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Saturday, December 26, 2015

2015 के कमचर्चित सुरीले गीतों की हिट परेड - The Unsung Melodies of 2015



चित्रशाला - नववर्ष विशेष 

2015 के कमचर्चित सुरीले गीतों की हिट परेड

The Unsung Melodies of 2015





रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! प्रस्तुत है फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत के विभिन्न पहलुओं से जुड़े विषयों पर आधारित शोधालेखों का स्तंभ ’चित्रशाला’। वर्ष 2015 हमसे विदा लेना चाहता है। और इसी वर्ष के समाप्त होने से इस दशक का पूर्वार्ध भी समाप्त हो जाएगा। इस दशक में फ़िल्म संगीत का जो स्वरूप अब अक हम सबसे देखा, उससे यही कहा जा सकता है कि वही गाने हिट हो रहे हैं, या उन्हीं गानों को बढ़ावा मिल रहा है जिनमें कोई पंच लाइन, या आइटम वाली बात, और इस तरह का कोई मसाला हो। हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी कुछ ऐसे गुमनाम गीत आए जिनकी तरफ़ किसी का भी ध्यान नहीं गया, पर स्तर की दृष्टि से ये गीत बहुत से लोकप्रिय और हिट गीतों के मुकाबले कहीं अधिक उत्कृष्ट हैं। ऐसे ही दस गीत को चुन कर आज के ’चित्रशाला’ का यह नववर्ष विशेषांक प्रस्तुत कर रहे हैं। तो पेश है वर्ष 2015 का कमचर्चित हिट परेड, The Top-10 Unsung Melodies of 2015.


10: "साईं बाबा के दरबार आ शीष झुका ले" (साईं महिमा)

एक समय था जब सामाजिक फ़िल्मों के साथ-साथ पौराणिक व धार्मिक फ़िल्मों का जौनर भी काफ़ी लोकप्रिय हुआ करता था। भले ऐसे फ़िल्मों को ज़्यादा व्यावसायिक सफलता ना मिला करता हो, पर इन फ़िल्मों का अलग दर्शक-समूह होता है, सिनेमाघरों में ये फ़िल्में लगती थीं। धीरे-धीरे धार्मिक फ़िल्मों का जौनर लगभग समाप्त हो चुका है, बस इक्का-दुक्का फ़िल्में आ जाती हैं कभी कभार। और जहाँ तक भक्ति रचनाओं का सवाल है, तो सूफ़ी श्रेणी की कुछ भक्तिमूलक क़व्वालियाँ ज़रूर फ़िल्मों में सुनने को मिल जाती हैं आजकल। वर्ष 2015 में ’साईं महिमा’ और ’गौड़ हरि दर्शन’ नामक दो फ़िल्में बनी हैं, पर ये फ़िल्में कब आईं कब गईं कुछ पता नहीं चला। ना किसी सिनेमाघर में ये फ़िल्में लगीं और ना इनके गीत रेडियो पर सुनने को मिले। बस यू-ट्युब पर निर्माता ने अपलोड कर दिए हैं। तो लीजिए प्रस्तुत है ’2015 कमचर्चित हिट परेड’ के पायदान नंबर 10 पर फ़िल्म ’साईं महिमा’ की एक भक्ति रचना, जिसे हिमांशु शर्मा ने गाया और स्वरबद्ध किया है, और इसे लिखा है प्रदीप शर्मा ने।




9: "सज के चली है भारत माँ" (जय जवान जय किसान)

जावेद अली
भक्ति रचनाओं की तरह देशभक्ति रचनाओं का भी अकाल पड़ चुका है हिन्दी फ़िल्म- संगीत संसार में। इस सूखे संसार को हरा-भरा करने हेतु मदन लाल खुराना, सीमा चक्रवर्ती और पंकज दुआ जैसे निर्माता सामने आए और बनाई ’जय जवान जय किसान’। ओम पुरी, प्रेम चोपड़ा, रति अग्निहोत्री जैसे वरिष्ठ अभिनेता भी इस फ़िल्म को नहीं बचा सके। संगीतकार रूपेश गिरिश का संगीत भी अनसुना रह गया। इस फ़िल्म के जिस गीत को हमने इस हिट परेड के पायदान नंबर 9 के लिए चुना है, उसकी ख़ास बात यह है कि यह आपको मनोज कुमार की बहुचर्चित देशभक्ति फ़िल्म ’पूरब और पश्चिम’ के मशहूर गीत "बहन चली, दुल्हन चली, तीन रंग की चोली" की याद दिला जाएगी। किशन पालिवाल के लिखे और जावेद अली की आवाज़ में इस गीत के बोलों "देश प्रेम के गहनों से सज के चली है भारत माँ" की समानता ’पूरब और पश्चिम’ के उस गीत से देखी जा सकती है। कुल मिला कर यह एक कर्णप्रिय रचना है, कम से कम वाद्यों का प्रयोग हुआ है और उससे भी बड़ी बात यह कि किसी कृत्रिम यांत्रिक संगीत का बोलबाला नहीं है इस गीत में।




8: "माँ सुन ले ज़रा " (Take it Easy)

