति में किस फ़ार्म, किस विधा की बात की जा रही है। और उस फ़ार्म की तख़्लीक़ का श्रेय किसे दिया जाता है?


इन सवालों के बाद चलिए अब रूख करते हैं आज की गज़ल की ओर। आज की गज़ल की खासियत यह है कि इसके शायर गुमनाम हैं तो इसकी गायिका के बारे में लोगों को ज़्यादा कुछ मालूंम नहीं है। यूँ तो इनकी आवाज़ हिन्दुस्तान के कोने-कोने में रवाँ-दवाँ है, लेकिन कितनों को इनकी शख्सियत की जानकारी है, यह पक्के यकीन से नहीं कहा जा सकता। बरसों पहले सुभाष घई साहब की एक फिल्म आई थी "हीरो" जिसका एक गाना बड़ा हीं मक़बूल हुआ। उस गाने की मक़बूलियत का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि अभी पिछले साल हीं रीलिज हुई "ज़न्नत" में एक नगमा उसी गाने पर आधार करके तैयार किया गया था। जी हाँ, हम बात कर रहे हैं "चार दिनों का प्यार ओ रब्बा, बड़ी लंबी जुदाई" गाने की। इस गाने का असर ऐसा हुआ कि चाहे किसी को फिल्म की कहानी या फिल्म के कलाकार याद हों न हों, लेकिन इस गाने और इस गाने में छिपी कशिश की छाप मिटाए नहीं मिटती। कहते है कि जब "रेशमा" जी (यह नाम याद है ना?) को इस गाने के लिए संपर्क किया गया तो वो इस हालत में नहीं थीं कि इसे गा सकें। मतलब कि इन्हें अपनी "पश्तो" ज़बान छोड़कर और कोई भी ज़बान सही से नहीं आती थी और हिंदी/उर्दू के लफ़्ज़ों का सही तलफ़्फ़ुज़ तो इनके लिए दूर की कौड़ी के समान था। लेकिन सुभाष घई साहब और एल०पी० साहबान जिद्द पर अड़े थे कि गाना इन्हीं को गाना है। कई दिनों की मेहनत और न जाने कितने रिहर्सल्स के बाद यह गाना तैयार हो पाया। और जैसा कि कहते हैं कि "रेस्ट इज हिस्ट्री"। वैसे हम भारतीयों और हिंदी-भाषियों के लिए इनकी पहचान यहीं तक सीमित है लेकिन जिन्होंने इनके पंजाबी गाने सुने हैं उन्हें "रेशमा" आपा का सही मोल मालूम है। "शाबाज़ कलंदर" ,"गोरिये मैं जाना परदेस" और "कित्थे नैन न जोरीं" जैसे नज़्मों को सुनने के बाद और कुछ सुनने का दिल हीं नहीं होता। पाकिस्तान के एक अखबार "न्युज लाईन" के संवाददाता "आयेशा जावेद अकरम" के साथ "आपा" ने अपनी ज़िंदगी कुछ यूँ शेयर की: मेरा जन्म राजस्थान के बीकानेर में सौदागरों के एक परिवार में हुआ था। जन्म की सही तारीख मालूम नहीं क्योंकि घरवालों ने इसे याद रखना जरूरी नहीं समझा। वैसे मुझे इतना मालूम है कि देश के बंटवारे के समय मैं एक या दो महीने की थी और उसी दौरान मेरे परिवार का हिन्दुस्तान से पाकिस्तान जाना हुआ था। जब मेरा परिवार हिन्दुस्तान में था तो हम बीकानेर से देश के दूसरे कोनों में ऊँट ले जाया करते थे(क्योंकि हमारे यहाँ के ऊँट बड़े मशहूर थे) और उन जगहों से गाय-बकरियाँ लाकर अपने यहाँ व्यापार करते थे। हमारा समुदाय बहुत बड़ा था और हम खानाबदोशों की ज़िंदगी जिया करते थे। आपस में हममे बड़ा प्यार था। पाकिस्तान जाने के बाद भी यही सब चलता रहा। वैसे हममें से बहुत सारे अब लाहौर और करांची में बस गए हैं।

