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Saturday, April 8, 2017

चित्रकथा - 13: हिन्दी फ़िल्मों में किशोरी अमोनकर


अंक - 13

हिन्दी फ़िल्मों में किशोरी अमोनकर

"मेघा झर झर बरसत रे..." 



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ में आपका हार्दिक स्वागत है। 


पिछले सोमवार दिनांक 3 अप्रैल 2017 को शास्त्रीय संगीत की सुप्रसिद्ध गायिका पद्मविभूशण किशोरी अमोनकर (आमोणकर) का 84 वर्ष की आयु में देहावसन हो जाने से हिन्दुस्तानी शास्त्रीय गायन जगत को गहरी हानी पहुँची है। शास्त्रीय संगीत जगत में किशोरी जी का जो स्थान रिक्त हुआ है, उसकी पूर्ति हो पाना असंभव है। संयोग से आगामी सोमवार 10 अप्रैल को किशोरी जी का जन्मदिवस है। आइए आज ’चित्रकथा’ में स्वर्गीया किशोरी अमोनकर जी को श्रद्धा-सुमन अर्पित करें उनकी गाई उन रचनाओं को याद करते हुए जिन्होंने फ़िल्म-संगीत के धरोहर को समृद्ध किया है।



किशोरी अमोनकर (10 अप्रैल 1932 - 3 अप्रैल 2017)

फ़िल्म-संगीत के धरोहर को समृद्ध करने में जितना योगदान फ़िल्मी गायक-गायिकाओं का है, उतना ही योगदान उन शास्त्रीय-संगीत जगत के गायक-गायिकाओं का भी है जिन्होंने अपनी गिनी-चुनी रचनाओं से ना केवल रसिकों के दिलों में रस घोला है बल्कि फ़िल्म-संगीत का स्तर बहुत ऊँचा कर दिया है। शास्त्रीय गायिकाओं में शोभा गुर्टू, बेगम परवीन सुल्ताना, लक्ष्मी शंकर, सरस्वती राणे, हीरा देवी मिश्र के साथ-साथ किशोरी अमोनकर का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है। भले किशोरी जी ने केवल दो फ़िल्मों में अपनी आवाज़ दी है, लेकिन उनकी गाई हुई ये चन्द रचनाएँ किसी ख़ज़ाने से कम नहीं। इन फ़िल्मों के गीतों की चर्चा शुरु करने से पहले कुछ ग़लतफ़हमियों को दूर करना बहुत ज़रूरी है। जहाँ इन्टरनेट से हमें बहुत सी जानकारियाँ मिलती है, वहीं ग़लत जानकारियों का भण्डार भी है इन्टरनेट। कई जगहों पर यह लिखा हुआ मिलता है कि किशोरी अमोनकर ने पहली बार 1946 की फ़िल्म ’पृथ्वीराज संयोगिता’ में गीत गाए हैं जो कि ग़लत है। यह सच है कि 1933 की इसी शीर्षक से बनी फ़िल्म में "किशोरी" नामक गायिका के गाए कुछ गीत हैं, लेकिन ये किशोरी अमोनकर नहीं बल्कि किशोरी पाठक हैं। एक और ग़लत धारणा है कि 1952 की फ़िल्म ’सिस्कियाँ’ में भी किशोरी जी ने गीत गाए हैं। ये दरसल "किशोरी" नामक किसी अन्य गायिका की आवाज़ में हैं और यह फ़िल्म कभी प्रदर्शित नहीं हुई।

10 अप्रैल 1932 को बम्बई में जन्मीं किशोरी अमोनकर ने संगीत की पहली शिक्षा अपनी माँ मोगुबाई कुर्डिकर से ली जो जयपुर-अतरौली घराने की जानीमानी गायिका थीं। साथ ही भिंडीबाज़ार घराने के अंजनी मालपेकर से भी उन्होंने तालीम ली। पारम्परिक रागों में निबद्ध ख़याल गायकी में उन्होंने महरथ हासिल की। भजन और ठुमरी में भी किशोरी अमोनकर का कोई सानी नहीं। एक प्रसिद्ध शास्त्रीय गायिका के रूप में वो 60 के दशक के शुरु में प्रतिष्ठित हुईं। 1964 में वी. शान्ताराम एक नृत्यप्रधान फ़िल्म बना रहे थे ’गीत गाया पत्थरों ने’। अपनी पुत्री राजश्री और अभिनेत्र जीतेन्द्र को उन्होंने इस फ़िल्म में लौन्च किया। ’झनक झनक पायल बाजे’ में एक से बढ़ कर एक शास्त्रीय-संगीत जगत के फ़नकारों के द्वारा फ़िल्म के गीतों को सजाने के बाद ’गीत गाया पत्थरों ने’ के शीर्षक गीत के लिए उन्होंने किशोरी अमोनकर को चुना। उन दिनों फ़िल्म-संगीत अपने पूरे शबाब पर थी। हर गायिका की तरह किशोरी के मन में भी फ़िल्म में गाने की इच्छा जागृत हुई। उनकी माँ और गुरुजी ने उन्हें समझाया कि उनके परिवार के लिए गीत-संगीत व्यवसाय नहीं बल्कि साधना है और इसलिए उन्हें फ़िल्मी गायन से दूर रहना चाहिए। पर किशोरी की तीव्र इच्छा थी फ़िल्म में गाने की। इसलिए उन्होंने अपनी माँ और गुरुजी के सुझाव को नज़रंदाज़ कर वी. शान्ताराम की फ़िल्म में मिले मौके को हाथोंहाथ ग्रहण कर लिया। 

राजश्री का सुन्दर नृत्य और उस पर किशोरी अमोनकर की मनमोहक आवाज़, असर तो होना ही था। हसरत जयपुरी के लिखे और कमचर्चित संगीतकार रामलाल द्वारा स्वरबद्ध इस गीत के दो संस्करण थे। एक तो किशोरी जी का गाया एकल, और दूसरा संस्करण एक युगल गीत था आशा भोसले और महेन्द्र कपूर की आवाज़ों में। जब इन दो संस्करणों में त्लनात्मक समीक्षा हुई तब किशोरी अमोनकर के गाए संस्करण को दिग्गजों ने ऊँचा स्थान दिया। इस गीत में राग दुर्गा की छाया थी जिसमें किशोरी जी को अपनी स्वरभाषा के ज्ञान को शब्दभाषा में ढालना था। बेहद ख़ूबसूरती के साथ फ़िल्म का यह शीर्षक गीत "गीत गाया पत्थरों ने..." उन्होंने गाया जो 1965 के बिनाका गीतमाला के वार्षिक कार्यक्रम के दसवें पायदान का सर्वाधिक लोकप्रिय गीत बना। इस कामयाबी के बावजूद किशोरी अमोनकर ने फ़िल्म जगत से अपने सारे रिश्ते समाप्त करने का निर्णय लिया। इसके दो कारण थे। पहला कारण यह था कि जब ’गीत गाया पत्थरों ने’ गीत कामयाब हुई, तब उनकी माँ ने उन्हें चेतावनी दे दी कि अगर उसने फिर कभी किसी फ़िल्म के लिए गाया तो वो उसे अपने दो तानपुरों को छूने तक नहीं देंगी। किशोरी जी को अपनी ग़लती का अहसास हुआ। लेकिन सिर्फ़ यही एक कारण नहीं था फ़िल्म जगत से मुंह मोड़ने का। जैसा कि हम सभी जानते हैं उन दिनों फ़िल्म जगत में लौबी हुआ करती थी। जानेमाने संगीत इतिहासकार वामनराव हरि देशपाण्डे ने एक लेख में लिखा है कि किशोरी और उनकी माँ का इस फ़िल्म में गाने को लेकर कड़वा अनुभव रहा जब उन्होंने इस गीत के ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड्स को सभी दुकानों से यकायक ग़ायब होते हुए देखा। वैसे भी वो फ़िल्मी गायन के क्षेत्र में नहीं रहतीं, लेकिन कुछ प्रभावशाली लोगों द्वारा उन्हें अलग-थलग करने की साज़िश ने उनके दिल को बहुत ज़ोर का ठेस पहुँचाया। शक़ की उंगली लता मंगेशकर की तरफ़ उठी, पर सबूत के अभाव में इसकी पुष्टि कभी नहीं हो सकी। लेकिन ऐसा कई गायिकाओं के साथ हो चुका है। इस फ़िल्म के बाद किशोरी अमोनकर ने अपना पूरा ध्यान शास्त्रीय संगीत में लगा दिया और दिन दुगुनी रात चौगुनी उन्नति करती चली गईं। 