सोनू निगम
भारत माँ के बाद अब एक और माँ के लिए एक बेटे के दिल की पुकार पेश है। धार्मिक और देशभक्ति फ़िल्मों के बाद अब जिस जौनर की हम बात करने जा रहे हैं, वह है बाल फ़िल्मों की, और इस जौनर की भी क्या दशा, ज़्यादा कुछ कहने की आवश्यक्ता नहीं है। ’तारे ज़मीन पर’ जैसी फ़िल्में रोज़ नहीं बनती। 2015 में एक बाल-फ़िल्म आई ’Take it Easy'। इसमें मुख्य चरित्रों में दो दस वर्षीय बालक हैं। एक के पिता खिलाड़ी है और वो चाहते हैं कि उनका बेटा उनकी तरह खिलाड़ी बने जबकि बेटे को पढ़ाई-लिखाई में ज़्यादा रुचि है। दूसरी तरफ़ दूसरे लड़के की कहानी बिल्कुल विपरीत है। उसके माता-पिता अपने सपनों को उस पर थोपना चाहते हैं जबकि बेटे को कुछ और ही करना है। ऐसे में बेटा क्या करे! इस परिदृश्य में प्रस्तुत गीत सार्थक है जिसमें बेटा माँ से कह रहा है कि "दिल पे उम्मीदों का बोझ, कुछ माँगे हर कोई रोज़, हँसी मेरी कहीं छुप गई, कहानी कहीं रुक गई, माँ सुन ले ज़रा, कहता है क्या यह दिल मेरा"। सोनू निगम की आवाज़ ने गीत को काफ़ी असरदार बना दिया है। सुनिल प्रेम व्यास, सुशान्त पवार और अमोल पावले के लिखे इस गीत को संगीत से संवारा है सुशान्त-किशोर ने।




7: "इश्क़ फ़ोबिया" (युवा)

इरफ़ान
जसबीर भट्टी लिखित व निर्देशित फ़िल्म ’युवा’ भी बॉक्स ऑफ़िस पर पिट गई। लेकिन इसके गीतों में दम ज़रूर था। फ़िल्म में संगीत देने के लिए चार संगीतकार लिए गए। यह आजकल फ़िल्मों में एकाधिक संगीतकार का ट्रेन्ड चल रहा है, और यह फ़िल्म व्यतिक्रम नहीं। राशिद ख़ाँ, पलक मुछाल, हनीफ़ शेख और प्रवीण-मनोज इस फ़िल्म के संगीतकार हैं और भूपेन्द्र शर्मा ने गीत लिखे हैं। फ़िल्म के तमाम गीतों में एक गीत है मोहम्मद इरफ़ान का गाया हुआ जिसने हमारा ध्यान आकर्षित किया। ये वही इरफ़ान हैं जिन्होंने ’जो जीता वो ही सुपरस्टार’ का ख़िताब जीता था और ’अमूल स्टार वॉयस ऑफ़ इण्डिया’ और ’सा रे गा मा पा’ के जानेमाने प्रतियोगी रहे। मेलडी, रोमान्स और सुफ़ियाना अंदाज़, कुल मिलाकर इस गीत को अच्छी तरह से स्वरबद्ध किया गया है, पर सबसे अच्छी बात है इसके अंतरों के बोल। गीत फ़िल्म में दो बार है, एक बार इरफ़ान की एकल आवाज़ में और एक बार पलक मुछाल और भानु प्रताप की युगल आवाज़ों में।



6: "एक हथेली तेरी हो, एक हथेली मेरी हो" (इश्क़ के परिन्दे)

केका घोषाल
पिछले दौर के गायकों में अगर कोई गायक आज टिका हुआ है तो वो हैं सोनू निगम। आजे के नवोदित गायकों की भीड़ में सोनू निगम आज भी अपने आप को एक अलग मुकाम पर बनाये रखा है और हर साल उनके कुछ अच्छे गीत सुनने को मिलते हैं। केका घोषाल के साथ सोनू निगम के इस युगल गीत के बोल और संगीत दोनों बहुत सुरीले हैं और एक कर्णप्रिय गीत की जितनी विशेषताएँ होती हैं, वो सब मौजूद हैं। हालाँकि इस गीत की धुन में ज़्यादा नई बात नहीं है और इस तरह की धुन पहले भी सुनाई दी है कई बार, पर एक ताज़गी ज़रूर है जिसकी वजह से इस गीत को सुनना अच्छा लगता है। इस गीत में पारम्परिक और समकालीन वाद्यों का संगम सुनने को मिलता है। एक तरफ़ बाँसुरी है तो दूसरी तरफ़ है गिटार। कई लोगों ने यह धारणा बना ली है कि केका घोषाल गायिका श्रेया घोषाल की बहन है, पर यह तथ्य ग़लत है। इन दोनों का कोई रिश्ता नहीं है संगीत के अलावा। केका घोषाल भी ’सा रे गा मा पा’ से रोशनी में आईं हैं। लीजिए इस गीत सुनिए, पर उससे पहले आपको यह बता दें कि इस गीत का एक सैड वर्ज़न भी है सोनू निगम की आवाज़ में और एक और रीमिक्स वर्ज़न है विजय वर्मा और सुप्रिया पाठक की आवाज़ों में।



5: "हमारी अधुरी कहानी" (हमारी अधुरी कहानी)

अरिजीत सिंह
कुछ अभिनेताओं के साथ ऐसा अक्सर हुआ है कि उनकी फ़िल्मों के गानें हमेशा अच्छे हुए हैं। उदाहरण के तौर पर पुराने समय में शम्मी कपूर और राजेश खन्ना की सभी फ़िल्मों के गाने हिट हुआ करते थे चाहे फ़िल्म चले ना चले। आगे चलकर सलमान ख़ान की फ़िल्मों के गाने हिट होते रहते थे। और इस दौर की अगर हम बात करें तो इमरान हाश्मी एक ऐसे अभिनेता हैं जिनकी फ़िल्मों का संगीत ख़ूब चला। 2015 में इमरान हाश्मी और विद्या बालन अभिनीत एक फ़िल्म आई ’हमारी अधुरी कहानी’। फ़िल्म का शीर्षक इमरान हाश्मी अभिनीत फ़िल्म ’गैंगस्टर’ के एक गीत "भीगी भीगी सी है रातें भीगी भीगी" के मुखड़े के अन्तिम तीन शब्द ही हैं। ’हमारी अधुरी कहानी’ मोहित सुरी निर्देशित फ़िल्म है, इसलिए इस फ़िल्म के गीत-संगीत से लोगों को उम्मीदें थीं, मोहित सुरी को अच्छे संगीत की परख जो है। फ़िल्म तो नहीं चली पर इसके गीत-संगीत ने निराश नहीं किया। फ़िल्म के कुल पाँच गीतों के हर गीत में कुछ ना कुछ ख़ास बात है। ’कमचर्चित हिट परेड’ के पायदान नंबर 5 के लिए हमने इस फ़िल्म का शीर्षक गीत ही चुना है जिसे अरिजीत सिंह ने गाया है। रश्मी विराग के लिखे और जीत गांगुली द्वारा स्वरबद्ध इस गीत का स्तर आजे के दौर के आम गीतों से काफ़ी उपर है। प्रेम और विरह के भावों को व्यक्त करता यह गीत सुनने वाले के मन पर असर ज़रूर करता है। और एक बार सुनने के बाद लूप में सुनने का मन होता है। कम से कम साज़ों का इस्तमाल, सुरीली धुन, मनमोहक गायकी, असरदार बोल, कुल मिलाकर यह भावुक गीत इस ऐल्बम का श्रेष्ठ गीत है।