बहुत कम लोगों को यह मालूम होगा कि "आपा" को नाक की हड्डी का कैंसर हुआ था। लेकिन उनके आत्म-विश्वास और उनके प्रशंसकों की दुआओं ने उन्हें वापस ठीक कर दिया। इस बारे में वो कहती हैं: क्या मैं आपको बीमार लगती हूँ? नहीं ना? फिर क्यों मेरे बारे में लोग लिखते रहते हैं कि मैं मर रही हूँ। हाँ, मुझे कैंसर था, लेकिन भला हो इमरान खान का, जिनके अस्पताल के डाक्टरों के इलाज से मेरा रोग जाता रहा। लेकिन मुझे मालूम नहीं कि इन अखबार वालों के साथ क्या दिक्कत है कि वे हमेशा मेरे खराब स्वास्थ्य के बारे में छापते रहते हैं और इसी कारण अब मेरे पास गाने के न्योते नहीं आते। अब आप बताएँ, बस ऐसे गुजारा होता है? मैं आपको यकीन दिलाती हूँ कि मैं दुनिया की किसी भी भाषा में गा सकती हूँ। इस खूबी में मेरा कोई योगदान नहीं है। सब ऊपर वाले का करम है, उसी ने मुझे ऐसी आवाज़ दी है। संगीत के सफ़र की शुरूआत कैसे हुई, यह पूछने पर उनका जवाब था: मैं हमेशा दरगाहों, मज़ारों और मेलों में गाया करती थी। एक बार इसी तरह मैं अपने किसी संबंधी की शादी में गा रही थी तो सलीम गिलानी साहब ने मुझे सुना और मुझे रेडियो पर गाने की सलाह दी। उस समय मेरी उम्र कोई ११-१२ साल की होगी। फिर तो मेरी नई कहानी हीं शुरू हो गई। "ओ रब्बा, दो दिनां दा मेल, ओथे फिर लंबी जुदाई"(यह गाना आपको सुना-सुना नहीं लग रहा, हीरो की "लंबी जुदाई" कहीं इसी की नकल तो नहीं है?) जैसे गाने घर-घर में सुने जाने लगे और इस तरह मैं धीरे-धीरे आगे बढती गई। भले हीं मेरा बहुत नाम था और अब भी है लेकिन इस दौरान मैने अपनी हया कायम रखी है और किसी भी तरह का कोई समझौता नहीं किया है। दैनिक भास्कर में "आपा" से जुड़ा एक बड़ा हीं अनोखा किस्सा छपा था। आप भी देखें: यूं तो मलिका पुखराज को काफ़ी आत्म-केंद्रित व्यक्ति माना जाता था, मगर उनकी ज़िंदगी की कुछ ऐसी मार्मिक घटनाएं हैं, जिनसे उनके अंदर का इंसान उभरकर बाहर आ जाता है। अपने पति शब्बीर शाह की मृत्यु के बाद मलिका अंदर से ही टूट गईं। एक दिन उन्होंने गायिका रेशमा का गाया एक गीत "हैयो रब्बा! दिल लगदा नैयों मेरा" सुन लिया। रेशमा ख़ुद मलिका जी की बहुत भक्त थीं। मलिका जी ने उन्हें बुलवा भेजा। कहा कि वे एक ह़फ्ते उनके साथ उनके घर रुक जाएं और उन्हें यही गीत गा-गाकर सुनाएं। रेशमा ने इसे अपना सम्मान माना और ठहर गईं। अब दिन में कई बार रेशमा से गाने की फरमाइश होती। रेशमा गातीं और मलिका फूट-फूटकर रोना शुरू कर देतीं। इस क्रम से रेशमा डर गईं। हाथ जोड़े कि अब बस भी करें। मगर मलिका रोना चाहती थीं। सो रेशमा ने ख़ूब गाया और वे भी ख़ूब रोईं। यह आपा की आवाज़ में बसे दर्द का हीं असर था कि आँसू बरबस निकल पड़े। "आपा" के बाद अब बात करते हैं आज की गज़ल के गज़लगो की। सुरेन्द्र मलिक "गुमनाम" साहब के बारे में अंतर्जाल पर ज्यादा जानकारी उपलब्ध नहीं है। इसलिए अभी हम इन दो शेरों के अलावा कुछ और कह नहीं सकेंगे। वैसे यह तो ज़ाहिर है कि इन शेरों को लिखने वाला शायर "गुमनाम" हीं रहा और इसे गाकर जगजीत सिंह जी कहाँ से कहाँ पहुँच गए। है ना?:

काँटों की चुभन पाई, फूलों का मज़ा भी,
दिल दर्द के मौसम में रोया भी हँसा भी।

आने का सबब याद ना जाने की खबर है,
वो दिल में रहा और उसे तोड़ गया भी।


और यह रही आज़ की गज़ल, जिसे हमने "दर्द" एलबम से लिया है। तो आनंद लीजिए हमारी आज की पेशकश का:

लो दिल की बात आप भी हमसे छुपा गए,
लगता है आप गैरों की बातों में आ गए।

मेरी तो इल्तजा थी रक़ीबों से मत मिलो,
उनके बिछाए जाल में लो तुम भी आ गए।

ये इश्क़ का सफ़र है मंज़िल है इसकी मौत,
घायल जो करने आए वही चोट खा गए।

रोना था मुझको उनके दामन में ज़ार-ज़ार,
पलकों के मेरे अश्क उन्हीं को रूला गए।

"गुमनाम" भूलता नहीं वो तेरी रहगु़ज़र,
जिस रहगुज़र से प्यार की शम्मा बुझा गए।




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

____ करने की हिम्मत नहीं होती सब में
और कुछ दिन यूँ ही औरों को सताया जाये


आपके विकल्प हैं -
a) ख़ुदकुशी, b) बेदिली, c) दिल्लगी, d) बेरुखी

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "तेशे" और शेर कुछ यूं था -

मुसीबत का पहाड़ आख़िर किसी दिन कट ही जायेगा
मुझे सर मार कर तेशे से मर जाना नहीं आता...

यगाना चंगेजी साहब के लिखे इस शेर को सबसे पहले सही पहचाना शामिख जी ने। आप बहुत दिनों के बाद समय पर हाज़िर हुए हैं। वैसे महफ़िल में पहली हाज़िरी तो निर्मला जी ने लगाई थी। निर्मला जी, आपको हमारी महफ़िल पसंद आ रही है, इसके लिए हम आपका तहे-दिल से शुक्रिया अदा करते हैं। लेकिन यह क्या, आपने तो शब्द/शेर-पहेली में हिस्सा हैं नहीं लिया। हमारी महफ़िल में कोई ऐसे खाली हाथ नहीं आता, आगे से इस बात का जरूर ध्यान रखिएगा :) । शरद जी, आपसे भी यही शिकायत है।

तो हाँ, हम बात कर रहे थे शामिख जी के शेरों की, तो यह रही आपकी पेशकश:

हमसुख़न तेशे ने फ़रहाद को शीरीं से किया
जिस तरह का भी किसी में हो कमाल अच्छा है। (चचा ग़ालिब)

हाँ इश्क़ मेरा दीवाना ये दीवाना मस्ताना
तेशे को बना कर अपना क़लम लिखेगा नया फ़साना (अनाम)

जहाँ शरद जी इस बार स्वरचित शेरों के मामले में पिछड़ गए, वहीं मंजु जी ने अपना पलड़ा हल्का नहीं होने दिया। बानगी देखिए:

सैकड़ों तेशे चलाए थे नींव के लिए ,
चिन्नी थी दीवार इमारत के लिए . (हमारे हिसाब से यहाँ चुननी थी, होना चाहिए था)

इस बार हमारी महफ़िल बड़ी जल्दी हीं सिमट गई। शायद इसे किसी की नज़र लग गई है। तो हम चले नज़र उतारने का इंतजाम करने। तब तक आप महफ़िल में सबसे आखिर में हाज़िर होने वालीं सीमा जी के शेरों का मज़ा लें। खुदा हाफ़िज़!

एक हुआ दीवाना एक ने सर तेशे से फोड़ लिया
कैसे कैसे लोग थे जिनसे रस्म-ए-वफ़ा की बात चली (मुनिर नियाज़ी)

तेशे बग़ैर मर न सका कोह्‌कन असद
सर्‌गश्‌तह-ए ख़ुमार-ए रुसूम-ओ-क़ुयूद था! (अनाम)

कोह-ए-गम और गराँ, और गराँ और गराँ
गम-जूड तेशे को चमकाओ कि कुछ रात कटे (मखदूम मुहीउद्दीन)

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

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