’गीत गाया पत्थरों ने’ बनने के 26 वर्ष बाद किशोरी अमोनकर फिर एक बार फ़िल्म जगत में क़दम रखे। इस बार फ़िल्मकार थे गोविन्द निहलानी। 1982 की अपनी फ़िल्म ’विजेता’ में शास्त्रीय संगीत का प्रयोग करने वाले गोविन्द निहलानी ने 1990 में अपनी फ़िल्म ’दृष्टि’ के लिए एक शास्त्रीय गायिका की आवाज़ लेने की सोच रहे थे। उन्हीं के शब्दों में यह फ़िल्म ग्यारह आंदोलनों में बनाया गया था और हर एक आन्दोलन के लिए एक सांकेतिक गीत था। इसके लिए उन्होंने किशोरी अमोनकर से गीत और आलाप गवाने का निर्णय लिया। लेकिन अमोनकर तो फ़िल्मों से दूर जा चुकी थीं। गोविन्द निहलानी ने जब उन्हें फ़िल्म की कहानी सुनाई और यह भी कहा कि वो अपने गीत ख़ुद कम्पोज़ कर सकती हैं, तब किशोरी अमोनकर को कहानी भी पसन्द आई और ख़ुद के रचे गीतों को गाने की बात से ख़ुश होकर फ़िल्म स्वीकार कर ली। फ़िल्म की कहानी में वैवाहिक विवाद और एक्स्ट्रामैरिटल अफ़ेअर्स के प्रसंगों को सुन कर अमोनकर ने निहलानी के सामने यह शर्त रख दी कि उनके किसी भी गीत को प्रेम-संपादन (lovemaking) दृश्य के पार्श्व में नहीं रखा जाएगा। उनकी सारी शर्तों तो निहलानी मान गए। अमोनकर जुट गईं फ़िल्म की धुनों को तैयार करने में। गीतों के लिए बोल थे वसन्त देव ने जिन्होंने ’उत्सव’ फ़िल्म में कई सुन्दर गीत लिखे थे। किशोरी अमोनकर के लिए इस फ़िल्म में संगीत देना एक बड़ी चुनौती थी। इसका मुख्य कारण था उनके जयपुर घराने के शैली का अनम्य या दृढ़ होना। ताल, अलंकार और स्वरूप, सभी बहुत दृढ़ होते हैं इस घराने के। ऐसे में एक फ़िल्मी संगीतकार न होते हुए अपने संगीत को फ़िल्म के संगीत के लिए ढाल पाना आसान काम नहीं था। और फिर समय की भी सीमा थी।

’दृष्टि’ फ़िल्म में तीन गीत और तीन आलाप थे। पहला गीत "मेघा झर झर बरसत रे..." को किशोरी अमोनकर ने राग मलहार की शैली में स्वरबद्ध किया है। गीत के बीच बीच में आलाप बेहद सुन्दर बन पड़े हैं। यूं तो इस फ़िल्म में कई आलाप उन्होंने गाए हैं जिनका प्रयोग पाश्वसंगीत के रूप में किया गया है, लेकिन इस गीत के भीतर गाए हुए आलाप बेहद सुन्दर हैं। ऐसे ही एक आलाप का प्रयोग गोविन्द निहलानी ने एक लम्बे प्रेम-संपादन वाले दृश्य के लिए कर लिया और किशोरी अमोनकर को दिए अपने वादे से मूकर गए। फ़िल्म के रिलीज़ होने के बाद जब किशोरी जी ने फ़िल्म देखी तो उन्हें ज़बरदस्त झटका लगा। उनकी माँ ग़ुस्से से आग-बबूला हो गईं। अमोनकर ने अन्तिम फ़ैसला ले लिया अब चाहे कुछ भी हो जाए, वो फ़िल्म जगत फिर कभी वापस नहीं आएँगी। फ़िल्म की दूसरी रचना थी रघुनन्दन पांशिकर के साथ गाया उनका युगल गीत "सावनिया संझा में अंबर झर आई, का चाल चलत काम राधा भरमाई"। यह भी वर्षा का गीत है। इस गीत को मुख्य रूप से रघुनन्दन जी ने ही गाया है जबकि किशोरी जी की आवाज़ आलापों में सुनाई देती है। रघुनन्दन मराठी मंच के प्रसिद्ध अभिनेता प्रभाकर पांशिकर के पुत्र हैं। 11 वर्ष की आयु में उन्होंने संगीत की विधिवत शिक्षा लेनी शुरु कर दी थी। पंडित वसन्तराव कुलकर्णी से शुरुआती तालीम लेने के बाद उन्होंने जयपुर-अतरौली घराने की विधिवत तालीम किशोरी अमोनकर से लेनी शुरु की। अगले 17 वर्षों तक वो किशोरी जी के शिष्य बने रहे और उन्हीं की निगरानी में संगीत की सेवा करते रहे। इस तरह से जब ’दृष्टि’ में एक शास्त्रीय युवा गायक (इरफ़ान ख़ान) के पार्श्वगायन के लिए एक पुरुष आवाज़ की ज़रूरत पड़ी तो किशोरी जी ने अपने शिष्य को गाने का मौक़ा दिया और इस तरह से गुरु-शिष्य की जोड़ी ने गीत-संगीत का ऐसा समा बाँधा कि यह गीत फ़िल्म-संगीत के ख़ज़ाने का एक अनमोल नगीना बन गया।

’दृष्टि’ फ़िल्म का समापन फ़िल्म के नायक निखिल (शेखर कपूर) और नायिका संध्या (डिम्पल कापड़िया) के समुन्दर के किनारे बैठे हुए एक दृश्य से होता है जिसमें निखिल संध्या से पूछ रहे हैं कि उनके रिश्ते में आख़िर दिक्कत क्या थी जो एक दूसरे से इतना दूर कर दिया। समुन्दर किनारे बैठे वो बारिश का आनन्द ले रहे हैं और पार्श्व में चार अन्तरों का एक गीत चल रहा है। गीत के बोल इशारा कर रहे हैं कि वो एक दूसरे के साथ पुनर्मिलन के लिए तैयार हैं। यह संवाद के माध्यम से बोला नहीं जाता, लेकिन समाप्ति का यह गीत इसी तरफ़ इशारा कर रहा है। इस अन्तिम गीत के बोल हैं "एक ही संग हुते जो हम और तुम काहे बिछुड़ा रे" जिसे सुनते हुए हमें "ज्योति कलश छलके" गीत की याद आ जाती है। वैसे "ज्योति कलश छलके" राग देशकर पर आधारित है। किशोरी जी की आवाज़ में चार अन्तरों का यह गीत राग भूपाली पर आधारित है। इस गीत को छोटा ख़याल (अविलम्बित ख़याल) भी कहा जा सकता है। फ़िल्म के मुख्य भाव को उजागर करता यह गीत किशोरी अमोनकर के दिलकश आलापों और संगीत के तालों से सुसज्जित होकर जैसे रसों और भावनाओं का संचार कर रहे हों। वसन्त देव के छोटे-छोटे बोल गीत की सुन्दरता पे चार चाँद लगाते हैं। इस गीत से फ़िल्म समाप्त होता है। वैसे इसी गीत का एक और संस्करण भी है जिसमें किसी साज़ का प्रयोग नहीं हुआ है। निखिल और संध्या के एक दूसरे से अलग होने वाले दृ्श्य के बाद यह संस्करण पार्श्व में बजता है। जैसा कि ’गीत गाया पत्थरों ने’ फ़िल्म के गीत के बाद किशोरी जी ने कहा कि उन्होंने अपने स्वरभाषा को शब्दभाषा के साथ मिलाया है, इस गीत में भी वही प्रयोग सुनाई देता है। गीत का करुण रस किशोरी अमोनकर के स्वरभाषा से पूर्णता को प्राप्त करता है।


किशोरी अमोनकर ने केवल दो फ़िल्मों में अपनी आवाज़ दी और एक फ़िल्म में संगीत दिया। हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के लौहस्तंभ किशोरी अमोनकर का इन दो फ़िल्मों में योगदान कला की दृष्टि से अद्वितीय है, अतुलनीय है। फ़िल्म जगत हमेशा ॠणी रहेगी उनकी जिन्होंने अपनी पारस प्रतिभा से इन दोनों फ़िल्मों के संगीत को स्वर्णिम बना दिया। किशोरी अमोनकर भले एक फ़िल्मी पार्श्वगायिका नहीं थीं, लेकिन बस इन चार गीतों के माध्यम से उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि उनका मुकाम फ़िल्मी पार्श्वगायिकाओं से बहुत उपर है।



आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!




शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Sunday, February 19, 2017

सायंकालीन राग : SWARGOSHTHI – 305 : EVENING RAGAS




स्वरगोष्ठी – 305 में आज

राग और गाने-बजाने का समय – 5 : रात के प्रथम प्रहर के राग

राग भूपाली की बन्दिश - ‘जब से तुम संग लागली प्रीत...’