4: "तू, मेरे सारे इम्तिहानों के जवाब तू" (दम लगाके ह‍इशा)


अनु और सानू
वर्ष 2015 हिन्दी सिने संगीत के लिए एक उल्लेखनीय वर्ष माना जा सकता है क्योंकि इस वर्ष पुनरागमन हुआ तीन कलाकारों का जिन्होंने 90 के दशक में काफ़ी धूम मचाई थी। ये हैं संगीतकार अनु मलिक, गायक कुमार सानू और गायिका साधना सरगम। जी हाँ, ’दम लगाके ह‍इशा’ फ़िल्म में अनु मलिक ने 90 के उसी सुरीले रोमान्टिक दौर को वापस लाने की कोशिश की है, और इसमें वो कामयाब भी रहे हैं। इस फ़िल्म में कुल छह गीत हैं जिनमें कुमार सानू का एकल गीत "तू..." और कुमार-सानू-साधना सरगम के युगल गीत "दर्द करारा" ख़ास उल्लेखनीय हैं। ख़ास कर "तू..." तो शायद पिछले दस वर्षों के तमाम श्रेष्ठ रोमान्टिक गीतों में से एक है। और ऐसे गीतों के लिए ही तो कुमार सानू जाने जाते रहे हैं। इस गीत में हमें निराश नहीं करते और इस गीत को सुनते हुए हम उसी 90 के दशक में पहुँच जाते हैं। किसी को अपने स्कूल या कॉलेज के दिन याद आते हैं, तो किसी को अपने दफ़्तर-जीवन के दिन। निस्संदेह यह गीत इस ऐल्बम का श्रेष्ठ गीत है। इसके बारे में ज़्यादा कुछ कहने की आवश्यक्ता नहीं, बस सुनिए...



3: "भोर भयी और कोयल जागे" (बेज़ुबान इश्क़)

ओस्मान मीर
कुछ गीत आज ऐसे भी बन रहे हैं जिहें सुनते हुए मन में यह उम्मीद जागती है कि शायद सुरीले और अच्छे गीतों का दौर अभी समाप्त नहीं हुआ है। इस हिट परेड के तीसरे पायदान के लिए हमने जो गीत चुना है वह है ’बेज़ुबान इश्क़’ फ़िल्म का "भोर भयी और कोयल जागे"। जी नहीं, इस गीत का ’सत्यम शिवम सुन्दरम्’ के "भोर भयी पनघट पे" के साथ कोई समानता नहीं है। इसे राजस्थानी लोक गायक ओस्मान मीर ने गाया है। ओस्मान मीर के लोक गीत लोकप्रिय रहे हैं। प्राकृतिक सुन्दरता को दर्शाता यह गीत भी उतना ही सुन्दर है। राजस्थान की मिट्टी की ख़ुशबू लिए यह गीत ना केवल एक लोक गीत है बल्कि इसमें भक्ति रस का भी एक पुट है। फ़िल्म की नायिका स्नेहा उल्लाल के एन्ट्री सॉंग् के रूप में इस गीत को रखा गया है। स्नेहा ने इसमें एक श्रद्धालु का चरित्र निभाया है। इस गीत में प्रस्तुत ध्वनियाँ और वाद्य तरंगें इतने कर्णप्रिय हैं कि सुबह सुबह सुन कर मन-मस्तिष्क पवित्रा हो जाता है। बाँसुरी, घण्टियों और शंख की ध्वनियों से गीत की आध्यात्मिक्ता और भी निखर कर सामने आई है। ’बेज़ुबान इश्क़’ फ़िल्म के अन्य गीत भी सुनने लायक है, पर प्रस्तुत गीत सबसे ज़्यादा ख़ास है। रूपेश वर्मा के संगीत निर्देशन में इस गीत को लिखा है यशवन्त गंगानी ने।



2: "आजा मेरी जान" (I Love NY)

पंचम
'2015 कमचर्चित हिट परेड’ के शीर्ष के दो गीत ऐसे हैं जिनसे सीधे सीधे जुड़े हैं फ़िल्म-संगीत संसार के दो दिग्गज, दो स्तंभ, दो किंवदन्ती, जिनकी तारीफ़ में कुछ कहना सूरज को दीया दिखाना है। इनमें जो पहला नाम है, उन्हीं का स्वरबद्ध गीत है इस हिट परेड के दूसरे पायदान का गीत। और ये शख़्स हैं राहुल देव बर्मन, हमारे पंचम दा। आश्चर्य हो रहा है आपको? आपको याद होगा 1993 में एक फ़िल्म आई थी ’आजा मेरी जान’, जिसमें अमर-उत्पल का संगीत था। इसमें गुल्शन कुमार ने अपने भाई कृषण कुमार को लौन्च करने के लिए एक गीत राहुल देव बर्मन के कम्पोज़िशन का भी रखा था। उन्हीं दिनों अनुराधा पौडवाल चाहती थीं कि पंचम उनके गाये आठ गीतों के एक ऐल्बम के लिए संगीत तैयार करे। और उन्हीं गीतों में से एक गीत था "आजा मेरी जान", जिसे गुल्शन कुमार ने फ़िल्म ’आजा मेरी जान’ में इस्तमाल किया। इसे अनुराधा पौडवाल और एस. पी. बालसुब्रह्मण्यम ने गाया था। पर इसे फ़िल्म के साउण्डट्रैक में नहीं रखा गया और जो ऐल्बम लोगों के हाथ आया उसमें केवल अमर-उत्पल के स्वरबद्ध गीत ही थे। इस तरह से पंचम का यह गीत गुमनाम ही रह गया (हालाँकि बांगला में पंचम की आवाज़ में इस धुन पर आधारित गीत काफ़ी लोकप्रिय रहा)। 2015 की फ़िल्म ’I Love NY' में इस गीत को DJ फुकन ने बड़ी ख़ूबसूरती से अरेंज कर मौली दवे से गवाया है। गीत के बोल लिखे हैं मयुर पुरी ने। मौली की थोड़ी कर्कश (husky) आवाज़ ने गीत में एक कामुक पुट जोड़ा है। आर. डी. बर्मन के नाम इस हिट परेड का दूसरा पायदान!



1: "जीना क्या है जाना मैंने" (Dunno Y2 - Life is a Moment)

लता मंगेशकर
अभी हमने दो दिग्गज कलाकारों का उल्लेख किया था, जिनमें एक हैं राहुल देव बर्मन, जिनका गीत अभी हमने सुना। दूसरी किंवदन्ती हैं स्वर-साम्राज्ञी, भारतरत्न लता मंगेशकर। यह किसी विस्मय, किसी आश्चर्य से कम नहीं कि 86 वर्ष की आयु में लता जी ने किसी फ़िल्म में गीत गाया है, वर्ष 2015 के हिट परेड में लता जी का गाया गीत शामिल हो रहा है। 1945 में लता जी ने ’बड़ी माँ’ फ़िल्म में "माता तेरी चरणों में" गीत गाया था, और उससे 70 वर्ष बाद भी उनका गाया नया गीत रिलीज़ हो रहा है। वर्ष 2010 में 'Dunno Y - Na Jaane Kyun' फ़िल्म का शीर्षक गाने के बाद जब 2015 में इस फ़िल्म का सीकुइल बना ’'Dunno Y - Life is a Moment' के शीर्षक से, तब संगीतकार निखिल कामत ने इसमें भी लता जी से गीत गवाने की इच्छा व्यक्त की। गीत लिखा है विमल कश्यप ने। इसी फ़िल्म में सलमा आग़ा ने भी एक गीत गाया है पर उस गीत को सुन कर ऐसा लगता है कि सलमा आग़ा के स्तर की गायिका के लिए यह गीत ज़रा हल्का हो गया है। ख़ैर, हम लता जी के गीत की बात कर रहे थे। आप सुनिए यह गीत और इस हिट परेड को समाप्त करने की मुझे दीजिए अनुमति। नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ मैं, सुजॉय चटर्जी, प्रस्तुति सहायक कृष्णमोहन मिश्र के साथ आपसे विदा लेता हूँ, नमस्कार!




तो यह थी नववर्ष की हमारी विशेष प्रस्तुति। आशा है आपको हमारी यह कोशिश पसन्द आई होगी। अपनी राय टिप्पणी में ज़रूर लिखें। चलते चलते हाप सभी को नववर्ष की एक बार फिर से शुभकामनाएँ देते हुए विदा लेता हूँ, नमस्कार।



प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र

Saturday, January 3, 2015

"तुझे देखा तो यह जाना सनम..." - 1000 सप्ताह पूर्ति पर DDLJ के इस गीत से जुड़ी कुछ बातें


एक गीत सौ कहानियाँ - 49
 

तुझे देखा तो यह जाना सनम...’




'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के मंच पर प्रकाशित और प्रसारित होने वाले साप्ताहिक स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ' के सभी श्रोता-पाठकों को नये वर्ष 2015 की पहली कड़ी में सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 49वीं कड़ी में आज जानिये 1995 की फ़िल्म 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे’ के गीत "तुझे देखा तो यह जाना सनम..." के बारे में। इस फ़िल्म ने पिछले दिनों 1000 सप्ताह पूरे किये हैं, मुम्बई के ’मराठा मन्दिर’ सिनेमाघर में।



हिन्दी सिनेमा के इतिहास के सुनहरे पन्नों में जिन फ़िल्मों का शुमार होता है, उनमें से एक हैं ’दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे’, जिसे हम और आप प्यार से DDLJ कह कर बुलाते हैं। 1995 में प्रदर्शित इस फ़िल्म ने आज 1000 सप्ताह पूरे कर लिए हैं मुम्बई के ’मराठा मन्दिर’ सिनेमा घर में। पिछले 19 वर्षों से यह फ़िल्म लगातार हर रोज़ प्रदर्शित होती चली आई है इस थिएटर में जो अपने आप में एक रेकॉर्ड है। इस फ़िल्म की हर बात निराली है, हर पहलू सुपरहिट है, और उनमें संगीत भी एक ख़ास महत्व है। यूँ तो यश चोपड़ा की फ़िल्मों का संगीत हमेशा से ही सर चढ़ कर बोलता रहा है, पर DDLJ के गीतों ने तो लोकप्रियता की सारी हदें पार कर दी है। फ़िल्म के सातों गीत सूपर-डूपर हिट और एक से बढ़ कर एक। इनमें से कौन सा गीत उपर है और कौन सा नीचे, यह तय पाना आसान काम नहीं है। भले ही फ़िल्म के संगीतकार जतिन-ललित के लिए यह फ़िल्म किसी वरदान से कम नहीं थी, पर दुर्भाग्यवश उस साल का फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड ए. आर. रहमान की झोली में चला गया फ़िल्म ’रंगीला’ के लिए। DDLJ के अलावा अन्य नामांकन थे ’अकेले हम अकेले तुम’, ’राजा’ और ’करण अर्जुन’। पर जतिन-ललित को DDLJ के लिए लोगों का इतना ज़्यादा प्यार मिला कि जो हर पुरस्कार से बढ़ कर था। और हाल ही में BBC Asia ने एक मतदान करवाया जिसमें लोगों से सर्वश्रेष्ठ हिन्दी म्युज़िकल फ़िल्म के लिए अपना मत व्यक्त करने को कहा गया। इस मतदान के आख़िरी चरण में कुल 40 फ़िल्मों का चयन हुआ जिनमें ’मुग़ल-ए-आज़म’, ’तीसरी मंज़िल’, ’गाइड’, ’दिलवाले दुल्हनिआ ले जायेंगे’, ’कुछ कुछ होता है’ आदि फ़िल्में थीं, और जिस फ़िल्म को सर्वश्रेष्ठ म्युज़िकल फ़िल्म का ख़िताब मिला, वह फ़िल्म थी ’दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे।