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हमारी श्रृंखला- “राग और गाने-बजाने का समय” की पाँचवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। है। उत्तर भारतीय रागदारी संगीत की अनेक विशेषताओं में से एक विशेषता यह भी है कि संगीत के प्रचलित राग परम्परागत रूप से ऋतु प्रधान हैं या प्रहर प्रधान। अर्थात संगीत के प्रायः सभी राग या तो अवसर विशेष या फिर समय विशेष पर ही प्रस्तुत किये जाने की परम्परा है। बसन्त ऋतु में राग बसन्त और बहार तथा वर्षा ऋतु में मल्हार अंग के रागों के गाने-बजाने की परम्परा है। इसी प्रकार अधिकतर रागों को गाने-बजाने की एक निर्धारित समयावधि होती है। उस विशेष समय पर ही राग को सुनने पर आनन्द प्राप्त होता है। भारतीय कालगणना के सिद्धान्तों का प्रतिपादन करने वाले प्राचीन मनीषियों ने दिन और रात के चौबीस घण्टों को आठ प्रहर में बाँटा है। सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक के चार प्रहर को दिन के और सूर्यास्त से लेकर अगले सूर्योदय से पहले के चार प्रहर को रात्रि के प्रहर कहे जाते हैं। उत्तर भारतीय संगीत के साधक कई शताब्दियों से विविध प्रहर में अलग-अलग रागों का परम्परागत रूप से प्रयोग करते रहे हैं। रागों का यह समय-सिद्धान्त हमारे परम्परागत संस्कारों से उपजा है। विभिन्न रागों का वर्गीकरण अलग-अलग प्रहर के अनुसार करते हुए आज भी संगीतज्ञ व्यवहार करते हैं। राग भैरव का गायन-वादन प्रातःकाल और मालकौंस मध्यरात्रि में ही किया जाता है। कुछ राग ऋतु-प्रधान माने जाते हैं और विभिन्न ऋतुओं में ही उनका गायन-वादन किया जाता है। इस श्रृंखला में हम विभिन्न प्रहरों में बाँटे गए रागों की चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की आज की कड़ी में आज हम आपसे दिन के पाँचवें प्रहर के रागों पर चर्चा करेंगे और इस प्रहर के एक प्रमुख राग भूपाली की बन्दिश सुविख्यात गायिका विदुषी किशोरी अमोनकर के स्वरों में प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही 1957 में प्रदर्शित फिल्म ‘नरसी भगत’ से राग केदार पर आधारित एक गीत भी सुनवा रहे हैं।



विदुषी किशोरी  अमोनकर
भारतीय संगीत के रागों के गाने-बजाने का समय निर्धारण करने के लिए शास्त्रकारों ने कुछ सिद्धान्त बनाए हैं। इस श्रृंखला के पिछले अंकों में हमने आपसे ‘अध्वदर्शक स्वर’ और ‘वादी संवादी स्वर’ सिद्धान्तों पर चर्चा की थी। आज के अंक में हम पूर्वांग और उत्तरांग के सिद्धान्त पर आपसे चर्चा कर रहे हैं। एक सप्तक के दो भाग किये जाते हैं। षडज से पंचम तक के स्वरों को पूर्वांग के स्वर और मध्यम से अगले सप्तक के षडज तक के स्वरों को उत्तरांग के स्वर कहे जाते हैं। जिस राग का पूर्वांग अधिक प्रधान होता है, वह मध्याह्न 12 बजे से मध्यरात्रि 12 के बीच की अवधि में तथा जिस राग का उत्तर अंग अधिक प्रबल होता है, वह मध्यरात्रि 12 बजे से लेकर मध्याह्न 12 बजे के बीच गाया-बजाया जाता है। राग केदार, भूपाली, दरबारी कान्हड़ा, भीमपलासी आदि पूर्वांग प्रधान राग दिन के 12 बजे से रात्रि 12 बजे से पूर्व गाये-बजाए जाते हैं। इसी प्रकार सोहनी, बसन्त, हिंडोल, बहार, जौनपुरी आदि उत्तरांग प्रधान राग मध्यरात्रि 12 बजे से मध्याह्न 12 बजे तक गाये-बजाए जाते हैं। इन्हें क्रमशः पूर्व राग और उत्तर राग कहा जाता है। पूर्व राग का वादी स्वर सप्तक के पूर्व अंग से तथा संवादी स्वर उत्तर अंग से लिया जाता है। रात्रि के प्रथम प्रहर अर्थात गोधूलि बेला से रात्रि 9 बजे तक ऐसे रागों को गाया-बजाया जाता है जिसमे ऋषभ और गान्धार स्वर शुद्ध होते हैं। राग भूपाली और केदार दो ऐसे राग हैं, जिनमें उपरोक्त दोनों सिद्धान्तों का पालन किया जाता है। यह दोनों राग रात्रि के प्रथम प्रहर में खूब प्रचलित हैं। आज पहले हम आपको राग भूपाली और फिर राग केदार के उदाहरण सुनवाते हैं। राग भूपाली कल्याण थाट का राग माना जाता है। इसकी जाति औड़व-औड़व होती है, अर्थात राग के आरोह और अवरोह में पाँच-पाँच स्वर प्रयोग होते हैं। इस राग में मध्यम और निषाद स्वर वर्जित होता है। शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। इसका वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर धैवत होता है। रात्रि का प्रथम प्रहर इस राग का आदर्श गायन-वादन समय होता है। यह राग पूर्वांग प्रधान है, अर्थात इसका चलन अधिकतर मन्द्र और मध्य सप्तक के पूर्वांग में होता है। यदि भूपाली के स्वरों को उत्तरांग प्रधान कर दिया जाए तो यह राग देशकार हो जाता है। इन्हीं स्वरों वाले राग को दक्षिण भारतीय संगीत में राग मोहनम् कहा जाता है। अब हम आपको राग भूपाली की एक लोकप्रिय बन्दिश सुविख्यात गायिका विदुषी किशोरी अमोनकर के स्वरों में सुनवा रहे हैं। तीनताल में निबद्ध इस रचना के बोल हैं- ‘जब से तुम संग लागली प्रीत...’

राग भूपाली : “जब से तुम संग लागली प्रीत...” : विदुषी किशोरी अमोनकर




हेमन्त कुमार, मन्ना डे और सुधा मल्होत्रा 
रात्रि के पहले प्रहर में गाये-बजाये जाने वाले राग भूपाली के अलावा इस प्रहर के कुछ अन्य राग हैं, कामोद, चन्द्रकान्त, छायानट, देशकार, नटविहाग, पटविहाग, जैतकल्याण, बिहागड़ा, यमन, श्यामकल्याण, शुद्धकल्याण, श्रीकल्याण, हमीर, हंसध्वनि, केदार आदि। अब हम आपको राग केदार में पिरोया एक फिल्मी गीत सुनवाते हैं। राग केदार भी कल्याण थाट का राग है। इसकी जाति औड़व-षाड़व होती है; अर्थात आरोह में ऋषभ और गान्धार और अवरोह में केवल गान्धार स्वर वर्जित होता है। इस राग में दोनों मध्यम और शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। दोनों मध्यम के कारण ही कुछ विद्वान इस राग को बिलावल थाट तो कुछ कल्याण थाट का मानते हैं। प्राचीन शास्त्रकारों ने इसे बिलावल थाट का राग माना है। परन्तु अधिकांश आधुनिक गायक इसे कल्याण थाट का राग मानते हैं। इस राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। 1957 में प्रदर्शित फिल्म “नरसी भगत” का एक गीत राग केदार का अच्छा उदाहरण है। तीनताल में निबद्ध इस गीत की धुन संगीतकार रवि ने बनाई थी। इस गीत में तीन पार्श्वगायकों की आवाज़ है: हेमन्त कुमार, मन्ना डे और सुधा मल्होत्रा। हिन्दी के यशस्वी गीतकार गोपाल सिंह नेपाली ने इस गीत को लिखा है। इस गीत से जुड़ा एक उल्लेखनीय प्रसंग श्री नेपाली के निधन के चार दशक बाद सामने आया जब ब्रिटिश फिल्म निर्माता डेनी बोयेल ने फिल्म 'स्लमडॉग मिलियोनार' का निर्माण किया था। ऑस्कर पुरस्कार प्राप्त इस फिल्म में नेपाली जी के गीत का इस्तेमाल किया गया था, किन्तु फिल्म में इस गीत का श्रेय भक्तकवि सूरदास को दिया गया था। गोपाल सिंह नेपाली के सुपुत्र नकुल सिंह ने मुम्बई उच्च न्यायालय में फिल्म के निर्माता के विरुद्ध क्षतिपूर्ति का दावा भी पेश किया था। कैसा दुर्भाग्य है कि एक स्वाभिमानी गीतकार को मृत्यु के बाद भी अन्याय का शिकार होना पड़ा। संगीतकार रवि का स्वरबद्ध किया यही गीत हेमन्त कुमार, मन्ना डे और सुधा मल्होत्रा की आवाज़ में अब आप यह गीत सुनिए।

राग केदार : ‘दर्शन दो घनश्याम...’ : हेमन्त कुमार, मन्ना डे और सुधा मल्होत्रा : फिल्म नरसी भगत



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 305वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1955 में प्रदर्शित फिल्म के राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 310वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के पहले सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।





1 – संगीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – गीतांश में गायिका के स्वरों को पहचानिए और हमे उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 25 फरवरी, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 307वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 303 की संगीत पहेली में हमने 1963 में प्रदर्शित फिल्म ‘सेहरा’ के एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग मारू बिहाग, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल कहरवा तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका लता मंगेशकर और गायक मुहम्मद रफी

इस बार की पहेली में हमारे नियमित प्रतिभागी पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर से क्षिति तिवारी, वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने भी सही उत्तर दिये हैं। पाँचो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर लघु श्रृंखला “राग और गाने-बजाने का समय” का यह पाँचवाँ अंक था। अगले अंक में हम रात के दूसरे प्रहर के रागों पर आधारित कार्यक्रम प्रस्तुत करेंगे। पिछले सप्ताह कुछ अपरिहार्य कारणों से हम ‘स्वरगोष्ठी’ का अंक प्रकाशित नहीं कर सके, जिसके लिए हमे खेद है। हमारे पिछले अंक के बारे में पेंसिलवानिया, अमेरिका से हमारी एक नियमित पाठक विजया राजकोटिया ने एक टिप्पणी की है –

Krishnamohan Ji, Ustad Rashid Khan has presented superb composition in Raag Marwa. The same composition is sung by Ustad Amir Khan. I just have a suggestion that it would have been appropriate to post Marwa by Amir Khan Ji as it was his death anniversary recently.

इस सुझाव के लिए विजया जी का हार्दिक आभार। यदि आप भी किसी राग, गीत, श्रृंखला अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 


Sunday, July 17, 2016

राग अल्हैया बिलावल : SWARGOSHTHI – 279 : RAG ALHAIYA BILAWAL




स्वरगोष्ठी – 279 में आज

मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन – 12 : समापन कड़ी में खुशहाली का माहौल

“भोर आई गया अँधियारा सारे जग में हुआ उजियारा...”




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच जारी हमारी श्रृंखला – ‘मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन’ की यह समापन कड़ी है। श्रृंखला की बारहवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र अपने साथी सुजॉय चटर्जी के साथ आप सभी संगीत-प्रेमियों का एक बार फिर हार्दिक स्वागत करता हूँ। यह श्रृंखला आप तक पहुँचाने के लिए हमने फिल्म संगीत के सुपरिचित इतिहासकार और ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी का सहयोग लिया है। हमारी यह श्रृंखला फिल्म जगत के चर्चित संगीतकार मदन मोहन के राग आधारित गीतों पर केन्द्रित है। श्रृंखला के प्रत्येक अंक में हमने मदन मोहन के स्वरबद्ध किसी राग आधारित गीत की चर्चा की और फिर उस राग की उदाहरण सहित जानकारी भी दी। श्रृंखला की बारहवीं कड़ी में आज हम आपको राग अल्हैया बिलावल के स्वरों में पिरोये गए 1972 में प्रदर्शित फिल्म ‘बावर्ची’ से एक सुमधुर, उल्लास से परिपूर्ण गीत का रसास्वादन कराएँगे। इस राग आधारित गीत को स्वर दिया है, मन्ना डे, लक्ष्मी शंकर, निर्मला देवी, किशोर कुमार और हरीन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय ने। संगीतकार मदन मोहन द्वारा राग अल्हैया बिलावल के स्वरों पर आधारित इस गीत के साथ ही राग का यथार्थ स्वरूप उपस्थित करने के लिए हम सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी किशोरी अमोनकर और उनकी शिष्याओ के स्वरों में राग अल्हैया बिलावल में निबद्ध एक सुमधुर रचना भी प्रस्तुत कर रहे हैं।


दन मोहन उन गिने-चुने संगीतकारों में से थे जो नए-नए प्रयोग करने से नहीं कतराते थे। शास्त्रीय रागों को लेकर तरह-तरह के प्रयोग मदन मोहन ने किए जो उनके गीतों में साफ़ झलकता है। उदाहरण के तौर पर फ़िल्म ’बावर्ची’ का गीत ही ले लीजिए "भोर आई गया अँधियारा..."। यह गीत आधारित है राग अल्हैया बिलावल पर। इस फ़िल्म के बनते समय तक शायद ऐसा कोई भी हिन्दी फ़िल्मी गीत नहीं था जो इस राग पर आधारित हो। अल्हैया बिलावल एक प्रात:कालीन राग (सुबह 6 से 9 बजे तक गाया जाने वाला राग) होने की वजह से मुमकिन था कि इसका प्रयोग संगीतकार अपने गीतों में करते क्योंकि प्रात:काल के बहुत से गीत फ़िल्मों में आ चुके थे। पर शायद किसी ने भी इस राग को नहीं अपनाया, या फिर यूँ कहें कि अपना नहीं सके। मदन मोहन ने इस ओर पहल किया और अल्हैया बिलावल को गले लगाया। ’बावर्ची’ फ़िल्म में एक सिचुएशन ऐसी थी कि सुबह के वक़्त संयुक्त परिवार में चहल-पहल शुरु हुई है, पिताजी के चरण-स्पर्ष हो रहे हैं, सुबह की चाय पी जा रही है, बावर्ची अपने काम पे लगा है, संगीतकार बेटा अपने सुर लगा रहा है, घर की बेटियाँ घर के काम-काज में लगी हैं। इस सिचुएशन के लिए गीत बनाना आसान काम नहीं था। पर मदन मोहन ने एक ऐसे गीत की रचना कर दी कि इस तरह का यह आजतक का एकमात्र गीत बन कर रह गया है। बावर्ची बने फ़िल्म के नायक राजेश खन्ना के लिए मन्ना डे की आवाज़ ली गई जो इस गीत के मुख्य गायक हैं, जो बिखरते हुए उस परिवार को एक डोर में बाँधे रखने के लिए इस गीत में सबको शामिल कर लेते हैं। पिता हरीन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय का पार्श्वगायन उन्होंने ख़ुद ही किया, संगीतकार बेटे (असरानी) को आवाज़ दी किशोर कुमार ने, और घर की दो बेटियों (जया भादुड़ी और उषा किरण) के लिए आवाज़ें दीं शास्त्रीय-संगीत की शीर्ष की दो गायिकाओं ने। ये हैं लक्ष्मी शंकर और निर्मला देवी। कैफ़ी आजमी ने गीत लिखा और नृत्य निर्देशन के लिए चुना गया गोपीकृष्ण को। कलाकारों के इस अद्वितीय आयोजन ने इस गीत को अमर बना दिया। और मदन मोहन ने केवल अल्हैया बिलावल ही नहीं, इस गीत के अलग-अलग अंश के लिए अलग-अलग रागों का प्रयोग किया। "भोर आई गया अंधियारा" का मूल स्थायी और अन्तरा राग अल्हैया बिलावल है। परन्तु अलग-अलग अन्तरों में राग मारु विहाग, नट भैरव, धनाश्री और हंसध्वनि की झलक भी मिलती है। हर बदले हुए राग के अन्तरे के बाद राग अल्हैया बिलावल में निबद्ध स्थायी की पंक्तियाँ वापस आती हैं।

अपने उसूलों पर चलने की वजह से 70 के दशक में मदन मोहन के साथ कई फ़िल्मकारों ने काम करना बन्द कर दिया था। हालाँकि उनके अन्तिम कुछ वर्षों में उन्होंने ॠषीकेश मुखर्जी (बावर्ची), गुलज़ार (कोशिश, मौसम), चेतन आनन्द (हँसते ज़ख़्म) और एच. एस. रवैल (लैला मजनूं) के साथ काम किया, पर उनके लिए रेकॉर्डिंग् स्टुडियो में तारीख़ मिलना भी मुश्किल हो रहा था। नए संगीतकारों की फ़ौज 60 के दशक के अन्तिम भाग से आ चुकी थी जिनके पास बहुत सी फ़िल्में थीं और वो महीनों तक अच्छे रेकॉर्डिंग् स्टुडियोज़ (जैसे कि तारदेव, फ़िल्म सेन्टर, महबूब) को बुक करवा लेते थे जिस वजह से जब मदन जी को ज़रूरत पड़ती स्टुडियो की, तो उन्हें नहीं मिल पाता। इस तरह से उनकी रेकॉर्डिंग् कई महीनों के लिए टल जाती और इस तरह से वो पिछड़ते जा रहे थे। ख़ैर, वापस आते हैं ’बावर्ची’ पर। इस फ़िल्म में कुल छह गीत थे। एक गीत की हमने चर्चा की, अन्य पाँच गीत भी रागों अथवा लोक संगीत पर आधारित थे। मन्ना डे की एकल आवाज़ में "तुम बिन जीवन कैसा जीवन..." के पहले अन्तरे में राग हेमन्त की झलक है। इसी प्रकार लक्ष्मी शंकर की आवाज़ में "काहे कान्हा करत बरजोरी...", में भी राग का स्पर्श है। कुमारी फ़ैयाज़ की आवाज़ में "पहले चोरी फिर सीनाज़ोरी..." में मराठी लोक संगीत लावणी का रंग है। मदन मोहन की फ़िल्म हो और लता मंगेशकर का कोई गीत ना हो कैसे हो सकता है भला। इस फ़िल्म में दो गीत लता जी से गवाये गए - "मोरे नैना बहाये नीर...", और दूसरा गीत है "मस्त पवन डोले रे..."। इस दूसरे गीत को फ़िल्म में नहीं शामिल किया गया, इसका मदन मोहन को अफ़सोस रहा। उनके साथ ऐसा कई बार हुआ। एडिटिंग् की कैंची उनके कई सुन्दर गीतों पर चल गई और गीत फ़िल्म से बाहर हो गया। कुछ उदाहरण - "खेलो ना मेरे दिल से..." (हक़ीक़त), "चिराग़ दिल का जलाओ बहुत अन्धेरा है..." (चिराग़), "दुनिया बनाने वाले..." (हिन्दुस्तान की क़सम), "मस्त पवन डोले रे..." (बावर्ची)। ’हीर रांझा’ में "मेरी दुनिया में तुम आयी..." शुरु-शुरु में फ़िल्म में नहीं था, कुछ सप्ताह बाद इसे जोड़ा गया था, पर साथ ही "तेरे कूचे में..." को हटा दिया गया। ’हँसते ज़ख़्म’ में "आज सोचा तो आँसू भर आए..." गीत को बहुत सप्ताह बीत जाने के बाद जोड़ा गया था। इन सारी जानकारियों के बाद अब समय है फ़िल्म ’बावर्ची’ के "भोर आई गया अँधियारा..." गीत को सुनने के साथ-साथ देखने का।