यश चोपड़ा DDLJ से पहले की फ़िल्मों में संगीतकार शिव-हरि से संगीत तैयार करवा रहे थे। ’सिलसिला’, ’फ़ासले’, ’विजय’, ’लम्हे’, ’चाँदनी’ और ’डर’ जैसी फ़िल्मों में इनके संगीत थे। इन तमाम फ़िल्मों में या तो लोक धुनों पर आधारित गीतों की गुंजाइश थी या फिर इन फ़िल्मों के नायक-नायिका थोड़े से उम्रदराज़ थे, यानी कि थोड़े से वयस्क। लेकिन DDLJ की कहानी बिल्कुल अलग थी। इसमें नायक-नायिका बिल्कुल जवान, और यूरोप में पले बढ़े हैं; ऐसे में फ़िल्म का गीत-संगीत भी उसी अंदाज़ का होना चाहिए, इस बात को ध्यान में रखते हुए यश चोपड़ा ने संगीतकार जतिन-ललित को साइन करने का फ़ैसला किया। मेलडी में विश्वास रखने वाले यश जी जतिन-ललित के संगीत को सुन चुके थे और उस समय जतिन-ललित की जुबान पर मेलडियस संगीत चारों ओर धूम मचा रही थी। ’यारा दिलदारा’, ’जो जीता वही सिकन्दर’, ’खिलाड़ी’, ’राजू बन गया जेन्टलमैन’, और ’कभी हाँ कभी ना’ जैसी फ़िल्मों में सुपरहिट संगीत देकर जतिन-ललित शीर्ष के संगीतकारों की श्रेणी में जा बैठे थे। पर जब ’यशराज फ़िल्म्स’ की तरफ़ से उन्हें DDLJ में संगीत देने का मौका मिला तो उनकी ख़ुशी का ठिकाना न रहा, जिसके दो मुख्य कारण थे। एक तो यह कि यश चोपड़ा की फ़िल्म में संगीत देना ही अपने आप में एक अहम सम्मान है, और दूसरा यह कि इस फ़िल्म में उन्हें लता मंगेशकर के साथ काम करने का मौका मिलेगा (लता जी के साथ जतिन-ललित की यह पहली फ़िल्म थी)। जतिन-ललित ने अपने एक इन्टरव्यू में यह कहा है कि इस फ़िल्म के गीतों को बनाते समय उन्होंने यह सोचा भी नहीं था कि ये गानें इतने ज़्यादा लोकप्रिय हो जायेंगे। फ़िल्म के सभी के सभी गीत कैसे इतने अच्छे बन गए यह उन्हें भी नहीं पता। ललित पंडित ने कहा है कि इस फ़िल्म के गीतों को पहले लिखा गया है और उसके बाद उनकी धुनें बनी हैं। गीतों के इन्टरल्यूड म्यूज़िक को रिचार्ड मित्र, अरेंजर बाबुल और ललित पंडित ने बनाया था।