राग अल्हैया बिलावल : "भोर आई गया अँधियारा..." : मन्ना डे और साथी : फिल्म – बावर्ची


राग अल्हैया बिलावल का सम्बन्ध बिलावल थाट से माना गया है और इस थाट के आश्रय राग बिलावल का ही एक प्रकार है। इस राग के आरोह में मध्यम स्वर वर्जित होता है और अवरोह में सातो स्वर प्रयोग किये जाते हैं। इस कारण इस राग की जाति षाड़व-सम्पूर्ण होती है। आरोह में शुद्ध और अवरोह में दोनों निषाद प्रयोग किये जाते है। शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। राग अल्हैया बिलावल के गायन-वादन का समय दिन का प्रथम प्रहर होता है। राग के आरोह में ऋषभ और अवरोह में गान्धार स्वर का अधिकतर वक्र प्रयोग किया जाता है। शुद्ध निषाद स्वर का प्रयोग आरोह में और कोमल निषाद का अल्प प्रयोग केवल अवरोह में दो धैवत के बीच में किया जाता है। राग का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गान्धार होता है। यह उत्तरांग प्रधान राग है, अर्थात इसका वादी स्वर सप्तक के उत्तरांग में आता है। इस राग का चलन भी सप्तक के उत्तरांग में और तार सप्तक में अधिक किया जाता है। आजकल राग अल्हैया बिलावल का प्रचार इतना अधिक बढ़ गया है केवल बिलावल कह देने से लोग अल्हैया बिलावल ही समझते हैं, जबकि राग बिलावल और अल्हैया बिलावल दो अलग-अलग राग हैं। राग अल्हैया बिलावल के वास्तविक स्वरूप का अनुभव करने के लिए अब हम आपको 16 मात्रा में निबद्ध एक खयाल सुनवा रहे हैं। इसे प्रस्तुत कर रही हैं, जयपुर अतरौली घराने के गायकी में दक्ष विदुषी किशोरी अमोनकर। इस गायन में उनकी शिष्याओं का योगदान भी है। राग अल्हैया बिलावल की इस बन्दिश के बोल हैं – ‘कवन बतरिया गैलो माई...’। आप यह रचना सुनिए और मुझे आज के इस अंक के साथ जारी श्रृंखला को भी यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग अल्हैया बिलावल : ‘कवन बतरिया गैलो माई...’ विदुषी किशोरी अमोनकर




संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 279वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको सात दशक पुरानी फिल्म से लिये गए एक राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 280वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के तीसरे सत्र (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश को सुन कर आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – ताल के लिए गीत में किस तालवाद्य का प्रयोग किया गया है? हमें उस तालवाद्य का नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 23 जुलाई, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 281वें अंक में प्रकाशित किया जाएगा। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 277 की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1973 में प्रदर्शित फिल्म ‘दिल की राहें’ से राग आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – मधुवन्ती, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का उत्तर है- पार्श्वगायिका – लता मंगेशकर

इस बार की संगीत पहेली में पाँच प्रतिभागियों ने तीनों प्रश्नों का सही उत्तर देकर विजेता बनने का गौरव प्राप्त किया है। ये विजेता हैं - वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। सभी पाँच विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में जारी हमारी श्रृंखला ‘मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन’ की आज यह समापन कड़ी है। आज की कड़ी में आपने राग अल्हैया बिलावल का रसास्वादन किया। इस श्रृंखला में फिल्म संगीतकार मदन मोहन के कुछ राग आधारित गीतों को चुन कर आपके लिए हमने प्रस्तुत किया। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी, हमें लिखिए। ‘स्वरगोष्ठी’ साप्ताहिक स्तम्भ के बारे में हमारे पाठक और श्रोता नियमित रूप से हमें पत्र लिखते है। हम उनके सुझाव के अनुसार ही आगामी विषय निर्धारित करते है। हमारी अगली श्रृंखला “वर्षा ऋतु के राग” विषय पर आधारित होगी। इस श्रृंखला के लिए आप अपने सुझाव या फरमाइश ऊपर दिये गए ई-मेल पते पर शीघ्र भेजिए। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करेंगे। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


शोध व आलेख  : सुजॉय चटर्जी  
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  




Sunday, September 20, 2015

सायंकालीन राग : SWARGOSHTHI – 236 : EVENING RAGAS




स्वरगोष्ठी – 236 में आज

रागों का समय प्रबन्धन – 5 : रात के प्रथम प्रहर के राग

राग भूपाली की बन्दिश - ‘जब से तुम संग लागली प्रीत...’




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हमारी श्रृंखला- ‘रागों का समय प्रबन्धन’ की पाँचवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। है। उत्तर भारतीय रागदारी संगीत की अनेक विशेषताओं में से एक विशेषता यह भी है कि संगीत के प्रचलित राग परम्परागत रूप से ऋतु प्रधान हैं या प्रहर प्रधान। अर्थात संगीत के प्रायः सभी राग या तो अवसर विशेष या फिर समय विशेष पर ही प्रस्तुत किये जाने की परम्परा है। बसन्त ऋतु में राग बसन्त और बहार तथा वर्षा ऋतु में मल्हार अंग के रागों के गाने-बजाने की परम्परा है। इसी प्रकार अधिकतर रागों को गाने-बजाने की एक निर्धारित समयावधि होती है। उस विशेष समय पर ही राग को सुनने पर आनन्द प्राप्त होता है। भारतीय कालगणना के सिद्धान्तों का प्रतिपादन करने वाले प्राचीन मनीषियों ने दिन और रात के चौबीस घण्टों को आठ प्रहर में बाँटा है। सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक के चार प्रहर को दिन के और सूर्यास्त से लेकर अगले सूर्योदय से पहले के चार प्रहर को रात्रि के प्रहर कहे जाते हैं। उत्तर भारतीय संगीत के साधक कई शताब्दियों से विविध प्रहर में अलग-अलग रागों का परम्परागत रूप से प्रयोग करते रहे हैं। रागों का यह समय-सिद्धान्त हमारे परम्परागत संस्कारों से उपजा है। विभिन्न रागों का वर्गीकरण अलग-अलग प्रहर के अनुसार करते हुए आज भी संगीतज्ञ व्यवहार करते हैं। राग भैरव का गायन-वादन प्रातःकाल और मालकौंस मध्यरात्रि में ही किया जाता है। कुछ राग ऋतु-प्रधान माने जाते हैं और विभिन्न ऋतुओं में ही उनका गायन-वादन किया जाता है। इस श्रृंखला में हम विभिन्न प्रहरों में बाँटे गए रागों की चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की आज की कड़ी में आज हम आपसे दिन के पाँचवें प्रहर के रागों पर चर्चा करेंगे और इस प्रहर के एक प्रमुख राग भूपाली की बन्दिश सुविख्यात गायिका विदुषी किशोरी अमोनकर के स्वरों में प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही 1957 में प्रदर्शित फिल्म ‘नरसी भगत’ से राग केदार पर आधारित एक गीत भी सुनवा रहे हैं।


किशोरी अमोनकर
भारतीय संगीत के रागों के गाने-बजाने का समय निर्धारण करने के लिए शास्त्रकारों ने कुछ सिद्धान्त बनाए हैं। इस श्रृंखला के पिछले अंकों में हमने आपसे ‘अध्वदर्शक स्वर’ और ‘वादी संवादी स्वर’ सिद्धान्तों पर चर्चा की थी। आज के अंक में हम पूर्वांग और उत्तरांग के सिद्धान्त पर आपसे चर्चा कर रहे हैं। एक सप्तक के दो भाग किये जाते हैं। षडज से पंचम तक के स्वरों को पूर्वांग के स्वर और मध्यम से अगले सप्तक के षडज तक के स्वरों को उत्तरांग के स्वर कहे जाते हैं। जिस राग का पूर्वांग अधिक प्रधान होता है, वह मध्याह्न 12 बजे से मध्यरात्रि 12 के बीच की अवधि में तथा जिस राग का उत्तर अंग अधिक प्रबल होता है, वह मध्यरात्रि 12 बजे से लेकर मध्याह्न 12 बजे के बीच गाया-बजाया जाता है। राग केदार, भूपाली, दरबारी कान्हड़ा, भीमपलासी आदि पूर्वांग प्रधान राग दिन के 12 बजे से रात्रि 12 बजे से पूर्व गाये-बजाए जाते हैं। इसी प्रकार सोहनी, बसन्त, हिंडोल, बहार, जौनपुरी आदि उत्तरांग प्रधान राग मध्यरात्रि 12 बजे से मध्याह्न 12 बजे तक गाये-बजाए जाते हैं। इन्हें क्रमशः पूर्व राग और उत्तर राग कहा जाता है। पूर्व राग का वादी स्वर सप्तक के पूर्व अंग से तथा संवादी स्वर उत्तर अंग से लिया जाता है। रात्रि के प्रथम प्रहर अर्थात गोधूलि बेला से रात्रि 9 बजे तक ऐसे रागों को गाया-बजाया जाता है जिसमे ऋषभ और गान्धार स्वर शुद्ध होते हैं। राग भूपाली और केदार दो ऐसे राग हैं, जिनमें उपरोक्त दोनों सिद्धान्तों का पालन किया जाता है। यह दोनों राग रात्रि के प्रथम प्रहर में खूब प्रचलित हैं। आज पहले हम आपको राग भूपाली और फिर राग केदार के उदाहरण सुनवाते हैं।