और अब आते हैं "तुझे देखा तो यह जाना सनम..." पर। फ़िल्मी गीतों के इतिहास के सर्वश्रेष्ठ रोमान्टिक गीतों की सूची जब बनायी जाएगी तब उसमें इस गीत का ज़िक्र ज़रूर आएगा। गीतकार आनन्द बक्शी के सीधे-सच्चे शब्द लोगों के दिल में ऐसे उतर गए कि पिछले 19 सालों से निरन्तर सुनते रहने के बावजूद इस गीत से ऊबे नहीं। बक्शी साहब को इसी गीत के लिए उस साल सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फ़िल्मफेयर पुरस्कार मिला था। इससे पहले आनद बक्शी को केवल दो बार यह पुरस्कार मिला था - "आदमी मुसाफ़िर है" (अपनापन) और "तेरे मेरे बीच में" (एक दूजे के लिए) गीतों के लिए। DDLJ के लिए शाहरुख़ ख़ान के लिए उदित नारायण की आवाज़ तय हुई थी और अधिकांश गीतों में उदित की ही आवाज़ सुनाई दी है। पर दो गीत ऐसे हैं जिनमें अभिजीत और कुमार सानू की आवाज़ें हैं। "ज़रा सा झूम लूँ मैं" की मादकता को देखते हुए अभिजीत की आवाज़ ली गई, पर "तुझे देखा तो यह जाना सनम" के लिए उदित नारायण के स्थान पर कुमार सानू की आवाज़ को चुनने का निर्णय आश्चर्यपूर्ण है। दरसल बात ऐसी हुई कि इस गीत की शुरुआत "तुझे" शब्द से होती है और उदित नारायण का उच्चारण कुछ ऐसा है कि "झ" वाले शब्द कुछ-कुछ "ज्‍ह" जैसी सुनाई देती है (शायद उनके नेपाली होने की वजह से)। और क्योंकि शुरुआती मुखड़ा बिना किसी साज़ के शुरू होता है, ऐसे में उदित की आवाज़ में "तुझे" शब्द का उच्चारण ठीक ना होने की सम्भावना को ध्यान में रखते हुए यह निर्णय लिया गया कि गीत को कुमार सानू से गवा लिया जाए। वैसे उदित नारायण को "मेहन्दी लगाके रखना" गीत के लिए सर्वश्रेष्ठ गायक का फ़िल्मफ़ेअर पुरस्कार ज़रूर मिला था। अब बात इस गीत के फ़िल्मांकन की। गीत फ़िल्माया गया था पीले सरसों के खेतों में। पर फ़िल्मांकन में कन्टिन्यूइटी की गड़बड़ी ज़रूर देखी जा सकती है। गीत शुरू होने से ठीक पहले सिमरन (काजोल) हरे घाँस वाले खेत में खड़ी हैं, पर अगले ही शॉट में वो पीले फूलों के खेत से दौड़ने लग पड़ती हैं। ख़ैर, जो हिट है, वही फ़िट है। "तुझे देखा" से सम्बन्धित एक अन्तिम जानकारी यह भी है कि 1998 की फ़िल्म ’प्यार तो होना ही था’ में जतिन-ललित ने लगभग इसी धुन पर कम्पोज़ किया था "अजनबी मुझको इतना बता दिल मेरा क्यों परेशान है" जिसे आशा भोसले और उदित नारायण ने गाया था और एक बार फिर काजोल पर ही फ़िल्माया गया था। पर इस गीत को वह ख्याति नहीं मिली जो ख्याति "तुझे देखा..." को मिली। लीजिए, अब आप वही चर्चित गीत सुनिए।

फिल्म - दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे : 'तुझे देखा तो ये जाना सनम...' : कुमार सानू और लता मंगेशकर : 



अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तम्भ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर।



खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र

Friday, February 13, 2009

खुदाया खैर...एक बार फ़िर शाहरुख़ की आवाज़ बने अभिजीत


"बड़ी मुश्किल है, खोया मेरा दिल है..." शाहरुख़ खान के उपर फिल्माए गए इस गीत में आवाज़ थी अभिजीत भट्टाचार्य की. जब ये गीत आया तो श्रोताओं को लगा कि यही वो आवाज़ है जो शाहरुख़ के ऑन स्क्रीन व्यक्तित्व को सहज रूप से उभरता है. पर शायद वो ज़माने लद चुके थे जब नायक अपनी फिल्मों के लिए किसी ख़ास आवाज़ की फरमाईश करता था. जहाँ शाहरुख़ के शुरूआती दिनों में कुमार सानु ने उनके गीतों को आवाज़ दी (कोई न कोई चाहिए..., और काली काली ऑंखें...), वहीँ बाद में उनकी रोमांटिक हीरो की छवि पर उदित नारायण की आवाज़ कुछ ऐसे जमी की सुनने वाले बस वाह वाह कर उठे, "डर" और "दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगें" के गीत आज तक सुने और याद किए जाते हैं.

फ़िर हीरो की छवि बदली, पहले जिस नायक का लक्ष्य नायिका को पाना मात्र होता था, वह अब अपने कैरिअर के प्रति भी सजग हो चुका था. वो चाँद तारे तोड़ने के ख्वाब सजाने लगा और ऐसे नायक को परदे पर साकार किया शाहरुख़ ने एक बार फ़िर अपनी फ़िल्म "येस् बॉस" में और यहाँ फ़िर से मिला उन्हें अभिजीत की आवाज़ का साथ और इस फ़िल्म के गीतों ने इस नायक-गायक की जोड़ी को एक नई पहचान दी. पर ये वो दौर था जब समय चक्र तेज़ी से बदल रहा था, और शाहरुख़ खान रुपी नायक ने भी बदलते किरदारों को जीते हुए अलग अलग आवाजों में ख़ुद को आजमाना शुरू किया.

"दिल से" में ऐ आर रहमान ने शाहरुख़ पर फिल्माए गए ४ गीतों में चार अलग अलग आवाजों का इस्तेमाल किया, जिसमें सुखविंदर (छैयां छैयां), उदित नारायण (ऐ अजनबी), सोनू निगम (सतरंगी रे) और ख़ुद ऐ आर आर ने आवाज़ दी फ़िल्म के शीर्षक गीत को. दरअसल अब संगीतकार गायक का चुनाव करते समय गीत के मूड को सर्वोपरि रखने लगे थे, बाकि उस आवाज़ को अपनी आवाज़ से मिलाने का काम नायक का होने लगा. उर्जा से भरे शाहरुख़ खान को अब अपने जोशीले गानों के लिए सुखविंदर जैसी दमदार आवाज़ मिल गई थी वहीँ भावनात्मक गीतों के लिए वो कभी सोनू निगम, कभी उदित तो कभी रूप कुमार राठोड की आवाजों में ख़ुद को ढालने लगे, और इन सब के बीच अभिजीत कहीं पीछे छूट गए.

"चलते चलते" में वो फ़िर से शाहरुख़ की आवाज़ बने, फ़िर बहुचर्चित "मैं हूँ न" में उनका सामना सीधे तौर पर सोनू निगम से हुआ, जब फ़िल्म का शीर्षक गीत जो दो संस्करण में था, एक को आवाज़ दी सोनू ने तो इसी गीत का दर्द संस्करण गाया अभिजीत ने. रजत पटल पर शाहरुख़ ने एक लंबा सफर तय किया है और बेशक अभिजीत ने उनके लिए कुछ बेहद यादगार गीतों को गाकर उनके इस सफर में एक अहम् भूमिका अदा की है. "तुम आए तो..." "अयाम दा बेस्ट.." (फ़िर भी दिल है हिन्दुस्तानी), "तौबा तुम्हारे ये इशारे...", "सुनो न..." "चलते चलते..." (चलते चलते), "चाँद तारे...", "मैं कोई ऐसा..." (येस् बॉस), "रोशनी से...", "रात का नशा..." (अशोक), और "धूम ताना...."( ओम् शान्ति ओम्), जैसे गीत शाहरुख़ के लिए गाने के आलावा अभीजीत ने कुछ और भी बेहतरीन गीत गाये जो अन्य नायकों पर फिल्माए गए जैसे, - "तुम दिल की धड़कन में...", "आँखों में बसे हो तुम..."(टक्कर), "एक चंचल शोख हसीना...","चांदनी रात है..."(बागी), "ये तेरी ऑंखें झुकी झुकी..."(फरेब) और "लम्हा लम्हा दूरी..."(गैंगस्टर).

कानपूर में जन्में अभिजीत ने अपने "ख्वाबों" का पीछे करते हुए १९८१ में अपने परिवार की इच्छाओं को ठुकराकर मुंबई को अपना घर बना लिया और चार्टेड एकाउंटेंट की पढ़ाई को छोड़कर, पार्श्वगायन को अपना लक्ष्य. देव आनंद की फ़िल्म 'आनंद और आनंद" से उन्होंने शुरुआत की, इस फ़िल्म में उनका गाया "मैं आवारा ही सही..." सुनकर एक बार किशोर दा उनसे कहा- "तुम बहुत सुर में गाते हो..". अभिजीत आज भी मानते हैं कि किशोर दा की ये टिपण्णी उनके लिए दुनिया का सबसे बड़ा पुरस्कार है. अपनी एल्बम "तेरे बिना" जो कि बहुत मकबूल भी हुई से अभिजीत ने संगीत निर्देशन के क्षेत्र में भी ख़ुद को उतार दिया है. आजकल वो एक टेलेंट शो में बतौर निर्णायक भी खासी चर्चा बटोर रहे हैं.

शाहरुख़ की सबसे ताज़ा फ़िल्म में भी एक नर्मो नाज़ुक अंदाज़ का गीत उनके हिस्से आया है, अभिजीत को गायिकी की एक और सुरीली पारी की शुभकामनायें देते हुए आईये सुनें फ़िल्म "बिल्लू" (जो कि पहले बिल्लू बार्बर थी) का ये गीत जिसे लिखा है गुलज़ार ने और सुरों में पिरोया है प्रीतम ने -





Sunday, February 8, 2009

सुनिए "इमोशनल अत्याचार" की ये कहानी

सप्ताह की संगीत सुर्खियाँ (11)
शास्त्रीय संगीत का किसी अन्य संगीत विधा से कोई मुकाबला नही है - पंडित शिव कुमार शर्मा
"येहुदी मेनुहिन कितने महान फनकार थे पर मेडोना या माइकल जेक्सन को हमेशा मीडिया ने अधिक तरजीह दी. ये ट्रेंड पूरी दुनिया का है अकेले भारत का नही. भारतीय शास्त्रीय संगीत को पॉप संस्कृति या फ़िल्म संगीत से भिड़ने की आवश्यकता नही है."- ये कथन थे ५४ वर्षों से भारतीय शास्त्रीय संगीत का परचम अपने संतूर वादन से दुनिया भर में फहराने वाले पंडित शिव कुमार शर्मा जी के. दिल्ली के पुराना किला में अपनी एक और लाइव प्रस्तुति देने आए पंडित जी ने संगीतकार ऐ आर रहमान को बधाई देते हुए कहा कि वो रहमान ही थे जिन्होंने फिल्मों में इलेक्ट्रॉनिक संगीत का ट्रेंड शुरू किया. उनसे पहले के संगीतकार धुन और prelude बनाते थे और बाकी कामों के लिए उन्हें साजिंदों पर निर्भर रहना पड़ता था. यश राज की बहुत सी सफल फिल्मों में साथी पंडित हरी प्रसाद चौरसिया के साथ जोड़ी बनाकर संगीत देने वाले पंडित शिव कुमार शर्मा ने ये पूछने पर कि वो फ़िर से कब फिल्मों में संगीत देंगे, पंडित जी का जवाब था - "फिल्मों में संगीत देने के लिए बहुत समय की जरुरत पड़ती है और कुछ आकर्षक विषय भी मिलने चाहिए..."



मैं ख़ुद को ऑस्कर में देख रहा हूँ - गुलज़ार

रहमान यदि ऑस्कर जीतेंगे तो मुझे सबसे अधिक खुशी होगी - जयपुर साहित्यिक समारोह में गुलज़ार साहब ने खुले दिल से इस युवा संगीतकार की जम कर तारीफ की. ७२ वर्षीया गुलज़ार साहब ने कहा कि मानसिक रूप से मैं अभी से ख़ुद को ऑस्कर में देख रहा हूँ. आवाज़ की पूरी टीम ऐ आर और गुलज़ार साहब के साथ साउंड मास्टर रसूल पूकुट्टी के भी ऑस्कर में विजयी होने की कामना करता है...आप सब भी दुआ करें.


कुमार सानु का मानवीय पक्ष

गायक कुमार सानु ने अपनी नई फ़िल्म "ये सन्डे क्यों आता है" के लिए चार बूट पोलिश करने वाले बच्चों को न सिर्फ़ अभिनय सिखाने के लिए अभिनय स्कूल में डाला बल्कि वो वापस अपने पुराने जीवन चर्या की तरफ़ न मुडें इस उद्देश्य से उनके लिए दो खोलियां (छोटे घर) भी खरीद दिए और उन्हें नियमित स्कूलों में दाखिल भी करवा दिया. बहुत नेक काम किया आपने सानु साहब हमें आपकी इस फ़िल्म का भी इंतज़ार रहेगा.