राग भूपाली कल्याण थाट का राग माना जाता है। इसकी जाति औड़व-औड़व होती है, अर्थात राग के आरोह और अवरोह में पाँच-पाँच स्वर प्रयोग होते हैं। इस राग में मध्यम और निषाद स्वर वर्जित होता है। शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। इसका वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर धैवत होता है। रात्रि का प्रथम प्रहर इस राग का आदर्श गायन-वादन समय होता है। यह राग पूर्वांग प्रधान है, अर्थात इसका चलन अधिकतर मन्द्र और मध्य सप्तक के पूर्वांग में होता है। यदि भूपाली के स्वरों को उत्तरांग प्रधान कर दिया जाए तो यह राग देशकार हो जाता है। इन्हीं स्वरों वाले राग को दक्षिण भारतीय संगीत में राग मोहनम् कहा जाता है। अब हम आपको राग भूपाली की एक लोकप्रिय बन्दिश सुविख्यात गायिका विदुषी किशोरी अमोनकर के स्वरों में सुनवा रहे हैं। तीनताल में निबद्ध इस रचना के बोल हैं- ‘जब से तुम संग लागली प्रीत...’


राग भूपाली : “जब से तुम संग लागली प्रीत...” : विदुषी किशोरी अमोनकर




गोपाल सिंह नेपाली 
रात्रि के पहले प्रहर में गाये-बजाए जाने वाले राग भूपाली के अलावा इस प्रहर के कुछ अन्य राग हैं- कामोद, चन्द्रकान्त, छायानट, देशकार, नटविहाग, पटविहाग, जैतकल्याण, बिहागड़ा, यमन, श्यामकल्याण, शुद्धकल्याण, श्रीकल्याण, हमीर, हंसध्वनि, केदार आदि। अब हम आपको राग केदार में पिरोया एक फिल्मी गीत सुनवाते हैं। राग केदार भी कल्याण थाट का राग है। इसकी जाति औड़व-षाड़व होती है, अर्थात आरोह में ऋषभ और गान्धार और अवरोह में केवल गान्धार स्वर वर्जित होता है। इस राग में दोनों मध्यम और शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। दोनों मध्यम के कारण ही कुछ विद्वान इस राग को बिलावल थाट तो कुछ कल्याण थाट का मानते हैं। प्राचीन शास्त्रकारों ने इसे बिलावल थाट का राग माना है। परन्तु अधिकांश आधुनिक गायक इसे कल्याण थाट का राग मानते हैं। इस राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। 1957 में प्रदर्शित फिल्म ‘नरसी भगत’ का एक गीत- 'दर्शन दो घनश्याम नाथ मोरी अँखियाँ प्यासी रे...' राग केदार का अच्छा उदाहरण है। तीनताल में निबद्ध इस गीत की धुन संगीतकार रवि ने बनाई थी। इस गीत में तीन पार्श्वगायकों की आवाज़ है- हेमन्त कुमार, मन्ना डे और सुधा मल्होत्रा। हिन्दी के यशस्वी गीतकार गोपाल सिंह नेपाली ने इस गीत को लिखा था। इस गीत से जुड़ा एक उल्लेखनीय प्रसंग श्री नेपाली के निधन के चार दशक बाद सामने आया जब ब्रिटिश फिल्म निर्माता डेनी बोयेल ने फिल्म 'स्लमडॉग मिलियोनार' का निर्माण किया था। आस्कर पुरस्कार प्राप्त इस फिल्म में नेपाली जी के गीत का इस्तेमाल किया गया था, किन्तु फिल्म में इस गीत का श्रेय भक्तकवि सूरदास को दिया गया था। गोपाल सिंह नेपाली के सुपुत्र नकुल सिंह ने मुम्बई उच्च न्यायालय में फिल्म के निर्माता के विरुद्ध क्षतिपूर्ति का दावा भी पेश किया था। कैसा दुर्भाग्य है कि एक स्वाभिमानी गीतकार को मृत्यु के बाद भी अन्याय का शिकार होना पड़ा। संगीतकार रवि का स्वरबद्ध किया यही गीत हेमन्त कुमार, मन्ना डे और सुधा मल्होत्रा की आवाज़ में अब आप सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। 


राग केदार : ‘दर्शन दो घनश्याम...’ : हेमन्त कुमार, मन्ना डे और सुधा मल्होत्रा : फिल्म नरसी भगत




संगीत पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ के 236वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक छः दशक पुरानी फिल्म के राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 240वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की चौथी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – संगीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – गीतांश में गायिका के स्वरों को पहचानिए और हमे उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार,  26 सितम्बर, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 238वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 234 की संगीत पहेली में हमने 1963 में प्रदर्शित फिल्म ‘सेहरा’ के एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग मारू बिहाग, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल कहरवा तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका लता मंगेशकर और गायक मुहम्मद रफी। इस बार की पहेली में हमारे दो नये पाठक / श्रोता शामिल हुए हैं। बठिण्डा, पंजाब से सोनू बामराह और किसी अज्ञात स्थान से देवेन श्रोफ। इन दोनों प्रतिभागियों ने तीनों प्रश्नों के सही उत्तर दिये है। परन्तु देवेन जी ने अपना उत्तर फेसबुक पर सार्वजनिक रूप से दिया था, जिसे हमने तत्काल हटा दिया था। पहेली का उत्तर फेसबुक पर भी दिया जा सकता है, किन्तु व्यक्तिगत संदेश के रूप में ही, सार्वजनिक नहीं। इनके अलावा हमारी नियमित प्रतिभागी जबलपुर से क्षिति तिवारी, वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने भी सही उत्तर दिये हैं। पाँचो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर लघु श्रृंखला ‘रागों का समय प्रबन्धन’ का यह पाँचवाँ अंक था। अगले अंक में हम रात के दूसरे प्रहर के रागों पर आधारित कार्यक्रम प्रस्तुत करेंगे। इस श्रृंखला के लिए यदि आप किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



Sunday, July 13, 2014

SWARGOSHTHI – 176 : Raag Miyan Malhar : ‘उमड़ घुमड़ गरज गरज बरसन को आए...’




स्वरगोष्ठी – 176 में आज

वर्षा ऋतु के राग और रंग – 2 : राग मियाँ मल्हार 

पावस ऋतु की चरम अवस्था के सौन्दर्य की अनुभूति कराने पूर्ण समर्थ राग मियाँ की मल्हार 



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी लघु श्रृंखला ‘वर्षा ऋतु के राग और रंग’ की दूसरी कड़ी में, मैं कृष्णमोहन मिश्र, एक बार पुनः आप सभी संगीतानुरागियों का हार्दिक स्वागत और अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम वर्षा ऋतु के राग, रस और गन्ध से पगे गीत-संगीत का आनन्द प्राप्त कर रहे हैं। हम आपसे वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले रागों और उनमें निबद्ध कुछ चुनी हुई रचनाओं पर चर्चा करेंगे। इसके साथ ही सम्बन्धित राग के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत भी प्रस्तुत कर रहे हैं। भारतीय संगीत के अन्तर्गत मल्हार अंग के सभी राग पावस ऋतु के परिवेश की सार्थक अनुभूति कराने में समर्थ हैं। आम तौर पर इन रागों का गायन-वादन वर्षा ऋतु में अधिक किया जाता है। इसके साथ ही कुछ ऐसे सार्वकालिक राग भी हैं जो स्वतंत्र रूप से अथवा मल्हार अंग के मेल से भी वर्षा ऋतु के अनुकूल परिवेश रचने में सक्षम होते हैं। इस श्रृंखला की पहली कड़ी में गत सप्ताह हमने आपसे राग मेघ मल्हार पर चर्चा की थी। आज के अंक में हम मल्हार अंग के ही सबसे लोकप्रिय राग मियाँ मल्हार पर चर्चा करेंगे। राग मियाँ मल्हार भी एक प्राचीन राग है। ऐसी मान्यता है कि अकबर के दरबारी संगीतज्ञ तानसेन ने इस राग को परिष्कृत कर लोकप्रिय किया था। इसीलिए वर्तमान में मल्हार अंग के इस राग का नामकरण उनके नाम से ही प्रचलित है। आज के अंक में हम आपके लिए राग मियाँ मल्हार में निबद्ध एक मोहक खयाल रचना सुविख्यात गायिका और विदुषी किशोरी अमोनकर के स्वरों में प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके अलावा 1971 में प्रदर्शित हिन्दी फिल्म ‘गुड्डी’ से इसी राग में पिरोया एक मधुर गीत भी सुपरिचित पार्श्वगायिका वाणी जयराम की आवाज़ में सुनवा रहे हैं। 
 


ल्हार अंग के रागों में राग मेघ मल्हार, मेघों का आह्वान करने, मेघाच्छन्न आकाश का चित्रण करने और वर्षा ऋतु के आगमन की आहट देने में सक्षम राग माना जाता है। वहीं दूसरी ओर राग मियाँ मल्हार, वर्षा ऋतु की चरम अवस्था के सौन्दर्य की अनुभूति कराने पूर्ण समर्थ है। यह राग वर्तमान में वर्षा ऋतु के रागों में सर्वाधिक प्रचलित और लोकप्रिय है। सुप्रसिद्ध इसराज और मयूरी वीणा वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र के अनुसार- राग मियाँ की मल्हार की सशक्त स्वरात्मक परमाणु शक्ति, बादलों के परमाणुओं को झकझोरने में समर्थ है। राग मियाँ की मल्हार के बारे में हमें जानकारी देते हुए पण्डित श्रीकुमार मिश्र ने हमें बताया कि यह राग काफी थाट के अन्तर्गत माना जाता है। आरोह और अवरोह में दोनों निषाद का प्रयोग किया जाता है। राग मियाँ की मल्हार के स्वरों का ढाँचा कुछ इस प्रकार बनता है कि कोमल निषाद एक श्रुति ऊपर लगने लगता है। इसी प्रकार कोमल गान्धार, ऋषभ से लगभग ढाई श्रुति ऊपर की अनुभूति कराता है। इस राग में गान्धार स्वर का प्रयोग अत्यन्त सावधानी से करना पड़ता है। राग मियाँ की मल्हार को गाते-बजाते समय राग बहार से बचाना पड़ता है। परन्तु कोमल गान्धार का सही प्रयोग किया जाए तो इस दुविधा से मुक्त हुआ जा सकता है। इन दोनों रागों को एक के बाद दूसरे का गायन-वादन कठिन होता है, किन्तु उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ ने एक बार यह प्रयोग कर श्रोताओं को चमत्कृत कर दिया था। इस राग में गमक की तानें बहुत अच्छी लगती है।

राग मियाँ की मल्हार तानसेन के प्रिय रागों में से एक है। कुछ विद्वानों का मत है कि तानसेन ने कोमल गान्धार तथा शुद्ध और कोमल निषाद का प्रयोग कर इस राग का सृजन किया था। अकबर के दरबार में तानसेन को सम्मान देने के लिए उन्हें ‘मियाँ तानसेन’ नाम से सम्बोधित किया जाता था। इस राग से उनके जुड़ाव के कारण ही मल्हार के इस प्रकार को ‘मियाँ मल्हार’ कहा जाने लगा। इस राग के बारे में चर्चा को आगे बढ़ाने से पहले आइए सुनते हैं, राग मियाँ की मल्हार में एक भावपूर्ण रचना। आपके लिए हम प्रस्तुत कर रहे हैं, विदुषी किशोरी अमोनकर के स्वर में द्रुत एक ताल में निबद्ध, मियाँ की मल्हार की एक रचना-


राग मियाँ मल्हार : ‘उमड़ घुमड़ गरज गरज बरसन को आए मेघा...’ : किशोरी अमोनकर : द्रुत एकताल




राग मियाँ मल्हार में वर्षा ऋतु के प्राकृतिक सौन्दर्य को स्वरों के माध्यम से अभिव्यक्त करने की अनूठी क्षमता होती है। इसके साथ ही इस राग का स्वर-संयोजन, पावस के उमड़ते-घुमड़ते मेघ द्वारा विरहिणी नायिका के हृदय में मिलन की आशा जागृत होने की अनुभूति भी कराते हैं। यह काफी थाट का और षाड़व-सम्पूर्ण जाति का राग है। अर्थात; आरोह में छह और अवरोह में सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं। आरोह में शुद्ध गान्धार का त्याग, अवरोह में कोमल गान्धार का प्रयोग तथा आरोह और अवरोह दोनों में शुद्ध और कोमल दोनों निषाद का प्रयोग किया जाता है। आरोह में शुद्ध निषाद से पहले कोमल निषाद तथा अवरोह में शुद्ध निषाद के बाद कोमल निषाद का प्रयोग होता है। राग के स्वरों में प्रकृति के मनमोहक चित्रण की और विरह की पीड़ा को हर लेने की अनूठी क्षमता होती है। महाकवि कालिदास रचित ‘मेघदूत’ के पूर्वमेघ के नौवें श्लोक का काव्यानुवाद करते हुए हिन्दी के सुप्रसिद्ध कवि डॉ. ब्रजेन्द्र अवस्थी ने लिखा है-


गिनती दिन जोहती बाट जो व्याकुल अर्पित जीवन सारा लिये,

प्रिया को लखोगे घन निश्चय ही गतिमुक्त अबाधित धारा लिये,

सुमनों सा मिला ललनाओं को है मन प्रीतिमरंद जो प्यारा लिये,

विरहानल में जल के रहता मिलनाशा का एक सहारा लिये।


वास्तव में पावस के उमड़ते-घुमड़ते मेघ विरह से व्याकुल नायक-नायिकाओं की विरहाग्नि को शान्त करते हैं और मिलन की आशा जगाते हैं। कई फिल्म संगीतकारों ने इस राग पर आधारित यादगार गीतों की रचना की है। ऐसे ही संगीतकारों में एक अग्रणी नाम बसन्त देसाई का है। हिन्दी और मराठी फिल्मों में राग आधारित गीत तैयार करने में इस संगीतकार का कोई विकल्प नहीं था। महाराष्ट्र के एक कीर्तनकार परिवार में 1912 में जन्में बसन्त देसाई ने मात्र 17 वर्ष की आयु में ही फिल्मों में प्रवेश किया था। प्रभात स्टूडिओ की फिल्म ‘खूनी खंजर’ बतौर अभिनेता और स्टूडिओ सहायक उनकी पहली फिल्म थी। सहायक संगीतकार के रूप उनकी प्रतिभा का परिचय कई मराठी फिल्मों में मिला। स्वतंत्र संगीतकार के रूप में 1942 में वाडिया मूवीटोन की फिल्म ‘शोभा’, 1943 में प्रदर्शित फिल्म ‘आँख का शर्म’, 1943 में बसन्त पिक्चर्स की फिल्म ‘मौज’ के माध्यम से अपनी पहचान बनाने में सफल रहे। 1943 में ही राजकमल कलामन्दिर की चर्चित फिल्म ‘शकुन्तला’ ने तो उन्हें फिल्म जगत में स्थापित ही कर दिया। इस फिल्म के गीतों में उनका रागों के प्रति अनुराग स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। रागदारी संगीत के प्रति उनका लगाव उनकी अन्तिम फिल्म ‘शक’ तक निरन्तर बना रहा। विशेष रूप से मल्हार अंग के रागों से उन्हें खूब लगाव था। 1971 में ऋषिकेश मुखर्जी के निर्देशन में बनी फिल्म ‘गुड्डी’ में राग मियाँ की मल्हार के स्वरों की चाशनी में लिपटा गीत ‘बोले रे पपीहरा...’ तो कालजयी गीतों की सूची में शीर्षस्थ है। आज हम आपको यही गीत सुनवाते हैं। राग मियाँ की मल्हार की ही एक पारम्परिक बन्दिश- ‘बोले रे पपीहरा अब घन गरजे...’ से प्रेरित फिल्म ‘गुड्डी’ का यह गीत वाणी जयराम की स्वर-प्रतिभा से सुसज्जित है। कहरवा ताल में निबद्ध, राग मियाँ की मल्हार के स्वरों से स्पंदित यह गीत आप भी सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग - मियाँ की मल्हार : ‘बोले रे पपीहरा...’ : फिल्म – गुड्डी : स्वर - वाणी जयराम : ताल – कहरवा




आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 176वें अंक की पहेली में आज हम आपको नारी कण्ठ संगीत में एक रागबद्ध खयाल रचना का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 180वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।





1 – बन्दिश के इस अंश को सुन कर राग पहचाइए और हमे राग का नाम बताइए।

2 – गीत का यह अंश सुन कर गायिका के स्वर को पहचानिए और हमे उनका नाम बताइए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 178वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 174वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको एक खयाल रचना का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग मेघ मल्हार और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायक पण्डित अजय चक्रवर्ती। इस अंक के दोनों प्रश्नों के सही उत्तर पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, चण्डीगढ़ के हरकीरत सिंह, जबलपुर से क्षिति तिवारी और हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी ने दिया है। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी श्रृंखला ‘वर्षा ऋतु के राग और रंग’ के अन्तर्गत आज के अंक में हमने आपसे राग मियाँ मल्हार पर चर्चा की। इसके साथ ही हमने इस राग में निबद्ध एक खयाल रचना और एक फिल्म संगीत का एक उदाहरण भी सुनवाया। अगले अंक में भी हम एक और ऋतु प्रधान राग की चर्चा करेंगे। यह अंक आपको कैसा लगा, हमें अवश्य बताइए। आप भी अपनी पसन्द के विषय और गीत-संगीत की फरमाइश हमें भेज सकते हैं। हमारी अगली श्रृंखलाओं के लिए आप किसी नए विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीतानुरागियों की प्रतीक्षा करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   

Sunday, July 15, 2012

वर्षा ऋतु के रंग : मल्हार अंग के रागों का संग- 2


स्वरगोष्ठी – ७९ में आज

मियाँ की मल्हार : ‘बोले रे पपीहरा...’