इमोशनल अत्याचार

देव डी, बड़ा ही अजीब लगता था ये नाम, पर निर्देशक अनुराग कश्यप ने इसके माने साफ़ कर दिए जब एलान किया कि ये आज के दौर के देवदास की कहानी है, तो देवदास ही हैं जो अब देव डी के नाम से जाने जा रहे हैं. "नो स्मोकिंग " जैसी उत्कृष्ट और तमाम लीकों से हटकर फ़िल्म देने वाले अनुराग से उम्मीदें हैं कि उनकी ये फ़िल्म कुछ अलग और नया देखने की चाह रखने वाले दर्शकों की उम्मीदों पर खरी उतरेगी. इस हफ्ते का हमारा "सप्ताह का गीत" भी इसी फ़िल्म से है जो इन दिनों हर किसी की जुबां पर चढा हुआ है. अमिताभ वर्मा के लिखे इस "इमोशनल अत्याचार" को स्वरबद्ध किया है अमित त्रिवेदी ने जिनका अंदाज़ हमेशा की तरह एकदम नया और ताज़ा है, आवाज़ है बोनी चक्रवर्ती की. सुनिए और आनंद लीजिये -








Thursday, November 13, 2008

क्या फिर लौटेगा "आशिकी" का दौर


वो १९७२ में मिले थे एक दूजे से। १९८१ में आई फ़िल्म "मैंने जीना सीख लिया" से इस संगीतकार जोड़ी ने कदम रखा फ़िल्म जगत में। "हिसाब खून का", "लश्कर", और "इलाका" जैसी फिल्मों में इनका काम किसी की भी नज़र में नहीं आया, फिर इन्हें मिला संगीत की दुनिया में नई मिसाल बनाने की योजनायें लेकर दिल्ली से मुंबई पहुंचे गुलशन कुमार का साथ। १९९० में आई महेश भट्ट निर्देशित फ़िल्म "आशिकी" ने संगीत की दुनिया को हिला कर रख दिया, और उभर कर आए - नदीम-श्रवण। एक ऐसा दौर जब फ़िल्म संगीत अश्लील शब्दों और भौंडे संगीत की गर्त में जा रहा था, एक साथ कई नए कलकारों ने आकर जैसे संगीत का सुनहरा दौर वापस लौटा दिया। शुरूआत हुई आनंद मिलिंद के संगीत से सजी फ़िल्म "क़यामत से क़यामत तक" से और इसी के साथ वापसी हुई रोमांस के सुनहरे दौर की भी। फ़िल्म "आशिकी" भी इसी कड़ी का एक हिस्सा थी, कमाल की बात यह थी कि इस फ़िल्म के सभी गीत एक से बढ़कर एक थे और बेहद मशहूर हुए। इसके बाद नदीम-श्रवण ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। एक के बाद एक सुपर हिट संगीत से सजी फिल्में -दिल है कि मानता नहीं, साजन, सड़क, फूल और कांटे, दीवाना....और सूची लम्बी होती चली गई। नदीम-श्रवण के साथ साथ गीतकार समीर, गायक कुमार सानू, अलका याग्निक, और साधना सरगम ने भी कमियाबी का स्वाद चखा। लगातार तीन सालों तक वो फ़िल्म फेयर सम्मान के सरताज रहे, १९९६ में "राजा हिन्दुस्तानी" और १९९७ में आई "परदेश" जैसी फिल्मों से उन्होंने अपना एक नया अंदाज़ दुनिया के सामने रखा.

गुलशन कुमार की निर्मम हत्या और नदीम पर लगे आरोपों ने संगीत के इस सुहावने सफर में एक ग्रहण का काम किया। लंबे समय तक इस जोड़ी ने फिल्मों से ख़ुद को दूर रखा, २००५ में लन्दन से फ़ोन कर नदीम ने श्रवण से कहा कि "मैं कुछ समय तक अपने परफ्यूम के काम पर ध्यान देना चाहता हूँ..." इसी के साथ लगा कि यह जोड़ी अब टूट गई। श्रवण की सुनें तो उन्होंने स्वीकार किया कि-"नदीम की इस बात से वो आहत ज़रूर हुए, शुरू में नहीं समझ पाये कि आखिर वो ऐसा क्यों कर रहे हैं, पर अब सोचता हूँ कि यह अन्तराल हम दोनों के लिए ज़रूरी सा था"।

एक समय आया जब यह जोड़ी संगीत-प्रेमियों की नज़र से ओझल हो गई। लेकिन कलाकार काम किये बिने चैन नहीं पाता। श्रवण ने अकेले ही 'सिर्फ़ तुम' में संगीत दिया और बहुत हिट हुए। लेकिन संगीत प्रेमियों को संगीत को वह सुंगंध और ताजगी एकाकी संगीत में नहीं मिली। न्यायिक कारणों ने सिर्फ तुम के एल्बम पर संगीतकार का नाम तक नहीं लिखा गया।

इस जोड़ी ने 'राज़' से दुबारा वापसी की, या यूँ कहिए कि दमदार वापिसी की। वैसे धड़कन फिल्म के संगीत ने ही इस जोड़ी ने लौटने का संकेत दे ही दिया था, लेकिन इनकी संगीत का असली फ्लैवर राज़ में दिखा। इसके बाद कसूर का संगीत हिट हुआ। संगीत प्रेमियों के लिए अब ये खुशी की बात है कि अब ये जोड़ी एक बार फ़िर साथ में काम करेगी, और वो भी फूरे जोर-शोर के साथ। डेविड धवन की "डू नोट डिसटर्ब" और धर्मेश दर्शन की "बावरा" है उनकी आने वाली फिल्में। हो सकता है फ़िर कुछ ऐसे नगमें सुनने को मिलें जो बरसों तक यादों में बसे रहें।
आइए सुनते हैं इसी जोड़ी द्वारा संगीतबद्ध कुछ एवरग्रीन गीत


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