‘स्वरगोष्ठी’ के अन्तर्गत जारी लघु श्रृंखला ‘वर्षा ऋतु के रंग : मल्हार अंग के रागों का संग’ के दूसरे अंक में, मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का स्वागत, आज राग ‘मियाँ की मल्हार’ की स्वर-वर्षा के साथ करता हूँ। मल्हार अंग के रागों में राग मेघ मल्हार, मेघों का आह्वान करने, मेघाच्छन्न आकाश का चित्रण करने और वर्षा ऋतु की आहट देने में सक्षम राग माना जाता है। वहीं दूसरी ओर राग मियाँ की मल्हार, वर्षा ऋतु की चरम अवस्था के सौन्दर्य की अनुभूति कराने पूर्ण समर्थ है। यह राग वर्तमान में वर्षा ऋतु के रागों में सर्वाधिक प्रचलित और लोकप्रिय है। सुप्रसिद्ध इसराज और मयूरी वीणा वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र के अनुसार- राग मियाँ की मल्हार की सशक्त स्वरात्मक परमाणु शक्ति, बादलों के परमाणुओं को झकझोरने में समर्थ है।

राग मियाँ की मल्हार तानसेन के प्रिय रागों में से एक है। कुछ विद्वानों का मत है कि तानसेन ने कोमल गान्धार तथा शुद्ध और कोमल निषाद का प्रयोग कर इस राग का सृजन किया था। अकबर के दरबार में तानसेन को सम्मान देने के लिए उन्हें ‘मियाँ तानसेन’ नाम से सम्बोधित किया जाता था। इस राग से उनके जुड़ाव के कारण ही मल्हार के इस प्रकार को ‘मियाँ की मल्हार’ कहा जाने लगा। इस राग के बारे में चर्चा को आगे बढ़ाने से पहले आइए सुनते हैं, राग मियाँ की मल्हार में एक भावपूर्ण रचना। आपके लिए हम प्रस्तुत कर रहे हैं, विदुषी किशोरी अमोनकर के स्वर में द्रुत एक ताल में निबद्ध, मियाँ की मल्हार की एक रचना-

मियाँ की मल्हार : ‘उमड़ घुमड़ गरज गरज...’ : किशोरी अमोनकर



राग मियाँ की मल्हार के बारे में हमें जानकारी देते हुए जाने-माने इसराज और मयूरी वीणा वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र ने हमें बताया कि यह राग काफी थाट के अन्तर्गत माना जाता है। आरोह और अवरोह में दोनों निषाद का प्रयोग किया जाता है। राग मियाँ की मल्हार के स्वरों का ढाँचा कुछ इस प्रकार बनता है कि कोमल निषाद एक श्रुति ऊपर लगने लगता है। इसी प्रकार कोमल गान्धार, ऋषभ से लगभग ढाई श्रुति ऊपर की अनुभूति कराता है। इस राग में गान्धार स्वर का प्रयोग अत्यन्त सावधानी से करना पड़ता है। राग की कुछ अन्य विशेषताओं पर हम चर्चा जारी रखेंगे, परन्तु आइए, पहले सुनते हैं, सारंगी पर उस्ताद अब्दुल लतीफ़ खाँ का बजाया राग मियाँ की मल्हार का एक अंश।

मियाँ की मल्हार : सारंगी वादन : उस्ताद अब्दुल लतीफ़ खाँ



राग मियाँ की मल्हार को गाते-बजाते समय राग बहार से बचाना पड़ता है। परन्तु कोमल गान्धार का सही प्रयोग किया जाए तो इस दुविधा से मुक्त हुआ जा सकता है। इन दोनों रागों को एक के बाद दूसरे का गायन-वादन कठिन होता है, किन्तु उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ ने एक बार यह प्रयोग कर श्रोताओं को चमत्कृत कर दिया था। इस राग में गमक की तानें बहुत अच्छी लगती है। आइए यहाँ थोड़ा विराम लेकर राग मियाँ के मल्हार का एक और उदाहरण सुनते हैं। विश्वविख्यात फ़िल्मकार सत्यजीत रे ने १९५९ में भारतीय संगीत की दशा-दिशा को रेखांकित करती बांग्ला फिल्म ‘जलसाघर’ का निर्माण किया था। इस फिल्म में गायन, वादन और नर्तन के कई उत्कृष्ट कलासाधकों की प्रस्तुतियाँ शामिल की गईं थीं। इन्हीं में एक थे, उस्ताद सलामत अली खाँ, जिन्होने फिल्म में राग मियाँ की मल्हार की एक रचना तीनताल में निबद्ध कर प्रस्तुत की थी। लीजिए, आप भी सुनिए-

मियाँ की मल्हार : ‘जलरस बूँदन बरसे...’ : फिल्म – जलसाघर : उस्ताद सलामत अली खाँ



वर्षा ऋतु के प्राकृतिक सौन्दर्य को स्वरों के माध्यम से अभिव्यक्त करने की अनूठी क्षमता राग मियाँ की मल्हार में होती है। इसके साथ ही इस राग का स्वर-संयोजन, पावस के उमड़ते-घुमड़ते मेघ द्वारा विरहिणी नायिका के हृदय में मिलन की आशा जागृत होने की अनुभूति भी कराते हैं। कई फिल्म- संगीतकारों ने इस राग पर आधारित कुछ यादगार गीत तैयार किये हैं। इन्हीं में से आज हम आपके लिए दो गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। ये गीत राग मियाँ की मल्हार के स्वरों पर आधारित तो हैं ही, इन गीतों के बोल में वर्षा ऋतु का सार्थक चित्रण भी हुआ है। पहले प्रस्तुत है- १९९८ में प्रदर्शित फिल्म ‘साज’ का गीत, जिसे कविता कृष्णमूर्ति ने तीनताल में गाया है। इसके बाद सुनिए- १९७१ की फिल्म ‘गुड्डी’ का बेहद लोकप्रिय गीत, जिसे बसन्त देसाई ने स्वरबद्ध किया है और वाणी जयराम ने कहरवा ताल में गाया है। आप ये दोनों गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक से यहीं विराम लेने की अनुमति दीजिए।

मियाँ की मल्हार : ‘बादल घुमड़ घिर आए...’ : फिल्म – साज : कविता कृष्णमूर्ति



मियाँ की मल्हार : ‘बोले रे पपीहरा...’ : फिल्म – गुड्डी : वाणी जयराम



आज की पहेली

आज की संगीत-पहेली में हम आपको सुनवा रहे हैं, कण्ठ-संगीत का एक अंश। इसे सुन कर आपको हमारे दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ८०वें अंक तक सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाले पाठक/श्रोता हमारी तीसरी पहेली श्रृंखला के ‘विजेता’ होंगे।



१ - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

२ – इस गीत की गायिका कौन हैं?


आप अपने उत्तर हमें तत्काल swargoshthi@gmail.com पर भेजें। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के ८१वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा swargoshthi@gmail.com पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के ७७वें अंक में हमने आपको फिल्म चश्मेबद्दूर का गीत- ‘कहाँ से आए बदरा...’ का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग मेघ मल्हार और दूसरे का उत्तर है- गायिका हेमन्ती शुक्ला। दोनों प्रश्नों के सही उत्तर मीरजापुर (उ.प्र.) के डॉ. पी.के. त्रिपाठी, जबलपुर की क्षिति तिवारी और लखनऊ के प्रकाश गोविन्द ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर से हार्दिक बधाई।

झरोखा अगले अंक का

मित्रों, इस वर्ष मानसून का आगमन कुछ विलम्ब से हुआ है, किन्तु देश के अधिकतर भागों में अच्छी वर्षा हो रही है। इधर आपके प्रिय स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में भी मल्हार अंग के रागों की स्वर-वर्षा जारी है। अब तक आपने मेघ मल्हार और मियाँ की मल्हार का आनन्द प्राप्त किया है। अगले अंक से हम मल्हार का एक और प्रकार लेकर आपकी महफिल में उपस्थित होंगे। रविवार को प्रातः ९-३० बजे आप और हम ‘स्वरगोष्ठी’ के अगले अंक में पुनः मिलेंगे। तब तक के लिए हमें विराम लेने की अनुमति दीजिए।

कृष्णमोहन मिश्र

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